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Thursday, 29 August 2024

अर्जुन ने हमें सिखाया कि सच्ची खुशी और सुकून कहीं और नहीं, बल्कि अपने परिवार और अपनों के साथ ही मिलती है।

 मेरा मित्र, अर्जुन, जिसे मैंने पांच साल पहले आखिरी बार देखा था, अचानक दुबई चला गया था। उसकी जिंदगी का मकसद बड़ा स्पष्ट था—अपनी बहनों की शादियाँ करना, घर का कर्ज़ उतारना, और अपने बूढ़े माता-पिता की सेवा करना। हालांकि, हम फेसबुक पर अक्सर बात कर लिया करते थे, फिर भी जब वह पांच साल बाद लौटकर आया, तो उसकी आँखों में एक अलग ही गहराई दिखी। उसकी जिंदगी की कहानी कुछ ऐसी थी जिसे सुनकर हम सभी मित्र मंडली गहरी सोच में डूब गए।


एक दिन हम सभी दोस्तों ने मिलकर अर्जुन को घेरा और उससे पूछा, "और भाई, कैसी रही अरब की जिंदगी?"


अर्जुन ने गहरी सांस ली, जैसे एक लंबी कहानी कहने की तैयारी कर रहा हो। फिर उसने कहना शुरू किया:


"देखो, भाई, पाँच साल हो गए थे सऊदी में काम करते हुए। पहले साल की सारी कमाई तो कर्ज़ उतारने में चली गई। दूसरा साल बहनों की शादियों में खर्च हो गया। तुम जानते हो ना, परिवार की जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। तीसरे साल कुछ पैसे बचाने की सोची, लेकिन अब्बा की तबियत खराब हो गई। लौटने की हिम्मत नहीं हो रही थी, फिर अब्बा भी दुनिया से चले गए। चौथा साल अब्बा के इलाज और उनकी मौत के सदमे में निकल गया।"


हम सबके चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। अर्जुन ने कहानी को जारी रखते हुए कहा, "अम्मा बूढ़ी हो गई थीं, घर पर अकेली थीं, लेकिन मेरे पास कोई बचत नहीं थी। पांच साल सऊदी में बिताने के बाद भी, जब घर लौटने का समय आया, तो खाली हाथ लौटना पड़ा। अम्मा की जिद और बहनों की पुकार ने मेरी हिम्मत बढ़ाई, 'भाई, बस आ जाओ, हमें कुछ नहीं चाहिए।' सोचा, चलो अब यहां ही कुछ कर लेंगे।"


अर्जुन ने गहरी नजरों से हमारी तरफ देखा और फिर बोला, "जब घर लौटा, तो लगा कि ये पांच साल जैसे एक सपना था, एक ऐसा सपना जिसे पूरा करने की जद्दोजहद में सब कुछ दांव पर लग गया। अगले ही दिन बहनों से मिलने गया। पहली बहन के बच्चों के हाथ पर सौ रुपये रखकर आया, लेकिन जब दूसरी बहन के घर पहुंचा, तो पास में एक भी पैसा नहीं बचा था। सोचा, चलो ये तो अपनी है, समझ जाएगी। पर वह समझी नहीं। घर वापस आया तो अम्मा ने बताया कि बड़ी बहन का फोन आया था। उसने कहा, 'भाई पांच साल बाद सऊदी से आया था, बच्चों के हाथों पर सौ रुपये रखकर गया, इतना तो किसी फकीर को भी दे देते हैं।'"


अर्जुन की आवाज में दर्द साफ झलक रहा था। उसने आगे कहा, "दूसरी बहन बोली, 'भाई, पांच साल बाद सऊदी से आए और बच्चों के हाथ पर दस रुपये भी नहीं रखे। बच्चों ने कहा कि मामू आए थे, खाली हाथ। मेरी ससुराल में मेरी नाक कटवा दी।'"


