sunilrathod

Friday, 13 September 2024

रिश्तों में धैर्य, समझदारी और एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना ही खुशहाल जीवन का असली राज़ है।

 जब मेरी शादी अमित से हुई, तो मैं बहुत उत्साहित थी। हम दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे और मैं यह सोचकर खुश थी कि मेरे ससुराल में भी मुझे वही प्यार और अपनापन मिलेगा। लेकिन शादी के बाद, कुछ चीजें मेरे लिए मुश्किल हो गईं। मेरी सास, सुशीला माँ, बहुत ही पुरानी सोच की थीं, जबकि मेरी परवरिश बड़े शहर में हुई थी और मेरी सोच थोड़ी आधुनिक थी।


शुरुआत में मैंने सोचा कि शायद समय के साथ सब ठीक हो जाएगा, लेकिन छोटी-छोटी बातों पर माँ के साथ मेरा मतभेद होना शुरू हो गया। चाहे वह किचन का काम हो, घर के फैसले हों या फिर घर की साफ-सफाई का तरीका, हमारे बीच हर बात पर बहस हो जाती। माँ को मेरे विचार बिल्कुल पसंद नहीं आते थे और मुझे लगता था कि वह मेरी बातों को समझना ही नहीं चाहतीं।


यह देखकर मुझे बहुत दुख होता था। अमित भी यह सब देख रहा था और मैं जानती थी कि वह भी परेशान था। मैं उसे अपनी तरफ खींचना नहीं चाहती थी, क्योंकि वह अपनी माँ का बहुत सम्मान करता था और यह सही भी था। लेकिन मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इस परिस्थिति में क्या किया जाए।


अमित का समझदारी भरा कदम:


एक दिन अमित ने मुझसे बहुत ही प्यार से बात की। उसने मुझसे कहा, "नेहा, माँ की सोच उनके अनुभव और परवरिश से बनी है। उन्होंने अपना पूरा जीवन इन परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ जिया है, इसलिए यह हमारे लिए आसान नहीं होगा कि वह अचानक से बदल जाएं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि तुम गलत हो। बस हमें थोड़ा धैर्य रखना होगा और सही तरीके से माँ को समझाना होगा।"


अमित की यह बात मुझे अंदर तक छू गई। मुझे एहसास हुआ कि शायद मैं भी चीजों को बहुत जल्दबाजी में बदलने की कोशिश कर रही थी। अमित ने मुझसे वादा किया कि वह माँ से बात करेगा, लेकिन टकराव से नहीं, बल्कि उन्हें धीरे-धीरे मेरी बात समझाएगा।


इसके बाद, अमित ने सुशीला माँ के साथ ज्यादा समय बिताना शुरू किया। वह उनसे आराम से बात करता और उनके विचारों को सुनता। फिर धीरे-धीरे वह उन्हें यह समझाने लगा कि मेरा नजरिया सिर्फ इसलिए अलग नहीं है कि मैं नई पीढ़ी की हूँ, बल्कि यह घर के भले के लिए है। उसने माँ को यह महसूस कराया कि मेरे सुझावों से घर की दिनचर्या और बेहतर हो सकती है।


अमित ने दोनों के बीच सेतु का काम किया:


अमित कभी माँ की बुराई नहीं करता था और न ही मेरी शिकायत करता। उसने हम दोनों की भावनाओं का ध्यान रखा। वह हमेशा मुझे समझाता कि माँ के अनुभवों का भी सम्मान करना जरूरी है, और साथ ही, माँ को यह एहसास दिलाता कि मेरे विचार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। उसने हम दोनों के बीच एक सेतु का काम किया।


अमित ने माँ से कहा, "माँ, नेहा का इरादा सिर्फ घर को बेहतर बनाना है। हम नए तरीके भी अपना सकते हैं, लेकिन आपको यह महसूस होना चाहिए कि आपकी परंपराएं और अनुभव भी हमारे लिए बहुत कीमती हैं।"


धीरे-धीरे, माँ ने भी मेरी बातों को समझना शुरू किया। अब वह मेरे सुझावों को ध्यान से सुनतीं और हम दोनों मिलकर फैसले लेने लगे। वहीं, मैंने भी माँ के पुराने तरीकों को स्वीकार करना शुरू किया और उनके अनुभव से सीखने की कोशिश की। अमित ने हमें यह सिखाया कि समझौता ही रिश्तों की कुंजी है।


आज, माँ और मैं न सिर्फ सास-बहू हैं, बल्कि अच्छे दोस्त भी बन गए हैं। हम मिलकर किचन संभालते हैं, घर के फैसले साथ में लेते हैं और अब घर में पहले जैसी टकराव की स्थिति नहीं होती। यह सब सिर्फ इसलिए हो सका क्योंकि अमित ने अपनी सूझ-बूझ से हमें यह सिखाया कि रिश्तों में सम्मान और समझदारी सबसे जरूरी होती है।

अमित की समझदारी ने हमारे रिश्ते को नया मोड़ दिया। आज मैं अपनी सास के साथ हँसती-बोलती हूँ और यह सब अमित की वजह से मुमकिन हो पाया है।

रिश्तों में धैर्य, समझदारी और एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना ही खुशहाल जीवन का असली राज़ है।

Thursday, 12 September 2024

संस्कारवान पीढ़ी क्यों आवश्यक है

 #वर्तमान समाज में पैर पसारते कलयुग के अशुभ लक्षण*


1. कुटुम्ब कम हुआ 

2. सम्बंध कम हुए 

3. नींद कम हुई. 

4. बाल कम हुए 

5. प्रेम कम हुआ  

6. कपड़े कम हुए 

7. शिष्टाचार कम हुआ 

8. लाज-लज्जा कम हुई 

9. मर्यादा कम हुई 

10. बच्चे कम हुए  

11. घर में खाना कम हुआ 

12. पुस्तक वाचन कम हुआ 

13. भाई-भाई प्रेम कम हुआ 

15. चलना कम हुआ 

16. खानपान की शुद्धता कम हुई 

17. खुराक कम हुई 

18. घी-मक्खन कम हुआ 

19. तांबे - पीतल के बर्तन कम हुए 

20. सुख-चैन कम हुआ 

21. अतिथि कम हुए 

22. सत्य कम हुआ 

23. सभ्यता कम हुई 

24. मन-मिलाप कम हुआ 

25. समर्पण कम हुआ 

26. बड़ों का सम्मान कम हुआ। 

27 सहनशक्ति कम हुई । 

28 धैर्य कम हुआ 

29 श्रद्धा-विश्वास कम हुआ ।

30 मास्टर जी का सम्मान कम हुआ। 

31पूजा, वंदना कम हुआ । 

32 लोगो से मेल मिलाप कम हुआ। 

और भी बहुत कुछ कम हुआ जिससे जीवन सहज था, सरल था।


संतान को दोष न दें

बालक या बालिका को 'इंग्लिश मीडियम' में पढ़ाया...

