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Thursday, 12 September 2024

विज्ञान के अनुसार प्यार में पड़ने के पीछे कई वजह होती हैं। यह दिल से नहीं बल्कि दिमाग़ से जुड़ा हुआ होता है

 विज्ञान के अनुसार प्यार में पड़ने के पीछे कई वजह होती हैं। यह दिल से नहीं बल्कि दिमाग़ से जुड़ा हुआ होता है।

कहते हैं जब आपका दिल किसी के लिए धड़कने लगे तो इसका मतलब होता है कि आपको उस शख़्स से प्यार हो गया है। हालांकि किसी से प्यार होने के पीछे कई साइंटिफ़िक वजह होती हैं। ये एहसास हमारे दिल से नहीं आते हैं, जैसे कि बॉलीवुड गानों में बताया जाता है। यह सबकुछ हमारे दिमाग़ से जुड़ा होता है। हमारा शरीर उसी के अनुसार रिएक्ट करता है। विज्ञान के अनुसार किसी के प्यार में पड़ने के पीछे कई वजह होती हैं। जिसकी वजह से हमारे हार्मोन्स मज़बूत हो जाते हैं और किसी व्यक्ति के प्रति उसका झुकाव बढ़ जाता है। आइए जानते हैं इसके पीछे अन्य वजहों के बारे में...

नेचर ने यह सुनिश्चित करने के लिए ख़्याल रखा है कि हम अपने हार्मोनल रिस्पांस को इस तरह मैनेज करते हुए कहीं विलुप्त ना जाएं। यह हमें एक प्रजाति के रूप में जीवित रहने की अनुमति देता है। प्यार में पड़ने के तीन स्टेज होती हैं, जिसमें लस्ट, अट्रैक्शन, और अटैचमेंट शामिल है। सभी तीन स्टेज अलग-अलग हार्मोनल रिस्पांस से जुड़ी हुई हैं। आइए जानते हैं...आकर्षण होता है जिसे हम उस व्यक्ति की ओर महसूस करते हैं, जिससे हम आकर्षण पाते हैं। एस्ट्रोजेन और टेस्टोस्टेरोन इस भावना के लिए ज़िम्मेदार मुख्य हार्मोन हैं। norepinephrine - Norepinephrine, या PEA, प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला एम्फैटेमिन है जो आनंद के अनुभव को बढ़ाता है और भूख को कम करता है। यह आमतौर से इस चरण में जारी किया जाता और आकर्षण चरण में जारी रहता है।यहीं से फ़न शुरू होता है, यह स्टेज फ़र्स्ट बायोलॉजिकल रिस्पांस के बाद शुरू होती है और यह कई हार्मोनल रिस्पांस को ट्रिगर करती है। इसी कड़ी में रिवॉर्ड सिस्टम होता है जो प्रेम अनिवार्य रूप से हमारे दिमाग़ की रिवॉर्ड सिस्टम में एक फ़ीडबैक लूप को ट्रिगर करता है, जिससे हम और अधिक चाहते हैं। यह इस स्टेज के दौरान ज़्यादातर किक करता है। वहीं एड्रेनालाईन जो पहली भीड़ से आती है। किसी व्यक्ति के साथ प्यार में पड़ना वास्तव में आपके शरीर में स्ट्रेस रिस्पांस का कारण होगा। ऐसे में हो सकता है कि एड्रेनालाईन में यह संभावना है कि आपने इन लक्षणों का अनुभव किया हो। रेसिंग हार्टबीट, मुंह का सूखना, पसीना आना, यह सभी रिएक्शन एंड्रानालाईन को ट्रिगर करता है। वहीं प्यार में होने के नाते हमारे शरीर को न्यूरोट्रांसमीटर डोपामाइन का उत्पादन करने के लिए प्रेरित करता है। इसे हैप्पी हार्मोन के रूप में भी जाना जाता है। दिल में खुशी की भावना के लिए डोपामाइन ज़िम्मेदार होता है। इससे एनर्जी, और फ़ोकस बढ़ता है और भूख कम लगती है।