हम सब सुनकर चुप हो गए। अर्जुन की आँखों में एक अजीब सी निराशा थी। उसने कहा, "मैं खड़ा था, और अपने पिछले पाँच सालों की कमाई का हिसाब लगा रहा था। ये सिर्फ मेरी कहानी नहीं है, भाई। हम में से कई लोग, जो पैसे कमाने के लिए घर से दूर जाते हैं, उनके साथ यही होता है। जब आप कमा रहे होते हैं, तो सब आपको सर पर उठाते हैं, लेकिन जब कभी कमाने का सिलसिला टूट जाता है, तो सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है। मान-सम्मान, रिश्ते, सब एक पल में धुंधले हो जाते हैं।"


अर्जुन की बात ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया। उसने हमें एक ऐसी सच्चाई दिखाई, जिसे हम शायद अपने आरामदायक जीवन में कभी समझ ही नहीं पाए थे। हमने अपने दोस्त के साथ वो समय बिताया, उसकी बातें सुनीं और महसूस किया कि जिंदगी में धन और दौलत से बढ़कर भी कुछ है—समय, प्रेम, और वो रिश्ते जिनकी कद्र शायद हम अक्सर भूल जाते हैं।


अर्जुन ने हमें सिखाया कि सच्ची खुशी और सुकून कहीं और नहीं, बल्कि अपने परिवार और अपनों के साथ ही मिलती है।

भाई सिर्फ नाम से नहीं, बल्कि दिल से भी होते हैं।

 शिवानी का रिजर्वेशन जिस बोगी में था, उसमें ज्यादातर लड़के ही थे। टॉयलेट जाने के बहाने शिवानी पूरी बोगी घूम आई थी, और उसे वहां मुश्किल से दो-तीन महिलाएं दिखीं। मन अनजाने भय से घबराने लगा।


यह पहली बार था जब शिवानी अकेली सफर कर रही थी, इसलिए वह पहले से ही चिंतित और डरी हुई थी। उसने खुद को सहज रखने की कोशिश करते हुए चुपचाप अपनी सीट पर बैठकर मैगज़ीन निकाल ली और पढ़ने लगी।


वहीं, पास के कुछ नवयुवक, जो शायद किसी कैम्प के लिए जा रहे थे, जोर-जोर से हंसी-मजाक और चुटकुले कर रहे थे। उनके शोर ने शिवानी की हिम्मत को और भी तोड़ दिया। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा, जैसे हर पल कुछ अनहोनी की आशंका हो।


शिवानी के मन में उठ रहे भय और घबराहट के बीच रात धीरे-धीरे उतरने लगी। अचानक सामने बैठे एक युवक ने कहा, "हेलो, मैं विनय हूँ, और आप?" शिवानी ने भय से कांपते हुए धीरे से कहा, "जी, मैं...," इससे पहले कि वह कुछ और कह पाती, विनय ने मुस्कुराते हुए कहा, "कोई बात नहीं, नाम बताने की ज़रूरत नहीं। वैसे, कहाँ जा रही हैं आप?"


शिवानी ने हिचकिचाते हुए कहा, "वाराणसी।"


विनय ने उत्साहित होकर कहा, "अरे वाह, वाराणसी तो मेरी मामी का घर है! इस रिश्ते से तो आप मेरी बहन हुईं, है न?" विनय की इस बात पर शिवानी थोड़ी हैरान हुई, लेकिन वह उसकी बातों में रुचि लेने लगी। विनय ने उसे वाराणसी की कई बातें बतानी शुरू कर दीं। उसने कहा कि उसके मामा एक प्रसिद्ध व्यक्ति हैं, और उसके मामा के बेटे सेना में उच्च पदों पर हैं। इन सब बातों ने शिवानी को कुछ हद तक आराम दिया, और वह धीरे-धीरे सामान्य हो गई।


शिवानी पूरी रात विनय से बातें करती रही। उसके साथ उसने अपना भय और अनिश्चितता भूलकर कुछ सुकून के पल बिताए। उसे लगा जैसे वह वास्तव में अपने भाई के साथ है। रात जैसे कुँवारी आई थी, वैसे ही पवित्र कुँवारी गुजर गई।


