sunilrathod

Thursday, 5 December 2024

मेरी शादी को 20 साल से ज़्यादा हो गए हैं।

 पत्नियां संभोग सुख की चेष्टा रखती हैं लेकिन जल्दी संतुष्टि नहीं प्राप्त करती हैं 


मेरी शादी को 20 साल से ज़्यादा हो गए हैं।


जब मैंने अपनी पत्नी को पहली बार देखा तो उनके चेहरे के हाव भाव देखकर महसूस हुआ कि शायद वो मेरे लिए ठीक नहीं हैं। किन्तु घर मे सभी को पसंद थीं, बाकी सभी मानदंडों पर खरा उतर रहीं थीं और मेरे पास अपना कोई विकल्प नहीं था तो मैंने हाँ कह दी।

जिसका डर था वो ही हुआ हमारा स्वभाव एक दूसरे से काफी भिन्न है। इसलिए आजतक मतभेद भी बहुत चलते रहते हैं।

शादी के लगभग 2 वर्ष उपरांत हमारी साली जी हमारे ही गृह शहर में स्वयं की शादी के लिए अपने मामा जी के यहाँ रहने आईं।

हमारा मेलजोल बढ़ा। वो अपने स्त्री सुलभ तरीके से अंजाने में हमें आकर्षित करती थीं, किन्तु हमने सब समझते हुए भी नज़रअंदाज़ किया। हम शादीशुदा जो थे।

इधर कुछ महीनों के बाद पत्नी जी को आगे की पढ़ाई अथवा नौकरी के सिलसिले में हमारा गृह शहर छोड़ना पड़ा। खट-पट हमारी कभी बन्द हुई ही नहीं।

एक बार कुछ दिनों के लिए में बाहर गया था और वापस गृह शहर लौट कर कॉल किया तो हमारी साली जी ने फ़ोन उठाते ही हम पर " I LOVE YOU" दाग दिया।

साली जी का यही स्त्री सुलभ तरीका, जो कि शायद उनका स्वाभाव था, हम पर असर करना शुरू कर गया। आखिर कब तक बचते?


उनकी शादी के 15 वर्ष बीत गए और उस वाकये को भी लगभग 17 वर्ष हो गए। उनके अपने पति और श्वसुराल वालों के प्रति स्वभाव एवं समर्पण को और गहराई से समझने का मौका मिला।

चूँकि एक ही परिवार से सम्बद्ध हैं तो मुलाक़ात होती रहती है। भले ही हमारे बीच बात न होती हो, एक दूसरे के जीवन मे क्या चल रहा है उसकी खबर भी लगती रहती है।

इसलिए आज भी मुझे ये महसूस होता है कि शायद हम एक दूसरे के लिए ही बने थे। लेकिन नियति नहीं चाहती थी कि हम एक हों।

उनका तो पता नहीं हम आजतक उस टीस से बाहर नहीं निकल पाए। आज भी मन के किसी कोने में ये इच्छा दबी हुई है कि उनके साथ कुछ पल गहनता के साथ बिताने को मिलें।

शादी के कुछ सालों बाद ही रंभा और आशुतोष का वैवाहिक जीवन टूटने की कगार पर पहुंच गया.

 शादी के कुछ सालों बाद ही रंभा और आशुतोष का वैवाहिक जीवन टूटने की कगार पर पहुंच गया.


आज सलोनी विदा हो गई. एअरपोर्ट से लौट कर रंभा दी ड्राइंगरूम में ही सोफे पर निढाल सी लेट गईं. 1 महीने की गहमागहमी, भागमभाग के बाद आज घर बिलकुल सूनासूना सा लग रहा था. बेटी की विदाई से निकल रहे आंसुओं के सैलाब को रोकने में रंभा दी की बंद पलकें नाकाम थीं. मन था कि आंसुओं से भीग कर नर्म हुई उन यादों को कुरेदे जा रहा था, जिन्हें 25 साल पहले दफना कर रंभा दी ने अपने सुखद वर्तमान का महल खड़ा किया था.


मुंगेर के सब से प्रतिष्ठित, धनाढ्य मधुसूदन परिवार को भला कौन नहीं जानता था. घर के प्रमुख मधुसूदन शहर के ख्यातिप्राप्त वकील थे. वृद्धावस्था में भी उन के यहां मुवक्किलों का तांता लगा रहता था. वे अब तक खानदानी इज्जत को सहेजे हुए थे. लेकिन उन्हीं के इकलौते रंभा के पिता शंभुनाथ कुल की मर्यादा के साथसाथ धनदौलत को भी दारू में उड़ा रहे थे. उन्हें संभालने की तमाम कोशिशें नाकाम हो चुकी थीं. पिता ने किसी तरह वकालत की डिगरी भी दिलवा दी थी ताकि अपने साथ बैठा कर कुछ सिखा सकें. लेकिन दिनरात नशे में धुत्त लड़खड़ाती आवाज वाले वकील को कौन पूछता?


बहू भी समझदार नहीं थी. पति या बच्चों को संभालने के बजाय दिनरात अपने को कोसती, कलह करती. ऐसे वातावरण में बच्चों को क्या संस्कार मिलेंगे या उन का क्या भविष्य होगा, यह दादाजी समझ रहे थे. पोते की तो नहीं, क्योंकि वह लड़का था, दादाजी को चिंता अपनी रूपसी, चंचल पोती रंभा की थी. उसे वे गैरजिम्मेदार मातापिता के भरोसे नहीं छोड़ना चाहते थे. इसी कारण मैट्रिक की परीक्षा देते ही मात्र 18 साल की उम्र में रंभा की शादी करवा दी.


आशुतोषजी का पटना में फर्नीचर का एक बहुत बड़ा शोरूम था. अपने परिवार में वे अकेले लड़के थे. उन की दोनों बहनों की शादी हो चुकी थी. मां का देहांत जब ये सब छोटे ही थे तब ही हो गया था. बच्चों की परवरिश उन की बालविधवा चाची ने की थी.


शादी के बाद रंभा भी पटना आ गईं. रिजल्ट निकलने के बाद उन का आगे की पढ़ाई के लिए दाखिला पटना में ही हो गया. आशुतोषजी और रंभा में उम्र के साथसाथ स्वभाव में भी काफी अंतर था. जहां रंभा चंचल, बातूनी और मौजमस्ती करने वाली थीं, वहीं आशुतोषजी शांत और गंभीर स्वभाव के थे. वे पूरा दिन दुकान पर ही रहते. फिर भी रंभा दी को कोई शिकायत नहीं थी.


नया बड़ा शहर, कालेज का खुला माहौल, नईनई सहेलियां, नई उमंगें, नई तरंगें. रंभा दी आजाद पक्षी की तरह मौजमस्ती में डूबी रहतीं. कोई रोकनेटोकने वाला था नहीं. उन दिनों चाचीसास आई हुई थीं. फिर भी उन की उच्छृंखलता कायम थी. एक रात करीब 9 बजे रंभा फिल्म देख कर लौटीं. आशुतोषजी रात 11 बजे के बाद ही घर लौटते थे, लेकिन उस दिन समय पर रंभा दी के घर नहीं पहुंचने पर चाची ने घबरा कर उन्हें बुला लिया था. वे बाहर बरामदे में ही चाची के साथ बैठे मिले.


‘‘कहां से आ रही हो?’’ उन की आवाज में गुस्सा साफ झलक रहा था.


‘‘क्लास थोड़ी देर से खत्म हुई,’’ रंभा दी ने जवाब दिया.


‘‘मैं 5 बजे कालेज गया था. कालेज तो बंद था?’’


अपने एक झूठ को छिपाने के लिए रंभा दी ने दूसरी कहानी गढ़ी, ‘‘लौटते वक्त सीमा दीदी के यहां चली गई थी.’’ सीमा दी आशुतोषजी के दोस्त की पत्नी थीं जो रंभा दी के कालेज में ही पढ़ती थीं.


