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Sunday, 8 September 2024

ये सब बिटिया की ज़िंदगी में बहुत काम आएगा

 जवान होती लड़की पर सभी की नजर होती है। परिवार के जितने भी रिश्तेदार थे, वे अक्सर पापा से कहते थे, "बिटिया बड़ी हो रही है, शादी के लिए लड़का देखना शुरू करो।" कभी दादी कहती थीं, "बिटिया बड़ी हो रही है, अब अच्छा लड़का देखना चाहिए।" पिताजी हां तो कर देते, पर ध्यान नहीं देते थे। 🤔


धीरे-धीरे मैंने इंटर पास कर लिया और ग्रेजुएशन शुरू कर दिया। अब मैं बाहर शहर में रहने लगी। घर में रिश्तेदारों की वही बातचीत चलती रहती थी, "बिटिया बड़ी हो गई है, क्यों नहीं देख रहे हो लड़का?" 🏠


समय गुजरता गया और पापा और भैया बस सुनते रहे, पर कोई कदम नहीं उठाया। धीरे-धीरे ग्रेजुएशन फाइनल ईयर आ गया और मैं 20 साल की हो गई थी। 🎓 मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन मैंने अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहा। इसलिए मैंने ऑप्टोमेट्री में एडमिशन ले लिया और कंप्यूटर भी सीखने लगी। 💻📚


कुछ महीनों बाद, एक दिन मैंने पापा को मेरे लिए लड़के के बारे में बात करते हुए सुना। तब मैंने उनसे पूछा, "अब आप लड़का क्यों पूछ रहे हैं? जब पहले इतने रिश्ते आए थे, तब आपने किसी को नहीं देखा। अब आप क्यों पूछ रहे हो, ये समझ में नहीं आ रहा।" 😕 


पापा ने जो जवाब दिया, वह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था। उन्होंने कहा, "तब तुम इंटर कर रही थी, तुम इतनी मजबूत नहीं थी। अगर तुम्हें उस समय किसी मुश्किल का सामना करना पड़ता, तो शायद तुम सही फैसला नहीं ले पातीं। मैंने तुम्हें ग्रेजुएशन तक इसीलिए रोका, ताकि तुम और मजबूत हो सको। अब जब तुम ऑप्टोमेट्री कर रही हो, तो मुझे यकीन है कि मेरी बेटी अपने पैरों पर खड़ी हो सकेगी, अगर उसे जीवन में कभी आर्थिक मजबूती की जरूरत पड़ी।" 🥺❤️


उन्होंने आगे कहा, "मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटी सिर्फ रिश्ते में बंधे नहीं, बल्कि रिश्ते को प्यार से संजोए। और अगर जीवन में कभी अकेली पड़ जाए, तो वह स्वाभिमान से अपना जीवन जी सके।" 🌸


पापा की ये बातें उस वक्त तो मुझे पूरी तरह समझ में नहीं आई थीं, पर आज जब मैं सोचती हूँ, तो उनकी बातों का गहरा मतलब समझ आता है। सच में, बेटियों की महंगी शादी भले न करो, पर उन्हें काबिलियत ज़रूर दो। 💪


कभी उनकी पढ़ाई ससुराल वालों के भरोसे मत छोड़ना, खुद पढ़ाना और फिर ही शादी करना। नौकरी करना जरूरी नहीं है, पर उन्हें इतना काबिल बनाना कि वे बुरे वक्त में अपने हुनर का उपयोग कर सकें और किसी के सामने हाथ फैलाने की मजबूरी न हो। 🙏


बहुत सी बेटियां आज भी ना चाहते हुए अपने भविष्य को लेकर बुरे ससुराल में इसलिए अटकी रहती हैं क्योंकि वे आगे क्या करेंगी, ये नहीं जानतीं। या पति के ना होने पर लाचार हो जाती हैं और अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में संघर्ष करती हैं। 😔


बेटियों को शादी के लिए नहीं, बल्कि उन्हें मजबूत बनाने के लिए शिक्षा और हुनर जरूर सिखाएं। हां, सही समय पर शादी करना जरूरी है, पर उससे पहले बेटी को इतना सक्षम बनाएं कि वह किसी भी मुश्किल घड़ी में खुद को संभाल सके। 🌟💖


बेटियों को कोई हुनर ज़रूर सिखाएं ताकि जीवन में अगर कोई मुश्किल आए तो वे डटकर सामना कर सकें, किसी पर निर्भर न रहें। सभी माता-पिता धनवान नहीं होते, इसलिए संस्कार, इज्जत और घर के कामकाज के साथ-साथ हुनर भी सिखाएं। ✨


