sunilrathod

Thursday, 12 September 2024

विनीत नाम था उसका.

 "विनीत नाम था उसका...।" मेरे ऑफिस में वह एक थर्ड ग्रेड कर्मचारी था। मेरा हाल ही में यहाँ अफसर के पद पर तबादला हुआ था, और मैंने चार दिन पहले ही जॉइनिंग की थी। विनीत बेहद मेहनती और समझदार था। वो मुझे "दीदी" ही कहता था, लेकिन एक दिन मेरे जूनियर, सुशांत, ने उसे डांटते हुए कहा, "वो मैडम हैं, उन्हें दीदी नहीं, सपना मैडम कहा करो!" तब से वह मुझे मैडम बुलाने लगा, लेकिन न जाने क्यों, मुझे उसका "दीदी" कहना ज्यादा अच्छा लगता था।


आज वह बेहद खुश था, तो मैंने पूछ लिया, "विनीत, आज बहुत खुश दिख रहे हो, क्या बात है?"

विनीत हंसते हुए बोला, "मैम, कल राखी है ना, इसलिए घर जा रहा हूँ।"

मैंने कहा, "अच्छा, तुम्हारी बहनें हैं?"

उसने ज़ोर से हंसते हुए कहा, "हां, मैम, पांच बहनें हैं। तीन बड़ी शादीशुदा हैं, और दो छोटी।"

मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, "तोहफे ले लिए उनके लिए?"

वह बोला, "आज खरीदूंगा, मैम। ज्यादा महंगे तो नहीं ले सकता, पर जो भी हो, अपनी मेहनत से खरीदूंगा।" कहकर वह जल्दी-जल्दी अपने काम में लग गया।


उसकी मुस्कान और प्यार देखकर मेरे दिल में एक अलग सी भावना उमड़ आई। सच कहूं, तो आज पहली बार मुझे अपने भाई की बहुत याद आई। मैं अपने मम्मी-पापा की इकलौती बेटी हूँ और हर राखी पर यही खालीपन महसूस करती थी। अचानक मेरे मन में एक विचार आया। मैंने विनीत की फाइल उठाई और उसके घर का पता नोट किया, फिर तुरंत ऑफिस से निकलकर शॉपिंग करने चली गई। मेरे दिल में एक नई उमंग थी।


शॉपिंग करके जब घर पहुँची, तो मम्मी ने हैरानी से पूछा, "अरे सपना, आज ये सब क्या खरीद लाई?"

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "राखी की तैयारी कर रही हूँ, मम्मी!"

मम्मी हैरानी से मेरी ओर देखती रह गईं, क्योंकि जो बेटी हर राखी पर उदास रहती थी, वह आज इतनी उत्साहित कैसे हो गई! फिर मैंने मम्मी को अपनी योजना बताई और पापा से भी इसे लेकर बात की। दोनों ने मेरे इस निर्णय को सराहा।


अगले दिन, राखी की सुबह, मैं बहुत जल्दी उठकर तैयार हो गई। मेरे साथ मम्मी-पापा भी तैयार हो गए और हम तीनों विनीत के घर की ओर निकल पड़े। जैसे ही हम उसके घर पहुंचे, तो दरवाजा आधा खुला हुआ था। अंदर से हंसी-मजाक की आवाजें आ रही थीं। बहनों के बीच बहस चल रही थी कि पहले कौन राखी बाँधेगा। माहौल बेहद खुशनुमा और प्यार भरा था।


विनीत ने जैसे ही मुझे दरवाजे पर देखा, वह चौंक गया। "अरे मैम, आप यहाँ कैसे?"

मैंने मुस्कुराते हुए अपनी राखी निकाली और बोली, "अगर आप सबको मंजूर हो, तो मैं आज पहले राखी बांधना चाहती हूँ। क्या तुम मेरे भाई बनोगे, विनीत?"

मेरी आँखों में आँसू आ गए, और विनीत भावुक हो गया। उसने धीरे से कहा, "मैम, मैं आपको क्या दे सकता हूँ?"

