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Tuesday, 20 August 2024

मैंने पापा जी के इस फैसले को समझा

 सुबह के करीब 7 बजे थे, जब अचानक अमेरिका से भैया का वीडियो कॉल आया। मैं चौंक गई! मेरे भाई, जो आमतौर पर अपने काम की व्यस्तताओं में इतने उलझे रहते हैं कि मुश्किल से समय निकाल पाते हैं, आज खुद कॉल कर रहे थे। बिना देर किए मैंने कॉल उठाया और बोली, "नमस्ते भैया।"


भैया ने अपने चिर-परिचित अंदाज में थोड़ी उतावली के साथ जवाब दिया, "हाँ, ठीक है-ठीक है।" भैया और मेरे बीच करीब 12 साल का अंतर है, इसलिए वे आज भी मुझे बच्ची ही समझते हैं, जबकि मैं अब खुद दो बच्चों की मां बन चुकी हूँ। फिर भैया ने थोड़ी गंभीरता के साथ कहा, "तुमने कुछ सुना है कि नहीं? पापा जी उस नर्स से शादी करने जा रहे हैं जो मां के जाने के बाद से उनकी देखभाल कर रही है। मैं तो अभी आ नहीं सकता, लेकिन तुम ही उन्हें समझाओ। इस उम्र में ये सब क्या अच्छा लगता है?"


शायद पापा जी के पड़ोस में रहने वाले किसी अंकल ने उन्हें यह खबर दी थी। मैं भले ही छोटी हूँ, लेकिन पापा के लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल मुझे बिल्कुल सही नहीं लगा, इसलिए मैंने भैया को डांट दिया। भैया ने तुरंत माफी मांगते हुए कहा, "अच्छा, सॉरी-सॉरी। पर पापा को समझाना ज़रूरी है। तुम्हारी बात तो सुनते हैं। मुझसे तो हमेशा नाराज़ रहते हैं।"


मैंने थोड़ी नाराजगी के साथ जवाब दिया, "अभी दो दिन पहले ही हमारी पापा से बात हुई थी। तब तो उन्होंने कुछ नहीं कहा। वीडियो कॉल पर बातें तो हो जाती हैं, पर बहुत दिनों से मुलाकात नहीं हुई है। आज हम तीनों, मैं, मनोज और विकी पापा से मिलकर आते हैं। घर से उनका घर बस दो घंटे का रास्ता ही तो है। देखते हैं, मामला क्या है।"


हमने तुरंत पापा जी के घर जाने का फैसला किया। जब हम पहुंचे, तो मैंने आदतन उनके चरण स्पर्श किए और फिर उनके पास पलंग पर बैठ गई। कुछ इधर-उधर की बातें करके माहौल को थोड़ा हल्का किया। मुझे लगा कि पापा खुद ही अपनी बात कहेंगे, और ऐसा हुआ भी। पापा ने खुद ही विषय उठाया, "अंजू बेटी, मैं जो कहने जा रहा हूँ, उसे ध्यान से सुन। कल मैं कस्तूरी से, जो मेरी नर्स है, शादी करने वाला हूँ। लेकिन कुछ कहने से पहले मेरी बात पूरी सुन लो।"


पापा के इन शब्दों ने मुझे थोड़ी असहजता में डाल दिया, लेकिन मैं चुपचाप उनकी बात सुनने लगी। कुछ क्षणों के बाद उन्होंने गहरी सांस लेते हुए कहना शुरू किया, "बेटी, तेरी मां के जाने के बाद से, पिछले 15 वर्षों से कस्तूरी और उसकी बेटी दीपा ने मेरी तन-मन से सेवा की है। कस्तूरी विधवा है, और दीपा अभी पढ़ रही है। मैं अब 80 साल का हो चुका हूँ। यह नाज़ुक उम्र है, कभी भी बुलावा आ सकता है। कस्तूरी जिस प्राइवेट हॉस्पिटल में काम करती है, वहां उसे सिर्फ 9000 रुपये मिलते हैं। आज के समय में इतने पैसे में क्या होता है, तुम खुद ही समझ सकती हो।"


उन्होंने आगे कहा, "अब, मेरी पेंशन 50,000 रुपये है। अगर मैं कस्तूरी से शादी करता हूँ, तो मेरे बाद उसे आधी पेंशन यानी 25,000 रुपये मिल जाएगी। मैं चला जाऊंगा, पर उसका भला हो जाएगा। मैंने सब कुछ सोच-समझकर किया है। बाकी सब लिखा-पढ़ी वकील अंकल से मिलकर करवा दी है। उनसे मिलकर तुम लोग भी पुष्टि कर सकते हो। अब मैं चाहता हूँ कि तुम सभी खुश होकर और उदार हृदय से 'नई मां' का स्वागत करो।"


पापा जी की बातें सुनकर मैं अवाक् रह गई। उनके हर शब्द में एक गहरी सोच और मानवीयता थी, जिसे मैंने पहले नहीं देखा था। मुझे समझ में आया कि वे सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि कस्तूरी और उसकी बेटी के भविष्य के लिए यह फैसला कर रहे थे। यह कोई भावनात्मक निर्णय नहीं था, बल्कि पूरी तरह से सोचा-समझा हुआ कदम था।


पापा के इस निर्णय ने मेरी सोच को झकझोर दिया। मुझे एहसास हुआ कि जीवन में कुछ फैसले दिल से भी लिए जाते हैं, जिनमें किसी की भलाई की सोच होती है। यह सिर्फ पापा का निर्णय नहीं था, यह एक पिता का अपने जीवन के अंतिम चरण में लिया गया सबसे बड़ा निर्णय था, जिसमें उन्होंने अपने साथ-साथ कस्तूरी और उसकी बेटी के भविष्य की भी चिंता की थी।


मैंने पापा जी के इस फैसले को समझा और स्वीकार किया। मैंने सिर झुकाकर उन्हें सम्मान दिया और मन ही मन फैसला किया कि इस नई शुरुआत में हम सब साथ खड़े रहेंगे। आज, मैंने अपने पिता की सोच और उनके दिल की गहराई को समझा। यह मेरी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जो मुझे हमेशा याद रहेगा।

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