ये सब बिटिया की ज़िंदगी में बहुत काम आएगा। दोस्तों, पोस्ट अच्छी लगी हो तो लाइक, फॉलो, कमेंट और शेयर ज़रूर करें। 🙏🙏

"मैं, साक्षी। दरवाजा खोलो

 "कौन है?" दरवाजे पर कई बार दस्तक देने के बाद अंदर से धीमी सी आवाज आई, पर दरवाजा अब भी नहीं खुला था। खिड़की से हल्का सा पर्दा हिला, जैसे किसी ने झाँका हो।


"मैं, साक्षी। दरवाजा खोलो," साक्षी बोली, "कब से दरवाजा खटखटा रही हूँ।"


"सॉरी," श्रुति ने नींद से जागकर उबासी लेते हुए कहा, "तू कहीं और कमरा ढूंढ ले।"


"कमरा ढूंढ लूं?" साक्षी ने हैरानी से श्रुति की ओर देखा, "कमरा तुझे ढूंढना है, मुझे क्यों?"


"अब मुझे नहीं, तुझे कमरा तलाशना है," श्रुति ने ठंडे स्वर में कहा।


"क्यों?" साक्षी ने चौंकते हुए पूछा।


"क्योंकि मैंने और आदित्य ने शादी कर ली है," श्रुति ने अपनी उंगलियों से सिंदूर को हल्के से छूते हुए कहा।


"क्या?" साक्षी का चेहरा हतप्रभ हो गया। उसने श्रुति के माथे की बिंदी और मांग में भरा सिंदूर देखा। ये सब उसके नए जीवन की पुष्टि कर रहे थे।


"अब पतिपत्नी के बीच तेरा क्या काम?" श्रुति ने हल्की मुस्कान के साथ कहा और खिड़की का पर्दा पूरी तरह से बंद कर लिया।


साक्षी दरवाजे के बाहर खड़ी-खड़ी कभी खिड़की को देखती, तो कभी दरवाजे को। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसका इतना करीबी दोस्त, जिसे वह अपना समझती थी, अब किसी और का हो चुका था। उसका मन अतीत की यादों में खोने लगा, जहाँ आदित्य और उसकी कहानी ने शुरुआत की थी।


साक्षी और आदित्य ने एक साथ दिल्ली के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की थी। दोनों ने साथ पढ़ाई की, साथ प्लेसमेंट्स के लिए तैयारी की, और आखिरकार दोनों की नौकरी मुंबई की एक बड़ी कंपनी में लग गई। मुंबई में नए जीवन की शुरुआत करते हुए उन्होंने साथ रहने का निर्णय लिया और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगे। वे एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए थे।


एक रात, जब आदित्य ने साक्षी का हाथ पकड़ते हुए उसकी ओर खींचा, तो साक्षी चौंकते हुए बोली, "क्या कर रहे हो आदित्य?"


"प्यार... तुम्हारे बिना नहीं रह सकता," आदित्य ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा।


"नहीं, अभी नहीं। हम शादीशुदा नहीं हैं," साक्षी ने थोड़ा झिझकते हुए कहा।


"क्या शादी से पहले प्यार करना गलत है?" आदित्य ने सवाल किया।


"हमारे संस्कार यही कहते हैं," साक्षी ने समझाने की कोशिश की। "हम शादी के बाद ही यह सब करेंगे।"


"शादी की ज़रूरत ही क्या है? हम दोनों साथ हैं, यही काफी नहीं है?" आदित्य ने तर्क दिया। "शादी बस एक औपचारिकता है।"


साक्षी को आदित्य पर पूरा विश्वास था, और आदित्य ने अपने प्यार का यकीन दिलाकर उसे भी इस रिश्ते में खींच लिया। साक्षी ने धीरे-धीरे खुद को आदित्य के हवाले कर दिया। शुरू में उसे थोड़ी हिचक थी, लेकिन बाद में वह भी इस रिश्ते में डूब गई। उसे आदित्य के प्यार पर पूरा भरोसा था। वह मानने लगी थी कि शादी का बंधन सिर्फ एक औपचारिकता है। वह आदित्य से कभी शादी की बात भी नहीं करती, क्योंकि उसे यकीन था कि आदित्य हमेशा उसका रहेगा।


लेकिन जब श्रुति उनकी जिंदगी में आई, तो सबकुछ बदल गया।


श्रुति हाल ही में उनकी कंपनी में जॉइन हुई थी। वह दिल्ली की थी और मुंबई में उसका कोई जान-पहचान वाला नहीं था। जब तक उसे कोई जगह नहीं मिल जाती, आदित्य और साक्षी ने उसे अपने साथ रहने का ऑफर दिया। साक्षी को तब तक अंदाजा भी नहीं था कि उसकी जिंदगी में तूफान आने वाला है।


