*# अरे भाग्यवान तुम्हारा बेटा किसी का पति भी है*
रात के 11:00 बज चुके थे। श्रीनाथ जी को बहुत नींद आ रही थी, पर पत्नी थी कि अभी तक बेटे तरुण के कमरे से निकलकर नहीं आई थी। दो बार श्रीनाथजी उसके कमरे में चक्कर लगाकर आ चुके थे और अपनी पत्नी को बुला चुके थे। आखिर बहू नव्या को रसोई में जाते देखकर उठ गए और तरुण के कमरे में जाकर बोले,
"अरी भाग्यवान, कब तक तरुण के कमरे में ही बैठी रहोगी? अब इन्हें भी सोने दो और खुद भी सो जा"
" आपको भी क्या चैन नहीं है? कुछ पल मेरे बेटे से बातें कर रही हूँ लेकिन आपको वो भी नहीं सुहाता"
" अरे मुझे तो सब सुहाता है। पर तुम दवाई लेना भूल जाती हो और फिर मुझ से ही झगड़ा करती हो कि आप याद नहीं दिला सकते थे क्या?"
" हां तो ठीक है ना, दवाई लेकर आ कर बैठ जाती हूं"
" नहीं नहीं, तुम दवाई कमरे में ही लो और फिर आराम करो। डॉक्टर ने दवा लेने के बाद आराम करने के लिए कहा है"
" लेकिन कब?"
" इस बार जब गए थे तब डॉक्टर ने कहा था"
" पर मेरे सामने तो ऐसा कुछ नहीं कहा"
" अरे तुम बाहर निकल गई थी तब कहा था"
आखिर सुषमा जी को मन मार कर अपने कमरे में आना पड़ा। सुषमा जी के कमरे में आते ही श्रीनाथजी ने कहा,
" क्या तुम बच्चों के कमरे में बैठी रहती हो। अच्छा लगता है क्या?"
" इसमें अच्छा लगने की क्या बात है? मेरे बेटे से ही तो बात कर रही हूँ। पहले भी तो रात को मैं उससे बातें करती थी"
" पर पहले की बात और थी। अब बात और है। अब घर में बहू आ चुकी है। और पहले कौन सा तुम उसके कमरे में ग्यारह बारह बजे तक बैठी रहती थी"
" तो? बहू के आने के बाद भी मेरा बेटा तो बेटा ही रहेगा ना"
सुषमा जी ने तुनक कर कहा और अपनी दवाई लेकर सोने चली गईं। श्रीनाथजी अपना सिर पकड़ कर बैठ गए।
दूसरे दिन सुबह श्रीनाथजी अपने मॉर्निंग वॉक से लौट कर आए तो घड़ी में 8:00 बज चुके थे। तरुण अपना नाश्ता कर रहा था और सुषमा जी वहीं डाइनिंग टेबल पर बैठी हुई थीं जबकि बहू नव्या नाश्ता सर्व कर रही थी। सुषमा जी नव्या को बिल्कुल भी तरुण के पास रुकने नहीं दे रही थीं। जैसे ही नव्या कुछ सर्व करने के लिए भी आती तो सुषमा जी बर्तन उसके हाथ से ले लेतीं।
श्रीनाथजी अपने साथ गरमा गरम कचोरियां लेकर आए थे। उसे नव्या को देकर बोले,
" ले बहू तरुण को भी परोस दे"
नव्या कचौरियाँ लेकर तरुण की तरफ बढ़ ही रही थी कि सुषमा जी ने उसके हाथ से कचोरियाँ भी ले लीं और उससे कहा,
" जा बहू तू तरुण का टिफिन पैक कर दे। मैं ही कचौरियाँ परोस दूंगी"
'हे भगवान! इस औरत को कब समझ आएगा' यही बात सोचते हुए श्रीनाथजी वहीं सोफे पर बैठ गए। और सुषमा जी के तमाशे देखने लगे। थोड़ी देर बाद तरुण घर से निकलने लगा तो उसने नव्या को आवाज देकर कहा,
" नव्या शाम को जल्दी तैयार हो जाना। प्रवीण के यहाँ पार्टी में जाना है। मेरे सारे दोस्त आ रहे हैं"
इससे पहले कि नव्या कुछ कहती सुषमा जी बोलीं,
" अरे फिक्र मत कर बेटा, हम लोग टाइम से तैयार हो जाएंगे। तू जा"
सुषमा जी की बात सुनकर तरुण एक पल के लिए रुक गया। यहां तक कि श्रीनाथजी भी हैरानी से अपनी पत्नी की तरफ देखने लगे तो सुषमा जी ने कहा,
"अरे खड़ा क्या है? जाता क्यों नहीं? देर हो जाएगी ऑफिस में"
तरुण ने अपने पापा की तरफ देखा, तो उन्होंने उसे जाने का इशारा किया। अपने पापा का आश्वासन पाते हैं वो वहां से रवाना हो गया, वहीं नव्या भी रसोई में चली गई। आखिर बोलती भी तो बोलती क्या?
