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Thursday, 22 August 2024

मेरा बाल विवाह आज से आठ साल पहले हुआ था

 मेरा बाल विवाह आज से आठ साल पहले हुआ था। उस समय मैं खुद भी समझ नहीं पाया था कि शादी के क्या मायने होते हैं, और एक साथी के साथ जीवन की जिम्मेदारियां किस तरह निभाई जाती हैं। मेरी पत्नी जब 18 साल की हुई, तब वह पहली बार ससुराल आई। शुरुआती दिनों में सब कुछ ठीक ही रहा, और एक साल बाद हमारा बेटा भी हुआ। उस समय मेरे मन में उम्मीदों का एक नया सवेरा था, कि अब हम एक खुशहाल परिवार बनाकर साथ रहेंगे। लेकिन कहानी धीरे-धीरे एक अलग मोड़ लेने लगी।

बेटा जब सालभर का हुआ, तो मेरी पत्नी मायके से वापस आई। उसका मायका संपन्न था, और उसके पिता गैरकानूनी धंधों से खूब पैसा कमाते थे। उनके घर का जीवनस्तर बहुत ऊँचा था, और उस हिसाब से उनके खर्चे भी थे। दूसरी ओर, मैं एक मिडल क्लास परिवार से था। मेरे लिए हर एक रुपया महत्वपूर्ण था, और इस कारण से मैं ज्यादा खर्च नहीं कर पाता था, न ही बाहर घूमने-फिरने में पैसे उड़ा सकता था।

हमारे पास कृषि भूमि थी, जो मेरे ससुर को बहुत पसंद आई थी, और शायद यही वजह थी कि उन्होंने हमारी शादी को मंजूरी दी थी। इसके अलावा, मेरे स्वभाव और व्यवहार ने भी उन्हें प्रभावित किया था। मेरे ससुर के दो और दामाद थे, जो अच्छी तरह से खाते-पीते थे और अपनी जिंदगी में कई व्यसनों में लिप्त थे। जबकि मैं किसी भी प्रकार का व्यसन नहीं करता था। इस वजह से, मेरे ससुर मुझे अपना सबसे प्रिय दामाद मानते थे।

लेकिन, बीवी ने जिस माहौल में अपने मायके में पली-बढ़ी थी, वही वह ससुराल में भी चाहती थी। उसके पिता ने उसे जितनी छूट दी थी, उतनी ही आज़ादी और विलासिता वह मेरे घर में भी चाहती थी। वह चाहती थी कि ससुराल में भी उसी तरह का रहन-सहन हो, जैसा उसके मायके में था। लेकिन मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति और मानसिकता दोनों ही बहुत अलग थे। इन भिन्नताओं ने हमारे रिश्ते को धीरे-धीरे तनावपूर्ण बना दिया।

मेरे पिताजी ने सुझाव दिया कि हम दोनों अलग होकर रहने लगें, शायद यही समाधान हो। उन्होंने कहा कि बहू को लेकर अलग हो जाओ, शायद उसे यही चाहिए। लेकिन मेरी पत्नी को सर्वसुविधासंपन्न जीवन चाहिए था, जिसमें उसे किसी भी प्रकार का संघर्ष न करना पड़े। वह चाहती थी कि सब कुछ पका-पकाया मिल जाए, और उसे अपने जीवन में किसी भी तरह की चुनौतियों का सामना न करना पड़े।

जब उसे मन मुताबिक जीवन नहीं मिला, तो वह मुझसे झगड़ा करने लगी। बात इतनी बढ़ गई कि मैं कमरे से बाहर हॉल में सोने लगा। उसके बुरे बर्ताव और गालियों से तंग आकर, मैं अक्सर घर छोड़कर चला जाता और बहुत रात होने पर ही घर लौटता। रोज़-रोज़ की यह स्थिति मेरे लिए असहनीय हो गई थी। वह मुझे मारने की धमकी देती, झूठे केस में फंसाने की बात करती। उसकी हरकतों ने मुझे भीतर से तोड़ दिया था। उसके मायके वालों ने भी उसे पूरी तरह से समर्थन दिया। मेरे ससुर भी मुझसे गाली-गलौज करके बात करने लगे।