आशुतोषजी गुस्से से हाथ में पकड़ा हुआ गिलास रंभा की तरफ जोर से फेंक कर चिल्लाए, ‘‘कुछ तो शर्म करो… सीमा और अरुण अभीअभी यहां से गए हैं… घर में पूरा दिन चाची अकेली रहती हैं… कालेज जाने तक तो ठीक है… उस के बाद गुलछर्रे उड़ाती रहती हो. अपने घर के संस्कार दिखा रही हो?’’


आशुतोषजी आपे से बाहर हो गए थे. उन का गुस्सा वाजिब भी था. शादी को 1 साल हो गया था. उन्होंने रंभा दी को किसी बात के लिए कभी नहीं टोका. लेकिन आज मां तुल्य चाची के सामने उन्हें रंभा दी की आदतों के कारण शर्मिंदा होना पड़ा था.


रंभा दी का गुस्सा भी 7वें आसमान पर था. एक तो नादान उम्र उस पर दूसरे के सामने हुई बेइज्जती के कारण वे रात भर सुलगती रहीं.


सुबह बिना किसी को बताए मायके आ गईं. घर में किसी ने कुछ पूछा भी नहीं. देखने, समझने, समझाने वाले दादाजी तो पोती की विदाई के 6 महीने बाद ही दुनिया से विदा हो गए थे.


आशुतोषजी ने जरूर फोन कर के उन के पहुंचने का समाचार जान लिया. फिर कभी फोन नहीं किया. 3-4 दिनों के बाद रंभा दी ने मां से उस घटना का जिक्र किया. लेकिन मां उन्हें समझाने के बजाय और उकसाने लगीं, ‘‘क्या समझाते हैं… हाथ उठा दिया… केस ठोंक देंगे तब पता चलेगा.’’ शायद अपने दुखद दांपत्य के कारण बेटी के प्रति भी वे कू्रर हो गई थीं. उन की ममता जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम कर रही थी. रंभा दी अपनी विगत जिंदगी की कहानी अकसर टुकड़ोंटुकड़ों में बताती रहतीं, ‘‘मुझे आज भी जब अपनी नादानियां याद आती हैं तो अपने से ज्यादा मां पर क्रोध आता है. मेरे 5 अनमोल साल मां के कारण मुझ से छिन गए. लेकिन शायद मेरा कुछ भला ही होना था…’’ और वे फिर यादों में खो जातीं…


इंटर की परीक्षा करीब थी. वे अपनी पढ़ाई का नुकसान नहीं चाहती थीं, इसलिए परीक्षा देने पटना में दूर के एक मामा के यहां गईं. वहां मामा के दानव जैसे 2 बेटे अपनी तीखी निगाहों से अकसर उन का पीछा करते रहते. उन की नजरें उन के शरीर का ऐसे मुआयना करतीं कि लगता वे वस्त्रविहीन हो गई हैं. एक रात अपनी कमर के पास किसी का स्पर्श पा कर वे घबरा कर बैठ गईं. एक छाया को उन्होंने दौड़ते हुए बाहर जाते देखा. उस दिन के बाद से वे दरवाजा बंद कर के सोतीं. किसी तरह परीक्षा दे कर वे वापस आ गईं.


मां की अव्यावहारिक सलाह पर एक बार फिर वे अपनी मौसी की लड़की के यहां दिल्ली गईं. उन्होंने सोचा था कि फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर के बुटीक वगैरह खोल लेंगी. लेकिन वहां जाने पर बहन को अपने 2 छोटेछोटे बच्चों के लिए मुफ्त की आया मिल गई. वे अकसर उन्हें रंभा दी के भरोसे छोड़ कर पार्टियों में व्यस्त रहतीं. बच्चों के साथ रंभा को अच्छा तो लगता था, लेकिन यहां आने का उन का एक मकसद था. एक दिन रंभा ने मौसी की लड़की के पति से पूछा, ‘‘सुशांतजी, थोड़ा कोर्स वगैरह का पता करवाइए, ऐसे कब तक बैठी रहूंगी.’’


बहन उस वक्त घर में नहीं थी. बहनोई मुसकराते हुए बोले, ‘‘अरे, आराम से रहिए न… यहां किसी चीज की कमी है क्या? किसी चीज की कमी हो तो हम से कहिएगा, हम पूरी कर देंगे.’’


उन की बातों के लिजलिजे एहसास से रंभा को घिन आने लगी कि उन के यहां पत्नी की बड़ी बहन को बहुत आदर की नजरों से देखते हैं… उन के लिए ऐसी सोच? फिर रंभा दी दृढ़ निश्चय कर के वापस मायके आ गईं.


मायके की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. पिताजी का लिवर खराब हो गया था. उन के इलाज के लिए भी पैसे नहीं थे. रंभा के बारे में सोचने की किसी को फुरसत नहीं थी. रंभा ने अपने सारे गहने बेच कर पैसे बैंक में जमा करवाए और फिर बी.ए. में दाखिला ले लिया. एम.ए. करने के बाद रंभा की उसी कालेज में नौकरी लग गई.


5 साल का समय बीत चुका था. पिताजी का देहांत हो गया था. भाई भी पिता के रास्ते चल रहा था. घर तक बिकने की नौबत आ गई थी. आमदनी का एक मात्र जरीया रंभा ही थीं. अब भाई की नजर रंभा की ससुराल की संपत्ति पर थी. वह रंभा पर दबाव डाल रहा था कि तलाक ले लो. अच्छीखासी रकम मिल जाएगी. लेकिन अब तक की जिंदगी से रंभा ने जान लिया था कि तलाक के बाद उसे पैसे भले ही मिल जाएं, लेकिन वह इज्जत, वह सम्मान, वह आधार नहीं मिल पाएगा जिस पर सिर टिका कर वे आगे की जिंदगी बिता सकें.


आशुतोषजी के बारे में भी पता चलता रहता. वे अपना सारा ध्यान अपने व्यवसाय को बढ़ाने में लगाए हुए थे. उन की जिंदगी में रंभा की जगह किसी ने नहीं भरी थी. भाई के तलाक के लिए बढ़ते दबाव से तंग आ कर एक दिन बहुत हिम्मत कर के रंभा ने उन्हें फोन मिलाया, ‘‘हैलो.’’


‘‘हैलो, कौन?’’


आशुतोषजी की आवाज सुन कर रंभा की सांसों की गति बढ़ गई. लेकिन आवाज गुम हो गई.


हैलो, हैलो…’’ उन्होंने फिर पूछा, ‘‘कौन? रंभा.’’


‘‘हां… कैसे हैं? उन की दबी सी आवाज निकली.’’


‘‘5 साल, 8 महीने, 25 दिन, 20 घंटों के बाद आज कैसे याद किया? उन की बातें रंभा के कानों में अमृत के समान घुलती जा रही थीं.’’


‘‘आप क्या चाहते हैं?’’ रंभा ने प्रश्न किया.


‘‘तुम क्या चाहती हो?’’ उन्होंने प्रतिप्रश्न किया.


‘‘मैं तलाक नहीं चाहती.’’


‘‘तो लौट आओ, मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं.’’ और सचमुच दूसरे दिन बिना किसी को बताए जैसे रंभा अपने घर लौट गईं. फिर साहिल पैदा हुआ और फिर सलोनी.


रंभा दी मुंगेर के जिस कालेज में इकोनौमिक्स की विभागाध्यक्ष और सहप्राचार्या थीं, उसी कालेज में मैं हिंदी की प्राध्यापिका थी. उम्र और स्वभाव में अंतर के बावजूद हम दोनों की दोस्ती मशहूर थी.


रंभा दी को पूरा कालेज हिटलर के नाम से जानता था. आभूषण और शृंगारविहीन कठोर चेहरा, भिंचे हुए होंठ, बड़ीबड़ी आंखों को ढकता बड़ा सा चश्मा. बेहद रोबीला व्यक्तित्व था. जैसा व्यक्तित्व था वैसी ही आवाज. बिना माइक के भी जब बोलतीं तो परिसर के दूसरे सिरे तक साफ सुनाई देता.


