sunilrathod

Thursday, 19 September 2024

जिसका प्रेम बदलता रहता हैं वो तलाश में ही रहते हैं, अगर मन चित इस्थिर नही हैं तो उसकी इच्छा आकांशा बदलता रहता हैं,

 प्रेम तो सब करना चाहते हैं,पर प्रेम में कोई होना नहीं चाहते हैं। कहते हैं प्रेम कभी भी हो सकता हैं और कितने बार भी हो सकता हैं। पर आज मैं आप को कहता हूँ ,

प्रेम में सिर्फ़ आप एक बार ही हो सकते हो और यदि आप एक बार जिसके भी हो जाओगे उसके बाद आप कभी किसी के नही हो पाओगे, यही तो सास्वत प्रेम की निसानी हैं। 

यंहा सब को शिकवा शिकायत हैं कि

मेरा वाला मुझसे प्यार नहीं करता,

मुझें याद नही करता, मुझे समय नही देता, मुझें समझता नहीं, ये अपेक्षा करने से पहले ये तो जान लो कि तुम क्या करते हो,

प्रतीक्षा के बिना प्रेम और मन शांति के बिना ध्यान, या काहू की बिना कर्मकाण्ड के पूजा कभी संभव नही हुआ हैं ।

नही ना फिर बिना धैर्य और बिना प्रतीक्षा का तुम प्रेम कैसे कर पाओगे,

जिसका प्रेम बदलता रहता हैं वो तलाश में ही रहते हैं, अगर मन चित इस्थिर नही हैं तो उसकी इच्छा आकांशा बदलता रहता हैं,

प्रेम में एक भावना होता हैं आपका भावना और सामने वाले के भावना में अंतर ही प्रेम की परिधि हैं।

आप इच्छा से नही स्वेक्षा से प्रेम करिये इच्छा बदलता रहता हैं स्वेक्षा कभी नहीं बदलता और जो इच्छा से करते हैं वो भटकते हैं और जो स्वेक्षा के करते हैं वो निखड़ जाते हैं, वो इस बनावटी दुनिया से अलग हो जाते हैं।

हो सकता हैं इन बातों से आप इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते हो पर कभी चिंतन करना मालूम हो जायेगा प्रेम इतना भी जटिल नहीं हैं। बस जरूरत हैं तो स्वार्थ को तिलांजलि देने का निःस्वार्थ में प्रेम करिये फिर देखिए ज़िन्दगी कैसे हसीन हो जाता हैं।

सुनिल राठौड़ 

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