श्रुति बेहद खूबसूरत और आत्मविश्वास से भरी हुई लड़की थी। आदित्य धीरे-धीरे उसकी तरफ आकर्षित होने लगा। श्रुति की हाजिरजवाबी और उसकी शरारतों ने आदित्य को उस पर मोहित कर दिया। आदित्य, जो साक्षी को दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की मानता था, अब श्रुति के इर्द-गिर्द मंडराने लगा।


साक्षी ने कई बार आदित्य को चेताया, लेकिन उसने उसकी बातों को अनसुना कर दिया। धीरे-धीरे साक्षी को लगने लगा कि अगर उसने आदित्य को शादी के बंधन में नहीं बाँधा, तो वह उसे खो देगी। उसने इस बारे में अपनी माँ से बात करने का निर्णय लिया और छुट्टी लेकर दिल्ली चली गई। उसने माँ से अपने और आदित्य के रिश्ते की पूरी कहानी बताई। उसकी माँ ने उसे डांटते हुए कहा, "देर मत कर, जाकर उससे शादी कर ले।"


साक्षी जल्दी-जल्दी वापस मुंबई आई, ताकि आदित्य से शादी की बात कर सके। लेकिन जब वह वापस आई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आदित्य और श्रुति ने उससे पहले ही शादी कर ली थी।


साक्षी, जिसने आदित्य पर पूरी तरह विश्वास किया था, अब ठगी सी महसूस कर रही थी। उसने अपने प्यार, अपने विश्वास और अपनी भावनाओं को पूरी तरह आदित्य के नाम कर दिया था। लेकिन इस सबके बावजूद वह उसे अपना नहीं बना सकी।


अब वह दरवाजे के बाहर खड़ी थी, और उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके जीवन का यह मोड़ उसे कहाँ लेकर जाएगा। उसने अपनी पूरी दुनिया आदित्य के नाम कर दी थी, और अब वही दुनिया उसके सामने ढह रही थी।


साक्षी के दिल में एक अजीब सी खालीपन था, लेकिन उसने खुद को कमजोर नहीं होने दिया। वह जानती थी कि अब उसे अपने जीवन की दिशा खुद तय करनी होगी।

Friday, 6 September 2024

, मुझे 10 किलो बादाम दे दी मौज करो, रोज करो, नहीं मिले तो ख़ोज करो।जिए।

 किराने की एक दुकान में एक ग्राहक आया और दुकानदार से बोला - भइया, मुझे 10 किलो बादाम दे दीजिए। 

 दुकानदार 10 किलो तौलने लगा।

 तभी एक कीमती कार उसकी दुकान के सामने रुकी और उससे उतर कर एक सूटेड बूटेड आदमी दुकान पर आया,और बोला - भाई 1 किलो बादाम तौल दीजिये।


दुकानदार ने पहले ग्राहक को 10 किलो बादाम दी,,फिर दूसरे ग्राहक को 1 किलो दी..।


जब 10 किलो वाला ग्राहक चला गया तब कार सवार ग्राहक ने कौतूहलवश दुकानदार से पूछा - ये जो ग्राहक अभी गये है यह कोई बड़े आदमी है या इनके घर में कोई कार्यक्रम है क्योंकि ये 10 किलो लेकर गए हैं।


दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा - अरे नहीं भइया, ये एक सरकारी विभाग में चपरासी हैं लेकिन पिछले साल जब से इन्होंने एक विधवा से शादी की है जिसका पति लाखों रुपये उसके लिए छोड़ गया था, तब से उसी के पैसे को खर्च कर रहे हैं.. ये महाशय 10 किलो हर माह ले जाते हैं। "


इतना सुनकर दूसरे ग्राहक ने भी 1 की बजाय 10 किलो बादाम ले ली ।


10 किलो बादाम लेकर जब घर पहुँचे तो उसकी बीवी चौंक कर बोली - ये किसी और का सामान उठा लाये क्या? 10 किलो की क्या जरूरत अपने घर में..?