'अंग्रेजी' बोलना सिखाया।

'बर्थ डे' और 'मैरिज एनिवर्सरी'

जैसे जीवन के 'शुभ प्रसंगों' को 'अंग्रेजी कल्चर' के अनुसार जीने को ही 'श्रेष्ठ' माना।

माता-पिता को 'मम्मी' और

'डैड' कहना सिखाया।


जब 'अंग्रेजी कल्चर' से परिपूर्ण बालक या बालिका बड़ा होकर, आपको 'समय' नहीं देता, आपकी 'भावनाओं' को नहीं समझता, आप को 'तुच्छ' मानकर 'जुबान लड़ाता' है और आप को बच्चों में कोई 'संस्कार' नजर नहीं आता है, 

तब घर के वातावरण को 'गमगीन किए बिना'... या...

'संतान को दोष दिए बिना'...कहीं 'एकान्त' में जाकर 'रो लें'...


क्योंकि...

पुत्र या पुत्री की पहली वर्षगांठ से ही,

'भारतीय संस्कारों' के बजाय,मंदिर जाने की जगह,

'केक' कैसे काटा जाता है सिखाने वाले आप ही हैं...

'हवन कुण्ड में आहुति' कैसे दी जाए... 

'मंत्र, आरती, हवन, पूजा-पाठ, आदर-सत्कार के संस्कार देने के बदले'...

केवल 'फर्राटेदार अंग्रेजी' बोलने को ही,

अपनी 'शान' समझने वाले भी शायद आप ही हैं...


बच्चा जब पहली बार घर से बाहर निकला तो उसे

'प्रणाम-आशीर्वाद' के बदले

'बाय-बाय' कहना सिखाने वाले आप...


परीक्षा देने जाते समय

'इष्टदेव/बड़ों के पैर छूने' के बदले

'Best of Luck'

कह कर परीक्षा भवन तक छोड़ने वाले आप...


बालक या बालिका के 'सफल' होने पर, घर में परिवार के साथ बैठ कर 'खुशियाँ' मनाने के बदले...

'होटल में पार्टी मनाने' की 'प्रथा' को बढ़ावा देने वाले आप...


बालक या बालिका के विवाह के पश्चात्...

'कुल देवता / देव दर्शन' 

को भेजने से पहले... 

'हनीमून' के लिए 'फाॅरेन/टूरिस्ट स्पॉट' भेजने की तैयारी करने वाले आप...


ऐसी ही ढेर सारी 'अंग्रेजी कल्चर्स' को हमने जाने-अनजाने 'स्वीकार' कर लिया है...


अब तो बड़े-बुजुर्गों और श्रेष्ठों के 'पैर छूने' में भी 'शर्म' आती है...


गलती किसकी..? 

मात्र आपकी '(माँ-बाप की)'...


अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा' है... 

कामकाज हेतु इसे 'सीखना'है,अच्छी बात है पर

इसकी 'संस्कृति' को,'जीवन में उतारने' की तो कोई बाध्यता नहीं थी? 


अपनी समृद्ध संस्कृति को त्यागकर नैतिक मूल्यों,मानवीय संवेदनाओं से रहित अन्य सभ्यताओं की जीवनशैली अपनाकर हमनें क्या पाया? अवैध संबंध? टूटते परिवार? व्यसनयुक्त तन? थकेहारे मन? छलभरे रिश्ते? अभद्र,अनुशासनहीन संतानें? असुरक्षित समाज? भयावह भविष्य?


*एक बार विचार अवश्य कीजिएगा कि* 

*संस्कारवान पीढ़ी क्यों आवश्यक है 

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विज्ञान के अनुसार प्यार में पड़ने के पीछे कई वजह होती हैं। यह दिल से नहीं बल्कि दिमाग़ से जुड़ा हुआ होता है

 विज्ञान के अनुसार प्यार में पड़ने के पीछे कई वजह होती हैं। यह दिल से नहीं बल्कि दिमाग़ से जुड़ा हुआ होता है।

कहते हैं जब आपका दिल किसी के लिए धड़कने लगे तो इसका मतलब होता है कि आपको उस शख़्स से प्यार हो गया है। हालांकि किसी से प्यार होने के पीछे कई साइंटिफ़िक वजह होती हैं। ये एहसास हमारे दिल से नहीं आते हैं, जैसे कि बॉलीवुड गानों में बताया जाता है। यह सबकुछ हमारे दिमाग़ से जुड़ा होता है। हमारा शरीर उसी के अनुसार रिएक्ट करता है। विज्ञान के अनुसार किसी के प्यार में पड़ने के पीछे कई वजह होती हैं। जिसकी वजह से हमारे हार्मोन्स मज़बूत हो जाते हैं और किसी व्यक्ति के प्रति उसका झुकाव बढ़ जाता है। आइए जानते हैं इसके पीछे अन्य वजहों के बारे में...