वह धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। मैंने उसके कलाई पर राखी बांधी और फिर उसके लिए लाए गए उपहारों में से एक घड़ी निकालकर उसे पहनाई। मैंने उससे कहा, "ये घड़ी महज़ तोहफा नहीं है, ये विश्वास और प्रेम का प्रतीक है, जो मुझे तुममें महसूस हुआ। अब से तुम मुझे 'मैम' नहीं, दीदी ही बुलाना, जैसे पहली बार कहा था।"


विनीत की आँखों में कृतज्ञता और सम्मान था। उसकी बहनों ने भी मुझे बड़े प्यार से राखी बाँधने के लिए धन्यवाद दिया।

विनीत के लिए यह पल भी अविस्मरणीय था, और मेरे लिए भी। मैंने उसके घर में जो अपनापन महसूस किया, वह किसी बड़े गिफ्ट से बढ़कर था।


यह कहानी हमें सिखाती है कि हम अपने सहकर्मियों को केवल उनके पद से नहीं, बल्कि उनके दिल से भी जानें। किसी का छोटा या बड़ा होना उसकी काबिलियत या सम्मान को कम नहीं करता। मानवता और भाईचारे की भावना ही असली रिश्तों की नींव होती है।


आप सभी से निवेदन है कि आप भी अपने सहकर्मियों को सम्मान दें और उनके साथ भाईचारे का रिश्ता बनाए रखें।

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अत्याचार और बदसुलूकी का अंजाम हमेशा बुरा होता है

 संध्या रोज की तरह अपने सारे काम निपटा कर नहाने गई थी कि अचानक सास की कर्कश आवाज़ कानों में पड़ी, **"अरे बहू... ओ बहू, कहां मर गई? सुनती नहीं हो क्या?"** 😡 रसोई के सारे काम खत्म करने के बाद अब नहाने का समय मिला था, लेकिन उसे इस कर्कश आवाज़ की आदत हो चुकी थी। दिन में माया देवी की एक न एक शिकायत उसके कानों में गूंजती रहती थी। 


संध्या ने जैसे-तैसे अपने ऊपर पानी डाला, जल्दी से कपड़े पहने और दौड़ते हुए सास के कमरे में पहुँची। माया देवी गुस्से में चिल्ला रही थीं, **"अरे, तुझसे एक काम भी ठीक से नहीं होता! ये पानी कहां से आ गया? अगर मैं गिर जाती तो मेरी हड्डियां टूट जातीं!"** 😠 संध्या डरते हुए बोली, **"मां जी, मैंने पोछा तो लगाया था।"** पर माया देवी फिर से चिल्लाईं, **"तुझसे कुछ ठीक से नहीं होता! किस्मत ही खराब है जो तेरे जैसे को मेरे बेटे ने पसंद किया।"**


संध्या समझ गई थी कि माया देवी जानबूझकर उसे तंग कर रही थीं। उसने चुपचाप फर्श का पानी साफ किया और वापस अपने कमरे में जाकर बैठ गई। यह रोज़ का सिलसिला बन चुका था। 🥲 सुरेश के ऑफिस जाते ही माया देवी संध्या को परेशान करने के नए तरीके ढूंढती थीं। पहले तो संध्या सहन कर रही थी, लेकिन अब यह सब बर्दाश्त से बाहर हो रहा था। 


शाम को जब सुरेश घर आता, संध्या कई बातें करने की सोचती, पर सुरेश अक्सर थका होता और माँ की शिकायतों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता था। माया देवी भी बेटे के सामने एकदम अलग रूप धारण कर लेतीं—बहुत ही प्यारी सास बन जातीं। लेकिन सुरेश के जाते ही उनका असली चेहरा सामने आ जाता। 🤔


माया देवी की सबसे बड़ी नाराजगी थी कि शादी में उन्हें दहेज पर्याप्त नहीं मिला। उन्होंने घर की नौकरानी भी हटा दी थी, और अब सारा काम संध्या के जिम्मे आ गया था। 😔


एक दिन, जब संध्या झाड़ू लगा रही थी, माया देवी बिस्तर पर बैठी स्वेटर बुन रही थीं। अचानक उन्होंने बिना देखे जोर से पैर मारा, जिससे संध्या का सिर दीवार से टकरा गया। 😣 संध्या दर्द से कराह उठी, लेकिन फिर भी चुप रही। तभी माया देवी ने फिर से उसे लात मारी, और इस बार संध्या बेहोश हो गई। 


माया देवी फिर से चिल्लाईं, **"अरे मर गई क्या? उठ, अभी काम पड़ा है!"** 😡 लेकिन जब संध्या नहीं उठी, तो माया देवी के होश उड़ गए। उन्होंने तुरंत सुरेश को फोन किया। सुरेश उसे अस्पताल ले गया, लेकिन डॉक्टरों की कोशिशों के बावजूद, संध्या की जान नहीं बच पाई। 💔


