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Monday, 13 January 2025

थोड़ा उजट किस्म का हो सकता है पुरूष लेकिन औरत को सवाँर देता है पुरुष

 भले ही पुरुष घर मे सामान बिखेर देता हो पर

घर सँवारने के लिये पसीना वो ही बहाता है।

           अपना मोजा भी न ढूँढ पाने वाला पुरुष

अपने बच्चे के मनपसंद खिलौना सारे बाजार में से ढूँढ लाता है।।

             घर के काम मे हाथ न बटा पाये चाहे

मगर घर की नींव वही रखता है।।।

          जिस घर को औरत सजाती है उस घर में पाई-पाई लगा देता है...

          थोड़ा उजट किस्म का हो सकता है पुरूष लेकिन औरत को सवाँर देता है पुरुष।।

            सुबह का जब शाम को घर लौटता है पुरुष, अपने साथ कई दीये उज्वलित कर देता है।

             ब्रिज सा विशाल पुरुष भीतर से शिशु होता है। प्यार, दुलार और मनुहार की अपेक्षा करता है स्त्री से, तो क्या बुरा करता है..!

              लाख नारी शक्ति की बात करें हम । पर हम बखूबी ये जानते है कि औरत पुरुष का ही आधा हिस्सा है। 

हमारी बहस इस सोच से भी खत्म हो सकती है कि अगर हम खुद को अलग-अलग स्थापित करते है तो बिखराव निश्चित है। शिव के अर्धनारी रूप को मन से स्वीकार करना होगा। और यही सत्य है...यही प्रकृति है।

🙏🙏🙏🙏🙏

Monday, 23 December 2024

कम उम्र में सेक्स के लिए मैंने सारी हदे पार कर दी

 जवान उम्र में सेक्स के लिए मेने सारी हदे पार कर दी लेकिन अब विश्वास नहीं होता की में 5 साल पहले की एक बिगड़ैल और गैरजिम्मेदार, सामाजिक परंपराओं को तोड़ने वाली लड़की थी

उस दिन सुबह से ही मौसम खुशगवार था। अंशुल के घर में फूलों की महक थी, और हवा गुनगुना रही थी। अंशुल के मम्मी-पापा कल ही कानपुर से आ गए थे। अंशुल ने उन्हें सब कुछ बता दिया था। उन्हें खुशी थी कि बेटा पांच साल बाद ही सही, ठीक रास्ते पर आ गया था। वरना शादी के नाम से तो वह भड़क जाया करता था।


मम्मी-पापा के सामने शिखा को खड़ा कर अंशुल ने कहा,

"अब आप देख लीजिए। जैसा आप चाहते थे, वैसा ही मैंने किया। आप एक सुंदर, पढ़ी-लिखी और अच्छी बहू अपने बेटे के लिए चाहते थे। क्या शिखा से अच्छी और सुंदर बहू कोई हो सकती है?"


शिखा जैसे ही अंशुल की मम्मी के चरण छूने के लिए झुकी, उन्होंने उसे रोक लिया और गले से लगा लिया। शिखा पहली ही नजर में सबको पसंद आ गई थी।


अंशुल ने मम्मी-पापा को शिखा के अतीत के बारे में बताना जरूरी नहीं समझा। उसने बस इतना कहा कि शिखा एक रिश्तेदार के घर पली-बढ़ी है और अब दिल्ली में नौकरी कर रही है। मम्मी-पापा समझदार थे और शिखा की भावनाओं का सम्मान करते हुए कोई सवाल नहीं किया।


शिखा और अंशुल की शादी बेहद सादगी और परंपरागत तरीके से हुई। ज्यादा तामझाम और दिखावा अंशुल के परिवार को पसंद नहीं था। करीबी रिश्तेदारों और दोस्तों के बीच शादी संपन्न हुई।