अटैचमेंट में ऑक्सीटोसिन हार्मोन का उत्पादन होता है। ऑर्गेज्म के दौरान ऑक्सीटोसिन के स्तर में स्पाइक होता है, यह मनुष्यों के रूप में बंधन बनाता है। यह जन्म के तुरंत बाद मां और बच्चे के रिश्ते में भी महत्वपू्र्ण है। यह अनिवार्य रूप से स्तन को दूध छोड़ने के लिए संकेत देता है जब बच्चे को इसकी आवश्यकता होती है। इसके अलावा इसमें वासोप्रेसिन नामक हार्मोन का भी उत्पादन होता है जो ज़्यादातर एंटी मूत्रवर्धक के रूप में जाना जाता है। यह किडनी में काम करता है और प्यास को नियंत्रित करता है। यह हार्मोन सेक्स के तुरंत बाद रिलीज़ हो जाता है। यही नहीं ये सेक्स और पार्टनर पसंद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अलावा यह हेल्दी होता है और लंबे वक़्त तक रिलेशनशिप को बनाए रखने का काम करता है।जब पार्टनर के साथ ब्रेकअप होता है तो इसके लक्षण दिखाई देते हैं। इसमें डोपामाइन हार्मोन दिमाग़ के अधिकांश रिवॉर्ड सिस्टम को नियंत्रित करता है, इसलिए यह स्वाभाविक है कि डोपामाइन रिलीज़ में एक दुर्घटना है जो ब्रेकअप के बाद हमें एहसास दिलाती है कि हमारा दिल टूट गया है। वहीं जब कॉकटेल ग़लत हो जाता है।असंतुलित हार्मोनल स्तर ईश्यू की एक सीरीज को जन्म दे सकता है। क्योंकि यह हमारे दिमाग़ के रिवॉर्ड सिस्टम में शामिल होता है।

: सुनिल राठौड़ 

पत्नी के धोखे से पति की नई सुरवात

 मेरी पत्नी, राधिका, जो कभी हमेशा मेरे साथ बाहर घूमने और समय बिताने में दिलचस्पी रखती थी, अब घर पर अधिक से अधिक समय बिताने लगी। ज़्यादातर वक्त वह टीवी देखती रहती थी, और बाहरी दुनिया से कट गई थी।


एक वक्त ऐसा आया जब उसने एकदम से अपने हाव-भाव बदल लिए। वह अचानक से हफ्ते में 2-3 बार अपने सबसे अच्छे कपड़े पहन कर बाहर जाने लगी। शुरुआत में मुझे लगा कि यह अच्छी बात है। शायद राधिका अपनी पुरानी जिंदगी में लौट रही थी। मैं खुश था कि वह अब खुद का ख्याल रख रही थी और अपने जीवन का आनंद ले रही थी। आखिरकार, शादी के बाद और माँ बनने के बाद, हर महिला को अपनी स्वतंत्रता भी तो चाहिए।


लेकिन कुछ समय बाद, मेरे दोस्तों ने मुझे बताया कि उन्होंने राधिका को किसी दूसरे आदमी के साथ सुपरमार्केट और शहर के विभिन्न जगहों पर देखा है। वे हंसते हुए मुझे यह किस्सा सुना रहे थे, मानो यह एक मजाक हो, लेकिन मेरे दिल में एक अजीब सी बेचैनी हो गई। मुझे अब तक उस पर पूरा विश्वास था। वह मेरी बेटी की मां थी, मेरी जीवनसंगिनी। मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि वह मुझे धोखा दे सकती है।


एक दिन, मेरी बेटी ने मासूमियत में मुझसे कहा, "पापा, मम्मी रोज़ एक अंकल के साथ घूमने जाती हैं। वह बहुत अच्छे लगते हैं।" उसकी बात सुनकर मेरे दिल में संदेह और गहरा हो गया। अब मैं चीज़ों को नजरअंदाज नहीं कर सकता था।