वहीं सुषमा जी कमरे में आकर अलमारी खोलकर अलमारी के सामने खड़ी हो गईं। पीछे पीछे श्रीनाथजी भी कमरे में आ गए,
" क्या कर रही हो भाग्यवान?"
" अरे शाम की पार्टी के लिए क्या पहनूँ? बस यही सोच रही हूं"
" मैं यही तो पूछना चाहता हूं कि तुम कर क्या रही हो?"
" मतलब???"
" तुम्हें कुछ समझ है कि नहीं या तरुण की शादी के बाद समझ बेच खाई। तरुण के दोस्तों की पार्टी है, वहां तुम कहां अच्छी लगोगी?"
" अरे तो मैं तो उसके सारे दोस्तों को जानती हूं। वो सब भी तो मेरे बच्चे जैसे ही हैं"
" अरे बच्चे जैसे हैं तो भी तो उन्हें स्पेस तो चाहिए ना"
" ऐसा है तो वो अकेला चला जाएगा। जरूरी है क्या नव्या को साथ लेकर जाना? नव्या तो उसके सारे दोस्तों को भी ठीक से जानती भी नहीं"
" अरे नहीं जानती तो जान जाएगी। वो दोनों पति पत्नी हैं। तुम्हें शोभा देता है क्या बच्चों के साथ जाना"
" अरे! पर तरुण मेरा बेटा है"
" पर भाग्यवान, तुम्हारा बेटा अब किसी का पति भी है। अगर इतना ज्यादा इन दोनों के रिश्ते के बीच में आओगी तो एक दिन ऐसा आएगा कि तुम इस घर में अकेली रह जाओगी। हर रिश्ते की अपनी मर्यादा होती है। इतनी मर्यादा क्या तोड़ना कि मजबूर होकर बेटे बहू को तुम्हारे सामने खड़े होकर बोलना पड़े."
" ऐसे कैसे जी? मेरी बड़ी जीजी ने भी अपने बच्चों को कितनी छूट दी थी। क्या हुआ? बाद में बहू बेटे को लेकर के हमेशा हमेशा के लिए अलग हो गई। ना बाबा ना, मैं अपने बेटे को इस तरह अकेला नहीं छोड़ सकती और मैं नव्या को कोई मौका नहीं दूंगी कि वो मेरे बेटे को लेकर अलग हो"
" जब इतना ही डर था तो फिर बेटे की शादी ही क्यों की थी? देखो भाग्यवान, हर बात के दो पहलू होते हैं। जीजी का बेटा बहू लेकर अलग हुई। इल्जाम लगाना आसान है पर क्या उनके बेटे में अक्ल नहीं थी"
" लेकिन"
" लेकिन वेकिन कुछ नहीं। शाम को सिर्फ नव्या और तरुण जा रहे हैं। कुछ तो अपने संस्कारों पर भी विश्वास करो। थोड़ा स्पेस तो दो बच्चों को। और आइंदा मैंने इस तरह की हरकत देखी ना तो याद रखना मैं तरुण को कह दूंगा कि अपना ट्रांसफर दूसरे शहर करवा ले। फिर बैठी रहना अकेली."
जब श्रीनाथजी ने थोड़ा सख्त होते हुए कहा, तब जाकर सुषमा जी चुप हो गईं। आखिर पति को गुस्से में देख कर उन्होने चुप रहना ही ठीक समझा। क्योंकि वो जानती थीं, आखिर गलत वो खुद ही हैं। आखिर शाम को तरुण और नव्या ही पार्टी में गए।
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