sunilrathod

Friday, 30 August 2024

अमर विश्वास’

 मेरी बेटी की शादी थी, और मैं कुछ दिनों की छुट्टी लेकर शादी की तैयारियों में व्यस्त था। उस दिन, जब मैं सफर से लौटकर घर आया, तो मेरी पत्नी ने मुझे एक लिफाफा थमाया। लिफाफा अनजान था, लेकिन प्रेषक का नाम देखकर मेरी जिज्ञासा और आश्चर्य बढ़ गया।


**‘अमर विश्वास’**—एक ऐसा नाम, जिसे मिले हुए वर्षों बीत गए थे। मैंने लिफाफा खोला, तो उसमें **1 लाख डॉलर का चेक** और एक चिट्ठी थी। इतनी बड़ी राशि, वह भी मेरे नाम पर! मैंने जल्दी से चिट्ठी खोली और एक सांस में ही सब कुछ पढ़ डाला। पत्र किसी परी कथा जैसा था, जिसने मुझे अचंभित कर दिया। लिखा था...


**"आदरणीय सर, मैं एक छोटी सी भेंट आपको दे रहा हूं। मुझे नहीं लगता कि आपके एहसानों का कर्ज मैं कभी उतार पाऊंगा। यह उपहार मेरी अनदेखी बहन के लिए है। घर पर सभी को मेरा प्रणाम।"**


**आपका,

अमर।**


मेरी आँखों में वर्षों पुरानी यादें चलचित्र की तरह तैरने लगीं।


एक बार, मैं चंडीगढ़ में टहलते हुए एक किताबों की दुकान पर अपनी पसंदीदा पत्रिकाएं देख रहा था। तभी मेरी नजर बाहर, पुस्तकों के ढेर के पास खड़े एक लड़के पर पड़ी। वह लड़का हर संभ्रांत व्यक्ति से कुछ अनुनय-विनय करता, और कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर वापस अपनी जगह पर लौट जाता। मैं काफी देर तक उसे देखता रहा। उसकी निराशा सामान्य नहीं थी। वह बार-बार नई उम्मीद के साथ अपनी कोशिश करता, लेकिन फिर वही निराशा उसके चेहरे पर लौट आती।


आखिरकार, मैं अपनी उत्सुकता रोक नहीं पाया और उस लड़के के पास जाकर खड़ा हो गया। वह कुछ सामान्य सी विज्ञान की पुस्तकें बेच रहा था। मुझे देखकर उसमें फिर से उम्मीद जगी और उसने बड़ी ऊर्जा के साथ मुझे पुस्तकें दिखानी शुरू कीं। मैंने ध्यान से देखा—साफ-सुथरा चेहरा, आत्मविश्वास झलकता हुआ, लेकिन पहनावा साधारण। ठंड का मौसम था, और उसने केवल एक हल्का सा स्वेटर पहना हुआ था। 


**"बच्चे, ये सारी पुस्तकें कितने की हैं?"** मैंने पूछा।


**"आप कितना दे सकते हैं, सर?"**


**"अरे, कुछ तुमने सोचा तो होगा।"**


**"आप जो दे देंगे,"** लड़का थोड़ा निराश होकर बोला।


**"तुम्हें कितना चाहिए?"** मैंने पूछा, अब यह समझते हुए कि वह मेरे साथ समय बिता रहा है।


**"5 हजार रुपए,"** वह लड़का कुछ कड़वाहट के साथ बोला।


**"इन पुस्तकों का कोई 500 भी दे दे तो बहुत है,"** मैंने अनायास कह दिया, उसे दुखी नहीं करना चाहता था, लेकिन यह सुनकर उसके चेहरे पर निराशा का बादल छा गया। मुझे अपनी बात पर पछतावा हुआ, और मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रखकर सांत्वना भरे शब्दों में फिर पूछा, **"देखो बेटे, मुझे तुम पुस्तक बेचने वाले नहीं लगते, सच बताओ, क्या जरूरत है?"**


लड़का तब जैसे फूट पड़ा। **"सर, मैं 10+2 कर चुका हूं। मेरे पिता एक छोटे से रेस्तरां में काम करते हैं। मेरा मेडिकल में चयन हो चुका है। अब प्रवेश के लिए पैसे की जरूरत है। कुछ मेरे पिताजी दे रहे हैं, कुछ का इंतजाम वह अभी नहीं कर सकते,"** उसने एक ही सांस में अच्छी अंग्रेजी में कहा।


