sunilrathod

Thursday, 19 September 2024

रसोई बनाने के कुछ नियम....!!

 कितनी बार पोस्ट कर चूका हूँ ओर करता रहूंगा शायद इसे पढ़ कर कुछ ओर लोग शाकाहारी बन जायें...!


रसोई बनाने के कुछ नियम....!!


गुस्से से अगर खाना बनाया गया है उसे सात्विक अन्न नही कहेंगे, इसलिए खाना बनाने वालों को कभी भी नाराज, परेशान स्थिति में खाना नही बनाना चाहिए।


और कभी भी माँ, बीबी, बहनों को (या जो खाना बनाते है उनको) डांटना नहीं, उनसे कभी लड़ना नहीं क्योंकि वो रसोईघर में जाके और आपके ही खाने में गुस्से वाली Vibrations मिला के.....आपको ही एक घंटे में खिलाने वाले है... ये ध्यान में रखने वाली अत्यन्त ही महत्वपूर्ण बात है।


 किसी को डांट दो, गुस्सा कर दो और बोलो जाके खाना बनाओ.....अब....?

खाना तो हाथ बना रहा है मन क्या कर रहा है अन्दर मन तो लगतार खिन्न है -......तो वो सारे प्रभाव खाने के अंदर जा रहे है..


 भोजन तीन प्रकार का होता है-

1. जो हम होटल में खाते है

2. जो घर में माँ बनाती है और 

3. जो हम मंदिर और गुरूद्वारे में खाते है

तीनो के प्रभाव अलग अलग होते हैं ।


(1) जो Hotel में खाना बनाते है उनके Vibration कैसे होते है 

आप खाओ और हम कमायें जो ज्यादा बाहर खाता है ... असल मे उनका रोज़ रोज़ बाहर खाना ही उसकी सारी कमाई खा जाता है।


(2) घर में जो माँ खाना बनाती है

वो बड़े प्यार से खाना बनाती है...

परंतु ,घर में आजकल जो Cook (नौकर) रख लिए है खाना बनाने के लिए और वो जो खाना बना रहे है वो भी.. इसी सोच से कि आप खाओ हम कमाए.... एक बच्चा अपनी माँ को बोले कि..एक रोटी और खानी है तो माँ का चेहरा ही खिल जाता है।कितनी प्यार से वो एक और रोटी बनाएगी। कि मेरे बच्चे ने रोटी तो और मांगी वो उस रोटी में बहुत ज्यादा प्यार भर देती है... अगर आप अपने खाना बनाने वाले नौकर को बोलो एक रोटी और खानी है.... तो..? वो सोचेगा ...रोज 2 रोटी खाते है, आज एक और चाहिए आज ज्यादा भूख लगी है अब मेरे लिए एक कम पडेगी या ..आटा भी ख़त्म हो गया अब और आटा गुंथना पड़ेगा एक रोटी के लिए..मुसीबत...!!!

 ऐसी रोटी नही खानी है..ऐसी रोटी खाने से..ना खाना ही भला....


(3) जो मंदिर और गुरूद्वारे में

खाना बनता है प्रसाद बनता है वो किस भावना से बनता है...वो परमात्मा को याद करके खाना बनाया जाता है, सबके पेट और आत्मतृप्ति के लिए वह भोजन पकाया जाता है तो , क्यों न हम अपने घर में परमात्मा की याद में प्रसाद बनाना शुरू कर दें. 


करना क्या है ... ?

घर, रसोई साफ़, मन शांत, रसोई में अच्छे गीत चलाये और उनको सुनते हुए खाना बनाये ।

या फिर,

 घर में जो समस्या है उसके लिए जो समाधान है उसके बारे में परमात्मा को याद करते हुए खाना बनाये.

 परमात्मा को कहे मेरे बच्चे के कल परीक्षा है, इस खाने में बहुत ताकत भर दो.! शांति भर दो.! ताकि मेरे बच्चे का मन एकदम शांत हो, ताकि उसकी सारी चिंता खत्म हो जाये. 

हे परमात्मा, मेरे पति को व्यवसाय में बहुत चिंता है और वो बहुत गुस्सा करते हैं, इस खाने में ऐसी शक्ति भरो, कि उनका मन शांत हो जाये... 

जैसा अन्न वैसा मन..

