शिवानी का रिजर्वेशन जिस बोगी में था, उसमें ज्यादातर लड़के ही थे। टॉयलेट जाने के बहाने शिवानी पूरी बोगी घूम आई थी, और उसे वहां मुश्किल से दो-तीन महिलाएं दिखीं। मन अनजाने भय से घबराने लगा।
यह पहली बार था जब शिवानी अकेली सफर कर रही थी, इसलिए वह पहले से ही चिंतित और डरी हुई थी। उसने खुद को सहज रखने की कोशिश करते हुए चुपचाप अपनी सीट पर बैठकर मैगज़ीन निकाल ली और पढ़ने लगी।
वहीं, पास के कुछ नवयुवक, जो शायद किसी कैम्प के लिए जा रहे थे, जोर-जोर से हंसी-मजाक और चुटकुले कर रहे थे। उनके शोर ने शिवानी की हिम्मत को और भी तोड़ दिया। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा, जैसे हर पल कुछ अनहोनी की आशंका हो।
शिवानी के मन में उठ रहे भय और घबराहट के बीच रात धीरे-धीरे उतरने लगी। अचानक सामने बैठे एक युवक ने कहा, "हेलो, मैं विनय हूँ, और आप?" शिवानी ने भय से कांपते हुए धीरे से कहा, "जी, मैं...," इससे पहले कि वह कुछ और कह पाती, विनय ने मुस्कुराते हुए कहा, "कोई बात नहीं, नाम बताने की ज़रूरत नहीं। वैसे, कहाँ जा रही हैं आप?"
शिवानी ने हिचकिचाते हुए कहा, "वाराणसी।"
विनय ने उत्साहित होकर कहा, "अरे वाह, वाराणसी तो मेरी मामी का घर है! इस रिश्ते से तो आप मेरी बहन हुईं, है न?" विनय की इस बात पर शिवानी थोड़ी हैरान हुई, लेकिन वह उसकी बातों में रुचि लेने लगी। विनय ने उसे वाराणसी की कई बातें बतानी शुरू कर दीं। उसने कहा कि उसके मामा एक प्रसिद्ध व्यक्ति हैं, और उसके मामा के बेटे सेना में उच्च पदों पर हैं। इन सब बातों ने शिवानी को कुछ हद तक आराम दिया, और वह धीरे-धीरे सामान्य हो गई।
शिवानी पूरी रात विनय से बातें करती रही। उसके साथ उसने अपना भय और अनिश्चितता भूलकर कुछ सुकून के पल बिताए। उसे लगा जैसे वह वास्तव में अपने भाई के साथ है। रात जैसे कुँवारी आई थी, वैसे ही पवित्र कुँवारी गुजर गई।
सुबह होते ही शिवानी ने विनय से कहा, "लीजिए, मेरा पता रख लीजिए। कभी वाराणसी आना हो, तो जरूर मिलने आइएगा।"
विनय ने हंसते हुए जवाब दिया, "बहन, सच कहूं तो मैंने कभी वाराणसी देखा ही नहीं है। मैंने सिर्फ आपको सहज महसूस कराने के लिए ये बातें गढ़ीं।"
शिवानी चौंक गई, "क्या? आपने तो कहा था कि..."
विनय ने उसकी बात काटते हुए कहा, "बहन, ऐसा नहीं है कि सभी लड़के बुरे होते हैं। हर किसी का इरादा खराब नहीं होता। हम में ही तो वे लोग होते हैं जो पिता, भाई और मित्र बनते हैं। यह समाज वैसा नहीं है जैसा हम अक्सर सोचते हैं।"
इतना कहकर विनय ने प्यार से शिवानी के सिर पर हाथ फेरा और मुस्कुराते हुए बोला, "अपना ख्याल रखना, बहन।"
शिवानी उसे देखती रही, जैसे कोई अपना भाई उससे विदा ले रहा हो। उसकी आंखें गीली हो चुकी थीं। वह सोच रही थी, काश, इस संसार में सभी ऐसे ही होते—न कोई अत्याचार, न कोई व्यभिचार। एक भयमुक्त समाज का स्वरूप, जहां हर बहन-बेटी खुली हवा में सांस ले सके, निर्भय होकर कहीं भी, कभी भी जा सके। जहां हर कोई एक-दूसरे का मददगार हो।
तभी एक रिक्शे वाले ने आवाज दी, "बहन, कहां चलना है?"
शिवानी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "कॉलेज तक, भाई। ले चलोगे?"
आज, वह डर नहीं रही थी। क्योंकि अब वह जान गई थी कि भाई सिर्फ नाम से नहीं, बल्कि दिल से भी होते हैं।
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