नेचर ने यह सुनिश्चित करने के लिए ख़्याल रखा है कि हम अपने हार्मोनल रिस्पांस को इस तरह मैनेज करते हुए कहीं विलुप्त ना जाएं। यह हमें एक प्रजाति के रूप में जीवित रहने की अनुमति देता है। प्यार में पड़ने के तीन स्टेज होती हैं, जिसमें लस्ट, अट्रैक्शन, और अटैचमेंट शामिल है। सभी तीन स्टेज अलग-अलग हार्मोनल रिस्पांस से जुड़ी हुई हैं। आइए जानते हैं...आकर्षण होता है जिसे हम उस व्यक्ति की ओर महसूस करते हैं, जिससे हम आकर्षण पाते हैं। एस्ट्रोजेन और टेस्टोस्टेरोन इस भावना के लिए ज़िम्मेदार मुख्य हार्मोन हैं। norepinephrine - Norepinephrine, या PEA, प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला एम्फैटेमिन है जो आनंद के अनुभव को बढ़ाता है और भूख को कम करता है। यह आमतौर से इस चरण में जारी किया जाता और आकर्षण चरण में जारी रहता है।यहीं से फ़न शुरू होता है, यह स्टेज फ़र्स्ट बायोलॉजिकल रिस्पांस के बाद शुरू होती है और यह कई हार्मोनल रिस्पांस को ट्रिगर करती है। इसी कड़ी में रिवॉर्ड सिस्टम होता है जो प्रेम अनिवार्य रूप से हमारे दिमाग़ की रिवॉर्ड सिस्टम में एक फ़ीडबैक लूप को ट्रिगर करता है, जिससे हम और अधिक चाहते हैं। यह इस स्टेज के दौरान ज़्यादातर किक करता है। वहीं एड्रेनालाईन जो पहली भीड़ से आती है। किसी व्यक्ति के साथ प्यार में पड़ना वास्तव में आपके शरीर में स्ट्रेस रिस्पांस का कारण होगा। ऐसे में हो सकता है कि एड्रेनालाईन में यह संभावना है कि आपने इन लक्षणों का अनुभव किया हो। रेसिंग हार्टबीट, मुंह का सूखना, पसीना आना, यह सभी रिएक्शन एंड्रानालाईन को ट्रिगर करता है। वहीं प्यार में होने के नाते हमारे शरीर को न्यूरोट्रांसमीटर डोपामाइन का उत्पादन करने के लिए प्रेरित करता है। इसे हैप्पी हार्मोन के रूप में भी जाना जाता है। दिल में खुशी की भावना के लिए डोपामाइन ज़िम्मेदार होता है। इससे एनर्जी, और फ़ोकस बढ़ता है और भूख कम लगती है।

अटैचमेंट में ऑक्सीटोसिन हार्मोन का उत्पादन होता है। ऑर्गेज्म के दौरान ऑक्सीटोसिन के स्तर में स्पाइक होता है, यह मनुष्यों के रूप में बंधन बनाता है। यह जन्म के तुरंत बाद मां और बच्चे के रिश्ते में भी महत्वपू्र्ण है। यह अनिवार्य रूप से स्तन को दूध छोड़ने के लिए संकेत देता है जब बच्चे को इसकी आवश्यकता होती है। इसके अलावा इसमें वासोप्रेसिन नामक हार्मोन का भी उत्पादन होता है जो ज़्यादातर एंटी मूत्रवर्धक के रूप में जाना जाता है। यह किडनी में काम करता है और प्यास को नियंत्रित करता है। यह हार्मोन सेक्स के तुरंत बाद रिलीज़ हो जाता है। यही नहीं ये सेक्स और पार्टनर पसंद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अलावा यह हेल्दी होता है और लंबे वक़्त तक रिलेशनशिप को बनाए रखने का काम करता है।जब पार्टनर के साथ ब्रेकअप होता है तो इसके लक्षण दिखाई देते हैं। इसमें डोपामाइन हार्मोन दिमाग़ के अधिकांश रिवॉर्ड सिस्टम को नियंत्रित करता है, इसलिए यह स्वाभाविक है कि डोपामाइन रिलीज़ में एक दुर्घटना है जो ब्रेकअप के बाद हमें एहसास दिलाती है कि हमारा दिल टूट गया है। वहीं जब कॉकटेल ग़लत हो जाता है।असंतुलित हार्मोनल स्तर ईश्यू की एक सीरीज को जन्म दे सकता है। क्योंकि यह हमारे दिमाग़ के रिवॉर्ड सिस्टम में शामिल होता है।

: सुनिल राठौड़ 

पत्नी के धोखे से पति की नई सुरवात

 मेरी पत्नी, राधिका, जो कभी हमेशा मेरे साथ बाहर घूमने और समय बिताने में दिलचस्पी रखती थी, अब घर पर अधिक से अधिक समय बिताने लगी। ज़्यादातर वक्त वह टीवी देखती रहती थी, और बाहरी दुनिया से कट गई थी।


एक वक्त ऐसा आया जब उसने एकदम से अपने हाव-भाव बदल लिए। वह अचानक से हफ्ते में 2-3 बार अपने सबसे अच्छे कपड़े पहन कर बाहर जाने लगी। शुरुआत में मुझे लगा कि यह अच्छी बात है। शायद राधिका अपनी पुरानी जिंदगी में लौट रही थी। मैं खुश था कि वह अब खुद का ख्याल रख रही थी और अपने जीवन का आनंद ले रही थी। आखिरकार, शादी के बाद और माँ बनने के बाद, हर महिला को अपनी स्वतंत्रता भी तो चाहिए।


लेकिन कुछ समय बाद, मेरे दोस्तों ने मुझे बताया कि उन्होंने राधिका को किसी दूसरे आदमी के साथ सुपरमार्केट और शहर के विभिन्न जगहों पर देखा है। वे हंसते हुए मुझे यह किस्सा सुना रहे थे, मानो यह एक मजाक हो, लेकिन मेरे दिल में एक अजीब सी बेचैनी हो गई। मुझे अब तक उस पर पूरा विश्वास था। वह मेरी बेटी की मां थी, मेरी जीवनसंगिनी। मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि वह मुझे धोखा दे सकती है।


एक दिन, मेरी बेटी ने मासूमियत में मुझसे कहा, "पापा, मम्मी रोज़ एक अंकल के साथ घूमने जाती हैं। वह बहुत अच्छे लगते हैं।" उसकी बात सुनकर मेरे दिल में संदेह और गहरा हो गया। अब मैं चीज़ों को नजरअंदाज नहीं कर सकता था।


कुछ दिन बाद, मैंने देखा कि राधिका ने अचानक अपना फोन मुझसे छुपाना शुरू कर दिया। पहले तो हम एक-दूसरे के फोन का इस्तेमाल कर लेते थे, लेकिन अब वह अपने फोन को कभी भी खुला नहीं छोड़ती थी। यहां तक कि उसने अपने लैपटॉप पर भी पासवर्ड डाल दिया था। मुझे समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हो रहा है, लेकिन मेरा संदेह बढ़ता जा रहा था।