 जादू है खाने में। 

    असर है पकाने में।

शुद्ध शाकाहारी 

रोटी

आलू 

दही

सलाद❤️🙏

जिसका प्रेम बदलता रहता हैं वो तलाश में ही रहते हैं, अगर मन चित इस्थिर नही हैं तो उसकी इच्छा आकांशा बदलता रहता हैं,

 प्रेम तो सब करना चाहते हैं,पर प्रेम में कोई होना नहीं चाहते हैं। कहते हैं प्रेम कभी भी हो सकता हैं और कितने बार भी हो सकता हैं। पर आज मैं आप को कहता हूँ ,

प्रेम में सिर्फ़ आप एक बार ही हो सकते हो और यदि आप एक बार जिसके भी हो जाओगे उसके बाद आप कभी किसी के नही हो पाओगे, यही तो सास्वत प्रेम की निसानी हैं। 

यंहा सब को शिकवा शिकायत हैं कि

मेरा वाला मुझसे प्यार नहीं करता,

मुझें याद नही करता, मुझे समय नही देता, मुझें समझता नहीं, ये अपेक्षा करने से पहले ये तो जान लो कि तुम क्या करते हो,

प्रतीक्षा के बिना प्रेम और मन शांति के बिना ध्यान, या काहू की बिना कर्मकाण्ड के पूजा कभी संभव नही हुआ हैं ।

नही ना फिर बिना धैर्य और बिना प्रतीक्षा का तुम प्रेम कैसे कर पाओगे,

जिसका प्रेम बदलता रहता हैं वो तलाश में ही रहते हैं, अगर मन चित इस्थिर नही हैं तो उसकी इच्छा आकांशा बदलता रहता हैं,

प्रेम में एक भावना होता हैं आपका भावना और सामने वाले के भावना में अंतर ही प्रेम की परिधि हैं।

आप इच्छा से नही स्वेक्षा से प्रेम करिये इच्छा बदलता रहता हैं स्वेक्षा कभी नहीं बदलता और जो इच्छा से करते हैं वो भटकते हैं और जो स्वेक्षा के करते हैं वो निखड़ जाते हैं, वो इस बनावटी दुनिया से अलग हो जाते हैं।

हो सकता हैं इन बातों से आप इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते हो पर कभी चिंतन करना मालूम हो जायेगा प्रेम इतना भी जटिल नहीं हैं। बस जरूरत हैं तो स्वार्थ को तिलांजलि देने का निःस्वार्थ में प्रेम करिये फिर देखिए ज़िन्दगी कैसे हसीन हो जाता हैं।

सुनिल राठौड़ 

सच्चाई का एहसास भी गहरा था।

 लगातार दरवाजे पर पीटने की आवाज़ से मेरी आँख खुल गई। आँखों में अधूरी नींद और थकान के काँटे चुभने लगे। मन किया कि बस फिर से आँखें बंद कर लूं, लेकिन जिम्मेदारियों का बोझ ऐसा होता है कि सोचना भी मुश्किल हो जाता है। दस साल से बिना सास के इस गृहस्थी का जुआ मेरे ही कंधों पर था। हर चीज़ की जिम्मेदारी मुझे ही निभानी पड़ती थी। अभी तो तीन दिन पहले ही बड़े अरमानों से देवर की शादी कराके घर लाई थी, नाजुक सी देवरानी श्वेता। मैं और मेरी दोनों ननदें, नेहल और निकिता, उसकी बलैयां लेते नहीं थक रहे थे।


जब शादी का शोर थमा, तो बड़ी ननद नेहल ने मेरे सूजे हुए पैरों को देखकर लाड़ से कहा, "बड़ी भाभी, अब आराम करो, छोटी भाभी आ गई है, अब तुम्हारा काम हल्का हो जाएगा। जैसे तुमने दस साल पहले मेरा किया था, याद है?" उसने हंसते हुए निकिता की ओर देखा और कहा, "इस आफत की पुड़िया को तुम्हारे पास छोड़कर ही तो मैं ससुराल जा पाई थी।"


मैं भी हंस पड़ी। वो दिन याद आ गए जब निकिता बिना खटखटाए कमरे में आ जाती थी, और हम दोनों के बीच सो जाती थी। कभी-कभी तो वह फरमाइशों का पूरा पुलिंदा लेकर बैठ जाती थी। अब उसने मज़ाक में कहा था, "भाभी, अब छोटी भाभी मेरी दोस्त होगी। आपकी नसीहतों से छुटकारा मिल जाएगा।"


मन में उन पुरानी यादों में डूबी ही थी कि दरवाजे पर फिर से जोर से आवाज़ हुई। अनमने से स्वर में मैंने कहा, "दरवाजा खुला है, आ जाओ।"


दरवाजा खुलते ही निकिता रोती हुई अंदर आई और उसके पीछे श्वेता की कड़क आवाज़ गूंज रही थी, "इतनी बड़ी हो गई हो, लेकिन मैनर्स सब भूल चुकी हो क्या? बिना दरवाजा खटखटाए अंदर आ जाती हो, और फरमाइशें करती हो। शरबत बना दो, ये बना दो, वो बना दो। खाना खाते वक्त पेट नहीं भरा था क्या?"


