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Thursday, 15 August 2024

मेरीइस यात्रा में, वह रिक्शा वाला मेरे लिए किसी देवदूत से कम नहीं

 एक दिन की बात है, जब मुझे सूरत जाना पड़ा। मेरे पास वहां एक दिन का काम था, जिसे निपटाने के लिए मैं ट्रेन से सफर कर रही थी। सूरत पहुंचने पर, मैंने एक छोटा सा होटल देखा, जो देखने में साधारण और आरामदायक लग रहा था। वहां मैंने अपना सामान रखा और कार्यक्रम स्थल के लिए निकल गई। दिनभर की भागदौड़ के बाद, जब मैं शाम को लौटने लगी, तो रात का अंधेरा गहराने लगा था।


कार्यक्रम स्थल से निकलकर मैंने एक ऑटो लिया और उस गली के करीब पहुंची जहां मेरा होटल था। ऑटो से उतरकर मैंने एक रिक्शा लिया, क्योंकि वह गली तंग थी और वहां तक पहुंचने के लिए पैदल या रिक्शे का सहारा लेना पड़ता था। लेकिन जैसे ही गली तक पहुंची, मुझे महसूस हुआ कि मैं रास्ता भूल गई हूँ। हड़बड़ी में होटल का पूरा पता लेना भूल गई थी, सिर्फ होटल का नाम याद था। लेकिन सूरत की तंग गलियों में हर ओर सिर्फ गलियां ही नजर आ रही थीं, और मुझे पता नहीं चल रहा था कि किस दिशा में जाऊं।


मैंने रिक्शा वाले से होटल का नाम बताया, लेकिन उसे भी उस जगह की जानकारी नहीं थी। मेरी चिंता बढ़ने लगी। मैंने उसे कहा कि वह मुझे उतार दे, मैं खुद ही रास्ता ढूंढ लूंगी। उसने मुझे एक मोड़ पर उतार दिया, और मैं अकेले ही होटल की तलाश में चलने लगी।


लेकिन जैसे ही मैं आगे बढ़ी, मुझे महसूस हुआ कि कोई मेरा पीछा कर रहा है। मैंने पलटकर देखा, तो वही रिक्शा वाला दूर से मेरे पीछे-पीछे चल रहा था। मैं थोड़ी देर रुकी, उसने भी वहीं रुककर इंतजार किया। इस तरह की स्थिति में मैंने खुद को असहज महसूस किया और थोड़ी बेचैनी भी होने लगी। मुझे लगा कि यह कुछ गलत है, और मैंने अपनी गति तेज कर दी, लेकिन वह आदमी अब भी मेरी ही दिशा में बढ़ रहा था।


आखिरकार, मैंने हिम्मत जुटाई और वापस लौटकर उस रिक्शा वाले के पास गई। मेरे मन में डर और गुस्सा दोनों थे, और मैंने उससे पूछा, "आप क्या कर रहे हैं? मेरे पीछे-पीछे क्यों आ रहे?"


उसने शांत स्वर में जवाब दिया, "आपका रास्ता भटक गया है, इसलिए देख रहा हूँ कि आप सही जगह पहुंच जाएं।"


मेरी नाराजगी और बढ़ गई, "इससे आपको क्या? आप जाइए, मुझे अकेला छोड़ दीजिए।"


उसने थोड़ा झुंझलाकर कहा, "नहीं, हम कहीं नहीं जाएंगे। रात का समय है और आप इस शहर से अनजान लगती हैं। मुझे पैसे की चिंता नहीं है, बस यही खड़ा रहूंगा जब तक आपको आपका होटल नहीं मिल जाता।"


उसके शब्दों में एक सच्चाई थी, जो मैंने धीरे-धीरे महसूस की। वह कहीं जाने को तैयार नहीं था, और मैं भी थक चुकी थी। मैंने आगे बढ़ने का फैसला किया, और जब भी पलटकर देखती, वह व्यक्ति दूर खड़ा मिलता, लेकिन कहीं जाता नहीं था।


काफी देर बाद, जब मैं थककर एक जगह रुक गई और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए, तभी मेरी नजर उस होटल पर पड़ी, जहां मैंने सुबह अपना सामान रखा था। वह होटल मेरे ठीक सामने था, और मैंने चैन की सांस ली। मैंने राहत की मुस्कान के साथ उस आदमी को इशारा किया, और वह पास आया।


मैंने पास की दुकान से मिठाई खरीदी और उसे दी। मैंने उसके साथ देने और मेरे लिए रुके रहने के लिए शुक्रिया कहा। वह पहली बार मुस्कुराया और बोला, "मेरी दो बेटियां हैं। एक तुम्हारी उम्र की है। इसलिए मैं खड़ा रहा, ताकि तुम सुरक्षित रहो।"


उसकी बात सुनकर मेरा दिल भर आया। मैं उसे देखती रही, जबकि वह धीरे-धीरे अंधेरे में गुम हो गया। उसकी बातों ने मुझे गहराई से छू लिया। उस रात मैंने महसूस किया कि हमारा ईश्वर वास्तव में हमारे साथ सड़कों पर चलता है, भटकने पर वह हमें सही राह दिखाने के लिए पास ही खड़ा होता है।


मैंने बाहर की एक दुकान से चाय ली और अपने भीतर एक नई ऊर्जा और विश्वास महसूस किया। मेरीइस यात्रा में, वह रिक्शा वाला मेरे लिए किसी देवदूत से कम नहीं था, जिसने मेरे विश्वास को और मजबूत किया। सच में, भगवान हमें कभी अकेला नहीं छोड़ता, वह हमारे आसपास के लोगों में हमें सुरक्षा और स्नेह देने के लिए उपस्थित रहता है।

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