sunilrathod

Thursday, 19 September 2024

रिश्ता एक दोस्ती और समझदारी का प्रतीक बन गया

 रवि, 22 साल का एक होनहार और पढ़ाई में व्यस्त युवक, अपने माता-पिता के साथ एक छोटे से मोहल्ले में रहता था। उस मोहल्ले की सबसे बड़ी रौनक थी नेहा भाभी, जो अपनी खूबसूरती और सादगी से सभी का ध्यान आकर्षित करती थीं। 28 वर्षीय नेहा की शादी को तीन साल हो चुके थे, लेकिन उनके पति विनोद, जो एक बिजनेसमैन थे, अक्सर काम के सिलसिले में बाहर रहते थे। इस कारण नेहा को ज्यादातर वक्त अकेले ही गुजारना पड़ता था।


रवि का कमरा ठीक नेहा के आँगन की ओर था, और दीवार काफी छोटी होने के कारण, अक्सर वह नेहा भाभी को देखता रहता। धीरे-धीरे, नेहा के प्रति रवि के दिल में एक अलग सा आकर्षण पनपने लगा। उसकी मासूमियत और सहजता रवि को दिल से छूने लगी। 


एक दिन, रवि छत पर पढ़ाई कर रहा था, तभी उसने देखा कि नेहा भाभी आँगन में पौधों को पानी दे रही थीं। गुलाबी साड़ी में लिपटी हुई नेहा की खूबसूरती ने रवि के दिल को बेचैन कर दिया। वह इस बात को समझ रहा था कि यह केवल एकतरफा आकर्षण था, लेकिन अपने दिल की धड़कनों को रोक पाना उसके लिए मुश्किल हो गया था।


नेहा भाभी, जो सुलझी हुई और हंसमुख महिला थीं, रवि की मासूमियत से काफी प्रभावित थीं। कभी-कभी वह उसे अपने छोटे-छोटे कामों में मदद करने के लिए बुला लेतीं, और रवि इस बात से बेहद खुश हो जाता था। एक दिन नेहा ने रवि से कहा, "रवि, क्या तुम मेरे साथ बाजार चल सकते हो? मुझे कुछ सामान लेना है, और अकेले जाना ठीक नहीं लग रहा।" 


यह सुनकर रवि का दिल खुशी से झूम उठा। उसे नेहा के साथ कुछ समय बिताने का मौका जो मिल रहा था। बाजार जाते हुए, हल्की-फुल्की बातचीत के बीच, रवि ने अचानक कहा, "भाभी, आप बहुत अच्छी हैं, और मैं आपको बहुत पसंद करता हूँ।"


नेहा हैरान होकर रुक गईं। उन्होंने थोड़ी मुस्कान के साथ पूछा, "रवि, ये क्या कह रहे हो?"


रवि ने धीरे से कहा, "भाभी, मुझे पता है कि यह सही नहीं है, लेकिन मैं आपको भूल नहीं पाता। शायद यह सिर्फ एकतरफा है, लेकिन मुझे लगा कि आपको बताना चाहिए।"


नेहा ने रवि के मासूम चेहरे की ओर देखा, उसकी आँखों में सच्चाई और मासूमियत दिखाई दी। वह जानती थीं कि यह आकर्षण उम्र और परिस्थितियों के कारण था। उन्होंने समझाते हुए कहा, "रवि, तुम्हारी भावनाएँ बहुत प्यारी हैं, लेकिन यह सिर्फ एक आकर्षण है। प्यार और आकर्षण में फर्क होता है। समय के साथ ये भावनाएँ बदल जाएंगी। तुम एक अच्छे इंसान हो, और तुम्हें अपनी जिंदगी में बहुत कुछ हासिल करना है।"


रवि ने सिर झुका लिया और समझ गया कि नेहा सही कह रही थीं। वह अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने लगा। इसके बाद, रवि ने खुद को पढ़ाई में और भी ज्यादा डूबा लिया और नेहा को एक आदर्श और प्रेरणा के रूप में देखने लगा।