मैं हक्का-बक्का रह गई। निकिता की आंखों में आँसू थे और वह मेरे गले लग गई। मैंने उसे चुप कराया, पीठ पर हाथ फेरा और उससे पूछा कि क्या हुआ। उसने सुबकते हुए बताया कि कैसे श्वेता ने पहले दिन से ही उसे उपेक्षित महसूस कराया था। उसने बताया कि पिछली शाम जब वह तैयार होकर चाट खाने के लिए जाने वाली थी, तो श्वेता और देवर उसे बिना बताए चले गए थे। और आज, जब वह छोटे भैया के पीछे-पीछे कमरे में गई, तो श्वेता ने उसे झिड़क कर बाहर निकाल दिया।


निकिता की बातों से मेरा दिल बैठ गया। वह रोते हुए कह रही थी, "भाभी, आपकी भी तो नई शादी थी, लेकिन आपने कभी मुझे अलग महसूस नहीं कराया। मैं आज भी आपकी लाडली हूँ, तो फिर अब ऐसा क्यों हो रहा है?"


मैं और नेहल उसे समझाने की कोशिश कर रहे थे, तभी निकिता ने अचानक कहा, "भाभी, आप तो मेरी कोहिनूर हो, लेकिन एक बात कहूं? छोटी भाभी आपसे आगे निकल गईं। जो बात आप दस साल में नहीं सिखा पाईं, वो श्वेता भाभी ने तीन दिन में सिखा दी। कि ससुराल में क्या-क्या नहीं करना चाहिए।"


उसकी ये बात सुनकर मेरे मन में खामोशी छा गई, लेकिन सच्चाई का एहसास भी गहरा था।

यदि आपको कोई देखे तो कुत्ता कैसे देख रहा है और न देखे तो कुत्ता देखता भी नहीं है

 🤷‍♀️मैंने एक पोस्ट कि थी तो उस पर🤷‍♀️

 एक सज्जन ने बहुत ही अच्छा कमेंट किये है 

हमें उनकी कमेंट bahut👙अच्छी लगी 

आप भी पढ़ कर बताये 

🤷‍♀️आपको कैसी लगी🤷‍♀️


 🌹आपने मात्र एक पक्ष ही रखा है, कभी दूसरा पक्ष भी रखकर देखिए सोचिए और लिखिए 

हमारी संस्कृति में स्त्री चार स्वरूप में स्वीकृत की गई है जिसमें प्रथम स्वरूप माँ है दूसरा स्वरूप बहिन है, तीसरा स्वरूप पुत्री है और चौथा स्वरूप है सहधर्मिणी जिसे धर्मपत्नी भी कहा जाता है। 

यह प्राकृतिक स्वरूप है कि एक उम्र आने पर मनुष्यों में विपरीत लिंगी को देखकर कामोत्तेजक परिवर्तन होते हैं यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। जहां स्त्री अपनी कामोत्तेजना को नियंत्रित करने में स्वाभाविक रूप से सक्षम है वहीं कामोत्तेजना को नियंत्रित करने में पुरुष की सक्षमता स्त्रियों की तुलना में कम है।

हम जिस देश में रहते हैं उस देश में गाँव मुहल्ले के परिवार की बेटी सारे गांव मुहल्ले की बहिन बेटी तो होती है माँ, भाभी चाची मामी बुआ भी होती है लेकिन गांव के किसी एक व्यक्ति की पत्नी सारे गांव की पत्नी नहीं होती।

आज के समय में यदि पड़ौसी की बहिन बेटियों के प्रति यह सम्मान कम हुआ है तो इसके लिए आप मात्र पुरुषों को दोषी नहीं ठहरा सकते। फिल्मों में होते प्यार, वैवाहिक जीवन के अंतरंग दृश्य प्रेम प्रसंगों के प्रदर्शन में उत्तेजकता से भरे दृश्यों ने पुरुषों की मानसिकता में ठीक वैसा ही परिवर्तन किया है जैसा परिवर्तन स्त्रियों में ड्रेसिंग सेंस को लेकर हुआ है।