भैया जी ने उत्तर दिया - पगली मेरे मरने के बाद कोई चपरासी मेरे ही पैसे से 10 किलो बादाम खाए.. तो जीते जी, मैं क्यों 1 किलो खाऊं..।"


निष्कर्ष: अपनी कमाई को बैंक में जमा करते रहने के बजाय अपने ऊपर भी खर्च करते रहना चाहिए। क्या पता आपके बाद आपकी गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग ही हो।


आनंद लीजिए जीवन के हर पल का


मौज करो, रोज करो, नहीं मिले तो ख़ोज करो।


😀😃😄😁😆😅😂🤣😀

फॉलो करने के चक्कर में अपनी अस्मिता को दांव पर लगा देती हैं

 मेरी एक दोस्त थी, जिसका नाम नेहा था। नेहा को सोशल मीडिया पर रील्स बनाने का बहुत शौक था और वह हर नए ट्रेंड को फॉलो करने में माहिर थी। एक नया ट्रेंड चल पड़ा था, जिसे #GRWM यानी "गेट रेडी विद मी" के नाम से जाना जाता था। पहले तो इसमें लड़कियां सिर्फ सज-धज कर दिखाती थीं—काजल लगाना, झुमके पहनना, बाल सेट करना—ये सब चीजें दिखाई जाती थीं।


लेकिन जैसे-जैसे ये ट्रेंड पुराना होने लगा, लोग इससे एक कदम आगे बढ़ गए। अब लड़कियां मेकअप करने से पहले अपने कपड़े पहनने की पूरी प्रक्रिया दिखाने लगीं। बाथरूम से निकलकर, सिर्फ अंडरगार्मेंट्स में वीडियो बनाना, फिर धीरे-धीरे पूरी ड्रेस पहनना... और इस तरह की वीडियो अचानक वायरल होने लगीं।


नेहा ने भी यही किया। एक दिन उसने बाथरूम से टॉवल लपेटकर बाहर निकली और अपने कमरे में कैमरा ऑन करके वीडियो बनानी शुरू कर दी। उसने ब्रा और पैंटी पहनी, फिर झुमके, काजल और अपनी कुर्ती डाली। नेहा ने इस वीडियो को पोस्ट किया और कुछ ही घंटों में उसका वीडियो वायरल हो गया। उसे लाखों व्यूज़ मिले, और वह बहुत खुश थी कि उसकी पहली ही वीडियो पर इतना अच्छा रिस्पॉन्स आया।


कुछ ही हफ्तों बाद, नेहा का एक इंटरव्यू था। जब वह इंटरव्यू देने पहुंची, तो इंटरव्यूअर ने उसे पहचान लिया। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं आपकी रील्स का बड़ा फैन हूँ। आपके वीडियो वाकई शानदार हैं!" नेहा को नौकरी तो मिल गई, लेकिन कुछ दिनों बाद उसके मैनेजर का व्यवहार बदलने लगा। वह आते-जाते उसे छूने की कोशिश करता, जिससे नेहा असहज हो जाती।


एक दिन उसने खुलकर नेहा से कहा, "तुम मुझे बहुत पसंद हो, कल मेरे फ्लैट पर आओ, साथ में लंच करेंगे और थोड़ा मज़ा भी करेंगे।" नेहा ने साफ मना कर दिया। मगर कुछ दिनों बाद वह फिर से उसे कहने लगा, "चलो, अब तो फ्लैट पर चलते हैं।" नेहा ने फिर से इंकार कर दिया। इस पर मैनेजर हंसते हुए बोला, "प्राइवेट में कपड़े उतारने में शर्म आती है, लेकिन ऑनलाइन पूरी दुनिया के सामने नंगा होना तुम्हें मंजूर है!"


धीरे-धीरे यह बात ऑफिस में फैल गई कि नेहा सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो बनाती है। उसके सामने लोग तारीफ करते, लेकिन पीठ पीछे उसे 'वैश्य' कहकर बुलाने लगे। कुछ लोग यह भी कहने लगे कि उसकी नौकरी बस एक बहाना है, असली काम तो लोगों के साथ पैसे लेकर सोना है।


इस सब से आहत होकर नेहा ने अपनी वीडियो डिलीट कर दी और नौकरी छोड़ दी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसकी वीडियो कई अन्य अकाउंट्स पर वायरल हो चुकी थी। वह जहां से वीडियो डिलीट करने की कोशिश करती, वहीं से नए अकाउंट्स पर वीडियो अपलोड हो जाती।


नेहा की इस एक रील ने उसकी जिंदगी को बर्बाद कर दिया। उसे एक सोशल मीडिया वीडियो बनाने की भारी कीमत चुकानी पड़ी—अपनी इज्जत और आत्म-सम्मान खोकर।