धीरे-धीरे, पड़ोसियों को माया देवी के बुरे बर्ताव की सच्चाई पता चलने लगी। सुरेश भी समझ गया था कि उसकी माँ ने उसकी पत्नी के साथ जो किया, वह गलत था। 😞 सुरेश ने ज्यादा दिन इस बोझ के साथ नहीं जी पाए और एक दिन उसने खुद को पंखे से लटकाकर अपनी जिंदगी खत्म कर ली। 💔


अब माया देवी के घर में बस सन्नाटा था। वह दिनभर बड़बड़ाती रहतीं, **"अरे बहू, कहां मर गई? मेरे बेटे को भी ले गई। जल्दी आ, घर गंदा पड़ा है!"** 😢 लोगों ने सुना, लेकिन कोई उनकी मदद करने नहीं आया। कुछ दिनों बाद खबर आई कि माया देवी को पागलखाने में भर्ती करा दिया गया, और उनके घर को सस्ते दामों में बेच दिया गया। 🏚️


**सीख:** अत्याचार और बदसुलूकी का अंजाम हमेशा बुरा होता है। रिश्तों में प्यार और समझदारी सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। 💔

संस्कारी बहू तभी मिलेगी,

 एक प्रतिष्ठित वकील साहब ने अपने बेटे का रिश्ता तय किया, और कुछ दिनों बाद समधी जी के घर मिलने गए। घर का दृश्य कुछ ऐसा था कि मां रसोई में काम कर रही थीं, जबकि बच्चे और होने वाली बहू आराम से टीवी देख रहे थे। वकील साहब ने कुशल-क्षेम पूछा, चाय पी, और घर लौट आए। 🏡☕


एक माह बाद फिर से वकील साहब समधी जी के घर गए। इस बार भी देखा कि मां झाड़ू लगा रही थीं, बच्चे पढ़ाई कर रहे थे और होने वाली बहू गहरी नींद में सो रही थी। 😴 फिर भी, वकील साहब कुछ नहीं बोले, खाना खाया और वापस चले गए। 🍽️


तीसरी बार, किसी और काम से जब वकील साहब समधी जी के घर पहुंचे, तो यह दृश्य मिला कि समधन बर्तन साफ कर रही थीं, बच्चे टीवी देख रहे थे, और इस बार होने वाली बहू अपने नाखूनों में नेलपेंट लगा रही थीं। 💅🖥️


वकील साहब ने गहन विचार किया और रिश्ता तोड़ने का निर्णय लिया। कारण पूछने पर उन्होंने कहा, “मैंने तीन बार घर में जाकर देखा, समधन जी हमेशा घर के काम में व्यस्त थीं, लेकिन एक भी बार होने वाली बहू ने हाथ नहीं लगाया। जो बेटी अपनी मां की मदद नहीं करती, वह ससुराल में क्या करेगी?" 🤷‍♀️👩‍🍳


वकील साहब का यह फैसला सिर्फ एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि हर उस माता-पिता के लिए है जो चाहते हैं कि उनकी बेटी एक संस्कारी बहू बने, न कि केवल एक सुंदर गुलदस्ता जो सजाने के लिए हो। 🌹


आजकल के माता-पिता अपनी बेटियों को केवल प्यार से बड़ा करते हैं, लेकिन उन्हें यह भी सिखाना चाहिए कि घर का काम करना, दूसरों की मदद करना और जिम्मेदारियां निभाना कितना ज़रूरी है। 🌼


बेटी से बहू बनाना माता-पिता की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। अगर हम अपनी बेटियों में संस्कार नहीं डालेंगे, तो ससुराल में वही बेटी गालियां सुनकर ज़िंदगी भर दुखी रहेगी। 😔💔


कड़वा सच, लेकिन यह हमें समझने की जरूरत है कि संस्कारी बहू तभी मिलेगी, जब हम अपनी बेटियों को भी अच्छे संस्कार देंगे। 🌸✨


वृद्धाश्रम में माता-पिता को देखकर हम सिर्फ बेटों को दोषी ठहराते हैं, लेकिन अक्सर भूल जाते हैं कि उन्हें वहां भेजने में किसी की बेटी का भी योगदान हो सकता है। बेटे शादी से पहले अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम क्यों नहीं भेजते? क्योंकि बेटी में संस्कार की कमी होती है। 🌍🧑‍🦳


