पूनम के मन में उस दिन एक उथल-पुथल मची थी। उसने अपने पिता के सामने खड़े होकर एक भारी दिल के साथ कहा, "पापा, मैंने अपनी पसंद के लड़के से शादी कर ली है।" उसका चेहरा उतना ही दृढ़ था जितना कि उसके शब्द। उसके पिता, रमेश बाबू, यह सुनते ही गुस्से से भर उठे। लेकिन गुस्से की आग में जलते हुए उन्होंने केवल इतना ही कहा, "मेरे घर से निकल जाओ।" पूनम ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, "अभी उनके पास कोई काम नहीं है, हमें कुछ समय रहने दीजिए। हम जल्द ही चले जाएंगे।" परंतु रमेश बाबू के कठोर हृदय में बेटी की गुहार के लिए कोई जगह नहीं थी। उन्होंने उसकी एक न सुनी और उसे घर से बाहर निकाल दिया।
समय बीतता गया, और जीवन ने अपनी करवट बदल ली। कुछ सालों बाद रमेश बाबू का निधन हो गया। इधर, पूनम की जिंदगी भी बुरी तरह बदल गई। वह जिस लड़के के साथ प्रेम की बगिया सजाकर घर आई थी, वही उसे धोखा देकर चला गया। पूनम के दो बच्चे थे, एक बेटी और एक बेटा। हालात के आगे झुककर उसने खुद का एक छोटा सा रेस्टोरेंट खोला, जिससे उसका जीवन यापन हो रहा था।
जब पूनम को अपने पिता के निधन की खबर मिली, तो उसके मन में एक अजीब सा भाव आया। "अच्छा हुआ, उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया था। आज मैं उनके लिए नहीं रो रही हूँ।" पूनम ने सोचा कि वह उनकी अंतिम यात्रा में नहीं जाएगी। पर उसके ताऊजी, शंकरलाल, ने उसे समझाया, "पूनम, जाओ, जाने वाले के साथ दुश्मनी क्यों? वह तो अब इस दुनिया में नहीं रहे।"
शंकरलाल जी की बात मानकर पूनम ने अपने पिता की अंतिम यात्रा में शामिल होने का फैसला किया। वह जब अपने पिता के घर पहुंची, तो वहां अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थीं। पूनम के चेहरे पर कोई भाव नहीं था, वह बस ताऊजी की बात मानकर वहां आई थी। तेरहवीं के दिन उसके ताऊजी ने उसे एक लिफाफा दिया, जिसमें उसके पिता का लिखा एक खत था।
रात को पूनम ने उस खत को खोला और पढ़ना शुरू किया। खत में लिखा था:
"मेरी प्यारी बेटी, पूनम,
जब तुम ये खत पढ़ रही होगी, तो शायद मैं इस दुनिया में नहीं रहूँगा। मुझे मालूम है कि तुम मुझसे नाराज हो, और हो भी क्यों न? आखिर मैंने तुम्हें घर से निकाला था। लेकिन तुम्हारी नाराजगी के पीछे भी एक पिता का दिल धड़कता था, जो तुम्हें सिर्फ खुशी और सुरक्षा देना चाहता था।
याद है, जब तुम सिर्फ पाँच साल की थी, तुम्हारी माँ हमें छोड़कर चली गई थी। तुमने कितना रोया था, और मैं रातों को तुम्हारे साथ जागता था, तुम्हें अपने सीने से लगाकर। जब तुम स्कूल जाने से डरती थी, मैं तुम्हारे साथ स्कूल की खिड़की के बाहर खड़ा रहता था, और जैसे ही तुम बाहर आती थी, तुम्हें अपनी बाहों में भर लेता था।
वह समय भी याद है, जब तुमने पहली बार जीन्स पहनी थी, कॉलोनी के लोग क्या कुछ नहीं कहते थे। पर मैंने किसी की नहीं सुनी, बस तुम्हारे साथ खड़ा रहा। तुम्हारा देर रात घर लौटना, डिस्को जाना, दोस्तों के साथ घूमना—मैंने कभी तुम पर बंदिशें नहीं लगाईं, क्योंकि मुझे तुम्हारे विश्वास पर विश्वास था।
लेकिन जिस दिन तुम बिना बताए शादी करके घर आई, मेरा दिल टूट गया। मैंने तुम्हारे लिए कितने सपने देखे थे, तुम्हें एक राजकुमारी की तरह सजाने के, तुम्हारी शादी को धूमधाम से करने के। लेकिन तुमने मेरे सारे सपनों को एक पल में बिखेर दिया।
पूनम, मैं जानता हूँ, मैं कठोर था, पर मेरा कठोरता केवल उस लड़के के लिए थी जिसने तुम्हें धोखा दिया। मैंने सबकुछ छोड़ दिया, यहाँ तक कि तुम्हारी माँ की स्मृतियों को भी अपने भीतर दबाए रखा। तुम्हारी माँ के गहने, जो मैंने तुम्हारी शादी के लिए संजोए थे, वे सब आलमारी में तुम्हारे लिए रखे हैं। मैंने जो घर और संपत्ति जुटाई थी, वह सब अब तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के नाम कर दी है।
पूनम, हो सकता है, तुम मेरे कठोर व्यवहार को कभी माफ न कर सको, लेकिन मैं हमेशा तुम्हें प्यार करता था। एक पिता के रूप में, मैंने वही किया जो मुझे सही लगा। और हाँ, शायद तुम अब समझ चुकी होगी कि औलाद का दिल तोड़ने पर कैसा लगता है। मैं तुम्हें वह दर्द नहीं देना चाहता, जो मैंने झेला है। तुमने जो किया, उसमें गलत क्या था, यह तुम्हारी सोच थी। मैं बस यही कहूँगा कि मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं था, तुम्हारा पापा था। वह पापा जिसने तुम्हारी खुशी के लिए अपनी सारी ख्वाहिशें कुर्बान कर दीं।
काश, तुमने मुझे समझा होता। अब मैं इस खत को यहीं खत्म करता हूँ। अगर हो सके तो अपने इस खराब पिता को माफ कर देना।
तुम्हारा पापा।"
खत पढ़ते-पढ़ते पूनम की आँखें नम हो गईं। उसके साथ एक छोटी सी ड्राइंग लगी थी, जो उसने बचपन में बनाई थी। उस पर लिखा था, "आई लव यू, मेरे पापा, मेरे हीरो। मैं आपकी हर बात मानूंगी।"
पूनम की आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। तभी उसके ताऊजी, शंकरलाल, कमरे में आए और बोले, "पूनम, तुम्हारे रेस्टोरेंट और घर के लिए जो पैसे मैंने दिए थे, वे तुम्हारे पापा ने ही दिए थे। औलाद चाहे कितनी भी बुरी हो, माँ-बाप कभी बुरे नहीं होते। वे मरने के बाद भी अपने बच्चों के लिए दुआ करते हैं।"
पूनम के पिता को सुकून मिला होगा या नहीं, यह तो नहीं पता, लेकिन उस खत को पढ़ने के बाद शायद पूनम को जीवनभर सुकून नहीं मिलेगा।
दोस्तों, प्यार करना और लव मैरिज करना गलत नहीं है, लेकिन अपने माँ-बाप की मर्जी और उनकी भावनाओं का सम्मान जरूर करें। हर पिता का सपना होता है कि वह अपनी बेटी को अपनी आँखों के सामने डोली में विदा करे। कोशिश करें कि उनके इस सपने को पूरा करें, ताकि किसी का दिल टूटने से बच सके।
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