यह कहानी नेहा की ही नहीं, बल्कि उन कई लड़कियों की है जो सोशल मीडिया पर ट्रेंड फॉलो करने के चक्कर में अपनी अस्मिता को दांव पर लगा देती हैं। उन्हें यह समझने की जरूरत है कि जो मॉडल्स और एक्ट्रेसेस ऐसे वीडियो बनाती हैं, उन्हें इसके लिए पैसे मिलते हैं और यह उनका काम है। लेकिन आम लड़कियां, जो सिर्फ व्यूज़ पाने की चाहत में ऐसा करती हैं, अपनी इज्जत खो बैठती हैं।


इसलिए, ट्रेंड को आंख मूंदकर फॉलो करने से पहले सोचिए कि कहीं आप भी नेहा की तरह अपने सम्मान को खोने की राह पर तो नहीं हैं।

Thursday, 5 September 2024

जिसमें प्यार का अंत बिछड़ने से हुआ..

 प्रिये..

बहुत वक्त हो गए तुमसे बिछड़े, पर अब न तुम याद आतीं हो न ही तुम्हारी सूरत, बस याद आती हैं तुम्हारे साथ बिताए वो पल, जिसकी यादों में मैं बेजुबान सा हो जाता हूँ..


नाम नहीं लिखूंगा तुम्हारा क्योंकि ये ना मैं जरूरी समझता हूं और न ही तुम्हें कोई नाम देने की जरूरत कभी महसूस हुई मुझे..

तुम्हारे बगैर शामें सिंदूरी रंग से सरोबार हो कर भी फीकी सी लगती हैं ,अब मुझे उतनी ही फीकी जितनी फीकी होती है तुम्हारी मुस्कुराहट मुझे दर्द में देखकर..


उतनी ही फीकी जितनी फीकी चाय नापसन्द है मुझे

उतनी फीकी जितना फीका पड़ जाता है मेरे चेहरे का रंग तुम्हें उदास देखकर..

इन दिनों ना जाने कहाँ गुम रहता हूँ बस आधी तुममे उलझा तो कुछ हिस्सा किताबो में उलझी किसी और ही दुनिया का गणित लगाता रहता हूँ..


बाल संवारने का ना अब वक्त मिलता है ना जरूरत महसूस होती है तुम्हारी आँखो में अपना दर्पण जो तलाश लिया था मैंने तबसे घर भर के आईनो से बैर बंध गया है मेरा..

तुम्हारे बगैर ये शामें बोझिल लगती हैं और सुबह की उदास शुरुआत..


हर दिन अनमने मन से क्षितिज तकता हूँ और दिनभर का हिसाब डायरी में लिख निश्चिंत होने की कोशिश करता हूँ..

पर तुम तो जानती हो ना मेरा सुकूँ किसमे हैं

मेरी उंगलियों पर रहते हैं इंतज़ार के दिन हमारी मुलाकातों की तारीखें मुझे मुँह जबानी याद हैं..


तुम्हारा ये फ़ितूर दिन पर दिन सर चढ़ता जा रहा है और तुम्हारी अनुपस्थिति से एक वैराग पलने लगा है मुझमे..

मैं बेमन ही लिखने बैठा था और इतना कुछ लिख गया मैं जब तुम्हें लिखने बैठता हूँ तो ना जाने क्यों वक्त कम पड़ जाते हैं मेरी पिछली डायरियां तुम्हारे खतों से अटी पड़ी हैं जिन्हें मैं कभी तुम्हें नहीं सौंपना चाहता..


ना जाने क्यों तुम्हारे हक़ की हर चीज़ तुमसे दूर रखता हूँ इसका जवाब तुम हो बेहतर जानती हो... खत लिखना नापसन्द है मुझे फिर आज ना जाने क्यों अचानक लिखने बैठ गया हूँ ..


यही खत्म करता हूँ तुम्हारी यादें जो बरसों से चलीं आ रहीं हैं और ये कभी-कभी भावावेश में इतना हावी हो जाता है मुझपर की मैं सम्पूर्ण ग्रन्थ लिखने लगता हूँ

तो बस यही विराम देता हूँ..


वरना ख़ामख़ा नाराज़गी का पात्र बन जाऊंगा

ये अधूरा सा खत एक पूरे इंसान के लिए 

जो दुनिया है मेरी..


पर वक्त और लोगों ने इस कदर फसाया हमें की न हम तुम्हारे हो सकें और न तुम हमारें, और हम दोनो अलग हो गए 

अब शायद बात या मुलाकात हो या न हो पर तुम्हारें साथ बिताए पल हमें, फिर से मिला जाता हैं..