कुछ दिन बाद, मैंने देखा कि राधिका ने अचानक अपना फोन मुझसे छुपाना शुरू कर दिया। पहले तो हम एक-दूसरे के फोन का इस्तेमाल कर लेते थे, लेकिन अब वह अपने फोन को कभी भी खुला नहीं छोड़ती थी। यहां तक कि उसने अपने लैपटॉप पर भी पासवर्ड डाल दिया था। मुझे समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हो रहा है, लेकिन मेरा संदेह बढ़ता जा रहा था।


मैं पेशे से आईटी में हूँ, इसलिए मुझे टेक्नोलॉजी की अच्छी समझ थी। मैंने एक दिन चुपचाप राधिका के लैपटॉप पर एक की-लॉगर (Key-logger) लगा दिया। अब मैं उसके सभी संदेश देख सकता था, जो वह किसी के साथ शेयर कर रही थी। मुझे आशंका थी, लेकिन उस दिन जब मैंने उसके और उस आदमी के बीच हुए मैसेज पढ़े, तो मेरी दुनिया ही हिल गई। उन मैसेजों में अश्लील बातें थीं, उनकी भावनाओं की परछाइयाँ थीं, और मेरे दिल पर एक गहरा घाव था।


मैंने तुरंत राधिका से कुछ नहीं कहा। मैंने सोचा, "उसे रंगे हाथों पकड़ूंगा।" कुछ दिनों तक मैं सामान्य तरीके से चलता रहा, लेकिन मन में एक भारी बोझ था।


एक दिन, मैंने ऑफिस का काम जल्दी निपटाया और अचानक घर वापस आ गया। दरवाजा अंदर से बंद था। मैंने बिना किसी आहट के रसोई की खिड़की से अंदर झांका। वहां, मैंने राधिका को उस आदमी के साथ नग्न अवस्था में देखा। मेरी आंखों के सामने सब कुछ धुंधला हो गया। मेरा दिल टूट चुका था। वह दृश्य मेरे मन में एक घाव की तरह अंकित हो गया।


उस दिन मैंने बिना कुछ कहे घर छोड़ दिया। मैं टूट चुका था, बिखर चुका था। अपने दर्द और अवसाद से निपटने के लिए मैंने शराब का सहारा लिया। मैं लगभग एक साल तक हर रात शराब पीता रहा। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैंने अपनी दुनिया खो दी थी, वह औरत जिससे मैं प्यार करता था, उसने मेरे विश्वास को तोड़ा था।


लेकिन एक दिन, मुझे अहसास हुआ कि यह सब करके मैं सिर्फ खुद को ही नुकसान पहुँचा रहा हूँ। राधिका अब मेरी जिंदगी का हिस्सा नहीं थी, और मुझे उसके धोखे से उबरना था। मैंने धीरे-धीरे अपने जीवन को दोबारा संवारने का फैसला किया। मैंने शराब छोड़ दी और खुद को बेहतर बनाने पर ध्यान देना शुरू किया।


और फिर, एक दिन, मेरी मुलाकात सीमा से हुई। वह अद्भुत थी—सहनशील, समझदार और प्यार से भरी हुई। पिछले दो सालों से वह मेरे जीवन की रोशनी है। उसकी वजह से मैंने अपने अंदर की कड़वाहट को खत्म करना सीखा।


आज, मैं सबसे खुश इंसान हूँ। राधिका के धोखे के बाद, मुझे विश्वास नहीं था कि मैं फिर से किसी से प्यार कर पाऊंगा, लेकिन सीमा ने मुझे न केवल प्यार करना सिखाया, बल्कि मुझमें खोया हुआ विश्वास भी लौटाया।


अब, आठ साल बाद, मैं राधिका के प्रति नफरत तो महसूस करता हूँ, लेकिन साथ ही उसका शुक्रगुजार भी हूँ। अगर उसने मुझे धोखा नहीं दिया होता, तो शायद मैं सीमा से कभी नहीं मिलता। यह जीवन का एक अजीब मोड़ है—कभी-कभी बुरे अनुभव आपको वहां ले जाते हैं जहां आप सच्ची खुशी और सुकून पा सकते हैं।

विनीत नाम था उसका.