शादी के बाद शिखा ने न सिर्फ अंशुल के घर को, बल्कि उसके व्यक्तित्व को भी संवार दिया। अंशुल की मम्मी ने उसे बेटी की तरह घर की जिम्मेदारियां सिखाईं। शिखा ने भी हर बात को खुलकर सीखा। नतीजा यह हुआ कि वह एक समझदार पत्नी, आदर्श बहू और सुलझी हुई गृहिणी बन गई।


अब शिखा को विश्वास नहीं हो रहा था कि कभी वह इतनी विद्रोही और गैरजिम्मेदार लड़की थी। वह अपने अतीत को याद कर सोचती कि बिना शादी के किसी पुरुष के साथ रहना और शादी कर एक परिवार का हिस्सा बनना कितना अलग है।


कॉलेज के दिनों की शिखा


शिखा पढ़ाई में होशियार थी लेकिन अपने विद्रोही स्वभाव के कारण कॉलेज में मशहूर थी। वह हर गतिविधि में भाग लेती, लेकिन उसकी चंचलता के कारण उसकी सच्चाई शायद ही किसी को समझ में आती।


कॉलेज में ही उसकी मुलाकात राघव से हुई, जो यूनियन का अध्यक्ष था। दोनों ने होस्टल छोड़ ममफोर्डगंज में एक कमरा लेकर साथ रहना शुरू कर दिया। यह पूरे शहर के लिए एक चौंकाने वाली बात थी।


परंतु राघव के साथ बिताए गए पांच सालों ने शिखा को जीवन का सबसे बड़ा सबक सिखाया। राघव ने उसे केवल अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया। जब उसका मन भर गया, तो उसने शिखा को छोड़ दिया।


अंशुल की मुलाकात शिखा से


शादी के कई साल बाद, मैट्रो में अंशुल और शिखा की मुलाकात हुई। एक-दूसरे को पहचानते ही उनके चेहरे पर हैरानी और खुशी के भाव आ गए।


बातों का सिलसिला शुरू हुआ। अंशुल ने बताया कि उसने शादी नहीं की क्योंकि वह अपने जीवन को स्थिर करने में व्यस्त था। शिखा ने धीरे-धीरे अपने अतीत की बातें साझा कीं और स्वीकार किया कि उसने अपने फैसलों से बहुत कुछ सीखा है।


नए रिश्ते की शुरुआत


अंशुल और शिखा ने एक-दूसरे के साथ समय बिताना शुरू किया। धीरे-धीरे दोनों के बीच का रिश्ता गहराता गया। शिखा ने अंशुल के साथ अपने जीवन की नई शुरुआत की।


कुछ महीनों बाद, शिखा और अंशुल की शादी हो गई। शिखा ने अंशुल के घर में न सिर्फ अपने लिए जगह बनाई, बल्कि मम्मी-पापा के दिल में भी खास जगह बना ली।


अब, शिखा एक खुशहाल जिंदगी जी रही थी। अंशुल अक्सर मजाक में कहता,

"तुमने मुझे तो पाया, लेकिन मम्मी-पापा को मुझसे छीन लिया!"


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Sunday, 15 December 2024

गरम मसाला सामग्री

 उत्पादों के जहर से बचना चाहते हैं तो घर में बने शुद्ध और ग्रेवी के स्वाद को सौ गुना बढ़ा दे 🌿


गरम मसाला सामग्री


धनिया साबुत 40 ग्राम (5 टेबल स्पून) 

जीरा 20 ग्राम (3 टेबल स्पून) 

काली मिर्च- 25 ग्राम (4 टेबल स्पून)

बड़ी इलायची- 10 ग्राम (2 टेबल स्पून)

शाही जीरा- 20 ग्राम (3 टेबल स्पून)

पियानो- 10 ग्राम या 8 से 10 टुकड़े (1 इंच)

पत्थर का फूल -5 ग्राम (1 टेबल स्पून) 

तेजपत्ते- 5 -6

जयफल- 10 ग्राम (2 टेबल स्पून)

जावित्री- 10 ग्राम (2 टेबल स्पून)

लौंग- 5 ग्राम (1 टेबल स्पून)

