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Thursday, 12 September 2024

विनीत नाम था उसका.

 "विनीत नाम था उसका...।" मेरे ऑफिस में वह एक थर्ड ग्रेड कर्मचारी था। मेरा हाल ही में यहाँ अफसर के पद पर तबादला हुआ था, और मैंने चार दिन पहले ही जॉइनिंग की थी। विनीत बेहद मेहनती और समझदार था। वो मुझे "दीदी" ही कहता था, लेकिन एक दिन मेरे जूनियर, सुशांत, ने उसे डांटते हुए कहा, "वो मैडम हैं, उन्हें दीदी नहीं, सपना मैडम कहा करो!" तब से वह मुझे मैडम बुलाने लगा, लेकिन न जाने क्यों, मुझे उसका "दीदी" कहना ज्यादा अच्छा लगता था।


आज वह बेहद खुश था, तो मैंने पूछ लिया, "विनीत, आज बहुत खुश दिख रहे हो, क्या बात है?"

विनीत हंसते हुए बोला, "मैम, कल राखी है ना, इसलिए घर जा रहा हूँ।"

मैंने कहा, "अच्छा, तुम्हारी बहनें हैं?"

उसने ज़ोर से हंसते हुए कहा, "हां, मैम, पांच बहनें हैं। तीन बड़ी शादीशुदा हैं, और दो छोटी।"

मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, "तोहफे ले लिए उनके लिए?"

वह बोला, "आज खरीदूंगा, मैम। ज्यादा महंगे तो नहीं ले सकता, पर जो भी हो, अपनी मेहनत से खरीदूंगा।" कहकर वह जल्दी-जल्दी अपने काम में लग गया।


उसकी मुस्कान और प्यार देखकर मेरे दिल में एक अलग सी भावना उमड़ आई। सच कहूं, तो आज पहली बार मुझे अपने भाई की बहुत याद आई। मैं अपने मम्मी-पापा की इकलौती बेटी हूँ और हर राखी पर यही खालीपन महसूस करती थी। अचानक मेरे मन में एक विचार आया। मैंने विनीत की फाइल उठाई और उसके घर का पता नोट किया, फिर तुरंत ऑफिस से निकलकर शॉपिंग करने चली गई। मेरे दिल में एक नई उमंग थी।


शॉपिंग करके जब घर पहुँची, तो मम्मी ने हैरानी से पूछा, "अरे सपना, आज ये सब क्या खरीद लाई?"

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "राखी की तैयारी कर रही हूँ, मम्मी!"

मम्मी हैरानी से मेरी ओर देखती रह गईं, क्योंकि जो बेटी हर राखी पर उदास रहती थी, वह आज इतनी उत्साहित कैसे हो गई! फिर मैंने मम्मी को अपनी योजना बताई और पापा से भी इसे लेकर बात की। दोनों ने मेरे इस निर्णय को सराहा।


अगले दिन, राखी की सुबह, मैं बहुत जल्दी उठकर तैयार हो गई। मेरे साथ मम्मी-पापा भी तैयार हो गए और हम तीनों विनीत के घर की ओर निकल पड़े। जैसे ही हम उसके घर पहुंचे, तो दरवाजा आधा खुला हुआ था। अंदर से हंसी-मजाक की आवाजें आ रही थीं। बहनों के बीच बहस चल रही थी कि पहले कौन राखी बाँधेगा। माहौल बेहद खुशनुमा और प्यार भरा था।


विनीत ने जैसे ही मुझे दरवाजे पर देखा, वह चौंक गया। "अरे मैम, आप यहाँ कैसे?"

मैंने मुस्कुराते हुए अपनी राखी निकाली और बोली, "अगर आप सबको मंजूर हो, तो मैं आज पहले राखी बांधना चाहती हूँ। क्या तुम मेरे भाई बनोगे, विनीत?"

मेरी आँखों में आँसू आ गए, और विनीत भावुक हो गया। उसने धीरे से कहा, "मैम, मैं आपको क्या दे सकता हूँ?"

वह धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। मैंने उसके कलाई पर राखी बांधी और फिर उसके लिए लाए गए उपहारों में से एक घड़ी निकालकर उसे पहनाई। मैंने उससे कहा, "ये घड़ी महज़ तोहफा नहीं है, ये विश्वास और प्रेम का प्रतीक है, जो मुझे तुममें महसूस हुआ। अब से तुम मुझे 'मैम' नहीं, दीदी ही बुलाना, जैसे पहली बार कहा था।"


विनीत की आँखों में कृतज्ञता और सम्मान था। उसकी बहनों ने भी मुझे बड़े प्यार से राखी बाँधने के लिए धन्यवाद दिया।

विनीत के लिए यह पल भी अविस्मरणीय था, और मेरे लिए भी। मैंने उसके घर में जो अपनापन महसूस किया, वह किसी बड़े गिफ्ट से बढ़कर था।


यह कहानी हमें सिखाती है कि हम अपने सहकर्मियों को केवल उनके पद से नहीं, बल्कि उनके दिल से भी जानें। किसी का छोटा या बड़ा होना उसकी काबिलियत या सम्मान को कम नहीं करता। मानवता और भाईचारे की भावना ही असली रिश्तों की नींव होती है।


आप सभी से निवेदन है कि आप भी अपने सहकर्मियों को सम्मान दें और उनके साथ भाईचारे का रिश्ता बनाए रखें।

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