 "विनीत नाम था उसका...।" मेरे ऑफिस में वह एक थर्ड ग्रेड कर्मचारी था। मेरा हाल ही में यहाँ अफसर के पद पर तबादला हुआ था, और मैंने चार दिन पहले ही जॉइनिंग की थी। विनीत बेहद मेहनती और समझदार था। वो मुझे "दीदी" ही कहता था, लेकिन एक दिन मेरे जूनियर, सुशांत, ने उसे डांटते हुए कहा, "वो मैडम हैं, उन्हें दीदी नहीं, सपना मैडम कहा करो!" तब से वह मुझे मैडम बुलाने लगा, लेकिन न जाने क्यों, मुझे उसका "दीदी" कहना ज्यादा अच्छा लगता था।


आज वह बेहद खुश था, तो मैंने पूछ लिया, "विनीत, आज बहुत खुश दिख रहे हो, क्या बात है?"

विनीत हंसते हुए बोला, "मैम, कल राखी है ना, इसलिए घर जा रहा हूँ।"

मैंने कहा, "अच्छा, तुम्हारी बहनें हैं?"

उसने ज़ोर से हंसते हुए कहा, "हां, मैम, पांच बहनें हैं। तीन बड़ी शादीशुदा हैं, और दो छोटी।"

मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, "तोहफे ले लिए उनके लिए?"

वह बोला, "आज खरीदूंगा, मैम। ज्यादा महंगे तो नहीं ले सकता, पर जो भी हो, अपनी मेहनत से खरीदूंगा।" कहकर वह जल्दी-जल्दी अपने काम में लग गया।


उसकी मुस्कान और प्यार देखकर मेरे दिल में एक अलग सी भावना उमड़ आई। सच कहूं, तो आज पहली बार मुझे अपने भाई की बहुत याद आई। मैं अपने मम्मी-पापा की इकलौती बेटी हूँ और हर राखी पर यही खालीपन महसूस करती थी। अचानक मेरे मन में एक विचार आया। मैंने विनीत की फाइल उठाई और उसके घर का पता नोट किया, फिर तुरंत ऑफिस से निकलकर शॉपिंग करने चली गई। मेरे दिल में एक नई उमंग थी।


शॉपिंग करके जब घर पहुँची, तो मम्मी ने हैरानी से पूछा, "अरे सपना, आज ये सब क्या खरीद लाई?"

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "राखी की तैयारी कर रही हूँ, मम्मी!"

मम्मी हैरानी से मेरी ओर देखती रह गईं, क्योंकि जो बेटी हर राखी पर उदास रहती थी, वह आज इतनी उत्साहित कैसे हो गई! फिर मैंने मम्मी को अपनी योजना बताई और पापा से भी इसे लेकर बात की। दोनों ने मेरे इस निर्णय को सराहा।


अगले दिन, राखी की सुबह, मैं बहुत जल्दी उठकर तैयार हो गई। मेरे साथ मम्मी-पापा भी तैयार हो गए और हम तीनों विनीत के घर की ओर निकल पड़े। जैसे ही हम उसके घर पहुंचे, तो दरवाजा आधा खुला हुआ था। अंदर से हंसी-मजाक की आवाजें आ रही थीं। बहनों के बीच बहस चल रही थी कि पहले कौन राखी बाँधेगा। माहौल बेहद खुशनुमा और प्यार भरा था।


विनीत ने जैसे ही मुझे दरवाजे पर देखा, वह चौंक गया। "अरे मैम, आप यहाँ कैसे?"

मैंने मुस्कुराते हुए अपनी राखी निकाली और बोली, "अगर आप सबको मंजूर हो, तो मैं आज पहले राखी बांधना चाहती हूँ। क्या तुम मेरे भाई बनोगे, विनीत?"

मेरी आँखों में आँसू आ गए, और विनीत भावुक हो गया। उसने धीरे से कहा, "मैम, मैं आपको क्या दे सकता हूँ?"