सुबह होते ही शिवानी ने विनय से कहा, "लीजिए, मेरा पता रख लीजिए। कभी वाराणसी आना हो, तो जरूर मिलने आइएगा।"


विनय ने हंसते हुए जवाब दिया, "बहन, सच कहूं तो मैंने कभी वाराणसी देखा ही नहीं है। मैंने सिर्फ आपको सहज महसूस कराने के लिए ये बातें गढ़ीं।"


शिवानी चौंक गई, "क्या? आपने तो कहा था कि..."


विनय ने उसकी बात काटते हुए कहा, "बहन, ऐसा नहीं है कि सभी लड़के बुरे होते हैं। हर किसी का इरादा खराब नहीं होता। हम में ही तो वे लोग होते हैं जो पिता, भाई और मित्र बनते हैं। यह समाज वैसा नहीं है जैसा हम अक्सर सोचते हैं।"


इतना कहकर विनय ने प्यार से शिवानी के सिर पर हाथ फेरा और मुस्कुराते हुए बोला, "अपना ख्याल रखना, बहन।"


शिवानी उसे देखती रही, जैसे कोई अपना भाई उससे विदा ले रहा हो। उसकी आंखें गीली हो चुकी थीं। वह सोच रही थी, काश, इस संसार में सभी ऐसे ही होते—न कोई अत्याचार, न कोई व्यभिचार। एक भयमुक्त समाज का स्वरूप, जहां हर बहन-बेटी खुली हवा में सांस ले सके, निर्भय होकर कहीं भी, कभी भी जा सके। जहां हर कोई एक-दूसरे का मददगार हो।


तभी एक रिक्शे वाले ने आवाज दी, "बहन, कहां चलना है?"


शिवानी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "कॉलेज तक, भाई। ले चलोगे?"


आज, वह डर नहीं रही थी। क्योंकि अब वह जान गई थी कि भाई सिर्फ नाम से नहीं, बल्कि दिल से भी होते हैं।

रिश्तों का महत्व समझें, उन्हें संजोएं,

 सुनैना एक प्रतिष्ठित बैंक में उच्च पद पर कार्यरत थी। शादी के बाद से वह अपने ससुराल में अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने और करियर के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी। घर में बस तीन लोग थे—सुनैना, उसके पति अनुराग, जो खुद का व्यापार करते थे, और उनके वृद्ध ससुर, श्री रमेश तिवारी। सुनैना की सास का देहांत एक साल पहले ही हो चुका था, और उसके बाद से ही घर का माहौल थोड़ा सा उदासीन हो गया था।


हर दिन, जब सुनैना सुबह जल्दी उठकर घर के काम निपटाकर ऑफिस के लिए तैयार होती, ठीक उसी समय उसके ससुर, जो अक्सर अपने कमरे में रहते थे, उसे बुलाते और कहते, "बहू, मेरा चश्मा साफ कर दो, और मुझे दे दो।" सुनैना को ऑफिस के लिए देर हो रही होती थी, और वह मन ही मन झुंझलाती, लेकिन ससुर की बात का मान रखते हुए चश्मा साफ कर देती थी। यह सिलसिला रोज़ का हो गया था, और सुनैना के लिए यह बात धीरे-धीरे असहनीय हो चली थी।


एक दिन, जब यह रोज़ की बात उसके सहनशक्ति की सीमा को पार करने लगी, तो उसने यह बात अपने पति अनुराग से साझा की। अनुराग को भी यह सुनकर आश्चर्य हुआ, क्योंकि उनके पिता ने कभी ऐसी आदत नहीं दिखाई थी। अनुराग ने सुनैना को सलाह दी, "तुम सुबह उठते ही पिताजी का चश्मा साफ करके उनके कमरे में रख दिया करो, शायद इससे उनका बार-बार बुलाना बंद हो जाए।"


