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Wednesday, 11 September 2024

करूँ—हँसूँ या रोऊँ।

 मेरे पति रोहित और मैं, अपने दो बच्चों करण (6 साल) और दीक्षा (1 साल) के साथ हाल ही में नए घर में शिफ्ट हुए। सब कुछ सेट करने के बाद, मैंने अपनी आदत के अनुसार रात में बादाम भिगो दिए और सोने चली गई। ये बचपन से मेरी आदत रही है, शादी के बाद भी मैं रोहित और बच्चों को भी भीगे बादाम खाने के लिए देती हूँ।


सुबह उठी तो देखा कि कटोरी में बादाम थे ही नहीं! मुझे बड़ा अजीब लगा। मैं सोचने लगी, "मैंने तो रात में भिगोए थे, फिर गए कहाँ?" मैंने रोहित को उठाया और उसे बताया। वो हंसने लगा और बोला, "शायद तुमने भिगोना भूल ही गई होगी।" लेकिन मैंने कहा, "नहीं, मैंने भिगोए थे। देखो, अगर नहीं भिगाए होते तो पानी का रंग कैसे बदलता?" उसने भी मान लिया, "अरे हां, सही कह रही हो। खैर, छोड़ो अब, मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है।"


शाम को मैंने फिर से बादाम भिगोए। रोहित भी उसी समय रसोई में खड़ा था। सब कुछ सामान्य लग रहा था। फिर रात में जब रोहित ने पानी माँगा, मैं पानी लेने गई तो देखा कि बादाम फिर गायब थे! अब तो मेरा दिल दहल गया। मैंने रोहित को बुलाया, "रोहित, जल्दी आओ, फिर से बादाम गायब हो गए!" वो खुद भी हैरान था, पर मुझे ढांढस बंधाने लगा। उसने दूसरी कटोरी में बादाम डालकर कमरे में रख दिए। पूरी रात हम दोनों बार-बार कटोरी देखते रहे, पर बादाम तब तक थे।


अगले दिन मैंने ये बात अपनी पड़ोसन को बताई। उसने जो कहा, उससे मेरी तो जैसे जान ही निकल गई। उसने बताया कि इस घर में जो पहले लोग रहते थे, उनकी पत्नी का तीन महीने में देहांत हो गया था। "हो न हो, ये उसी का साया है जो तुम्हें परेशान कर रहा है," उसने कहा। अब तो रोहित भी डरने लगा था।


मैंने रसोई जाना ही बंद कर दिया, अब मैं सारा खाना अपने कमरे में ही रखती थी। जब तक रोहित शाम को वापस नहीं आता, मैं रसोई में कदम भी नहीं रखती। कुछ दिन ऐसे ही बीते, कभी बादाम होते, कभी गायब हो जाते। हर समय मैं डरी रहती थी।

एक दिन रसोई का बल्ब अचानक फूट गया। मैं जोर से चीख पड़ी, रोहित दौड़ा-दौड़ा आया। उसने मुझे संभाला और स्टूल पर चढ़कर नया बल्ब लगाने लगा। तभी उसकी नजर फ्रीज के ऊपर पड़ी—वहां ढेर सारे बादाम बिखरे हुए थे! "ये क्या! इतने सारे बादाम यहाँ कैसे आए?" उसने मुझे दिखाया। मैं तो जैसे कुछ समझ ही नहीं पा रही थी, पर रोहित अब सतर्क हो गया था।

रात में जब मैंने फिर से बादाम भिगोए, तो हम दोनों ने ध्यान से देखा कि क्या होता है। सब सोने के बाद, हमारा बेटा करण चुपके से रसोई में गया और कटोरी से बादाम निकालकर फ्रीज के ऊपर फेंक दिए! हम उसे पकड़कर हैरान रह गए। रोहित ने उसे प्यार से पूछा, "करण, ये क्या कर रहे हो?" पहले तो वो बहुत डर गया, फिर मासूमियत से बोला, "मुझे बादाम अच्छे नहीं लगते, मम्मी रोज खाने को देती है। मना करने पर भी नहीं मानती, तो मैंने ऐसा किया।"


उस पल मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं क्या करूँ—हँसूँ या रोऊँ।

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