वह कहती कि मुझे मायके छोड़ आओ, लेकिन मैंने उसे नहीं पहुंचाया। उसके कहने के बावजूद मैं उसे वापस नहीं ले गया। अंततः एक साल पहले वह खुद ही मायके चली गई और हमारे बेटे को भी साथ ले गई।

अब, मेरे ससुर ने एक नई मांग रखी है। उनका कहना है कि अगर मैं दस लाख रुपये की सिक्योरिटी मनी दूं, तभी वे मेरी पत्नी और बेटे को वापस भेजेंगे। फिलहाल, उन्होंने कोर्ट में कोई केस नहीं किया है, लेकिन इस धमकी ने मुझे चिंता में डाल दिया है।

मेरे पिताजी ने कहा कि अब फैसला मुझे करना है। उन्होंने मुझसे कहा, "तुम्हें तय करना है कि बहू को वापस लाना है या नहीं। सोच-समझकर निर्णय लेना।"

इस सवाल ने मुझे एक कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया है।

मैंने बहुत सोचने के बाद यह महसूस किया कि विवाह सिर्फ दो लोगों का बंधन नहीं होता, बल्कि यह दो परिवारों का भी जुड़ाव है। लेकिन जब दो परिवारों की सोच, आर्थिक स्थिति और मानसिकता में इतनी बड़ी खाई हो, तो यह जुड़ाव मुश्किल हो जाता है।

मेरे लिए, यह केवल पैसों का सवाल नहीं है, बल्कि आत्म-सम्मान और अपने मूल्यों का भी सवाल है। मैं जानता हूं कि एक बार अगर मैंने उनकी मांगें मान लीं, तो यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। मेरी पत्नी को वापस लाना सिर्फ एक कदम नहीं होगा, बल्कि यह एक नए संघर्ष की शुरुआत होगी, जिसमें मुझे बार-बार झुकना पड़ेगा।

मुझे यह भी समझ में आया कि रिश्ते का आधार केवल पैसे या सुविधाएं नहीं हो सकते। अगर रिश्ते में सम्मान, समझ और प्यार न हो, तो वह रिश्ता खोखला हो जाता है। मैंने यह भी सोचा कि अगर मैं इस रिश्ते को बनाए रखने की कोशिश करता हूं, तो क्या मैं और मेरी पत्नी वाकई खुश रह पाएंगे?

इसलिए, मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मुझे अपने आत्म-सम्मान और मूल्यों को बरकरार रखते हुए ही निर्णय लेना चाहिए। मैंने पिताजी से कहा, "मैंने फैसला कर लिया है। अगर वे दस लाख रुपये की मांग कर रहे हैं, तो यह साफ है कि इस रिश्ते में अब कोई सच्चाई या सम्मान नहीं बचा है। मैं इस संबंध को जबरदस्ती नहीं खींच सकता। इसलिए, मैं उन्हें पैसे देने के बजाय, इस रिश्ते से बाहर निकलने का निर्णय लूंगा।"

यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन मैंने यह समझा कि कभी-कभी जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए हमें कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। मैंने यह भी महसूस किया कि रिश्ते केवल प्यार और सम्मान के आधार पर ही फल-फूल सकते हैं। जब तक दोनों पक्ष इस रिश्ते को समझदारी और सम्मान के साथ निभाने के लिए तैयार नहीं होंगे, तब तक यह रिश्ता सफल नहीं हो सकता।

अब मेरे सामने एक नया सफर है, जिसमें मैं अपने भविष्य का निर्माण करूंगा, अपनी शर्तों पर। यह सफर अकेला हो सकता है, लेकिन यह मेरी शर्तों पर होगा, मेरे आत्म-सम्मान के साथ। मुझे विश्वास है कि सही निर्णय लेने से, मैं एक बेहतर और सुखद भविष्य की ओर बढ़ूंगा।

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