**"तुम्हारा नाम क्या है?"** मैंने मंत्रमुग्ध होकर पूछा।


**"अमर विश्वास।"**


**"तुम विश्वास हो और दिल छोटा करते हो? कितना पैसा चाहिए?"**


**"5 हजार,"** उसने इस बार दीनता से कहा।


**"अगर मैं तुम्हें यह रकम दे दूं, तो क्या मुझे वापस कर पाओगे? इन पुस्तकों की इतनी कीमत तो है नहीं,"** मैंने थोड़ा हंसते हुए पूछा।


**"सर, आपने ही कहा कि मैं विश्वास हूं। आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं। मैं पिछले 4 दिन से यहां आता हूं, आप पहले आदमी हैं जिसने इतना पूछा। अगर पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया, तो मैं भी आपको किसी होटल में कप प्लेटें धोता हुआ मिलूंगा,"** उसके स्वर में अपने भविष्य की अनिश्चितता थी।


उसके स्वर ने मेरे दिल में उसके लिए सहानुभूति और मदद की भावना जगा दी। मैंने अपने पर्स से 5 हजार रुपए निकाले, जिन्हें मैं शेयर मार्केट में निवेश करने की सोच रहा था, और उसे दे दिए। वैसे इतने रुपए मेरे लिए भी मायने रखते थे, लेकिन न जाने किस भाव ने मुझसे वह पैसे निकलवा दिए।


**"देखो बेटे, मैं नहीं जानता कि तुम्हारी बातों में कितना दम है, लेकिन मेरा दिल कहता है कि तुम्हारी मदद करनी चाहिए, इसलिए कर रहा हूं।"** मैंने पैसे उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा।


अमर हतप्रभ था। उसकी आँखों में आंसू थे। उसने मेरे पैर छुए और कहा, **"सर, ये पुस्तकें मैं आपकी गाड़ी में रख दूं?"**


**"कोई जरूरत नहीं। यह मेरा कार्ड है, जब भी कोई जरूरत हो तो मुझे बताना।"**


वह मूक खड़ा रहा और मैंने उसका कंधा थपथपाया, फिर कार स्टार्ट कर दी। कार चलाते हुए वह घटना मेरे दिमाग में घूम रही थी और मैं अपने फैसले पर सोच रहा था।


दिन गुजरते गए। अमर ने अपने मेडिकल में दाखिले की सूचना मुझे एक पत्र के माध्यम से दी। मुझे अपनी मदद में कुछ मानवता नजर आई। मैंने फिर उसके पते पर कुछ और पैसे भेजे। दिन हवा होते गए। उसका संक्षिप्त सा पत्र आता, जिसमें वह मुझे और मिनी को याद करता। मैं कभी उसके पास जाकर अपने पैसे का उपयोग देखने नहीं गया, न कभी वह मेरे घर आया। कुछ साल तक यही क्रम चलता रहा। एक दिन उसका पत्र आया कि वह उच्च शिक्षा के लिए ऑस्ट्रेलिया जा रहा है। उसने छात्रवृत्तियों का जिक्र किया और एक लाइन मिनी के लिए भी लिखी।


समय पंख लगा कर उड़ता रहा। अमर ने अपनी शादी का कार्ड भेजा। मिनी भी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी। अब मुझे मिनी की शादी की तैयारियाँ करनी थीं, और इस बीच वह चेक? मैं फिर अपनी दुनिया में लौट आया और मिनी की शादी का एक कार्ड अमर को भी भेज दिया।


शादी की गहमागहमी के बीच, मैं और मेरी पत्नी व्यवस्थाओं में व्यस्त थे। अचानक एक बड़ी सी गाड़ी पोर्च में आकर रुकी। एक संभ्रांत व्यक्ति, जिसकी गोद में एक बच्चा था, गाड़ी से बाहर निकले। मैं उन्हें देखता रहा। 


उन्होंने आकर मेरे और मेरी पत्नी के पैर छुए। 


**"सर, मैं अमर..."** वह श्रद्धा से बोले।


मेरी पत्नी अचंभित रह गई, और मैंने गर्व से उसे सीने से लगा लिया। 🌟

No comments:

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...