शादी के कुछ महीने बाद, मैं यह सोचता था कि अगर मैं अपनी पत्नी की सभी ज़रूरतें पूरी कर दूं, तो ज़िन्दगी में कोई परेशानी नहीं आएगी। मेरे खुद के व्यापार के चलते, मुझे एक ऐसी लड़की चाहिए थी जो स्मार्ट हो, मेरे काम में मेरा हाथ बंटा सके, और समाज में अच्छी तरह से मिलजुल सके। अंजली से मेरी शादी हुई, जो खूबसूरती और दिमाग, दोनों में बेमिसाल थी।
शुरुआत के तीन महीने शानदार थे। हमारे बीच जिस्मानी रिश्ते बहुत अच्छे थे, और मुझे लगा कि मैंने सही जीवनसाथी चुना है। मुझे विश्वास था कि एक सफल शादी के लिए शारीरिक सुख सबसे महत्वपूर्ण है। लेकिन धीरे-धीरे, सेक्स से भी मन हटने लगा और व्यापार के दबाव के कारण इस ओर ध्यान देने का समय भी कम हो गया।
लेकिन असली समस्या तब शुरू हुई जब अंजली ने मुझसे कहा कि वह अपने माता-पिता से अलग एक फ्लैट में रहना चाहती है। मैंने चौंकते हुए पूछा, "क्यों? ऐसा क्या दिक्कत है यहाँ?"
अंजली ने जवाब दिया, "मुझे प्राइवेसी चाहिए। मम्मी-पापा के साथ रहते हुए वो संभव नहीं है।" मैंने कहा, "लेकिन अपना घर है, अपना कमरा है। जैसा मन करो, वैसे रहो।"
उसने बताया, "तुम्हें शायद यह आसान लगता है, लेकिन मुझे दिनभर सलवार-सूट में रहना पड़ता है, जबकि मैं शर्ट्स और टी-शर्ट में ज्यादा कंफर्टेबल महसूस करती हूँ। मायके में पापा के सामने भी निक्कर और टी-शर्ट पहन सकती हूँ, लेकिन यहाँ मर्यादा का ख्याल रखना पड़ता है।"
मैंने सोचा, "बात तो सही कह रही है।" फिर मैंने मां-पापा से इस बारे में बात की। पापा को कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन मां ने साफ मना कर दिया। उनका कहना था कि बहू को उनके हिसाब से रहना होगा।
मैं दुविधा में पड़ गया—एक ओर मां, जिन्होंने मुझे जन्म दिया, और दूसरी ओर पत्नी, जिसके साथ पूरी ज़िन्दगी गुजारनी है। शादी को केवल आठ महीने हुए थे और अब यह सवाल उठने लगा था कि किसके साथ खड़ा रहूं।
इसी दौरान, मैंने एक दिन अंजली के फोन पर इंस्टाग्राम खोला और देखा कि वह रील्स देख रही थी। एक रील में बताया जा रहा था कि कैसे माता-पिता से अलग रहने से शादीशुदा जिंदगी बेहतर होती है। दूसरी रील में सास-ससुर के साथ रहने से महिलाओं की आजादी पर असर पड़ने की बात कही गई थी। मैंने तुरंत समझ लिया कि असली समस्या "प्राइवेसी" नहीं, बल्कि ये सोशल मीडिया क्रिएटर्स हैं जो ऐसे विचार फैला रहे हैं।
मैंने सोचा, भले ही ये बातें सही लग सकती हैं, लेकिन हमारे संस्कार और परिवार का महत्व इससे कहीं अधिक है। मैंने तय किया कि किसी भी कीमत पर मां-पापा को नहीं छोड़ूंगा। बल्कि अंजली को इस सोशल मीडिया के प्रभाव से दूर करना ज्यादा जरूरी है।
उस दिन के बाद से, मैंने अंजली को ऑफिस में अपने साथ लाना शुरू किया। जब भी वह रील देखती, मैं उसे कोई काम दे देता। ऑफिस में आए बड़े डॉक्टरों ने भी उसे बताया कि रील्स देखने से होने वाले नुकसान क्या-क्या हो सकते हैं। धीरे-धीरे, अंजली ने रील्स देखना बंद कर दिया और "अलग घर" या "प्राइवेसी" की बातें भी खत्म हो गईं। 😊
अब जब कभी मैं उसे छेड़ता हूँ और कहता हूँ, "चलो, अलग घर ले लेते हैं, ताकि तुम आराम से छोटे कपड़े पहन सको," तो वह मुझे आंखें दिखाने लगती है। 😜
दोस्तों, यह समस्या सिर्फ मेरे घर में नहीं, बल्कि कई घरों में है। एक बार जरूर सोचिए कि यह मोबाइल और सोशल मीडिया अनजाने में हमारे परिवार और संस्कारों को तोड़ने का काम कर रहा है। ❤️
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