सुनैना ने पति की सलाह मान ली और अगले दिन से हर सुबह सबसे पहले ससुर का चश्मा साफ कर उनके कमरे में रख आती। लेकिन ससुर के बुलाने का सिलसिला थमा नहीं। सुनैना के प्रयास के बावजूद, जब वह ऑफिस के लिए निकलने लगती, तो ससुर फिर से उसे चश्मा साफ करने के लिए बुला लेते। इस आदत से सुनैना और भी अधिक परेशान हो गई थी।


समय के साथ, सुनैना ने इस स्थिति को अनदेखा करना शुरू कर दिया। ससुर की आवाज़ अब उसके लिए कोई महत्व नहीं रखती थी, और वह अपने काम में मग्न रहती। धीरे-धीरे, रिश्तों में वह गर्माहट भी कम होने लगी थी। फिर एक दिन, ससुर अचानक बीमार हो गए और कुछ ही दिनों में चल बसे। सुनैना के दिल में कहीं न कहीं पछतावा था, लेकिन उसने खुद को व्यस्त रखकर उस दर्द को दबा दिया।


ससुर के देहांत के दो साल बाद, एक दिन सुनैना ने सोचा कि घर की सफाई की जाए। सफाई करते समय, उसे अपने ससुर की एक पुरानी डायरी मिली। सुनैना ने वह डायरी खोली और उसमें लिखे पन्ने पलटने लगी। एक पन्ने पर लिखा था:


"दिनांक 24-08-09... आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में बच्चे अक्सर घर से निकलते समय बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं। यही आशीर्वाद उनके जीवन की कठिनाइयों में ढाल बनता है। इसलिए, जब तुम चश्मा साफ कर मुझे देने के लिए झुकती थी, तो मैं मन ही मन तुम्हारे सिर पर अपना हाथ रखकर तुम्हें आशीर्वाद देता था। तुम्हारी सास ने मुझसे वादा लिया था कि मैं तुम्हें अपनी बेटी की तरह ही प्यार दूंगा और तुम्हें कभी महसूस नहीं होने दूंगा कि तुम अपने ससुराल में हो, बल्कि हमेशा ऐसा लगे कि यह तुम्हारा अपना घर है।"


डायरी के ये शब्द पढ़ते ही सुनैना की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने महसूस किया कि जिस आशीर्वाद को वह अनदेखा करती आई थी, वही उसकी असली ताकत थी। अपने ससुर के उस अनकहे प्यार और आशीर्वाद की गहराई को समझकर वह फूट-फूटकर रोने लगी।


आज भी, ससुर के जाने के वर्षों बाद, सुनैना रोज़ सुबह घर से निकलते समय उनका चश्मा साफ कर, उसी टेबल पर रख देती है। उसे यह यकीन है कि उसके ससुर की आत्मा कहीं न कहीं से उसे देख रही होगी और उसे अपने आशीर्वाद से सराबोर कर रही होगी।


इस घटना ने सुनैना को रिश्तों की असली महत्ता सिखाई। अब वह समझ गई थी कि रिश्ते शब्दों से नहीं, भावनाओं से सहेजे जाते हैं। वह जीवनभर उस आशीर्वाद को संजोकर रखेगी, जो ससुर के हाथों से उसे अनकहे मिलते रहे।


रिश्तों का महत्व समझें, उन्हें संजोएं, क्योंकि जब हम उन्हें खो देते हैं, तब उनकी कीमत का एहसास होता है।

Wednesday, 28 August 2024

माता-पिता के विश्वास का सम्मान करना चाहिए,

 "माँ...!" रीना ने हल्की हिचकिचाहट के साथ कहा, "मैं सोच रही थी कि आज रात शालिनी के घर रुक जाऊं। थोड़ी ग्रुप स्टडी करनी है, और परसों मैथ्स का टेस्ट भी है, उसी की तैयारी करनी है।" रीना अपनी किताबें समेटते हुए उत्साहित होकर बोलती जा रही थी।


"बेटा, रात को किसी के घर रुकना मुझे ठीक नहीं लगता," माँ, सुनीता, ने अपने संकोच को जाहिर करते हुए कहा।


"माँ!!", रीना ने नाराज होते हुए कहा, "पापा, देखिए ना, माँ मुझे जाने नहीं दे रहीं!"