लेकिन रंभा दी की सारी कठोरता कक्षा में पढ़ाते वक्त बालसुलभ कोमलता में बदल जाती. अर्थशास्त्र जैसे जटिल विषय को भी वे अपने पढ़ाने की अद्भुत कला से सरल बना देतीं. कला संकाय की लड़कियों में शायद इसी कारण इकोनौमिक्स लेने की होड़ लगी रहती थी. हर साल इस विषय की टौपर हमारे कालेज की ही छात्रा होती थी.


मैं तब भी रंभा दी के विगत जीवन की तुलना वर्तमान से करती तो हैरान हो जाती कि कितना प्यार, तालमेल है उन के परिवार में. अगर रंभा दी किसी काम के लिए बस नजर उठा कर आशुतोषजी की तरफ देखतीं तो वे उन की बात समझ कर जब तक नजर घुमाते साहिल उसे करने को दौड़ता. तब तक तो सलोनी उस काम को कर चुकी होती.


दोनों बच्चे रूपरंग में मां पर गए थे. सलोनी थोड़ी सांवली थी, लेकिन तीखे नैननक्श और छरहरी काया के कारण बहुत आकर्षक लगती थी. वह एम.एससी. की परीक्षा दे चुकी थी. साहिल एम.बी.ए. कर के बैंगलुरु में एक अच्छी फर्म में मैनेजर के पद पर नियुक्त था. उस ने एक सिंधी लड़की को पसंद किया था. मातापिता की मंजूरी उसे मिल चुकी थी मगर वह सलोनी की शादी के बाद अपनी शादी करना चाहता था.


लेकिन सलोनी शादी के नाम से ही बिदक जाती थी. शायद अपनी मां के शुरुआती वैवाहिक जीवन के कारण उस का शादी से मन उचट गया था.


फिर एक दिन रंभा दी ने ही समझाया, ‘‘बेटी, शादी में कोई शर्त नहीं होती. शादी एक ऐसा पवित्र बंधन है जिस में तुम जितना बंधोगी उतना मुक्त होती जाओगी… जितना झुकोगी उतना ऊपर उठती जाओगी. शुरू में हम दोनों अपनेअपने अहं के कारण अड़े रहे तो खुशियां हम से दूर रहीं. फिर जहां एक झुका दूसरे ने उसे थाम के उठा लिया, सिरमाथे पर बैठा लिया. बस शादी की सफलता की यही कुंजी है. जहां अहं की दीवार गिरी, प्रेम का सोता फूट पड़ता है.’’


धीरेधीरे सलोनी आश्वस्त हुई और आज 7 फेरे लेने जा रही थी. सुबह से रंभा दी का 4-5 बार फोन आ चुका था, ‘‘सुभि, देख न सलोनी तो पार्लर जाने को बिलकुल तैयार नहीं है. अरे, शादी है कोई वादविवाद प्रतियोगिता नहीं कि सलवारकमीज पहनी और स्टेज पर चढ़ गई. तू ही जरा जल्दी आ कर उस का हलका मेकअप कर दे.’’


5 बज गए थे. साहिल गेट के पास खड़ा हो कर सजावट वाले को कुछ निर्देश दे रहा था. जब से शादी तय हुई थी वह एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह घरबाहर दोनों के सारे काम संभाल रहा था. मुझे देख कर वह हंसता हुआ बोला, ‘‘शुक्र है मौसी आप आ गईं. मां अंदर बेचैन हुए जा रही हैं.’’


मैं हंसते हुए घर में दाखिल हुई. पूरा घर मेहमानों से भरा था. किसी रस्म की तैयारी चल रही थी. मुझे देखते ही रंभा दी तुरंत मेरे पास आ गईं. मैं ठगी सी उन्हें निहार रही थी. पीली बंधेज की साड़ी, पूरे हाथों में लाल चूडि़यां, पैरों में आलता, कानों में झुमके, गले में लटकी चेन और मांग में सिंदूर. मैं तो उन्हें पहचान ही नहीं पाई.


‘‘रंभा दी, कहीं समधी तुम्हारे साथ ही फेरे लेने की जिद न कर बैठें,’’ मैं ने छेड़ा.


‘‘आशुतोषजी पीली धोती में मंडप में बैठे कुछ कर रहे थे. यह सुन कर ठठा कर हंस पड़े. फिर रंभा दी की तरफ प्यार से देखते हुए कहा, ‘‘आज कहीं, बेटी और बीवी दोनों को विदा न करना पड़ जाए.’’


रंभा दीदी शर्म से लाल हो गईं. मुझे खींचते हुए सलोनी के कमरे में ले गईं. शाम कोजब सलोनी सजधज कर तैयार हुई तो मांबाप, भाई सब उसे निहार कर निहाल हो गए. रंभा दी ने उसे सीने से लगा लिया. मैं ने सलोनी को चेताया, ‘‘खबरदार जो 1 भी आंसू टपकाया वरना मेरी सारी मेहनत बेकार हो जाएगी.’’


सलोनी धीमे से हंस दी. लेकिन आंखों ने मोती बिखेर ही दिए. रंभा दी ने हौले से उसे अपने आंचल में समेट लिया.


स्टेज पर पूरे परिवार का ग्रुप फोटो लिया जा रहा था. रंभा दी के परिवार की 4 मनकों की माला में आज दामाद के रूप में 1 और मनका जुड़ गया था.


उन लोगों को देख कर मुझे एक बार रंभा दी की कही बात याद आ गई. कालेज के सालाना जलसे में समाज में बढ़ रही तलाक की घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था कि प्रेम का धागा मत तोड़ो, अगर टूटे तो फिर से जोड़ो

आज उन्हें और उन के परिवार को देख कर यह बात सिद्ध भी हो रही थी. रंभा दी के प्रेम का धागा एक बार टूटने के बावजूद फिर जुड़ा और इतनी दृढ़ता से जुड़ा कि गांठ की बात तो दूर उस की कोई निशानी भी शेष नहीं है. उन के सच्चे, निष्कपट प्यार की ऊष्मा में इतनी ऊर्जा थी जिस ने सभी गांठों को पिघला कर धागे को और चिकना और सुदृढ़ कर दिया.


Wednesday, 4 December 2024

शादी होती है तो संभोग होना लाज़मी है,

 शादी होती है तो संभोग होना लाज़मी है, एक लड़का शादी करता है तो उसके पीछे मुख्य कारण लड़की का शरीर है, लेकिन अगर गहराई से समझा जाए तो ऐसा नहीं है बात इससे कहीं ज्यादा बड़ी है 

मेरी शादी को छह साल हो गए थे। मेरे पति, राकेश, एक साधारण आदमी थे। बैंक में नौकरी करते थे और बस, उनकी दुनिया मेरे और हमारे छोटे से घर तक ही सीमित थी।, न कोई बड़े-बड़े सपने दिखाते थे। उनकी बातें, उनकी आदतें, सब मुझे साधारण लगती थीं। मैं अक्सर सोचती, "काश मेरी शादी किसी और से हुई होती, जो ज्यादा रोमांचक होता, मेरे लिए कुछ अलग करता।"


मेरे करीब तभी आते थे जब उन्हें शारीरिक संतुष्टि चाहिए होती थी और यही से मेरे मन में ये बात घर कर गई कि लडको को सिर्फ इस ही चीज से मतलब है 


मुझे कभी उनकी कद्र ही नहीं हुई। छोटी-छोटी बातों पर मैं उन्हें टोक देती। कभी कपड़े सही से नहीं पहने, कभी दाल में नमक ज्यादा डाल दिया, तो कभी बच्चों के होमवर्क में मदद करते-करते थक जाते। मुझे उनकी ये मुझे ये सब कभी अच्छी नहीं लगी।


मुझे इस बात से नफरत होती थी जब मैं बाहर माडर्न कपड़े पहन कर जाती और वो बोलते बाहर निकलने से पहले ध्यान दिया करो क्या पहनना है क्या नहीं