इसलिए, एक सुंदर बहू के साथ एक संस्कारी बहू भी चाहिए। 🙏

Wednesday, 11 September 2024

करूँ—हँसूँ या रोऊँ।

 मेरे पति रोहित और मैं, अपने दो बच्चों करण (6 साल) और दीक्षा (1 साल) के साथ हाल ही में नए घर में शिफ्ट हुए। सब कुछ सेट करने के बाद, मैंने अपनी आदत के अनुसार रात में बादाम भिगो दिए और सोने चली गई। ये बचपन से मेरी आदत रही है, शादी के बाद भी मैं रोहित और बच्चों को भी भीगे बादाम खाने के लिए देती हूँ।


सुबह उठी तो देखा कि कटोरी में बादाम थे ही नहीं! मुझे बड़ा अजीब लगा। मैं सोचने लगी, "मैंने तो रात में भिगोए थे, फिर गए कहाँ?" मैंने रोहित को उठाया और उसे बताया। वो हंसने लगा और बोला, "शायद तुमने भिगोना भूल ही गई होगी।" लेकिन मैंने कहा, "नहीं, मैंने भिगोए थे। देखो, अगर नहीं भिगाए होते तो पानी का रंग कैसे बदलता?" उसने भी मान लिया, "अरे हां, सही कह रही हो। खैर, छोड़ो अब, मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है।"


शाम को मैंने फिर से बादाम भिगोए। रोहित भी उसी समय रसोई में खड़ा था। सब कुछ सामान्य लग रहा था। फिर रात में जब रोहित ने पानी माँगा, मैं पानी लेने गई तो देखा कि बादाम फिर गायब थे! अब तो मेरा दिल दहल गया। मैंने रोहित को बुलाया, "रोहित, जल्दी आओ, फिर से बादाम गायब हो गए!" वो खुद भी हैरान था, पर मुझे ढांढस बंधाने लगा। उसने दूसरी कटोरी में बादाम डालकर कमरे में रख दिए। पूरी रात हम दोनों बार-बार कटोरी देखते रहे, पर बादाम तब तक थे।


अगले दिन मैंने ये बात अपनी पड़ोसन को बताई। उसने जो कहा, उससे मेरी तो जैसे जान ही निकल गई। उसने बताया कि इस घर में जो पहले लोग रहते थे, उनकी पत्नी का तीन महीने में देहांत हो गया था। "हो न हो, ये उसी का साया है जो तुम्हें परेशान कर रहा है," उसने कहा। अब तो रोहित भी डरने लगा था।


मैंने रसोई जाना ही बंद कर दिया, अब मैं सारा खाना अपने कमरे में ही रखती थी। जब तक रोहित शाम को वापस नहीं आता, मैं रसोई में कदम भी नहीं रखती। कुछ दिन ऐसे ही बीते, कभी बादाम होते, कभी गायब हो जाते। हर समय मैं डरी रहती थी।

एक दिन रसोई का बल्ब अचानक फूट गया। मैं जोर से चीख पड़ी, रोहित दौड़ा-दौड़ा आया। उसने मुझे संभाला और स्टूल पर चढ़कर नया बल्ब लगाने लगा। तभी उसकी नजर फ्रीज के ऊपर पड़ी—वहां ढेर सारे बादाम बिखरे हुए थे! "ये क्या! इतने सारे बादाम यहाँ कैसे आए?" उसने मुझे दिखाया। मैं तो जैसे कुछ समझ ही नहीं पा रही थी, पर रोहित अब सतर्क हो गया था।

रात में जब मैंने फिर से बादाम भिगोए, तो हम दोनों ने ध्यान से देखा कि क्या होता है। सब सोने के बाद, हमारा बेटा करण चुपके से रसोई में गया और कटोरी से बादाम निकालकर फ्रीज के ऊपर फेंक दिए! हम उसे पकड़कर हैरान रह गए। रोहित ने उसे प्यार से पूछा, "करण, ये क्या कर रहे हो?" पहले तो वो बहुत डर गया, फिर मासूमियत से बोला, "मुझे बादाम अच्छे नहीं लगते, मम्मी रोज खाने को देती है। मना करने पर भी नहीं मानती, तो मैंने ऐसा किया।"