रीना के पिता, रोहित, जो हमेशा अपने बच्चों की बात मानते थे, सुनीता पर हल्का सा नाराज होते हुए बोले, "अरे, रुक जाने दो ना रीना को उसकी सहेली के घर, एक रात की ही तो बात है। हमें अपने बच्चों पर विश्वास करना सीखना चाहिए। जाओ बेटा, जाओ!"


रीना ने अपने पापा को धन्यवाद कहा और उत्साहित होकर अपनी स्कूटी से शालिनी के घर की ओर निकल पड़ी।


रात का एक बज चुका था, जब फोन की घनघनाहट ने रोहित जी को जगा दिया। फोन उठाते ही उन्होंने एक अनजान आवाज सुनी, "मि. रोहित, आप तुरन्त थाना सिविल लाइन्स आने का कष्ट करें।"


रोहित जी का दिल धक-धक करने लगा, उन्हें कुछ अनहोनी का आभास हो रहा था। उनकी सांसें जैसे गले में अटक गईं। बदहवास होकर वे थाने पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि लगभग दस-पंद्रह युवक-युवतियां मुंह छिपाए बैठे थे। रोहित जी ने अपनी बेटी, रीना, को पहचानने में जरा भी देर नहीं लगाई। उनका दिल टूट गया था, जैसे किसी ने उनके विश्वास को कुचल दिया हो।


"देखिए, मि. रोहित," थानेदार ने गुस्से से कहा, "ये बच्चे शहर के बाहर एक फार्महाउस में ड्रग्स के साथ रेव पार्टी करते हुए पकड़े गए हैं! आप लोग आखिर किस तरह के संस्कार अपने बच्चों को देते हैं? इतनी रात गए घर से बाहर जाने की परमिशन कैसे दे देते हैं? आपको शर्म आनी चाहिए!"


रोहित जी का सिर शर्म से झुक गया। वे बस एक ही बात सोच रहे थे, "मैंने अपनी बेटी पर इतना विश्वास किया, लेकिन आखिर क्यों उसने मेरे साथ विश्वासघात किया?"


दोस्तों, इस दुनिया में अगर कोई है जो आपका सबसे ज्यादा ख्याल रखता है, आपका भला चाहता है, तो वो आपके माता-पिता हैं। उनके सख्त होने के पीछे भी आपके लिए अपार प्रेम छिपा होता है। कभी भी आपको उस प्रेम का नाजायज फायदा नहीं उठाना चाहिए। माता-पिता के विश्वास का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि एक बार खोया हुआ विश्वास शायद कभी लौटकर नहीं आता।

बिजली बिल से पीड़ित आम नागरिक की व्यथा

 बिजली विभाग के दफ्तर के बाहर राजू केले बेच रहा था।

बिजली विभाग के एक बड़े अधिकारी ने पूछा : " केले कैसे दिए" ?

राजू: केले किस लिए खरीद रहे हैं साहब ?

अधिकारी:- मतलब ?? 

राजू:- मतलब ये साहब कि,

*मंदिर* के प्रसाद के लिए ले रहे हैं तो 10 रुपए दर्जन। 

*वृद्धाश्रम* में देने हों तो 15 रुपए दर्जन। 

बच्चों के *टिफिन* में रखने हों तो 20 रुपए दर्जन। 

*घर* में खाने के लिए ले जा रहे हों तो, 25 रुपए दर्जन 

और अगर *पिकनिक* के लिए खरीद रहे हों तो 30 रुपए दर्जन।

अधिकारी: - ये क्या बेवकूफी है ? अरे भई, जब सारे केले एक जैसे ही हैं तो,भाव अलग अलग क्यों बता रहे हो ??