पर मैं बेपरवाह उनकी बात ध्यान नहीं देती थी


एक दिन राकेश जल्दी उठकर काम के लिए तैयार हो रहे थे। मैंने बिना देखे ही कहा, "ऑफिस के बाद सब्जी ले आना। हर बार भूल जाते हो।" उन्होंने सिर हिलाया और मुस्कुराते हुए बोले, "ठीक है।" वो दरवाजे से बाहर निकले और फिर... वो कभी वापस नहीं आए।


राकेश का ऑफिस जाते वक्त एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। जब पुलिस की गाड़ी मेरे घर के बाहर रुकी और उन्होंने खबर दी, तो जैसे मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।


चंद दिनों बाद मुझे पता चला कि राकेश ने हमारे नाम पर बीमा लिया था। एक करोड़ की रकम मेरे खाते में आ गई। रिश्तेदारों ने कहा, "बहुत अच्छा किया राकेश ने। देखो, तुम्हारे और बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर दिया।" मैं बस चुपचाप सुनती रही।


वो एक करोड़ रुपये मेरे सामने थे, लेकिन मेरे पास राकेश नहीं था। मैंने सोचा, इस पैसे से मैं क्या खरीद सकती हूं? उनके चाय बनाने का तरीका? उनका बच्चों के साथ खेलना? वो हर शाम मुझे दफ्तर से फोन कर कहना, "कुछ चाहिए क्या?"


आज राकेश नहीं है, और मैं खुद माडर्न कपड़े नहीं पहनती क्यों की पहले मै बेपरवाह थी क्यों की लोग गंदी नजरों से नहीं देखते थे क्यों की राकेश साथ रहते थे 

आज ऐसा करने से पहले 100 बार सोचना पड़ता है


अब सब कुछ वही था, लेकिन उनके बिना सब अधूरा। जब मैं सुबह उठती, तो उनकी आदत थी चाय बनाकर मेरे पास लाने की। अब चाय का कप खाली था। जब मैं गुस्से में होती, तो वो मजाक करके मेरा मूड हल्का कर देते। अब वो खामोशी थी जो मेरे दिल को हर दिन तोड़ती थी।


मुझे याद आता है, कैसे वो हर महीने सैलरी मिलते ही मेरे लिए चुपचाप मेरी पसंद की साड़ी खरीद लाते थे। मैं शिकायत करती, "जरूरत नहीं थी, पैसे बचाया करो।" और वो कहते, "तुम्हारी मुस्कान के लिए इतना खर्च कर सकता हूं।"


अब मुझे एहसास हुआ कि वो छोटे-छोटे पल ही असली खुशियां थे। वो 'साधारण' पल ही मेरी जिंदगी का आधार थे। जिन बातों को मैं नज़रअंदाज़ करती थी, वो ही मेरे जीवन का हिस्सा थीं।


जीवन का सबक


अब जब मैं अकेली हूं, तो हर पल राकेश को महसूस करती हूं। हर चीज, हर कोना उनकी याद दिलाता है। जो बातें पहले मुझे शिकायतें लगती थीं, आज वही मेरी सबसे कीमती यादें हैं।


पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है, लेकिन वो जो रिश्ता, जो प्यार, जो अपनापन राकेश ने मुझे दिया, उसे कोई नहीं खरीद सकता। अब मैं समझती हूं कि प्यार दिखावा नहीं, बल्कि छोटी-छोटी चीजों में छुपा होता है।


काश, मैंने उनकी कदर पहले की होती। काश, मैंने उनकी हर छोटी बात को समझा होता। पर अब सिर्फ यही सोचती हूं—उनकी कमी हर पल महसूस होती है।


आज मैं नई लड़कियों की पोस्ट और वीडियो देखती हूं उसपे वो पति की बुराई करती हैं, और ज्यादातर महिलाएं आज अपने पति से संतुष्ट नहीं है और रोज घर में किसी ना किसी बात को लेके क्लेश करती है 


बस एक बात बोलूंगी, एक बार आंख बंद कर के देखो और सोचो अगर तुम्हारा पति तुम्हारे साथ ना रहे तो तुम्हारी दुनिया कैसी रहेगी

Tuesday, 3 December 2024

दो शरीर संभोग करें तो "काम"

 दो शरीर संभोग करें तो "काम"

दो मन संभोग करें तो "प्रेम"


दो दिल संभोग करें तो "ध्यान"

दो आत्माएं संभोग करें तो "समाधि"


दो पति-पत्नी संभोग करें तो "कर्तव्य"

दो प्रेमी संभोग करें तो "सुकून"


दो अनजान संभोग करें तो "वासना"

दो पड़ौसी संभोग करें तो "मजबूरी

लेखक: सुनिल राठौड़ 

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आज दराज़ में मिले तेरे ख़त कई पुराने थे

यक़ीनन वो मेरे गुज़रे हुए खूबसूरत ज़माने थे


कुछ वादे टूटे- बिखरे और गुम हो गए

ये वो वादे थे जो हमें उम्र भर निभाने थे


वफ़ा की राह में बिछड़े थे हम क्यों ..कब ..कैसे 

ये वो मसले थे जो हमें मिल बैठ कर सुलझाने थे


अब तलक हमारी हर शेर ओ शायरी का मेयार हो तुम

तुम्हारी दास्तान से जो गुमशुदा हम वो बदनसीब अफसाने थे


हाय ! क्या दौर था मोहब्बत के हसीं आलम का

किस कदर हम तेरे इश्क़ में दीवाने थे...


तुम हज़ार मर्तबा भी रुठ जाते तो मना लेते तुम्हे

बस हमारे दरमियां रकीबो के फ़लसफ़े ना आने थे


अभी कल की ही तो बात थी होठों पर मुस्कुराहट थी

आज ये आलम है कि ग़मज़दा धड़कनों के तराने हैं!


युवाओं को मेरी सलाह...

 युवाओं को मेरी सलाह...

1. अपनी #यौन इच्छाओं पर नियंत्रण ही आपकी सफलता या असफलता का कारण होगा।


2. पोर्न और हस्तमैथुन सफलता का सबसे बड़ा हत्यारा है। यह आपके मस्तिष्क को अवरुद्ध और नष्ट कर देता है।


3. ऊँट की तरह शराब पीने से बचें। अपने होश खोने और मूर्ख बनने से बुरा कुछ नहीं है।


4. अपने मानक ऊँचे रखें और किसी चीज़ से सिर्फ़ इसलिए संतुष्ट न हों कि वह उपलब्ध है।


5. अगर आपको कोई आपसे ज़्यादा होशियार मिले, तो उसके साथ काम करें, प्रतिस्पर्धा न करें।


6. कोई भी आपकी समस्याओं को बचाने नहीं आ रहा है। आपके जीवन की 100% ज़िम्मेदारी आपकी है।


7. आपको ऐसे लोगों से सलाह नहीं लेनी चाहिए जो जीवन में उस मुकाम पर नहीं हैं जहाँ आप पहुँचना चाहते हैं।


8. पैसे कमाने के नए तरीके खोजें। पैसे कमाएँ और उन मज़ाक करने वालों को नज़रअंदाज़ करें जो आपका मज़ाक उड़ाते हैं।


9. आपको 100 सेल्फ़-हेल्प किताबों की ज़रूरत नहीं है, आपको बस कार्रवाई और आत्म-अनुशासन की ज़रूरत है। अनुशासित रहें!