समय बीता, और रवि ने अपनी पढ़ाई पूरी करके एक सफल करियर बनाया। नेहा भाभी अब उसकी प्रेरणा थीं, और वह उन्हें एक मार्गदर्शक के रूप में देखने लगा, न कि किसी आकर्षण के रूप में। 

**कहानी का संदेश:** 

यह कहानी हमें सिखाती है कि उम्र के साथ हमारी भावनाएं बदलती रहती हैं। कभी-कभी हमें उन लोगों से प्यार हो जाता है जो हमारी पहुंच से बाहर होते हैं, लेकिन सही मार्गदर्शन और समझदारी से हम उन भावनाओं को सही दिशा में मोड़ सकते हैं। रवि और नेहा का रिश्ता एक दोस्ती और समझदारी का प्रतीक बन गया, जिसमें आपसी सम्मान और भावना की सही समझ थी। 😊❤️

प्यार में सादगी और सम्मान भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि भावनाएँ।

 मेरी शादी मेरी मर्जी के खिलाफ एक साधारण लड़के के साथ कर दी गई थी। उसका नाम था अमन। उसके परिवार में बस उसकी माँ, सविता जी थीं। न कोई भाई, न बहन, और न ही कोई बड़ा परिवार। घर की हालत भी कुछ खास नहीं थी। शादी में उसे ढेर सारे उपहार और पैसे मिले थे, मगर मेरा दिल कहीं और था। मैं अरमान नाम के एक लड़के से प्यार करती थी, और उसने भी मुझसे शादी करने का वादा किया था। पर किस्मत ने मुझे कहीं और ला खड़ा किया—अमन के ससुराल में।


शादी की पहली रात, अमन मेरे पास एक कप दूध लेकर आया। मेरी नज़रें उसकी सादगी और शांति पर टिकी थीं। मैंने गुस्से में उससे पूछा, "एक पत्नी की मर्जी के बिना अगर पति उसे छूता है, तो क्या उसे बलात्कार कहेंगे या फिर हक?" अमन मेरी आंखों में देखकर शांतिपूर्वक बोला, "आपको इतनी गहराई में जाने की जरूरत नहीं है। मैं सिर्फ शुभ रात्रि कहने आया हूँ," और बिना कोई बहस किए, वह कमरे से बाहर चला गया।


उस समय, मैं सोच रही थी कि कोई झगड़ा हो, ताकि मैं इस अनचाहे रिश्ते से छुटकारा पा सकूं। मगर, अमन ने मुझसे कोई सवाल नहीं पूछा, कोई दबाव नहीं डाला। दिन बीतते गए, और मैं उस घर में रहते हुए भी कभी किसी काम में हाथ नहीं लगाती थी। मेरा दिन इंटरनेट पर बीतता—अक्सर अरमान से बातें करती, या सोशल मीडिया पर समय बिताती। सविता जी, अमन की माँ, बिना किसी शिकायत के घर का सारा काम करती रहतीं। उनके चेहरे पर हमेशा एक प्यारी मुस्कान होती, मानो किसी तपस्वी की शांति हो।


अमन भी दिन-रात अपनी साधारण नौकरी में मेहनत करता रहता। वह एक छोटे से कार्यालय में काम करता था, और उसकी ईमानदारी की लोग मिसाल दिया करते थे। हमारी शादी को एक महीना बीत चुका था, लेकिन हम कभी पति-पत्नी की तरह एक साथ नहीं सोए। मैंने मन ही मन तय कर लिया था कि इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है।


एक दिन, मैंने जानबूझकर सविता जी के बनाए खाने को बुरा-भला कह दिया और खाने की थाली ज़मीन पर फेंक दी। इस बार अमन ने पहली बार मुझ पर हाथ उठाया। लेकिन उसकी आंखों में कोई क्रोध नहीं था, बल्कि एक अजीब सा दर्द था। वह चिल्लाया नहीं, बस मुझे घूरते हुए बोला, "इतनी नफरत क्यों है?" मुझे उसी बहाने की तलाश थी। मैंने पैर पटके, दरवाजा खोला, और सीधा अरमान के पास चली गई। मैंने उससे कहा, "चलो, कहीं भाग चलते हैं। अब इस जेल में नहीं रहना मुझे।"