राजू: - ये तो पैसे वसूली का, आप ही का स्टाइल है साहब। 

1 से 100 रीडिंग का रेट अलग, 

100 से 200 का अलग, 

200 से 300 का अलग। 

अरे आपके बाप की बिजली है क्या ?

आप भी तो एक ही खंभे से बिजली देते हो। 

तो फिर घर के लिए अलग रेट, 

दूकान के लिए अलग रेट, 

कारखाने के लिए अलग रेट, 

फिर इंधन भार, विज आकार.....

और हाँ, एक बात और साहब, 

*मीटर का भाड़ा।*

मीटर क्या अमेरिका से आयात किया है ? 25 सालों से उसका भाड़ा भर रहा हूँ। आखिर उसकी कीमत है कितनी ?? आप ये तो बता दो मुझे एक बार।

*जागो ग्राहक जागो* अधिकारी चुप चाप अपने ऑफिस में चला गया l 

🎺🎺🎺 

बिजली बिल से पीड़ित  आम नागरिक की व्यथा🤔😎

Monday, 26 August 2024

एक पत्नी को शादी के कुछ साल बाद यह विचार आया कि अगर वह अपने पति को छोड़ कर कहीं चली जाए, तो उसका पति कैसा महसूस करेगा?

 एक पत्नी को शादी के कुछ साल बाद यह विचार आया कि अगर वह अपने पति को छोड़ कर कहीं चली जाए, तो उसका पति कैसा महसूस करेगा?


पत्नी ने अपने इस विचार को जानने और परखने के लिए एक सादे कागज पर लिखा, "अब मैं तुम्हारे साथ और नहीं रह सकती। मैं तुम्हारे साथ से उब चुकी हूं। मैं घर छोड़ कर हमेशा के लिए जा रही हूं।”


उस कागज को उसने टेबल पर रखा और जब पति के आने का समय हुआ, तो उसकी प्रतिक्रिया देखने के लिए वह पलंग के नीचे छुप गई।


पति आया और उसने टेबल पर रखे कागज को पढ़ा। कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने उस कागज पर कुछ लिखा। फिर वह खुशी में जोर-जोर से सीटी बजाने लगा, गीत गाने लगा, उछल-उछल कर नाचने लगा और फिर अपने कपड़े बदलने लगा।


उसके बाद उसने अपने फोन से किसी को फोन किया और कहा, "आज मैं मुक्त हो गया! शायद मेरी मूर्ख पत्नी को समझ आ गया कि वह मेरे लायक नहीं थी। इसलिए आज वह घर से हमेशा के लिए चली गई। अब मैं आजाद हूं, तुमसे मिलने के लिए। मैं आ रहा हूं कपड़े बदलकर तुम्हारे पास। तुम तैयार होकर मेरे घर के सामने वाले पार्क में अभी आ जाओ।”


पति बाहर निकल गया।


पति के जाने के बाद पत्नी रोते-बिलखते बेड के नीचे से निकली और कांपते हाथों से कागज पर लिखी लाइन पढ़ी, जिसमें लिखा था,


"बेड के नीचे से तेरे पैर दिख रहे हैं पगली। पार्क के पास वाली दुकान से ब्रेड लेकर तुरंत आ रहा हूं। तब तक चाय बना लेना। मेरी जिंदगी में खुशियां तेरे बहाने से हैं। आधी तुझे सताने से हैं और आधी तुझे मनाने से हैं!! लव यू मच..!!"

