सुनैना एक प्रतिष्ठित बैंक में उच्च पद पर कार्यरत थी। शादी के बाद से वह अपने ससुराल में अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने और करियर के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी। घर में बस तीन लोग थे—सुनैना, उसके पति अनुराग, जो खुद का व्यापार करते थे, और उनके वृद्ध ससुर, श्री रमेश तिवारी। सुनैना की सास का देहांत एक साल पहले ही हो चुका था, और उसके बाद से ही घर का माहौल थोड़ा सा उदासीन हो गया था।
हर दिन, जब सुनैना सुबह जल्दी उठकर घर के काम निपटाकर ऑफिस के लिए तैयार होती, ठीक उसी समय उसके ससुर, जो अक्सर अपने कमरे में रहते थे, उसे बुलाते और कहते, "बहू, मेरा चश्मा साफ कर दो, और मुझे दे दो।" सुनैना को ऑफिस के लिए देर हो रही होती थी, और वह मन ही मन झुंझलाती, लेकिन ससुर की बात का मान रखते हुए चश्मा साफ कर देती थी। यह सिलसिला रोज़ का हो गया था, और सुनैना के लिए यह बात धीरे-धीरे असहनीय हो चली थी।
एक दिन, जब यह रोज़ की बात उसके सहनशक्ति की सीमा को पार करने लगी, तो उसने यह बात अपने पति अनुराग से साझा की। अनुराग को भी यह सुनकर आश्चर्य हुआ, क्योंकि उनके पिता ने कभी ऐसी आदत नहीं दिखाई थी। अनुराग ने सुनैना को सलाह दी, "तुम सुबह उठते ही पिताजी का चश्मा साफ करके उनके कमरे में रख दिया करो, शायद इससे उनका बार-बार बुलाना बंद हो जाए।"
सुनैना ने पति की सलाह मान ली और अगले दिन से हर सुबह सबसे पहले ससुर का चश्मा साफ कर उनके कमरे में रख आती। लेकिन ससुर के बुलाने का सिलसिला थमा नहीं। सुनैना के प्रयास के बावजूद, जब वह ऑफिस के लिए निकलने लगती, तो ससुर फिर से उसे चश्मा साफ करने के लिए बुला लेते। इस आदत से सुनैना और भी अधिक परेशान हो गई थी।
समय के साथ, सुनैना ने इस स्थिति को अनदेखा करना शुरू कर दिया। ससुर की आवाज़ अब उसके लिए कोई महत्व नहीं रखती थी, और वह अपने काम में मग्न रहती। धीरे-धीरे, रिश्तों में वह गर्माहट भी कम होने लगी थी। फिर एक दिन, ससुर अचानक बीमार हो गए और कुछ ही दिनों में चल बसे। सुनैना के दिल में कहीं न कहीं पछतावा था, लेकिन उसने खुद को व्यस्त रखकर उस दर्द को दबा दिया।
ससुर के देहांत के दो साल बाद, एक दिन सुनैना ने सोचा कि घर की सफाई की जाए। सफाई करते समय, उसे अपने ससुर की एक पुरानी डायरी मिली। सुनैना ने वह डायरी खोली और उसमें लिखे पन्ने पलटने लगी। एक पन्ने पर लिखा था:
"दिनांक 24-08-09... आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में बच्चे अक्सर घर से निकलते समय बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं। यही आशीर्वाद उनके जीवन की कठिनाइयों में ढाल बनता है। इसलिए, जब तुम चश्मा साफ कर मुझे देने के लिए झुकती थी, तो मैं मन ही मन तुम्हारे सिर पर अपना हाथ रखकर तुम्हें आशीर्वाद देता था। तुम्हारी सास ने मुझसे वादा लिया था कि मैं तुम्हें अपनी बेटी की तरह ही प्यार दूंगा और तुम्हें कभी महसूस नहीं होने दूंगा कि तुम अपने ससुराल में हो, बल्कि हमेशा ऐसा लगे कि यह तुम्हारा अपना घर है।"
डायरी के ये शब्द पढ़ते ही सुनैना की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने महसूस किया कि जिस आशीर्वाद को वह अनदेखा करती आई थी, वही उसकी असली ताकत थी। अपने ससुर के उस अनकहे प्यार और आशीर्वाद की गहराई को समझकर वह फूट-फूटकर रोने लगी।
आज भी, ससुर के जाने के वर्षों बाद, सुनैना रोज़ सुबह घर से निकलते समय उनका चश्मा साफ कर, उसी टेबल पर रख देती है। उसे यह यकीन है कि उसके ससुर की आत्मा कहीं न कहीं से उसे देख रही होगी और उसे अपने आशीर्वाद से सराबोर कर रही होगी।
इस घटना ने सुनैना को रिश्तों की असली महत्ता सिखाई। अब वह समझ गई थी कि रिश्ते शब्दों से नहीं, भावनाओं से सहेजे जाते हैं। वह जीवनभर उस आशीर्वाद को संजोकर रखेगी, जो ससुर के हाथों से उसे अनकहे मिलते रहे।
रिश्तों का महत्व समझें, उन्हें संजोएं, क्योंकि जब हम उन्हें खो देते हैं, तब उनकी कीमत का एहसास होता है।
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