मैं पेशे से आईटी में हूँ, इसलिए मुझे टेक्नोलॉजी की अच्छी समझ थी। मैंने एक दिन चुपचाप राधिका के लैपटॉप पर एक की-लॉगर (Key-logger) लगा दिया। अब मैं उसके सभी संदेश देख सकता था, जो वह किसी के साथ शेयर कर रही थी। मुझे आशंका थी, लेकिन उस दिन जब मैंने उसके और उस आदमी के बीच हुए मैसेज पढ़े, तो मेरी दुनिया ही हिल गई। उन मैसेजों में अश्लील बातें थीं, उनकी भावनाओं की परछाइयाँ थीं, और मेरे दिल पर एक गहरा घाव था।


मैंने तुरंत राधिका से कुछ नहीं कहा। मैंने सोचा, "उसे रंगे हाथों पकड़ूंगा।" कुछ दिनों तक मैं सामान्य तरीके से चलता रहा, लेकिन मन में एक भारी बोझ था।


एक दिन, मैंने ऑफिस का काम जल्दी निपटाया और अचानक घर वापस आ गया। दरवाजा अंदर से बंद था। मैंने बिना किसी आहट के रसोई की खिड़की से अंदर झांका। वहां, मैंने राधिका को उस आदमी के साथ नग्न अवस्था में देखा। मेरी आंखों के सामने सब कुछ धुंधला हो गया। मेरा दिल टूट चुका था। वह दृश्य मेरे मन में एक घाव की तरह अंकित हो गया।


उस दिन मैंने बिना कुछ कहे घर छोड़ दिया। मैं टूट चुका था, बिखर चुका था। अपने दर्द और अवसाद से निपटने के लिए मैंने शराब का सहारा लिया। मैं लगभग एक साल तक हर रात शराब पीता रहा। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैंने अपनी दुनिया खो दी थी, वह औरत जिससे मैं प्यार करता था, उसने मेरे विश्वास को तोड़ा था।


लेकिन एक दिन, मुझे अहसास हुआ कि यह सब करके मैं सिर्फ खुद को ही नुकसान पहुँचा रहा हूँ। राधिका अब मेरी जिंदगी का हिस्सा नहीं थी, और मुझे उसके धोखे से उबरना था। मैंने धीरे-धीरे अपने जीवन को दोबारा संवारने का फैसला किया। मैंने शराब छोड़ दी और खुद को बेहतर बनाने पर ध्यान देना शुरू किया।


और फिर, एक दिन, मेरी मुलाकात सीमा से हुई। वह अद्भुत थी—सहनशील, समझदार और प्यार से भरी हुई। पिछले दो सालों से वह मेरे जीवन की रोशनी है। उसकी वजह से मैंने अपने अंदर की कड़वाहट को खत्म करना सीखा।


आज, मैं सबसे खुश इंसान हूँ। राधिका के धोखे के बाद, मुझे विश्वास नहीं था कि मैं फिर से किसी से प्यार कर पाऊंगा, लेकिन सीमा ने मुझे न केवल प्यार करना सिखाया, बल्कि मुझमें खोया हुआ विश्वास भी लौटाया।


अब, आठ साल बाद, मैं राधिका के प्रति नफरत तो महसूस करता हूँ, लेकिन साथ ही उसका शुक्रगुजार भी हूँ। अगर उसने मुझे धोखा नहीं दिया होता, तो शायद मैं सीमा से कभी नहीं मिलता। यह जीवन का एक अजीब मोड़ है—कभी-कभी बुरे अनुभव आपको वहां ले जाते हैं जहां आप सच्ची खुशी और सुकून पा सकते हैं।

विनीत नाम था उसका.

 "विनीत नाम था उसका...।" मेरे ऑफिस में वह एक थर्ड ग्रेड कर्मचारी था। मेरा हाल ही में यहाँ अफसर के पद पर तबादला हुआ था, और मैंने चार दिन पहले ही जॉइनिंग की थी। विनीत बेहद मेहनती और समझदार था। वो मुझे "दीदी" ही कहता था, लेकिन एक दिन मेरे जूनियर, सुशांत, ने उसे डांटते हुए कहा, "वो मैडम हैं, उन्हें दीदी नहीं, सपना मैडम कहा करो!" तब से वह मुझे मैडम बुलाने लगा, लेकिन न जाने क्यों, मुझे उसका "दीदी" कहना ज्यादा अच्छा लगता था।


आज वह बेहद खुश था, तो मैंने पूछ लिया, "विनीत, आज बहुत खुश दिख रहे हो, क्या बात है?"

विनीत हंसते हुए बोला, "मैम, कल राखी है ना, इसलिए घर जा रहा हूँ।"

मैंने कहा, "अच्छा, तुम्हारी बहनें हैं?"

उसने ज़ोर से हंसते हुए कहा, "हां, मैम, पांच बहनें हैं। तीन बड़ी शादीशुदा हैं, और दो छोटी।"

मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, "तोहफे ले लिए उनके लिए?"

वह बोला, "आज खरीदूंगा, मैम। ज्यादा महंगे तो नहीं ले सकता, पर जो भी हो, अपनी मेहनत से खरीदूंगा।" कहकर वह जल्दी-जल्दी अपने काम में लग गया।


उसकी मुस्कान और प्यार देखकर मेरे दिल में एक अलग सी भावना उमड़ आई। सच कहूं, तो आज पहली बार मुझे अपने भाई की बहुत याद आई। मैं अपने मम्मी-पापा की इकलौती बेटी हूँ और हर राखी पर यही खालीपन महसूस करती थी। अचानक मेरे मन में एक विचार आया। मैंने विनीत की फाइल उठाई और उसके घर का पता नोट किया, फिर तुरंत ऑफिस से निकलकर शॉपिंग करने चली गई। मेरे दिल में एक नई उमंग थी।


शॉपिंग करके जब घर पहुँची, तो मम्मी ने हैरानी से पूछा, "अरे सपना, आज ये सब क्या खरीद लाई?"

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "राखी की तैयारी कर रही हूँ, मम्मी!"