वह धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। मैंने उसके कलाई पर राखी बांधी और फिर उसके लिए लाए गए उपहारों में से एक घड़ी निकालकर उसे पहनाई। मैंने उससे कहा, "ये घड़ी महज़ तोहफा नहीं है, ये विश्वास और प्रेम का प्रतीक है, जो मुझे तुममें महसूस हुआ। अब से तुम मुझे 'मैम' नहीं, दीदी ही बुलाना, जैसे पहली बार कहा था।"


विनीत की आँखों में कृतज्ञता और सम्मान था। उसकी बहनों ने भी मुझे बड़े प्यार से राखी बाँधने के लिए धन्यवाद दिया।

विनीत के लिए यह पल भी अविस्मरणीय था, और मेरे लिए भी। मैंने उसके घर में जो अपनापन महसूस किया, वह किसी बड़े गिफ्ट से बढ़कर था।


यह कहानी हमें सिखाती है कि हम अपने सहकर्मियों को केवल उनके पद से नहीं, बल्कि उनके दिल से भी जानें। किसी का छोटा या बड़ा होना उसकी काबिलियत या सम्मान को कम नहीं करता। मानवता और भाईचारे की भावना ही असली रिश्तों की नींव होती है।


आप सभी से निवेदन है कि आप भी अपने सहकर्मियों को सम्मान दें और उनके साथ भाईचारे का रिश्ता बनाए रखें।

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अत्याचार और बदसुलूकी का अंजाम हमेशा बुरा होता है

 संध्या रोज की तरह अपने सारे काम निपटा कर नहाने गई थी कि अचानक सास की कर्कश आवाज़ कानों में पड़ी, **"अरे बहू... ओ बहू, कहां मर गई? सुनती नहीं हो क्या?"** 😡 रसोई के सारे काम खत्म करने के बाद अब नहाने का समय मिला था, लेकिन उसे इस कर्कश आवाज़ की आदत हो चुकी थी। दिन में माया देवी की एक न एक शिकायत उसके कानों में गूंजती रहती थी। 


संध्या ने जैसे-तैसे अपने ऊपर पानी डाला, जल्दी से कपड़े पहने और दौड़ते हुए सास के कमरे में पहुँची। माया देवी गुस्से में चिल्ला रही थीं, **"अरे, तुझसे एक काम भी ठीक से नहीं होता! ये पानी कहां से आ गया? अगर मैं गिर जाती तो मेरी हड्डियां टूट जातीं!"** 😠 संध्या डरते हुए बोली, **"मां जी, मैंने पोछा तो लगाया था।"** पर माया देवी फिर से चिल्लाईं, **"तुझसे कुछ ठीक से नहीं होता! किस्मत ही खराब है जो तेरे जैसे को मेरे बेटे ने पसंद किया।"**


संध्या समझ गई थी कि माया देवी जानबूझकर उसे तंग कर रही थीं। उसने चुपचाप फर्श का पानी साफ किया और वापस अपने कमरे में जाकर बैठ गई। यह रोज़ का सिलसिला बन चुका था। 🥲 सुरेश के ऑफिस जाते ही माया देवी संध्या को परेशान करने के नए तरीके ढूंढती थीं। पहले तो संध्या सहन कर रही थी, लेकिन अब यह सब बर्दाश्त से बाहर हो रहा था। 


शाम को जब सुरेश घर आता, संध्या कई बातें करने की सोचती, पर सुरेश अक्सर थका होता और माँ की शिकायतों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता था। माया देवी भी बेटे के सामने एकदम अलग रूप धारण कर लेतीं—बहुत ही प्यारी सास बन जातीं। लेकिन सुरेश के जाते ही उनका असली चेहरा सामने आ जाता। 🤔


माया देवी की सबसे बड़ी नाराजगी थी कि शादी में उन्हें दहेज पर्याप्त नहीं मिला। उन्होंने घर की नौकरानी भी हटा दी थी, और अब सारा काम संध्या के जिम्मे आ गया था। 😔