10. नशीली दवाओं से बचें। खरपतवार से बचें।


11. YouTube पर कौशल सीखें, नेटफ्लिक्स पर घटिया सामग्री देखने में अपना समय बर्बाद न करें।


12. कोई भी आपकी परवाह नहीं करता। इसलिए शर्मीलेपन को छोड़ें, बाहर जाएँ और अपने लिए अवसर बनाएँ।


13. आराम सबसे बुरी लत है और अवसाद का सस्ता टिकट है।


14. अपने परिवार को प्राथमिकता दें। भले ही वे बदबूदार हों, भले ही वे मूर्ख हों, उनका बचाव करें। उनकी नग्नता को छिपाएँ।


15. नए अवसर खोजें और अपने से आगे के लोगों से सीखें।


16. किसी पर भरोसा न करें। किसी एक पर भी नहीं, चाहे आपको कितना भी प्रलोभन क्यों न दिया जाए। खुद पर विश्वास रखें।


17. चमत्कार होने का इंतज़ार न करें। हाँ, आप हमेशा अकेले नहीं कर सकते, लेकिन लोगों की राय न सुनें।


18. कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प आपको कुछ भी हासिल करा सकता है। खुद को विनम्र बनाना ही आपको ऊँचा उठाता है।


19. खुद को खोजने का इंतज़ार करना बंद करें। इसके बजाय खुद को बनाएँ।


 20. दुनिया आपके लिए धीमी नहीं होगी।


21. कोई भी आपका कुछ भी कर्जदार नहीं है।


22. जीवन एक एकल खिलाड़ी का खेल है। आप अकेले पैदा हुए हैं। आप अकेले मरने वाले हैं। आपकी सभी व्याख्याएँ अकेले हैं। आप तीन पीढ़ियों में चले गए हैं और किसी को परवाह नहीं है। आपके आने से पहले, किसी को परवाह नहीं थी। यह सब एकल खिलाड़ी है।


23. आपका जीवन पथ इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि आप हर समय ज़रूरतमंद, उदास और कमज़ोर महसूस करते हैं। और केवल एक ही रास्ता है, जो बाहर निकलने का फैसला करना है। आपके अलावा कोई भी खुद को और अपने प्रियजनों को नहीं बचा सकता।


24. हर किसी का दिल आपके जैसा नहीं होता। हर कोई आपके साथ उतना ईमानदार नहीं होता जितना आप उनके साथ हैं। आप ऐसे लोगों से मिलेंगे जो आपको अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करेंगे और फिर अपने जीवन का वह हिस्सा बीत जाने और संतुष्ट होने के बाद आपको त्याग देंगे। जागते रहें।


 25. 25 वर्ष की आयु तक, आपको इतना समझदार हो जाना चाहिए कि:

→दूसरों की सफलता का जश्न मनाएँ

→ईर्ष्या और जलन से बचें

→खुले दिमाग रखें

→अनुमान लगाने से बचें

→इरादे से काम करें

→कृतज्ञता का अभ्यास करें

→ईमानदारी से बोलें

→रोज़ाना व्यायाम करें

→गपशप से बचें

→स्वच्छ भोजन करें

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         धन्यवाद❤💐 खुश रहो, मस्त रहो,स्वस्थ रहो 

20 तक की गिनती सुनाएगा, वही राजकुमारी का पति बनेगा

 एक राजा की बेटी की शादी होनी थी। बेटी की यह शर्त थी कि जो भी 20 तक की गिनती सुनाएगा, वही राजकुमारी का पति बनेगा। गिनती ऐसी होनी चाहिए जिसमें सारा संसार समा जाए। जो यह गिनती नहीं सुना सकेगा, उसे 20 कोड़े खाने पड़ेंगे। यह शर्त केवल राजाओं के लिए ही थी।


अब एक तरफ राजकुमारी का वरण और दूसरी तरफ कोड़े! एक-एक करके राजा-महाराजा आए। राजा ने दावत का आयोजन भी किया। मिठाई और विभिन्न पकवान तैयार किए गए। पहले सभी दावत का आनंद लेते हैं, फिर सभा में राजकुमारी का स्वयंवर शुरू होता है।


एक से बढ़कर एक राजा-महाराजा आते हैं। सभी गिनती सुनाते हैं, जो उन्होंने पढ़ी हुई थी, लेकिन कोई भी ऐसी गिनती नहीं सुना पाया जिससे राजकुमारी संतुष्ट हो सके।


अब जो भी आता, कोड़े खाकर चला जाता। कुछ राजा तो आगे ही नहीं आए। उनका कहना था कि गिनती तो गिनती होती है, राजकुमारी पागल हो गई है। यह केवल हम सबको पिटवा कर मज़े लूट रही है।


यह सब नज़ारा देखकर एक हलवाई हंसने लगा। वह कहता है, "डूब मरो राजाओं, आप सबको 20 तक की गिनती नहीं आती!"


यह सुनकर सभी राजा उसे दंड देने के लिए कहने लगे। राजा ने उससे पूछा, "क्या तुम गिनती जानते हो? यदि जानते हो तो सुनाओ।"


हलवाई कहता है, "हे राजन, यदि मैंने गिनती सुनाई तो क्या राजकुमारी मुझसे शादी करेगी? क्योंकि मैं आपके बराबर नहीं हूँ, और यह स्वयंवर भी केवल राजाओं के लिए है। तो गिनती सुनाने से मुझे क्या फायदा?"


पास खड़ी राजकुमारी बोलती है, "ठीक है, यदि तुम गिनती सुना सको तो मैं तुमसे शादी करूँगी। और यदि नहीं सुना सके तो तुम्हें मृत्युदंड दिया जाएगा।"


सब देख रहे थे कि आज तो हलवाई की मौत तय है। हलवाई को गिनती बोलने के लिए कहा गया।


राजा की आज्ञा लेकर हलवाई ने गिनती शुरू की:


"एक भगवान,  

दो पक्ष,  

तीन लोक,  

चार युग,  

पांच पांडव,  

छह शास्त्र,  

सात वार,  

आठ खंड,  

नौ ग्रह,  

दस दिशा,  

ग्यारह रुद्र,  

बारह महीने,  

तेरह रत्न,  

चौदह विद्या,  

पन्द्रह तिथि,  

सोलह श्राद्ध,  

सत्रह वनस्पति,  

अठारह पुराण,  

उन्नीसवीं तुम और  

बीसवां मैं…"

सब लोग हक्के-बक्के रह गए। राजकुमारी हलवाई से शादी कर लेती है! इस गिनती में संसार की सारी वस्तुएं मौजूद हैं। यहाँ शिक्षा से बड़ा तजुर्बा है। 🙏🏻🙏🏻

Monday, 2 December 2024

आशुतोष की शुरुआती शिक्षा गाडरवारा के ही विद्यालय में हुई थी

 मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर ज़िला के गाडरवारा में जन्मे दिग्गज अभिनेता आशुतोष राणा का पूरा नाम आशुतोष रामनारायण नीखरा है। आशुतोष के माता पिता प्यार से उन्हें राणा कह के बुलाते थे। आशुतोष की शुरुआती शिक्षा गाडरवारा के ही विद्यालय में हुई थी। बाद में उन्होंने डॉ॰ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्यप्रदेश से स्नातक किया। 


आशुतोष की पढ़ाई सेे जुड़ीएक बहुत रोचक घटना है जिस का वर्णन उन्होंने स्वयं कई बार किया है। आशुतोष ने बताया कि उनके पिताजी ने अच्छी शिक्षा के लिए आशुतोष और उनके भाई का प्रवेश गाडरवारा से जबलपुर के क्राइस्ट चर्च स्कूल में करवा दिया जहाँ आशुतोष के ऊपर अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव इतना अधिक पड़ा कि एक दिन जब उनके माता-पिता उनसे मिलने उनके स्कूल पहुंचे तो आशुतोष ने उनको प्रभावित करने के लिये उनके पैर छूने की बजाय गुड ईवनिंग कह कर उनका अभिवादन किया और जिस माँ से वो हर समय लिपटे रहते थे उनके पास भी नहीं गये और माँ कि निश्चल हंसी से उन्हें लगा कि सबलोग उनके इस आत्मविश्वास से बहुत प्रभावित हो गये हैं लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा थोड़ी ही देर बाद उनके पिता ने कहा कि अपना सामान पैक करो तुम लोगों को गाडरवारा वापस चलना है आगे की पढ़ाई अब वहीं होगी। 