Sunday, 25 August 2024

अभिनव" नाम से एक फ्रेंड रिक्वेस्ट देख सुरभि हैरान हो गई थी। उसने अनायास ही प्रोफाइल खोलकर देखा

 कई वर्षों बाद "अभिनव" नाम से एक फ्रेंड रिक्वेस्ट देख सुरभि हैरान हो गई थी। उसने अनायास ही प्रोफाइल खोलकर देखा। प्रोफाइल फोटो देखते ही उसकी शंका यकीन में बदल गई। यह अभिनव ही था। सुरभि ने उत्सुकता से अभिनव का पूरा प्रोफाइल खंगाल डाला—पत्नी, बच्चे, व्यवसाय, दोस्तों की तस्वीरें, और कामयाबी की दास्तां। सुरभि मुस्कुराई, उसे यह देखकर अच्छा लगा कि इतने वर्षों बाद भी अभिनव ने उसे याद रखा है। सालों गुजर गए थे...


वह दिन याद आते ही सुरभि के मन में अतीत की परतें खुलने लगीं। इंटर कॉलेज का प्रतियोगिता होने वाला था। सुरभि बहुत अच्छा गाती थी, और यह उसका अंतिम वर्ष था। कॉलेज के बाद कौन मिल पाता है? यह सोचकर उसने सिंगिंग कॉम्पिटिशन में अपना नाम लिखवा दिया था। उसकी शिक्षिका ने भी उसे प्रोत्साहित किया, हालांकि उन्होंने यह भी कहा, "लड़कियों में तो तुम हर बार जीतती हो, लेकिन हमारे कॉलेज से कोई भी लड़का उस अभिनव से नहीं जीत पाता। पिछले दो सालों से वही जीत रहा है।" अभिनव दूसरे कॉलेज का छात्र था। सुरभि ने पहली बार उसे मंच पर गाते देखा था। उसकी आवाज में इतनी मिठास और सहजता थी कि सुरभि मंत्रमुग्ध हो गई थी। जब वह विजेता घोषित हुआ, तो सुरभि दिल से खुश हुई थी। दोनों की मुलाकातें सीमित थीं, लेकिन अभिनव सुरभि की आवाज से बहुत प्रभावित हुआ था।


कॉलेज खत्म होने के बाद, सुरभि की आकाशवाणी में नौकरी लग गई। एक दिन, एक कार्यक्रम के दौरान, सुरभि को पता चला कि उसके शहर के गायक कलाकारों का इंटरव्यू हो रहा है, जिसमें होस्ट वह खुद थी। और वहां उपस्थित अभिनव को देख सुरभि एक बार फिर अचंभित हो गई। उसे पहचानने में उसे देर न लगी। कार्यक्रम के बाद, औपचारिक बातों के बीच, अभिनव ने सुरभि से पूछा, "क्या हम कहीं और मिल सकते हैं?"


"क्यों?" सुरभि ने थोड़ा हैरानी से पूछा।


"बस ऐसे ही," अभिनव ने हंसते हुए कहा।


सुरभि ने मना नहीं किया। अभिनव के व्यक्तित्व में एक अलग सा आकर्षण था, जो उसे खींच रहा था।


काफी हाउस के एक कोने में बैठकर, अभिनव ने अचानक सुरभि से पूछा, "तुम्हारा विवाह कब हो रहा है?"


सुरभि इस प्रश्न से थोड़ा चौंक गई। मजेदार बात यह थी कि दोनों ही एक ही जाति से थे, लेकिन सुरभि एक साधारण परिवार से थी, जबकि अभिनव एक प्रतिष्ठित परिवार से था। सुरभि ने उत्तर दिया, "अभी तो कुछ सोचा नहीं है, पहले दीदी की शादी हो जाए, फिर मेरी होगी।"


अभिनव कुछ और कहने से पहले रुक गया, लेकिन इस मुलाकात ने दोनों के दिलों में एक नाजुक सा रिश्ता पनपा दिया।


फिर भी, दोनों अपनी-अपनी दुनिया में लौट गए। न कोई वादा, न कोई करार, बस एक अनकहा सा जुड़ाव...


कुछ समय बाद, सुरभि के मामा की बेटी की शादी में वह एक और समारोह में शामिल होने गई। वहां, वह अभिनव से फिर से मिली। दोनों एक-दूसरे को देखकर खुश और हैरान थे, लेकिन यह खुशी दोनों के चेहरे पर साफ झलक रही थी।


बंगाली विवाह की रस्मों के बीच, उस रात, सौरभ ने अपने दिल की बात कह दी, "क्या तुम मुझसे शादी करोगी?"


