स्नेहा एक साधारण परिवार की लड़की थी, लेकिन उसकी मेहनत और लगन ने उसे एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर पहुंचा दिया था। उसके पिता, एक शिक्षक, ने उसे और उसके भाई को अच्छे संस्कार और शिक्षा दी थी। जब उसकी शादी की बात अर्जुन के परिवार से तय हुई, तो घर में खुशी की लहर दौड़ गई। अर्जुन एक संपन्न परिवार से था, और उसके माता-पिता ने स्नेहा को इसलिए पसंद किया क्योंकि वह एक सरकारी नौकरी में कार्यरत थी। लेकिन स्नेहा का सांवला रंग उनके मन में एक छोटी सी खटास पैदा कर रहा था, जिसे उन्होंने छुपा कर रखा था।
💍 *सगाई का दिन* आ चुका था। स्नेहा ने सादगी से सजी अपनी पसंदीदा गुलाबी साड़ी पहनी थी। अंगूठी पहनाई जा चुकी थी, और लोग धीरे-धीरे खाने में व्यस्त हो गए थे। स्नेहा अपनी सहेली और होने वाली जेठानी सीमा के साथ एक कोने में बैठी थी। सभी बातें कर रहे थे, लेकिन स्नेहा को अंदर से एक अजीब सी बेचैनी हो रही थी।
🌸 तभी उसकी सासू माँ, सुनीता देवी, कमरे में आईं और स्नेहा के पास बैठकर बोलीं, "देखो स्नेहा, अब शादी में कुछ ही दिन बचे हैं। धूप में कम निकला करो, और रात को बेसन, दही, और हल्दी का लेप लगाया करो। इससे रंग थोड़ा साफ़ हो जाएगा।" स्नेहा ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला दिया, लेकिन अंदर से वह आहत हो गई थी।
सीमा, जो हमेशा खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने की कोशिश करती थी, हंसते हुए बोली, "हाँ, नींबू और टमाटर का रस लगाओ, रंग जरूर साफ़ हो जाएगा। वैसे देवर जी को गोरी-चिट्टी लड़कियाँ पसंद हैं, मेरी तरह!" वह खिलखिलाते हुए हंस पड़ी, और माहौल में थोड़ी हल्कापन आ गया। 😌
🕒 **दिन बीतते गए**, और शादी की तारीख नजदीक आती गई। स्नेहा पर ससुराल वालों का दबाव बढ़ता गया। जब भी अर्जुन का फोन आता, वह भी सांवलेपन को लेकर स्नेहा को छेड़ता था। कभी-कभी वह सीरियस हो कर कहता, "स्नेहा, मुझे तुम्हारे सांवलेपन से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन मम्मी का अरमान है कि बहुएँ गोरी-चिट्टी हों। भाभी तो गोरी हैं, तुम थोड़ी सांवली हो, तो जो टिप्स दी जा रही हैं, उन्हें मान लो न। आखिर खूबसूरत तो तुम ही दिखोगी।"
स्नेहा ये सब सुनकर चुप रह जाती, लेकिन उसके भीतर एक तूफान उमड़ रहा था। उसे लगता कि वह अपने ही अस्तित्व से लड़ रही है। उसकी माँ भी उसे समझातीं, "बेटा, इतने बड़े घर में रिश्ता हो रहा है, ये तुम्हारी नौकरी की वजह से मुमकिन हुआ है। वे बड़े लोग हैं, उनकी सोसाइटी में उठना-बैठना है। तुम किस्मत वाली हो कि उन्होंने तुम्हें चुना है, अपने रंग-रूप के बावजूद।"
💭 **स्नेहा के मन में कई सवाल उठते**, लेकिन वह खुद को समझाने की कोशिश करती कि शायद वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जैसे-जैसे शादी का दिन करीब आने लगा, ससुराल से मिलने वाली हिदायतें और भी ज्यादा कठोर होती गईं।
🎂 **शादी से एक सप्ताह पहले** अर्जुन का जन्मदिन था। अर्जुन ने अपने दोस्तों और परिवार के लिए एक पार्टी रखी थी और स्नेहा को भी बुलाया था। सुनीता देवी ने पहले ही फोन पर उसे साफ-साफ बता दिया था कि वह पार्लर से तैयार होकर आए। स्नेहा की माँ ने भी उसे भाई के साथ पार्लर भेज दिया।
जब स्नेहा पार्टी में पहुँची, तो उसे देखते ही सुनीता देवी का चेहरा कठोर हो गया। वह नाराज होकर बड़ी बहू सीमा को बुलाती हैं और कहती हैं, "इसे बाथरूम में ले जाकर अच्छे से तैयार कर दो, अपने मेकअप से।" लेकिन स्नेहा ने जाने से इंकार कर दिया। 🚫
🌩️ सुनीता देवी का गुस्सा चरम पर पहुँच गया और उन्होंने लगभग धक्का देते हुए स्नेहा से कहा, "न रंग है, न रूप, फिर तुम्हें घमंड किस बात का है? हमने अपने से छोटे घर से रिश्ता जोड़ कर गलती कर दी।" इतने में अर्जुन भी वहाँ आ गया और स्नेहा का हाथ पकड़कर उसे बाथरूम की ओर ले जाने लगा।
स्नेहा ने अर्जुन का हाथ धीरे से छोड़ा और अपनी सास के सामने जाकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में दृढ़ता थी। उसने कहा, "हाँ, मैं साधारण घर से हूँ, और मेरा रंग सांवला है। मुझे घमंड नहीं, बल्कि गर्व है अपनी पहचान पर। मैंने अपनी मेहनत से ये मुकाम हासिल किया है। मेरे माता-पिता ने मुझे सिखाया है कि इंसान को उसके रंग-रूप से नहीं, उसके गुणों से पहचाना जाता है। और अर्जुन, तुम्हें कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि तुमने बचपन से यही देखा है कि औरतें सजावटी सामान हैं। लेकिन मुझे अपनी पहचान पर गर्व है, और मैं खुद को बदलने वाली नहीं हूँ।" 🌟
**स्नेहा ने अपनी सगाई की अंगूठी उतारकर सुनीता देवी के हाथ में रख दी** और अपने भाई का हाथ पकड़कर हॉल से बाहर निकल गई। वह एक आज़ाद हवा के झोंके की तरह बाहर निकली, अपने आत्म-सम्मान और पहचान के साथ। 🌬️
**उसने यह निर्णय लिया** कि वह ऐसे रिश्ते में नहीं बंधेगी, जहाँ उसकी पहचान को उसके रंग से तौला जाए। स्नेहा जानती थी कि असली खूबसूरती आत्म-सम्मान, गरिमा, और अपने आप पर गर्व करने में है। वह गर्व से सिर उठाए चली गई, एक नई शुरुआत की ओर। ✨
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