छोटी इलायची - 5 ग्राम (1 टेबल स्पून) 

पिपली - 4-5 स्टिक

चक्र फूल - 1 या 2


गरम मसाला बनाने की विधि


🌸एक नॉन स्टिक पैन या आटे में धनिया के बीज को मिलाकर मिश्रण पर ठंडा होने तक मिश्रण और किसी प्लेट में ठंडा होने के लिए रख दीजिये|


🌸अब वापस वही पॉट में जीरा, रॉयल जीरा, काली मिर्च, को अधकचरे प्रभाव पर प्रभाव भूने और ठंडा होने के लिए अन्य प्लेट में रख दें।


🌸अब बाकी बचे सभी पटाखों को फ़्राईट में फ़्राईट गरम कर के टुकड़ों में तोड़ दिया..और ठंडा होने के लिए रख देंगे 

🌸ध्यान रखें कि आटा जले नहीं, उन्हें टुकड़ों में मिला लें तो सभी को निकाल कर ठंडा करके पीसकर जार में डाल दें और मोटा (दरदरा) पीसकर तैयार कर लें |मसालों को एयरटाइट में निकाल लें।


आपका गरम मसाला पाउडर तैयार है। किसी भी सब्जी को पकाते समय आखिरी में गरम मसाला पकाते समय एक मिनट पका लें। स्वाद बढेगा 


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लेखक:सुनिल राठौड़ 

मुझे शतरंज खेलना बहुत पसंद है।"

 एक दिन, एक कंपनी में interview के दौरान, बॉस, जिसका नाम रोहित था, ने सामने बैठी महिला, पूजा से पूछा, "आप इस नौकरी के लिए कितनी तनख्वाह की उम्मीद करती हैं?"


पूजा ने बिना किसी झिझक के आत्मविश्वास से कहा, "कम से कम 90,000 रुपये।"

रोहित ने उसकी ओर देखा और आगे पूछा, "आपको किसी खेल में दिलचस्पी है?"

पूजा ने जवाब दिया, "जी, मुझे शतरंज खेलना बहुत पसंद है।"

रोहित ने मुस्कुराते हुए कहा, "शतरंज बहुत ही दिलचस्प खेल है। चलिए, इस बारे में बात करते हैं। आपको शतरंज का कौन सा मोहरा सबसे ज्यादा पसंद है? या आप किस मोहरे से सबसे अधिक प्रभावित होती है?"

पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा, "वज़ीर।"

रोहित ने उत्सुकता से पूछा, "क्यों? जबकि मुझे लगता है कि घोड़े की चाल सबसे अनोखी होती है।"

पूजा ने गंभीरता से जवाब दिया, "वास्तव में घोड़े की चाल दिलचस्प होती है, लेकिन वज़ीर में वो सभी गुण होते हैं जो बाकी मोहरों में अलग-अलग रूप से पाए जाते हैं। वह कभी मोहरे की तरह एक कदम बढ़ाकर राजा को बचाता है, तो कभी तिरछा चलकर हैरान करता है, और कभी ढाल बनकर राजा की रक्षा करता है।"

रोहित ने उसकी समझ से प्रभावित होते हुए पूछा, "बहुत दिलचस्प! लेकिन राजा के बारे में आपकी क्या राय है?" पूजा 

पूजा ने तुरंत जवाब दिया, "सर, मैं राजा को शतरंज के खेल में सबसे कमजोर मानती हूँ। वह खुद को बचाने के लिए केवल एक ही कदम उठा सकता है, जबकि वज़ीर उसकी हर दिशा से रक्षा कर सकता है।"

रोहित पूजा के जवाब से प्रभावित हुआ और बोला, "बहुत शानदार! बेहतरीन जवाब। अब ये बताइए कि आप खुद को इनमें से किस मोहरे की तरह मानती हैं?"