उस पल मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं क्या करूँ—हँसूँ या रोऊँ।

सीख

 करीब एक महीने पहले की बात है, जब मैं अपने मायके गई थी। चूंकि मुझे वहां ज्यादा समय नहीं रुकना था, मैंने घर पर आरामदायक जूते पहन रखे थे। जब मायके पहुंची, तो मेरी भाभी नेहा की चप्पलें देखकर सोचा कि इन्हें पहनकर और आराम मिलेगा, इसलिए मैंने उनकी चप्पलें पहन लीं।


नेहा की चप्पलें दिखने में साधारण थीं, पर जब मैं वॉशरूम गई, तो अचानक मेरा पैर फिसल गया। गिरते-गिरते बची, और उस पल मुझे एहसास हुआ कि चप्पलों की ग्रिप कितनी जरूरी होती है। मैंने नेहा को तुरंत सलाह दी, "नेहा, ये चप्पलें बदल लो। ऐसी पहनना जिनकी ग्रिप बेहतर हो, वरना फिसलने का खतरा बना रहेगा।"


नेहा ने मेरी बात को मजाक में लेते हुए कहा, "दीदी, मैं तो इन्हीं में सारा काम करती हूँ, बाथरूम में भी। आपको शायद आदत नहीं है।" उसकी बात सुनकर मैंने ज्यादा जोर नहीं दिया, और हम बात वहीं खत्म कर दी।


कुछ दिनों बाद, मैंने नेहा से हालचाल लेने के लिए फोन किया। उसकी आवाज़ में उदासी थी। मैंने पूछा, "सब ठीक तो है?" नेहा ने जवाब दिया, "दीदी, दो दिन पहले बाथरूम में फिसल गई। कमर और पैरों में बहुत दर्द है। डॉक्टर ने दवाइयां दी हैं। शुक्र है कि हड्डी नहीं टूटी।" उसकी बात सुनकर मुझे दुख हुआ और पूछा, "अब तो तुमने चप्पलें बदल लीं?"


नेहा हल्के से हंसते हुए बोली, "हाँ दीदी, आपकी बात सुन लेनी चाहिए थी। अब मैंने नई चप्पलें ली हैं और अपनी बेटियों के लिए भी ले आई हूं।" यह सुनकर मुझे तसल्ली हुई। यह घटना एक बड़ी सीख दे गई कि हम कई बार सलाह को नजरअंदाज कर देते हैं, जब तक कि खुद पर कुछ न गुजर जाए। अगर सही समय पर सही सलाह मान ली जाए, तो हम बहुत सी मुसीबतों से बच सकते हैं।

*सीख:**  

कई बार हम दूसरों की सलाह को हल्के में लेते हैं, लेकिन समझदारी इसी में है कि सही वक्त पर सही सलाह को मानकर अमल में लाया जाए। इससे हम अनचाही परेशानियों से बच सकते हैं।

संघ क्यों चुप है ?

 *संघ क्यों चुप है ??*

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आज मैं जब सुबह सुबह घूमने निकला, तो सामने से एक परिचित हिन्दू महानुभाव भी साथ हो लिये। देश- विदेश की चर्चा एवं राजनीतिक चर्चा आजकल प्रिय विषय है ही। तो वह बन्धु चर्चा करते करते कश्मीर से कैराना व केरल से बंगाल तक मानसिक व वाचालिक भ्रमण करने लगे।मैं चुप हो उनकी सुन रहा था। तभी अचानक बोले "वहां इन स्थानों पर हिन्दू परेशान है। आखिर संघ क्यों चुप है - इस मामले में आखिर संघ कर क्या रहा है?"


अब तो मुझे जवाब देना ही पड़ा। मैने कहा "संघ क्या है?" 

बोले "हिन्दुओं का संगठन।" 


मैं बोला "तो आप हिन्दू हैं?" 

वह बोले "कैसा प्रश्न है यह आपका? मैं कट्टर सनातन हिन्दू हूं।" 


तब मैने कहा तो क्या आप जुडे हैं संघ से?" 

वह बोले.. "नहीं तो" 


तब मैने पूछा "आपका बेटा, पोता, नाती या परिवारजन कोई रिश्तेदार जुड़ा है क्या?"  