मम्मी हैरानी से मेरी ओर देखती रह गईं, क्योंकि जो बेटी हर राखी पर उदास रहती थी, वह आज इतनी उत्साहित कैसे हो गई! फिर मैंने मम्मी को अपनी योजना बताई और पापा से भी इसे लेकर बात की। दोनों ने मेरे इस निर्णय को सराहा।


अगले दिन, राखी की सुबह, मैं बहुत जल्दी उठकर तैयार हो गई। मेरे साथ मम्मी-पापा भी तैयार हो गए और हम तीनों विनीत के घर की ओर निकल पड़े। जैसे ही हम उसके घर पहुंचे, तो दरवाजा आधा खुला हुआ था। अंदर से हंसी-मजाक की आवाजें आ रही थीं। बहनों के बीच बहस चल रही थी कि पहले कौन राखी बाँधेगा। माहौल बेहद खुशनुमा और प्यार भरा था।


विनीत ने जैसे ही मुझे दरवाजे पर देखा, वह चौंक गया। "अरे मैम, आप यहाँ कैसे?"

मैंने मुस्कुराते हुए अपनी राखी निकाली और बोली, "अगर आप सबको मंजूर हो, तो मैं आज पहले राखी बांधना चाहती हूँ। क्या तुम मेरे भाई बनोगे, विनीत?"

मेरी आँखों में आँसू आ गए, और विनीत भावुक हो गया। उसने धीरे से कहा, "मैम, मैं आपको क्या दे सकता हूँ?"

वह धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। मैंने उसके कलाई पर राखी बांधी और फिर उसके लिए लाए गए उपहारों में से एक घड़ी निकालकर उसे पहनाई। मैंने उससे कहा, "ये घड़ी महज़ तोहफा नहीं है, ये विश्वास और प्रेम का प्रतीक है, जो मुझे तुममें महसूस हुआ। अब से तुम मुझे 'मैम' नहीं, दीदी ही बुलाना, जैसे पहली बार कहा था।"


विनीत की आँखों में कृतज्ञता और सम्मान था। उसकी बहनों ने भी मुझे बड़े प्यार से राखी बाँधने के लिए धन्यवाद दिया।

विनीत के लिए यह पल भी अविस्मरणीय था, और मेरे लिए भी। मैंने उसके घर में जो अपनापन महसूस किया, वह किसी बड़े गिफ्ट से बढ़कर था।


यह कहानी हमें सिखाती है कि हम अपने सहकर्मियों को केवल उनके पद से नहीं, बल्कि उनके दिल से भी जानें। किसी का छोटा या बड़ा होना उसकी काबिलियत या सम्मान को कम नहीं करता। मानवता और भाईचारे की भावना ही असली रिश्तों की नींव होती है।


आप सभी से निवेदन है कि आप भी अपने सहकर्मियों को सम्मान दें और उनके साथ भाईचारे का रिश्ता बनाए रखें।

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अत्याचार और बदसुलूकी का अंजाम हमेशा बुरा होता है

 संध्या रोज की तरह अपने सारे काम निपटा कर नहाने गई थी कि अचानक सास की कर्कश आवाज़ कानों में पड़ी, **"अरे बहू... ओ बहू, कहां मर गई? सुनती नहीं हो क्या?"** 😡 रसोई के सारे काम खत्म करने के बाद अब नहाने का समय मिला था, लेकिन उसे इस कर्कश आवाज़ की आदत हो चुकी थी। दिन में माया देवी की एक न एक शिकायत उसके कानों में गूंजती रहती थी। 


संध्या ने जैसे-तैसे अपने ऊपर पानी डाला, जल्दी से कपड़े पहने और दौड़ते हुए सास के कमरे में पहुँची। माया देवी गुस्से में चिल्ला रही थीं, **"अरे, तुझसे एक काम भी ठीक से नहीं होता! ये पानी कहां से आ गया? अगर मैं गिर जाती तो मेरी हड्डियां टूट जातीं!"** 😠 संध्या डरते हुए बोली, **"मां जी, मैंने पोछा तो लगाया था।"** पर माया देवी फिर से चिल्लाईं, **"तुझसे कुछ ठीक से नहीं होता! किस्मत ही खराब है जो तेरे जैसे को मेरे बेटे ने पसंद किया।"**


संध्या समझ गई थी कि माया देवी जानबूझकर उसे तंग कर रही थीं। उसने चुपचाप फर्श का पानी साफ किया और वापस अपने कमरे में जाकर बैठ गई। यह रोज़ का सिलसिला बन चुका था। 🥲 सुरेश के ऑफिस जाते ही माया देवी संध्या को परेशान करने के नए तरीके ढूंढती थीं। पहले तो संध्या सहन कर रही थी, लेकिन अब यह सब बर्दाश्त से बाहर हो रहा था। 


शाम को जब सुरेश घर आता, संध्या कई बातें करने की सोचती, पर सुरेश अक्सर थका होता और माँ की शिकायतों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता था। माया देवी भी बेटे के सामने एकदम अलग रूप धारण कर लेतीं—बहुत ही प्यारी सास बन जातीं। लेकिन सुरेश के जाते ही उनका असली चेहरा सामने आ जाता। 🤔


माया देवी की सबसे बड़ी नाराजगी थी कि शादी में उन्हें दहेज पर्याप्त नहीं मिला। उन्होंने घर की नौकरानी भी हटा दी थी, और अब सारा काम संध्या के जिम्मे आ गया था। 😔


एक दिन, जब संध्या झाड़ू लगा रही थी, माया देवी बिस्तर पर बैठी स्वेटर बुन रही थीं। अचानक उन्होंने बिना देखे जोर से पैर मारा, जिससे संध्या का सिर दीवार से टकरा गया। 😣 संध्या दर्द से कराह उठी, लेकिन फिर भी चुप रही। तभी माया देवी ने फिर से उसे लात मारी, और इस बार संध्या बेहोश हो गई। 


माया देवी फिर से चिल्लाईं, **"अरे मर गई क्या? उठ, अभी काम पड़ा है!"** 😡 लेकिन जब संध्या नहीं उठी, तो माया देवी के होश उड़ गए। उन्होंने तुरंत सुरेश को फोन किया। सुरेश उसे अस्पताल ले गया, लेकिन डॉक्टरों की कोशिशों के बावजूद, संध्या की जान नहीं बच पाई। 💔


धीरे-धीरे, पड़ोसियों को माया देवी के बुरे बर्ताव की सच्चाई पता चलने लगी। सुरेश भी समझ गया था कि उसकी माँ ने उसकी पत्नी के साथ जो किया, वह गलत था। 😞 सुरेश ने ज्यादा दिन इस बोझ के साथ नहीं जी पाए और एक दिन उसने खुद को पंखे से लटकाकर अपनी जिंदगी खत्म कर ली। 💔