पूजा ने बिना किसी देर के जवाब दिया, "राजा।"

रोहित थोड़ी हैरानी में पड़ गया और बोला, "लेकिन आपने तो राजा को कमजोर और सीमित बताया है, जो हमेशा वज़ीर की मदद का इंतजार करता है। फिर आप क्यों खुद को राजा मानती हैं?"

पूजा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "जी हाँ, मैं राजा हूँ और मेरा वज़ीर मेरा पति था। वह हमेशा मेरी रक्षा मुझसे बढ़कर प्यार करता था, हर मुश्किल में मेरा साथ देता था, लेकिन अब वह मुझे पूरी तरह से छोड़ चुका है।"


रोहित को यह सुनकर थोड़ा धक्का लगा, और उसने गंभीरता से पूछा, "तो आप यह नौकरी क्यों करना चाहती हैं?"

पूजा की आवाज भर्राई, उसकी आँखें नम हो गईं। उसने गहरी सांस लेते हुए कहा, "क्योंकि मेरा वज़ीर अब इस दुनिया में नहीं रहा। अब मुझे खुद वज़ीर बनकर अपने बच्चों और अपने जीवन की जिम्मेदारी उठानी है।"

यह सुनकर कमरे में एक गहरी खामोशी छा गई। रोहित ने तालियाँ बजाते हुए कहा, "बहुत बढ़िया, पूजा जी। आप एक सशक्त महिला हैं।"...

यह कहानी उन सभी बेटियों के लिए एक प्रेरणा है जो जिंदगी में किसी भी तरह की मुश्किलों का सामना कर सकती हैं। बेटियों को अच्छी शिक्षा और परवरिश देना बेहद जरूरी है, ताकि अगर कभी उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़े, तो वे खुद वज़ीर बनकर अपने और अपने परिवार के लिए एक मजबूत ढाल बन सकें।

किसी विद्वान ने कहा है, "एक बेहतरीन पत्नी वह होती है जो अपने पति की मौजूदगी में एक आदर्श औरत हो, और पति की गैरमौजूदगी में वह मर्द की तरह परिवार का बोझ उठा सके।"

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, अगर आत्मविश्वास और समझदारी हो, तो कोई भी मुश्किल हालात को पार किया जा सकता है।

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दहेज़ के पैसे जुटाना शुरू कर दो।"

 अपनी प्लेट में दो तरह की आइसक्रीम का मज़ा लेती सुनीता ने अपने देवर विनोद को कहा, "क्या देवर जी तीसरी बेटी होने पे कौन पार्टी देता है? अब तो दहेज़ के पैसे जुटाना शुरू कर दो।"


अपनी भाभी के प्लेट को देख हँसते हुए विनोद ने कहा, अरे भाभी ! "आप क्यूँ चिंता करती है घर में ख़ुशी आयी थी तो सबके साथ बाँट लिया और फिर बेटियां तो अपना भाग्य ले कर आती है।"


अपने देवर की बात सुन सुनीता मुस्कुरा के रह गई...जबकि असल में दिल खुशी से झूम रहा था देवर के घर तीसरी बेटी का जन्म जो हुआ था। खुद सुनीता के दो बेटे थे और इस बात का खूब घमंड रखती।


दो तीन दिन में सारे मेहमान चले गए। अब घर पे थे तो विनोद रूचि और तीनों बेटियां मानवी, अंकिता और तीसरी बेटी जिसका नाम सबने प्रीति रखा।


समय अपनी रफ़्तार से चल रहा था बच्चियों एक से बढ़ कर एक थी चाहे पढ़ाई हो या घर में माँ की मदद करना। घर की दीवारें बेटियों की बनायीं खूबसूरत पेंटिंग से सजती और अलमारियां उनके जीते मैडल और ट्रॉफी से, तीनों बेटियों की किलकारी और हँसी से विनोद और रूचि का घर गुलजार रहता।


सुनीता कोई मौका नहीं छोड़ती रूचि को एहसास दिलाने का की वो बेटियों की माँ है।


"देख रूचि चाहे जितने इनाम जीत ले ये लड़कियाँ पर दहेज़ तो फिर भी लगेगा जोड़ना शुरू किया की नहीं।"


रूचि अपनी जेठानी के बातों से जब घबरा जाती तब विनोद समझाता...।


"बेटियां अपना भाग्य ले कर आयी है रूचि, हमें तो बस उन्हें सही राह दिखानी है फिर देखना किसी बेटे वालों से कम सुख हमें नहीं देंगी हमारी ये तीनों बेटियां।"


"जब कोई पूछता क्या विनोद जी कब तक किराये के मकान में रहेंगे अपना घर नहीं बनवाना क्या....."?