तब बोले "नहीं कोई नहीं। बेटा नौकरी पर है, फुर्सत नहीं मिलती उसे। पोता नाती विदेश में सैटल हो चुके हैं। रिश्तेदार बडे व्यवसायी हैं। उसी में व्यस्त हैं व शेष घर पर ही रहते हैं और बच्चों को तो कोचिंग से फुर्सत नहीं मिलती।" 


मैने कहा - इसका मतलब यह हुआ कि संघ आपके व आपके परिवार व रिश्तेदारों को छोडकर शेष अन्य हिन्दुओं का संगठन है?

वह चिढकर बोले "आज क्या हुआ है आपको? कैसी बात कर रहे हो आप? अरे भाई ऐसी स्थिति मेरी अकेले की थोड़े है। देश में 90% लोग ऐसे हैं जिनको अपने काम से फुर्सत ही नहीं मिलती है। तो यह आप केवल मुझ पर ही क्यों इशारा कर रहे हो? काम ही तो पूजा है, काम नहीं करेंगे तो देश कैसे चलेगा?" 


मैने फिर कहा "तो मतलब आपके हिसाब से संघ से केवल 10% हिन्दू लोग ही जुड़े हैं।" 


वह बोले "जी नहीं साहब, मेरे वार्ड में रहते सारे हिन्दू ही है। कुल 10000 की जनसंख्या है वार्ड में हिन्दुओं की। पर सुबह सुबह देखता हूं बस रोज तो उसमें से भी केवल 10-15 लोग ही नजर आते हैं संघ की शाखा में। बाकी कभी उत्सव त्योहार पर ही नजर आते हैं।"


मैने पूछ लिया कि कभी जाकर मिले उनसे?  

बोले "नहीं.." 


मैंने पूछा कभी उनकी कोई मदद की?" 

बोले "नहीं"


मैं "कभी उनके उत्सवों कार्यक्रमों में भागीदारी की?" 

बोले "नहीं" 


मैं "तो फिर आप की संघ से यह सारी अपेक्षा क्यों ?


मैं भी तो खीज गया था अन्दर से आखिर बोल ही पड़ा "तो ठेका लिया है संघ ने आप जैसे हिन्दुओं का? क्या वह संघ के सारे लोग बेरोजगार हैं? उनके पास अपना काम नहीं है,या उनका अपना कोई परिवार नहीं हैं क्या? आप तो अपने व्यवसाय व परिवार की चिन्ता करें, बस। और वह अपने व्यवसाय व परिवार की भी चिन्ता करें व साथ में आप जैसे अकर्मण्य, एकांकी, आत्मकेंद्रित हिन्दुओं की भी चिन्ता करें ?


 यह केवल उनसे ही क्यों चाहते हैं आप ?


 क्योंकि वह भारतमाता की जय बोलते हैं, देश से प्यार करते हैं, वन्देमातरम कहते हैं? 


क्या यह करना गुनाह है उनका? इसलिये उन से आप यह जजिया वसूलना चाहते हैं?जो आप सभी समर्थ होकर भी नहीं करना चाहते वह सब कुछ वह करें। वही कश्मीर, कैराना व बंगाल तथा आप जैसों की चिन्ता करें? देश व समाज की हर तरह की आपदा व संकटों में वही अपना श्रम या धन व जीवन तक बलिदान करें? उनको क्यों आपकी तरह मूक या तटस्थ बने रहने का हक नहीं है ? क्यों वही अपना घर परिवार सब छोडकर केवल आप जैसों के लिये ही जियें ?

कभी सोचा है कि जब वह आप से चाहते हैं कि आप उनको बल दो, साथ दो, समर्थन दो, उन्हें ऐसे 10% पर ही अकेला मत छोड़ो। 

तब आप उनको निठल्ला, फालतू व पागल समझ कर उनकी उपेक्षा करते हो-और इतना ही नहीं उन्हैं साम्प्रदायिक कह कर गाली देते हो। अपने को सेक्यूलर मानकर अपनी शेखी बघारते हो।केवल अपने घर-परिवार, व्यवसाय को प्राथमिकता देते हो तथा अपने बच्चों का भविष्य बनाने में ही जुटे रहते हो।

अगर वह हिन्दू संगठन वाले हैं, तो आप जैसे भी तो सारे हिन्दू ही हैं। तो जो कर्तव्य उनका बनता है वह आपका क्यों नहीं बनता ? बस जरा यह तो स्पष्ट करें। कि क्या वही हिन्दू हैं आप हिन्दू नहीं है?