अब माया देवी के घर में बस सन्नाटा था। वह दिनभर बड़बड़ाती रहतीं, **"अरे बहू, कहां मर गई? मेरे बेटे को भी ले गई। जल्दी आ, घर गंदा पड़ा है!"** 😢 लोगों ने सुना, लेकिन कोई उनकी मदद करने नहीं आया। कुछ दिनों बाद खबर आई कि माया देवी को पागलखाने में भर्ती करा दिया गया, और उनके घर को सस्ते दामों में बेच दिया गया। 🏚️


**सीख:** अत्याचार और बदसुलूकी का अंजाम हमेशा बुरा होता है। रिश्तों में प्यार और समझदारी सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। 💔

संस्कारी बहू तभी मिलेगी,

 एक प्रतिष्ठित वकील साहब ने अपने बेटे का रिश्ता तय किया, और कुछ दिनों बाद समधी जी के घर मिलने गए। घर का दृश्य कुछ ऐसा था कि मां रसोई में काम कर रही थीं, जबकि बच्चे और होने वाली बहू आराम से टीवी देख रहे थे। वकील साहब ने कुशल-क्षेम पूछा, चाय पी, और घर लौट आए। 🏡☕


एक माह बाद फिर से वकील साहब समधी जी के घर गए। इस बार भी देखा कि मां झाड़ू लगा रही थीं, बच्चे पढ़ाई कर रहे थे और होने वाली बहू गहरी नींद में सो रही थी। 😴 फिर भी, वकील साहब कुछ नहीं बोले, खाना खाया और वापस चले गए। 🍽️


तीसरी बार, किसी और काम से जब वकील साहब समधी जी के घर पहुंचे, तो यह दृश्य मिला कि समधन बर्तन साफ कर रही थीं, बच्चे टीवी देख रहे थे, और इस बार होने वाली बहू अपने नाखूनों में नेलपेंट लगा रही थीं। 💅🖥️


वकील साहब ने गहन विचार किया और रिश्ता तोड़ने का निर्णय लिया। कारण पूछने पर उन्होंने कहा, “मैंने तीन बार घर में जाकर देखा, समधन जी हमेशा घर के काम में व्यस्त थीं, लेकिन एक भी बार होने वाली बहू ने हाथ नहीं लगाया। जो बेटी अपनी मां की मदद नहीं करती, वह ससुराल में क्या करेगी?" 🤷‍♀️👩‍🍳


वकील साहब का यह फैसला सिर्फ एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि हर उस माता-पिता के लिए है जो चाहते हैं कि उनकी बेटी एक संस्कारी बहू बने, न कि केवल एक सुंदर गुलदस्ता जो सजाने के लिए हो। 🌹


आजकल के माता-पिता अपनी बेटियों को केवल प्यार से बड़ा करते हैं, लेकिन उन्हें यह भी सिखाना चाहिए कि घर का काम करना, दूसरों की मदद करना और जिम्मेदारियां निभाना कितना ज़रूरी है। 🌼


बेटी से बहू बनाना माता-पिता की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। अगर हम अपनी बेटियों में संस्कार नहीं डालेंगे, तो ससुराल में वही बेटी गालियां सुनकर ज़िंदगी भर दुखी रहेगी। 😔💔


कड़वा सच, लेकिन यह हमें समझने की जरूरत है कि संस्कारी बहू तभी मिलेगी, जब हम अपनी बेटियों को भी अच्छे संस्कार देंगे। 🌸✨


वृद्धाश्रम में माता-पिता को देखकर हम सिर्फ बेटों को दोषी ठहराते हैं, लेकिन अक्सर भूल जाते हैं कि उन्हें वहां भेजने में किसी की बेटी का भी योगदान हो सकता है। बेटे शादी से पहले अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम क्यों नहीं भेजते? क्योंकि बेटी में संस्कार की कमी होती है। 🌍🧑‍🦳


इसलिए, एक सुंदर बहू के साथ एक संस्कारी बहू भी चाहिए। 🙏

Wednesday, 11 September 2024

करूँ—हँसूँ या रोऊँ।

 मेरे पति रोहित और मैं, अपने दो बच्चों करण (6 साल) और दीक्षा (1 साल) के साथ हाल ही में नए घर में शिफ्ट हुए। सब कुछ सेट करने के बाद, मैंने अपनी आदत के अनुसार रात में बादाम भिगो दिए और सोने चली गई। ये बचपन से मेरी आदत रही है, शादी के बाद भी मैं रोहित और बच्चों को भी भीगे बादाम खाने के लिए देती हूँ।


सुबह उठी तो देखा कि कटोरी में बादाम थे ही नहीं! मुझे बड़ा अजीब लगा। मैं सोचने लगी, "मैंने तो रात में भिगोए थे, फिर गए कहाँ?" मैंने रोहित को उठाया और उसे बताया। वो हंसने लगा और बोला, "शायद तुमने भिगोना भूल ही गई होगी।" लेकिन मैंने कहा, "नहीं, मैंने भिगोए थे। देखो, अगर नहीं भिगाए होते तो पानी का रंग कैसे बदलता?" उसने भी मान लिया, "अरे हां, सही कह रही हो। खैर, छोड़ो अब, मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है।"


शाम को मैंने फिर से बादाम भिगोए। रोहित भी उसी समय रसोई में खड़ा था। सब कुछ सामान्य लग रहा था। फिर रात में जब रोहित ने पानी माँगा, मैं पानी लेने गई तो देखा कि बादाम फिर गायब थे! अब तो मेरा दिल दहल गया। मैंने रोहित को बुलाया, "रोहित, जल्दी आओ, फिर से बादाम गायब हो गए!" वो खुद भी हैरान था, पर मुझे ढांढस बंधाने लगा। उसने दूसरी कटोरी में बादाम डालकर कमरे में रख दिए। पूरी रात हम दोनों बार-बार कटोरी देखते रहे, पर बादाम तब तक थे।


अगले दिन मैंने ये बात अपनी पड़ोसन को बताई। उसने जो कहा, उससे मेरी तो जैसे जान ही निकल गई। उसने बताया कि इस घर में जो पहले लोग रहते थे, उनकी पत्नी का तीन महीने में देहांत हो गया था। "हो न हो, ये उसी का साया है जो तुम्हें परेशान कर रहा है," उसने कहा। अब तो रोहित भी डरने लगा था।