एक दिन, जब संध्या झाड़ू लगा रही थी, माया देवी बिस्तर पर बैठी स्वेटर बुन रही थीं। अचानक उन्होंने बिना देखे जोर से पैर मारा, जिससे संध्या का सिर दीवार से टकरा गया। 😣 संध्या दर्द से कराह उठी, लेकिन फिर भी चुप रही। तभी माया देवी ने फिर से उसे लात मारी, और इस बार संध्या बेहोश हो गई। 


माया देवी फिर से चिल्लाईं, **"अरे मर गई क्या? उठ, अभी काम पड़ा है!"** 😡 लेकिन जब संध्या नहीं उठी, तो माया देवी के होश उड़ गए। उन्होंने तुरंत सुरेश को फोन किया। सुरेश उसे अस्पताल ले गया, लेकिन डॉक्टरों की कोशिशों के बावजूद, संध्या की जान नहीं बच पाई। 💔


धीरे-धीरे, पड़ोसियों को माया देवी के बुरे बर्ताव की सच्चाई पता चलने लगी। सुरेश भी समझ गया था कि उसकी माँ ने उसकी पत्नी के साथ जो किया, वह गलत था। 😞 सुरेश ने ज्यादा दिन इस बोझ के साथ नहीं जी पाए और एक दिन उसने खुद को पंखे से लटकाकर अपनी जिंदगी खत्म कर ली। 💔


अब माया देवी के घर में बस सन्नाटा था। वह दिनभर बड़बड़ाती रहतीं, **"अरे बहू, कहां मर गई? मेरे बेटे को भी ले गई। जल्दी आ, घर गंदा पड़ा है!"** 😢 लोगों ने सुना, लेकिन कोई उनकी मदद करने नहीं आया। कुछ दिनों बाद खबर आई कि माया देवी को पागलखाने में भर्ती करा दिया गया, और उनके घर को सस्ते दामों में बेच दिया गया। 🏚️


**सीख:** अत्याचार और बदसुलूकी का अंजाम हमेशा बुरा होता है। रिश्तों में प्यार और समझदारी सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। 💔

संस्कारी बहू तभी मिलेगी,

 एक प्रतिष्ठित वकील साहब ने अपने बेटे का रिश्ता तय किया, और कुछ दिनों बाद समधी जी के घर मिलने गए। घर का दृश्य कुछ ऐसा था कि मां रसोई में काम कर रही थीं, जबकि बच्चे और होने वाली बहू आराम से टीवी देख रहे थे। वकील साहब ने कुशल-क्षेम पूछा, चाय पी, और घर लौट आए। 🏡☕


एक माह बाद फिर से वकील साहब समधी जी के घर गए। इस बार भी देखा कि मां झाड़ू लगा रही थीं, बच्चे पढ़ाई कर रहे थे और होने वाली बहू गहरी नींद में सो रही थी। 😴 फिर भी, वकील साहब कुछ नहीं बोले, खाना खाया और वापस चले गए। 🍽️


तीसरी बार, किसी और काम से जब वकील साहब समधी जी के घर पहुंचे, तो यह दृश्य मिला कि समधन बर्तन साफ कर रही थीं, बच्चे टीवी देख रहे थे, और इस बार होने वाली बहू अपने नाखूनों में नेलपेंट लगा रही थीं। 💅🖥️


वकील साहब ने गहन विचार किया और रिश्ता तोड़ने का निर्णय लिया। कारण पूछने पर उन्होंने कहा, “मैंने तीन बार घर में जाकर देखा, समधन जी हमेशा घर के काम में व्यस्त थीं, लेकिन एक भी बार होने वाली बहू ने हाथ नहीं लगाया। जो बेटी अपनी मां की मदद नहीं करती, वह ससुराल में क्या करेगी?" 🤷‍♀️👩‍🍳


वकील साहब का यह फैसला सिर्फ एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि हर उस माता-पिता के लिए है जो चाहते हैं कि उनकी बेटी एक संस्कारी बहू बने, न कि केवल एक सुंदर गुलदस्ता जो सजाने के लिए हो। 🌹


आजकल के माता-पिता अपनी बेटियों को केवल प्यार से बड़ा करते हैं, लेकिन उन्हें यह भी सिखाना चाहिए कि घर का काम करना, दूसरों की मदद करना और जिम्मेदारियां निभाना कितना ज़रूरी है। 🌼