स्मरण करो, भगतसिंह को फांसी केवल इसलिये हुई थी एव॔ आजाद को भी इसीलिये अकेले लड़कर मौत को गले लगाना पडा था क्योंकि अगर यह आप जैसे शेष 90% हिन्दू हमें क्या करना कहकर सोये हुये ना होते, यह आप जैसे 90% हिन्दू आत्मकेन्द्रित हो हमें क्या फर्क पड़ता है कहकर ना जी रहे होते। उनके समर्थन में खुलकर आये होते तो उनको फांसी देने या मार सकने जितनी हिम्मत या औकात तब भी अग्रेजों में नहीं थी। अगर तब यह 90 % हिन्दू आपकी तरह तमाशा ना देखते, कभी इक्ठ्ठे होकर केवल एक बार अयोध्या पहुंच कर जय श्रीराम का नारा लगा देते तो मंदिर कब का बन गया होता।

अगर हिंदूओ मे जरा सी भी शर्म होती तो मात्र कुछ करोड़ गद्दार वंदेमातरम,भारत माता की जय का विरोध करने की हिम्मत नही कर पाते।

आज टहलते समय संघ स्थान पर हुयी वार्तालाप के. आधार पर मन के विचार -

*कभी मैं खुद भी रोज शाखा में जाता था आज न तो मेरा बेटा ना मैं दोनों ही नही जाते न किसी प्रोग्राम में support करते हाँ उम्मीद जरूर करते हैं कि देश बदलेगा but बदलेगा कौन ये बड़ा सवाल है इसलिए मैंने आज से ये सोच लिया है की मैं भी अपनी तरफ से संघ को पूरा support करूंगा साथ ही खुद भी उनके program में सम्मिलित भी होऊँगा आप भी हो सके तो थोड़ा समय निकाल कर प्रयास जरूर कीजियेगा* 😊🙏। 

Monday, 9 September 2024

काश मे भी उस दिन तेरे साथ स्कूल छोड़ कर भाग आया होता

 एक स्कूल के प्रिंसिपल एक बड़ी मीट की दुकान में घुसे और काउंटर पर बैठे लड़के से कहा कि मुझे दो किलो मीट दे दो।

वहां लड़के ने कहा हां सर आप बैठिए और एक कप चाय भी दी और अपने कर्मचारियों से दो किलो अच्छा मीट बनाने को कहा.

गोश्त को बैग में डालने के बाद कर्मचारियों ने खुद जाकर गाड़ी में रख दिया.

जब प्रिंसिपल ने पैसे देने चाहे तो लड़के ने बड़ी अज़ीज़ि से मना कर दिया और कहा कि आप तो हमारे टीचर हैं सर 

जब प्रिंसिपल ने पूछा बेटा तुमने मेरी इतनी खिदमत की और मीट के पैसे भी नहीं लिए, क्या तुम मुझे जानते हो? 

तो इस लड़के ने कहा आप मेरे टीचर हैं. 


क्या आपको याद है 10-12 साल पहले जब मे आपके स्कूल मे पड़ता था जब मैंने क्लास मे एक में गलती की थी, आपने कहा था कि जब तक आप अपने वालिद को अपने साथ नहीं लाओगे तब तक आप क्लास में प्रवेश नहीं कर सकते, इसलिए मैं स्कूल से भाग गया था और एक कसाई के यहाँ काम पे लग गया 


उसके बाद मेने काम सीख कर तरक़्क़ी करता गया और आज मेरे पास शहर मे 4 दुकानें, 2 घर, 1 फार्म हाउस और 3 लगज़री गाड़िया हैं 

अगर आप मुझे उस दिन स्कूल से न भगाते तो मे भी आज कही 15-20 हजार की नौकरी कर रहा होता या रेजयुम हाथ मे लेकर ऑफिस ऑफिस घूम रहा होता 


इतना सुनकर प्रिंसिपल साहब ज़ारो क़तार रोने लगे और बोले की काश मे भी उस दिन तेरे साथ स्कूल छोड़ कर भाग आया होता

लेखक सुनिल राठौड़ 


रिश्ते टूटते नहीं। बस रिश्ते दिल से होना चाहिए

 कोर्ट में पेपर पर आखिरी साइन होते ही वकील मुस्कुराया और बोला, “लो मैडम, अब आपका डिवोर्स हो गया है। कोर्ट ने आपको 10 लाख रुपये हर्जाने के तौ...