तुम जहाँ भी रहो हमेशा खुश रहना

कही पढ़ा हैं ,जिसमें प्यार का अंत बिछड़ने से हुआ..❤️🥀

एक-दूसरे की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना और एक-दूसरे के बिना अधूरा महसूस करना।

 मेरी शादी के कुछ समय बाद मेरी पत्नी, नेहा, अपने मायके आगरा चली गईं। उस वक्त वह मायके में अपने परिवार के साथ कुछ दिन बिताने गई थीं, और उनके जाते ही मेरे लिए घर जैसे वीरान हो गया। एक-एक पल काटना मुश्किल होने लगा। शादी के बाद से नेहा के बिना रहना पहली बार हो रहा था, और हर कोने में उसकी कमी महसूस हो रही थी।


मेरे माता-पिता गांव में रहते थे, और मेरी नौकरी के कारण मुझे शहर में रहना पड़ता था। नेहा के जाते ही मेरा मन कहीं भी नहीं लग रहा था। हर तरफ एक सन्नाटा छा गया था, और मैं अकेलेपन में घिर गया था। काम से आकर जब भी घर आता, घर की दीवारें जैसे मुझसे बात करने लगतीं, पर नेहा के बिना वे बातें अधूरी लगतीं।


आखिरकार, एक हफ्ते का वक्त तो जैसे-तैसे गुजर गया। फिर मैंने सोचा, अब और नहीं सहा जा सकता। नेहा के बिना घर में रहना मुश्किल हो रहा था। मैंने अपने ऑफिस से अचानक छुट्टी ली और आगरा के लिए रवाना हो गया।


उस जमाने में मोबाइल फोन नहीं थे, सिर्फ चिट्ठियों का ही सहारा था। हम एक-दूसरे से चिट्ठियों के जरिए ही बात किया करते थे। मेरी चिट्ठियों में अक्सर थोड़ा-बहुत साहित्यिक रंग होता था, कभी कुछ शेरो-शायरी होती तो कभी कुछ हल्के-फुल्के मजाक। नेहा को मेरी चिट्ठियां बेहद पसंद आती थीं, और उसने आज भी उन चिट्ठियों को सहेज कर रखा है।


जब मैं अचानक बिना किसी सूचना के ससुराल पहुंचा, तो मेरी सास, शोभा आंटी, मुझे देखकर थोड़ी चौंकीं। उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आई, लेकिन वह मुस्कान जैसे थोड़ी उलाहना भरी थी। उन्होंने मेरा स्वागत किया और तुरंत ही कहा, "अरे, आप तो पंद्रह दिन बाद आने वाले थे, इतनी जल्दी कैसे आ गए?"


मैं अंदर से हंस रहा था, लेकिन उन्हें यह कैसे बताता कि मेरा तो एक-एक दिन काटना भारी पड़ रहा था। उनके इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं था, तो मैं चुप रहा। शायद उन्होंने मेरी चुप्पी को ठीक से समझा नहीं, और वह कहने लगीं, "मैं अभी सुधा को नहीं भेजने वाली। आप सात दिन बाद आइए और तब लेकर जाइए।"


नेहा वहीं बैठी हुई थी, और हमारी नजरें मिलते ही मैं समझ गया कि वह भी मेरे साथ वापस जाना चाहती थी। लेकिन अब सवाल यह था कि सासू मां को कैसे मनाया जाए। मेरी आदत है कि जब भी मुश्किल वक्त आता है, मैं जल्दी से कोई न कोई बहाना बना लेता हूँ। उस दिन भी ऐसा ही कुछ हुआ।


मैंने सासू मां से कहा, "मम्मी, खाना कौन बनाएगा? आपके बिना घर में खाना बनाना भी नहीं हो पाता। पिछले कुछ दिनों से मैं बस एक वक्त का खाना खा रहा हूँ, वो भी मुश्किल से। वैसे सात-आठ दिन और भूखे रह लूंगा, कोई बात नहीं।"


मैंने अपने चेहरे पर पूरी मासूमियत ला दी, और शायद मेरी मासूमियत काम कर गई। सासू मां के चेहरे पर चिंता उभर आई। कौन सी सास अपने दामाद को भूखा रहने देना चाहेगी? तुरंत ही उन्होंने फरमान जारी कर दिया, "ठीक है, इस बार मैं भेज रही हूँ, लेकिन अगली बार जब सुधा मायके आएगी, तो एक महीने के लिए छोड़ना होगा। समझे?"