मैंने रसोई जाना ही बंद कर दिया, अब मैं सारा खाना अपने कमरे में ही रखती थी। जब तक रोहित शाम को वापस नहीं आता, मैं रसोई में कदम भी नहीं रखती। कुछ दिन ऐसे ही बीते, कभी बादाम होते, कभी गायब हो जाते। हर समय मैं डरी रहती थी।

एक दिन रसोई का बल्ब अचानक फूट गया। मैं जोर से चीख पड़ी, रोहित दौड़ा-दौड़ा आया। उसने मुझे संभाला और स्टूल पर चढ़कर नया बल्ब लगाने लगा। तभी उसकी नजर फ्रीज के ऊपर पड़ी—वहां ढेर सारे बादाम बिखरे हुए थे! "ये क्या! इतने सारे बादाम यहाँ कैसे आए?" उसने मुझे दिखाया। मैं तो जैसे कुछ समझ ही नहीं पा रही थी, पर रोहित अब सतर्क हो गया था।

रात में जब मैंने फिर से बादाम भिगोए, तो हम दोनों ने ध्यान से देखा कि क्या होता है। सब सोने के बाद, हमारा बेटा करण चुपके से रसोई में गया और कटोरी से बादाम निकालकर फ्रीज के ऊपर फेंक दिए! हम उसे पकड़कर हैरान रह गए। रोहित ने उसे प्यार से पूछा, "करण, ये क्या कर रहे हो?" पहले तो वो बहुत डर गया, फिर मासूमियत से बोला, "मुझे बादाम अच्छे नहीं लगते, मम्मी रोज खाने को देती है। मना करने पर भी नहीं मानती, तो मैंने ऐसा किया।"


उस पल मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं क्या करूँ—हँसूँ या रोऊँ।

सीख

 करीब एक महीने पहले की बात है, जब मैं अपने मायके गई थी। चूंकि मुझे वहां ज्यादा समय नहीं रुकना था, मैंने घर पर आरामदायक जूते पहन रखे थे। जब मायके पहुंची, तो मेरी भाभी नेहा की चप्पलें देखकर सोचा कि इन्हें पहनकर और आराम मिलेगा, इसलिए मैंने उनकी चप्पलें पहन लीं।


नेहा की चप्पलें दिखने में साधारण थीं, पर जब मैं वॉशरूम गई, तो अचानक मेरा पैर फिसल गया। गिरते-गिरते बची, और उस पल मुझे एहसास हुआ कि चप्पलों की ग्रिप कितनी जरूरी होती है। मैंने नेहा को तुरंत सलाह दी, "नेहा, ये चप्पलें बदल लो। ऐसी पहनना जिनकी ग्रिप बेहतर हो, वरना फिसलने का खतरा बना रहेगा।"


नेहा ने मेरी बात को मजाक में लेते हुए कहा, "दीदी, मैं तो इन्हीं में सारा काम करती हूँ, बाथरूम में भी। आपको शायद आदत नहीं है।" उसकी बात सुनकर मैंने ज्यादा जोर नहीं दिया, और हम बात वहीं खत्म कर दी।


कुछ दिनों बाद, मैंने नेहा से हालचाल लेने के लिए फोन किया। उसकी आवाज़ में उदासी थी। मैंने पूछा, "सब ठीक तो है?" नेहा ने जवाब दिया, "दीदी, दो दिन पहले बाथरूम में फिसल गई। कमर और पैरों में बहुत दर्द है। डॉक्टर ने दवाइयां दी हैं। शुक्र है कि हड्डी नहीं टूटी।" उसकी बात सुनकर मुझे दुख हुआ और पूछा, "अब तो तुमने चप्पलें बदल लीं?"


नेहा हल्के से हंसते हुए बोली, "हाँ दीदी, आपकी बात सुन लेनी चाहिए थी। अब मैंने नई चप्पलें ली हैं और अपनी बेटियों के लिए भी ले आई हूं।" यह सुनकर मुझे तसल्ली हुई। यह घटना एक बड़ी सीख दे गई कि हम कई बार सलाह को नजरअंदाज कर देते हैं, जब तक कि खुद पर कुछ न गुजर जाए। अगर सही समय पर सही सलाह मान ली जाए, तो हम बहुत सी मुसीबतों से बच सकते हैं।

*सीख:**  

कई बार हम दूसरों की सलाह को हल्के में लेते हैं, लेकिन समझदारी इसी में है कि सही वक्त पर सही सलाह को मानकर अमल में लाया जाए। इससे हम अनचाही परेशानियों से बच सकते हैं।

संघ क्यों चुप है ?

 *संघ क्यों चुप है ??*

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आज मैं जब सुबह सुबह घूमने निकला, तो सामने से एक परिचित हिन्दू महानुभाव भी साथ हो लिये। देश- विदेश की चर्चा एवं राजनीतिक चर्चा आजकल प्रिय विषय है ही। तो वह बन्धु चर्चा करते करते कश्मीर से कैराना व केरल से बंगाल तक मानसिक व वाचालिक भ्रमण करने लगे।मैं चुप हो उनकी सुन रहा था। तभी अचानक बोले "वहां इन स्थानों पर हिन्दू परेशान है। आखिर संघ क्यों चुप है - इस मामले में आखिर संघ कर क्या रहा है?"


अब तो मुझे जवाब देना ही पड़ा। मैने कहा "संघ क्या है?" 

बोले "हिन्दुओं का संगठन।" 


मैं बोला "तो आप हिन्दू हैं?" 

वह बोले "कैसा प्रश्न है यह आपका? मैं कट्टर सनातन हिन्दू हूं।" 


तब मैने कहा तो क्या आप जुडे हैं संघ से?" 

वह बोले.. "नहीं तो" 


तब मैने पूछा "आपका बेटा, पोता, नाती या परिवारजन कोई रिश्तेदार जुड़ा है क्या?"  

तब बोले "नहीं कोई नहीं। बेटा नौकरी पर है, फुर्सत नहीं मिलती उसे। पोता नाती विदेश में सैटल हो चुके हैं। रिश्तेदार बडे व्यवसायी हैं। उसी में व्यस्त हैं व शेष घर पर ही रहते हैं और बच्चों को तो कोचिंग से फुर्सत नहीं मिलती।" 


मैने कहा - इसका मतलब यह हुआ कि संघ आपके व आपके परिवार व रिश्तेदारों को छोडकर शेष अन्य हिन्दुओं का संगठन है?