फिल्मों में चलती हुई स्त्री के नितम्ब और कमर पर कैमरा केन्द्रित होना, क्लीबेज गले से झांकते स्तन, दौड़ते और चलते हुए मात्र स्तनों पर कैमरे का केन्द्रित होना इन सबने पुरुषों के दृष्टिकोण को बदल दिया। धीरे-धीरे यह कामोत्तेजना को बढाने वाले दृश्यों की ऐसी परिणति हुई है अब हर स्त्री में स्त्री ही दिखती है बहिन बेटी माता आदि नहीं।

आप जड़ पर प्रहार कीजिए अभिनय के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता रोकने का प्रयास कीजिए पुरुषों की मानसिकता स्वयमेव बदल जाएगी। 

यह जो फेमिनिज्म के नाम पर लड़कियां छोटी छोटी चड्डी से छोटी जीन्स और ऐसे टॉप जिनसे स्तन बाहर निकलने को आतुर रहते हैं निश्चित ही पुरुषों की कामोत्तेजना को बढ़ाते हैं, कोढ़ में खाज तब होती है जब मोबाईल अश्लीलतम कंटेंट भरे पड़े हैं, ऐसे में सक्षम पुरुष अपनी पत्नी के साथ अपनी उत्तेजना शांत कर लेता है, पत्नी नहीं है तो देहजीवाओं के पास चला जाता है लेकिन जिनके पास दोनों ही नहीं हैं वह लोग अपनी उत्तेजना को शांत करने के लिए अन्य साधनों का प्रयोग करते हैं जिसमें अंतिम साधन रेप होता है, ध्यान रहे हम यहां रेप का समर्थन नहीं कर रहे और न ही स्त्रियों की स्वतंत्रता का हम तो अश्लील फिल्म, अश्लील वीडियो, अश्लील साहित्य, सहजता से उपलब्ध नशा और अश्लील पहनावे के साथ साथ अश्लील भरी चाल, कामोत्तेजना को बढ़ाते मेकप आदि के दुष्प्रभाव को बता रहे हैं।


आप विचार करना कि टॉप से झांकते स्तन, जींस में से बाहर निकलने को आतुर नितम्ब चटख लिपस्टिक स्लीवलेस टॉप या ब्लाऊज़ या इस तरह के अन्य वस्त्र पहिनकर बाहर निकलने की आवश्यकता क्या है ❓ क्यों दिखाना चाहते हैं कि आप के स्तन या नितम्ब कैसे हैं ❓ जब लोग देखते हैं तो धारणा भी बनाते हैं और आपको धारणा बनाने पर आपत्ति है मतलब चित भी मेरी पट भी मेरी और अंटा भी मेरा वाह जी मुस्कान जी वाह सही जा रहे हैं 

यदि आपको कोई देखे तो कुत्ता कैसे देख रहा है और न देखे तो कुत्ता देखता भी नहीं है 

करें तो क्या करें

Wednesday, 18 September 2024

महाभारत का सार मात्र नौ पंक्तियों में।

 महाभारत का सार मात्र नौ पंक्तियों में।


1. अगर आप अपने बच्चों की अनुचित मांगों और इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखते हैं, तो आप जीवन में असहाय हो जाएंगे जैसे *"गांधारी"*।

2. आप चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अगर आप अधर्म का साथ देंगे, तो आपकी ताकत, हथियार, कौशल और आशीर्वाद सब बेकार हो जाएंगे जैसे *"कर्ण"*।

3. अपने बच्चों को इतना महत्वाकांक्षी न बनाएं कि, वे अपने ज्ञान का दुरुपयोग करें और कुल विनाश का कारण बनें जैसे *"अश्वत्थामा"*।

4. कभी भी ऐसे वादे न करें कि आपको अधर्मियों के सामने आत्मसमर्पण करना पड़े जैसे *"भीष्म पितामह"*।

5. धन, शक्ति, अधिकार का दुरुपयोग और गलत काम करने वालों का समर्थन अंततः पूर्ण विनाश की ओर ले जाता है जैसे *"दुर्योधन"*।

6. सत्ता की बागडोर कभी भी किसी अंधे व्यक्ति को न सौंपें, अर्थात जो स्वार्थ, धन, अभिमान, ज्ञान, आसक्ति या वासना से अंधा हो, क्योंकि यह विनाश की ओर ले जाएगा *"धृतराष्ट्र"*।