बड़े अचरज के साथ जब उन्होंने इसका कारण पूछा तो उनके पिता ने उत्तर दिया कि "राणाजी मैं तुम्हें मात्र अच्छा विद्यार्थी नहीं एक अच्छा व्यक्ति बनाना चाहता हूँ। तुम लोगों को यहाँ नया सीखने भेजा था पुराना भूलने नहीं। कोई नया यदि पुराने को भुला दे तो उस नए की शुभता संदेह के दायरे में आ जाती है, हमारे घर में हर छोटा अपने से बड़े परिजन, परिचित,अपरिचित जो भी उसके सम्पर्क में आता है उसके चरण स्पर्श कर अपना सम्मान निवेदित करता है लेकिन देखा कि इस नए वातावरण ने मात्र सात दिनों में ही मेरे बच्चों को परिचित छोड़ो अपने माता पिता से ही चरण स्पर्श की जगह गुड ईवनिंग कहना सिखा दिया। मैं नहीं कहता की इस अभिवादन में सम्मान नहीं है, किंतु चरण स्पर्श करने में सम्मान होता है यह मैं विश्वास से कह सकता हूँ। विद्या व्यक्ति को संवेदनशील बनाने के लिए होती है संवेदनहीन बनाने के लिए नहीं होती। मैंने देखा तुम अपनी माँ से लिपटना चाहते थे लेकिन तुम दूर ही खड़े रहे, विद्या दूर खड़े व्यक्ति के पास जाने की समझ देती है ना कि अपने से जुड़े हुए से दूर करने का काम करती है।"


उन्होंने कहा "आज मुझे विद्यालय और स्कूल का अंतर समझ आया, व्यक्ति को जो शिक्षा दे वह विद्यालय जो उसे सिर्फ साक्षर बनाए वह स्कूल, मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चे सिर्फ साक्षर हो के डिग्रियोंं के बोझ से दब जाएँ मैं अपने बच्चों को शिक्षित कर दर्द को समझने उसके बोझ को हल्का करने की महारत देना चाहता हूँ। मैंने तुम्हें अंग्रेज़ी भाषा सीखने के लिए भेजा था आत्मीय भाव भूलने के लिए नहीं। संवेदनहीन साक्षर होने से कहीं अच्छा संवेदनशील निरक्षर होना है। इसलिए बिस्तर बाँधो और घर चलो

आशुतोष और उनके भाई तुरंत अपने माता पिता के चरणों में गिर गए उनके पिता ने उन्हें उठा कर गले से लगा लिया और कहा कि किसी और के जैसे नहीं स्वयं के जैसे बनो। पिता की ये बातें आशुतोष ने उनके आशीर्वाद की तरह गाँठ बाँधकर रख ली और उन बातों को यादकर वो आज भी आत्मविश्वास से भर जाते हैं।


#AshutoshRana #actor #actorlife #bollywoodyaatra 

हर चीज़ सही मात्रा में खाइये,

 खुद को बढ़ती उम्र के साथ स्वीकारना एक तनावमुक्त जीवन देता है।

हर उम्र एक अलग तरह की खूबसूरती लेकर आती है उसका आनंद लीजिये

बाल रंगने हैं तो रंगिये, 

वज़न कम रखना है तो रखिये, 

मनचाहे कपड़े पहनने हैं तो पहनिए,

बच्चों की तरह खिलखिलाइये, 

अच्छा सोचिये, 

अच्छा माहौल रखिये, 

शीशे में दिखते हुए अपने अस्तित्व को स्वीकारिये। 


कोई भी क्रीम आपको गोरा नही बनाती, 

कोई शैम्पू बाल झड़ने नही रोकता,

कोई तेल बाल नही उगाता, 

कोई साबुन आपको बच्चों जैसी स्किन नही देता। 

चाहे वो PNG हो या पतंजलि.....सब सामान बेचने के लिए झूठ बोलते हैं। 


ये सब कुदरती होता है। 

उम्र बढ़ने पर त्वचा से लेकर बॉलों तक मे बदलाव आता है। 

पुरानी मशीन को Maintain करके बढ़िया चला तो सकते हैं, पर उसे नई नही कर सकते।


ना किसी टूथपेस्ट में नमक होता है ना किसी मे नीम। 

किसी क्रीम में केसर नही होती, क्योंकि 2 ग्राम केसर भी 500 रुपए से कम की नही होती ! 


कोई बात नही अगर आपकी नाक मोटी है तो,

कोई बात नही आपकी आंखें छोटी हैं तो,

कोई बात नही अगर आप गोरे नही हैं 

या आपके होंठों की shape perfect नही हैं, 


फिर भी हम सुंदर हैं, 

अपनी सुंदरता को पहचानिए।


दूसरों से कमेंट या वाह वाही लूटने के लिए सुंदर दिखने से ज्यादा ज़रूरी है, अपनी सुंदरता को महसूस करना।


हर बच्चा सुंदर इसलिये दिखता है कि वो छल कपट से परे मासूम होता है और बडे होने पर जब हम छल व कपट से जीवन जीने लगते हैं तो वो मासूमियत खो देते हैं 

और उस सुंदरता को पैसे खर्च करके खरीदने का प्रयास करते हैं।


मन की खूबसूरती पर ध्यान दो।


पेट निकल गया तो कोई बात नही उसके लिए शर्माना ज़रूरी नही।

आपका शरीर आपकी उम्र के साथ बदलता है तो वज़न भी उसी हिसाब से घटता बढ़ता है उसे समझिये।


सारा इंटरनेट और सोशल मीडिया तरह तरह के उपदेशों से भरा रहता है,

यह खाओ, वो मत खाओ 

ठंडा खाओ, गर्म पीओ, 

कपाल भाती करो,  

सवेरे नीम्बू पीओ,

रात को दूध पीओ

ज़ोर से सांस लो,लंबी सांस लो 

दाहिने से सोइये ,

बाहिने से उठिए,

हरी सब्जी खाओ, 

दाल में प्रोटीन है,

दाल से क्रिएटिनिन बढ़ जायेगा।


अगर पूरे एक दिन सारे उपदेशों को पढ़ने लगें तो पता चलेगा 

ये ज़िन्दगी बेकार है ना कुछ खाने को बचेगा ना कुछ जीने को !!

आप डिप्रेस्ड हो जायेंगे।


ये सारा ऑर्गेनिक, एलोवेरा, करेला, मेथी, पतंजलि में फंसकर दिमाग का दही हो जाता है। 

स्वस्थ होना तो दूर स्ट्रेस हो जाता है।


अरे! अपन मरने के लिये जन्म लेते हैं,

कभी ना कभी तो मरना है अभी तक बाज़ार में अमृत बिकना शुरू नही हुआ।


हर चीज़ सही मात्रा में खाइये, 

हर वो चीज़ थोड़ी थोड़ी जो आपको अच्छी लगती है। 


भोजन का संबंध मन से होता है

और मन अच्छे भोजन से ही खुश रहता है..

मन को मारकर खुश नही रहा जा सकता।

थोड़ा बहुत शारीरिक कार्य करते रहिए,

टहलने जाइये, 

लाइट कसरत करिये,

व्यस्त रहिये,  

खुश रहिये,

Tuesday, 26 November 2024

EVM मशीन के बारे में:

 ईवीएम मशीन के बारे में:

वर्तमान देश में ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) को लेकर तरह-तरह के विवाद और भ्रम की स्थिति है। मैं, जो 12 से 15 बार चुनाव (त्रिकोणीय चुनाव, लोकसभा.विधानसभा etc) पार्टी अभिकर्ता के रूप में कार्य कर चुकी है, आपके साथ ईवीएम प्रक्रिया का पूरा विवरण साझा कर रही हूं ताकि आप समझ सकें कि किस प्रकार की हेराफेरी संभव नहीं है.