अरमान, जो कभी मुझसे प्यार की बातें किया करता था, आज कुछ अजीब सा व्यवहार कर रहा था। वह बोला, "इस तरह हम कैसे भाग सकते हैं? मेरे पास भी कुछ नहीं है, और तुम्हारे पास भी अब कुछ नहीं बचा।" उसकी बातें सुनकर मेरा दिल टूट गया। वह मुझसे प्यार नहीं करता था, वह बस मेरे पैसों और गहनों का लालच रखता था।


वहां से लौटने के बाद, मैं सीधी अपने ससुराल आई। घर खाली था, अमन और उसकी माँ कहीं बाहर गए थे। मेरे मन में हलचल थी। मैंने अमन की अलमारी खोली, और जो मैंने देखा, वह मेरे पैरों तले जमीन खिसका देने वाला था। अलमारी में मेरी सारी चीजें—मेरे बैंक पासबुक, एटीएम कार्ड, गहने—सब वहाँ सुरक्षित रखे हुए थे। और पास में ही एक खत रखा था, जिसमें अमन ने लिखा था, "मैं जानता हूँ कि यह रिश्ता तुम्हारे लिए बोझ है। लेकिन मैंने तुम्हारी हर चीज को संभालकर रखा है, ताकि एक दिन जब तुम खुद को इस घर का हिस्सा मानोगी, तो यह सब तुम्हारा हो।"


खत में उसने यह भी लिखा था, "मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, और तुम्हारी मर्जी का हमेशा सम्मान करूंगा। मैं जबरदस्ती से नहीं, बल्कि तुम्हारे प्यार से तुम्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता हूँ।"


इस खत को पढ़ने के बाद, मेरे मन में अमन के प्रति एक नई भावना जागी। उसने कभी मुझ पर कोई हक नहीं जमाया, उसने हमेशा मेरा सम्मान किया। मुझे एहसास हुआ कि सच्चा प्यार सिर्फ अरमान जैसे दिखावे में नहीं होता, बल्कि अमन जैसे सादगी में भी हो सकता है।


अगली सुबह, मैंने पहली बार अपनी मांग में सिंदूर गाढ़ा किया और अपने पति के ऑफिस पहुँची। सबके सामने मैंने कहा, "अमन, हमें लंबी छुट्टी पर जाना है। अब से सब कुछ ठीक है।"


उस दिन मुझे समझ आया कि जो फैसले मैंने गलत समझे थे, वे मेरे लिए सबसे सही साबित हुए। मेरे माता-पिता ने मेरे लिए जो सोचा था, वही मेरे जीवन का सबसे अच्छा फैसला था। अमन ने मुझे बिना कुछ कहे, बिना कुछ जताए, सच्चे प्यार का एहसास कराया।


अब मैं अपने ससुराल को अपना घर मान चुकी थी। और अमन, जो कभी मुझे साधारण लगता था, मेरे लिए अब दुनिया का सबसे अनमोल व्यक्ति था।**


यह कहानी सिखाती है कि कभी-कभी जिंदगी में हमें जो मिलता है, वह हमारे अपने सपनों से कहीं बेहतर होता है। प्यार में सादगी और सम्मान भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि भावनाएँ।

हर पिता के भाग्य में बेटी नहीं होती*

 **हर पिता के भाग्य में बेटी नहीं होती**

राजा दशरथ जब अपने चारों बेटो की बरात लेकर जनक के द्वारा पहुंचे तो राजा जनक ने सम्मानपूर्वक बारात का स्वागत किया 

तभी दशरथ जी ने आगे बढ़कर जनक जी के चरण छु लिए 

चौंककर जनक जी ने दशरथ जी को थाम लिया और कहा महराज आप बड़े है वरपक्ष वाले हैं ये उल्टी गंगा कैसे बह रहा है 

इस पर दशरथ जी ने बड़ी सुंदर बात कही महराज आप दाता है कन्यादान कर रहे हैं मैं तो याचक हु आपके द्वारा कन्या लेने आया हूं अब आप ही बताइए दाता 

         और

याचक में कौन बड़ा है 

यह सुनकर जनक जी के नेत्रों से आंसु बह निकली भाग्यशाली हैं वो जिनके घर बेटियां हर बेटी के भाग्य में पिता होता है लेकिन हर पिता के भाग्य में बेटी नहीं होती 

     **जय श्री राम**

रसोई बनाने के कुछ नियम....!!