बेटी से बहू बनाना माता-पिता की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। अगर हम अपनी बेटियों में संस्कार नहीं डालेंगे, तो ससुराल में वही बेटी गालियां सुनकर ज़िंदगी भर दुखी रहेगी। 😔💔


कड़वा सच, लेकिन यह हमें समझने की जरूरत है कि संस्कारी बहू तभी मिलेगी, जब हम अपनी बेटियों को भी अच्छे संस्कार देंगे। 🌸✨


वृद्धाश्रम में माता-पिता को देखकर हम सिर्फ बेटों को दोषी ठहराते हैं, लेकिन अक्सर भूल जाते हैं कि उन्हें वहां भेजने में किसी की बेटी का भी योगदान हो सकता है। बेटे शादी से पहले अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम क्यों नहीं भेजते? क्योंकि बेटी में संस्कार की कमी होती है। 🌍🧑‍🦳


इसलिए, एक सुंदर बहू के साथ एक संस्कारी बहू भी चाहिए। 🙏

Wednesday, 11 September 2024

करूँ—हँसूँ या रोऊँ।

 मेरे पति रोहित और मैं, अपने दो बच्चों करण (6 साल) और दीक्षा (1 साल) के साथ हाल ही में नए घर में शिफ्ट हुए। सब कुछ सेट करने के बाद, मैंने अपनी आदत के अनुसार रात में बादाम भिगो दिए और सोने चली गई। ये बचपन से मेरी आदत रही है, शादी के बाद भी मैं रोहित और बच्चों को भी भीगे बादाम खाने के लिए देती हूँ।


सुबह उठी तो देखा कि कटोरी में बादाम थे ही नहीं! मुझे बड़ा अजीब लगा। मैं सोचने लगी, "मैंने तो रात में भिगोए थे, फिर गए कहाँ?" मैंने रोहित को उठाया और उसे बताया। वो हंसने लगा और बोला, "शायद तुमने भिगोना भूल ही गई होगी।" लेकिन मैंने कहा, "नहीं, मैंने भिगोए थे। देखो, अगर नहीं भिगाए होते तो पानी का रंग कैसे बदलता?" उसने भी मान लिया, "अरे हां, सही कह रही हो। खैर, छोड़ो अब, मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है।"


शाम को मैंने फिर से बादाम भिगोए। रोहित भी उसी समय रसोई में खड़ा था। सब कुछ सामान्य लग रहा था। फिर रात में जब रोहित ने पानी माँगा, मैं पानी लेने गई तो देखा कि बादाम फिर गायब थे! अब तो मेरा दिल दहल गया। मैंने रोहित को बुलाया, "रोहित, जल्दी आओ, फिर से बादाम गायब हो गए!" वो खुद भी हैरान था, पर मुझे ढांढस बंधाने लगा। उसने दूसरी कटोरी में बादाम डालकर कमरे में रख दिए। पूरी रात हम दोनों बार-बार कटोरी देखते रहे, पर बादाम तब तक थे।


अगले दिन मैंने ये बात अपनी पड़ोसन को बताई। उसने जो कहा, उससे मेरी तो जैसे जान ही निकल गई। उसने बताया कि इस घर में जो पहले लोग रहते थे, उनकी पत्नी का तीन महीने में देहांत हो गया था। "हो न हो, ये उसी का साया है जो तुम्हें परेशान कर रहा है," उसने कहा। अब तो रोहित भी डरने लगा था।


मैंने रसोई जाना ही बंद कर दिया, अब मैं सारा खाना अपने कमरे में ही रखती थी। जब तक रोहित शाम को वापस नहीं आता, मैं रसोई में कदम भी नहीं रखती। कुछ दिन ऐसे ही बीते, कभी बादाम होते, कभी गायब हो जाते। हर समय मैं डरी रहती थी।