वह चिढकर बोले "आज क्या हुआ है आपको? कैसी बात कर रहे हो आप? अरे भाई ऐसी स्थिति मेरी अकेले की थोड़े है। देश में 90% लोग ऐसे हैं जिनको अपने काम से फुर्सत ही नहीं मिलती है। तो यह आप केवल मुझ पर ही क्यों इशारा कर रहे हो? काम ही तो पूजा है, काम नहीं करेंगे तो देश कैसे चलेगा?" 


मैने फिर कहा "तो मतलब आपके हिसाब से संघ से केवल 10% हिन्दू लोग ही जुड़े हैं।" 


वह बोले "जी नहीं साहब, मेरे वार्ड में रहते सारे हिन्दू ही है। कुल 10000 की जनसंख्या है वार्ड में हिन्दुओं की। पर सुबह सुबह देखता हूं बस रोज तो उसमें से भी केवल 10-15 लोग ही नजर आते हैं संघ की शाखा में। बाकी कभी उत्सव त्योहार पर ही नजर आते हैं।"


मैने पूछ लिया कि कभी जाकर मिले उनसे?  

बोले "नहीं.." 


मैंने पूछा कभी उनकी कोई मदद की?" 

बोले "नहीं"


मैं "कभी उनके उत्सवों कार्यक्रमों में भागीदारी की?" 

बोले "नहीं" 


मैं "तो फिर आप की संघ से यह सारी अपेक्षा क्यों ?


मैं भी तो खीज गया था अन्दर से आखिर बोल ही पड़ा "तो ठेका लिया है संघ ने आप जैसे हिन्दुओं का? क्या वह संघ के सारे लोग बेरोजगार हैं? उनके पास अपना काम नहीं है,या उनका अपना कोई परिवार नहीं हैं क्या? आप तो अपने व्यवसाय व परिवार की चिन्ता करें, बस। और वह अपने व्यवसाय व परिवार की भी चिन्ता करें व साथ में आप जैसे अकर्मण्य, एकांकी, आत्मकेंद्रित हिन्दुओं की भी चिन्ता करें ?


 यह केवल उनसे ही क्यों चाहते हैं आप ?


 क्योंकि वह भारतमाता की जय बोलते हैं, देश से प्यार करते हैं, वन्देमातरम कहते हैं? 


क्या यह करना गुनाह है उनका? इसलिये उन से आप यह जजिया वसूलना चाहते हैं?जो आप सभी समर्थ होकर भी नहीं करना चाहते वह सब कुछ वह करें। वही कश्मीर, कैराना व बंगाल तथा आप जैसों की चिन्ता करें? देश व समाज की हर तरह की आपदा व संकटों में वही अपना श्रम या धन व जीवन तक बलिदान करें? उनको क्यों आपकी तरह मूक या तटस्थ बने रहने का हक नहीं है ? क्यों वही अपना घर परिवार सब छोडकर केवल आप जैसों के लिये ही जियें ?

कभी सोचा है कि जब वह आप से चाहते हैं कि आप उनको बल दो, साथ दो, समर्थन दो, उन्हें ऐसे 10% पर ही अकेला मत छोड़ो। 

तब आप उनको निठल्ला, फालतू व पागल समझ कर उनकी उपेक्षा करते हो-और इतना ही नहीं उन्हैं साम्प्रदायिक कह कर गाली देते हो। अपने को सेक्यूलर मानकर अपनी शेखी बघारते हो।केवल अपने घर-परिवार, व्यवसाय को प्राथमिकता देते हो तथा अपने बच्चों का भविष्य बनाने में ही जुटे रहते हो।

अगर वह हिन्दू संगठन वाले हैं, तो आप जैसे भी तो सारे हिन्दू ही हैं। तो जो कर्तव्य उनका बनता है वह आपका क्यों नहीं बनता ? बस जरा यह तो स्पष्ट करें। कि क्या वही हिन्दू हैं आप हिन्दू नहीं है?

स्मरण करो, भगतसिंह को फांसी केवल इसलिये हुई थी एव॔ आजाद को भी इसीलिये अकेले लड़कर मौत को गले लगाना पडा था क्योंकि अगर यह आप जैसे शेष 90% हिन्दू हमें क्या करना कहकर सोये हुये ना होते, यह आप जैसे 90% हिन्दू आत्मकेन्द्रित हो हमें क्या फर्क पड़ता है कहकर ना जी रहे होते। उनके समर्थन में खुलकर आये होते तो उनको फांसी देने या मार सकने जितनी हिम्मत या औकात तब भी अग्रेजों में नहीं थी। अगर तब यह 90 % हिन्दू आपकी तरह तमाशा ना देखते, कभी इक्ठ्ठे होकर केवल एक बार अयोध्या पहुंच कर जय श्रीराम का नारा लगा देते तो मंदिर कब का बन गया होता।

अगर हिंदूओ मे जरा सी भी शर्म होती तो मात्र कुछ करोड़ गद्दार वंदेमातरम,भारत माता की जय का विरोध करने की हिम्मत नही कर पाते।

आज टहलते समय संघ स्थान पर हुयी वार्तालाप के. आधार पर मन के विचार -

*कभी मैं खुद भी रोज शाखा में जाता था आज न तो मेरा बेटा ना मैं दोनों ही नही जाते न किसी प्रोग्राम में support करते हाँ उम्मीद जरूर करते हैं कि देश बदलेगा but बदलेगा कौन ये बड़ा सवाल है इसलिए मैंने आज से ये सोच लिया है की मैं भी अपनी तरफ से संघ को पूरा support करूंगा साथ ही खुद भी उनके program में सम्मिलित भी होऊँगा आप भी हो सके तो थोड़ा समय निकाल कर प्रयास जरूर कीजियेगा* 😊🙏। 

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश के नाम छोटा सा संदेश.. छोड़ा मुंह बड़ी बात..

 स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश के नाम छोटा सा संदेश.. छोड़ा मुंह बड़ी बात..   राज नेता, कुछ विपक्षी दल,संगठन,मीडिया.सभी, के सभी अपनी अपनी र...