 कितनी बार पोस्ट कर चूका हूँ ओर करता रहूंगा शायद इसे पढ़ कर कुछ ओर लोग शाकाहारी बन जायें...!


रसोई बनाने के कुछ नियम....!!


गुस्से से अगर खाना बनाया गया है उसे सात्विक अन्न नही कहेंगे, इसलिए खाना बनाने वालों को कभी भी नाराज, परेशान स्थिति में खाना नही बनाना चाहिए।


और कभी भी माँ, बीबी, बहनों को (या जो खाना बनाते है उनको) डांटना नहीं, उनसे कभी लड़ना नहीं क्योंकि वो रसोईघर में जाके और आपके ही खाने में गुस्से वाली Vibrations मिला के.....आपको ही एक घंटे में खिलाने वाले है... ये ध्यान में रखने वाली अत्यन्त ही महत्वपूर्ण बात है।


 किसी को डांट दो, गुस्सा कर दो और बोलो जाके खाना बनाओ.....अब....?

खाना तो हाथ बना रहा है मन क्या कर रहा है अन्दर मन तो लगतार खिन्न है -......तो वो सारे प्रभाव खाने के अंदर जा रहे है..


 भोजन तीन प्रकार का होता है-

1. जो हम होटल में खाते है

2. जो घर में माँ बनाती है और 

3. जो हम मंदिर और गुरूद्वारे में खाते है

तीनो के प्रभाव अलग अलग होते हैं ।


(1) जो Hotel में खाना बनाते है उनके Vibration कैसे होते है 

आप खाओ और हम कमायें जो ज्यादा बाहर खाता है ... असल मे उनका रोज़ रोज़ बाहर खाना ही उसकी सारी कमाई खा जाता है।


(2) घर में जो माँ खाना बनाती है

वो बड़े प्यार से खाना बनाती है...

परंतु ,घर में आजकल जो Cook (नौकर) रख लिए है खाना बनाने के लिए और वो जो खाना बना रहे है वो भी.. इसी सोच से कि आप खाओ हम कमाए.... एक बच्चा अपनी माँ को बोले कि..एक रोटी और खानी है तो माँ का चेहरा ही खिल जाता है।कितनी प्यार से वो एक और रोटी बनाएगी। कि मेरे बच्चे ने रोटी तो और मांगी वो उस रोटी में बहुत ज्यादा प्यार भर देती है... अगर आप अपने खाना बनाने वाले नौकर को बोलो एक रोटी और खानी है.... तो..? वो सोचेगा ...रोज 2 रोटी खाते है, आज एक और चाहिए आज ज्यादा भूख लगी है अब मेरे लिए एक कम पडेगी या ..आटा भी ख़त्म हो गया अब और आटा गुंथना पड़ेगा एक रोटी के लिए..मुसीबत...!!!

 ऐसी रोटी नही खानी है..ऐसी रोटी खाने से..ना खाना ही भला....


(3) जो मंदिर और गुरूद्वारे में

खाना बनता है प्रसाद बनता है वो किस भावना से बनता है...वो परमात्मा को याद करके खाना बनाया जाता है, सबके पेट और आत्मतृप्ति के लिए वह भोजन पकाया जाता है तो , क्यों न हम अपने घर में परमात्मा की याद में प्रसाद बनाना शुरू कर दें. 


करना क्या है ... ?

घर, रसोई साफ़, मन शांत, रसोई में अच्छे गीत चलाये और उनको सुनते हुए खाना बनाये ।

या फिर,

 घर में जो समस्या है उसके लिए जो समाधान है उसके बारे में परमात्मा को याद करते हुए खाना बनाये.

 परमात्मा को कहे मेरे बच्चे के कल परीक्षा है, इस खाने में बहुत ताकत भर दो.! शांति भर दो.! ताकि मेरे बच्चे का मन एकदम शांत हो, ताकि उसकी सारी चिंता खत्म हो जाये. 