ईवीएम का कार्य एवं सुरक्षा प्रक्रिया:

1. मोक पोल:

मतदान प्रारंभ होने से पहले, सभी राजनीतिक विचारधारा के आचार्यों की उपस्थिति में मॉक पोल किया जाता है।

50 वोट यह जांच करता है कि हर वोट सही उम्मीदवार को मिल रहा है।

सही तरीके से आने वाली मशीन का डेटा डिलीट कर दिया जाता है और मशीन को सील कर दिया जाता है।

2. मतदान प्रक्रिया:

सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक मतदान होता है।

इस दौरान सभी सैक्स पार्टी निर्माताओं की उपस्थिति हुई।


जोनल अधिकारी एवं अन्य अधिकारी नियमित रूप से निरीक्षण करते हैं।

3. मतदान के बाद:

मतदान समाप्त होने पर मशीन में दर्ज वोट और रजिस्टर के आंकड़ों का मिलान किया जाता है।

मशीन को बैटरी फैक्ट्री, सील करके सुरक्षित तहसील या स्टोर रूम में भेज दिया जाता है।

4. भाषाई प्रक्रिया:

गिनती के दिन सभी पार्टी कंपनियों के सामने मशीन की सील हटा दी जाती है।


बैटरी स्थापित कुंजीपटल और नतीजे जारी किए जाते हैं।


ईवीएम में हेराफेरी क्यों असंभावित है?


1. इंटरनेट इंटरनेट नहीं:


मशीन इंटरनेट से जुड़ा नहीं है, इसलिए यह असंभव है।

2. मछुआरों का कोई रास्ता नहीं:


बैटरी निकालने और सीलिंग की प्रक्रिया के कारण बालों का झड़ना संभव नहीं है।

3. वीवीपैट:


सुप्रीम कोर्ट के निर्देश 2015 में ईवीएम में वीवीपैट जोड़ा गया, जिससे मतदाता को यह सुनिश्चित हो गया कि उसका वोट सही जगह पर है।

ईवीएम का खुलासा:


भारतीय ईवीएम हिंदुस्तान लिवर लिमिटेड (एचएलएल) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीएचईएल) द्वारा बनाई गई हैं।


14 अन्य देशों में भी शामिल है।


सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में स्पष्ट कर दिया था कि ईवीएम विश्वसनीय हैं और इनमें हेराफेरी की संभावना नहीं है।



बैलेट पेपर बनाम ईवीएम:


बैलट पेपर में गड़बड़ी के कई उदाहरण हैं, जैसे बैलट बॉक्स को बदल देना।


ईवीएम का उपयोग मजबूती, मजबूती और सुरक्षित प्रक्रिया सुनिश्चित करता है।


निष्कर्ष:


ईवीएम में हेराफेरी असंभावित है। इसे लेकर वह जो फैलाया जा रहा है, वह केवल राजनीतिक षडयंत्र है। हमें विज्ञान के युग में छोड़कर तकनीक का उ

पयोग करना चाहिए, न कि पुराने और महंगे बैलट पेपर पर लौटना चाहिए।


🙏🏻धन्यवाद!


Tuesday, 19 November 2024

लाचार माता के शब्द है

 इससे अच्छी पोस्ट मैंने अपनी ज़िंदगी में आज तक नही पढ़ी, आप भी जरूर पढियेगा, 😭

"बेटा! थोड़ा खाना खाकर जा ..!! दो दिन से तुने कुछ खाया नहीं है।" लाचार माता के शब्द है अपने बेटे को समझाने के लिये।

"देख मम्मी! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद वेकेशन में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और पापा ने प्रोमिस किया था। आज मेरे आखरी पेपर के बाद दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा खंड से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खडी रहे। मेरे दोस्त की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है। और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।"

एक गरीब घर में बेटे मोहन की जिद्द और माता की लाचारी आमने सामने टकरा रही थी।

"बेटा! तेरे पापा तुझे बाइक लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुए एक्सिडेंट ..


मम्मी कुछ बोले उसके पहले मोहन बोला "मैं कुछ नहीं जानता .. मुझे तो बाइक चाहिये ही चाहिये ..!!"


ऐसा बोलकर मोहन अपनी मम्मी को गरीबी एवं लाचारी की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया।


12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद भागवत 'सर' एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे।

हालांकि भागवत सर का विषय गणित था, किन्तु विद्यार्थियों को जीवन का भी गणित भी समझाते थे और उनके सभी विद्यार्थी विविधता से भरे ये परीक्षा अवश्य देने जाते थे। 


इस साल परीक्षा का विषय था *मेरी पारिवारिक भूमिका*


मोहन परीक्षा खंड में आकर बैठ गया।

उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे बाइक लेकर नहीं देंगे तो मैं घर नहीं जाऊंगा।


भागवत सर के क्लास में सभी को पेपर वितरित हो गया। पेपर में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय दिया गया था।


मोहन ने पहला प्रश्न पढा और जवाब लिखने की शुरुआत की।


*प्रश्न नंबर १ :- आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो? सविस्तर बताइये?*


मोहन ने जल्द से जवाब लिखना शुरू कर दिया।


जवाबः

पापा सुबह छह बजे टिफिन के साथ अपनी ओटोरिक्शा लेकर निकल जाते हैं। और रात को नौ बजे वापस आते हैं। कभी कभार वर्दी में जाना पड़ता है। ऐसे में लगभग पंद्रह घंटे।


मम्मी सुबह चार बजे उठकर पापा का टिफिन तैयार कर, बाद में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है। और सभी लोगों के सो 

जाने के बाद वह सोती हैं। लगभग रोज के सोलह घंटे।


दीदी सुबह कालेज जाती हैं, शाम को 4 से 8 पार्ट टाइम जोब करती हैं। और रात्रि को मम्मी को काम में मदद करती हैं। लगभग बारह से तेरह घंटे।


मैं, सुबह छह बजे उठता हूँ, और दोपहर स्कूल से आकर खाना खाकर सो जाता हूँ। शाम को अपने दोस्तों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक पढता हूँ। लगभग दस घंटे।


(इससे मोहन को मन ही मन लगा, कि उनका कामकाज में औसत सबसे कम है।)


पहले सवाल के जवाब के बाद मोहन ने दूसरा प्रश्न पढा ..


*प्रश्न नंबर २ :- आपके घर की मासिक कुल आमदनी कितनी है?*


जवाबः

पापा की आमदनी लगभग दस हजार हैं। मम्मी एवं दीदी मिलकर पांंच हजार

जोडते हैं। कुल आमदनी पंद्रह हजार।


*प्रश्न नंबर ३ :- मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मनपसंद टीवी पर आ रही तीन सीरियल के नाम, शहर के एक सिनेमा होल का पता और अभी वहां चल रही मूवी का नाम बताइये?*


सभी प्रश्नों के जवाब आसान होने से फटाफट दो मिनट में लिख दिये ..


*प्रश्न नंबर ४ :- एक किलो आलू और भिन्डी के अभी हाल की कीमत क्या है? एक किलो गेहूं, चावल और तेल की कीमत बताइये? और जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस आटा चक्की का पता दीजिये।*


मोहनभाई को इस सवाल का जवाब नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक जरुरतों की चीजों के बारे में तो उसे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। मम्मी जब भी कोई काम बताती थी तो मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक चीजें मोबाइल रिचार्ज, मुवी का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। अपने घर के काम की

जवाबदेही लेने से या तो हाथ बटोर कर साथ देने से हम कतराते रहे हैं।


*प्रश्न नंबर ५ :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी तकरार या गुस्सा करते हो?*


जवाबः हां, मुझे आलू के सिवा कोई भी सब्जी पसंद नहीं है। यदि मम्मी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में झगड़ा होता है। कभी मैं बगैर खाना खायें उठ खडा हो जाता हूँ। 

(इतना लिखते ही मोहन को याद आया कि आलू की सब्जी से मम्मी को गैस की तकलीफ होती हैं। पेट में दर्द होता है, अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन डालकर खाती हैं। एक दिन मैंने गलती से मम्मी की सब्जी खा ली, और फिर मैंने थूक दिया था। और फिर पूछा कि मम्मी तुम ऐसा क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी अच्छी नहीं है कि हम दो सब्जी बनाकर खायें। तुम्हारी जिद के कारण मम्मी बेचारी क्या करें?)