एक दिन रसोई का बल्ब अचानक फूट गया। मैं जोर से चीख पड़ी, रोहित दौड़ा-दौड़ा आया। उसने मुझे संभाला और स्टूल पर चढ़कर नया बल्ब लगाने लगा। तभी उसकी नजर फ्रीज के ऊपर पड़ी—वहां ढेर सारे बादाम बिखरे हुए थे! "ये क्या! इतने सारे बादाम यहाँ कैसे आए?" उसने मुझे दिखाया। मैं तो जैसे कुछ समझ ही नहीं पा रही थी, पर रोहित अब सतर्क हो गया था।

रात में जब मैंने फिर से बादाम भिगोए, तो हम दोनों ने ध्यान से देखा कि क्या होता है। सब सोने के बाद, हमारा बेटा करण चुपके से रसोई में गया और कटोरी से बादाम निकालकर फ्रीज के ऊपर फेंक दिए! हम उसे पकड़कर हैरान रह गए। रोहित ने उसे प्यार से पूछा, "करण, ये क्या कर रहे हो?" पहले तो वो बहुत डर गया, फिर मासूमियत से बोला, "मुझे बादाम अच्छे नहीं लगते, मम्मी रोज खाने को देती है। मना करने पर भी नहीं मानती, तो मैंने ऐसा किया।"


उस पल मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं क्या करूँ—हँसूँ या रोऊँ।

सीख

 करीब एक महीने पहले की बात है, जब मैं अपने मायके गई थी। चूंकि मुझे वहां ज्यादा समय नहीं रुकना था, मैंने घर पर आरामदायक जूते पहन रखे थे। जब मायके पहुंची, तो मेरी भाभी नेहा की चप्पलें देखकर सोचा कि इन्हें पहनकर और आराम मिलेगा, इसलिए मैंने उनकी चप्पलें पहन लीं।


नेहा की चप्पलें दिखने में साधारण थीं, पर जब मैं वॉशरूम गई, तो अचानक मेरा पैर फिसल गया। गिरते-गिरते बची, और उस पल मुझे एहसास हुआ कि चप्पलों की ग्रिप कितनी जरूरी होती है। मैंने नेहा को तुरंत सलाह दी, "नेहा, ये चप्पलें बदल लो। ऐसी पहनना जिनकी ग्रिप बेहतर हो, वरना फिसलने का खतरा बना रहेगा।"


नेहा ने मेरी बात को मजाक में लेते हुए कहा, "दीदी, मैं तो इन्हीं में सारा काम करती हूँ, बाथरूम में भी। आपको शायद आदत नहीं है।" उसकी बात सुनकर मैंने ज्यादा जोर नहीं दिया, और हम बात वहीं खत्म कर दी।


कुछ दिनों बाद, मैंने नेहा से हालचाल लेने के लिए फोन किया। उसकी आवाज़ में उदासी थी। मैंने पूछा, "सब ठीक तो है?" नेहा ने जवाब दिया, "दीदी, दो दिन पहले बाथरूम में फिसल गई। कमर और पैरों में बहुत दर्द है। डॉक्टर ने दवाइयां दी हैं। शुक्र है कि हड्डी नहीं टूटी।" उसकी बात सुनकर मुझे दुख हुआ और पूछा, "अब तो तुमने चप्पलें बदल लीं?"


नेहा हल्के से हंसते हुए बोली, "हाँ दीदी, आपकी बात सुन लेनी चाहिए थी। अब मैंने नई चप्पलें ली हैं और अपनी बेटियों के लिए भी ले आई हूं।" यह सुनकर मुझे तसल्ली हुई। यह घटना एक बड़ी सीख दे गई कि हम कई बार सलाह को नजरअंदाज कर देते हैं, जब तक कि खुद पर कुछ न गुजर जाए। अगर सही समय पर सही सलाह मान ली जाए, तो हम बहुत सी मुसीबतों से बच सकते हैं।

*सीख:**  

कई बार हम दूसरों की सलाह को हल्के में लेते हैं, लेकिन समझदारी इसी में है कि सही वक्त पर सही सलाह को मानकर अमल में लाया जाए। इससे हम अनचाही परेशानियों से बच सकते हैं।

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...