हे परमात्मा, मेरे पति को व्यवसाय में बहुत चिंता है और वो बहुत गुस्सा करते हैं, इस खाने में ऐसी शक्ति भरो, कि उनका मन शांत हो जाये... 

जैसा अन्न वैसा मन..

 जादू है खाने में। 

    असर है पकाने में।

शुद्ध शाकाहारी 

रोटी

आलू 

दही

सलाद❤️🙏

जिसका प्रेम बदलता रहता हैं वो तलाश में ही रहते हैं, अगर मन चित इस्थिर नही हैं तो उसकी इच्छा आकांशा बदलता रहता हैं,

 प्रेम तो सब करना चाहते हैं,पर प्रेम में कोई होना नहीं चाहते हैं। कहते हैं प्रेम कभी भी हो सकता हैं और कितने बार भी हो सकता हैं। पर आज मैं आप को कहता हूँ ,

प्रेम में सिर्फ़ आप एक बार ही हो सकते हो और यदि आप एक बार जिसके भी हो जाओगे उसके बाद आप कभी किसी के नही हो पाओगे, यही तो सास्वत प्रेम की निसानी हैं। 

यंहा सब को शिकवा शिकायत हैं कि

मेरा वाला मुझसे प्यार नहीं करता,

मुझें याद नही करता, मुझे समय नही देता, मुझें समझता नहीं, ये अपेक्षा करने से पहले ये तो जान लो कि तुम क्या करते हो,

प्रतीक्षा के बिना प्रेम और मन शांति के बिना ध्यान, या काहू की बिना कर्मकाण्ड के पूजा कभी संभव नही हुआ हैं ।

नही ना फिर बिना धैर्य और बिना प्रतीक्षा का तुम प्रेम कैसे कर पाओगे,

जिसका प्रेम बदलता रहता हैं वो तलाश में ही रहते हैं, अगर मन चित इस्थिर नही हैं तो उसकी इच्छा आकांशा बदलता रहता हैं,

प्रेम में एक भावना होता हैं आपका भावना और सामने वाले के भावना में अंतर ही प्रेम की परिधि हैं।

आप इच्छा से नही स्वेक्षा से प्रेम करिये इच्छा बदलता रहता हैं स्वेक्षा कभी नहीं बदलता और जो इच्छा से करते हैं वो भटकते हैं और जो स्वेक्षा के करते हैं वो निखड़ जाते हैं, वो इस बनावटी दुनिया से अलग हो जाते हैं।

हो सकता हैं इन बातों से आप इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते हो पर कभी चिंतन करना मालूम हो जायेगा प्रेम इतना भी जटिल नहीं हैं। बस जरूरत हैं तो स्वार्थ को तिलांजलि देने का निःस्वार्थ में प्रेम करिये फिर देखिए ज़िन्दगी कैसे हसीन हो जाता हैं।

सुनिल राठौड़ 

सच्चाई का एहसास भी गहरा था।

 लगातार दरवाजे पर पीटने की आवाज़ से मेरी आँख खुल गई। आँखों में अधूरी नींद और थकान के काँटे चुभने लगे। मन किया कि बस फिर से आँखें बंद कर लूं, लेकिन जिम्मेदारियों का बोझ ऐसा होता है कि सोचना भी मुश्किल हो जाता है। दस साल से बिना सास के इस गृहस्थी का जुआ मेरे ही कंधों पर था। हर चीज़ की जिम्मेदारी मुझे ही निभानी पड़ती थी। अभी तो तीन दिन पहले ही बड़े अरमानों से देवर की शादी कराके घर लाई थी, नाजुक सी देवरानी श्वेता। मैं और मेरी दोनों ननदें, नेहल और निकिता, उसकी बलैयां लेते नहीं थक रहे थे।


जब शादी का शोर थमा, तो बड़ी ननद नेहल ने मेरे सूजे हुए पैरों को देखकर लाड़ से कहा, "बड़ी भाभी, अब आराम करो, छोटी भाभी आ गई है, अब तुम्हारा काम हल्का हो जाएगा। जैसे तुमने दस साल पहले मेरा किया था, याद है?" उसने हंसते हुए निकिता की ओर देखा और कहा, "इस आफत की पुड़िया को तुम्हारे पास छोड़कर ही तो मैं ससुराल जा पाई थी।"


