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Wednesday, 4 September 2024

आठ वर्ष हो चुके थे शादी को, और मेरी गोद अब भी खाली थी

 आठ वर्ष हो चुके थे शादी को, और मेरी गोद अब भी खाली थी। हर दिन तानों से भरे होते, पति का बेरुखापन अंदर तक घुटन पैदा कर रहा था। मैंने हर संभव कोशिश की, डॉक्टर से जांच करवाई, परंतु सब रिपोर्ट्स साफ थीं कि समस्या मुझमें नहीं, मेरे पति में है। फिर भी, घर के लोग मुझे ही दोषी ठहराते थे। यह सोचकर कि मैं बांझ हूँ, मेरे अस्तित्व को ही खत्म कर रहे थे।

रोज़ के ताने, समाज के सवाल, और पति का पीकर आकर मुझ पर हाथ उठाना—ये सब मेरे जीवन का हिस्सा बन गए थे। कितनी बार घर छोड़कर मां के पास चली गई, सोचते हुए कि शायद मुझे समझने वाला कोई मिलेगा। पर मां, समाज की परवाह करते हुए, मुझे हर बार ससुराल वापस भेज देतीं। "लोग क्या कहेंगे?"—इस सवाल ने मेरी मां को भी मजबूर कर दिया, और मैं फिर वही चक्रव्यूह में फंस जाती थी।

सहना औरत का गहना है, ऐसा सुना था, पर अब समझ आया कि सहना तो औरत के लिए एक सजा है। एक ऐसी सजा, जिसके लिए वह दोषी भी नहीं होती। मेरे सब्र का बांध अब टूट चुका था। आखिर मेरा कसूर क्या था? मैंने ठान लिया कि अब और नहीं सहूंगी। तलाक का फैसला कर लिया और घर हमेशा के लिए छोड़ दिया। मां के पास आ गई, और इस बार ठान लिया कि वापस नहीं जाऊंगी।

शुरू में मां ने मुझे समझाया, लेकिन इस बार मैंने अड़ने की ठान ली थी। आखिरकार, मां ने भी मेरी बात समझी और इस बार मेरा साथ दिया। ससुराल वालों ने धमकियां दीं, मुझे डराने की कोशिश की, पर मैं अपनी जिद पर अड़ी रही। तलाक हो गया, और मैंने बदले में कुछ नहीं लिया, सिर्फ अपनी आजादी।

कुछ समय बाद, एक दिन किसी ने आगे बढ़कर मेरा हाथ थामा। पहले तो मैं डरी, लेकिन मां ने समझाया और मेरी दूसरी शादी कर दी। नए घर में सब कुछ अच्छा था। धीरे-धीरे मैं अपने पुराने घावों को भूलने लगी, और अब मैं मां बनने वाली थी। पहले पति के चेहरे पर कुदरत ने एक ऐसा तमाचा मारा कि वह तिलमिला उठा। उसकी असलियत समाज के सामने आ गई थी।

अब मैं आठवें महीने में हूँ, और कुछ ही दिनों में मेरी गोद संतान से भर जाएगी। इस बार मैं खुद को दोषी महसूस नहीं करती। मैंने अपने पहले पति को सबक सिखाया—निर्दोष होकर भी बांझ का लेबल क्यों ढोएं? क्यों अपने जीवन को बर्बाद करें उन लोगों के लिए जो हमें सिर्फ दोषी ठहराते हैं?

ये मेरी सच्ची कहानी है, और आज मैं गर्व से कह सकती हूँ कि मैंने सही फैसला लिया। अब मैं खुद को आजाद और खुशहाल महसूस करती हूँ। ऐसे मर्दों को सबक सिखाना ही चाहिए, ताकि वे जान सकें कि औरत की भी एक हद होती है, और उसे तोड़ना आसान नहीं।

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