"हॅंस कर विनोद कहता जब मेरी बच्चियाँ कुछ बन जायेंगी तो समझो मेरा मकान भी बन जायेगा फिलहाल तो मुझे मेरी बच्चियों का भविष्य बनाना है।"


समय अपनी गति से बढ़ता गया रूचि और विनोद की तपस्या रंग लाई.. मानवी की बैंक में नौकरी लग गई, अंकिता सीए कर जॉब में आ गई और प्रीति इंजीनियरिंग कर दिल्ली में जॉब करने लगी।


"बड़ी मम्मी, कल माँ पापा की एनिवर्सरी की एक छोटी सी पार्टी रखी है आप सब समय से आ जाना।" मानवी ने अपनी बड़ी मम्मी सुनीता को फ़ोन कर पार्टी का इनविटेशन दे दिया।


सारी तैयारियां तीनों बहनों ने बहुत मन से की थी शहर के सबसे अच्छे होटल में पार्टी हॉल बुक था। खाने की मेनू में सारी चीज़े चुन चुन कर तीनों ने रखा था और माँ पापा का गिफ्ट वो तो एक सरप्राइज था सबके लिये...."


पार्टी वाले दिन सुबह सुबह प्रीति भी दिल्ली से आ गई प्रीति के आते ही घर में एक रौनक सी आ गई।


"ये क्या माँ? बालों में कैसी सफेदी सी आ रही है ऐसे जाओगी क्या पार्टी में..।"


प्रीति ने कहा तो रूचि ने हँसते हुए कहा मुझे कौन देखने वाला वहाँ अब तो तुम बच्चों के दिन है। नहीं माँ, अभी चलो पार्लर और प्रीति अपनी माँ को ले पार्लर चली गई। हल्के मेकअप और सुन्दर सी साड़ी में अपनी माँ को सजा संवार दिया प्रीति ने। विनोद के लिये एक शानदार सूट तैयार था। सूट को देख आंखें झलक उठी विनोद की....। शाम होते है सब तैयार हो हॉल की ओर निकल पड़े।


मेहमानों से हॉल भर गया सबकी बधाइयाँ स्वीकार कर रूचि और विनोद ने एक दूसरे को माला पहनाया और केक काट एक दूसरे को खिलाया।


सब विनोद और रूचि के भाग्य को सराह रहे थे सुनीता भी आयी थी पार्टी में अपने पति और दोनों बेटों के साथ। पार्टी की भव्य तैयारी देख सुनीता जलन से भर उठी। आज अहसास हो रहा था की देवर की बेटियां हो कर भी जो सुख ये लड़कियाँ अपने माता पिता को दे रही थी वो उसके लाडलों ने ना कभी दी थी और ना ही कभी देते।


तभी प्रीति ने माइक ले अनाउंस किया.. "" नमस्कार सभी को आप सब हमारे बुलाने पे आये आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया। अब समय है मेरे पापा माँ के गिफ्ट का जो हम तीनों बहनो ने अपने माँ पापा को दिया है लेकिन इसके लिये बाहर लॉन में चले सब।


ये क्या है प्रीति? जब विनोद ने धीरे से प्रीति से पूछा तो हँसते हुए मानवी ने कहा आप बस चले पापा और खुद देख ले.. तीनों बहनें आँखों ही आँखों में इशारे कर हॅंस रही थी। सारे मेहमान कौतुहल से बाहर आये, लॉन में एक चमचमाती नई कार खड़ी थी सारे मेहमान तालियां बजाने लगे, वाह भाई वाह बेटियां हो तो ऐसी।