मैं भी हंस पड़ी। वो दिन याद आ गए जब निकिता बिना खटखटाए कमरे में आ जाती थी, और हम दोनों के बीच सो जाती थी। कभी-कभी तो वह फरमाइशों का पूरा पुलिंदा लेकर बैठ जाती थी। अब उसने मज़ाक में कहा था, "भाभी, अब छोटी भाभी मेरी दोस्त होगी। आपकी नसीहतों से छुटकारा मिल जाएगा।"


मन में उन पुरानी यादों में डूबी ही थी कि दरवाजे पर फिर से जोर से आवाज़ हुई। अनमने से स्वर में मैंने कहा, "दरवाजा खुला है, आ जाओ।"


दरवाजा खुलते ही निकिता रोती हुई अंदर आई और उसके पीछे श्वेता की कड़क आवाज़ गूंज रही थी, "इतनी बड़ी हो गई हो, लेकिन मैनर्स सब भूल चुकी हो क्या? बिना दरवाजा खटखटाए अंदर आ जाती हो, और फरमाइशें करती हो। शरबत बना दो, ये बना दो, वो बना दो। खाना खाते वक्त पेट नहीं भरा था क्या?"


मैं हक्का-बक्का रह गई। निकिता की आंखों में आँसू थे और वह मेरे गले लग गई। मैंने उसे चुप कराया, पीठ पर हाथ फेरा और उससे पूछा कि क्या हुआ। उसने सुबकते हुए बताया कि कैसे श्वेता ने पहले दिन से ही उसे उपेक्षित महसूस कराया था। उसने बताया कि पिछली शाम जब वह तैयार होकर चाट खाने के लिए जाने वाली थी, तो श्वेता और देवर उसे बिना बताए चले गए थे। और आज, जब वह छोटे भैया के पीछे-पीछे कमरे में गई, तो श्वेता ने उसे झिड़क कर बाहर निकाल दिया।


निकिता की बातों से मेरा दिल बैठ गया। वह रोते हुए कह रही थी, "भाभी, आपकी भी तो नई शादी थी, लेकिन आपने कभी मुझे अलग महसूस नहीं कराया। मैं आज भी आपकी लाडली हूँ, तो फिर अब ऐसा क्यों हो रहा है?"


मैं और नेहल उसे समझाने की कोशिश कर रहे थे, तभी निकिता ने अचानक कहा, "भाभी, आप तो मेरी कोहिनूर हो, लेकिन एक बात कहूं? छोटी भाभी आपसे आगे निकल गईं। जो बात आप दस साल में नहीं सिखा पाईं, वो श्वेता भाभी ने तीन दिन में सिखा दी। कि ससुराल में क्या-क्या नहीं करना चाहिए।"


उसकी ये बात सुनकर मेरे मन में खामोशी छा गई, लेकिन सच्चाई का एहसास भी गहरा था।

यदि आपको कोई देखे तो कुत्ता कैसे देख रहा है और न देखे तो कुत्ता देखता भी नहीं है

 🤷‍♀️मैंने एक पोस्ट कि थी तो उस पर🤷‍♀️

 एक सज्जन ने बहुत ही अच्छा कमेंट किये है 

हमें उनकी कमेंट bahut👙अच्छी लगी 

आप भी पढ़ कर बताये 

🤷‍♀️आपको कैसी लगी🤷‍♀️


 🌹आपने मात्र एक पक्ष ही रखा है, कभी दूसरा पक्ष भी रखकर देखिए सोचिए और लिखिए 

हमारी संस्कृति में स्त्री चार स्वरूप में स्वीकृत की गई है जिसमें प्रथम स्वरूप माँ है दूसरा स्वरूप बहिन है, तीसरा स्वरूप पुत्री है और चौथा स्वरूप है सहधर्मिणी जिसे धर्मपत्नी भी कहा जाता है। 