7. यदि ज्ञान के साथ बुद्धि भी हो, तो आप निश्चित रूप से विजयी होंगे जैसे *"अर्जुन"*।

8. छल आपको हर समय सभी मामलों में सफलता नहीं दिलाएगा जैसे *"शकुनि"*।

9. यदि आप नैतिकता, धर्म और कर्तव्य को सफलतापूर्वक बनाए रखते हैं, तो दुनिया की कोई भी शक्ति आपको नुकसान नहीं पहुँचा सकती... "युधिष्ठिर"*।

Tuesday, 17 September 2024

इंसान की असली पहचान*

 *इंसान की असली पहचान*

        *मनुष्य की असली पहचान उसकी कद काठी और अच्छे पहनावे से नहीं, बल्कि उसके अपने व्यवहार से होती है और उसमें भी मधुर वाणी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वेश भूषा, कद काठी और अच्छा पहनावा तो एक बाहरी पहचान है जो मस्तिष्क में अंकित हो जाती है। वहीं मधुर वाणी और व्यवहार से बनी पहचान अमिट हो जाती है क्योंकि यह ह्रदय और मन में अंकित होती है।*

        *व्यक्ति का आकार, रंग रूप, समय यह सब परिस्थितियों के साथ बदल जाता है । उसे पहचानना मुश्किल हो जाता है, लेकिन मधुर वाणी और व्यवहार से बनने वाली पहचान व्यक्ति की असली पहचान के रूप में मन में स्थिर होती है और इससे दूसरों को भी प्रेरणा मिलती है । इसलिए अच्छे कपड़े और चेहरे की तरह अपनी पहचान में सुधारकर संवारना ही हितकारी है।* 

    

शरीर फिट हो तो सेक्स का मजा दोगुना हो जाता है। और मुरझाए हुए फलों को कौन खाना चाहेगा?"

 शरीर फिट होता है तो सेक्स का आनंद दोगुना हो जाता है। नहीं तो मुरझाया हुआ फल कौन खाना चाहेगा?" ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे। मैं इन्दौर में अपनी नई नौकरी पर था, और एक बड़े शहर में पहली बार इतने फिट लोगों को देखकर खुद को काफी कमजोर महसूस कर रहा था। मेरा नाम सुनिल राठौड़ है, और मैं मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर, बुरहानपुर, से आता हूँ। वहाँ का माहौल थोड़ा पुराना और पारंपरिक था। घर में मुझे कभी किसी अजनबी लड़की से बात करने की भी इजाजत नहीं थी, बहनें ही मेरी दुनिया थीं।

इन्दौर आकर जब मैंने देखा कि यहाँ सब लोग अपने शरीर का कितना ख्याल रखते हैं, तो मेरी तोंद और गले की बढ़ी हुई चर्बी मुझे खलने लगी। काम की वजह से कंप्यूटर के सामने दिनभर बैठने से मेरे शरीर का आकार बिगड़ चुका था। तभी मेरे दोस्त ऋतिक ने मुझसे कहा, "भाई, जिम जॉइन कर लो। फिटनेस बहुत जरूरी है।"

मैंने सोचा, "ठीक है, जिम तो जाना चाहिए," और पास के एक जिम में गया। वहां के सीन देखकर मेरी आंखें खुली की खुली रह गईं। मेरे छोटे शहर में ₹300 में महीना जिम मिल जाता था, और यहां ₹20,000 तीन महीने का एडवांस देना था। अगर ट्रेनर चाहिए तो ₹10,000 और। मुझे तो पता ही नहीं था कि ट्रेनर क्या होता है! मैंने बिना ट्रेनर के जिम में एडमिशन ले लिया।

परंतु एक महीने की कड़ी मेहनत के बाद भी पेट जस का तस रहा। दोस्त ऋतिक ने कहा, "भाई, एक ट्रेनर ले लो, शायद फायदा हो।" फिर मैंने जिम मैनेजर से बात की और उन्होंने एक ट्रेनर का इंतजाम किया।

ट्रेनर के रूप में एक दमदार और हट्टी-कट्टी लड़की सामने आई। उसका शरीर देख कर लगा कि हर अंग जैसे तराशा हुआ हो। मैंने पहली बार देखा कि कोई इतनी फिट हो सकती है। उसकी सख्त निगाहें और मजबूत शरीर देखकर मेरी बोलती बंद हो गई। मैंने मैनेजर से कहा, "भाई, इसे हटाकर कोई पुरुष ट्रेनर दे दो," लेकिन उन्होंने कहा कि अभी सिर्फ वही खाली है।