"पापा अब आपके स्कूटर का मज़ा तो ये नहीं दे सकती पर अब हम सब एक साथ स्कूटर पे बैठ भी तो नहीं सकते इसलिए आज से इसकी सवारी होगी।" सारे मेहमान अंकिता की बात सुन हॅंस पड़े।


रूचि और विनोद के आँखों में खुशी के आंसू थे और सिर गर्व से ऊंचा सब ने खूब बधाई दी और पार्टी का लुत्फ उठाया ।


सुनीता भी गई बधाई देने, 'बधाई हो देवर जी बेटियों ने नई गाड़ी दी और क्या चाहिए।"


"सच कहा भाभी और क्या चाहिए मुझे जब ऐसे बच्चे हो तो। मैंने कहा था ना बेटियां खुद अपना भाग्य बनाती है यहाँ तो इन तीनों ने मेरा भाग्य भी बदल दिया, देखिये तो कैसे मुझे स्कूटर से उठा कार में बिठा दिया।"


अपने देवर की बात सुन सुनीता ने अपने नालायक जवान बेटों को देखा जो आइसक्रीम के मज़े लेने में व्यस्त थे ... आज बेटों की माँ होने का दंभ टूट गया था सुनीता का।


* बेटियां किसी बेटे से कम नहीं होती बस थोड़ा प्यार ओर साथ हो तो बेटियां वो कर जाती है जो कई बेटे वालो के भाग्य में भी नहीं होता।

Friday, 13 December 2024

पैसे और गहने ले लिए ना?

 रात के 12 बज रहे थे। अनुज का फोन आया। फोन पर एक धीमी आवाज में फुसफुसाहट हुई - "हेलो..."

नेहा ने भी धीमे स्वर में जवाब दिया, "हां बोलो..."


अनुज ने पूछा, "सब तैयारी हो गई? सुबह 4 बजे की बस है।"

नेहा ने कहा, "हां, मेरे कपड़े पैक हो गए हैं। बस पैसे और गहने लेना बाकी है।"


अनुज ने फिर कहा, "अपने सारे डॉक्यूमेंट भी ले लेना। नया घर बसाना है, शायद दोनों को काम करना पड़े।"

नेहा ने जवाब दिया, "ठीक है, सब कुछ लेकर तुम्हें कॉल करती हूं।"


इसके बाद नेहा ने माँ की अलमारी खोली। उसमें से गहनों का डिब्बा निकाला और अपने लिए बनवाया गया मंगलसूत्र बैग में रखा। झुमके पहन लिए, और चूड़ियों का डिब्बा बैग में डाल ही रही थी कि माँ की तस्वीर गिर पड़ी। तस्वीर को उठाते हुए उसे याद आया कि माँ ने कितनी मेहनत से ये सब जोड़ा था। माँ की बातें उसे अंदर तक कचोट गईं।


फिर उसने घर के पैसे निकाले। यह वही रकम थी जो पापा, अनिकेत की पढ़ाई के लिए लोन लेकर आए थे। नेहा ने इसे भी बैग में रख लिया। उसके दिल में उलझन थी, लेकिन वह खुद को समझाने की कोशिश कर रही थी।


उसने अनिकेत के कमरे में झांका। अनिकेत पढ़ाई में डूबा हुआ था। माँ नींद की दवा लेकर सो रही थीं। पापा, हमेशा की तरह, वर्किंग टेबल पर बही खाता बना रहे थे। सब अपने काम में व्यस्त थे।


अपने कमरे में जाकर उसने अनुज को फोन लगाया। "सब कुछ तैयार है। घर में कोई जाग नहीं रहा।"

अनुज ने पूछा, "पैसे और गहने ले लिए ना?"

इस बार नेहा को अनुज का यह सवाल चुभा। उसने गुस्से में कहा, "हां ले लिए। लेकिन तुम बार-बार यही क्यों पूछ रहे हो?"


