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Thursday, 29 August 2024

अर्जुन ने हमें सिखाया कि सच्ची खुशी और सुकून कहीं और नहीं, बल्कि अपने परिवार और अपनों के साथ ही मिलती है।

 मेरा मित्र, अर्जुन, जिसे मैंने पांच साल पहले आखिरी बार देखा था, अचानक दुबई चला गया था। उसकी जिंदगी का मकसद बड़ा स्पष्ट था—अपनी बहनों की शादियाँ करना, घर का कर्ज़ उतारना, और अपने बूढ़े माता-पिता की सेवा करना। हालांकि, हम फेसबुक पर अक्सर बात कर लिया करते थे, फिर भी जब वह पांच साल बाद लौटकर आया, तो उसकी आँखों में एक अलग ही गहराई दिखी। उसकी जिंदगी की कहानी कुछ ऐसी थी जिसे सुनकर हम सभी मित्र मंडली गहरी सोच में डूब गए।


एक दिन हम सभी दोस्तों ने मिलकर अर्जुन को घेरा और उससे पूछा, "और भाई, कैसी रही अरब की जिंदगी?"


अर्जुन ने गहरी सांस ली, जैसे एक लंबी कहानी कहने की तैयारी कर रहा हो। फिर उसने कहना शुरू किया:


"देखो, भाई, पाँच साल हो गए थे सऊदी में काम करते हुए। पहले साल की सारी कमाई तो कर्ज़ उतारने में चली गई। दूसरा साल बहनों की शादियों में खर्च हो गया। तुम जानते हो ना, परिवार की जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। तीसरे साल कुछ पैसे बचाने की सोची, लेकिन अब्बा की तबियत खराब हो गई। लौटने की हिम्मत नहीं हो रही थी, फिर अब्बा भी दुनिया से चले गए। चौथा साल अब्बा के इलाज और उनकी मौत के सदमे में निकल गया।"


हम सबके चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। अर्जुन ने कहानी को जारी रखते हुए कहा, "अम्मा बूढ़ी हो गई थीं, घर पर अकेली थीं, लेकिन मेरे पास कोई बचत नहीं थी। पांच साल सऊदी में बिताने के बाद भी, जब घर लौटने का समय आया, तो खाली हाथ लौटना पड़ा। अम्मा की जिद और बहनों की पुकार ने मेरी हिम्मत बढ़ाई, 'भाई, बस आ जाओ, हमें कुछ नहीं चाहिए।' सोचा, चलो अब यहां ही कुछ कर लेंगे।"


अर्जुन ने गहरी नजरों से हमारी तरफ देखा और फिर बोला, "जब घर लौटा, तो लगा कि ये पांच साल जैसे एक सपना था, एक ऐसा सपना जिसे पूरा करने की जद्दोजहद में सब कुछ दांव पर लग गया। अगले ही दिन बहनों से मिलने गया। पहली बहन के बच्चों के हाथ पर सौ रुपये रखकर आया, लेकिन जब दूसरी बहन के घर पहुंचा, तो पास में एक भी पैसा नहीं बचा था। सोचा, चलो ये तो अपनी है, समझ जाएगी। पर वह समझी नहीं। घर वापस आया तो अम्मा ने बताया कि बड़ी बहन का फोन आया था। उसने कहा, 'भाई पांच साल बाद सऊदी से आया था, बच्चों के हाथों पर सौ रुपये रखकर गया, इतना तो किसी फकीर को भी दे देते हैं।'"


अर्जुन की आवाज में दर्द साफ झलक रहा था। उसने आगे कहा, "दूसरी बहन बोली, 'भाई, पांच साल बाद सऊदी से आए और बच्चों के हाथ पर दस रुपये भी नहीं रखे। बच्चों ने कहा कि मामू आए थे, खाली हाथ। मेरी ससुराल में मेरी नाक कटवा दी।'"


हम सब सुनकर चुप हो गए। अर्जुन की आँखों में एक अजीब सी निराशा थी। उसने कहा, "मैं खड़ा था, और अपने पिछले पाँच सालों की कमाई का हिसाब लगा रहा था। ये सिर्फ मेरी कहानी नहीं है, भाई। हम में से कई लोग, जो पैसे कमाने के लिए घर से दूर जाते हैं, उनके साथ यही होता है। जब आप कमा रहे होते हैं, तो सब आपको सर पर उठाते हैं, लेकिन जब कभी कमाने का सिलसिला टूट जाता है, तो सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है। मान-सम्मान, रिश्ते, सब एक पल में धुंधले हो जाते हैं।"


अर्जुन की बात ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया। उसने हमें एक ऐसी सच्चाई दिखाई, जिसे हम शायद अपने आरामदायक जीवन में कभी समझ ही नहीं पाए थे। हमने अपने दोस्त के साथ वो समय बिताया, उसकी बातें सुनीं और महसूस किया कि जिंदगी में धन और दौलत से बढ़कर भी कुछ है—समय, प्रेम, और वो रिश्ते जिनकी कद्र शायद हम अक्सर भूल जाते हैं।


अर्जुन ने हमें सिखाया कि सच्ची खुशी और सुकून कहीं और नहीं, बल्कि अपने परिवार और अपनों के साथ ही मिलती है।

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