मैं मन मसोस कर रह गया, और अगले दिन से उस ट्रेनर के साथ कसरत शुरू कर दी। एक हफ्ते बाद ही, उसने अपनी टी-शर्ट उतार कर सिर्फ स्पोर्ट्स ब्रा पहन ली और मेरे सामने एक्सरसाइज करवाने लगी। मैंने अपनी ओर से तो कसरत पर ध्यान देने की कोशिश की, पर उसकी बॉडी देखकर मेरे मन में हलचल मचने लगी। इस पर उसने हंसते हुए मजाक में कहा, "अपने मन को काबू में रखो।"

मैं शर्मिंदा हो गया। लेकिन उसकी बातें और उसके छोटे होते कपड़े मुझे और असहज करने लगे। कभी उसके अंग मुझसे छू जाते, कभी वह मेरे बहुत करीब आकर बैठती। एक दिन उसने कहा, "शाम को क्या कर रहे हो? साथ में खाना खाते हैं।"

मैं थोड़ा हैरान था, फिर सोचा कि दोस्ती ही सही, और हामी भर दी। हम एक रेस्तरां में गए, और वहां 3000 रुपये का बिल आया। खाने के दौरान वह हंसते हुए बोली, "तुम्हारे जज़्बात तुम्हारी पैंट में दिखते हैं, सुनिल।" उसकी बातों से मैं असहज महसूस कर रहा था, लेकिन मैं चुप रहा। फिर उसने पूछा, "घर में कौन-कौन है?"

मैंने बताया कि मैं अकेला रहता हूँ। उसने तुरंत कहा, "चलो तुम्हारा घर देखते हैं।" मुझे कुछ अजीब लगा, पर मैंने हाँ कह दी। हम घर पहुँचे, और उसने दरवाजा बंद करते ही अपने कपड़े उतार दिए। वह सिर्फ ब्रा में मेरे सामने खड़ी थी। मैं पूरी तरह से स्तब्ध था।

"शर्मा क्यों रहे हो? तुमने मुझे जिम में देखा ही है न," उसने कहा। मैं बिना कुछ बोले अंदर चला गया और पानी का गिलास लेने लगा। जब मैं वापस आया, तो उसने मेरे पैंट पर हाथ रखते हुए कहा, "यहाँ मन को काबू में रखने की कोई जरूरत नहीं है। सिर्फ 5000 रुपये दो, और मैं तुम्हारे जज़्बातों को हल्का कर दूंगी।"

मैं पूरी तरह से असहज हो गया। मैंने उससे कहा, "आप जिम में काम करती हैं, फिर ये क्यों?"


हंसते हुए उसने कहा, "शरीर फिट हो तो सेक्स का मजा दोगुना हो जाता है। और मुरझाए हुए फलों को कौन खाना चाहेगा?"

उसकी बात सुनकर मैंने गंभीरता से कहा, "मुझे कोई सूखा या गीला आम नहीं चाहिए। आप जा सकती हैं।"

वह थोड़ा चिढ़ी, लेकिन चली गई। अगले दिन जब मैं जिम गया, तो उसने ऐसे व्यवहार किया जैसे कुछ हुआ ही नहीं। मैंने यह सब अपने दोस्त निखिल को बताया, तो उसने कहा, "भाई, मजा लेना चाहिए था! यहाँ फिटनेस ट्रेनर्स बस नाम के होते हैं। असली कमाई तो इस 'साइड बिजनेस' से होती है। जिम मालिक भी इसका हिस्सा लेते हैं।"


तब मुझे समझ में आया कि जिम का असली धंधा क्या था। यह सिर्फ एक्सरसाइज का अड्डा नहीं, बल्कि एक तरह से 'बाजार' था। लड़कियां ही नहीं, लड़के भी ऐसी 'सर्विस' देते हैं।


मैंने तब फैसला किया कि मुझे अपने शरीर को फिट रखना है, लेकिन इस गंदगी से दूर रहकर।


रिश्ते टूटते नहीं। बस रिश्ते दिल से होना चाहिए

 कोर्ट में पेपर पर आखिरी साइन होते ही वकील मुस्कुराया और बोला, “लो मैडम, अब आपका डिवोर्स हो गया है। कोर्ट ने आपको 10 लाख रुपये हर्जाने के तौ...