यह प्राकृतिक स्वरूप है कि एक उम्र आने पर मनुष्यों में विपरीत लिंगी को देखकर कामोत्तेजक परिवर्तन होते हैं यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। जहां स्त्री अपनी कामोत्तेजना को नियंत्रित करने में स्वाभाविक रूप से सक्षम है वहीं कामोत्तेजना को नियंत्रित करने में पुरुष की सक्षमता स्त्रियों की तुलना में कम है।

हम जिस देश में रहते हैं उस देश में गाँव मुहल्ले के परिवार की बेटी सारे गांव मुहल्ले की बहिन बेटी तो होती है माँ, भाभी चाची मामी बुआ भी होती है लेकिन गांव के किसी एक व्यक्ति की पत्नी सारे गांव की पत्नी नहीं होती।

आज के समय में यदि पड़ौसी की बहिन बेटियों के प्रति यह सम्मान कम हुआ है तो इसके लिए आप मात्र पुरुषों को दोषी नहीं ठहरा सकते। फिल्मों में होते प्यार, वैवाहिक जीवन के अंतरंग दृश्य प्रेम प्रसंगों के प्रदर्शन में उत्तेजकता से भरे दृश्यों ने पुरुषों की मानसिकता में ठीक वैसा ही परिवर्तन किया है जैसा परिवर्तन स्त्रियों में ड्रेसिंग सेंस को लेकर हुआ है।

फिल्मों में चलती हुई स्त्री के नितम्ब और कमर पर कैमरा केन्द्रित होना, क्लीबेज गले से झांकते स्तन, दौड़ते और चलते हुए मात्र स्तनों पर कैमरे का केन्द्रित होना इन सबने पुरुषों के दृष्टिकोण को बदल दिया। धीरे-धीरे यह कामोत्तेजना को बढाने वाले दृश्यों की ऐसी परिणति हुई है अब हर स्त्री में स्त्री ही दिखती है बहिन बेटी माता आदि नहीं।

आप जड़ पर प्रहार कीजिए अभिनय के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता रोकने का प्रयास कीजिए पुरुषों की मानसिकता स्वयमेव बदल जाएगी। 

यह जो फेमिनिज्म के नाम पर लड़कियां छोटी छोटी चड्डी से छोटी जीन्स और ऐसे टॉप जिनसे स्तन बाहर निकलने को आतुर रहते हैं निश्चित ही पुरुषों की कामोत्तेजना को बढ़ाते हैं, कोढ़ में खाज तब होती है जब मोबाईल अश्लीलतम कंटेंट भरे पड़े हैं, ऐसे में सक्षम पुरुष अपनी पत्नी के साथ अपनी उत्तेजना शांत कर लेता है, पत्नी नहीं है तो देहजीवाओं के पास चला जाता है लेकिन जिनके पास दोनों ही नहीं हैं वह लोग अपनी उत्तेजना को शांत करने के लिए अन्य साधनों का प्रयोग करते हैं जिसमें अंतिम साधन रेप होता है, ध्यान रहे हम यहां रेप का समर्थन नहीं कर रहे और न ही स्त्रियों की स्वतंत्रता का हम तो अश्लील फिल्म, अश्लील वीडियो, अश्लील साहित्य, सहजता से उपलब्ध नशा और अश्लील पहनावे के साथ साथ अश्लील भरी चाल, कामोत्तेजना को बढ़ाते मेकप आदि के दुष्प्रभाव को बता रहे हैं।


आप विचार करना कि टॉप से झांकते स्तन, जींस में से बाहर निकलने को आतुर नितम्ब चटख लिपस्टिक स्लीवलेस टॉप या ब्लाऊज़ या इस तरह के अन्य वस्त्र पहिनकर बाहर निकलने की आवश्यकता क्या है ❓ क्यों दिखाना चाहते हैं कि आप के स्तन या नितम्ब कैसे हैं ❓ जब लोग देखते हैं तो धारणा भी बनाते हैं और आपको धारणा बनाने पर आपत्ति है मतलब चित भी मेरी पट भी मेरी और अंटा भी मेरा वाह जी मुस्कान जी वाह सही जा रहे हैं 

यदि आपको कोई देखे तो कुत्ता कैसे देख रहा है और न देखे तो कुत्ता देखता भी नहीं है 

करें तो क्या करें

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...