मैंने मन ही मन सोचा, 'मरता क्या न करता!' मैंने भी सोचा, "अभी तो अपनी बात बनाओ, आगे की आगे देखी जाएगी।" हमने उनकी बात मान ली और नेहा को लेकर खुशी-खुशी घर लौट आए।


नेहा को घर लौटकर बहुत खुशी हुई। जैसे मुझे उसकी कमी महसूस हो रही थी, वैसे ही वह भी मेरे बिना रह नहीं पा रही थी। अब मुझे यह समझ में आया कि उसकी भावनाएं भी मेरी ही तरह थीं।


कुछ महीने बीते और एक बार फिर से नेहा को उसके मायके भेजने का वक्त आ गया। इस बार साले साहब सुधा को लेने आए, और उनके साथ सासू मां का फरमान भी था—नेहा को इस बार पूरे एक महीने तक मायके में रहना था। हमने भी हंसते हुए हामी भर दी। इस बार नेहा अपने साथ ढेर सारे कपड़े लेकर गई, क्योंकि उसे पता था कि लंबा रुकना पड़ेगा। तब तक हमारा बेटा आर्यन भी हो गया था, और अब नेहा के बिना घर में रहना और भी मुश्किल लगने लगा था। लेकिन "जो वादा किया, वो निभाना पड़ेगा" की तर्ज पर मैंने खुद को संभाला और एक महीने के लिए तैयार हो गया।


लेकिन मुश्किल तो तब शुरू हुई जब आठ-दस दिन बीते ही थे कि नेहा की चिट्ठी आ गई। उसमें लिखा था, "तुम्हारे बिना एक-एक दिन काटे नहीं कटता। आकर ले जाओ ना।"


बस, अब और रुकना मुमकिन नहीं था। जैसे ही चिट्ठी मिली, मैंने फौरन अपनी पैकिंग की और आगरा पहुंच गया।


इस बार जब सासू मां ने मुझे अचानक दरवाजे पर देखा, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने मुझे देखते ही कहा, "आपने तो एक महीने का वादा किया था! इतनी जल्दी कैसे आ गए?"


मैं चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा, और नेहा कमरे के कोने में बैठी मुस्कुरा रही थी। मुझे लग रहा था जैसे उसने मुझे इस स्थिति में फंसा दिया है और अब मज़े ले रही है। लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। फिर भी, जब सासू मां ने गुस्से में अपनी बातें जारी रखीं, तो मैंने धीरे से नेहा को इशारे से बुलाया और उससे कहा, "तुम्हारी मम्मी मुझ पर पिल पड़ी हैं। कुछ तो बोलो उन्हें!"


नेहा ने हंसते हुए कहा, "ये आपकी समस्या है। मम्मी को आप ही संभालो। मैं नहीं जानती, लेकिन मुझे कल हर हाल में यहां से लेकर जाना है।"


अब मेरे पास और कोई चारा नहीं था। मैंने सासू मां को दिखाने के लिए अपनी उंगली पर पट्टी बांध रखी थी, जिसमें चोट लगी होने का बहाना किया था। मैंने अपनी चोट दिखाई और कहा, "मम्मी, इस चोट की वजह से खाना नहीं बना पाता। इसलिए मुझे सुधा को लेकर जाना ही पड़ेगा।"


सासू मां को यकीन नहीं हुआ। उन्हें लगा कि यह कोई बहाना है। मैंने उन्हें पट्टी खोलकर चोट दिखाई, तो उन्होंने राहत की सांस ली। लेकिन फिर भी वह आसानी से मानने वाली नहीं थीं। उन्होंने कहा, "मैं अभी भी भेजने के मूड में नहीं हूं।"


मुझे लगा कि अब तो कुछ और सोचना पड़ेगा। आखिरकार मैंने सासू मां से कहा, "मम्मी, एक बार सुधा से भी तो पूछिए कि क्या वह रुकना चाहती है या नहीं।"


सासू मां ने नेहा की ओर देखा, और वह तुरंत कमरे से बाहर भाग गई। सासू मां चौंककर बोलीं, "सुधा, तूने तो जुल्म कर दिया!"


थोड़ी देर बाद सासू मां और नेहा दोनों ड्राइंग रूम में वापस आईं। सासू मां ने कहा, "मुझे माफ करना, मैंने आपसे पता नहीं क्या-क्या कह दिया। मुझे नहीं पता था कि सुधा का मन अब यहां नहीं लग रहा। बेटी का मन अपने ससुराल में लगना हमारे लिए खुशी की बात है। अब मैं समझ गई हूं कि आप दोनों एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते। यही प्यार तो असली रिश्ते की पहचान है।"


यह सुनकर मेरी आंखों में भी खुशी के आंसू आ गए। सासू मां ने हमें आशीर्वाद दिया और कहा, "आप दोनों की जोड़ी हमेशा बनी रहे, यही मेरी दुआ है।"