मोहन ने अपनी यादों से बाहर आकर

अगले प्रश्न को पढा


*प्रश्न नंबर ६ :- आपने अपने घर में की हुई आखरी जिद के बारे में लिखिये ..*


मोहन ने जवाब लिखना शुरू किया। मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के बाद दूसरे ही दिन बाइक के लिये जिद्द की थी। पापा ने कोई जवाब नहीं दिया था, मम्मी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में खाना खाना भी छोड़ दिया है। जबतक बाइक नहीं लेकर दोगे मैं खाना नहीं खाऊंगा। और आज तो मैं वापस घर नहीं जाऊंगा कहके निकला

हूँ।

अपनी जिद का प्रामाणिकता से मोहन ने जवाब लिखा।


*प्रश्न नंबर ७ :- आपको अपने घर से मिल रही पोकेट मनी का आप क्या करते हो? आपके भाई-बहन कैसे खर्च करते हैं?*


जवाब: हर महीने पापा मुझे सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनपसंद पर्फ्यूम, गोगल्स लेता हूं, या अपने दोस्तों की छोटीमोटी पार्टियों में खर्च करता हूँ।


मेरी दीदी को भी पापा सौ रुपये देते हैं। वो खुद कमाती हैं और पगार के पैसे से मम्मी को आर्थिक मदद करती हैं। हां, उसको दिये गये पोकेटमनी को वो गल्ले में डालकर बचत करती हैं। उसे कोई मौजशौख नहीं है, क्योंकि वो कंजूस भी हैं।


*प्रश्न नंबर ८ :- आप अपनी खुद की पारिवारिक भूमिका को समझते हो?*

 

प्रश्न अटपटा और जटिल होने के बाद भी मोहन ने जवाब लिखा।

परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं मददरूप होना चाहिये और ऐसे अपनी जवाबदेही निभानी चाहिये। 

 

यह लिखते लिखते ही अंतरात्मासे आवाज आयी कि अरे मोहन! तुम खुद अपनी पारिवारिक भूमिका को योग्य रूप से निभा रहे हो? और अंतरात्मा से जवाब आया कि ना बिल्कुल नहीं ..!!


*प्रश्न नंबर ९ :- आपके परिणाम से आपके माता-पिता खुश हैं? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे जिद करते हैं? आपको डांटते रहते हैं?*


(इस प्रश्न का जवाब लिखने से पहले हुए मोहन की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था।)

लिखने की शुरुआत की ..


वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी जिद नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे रिजल्ट के प्रोमिस तोडे हैं।

 फिर भी हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता था।


*प्रश्न नंबर १० :- पारिवारिक जीवन में असरकारक भूमिका निभाने के लिये इस वेकेशन में आप कैसे परिवार को मददरूप होंगें?*


जवाब में मोहन की कलम चले इससे पहले उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, और जवाब लिखने से पहले ही कलम रुक गई .. बेंच के निचे मुंह रखकर रोने लगा। फिर से कलम उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। अनुत्तर दसवां प्रश्न छोड़कर पेपर सबमिट कर दिया।


स्कूल के दरवाजे पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।


"भैया! ये ले आठ हजार रुपये, मम्मी ने कहा है कि बाइक लेकर ही घर आना।"

दीदी ने मोहन के सामने पैसे धर दिये।


"कहाँ से लायी ये पैसे?" मोहन ने पूछा।


दीदी ने बताया

"मैंने मेरी ओफिस से एक महीने की सेलेरी एडवांस मांग ली। मम्मी भी जहां काम करती हैं वहीं से उधार ले लिया, और मेरी पोकेटमनी की बचत से निकाल लिये। ऐसा करके तुम्हारी बाइक के पैसे की व्यवस्था हो गई हैं।


मोहन की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई।


दीदी फिर बोली " भाई, तुम मम्मी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगी तो, मैं घर पर नहीं आऊंगा! अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारी भी घर के प्रति जिम्मेदारी है। मुझे भी बहुत से शौक हैं, लेकिन अपने शौक से अपने परिवार को मैं सबसे ज्यादा महत्व देती हूं। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, पापा को पैर की तकलीफ हैं फिर भी तेरी बाइक के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये प्रोमिस को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के बावजूद काम किये जा रहे हैं। तेरी बाइक के लिये। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल रात को अपने प्रोमिस को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। और इसके पीछे उनकी मजबूरी है।

बाकी तुमने तो अनेकों बार अपने प्रोमिस तोडे ही है न?  

मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल निकली।


उसी समय उनका दोस्त वहां अपनी बाइक लेकर आ गया, अच्छे से चमका कर ले आया था।

"ले .. मोहन आज से ये बाइक तुम्हारी, सब बारह हजार में मांग रहे हैं, मगर ये तुम्हारे लिये आठ हजार ।"


मोहन बाइक की ओर टगर टगर देख रहा था। और थोड़ी देर के बाद बोला

"दोस्त तुम अपनी बाइक उस बारह हजार वाले को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी हैं और होने की हाल संभावना भी नहीं है।"


और वो सीधा भागवत सर की केबिन में जा पहूंचा।


"अरे मोहन! कैसा लिखा है पेपर में?

भागवत सर ने मोहन की ओर देख कर पूछा।


"सर ..!!, यह कोई पेपर नहीं था, ये तो मेरे जीवन के लिये दिशानिर्देश था। मैंने एक प्रश्न का जवाब छोड़ दिया है। किन्तु ये जवाब लिखकर नहीं अपने जीवन की जवाबदेही निभाकर दूंगा और भागवत सर को चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा।


घर पहुंचते ही, मम्मी पापा दीदी सब उसकी राह देखकर खडे थे।

"बेटा! बाइक कहाँ हैं?" मम्मी ने पूछा। मोहन ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिये और कहा कि सोरी! मुझे बाइक नहीं चाहिये। और पापा मुझे ओटो की चाभी दो, आज से मैं पूरे वेकेशन तक ओटो चलाऊंगा और आप थोड़े दिन आराम करेंगे, और मम्मी आज मैं मेरी पहली कमाई शुरू होगी। इसलिये तुम अपनी पसंद की मैथी की भाजी और बैगन ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के खाना खायेंगे।

 

मोहन के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर मम्मी ने उसको गले लगा लिया और कहा कि "बेटा! सुबह जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे पापा को बतायी थी, और इसलिये वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेट में दर्द होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी पसंद की ही सब्जी बनाऊंगी।" मोहन ने कहा 

"नहीं मम्मी! अब मै समझ गया हूँ कि मेरे घरपरिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को बैंगन मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने आखरी जवाब नहीं लिखा हैं, वह प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है। और हाँ मम्मी हम गेहूं को पिसाने कहां जाते हैं, उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो"और उसी समय भागवत सर ने घर में प्रवेश किया। और बोले "वाह! मोहन जो जवाब तुमनें लिखकर नहीं दिये वे प्रेक्टिकल जीवन जीकर कर दोगे 


"सर! आप और यहाँ?" मोहन भागवत सर को देख कर आश्चर्य चकित हो गया।


"मुझे मिलकर तुम चले गये, उसके बाद मैंने तुम्हारा पेपर पढा इसलिये तुम्हारे घर की ओर निकल पडा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आये परिवर्तन को सुन रहा था। मेरी अनोखी परीक्षा सफल रही 

और इस परीक्षा में तुमने पहला नंबर पाया है।" 

ऐसा बोलकर भागवत सर ने मोहन के सर पर हाथ रखा

मोहन ने तुरंत ही भागवत सर के पैर छुएँ और ऑटो रिक्शा चलाने के लिये निकल पडा....

       मेरा सभी सम्माननीय अभिभावकों से आग्रह है कि आप इस पोस्ट को आप भी जरूर पढ़िए गा और अपने बच्चों को भी पढ़ने का अवसर दें इससे अच्छी पोस्ट मैंने अपनी जिंदगी में आज तक नहीं पड़ी प्रैक्टिकल जीवन में तो मैंने अनुभव किया है अरविन्द वर्मा जी लेकिन सभी लोगों को किस प्रकार से अनुभव कराया जाए इसके लिए मेरा आपसे आग्रह है कि आप स्वयं और अपने बच्चों को इस पोस्ट को जरूर करने का अवसर प्रदान करें l

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश के नाम छोटा सा संदेश.. छोड़ा मुंह बड़ी बात..

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