अनुज ने बहलाते हुए कहा, "अरे, नए घर के लिए पैसे तो चाहिए ही ना। मोबाइल भी लेना है। बस तुम फिक्र मत करो।"

नेहा ने एक पल के लिए सोचा और बोली, "सुनो, क्या तुममें इतनी हिम्मत नहीं है कि मेरे लिए कुछ कमा सको?"


अनुज बगलें झांकते हुए बोला, "अरे, ऐसी बात नहीं है। बस शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा।"

नेहा अब चुप हो गई। उसे अनुज की बातों में सच्चाई नहीं दिख रही थी।


थोड़ी देर की खामोशी के बाद उसने कहा, "सुनो, अभी के लिए ये भागने का प्लान कैंसल करते हैं। पहले तुम कुछ कमा कर दिखाओ। जब दो महीने का खर्च इकट्ठा कर सको, तब मुझे बुलाना। नहीं कर पाए, तो मुझे भूल जाना।"

अनुज कुछ बोलने ही वाला था कि नेहा ने फोन काट दिया।


नेहा ने पापा के कमरे का दरवाजा खटखटाया। पापा ने चौंककर पूछा, "क्या हुआ बेटा, अभी तक सोई नहीं?"

नेहा ने कहा, "पापा, मैं नौकरी करना चाहती हूं। जब तक अनिकेत की पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती, मुझे घर का हाथ बंटाने दीजिए।"

पापा ने स्नेह से नेहा के सिर पर हाथ फेरा। उनकी आंखों में गर्व था।

नेहा मन ही मन सोच रही थी कि भगवान ने उसे सही वक्त पर संभाल लिया। "थैंक यू गॉड, आपने मुझे एक बड़ी गलती करने से बचा लिया।"

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लेखक: सुनिल राठौड़ 

Monday, 9 December 2024

जवानी में क्यों हर लड़की की चाहत होती है

 जवानी में क्यों हर लड़की की चाहत होती है, इसमें कोई भी शामिल नहीं है कि ये शारीरिक ज़रूरत के साथ मानसिक ज़रूरत भी है जिसे आप किसी से प्यार करते हैं। तो उसके साथ अपने प्यार को अनंत सीमा तक ले जाने की दवा है सेक्स 

एक साधारण सी लड़की, जिसे कॉलेज में देखकर अपने सपनों की दुनिया मिल गई। वह वक्त मेरी जिंदगी में बेहद प्रभावशाली लग रहा था। पढ़ाई, दोस्त, और सबसे साहसी राहुल। राहुल...वो नाम नहीं, मेरी दुनिया थी।


पहली बार उन्हें पायल में देखा तो लगा, जैसे किसी फिल्म का हीरो हो। दोस्त से भरा, मुस्कुराता हुआ चेहरा और हर किसी की मदद का हाथ बढ़ाने वाला। पता नहीं कब और कैसे, हमारी दोस्ती प्यार में बदल गई। राहुल के साथ हर पल एक जादू जैसा लगता था। वह मेरी हर छोटी-बड़ी बात कहता है, मेरे सपने को सुनता है, और उन्हें पूरा करने का वादा करता है।


कॉलेज की लाइब्रेरी में एक साथ पढ़ना, कैंटीन में चाय के कप शेयर करना, और क्लास के बाद चौदह बातें करना—हमारी जिंदगी बस दोस्ती खुशियों से भरी थी। राहुल ने माय से कहा, "सीमा, चांदनी शादी करके ही मेरा सपना पूरा होगा। हम साथ रहेंगे, हमेशा के लिए।" मैं भी उनकी हर बात पर विश्वास रखता था।


हमारा रिश्ता इतना गहरा हो गया कि हमने अपने प्यार को हर सरहद पार कर लिया। पहली बार जब राहुल ने मुझसे करीब आकर कहा, तो मुझे थोड़ा डर लगा, लेकिन उनके बयान ने मुझे हर डर से दूर कर दिया। मुझे लगता है, राहुल तो मेरा ही है, फिर यह डर कैसा? मैंने उसे अपना राजसी राजसी दिया, अपनी आत्मा, अपना शरीर, अपना विश्वास।


