"भाभी, आपकी गुलाबी साड़ी चाहिए, मेरी दोस्त की शादी है," मीनाक्षी ने अपने भाभी कृतिका से कहा। कृतिका ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "इसमें पूछने की क्या बात है! अलमारी खुली है, जाकर ले लो।"
मीनाक्षी ने हँसते हुए कहा, "भाभी, मेकअप भी आपको ही करना पड़ेगा।" कृतिका ने प्यार से मुस्कुराते हुए हामी भरी, "अच्छा, ठीक है।"
यह सुनते ही कृतिका के मन में अतीत की यादें ताजा हो गईं। कृतिका के भी दो बड़े भाई थे, और दोनों की शादियाँ हो चुकी थीं। लेकिन उसकी भाभियाँ कृतिका से कभी प्यार नहीं करती थीं और उसके माता-पिता के साथ भी उनका व्यवहार ठीक नहीं था। एक बार, कृतिका ने अपनी भाभी से एक बैग माँगा था, तो भाभी ने उसे अपमानित करते हुए कहा, "तुम्हारी औकात नहीं है इतने महंगे बैग की। ये मेरे मायके से मिला है।"
कृतिका को यह सुनकर बहुत बुरा लगा था, जबकि उसके घर में कोई कमी नहीं थी। उसके पापा की अच्छी नौकरी थी और भाई की तनख्वाह भी शानदार थी। लेकिन उसकी भाभियाँ उसे पसंद नहीं करती थीं क्योंकि कृतिका अपने भाइयों की लाडली थी। फिर भी, कृतिका ने कभी भी अपने भाइयों से भाभियों की शिकायत नहीं की। उसके संस्कार बहुत अच्छे थे और वह रिश्तों की अहमियत समझती थी।
समय बीता, और कृतिका की शादी एक बेहद अच्छे परिवार में हुई। उसके पति आदित्य एक सफल इंजीनियर थे, और उनका परिवार काफी संपन्न था। कृतिका की शादी धूमधाम से हुई थी, और उसके मम्मी-पापा ने हर इंतजाम शानदार तरीके से किया था।
शादी के बाद, कृतिका ने अपने ससुराल में भी प्यार और अपनापन बिखेरा। खासकर अपनी ननद मीनाक्षी के साथ उसकी बेहद गहरी दोस्ती हो गई। कभी वह मीनाक्षी के लिए बड़ी बहन बन जाती, तो कभी उसकी सहेली। सासु माँ को भी कृतिका का यह व्यवहार बहुत पसंद आया। उन्हें इस बात की संतुष्टि थी कि कृतिका की वजह से मीनाक्षी को हमेशा उसका मायका जैसा प्यार और सम्मान मिलता रहेगा।
शादी के दो महीने बाद, कृतिका का जन्मदिन आया। आदित्य ने उसे एक बेहद खूबसूरत गुलाबी साड़ी और एक डायमंड रिंग उपहार में दी। सास-ससुर ने भी उसे प्यार और आशीर्वाद के साथ कई उपहार दिए। कृतिका का जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया गया, जिसमें उसके मायके वाले भी शामिल हुए थे।
कुछ दिनों बाद, मीनाक्षी की दोस्त की शादी थी, और वह कृतिका की वही गुलाबी साड़ी पहनना चाहती थी। जब उसने कृतिका से साड़ी मांगी, तो कृतिका ने बिना किसी झिझक के कहा, "इसमें पूछने की क्या बात है, मीनाक्षी! साड़ी अलमारी में रखी है, तुम खुद निकाल लो।"
कृतिका ने मीनाक्षी को खुद साड़ी पहनाई और उसका मेकअप भी किया। मीनाक्षी बेहद खुश थी, और यह देखकर सासु माँ भी बहुत खुश हो गईं। मीनाक्षी जब तैयार होकर घर से निकलने ही वाली थी, तभी कृतिका की भाभी, सुजाता, अचानक वहाँ आ गई। वह अपने भाई की शादी का कार्ड देने आई थी। उसने मीनाक्षी को गुलाबी साड़ी में देखकर कृतिका को एक कोने में बुलाया और कहा, "यह वही साड़ी है जो तुम्हारे पति ने तुम्हें उपहार में दी थी, फिर तुमने इसे अपनी ननद को क्यों दे दी?"
कृतिका ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "भाभी, रिश्ते ऐसे ही होते हैं। प्यार चीज़ों से नहीं, लोगों से होता है। मीनाक्षी के पहनने से साड़ी घिस नहीं जाएगी, लेकिन उसका दिल खुश हो जाएगा। अगर वह खुश है, तो मैं भी खुश हूँ। हमारे घर में किसी चीज़ पर 'तेरा-मेरे' का कोई अधिकार नहीं होता। यहाँ सबको बराबर का हक है। आज बात साड़ी की है, कल अगर अपने गहने भी देने पड़ें, तो मैं वो भी खुशी-खुशी दूँगी, क्योंकि यहाँ प्यार और अपनापन सबसे महत्वपूर्ण है।"
भाभी सुजाता यह सुनकर चुप हो गईं, लेकिन यह बात वहीं नहीं रुकी। आदित्य और सासु माँ, जो दूर खड़े थे, कृतिका की बातें सुन रहे थे। दोनों के चेहरे पर गर्व की मुस्कान थी, क्योंकि उन्हें एहसास हो चुका था कि कृतिका सिर्फ एक अच्छी बहू नहीं, बल्कि एक आदर्श इंसान भी है, जिसने रिश्तों की अहमियत समझ ली थी।
कृतिका की सोच ने न सिर्फ ससुराल वालों के दिलों में अपनी जगह बनाई थी, बल्कि उसने अपने जीवन में एक उदाहरण पेश किया था कि असली रिश्ते चीज़ों से नहीं, दिलों से बनते हैं।
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