सुरभि थोड़ा झिझकी, फिर बोली, "देखिए, मैं इस बारे में अभी कुछ नहीं कह सकती। आप घर में रिश्ता भेजिए।" और वह शर्माते हुए वहां से चली गई।


रिश्ते की बात चली भी, लेकिन दहेज की मांग के कारण मामला अटक गया। और फिर, दोनों का मिलना बंद हो गया।


फेसबुक पर अभिनव की फ्रेंड रिक्वेस्ट देखकर सुरभि एक बार फिर अतीत की यादों में खो गई थी। उसने रिक्वेस्ट स्वीकार की और मन ही मन मुस्कुराई। एक सुखद आश्चर्य यह था कि अभिनव भी उसी शहर में रह रहा था। एक प्रोग्राम के दौरान, दोनों आमने-सामने आए।


अभिनव को देखकर सुरभि चौंक गई। वह काफी उम्रदराज लग रहा था, आंखों के नीचे काले घेरे साफ दिखाई दे रहे थे। बात भी बहुत कम ही हुई। अभिनव की पत्नी और बच्चे साथ थे, और वह शायद कुछ असहज महसूस कर रहा था।


बहरहाल, उस प्रोग्राम में सुरभि का एक जानने वाला भी था, जिसने जो कुछ अभिनव के बारे में बताया, उसे सुनकर सुरभि हैरान रह गई। "अभिनव दादा अब बहुत पीने लगे हैं, पत्नी और बच्चे की भी नहीं सुनते। उन्होंने गाना भी छोड़ दिया है। कहते हैं, 'सब कुछ है मेरे पास, बस सुकून नहीं है।'"


सुरभि समझ नहीं पा रही थी कि वह कैसे अभिनव को समझाए।


दूसरे दिन उसने अभिनव को फोन किया। औपचारिक बातें करते-करते सुरभि ने कहा, "आप बहुत कमजोर लग रहे हैं, क्या कोई तकलीफ है?"


"नहीं भी और हां भी," अभिनव ने उत्तर दिया।


"क्या तकलीफ है, बता सकते हैं?" सुरभि ने चिंता से पूछा।


"कुछ छूट गया है, सुरभि, पीछे कहीं।"


सुरभि का दिल धड़क उठा। क्या अभिनव अब भी उसे भूला नहीं था?


"आज मन की बात कह लेने दो, सुरभि, प्लीज," अभिनव ने कहा। "मैंने मन ही मन तुम्हें अपनी पत्नी मान लिया था। लेकिन घर के दबाव में आकर मुझे शादी करनी पड़ी। विवाह की रात मैंने सोचा था कि सबकुछ अपनी पत्नी को बता दूंगा, लेकिन तुम्हारे सम्मान के लिए चुप रहा।"


गहरी सांस लेकर अभिनव ने कहा, "मेरी पत्नी पहले से ही गर्भवती थी। मैंने उसके जुड़वा बच्चों को अपना नाम दिया। लेकिन मेरे मन में हमेशा तुम्हारे लिए एक जगह रही, सुरभि।"


सुरभि सन्न रह गई। उसके मन में हजारों सवाल घूम रहे थे, लेकिन वह कुछ नहीं कह पाई। उसने फोन रख दिया और देर तक रोती रही।


अगले दिन, सुरभि के पास एक और फोन आया। "दीदी, अभिनव दादा नहीं रहे। उनके गले में कैंसर था। अंत तक उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा।"


सुरभि, जो अब किसी और की पत्नी थी, समझ नहीं पा रही थी कि वह खुद को क्या समझे। वह कैसे इस धर्मसंकट से निकले? निढाल होती सुरभि, केवल अपने आंसुओं से अभिनव को श्रद्धांजलि दे रही थी।

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...