लेकिन हर बार जब मैं डरता हूं कि कहीं कुछ गलत न हो जाए, राहुल मुझे समझाता है। उन्होंने ही कहा था। मैं उसकी बात सहयोगी रही। ये छोटी-छोटी गोलियां मुझे असुरक्षा से बचाती रहीं, या शायद मैं यही बनी थी।


कॉलेज खत्म हो गया और मेरे दोस्तों को हमारे साथी की खबर मिल गई। मैंने सोचा था, जैसे फिल्मों में होता है, राहुल सब ठीक कर लेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मेरे परिवार ने उन्हें लॉरी से ज़मानत दे दी। दूसरी वह जाति का था, और मेरे साथियों के लिए यह संबंध नामुम्किन था।


मैंने बहुत लड़ाई की, रोई, गिड़गिड़ाई, लेकिन मेरे माता-पिता ने मेरी एक न सुनी। और आख़िरकार, मैंने हार मान ली। राहुल से दूर जाना मेरे लिए सबसे बड़ा दर्द था। मेरी शादी अजय से तय हो गई। अजय अच्छा इंसान था, लेकिन राहुल जैसा नहीं।


शादी के बाद मैंने खुद को नई जिंदगी में ढालने की कोशिश की। अजय मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार करता था। वह मेरी हर ज़रूरत का असली मतलब है, लेकिन मेरे दिल में राहुल की यादें अब भी ताज़ा हैं। मैंने खुद से वादा किया कि मुझे इस अवसर का एक मौका मिला।


शादी के कुछ महीने बाद जब मैं इस बात से अनजान हो गया तो अजय ने डॉक्टर से मिलकर फैसला किया। मुझे चिंता हो गई थी, लेकिन उम्मीद थी कि सब ठीक हो जाएगा। डॉक्टर ने जब मेरी नैतिकता देखी, तो उनका चेहरा गंभीर हो गया।


उन्होंने कहा, "आपकी प्रजनन क्षमता खत्म हो गई है। बार-बार क्वांटम कॉन्ट्रासेप्टिव का इस्तेमाल आपकी सेहत पर भारी पड़ गया है।" मेरी दुनिया वहीं थी। मैंने अजय को सच बताया-राहुल के साथ मेरा रिश्ता, मेरी ग़लतियाँ।


अजय ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके चेहरे की स्याही ब्यां कर रही थी। वह अवलोकन करता है, जैसे मैं कोई अजनबी हूं। उसने मुझे न अपनाता, न ही छोड़ा। हमारा रिश्ता अब सिर्फ एक समझौता बनकर रह गया है।


आज जब मैं अपने कमरे में बैठा था, तो सोच रहा था कि अगर मैंने उस समय राहुल के प्यार में अपने भविष्य के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाई, तो शायद आज मेरी जिंदगी अलग होगी।

राहुल का प्यार सच्चा था या नहीं, ये मुझे आज तक समझ नहीं आया। लेकिन मैंने जो सपना देखा था, वे राजनीतिक रह गए। मेरा आरज़ू अधूरा रह गया।

अगर आप मेरी कहानी पढ़ रहे हैं, तो एक गुज़ारिश है—प्यार की गहराई में जाने से पहले अपना भविष्य पहचानो और मत भूलिए। हमें कई सारी मशीनें मिलती हैं, लेकिन हर मौका एक नई ज़िम्मेदारी भी देता है।

रिश्ते टूटते नहीं। बस रिश्ते दिल से होना चाहिए

 कोर्ट में पेपर पर आखिरी साइन होते ही वकील मुस्कुराया और बोला, “लो मैडम, अब आपका डिवोर्स हो गया है। कोर्ट ने आपको 10 लाख रुपये हर्जाने के तौ...