उस दिन मुझे एहसास हुआ कि प्यार और रिश्तों का असली मतलब यही है—एक-दूसरे की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना और एक-दूसरे के बिना अधूरा महसूस करना।

भाभी, आपकी गुलाबी साड़ी चाहिए

 "भाभी, आपकी गुलाबी साड़ी चाहिए, मेरी दोस्त की शादी है," मीनाक्षी ने अपने भाभी कृतिका से कहा। कृतिका ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "इसमें पूछने की क्या बात है! अलमारी खुली है, जाकर ले लो।"


मीनाक्षी ने हँसते हुए कहा, "भाभी, मेकअप भी आपको ही करना पड़ेगा।" कृतिका ने प्यार से मुस्कुराते हुए हामी भरी, "अच्छा, ठीक है।"


यह सुनते ही कृतिका के मन में अतीत की यादें ताजा हो गईं। कृतिका के भी दो बड़े भाई थे, और दोनों की शादियाँ हो चुकी थीं। लेकिन उसकी भाभियाँ कृतिका से कभी प्यार नहीं करती थीं और उसके माता-पिता के साथ भी उनका व्यवहार ठीक नहीं था। एक बार, कृतिका ने अपनी भाभी से एक बैग माँगा था, तो भाभी ने उसे अपमानित करते हुए कहा, "तुम्हारी औकात नहीं है इतने महंगे बैग की। ये मेरे मायके से मिला है।"


कृतिका को यह सुनकर बहुत बुरा लगा था, जबकि उसके घर में कोई कमी नहीं थी। उसके पापा की अच्छी नौकरी थी और भाई की तनख्वाह भी शानदार थी। लेकिन उसकी भाभियाँ उसे पसंद नहीं करती थीं क्योंकि कृतिका अपने भाइयों की लाडली थी। फिर भी, कृतिका ने कभी भी अपने भाइयों से भाभियों की शिकायत नहीं की। उसके संस्कार बहुत अच्छे थे और वह रिश्तों की अहमियत समझती थी।


समय बीता, और कृतिका की शादी एक बेहद अच्छे परिवार में हुई। उसके पति आदित्य एक सफल इंजीनियर थे, और उनका परिवार काफी संपन्न था। कृतिका की शादी धूमधाम से हुई थी, और उसके मम्मी-पापा ने हर इंतजाम शानदार तरीके से किया था।


शादी के बाद, कृतिका ने अपने ससुराल में भी प्यार और अपनापन बिखेरा। खासकर अपनी ननद मीनाक्षी के साथ उसकी बेहद गहरी दोस्ती हो गई। कभी वह मीनाक्षी के लिए बड़ी बहन बन जाती, तो कभी उसकी सहेली। सासु माँ को भी कृतिका का यह व्यवहार बहुत पसंद आया। उन्हें इस बात की संतुष्टि थी कि कृतिका की वजह से मीनाक्षी को हमेशा उसका मायका जैसा प्यार और सम्मान मिलता रहेगा।


शादी के दो महीने बाद, कृतिका का जन्मदिन आया। आदित्य ने उसे एक बेहद खूबसूरत गुलाबी साड़ी और एक डायमंड रिंग उपहार में दी। सास-ससुर ने भी उसे प्यार और आशीर्वाद के साथ कई उपहार दिए। कृतिका का जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया गया, जिसमें उसके मायके वाले भी शामिल हुए थे।


कुछ दिनों बाद, मीनाक्षी की दोस्त की शादी थी, और वह कृतिका की वही गुलाबी साड़ी पहनना चाहती थी। जब उसने कृतिका से साड़ी मांगी, तो कृतिका ने बिना किसी झिझक के कहा, "इसमें पूछने की क्या बात है, मीनाक्षी! साड़ी अलमारी में रखी है, तुम खुद निकाल लो।"


कृतिका ने मीनाक्षी को खुद साड़ी पहनाई और उसका मेकअप भी किया। मीनाक्षी बेहद खुश थी, और यह देखकर सासु माँ भी बहुत खुश हो गईं। मीनाक्षी जब तैयार होकर घर से निकलने ही वाली थी, तभी कृतिका की भाभी, सुजाता, अचानक वहाँ आ गई। वह अपने भाई की शादी का कार्ड देने आई थी। उसने मीनाक्षी को गुलाबी साड़ी में देखकर कृतिका को एक कोने में बुलाया और कहा, "यह वही साड़ी है जो तुम्हारे पति ने तुम्हें उपहार में दी थी, फिर तुमने इसे अपनी ननद को क्यों दे दी?"


कृतिका ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "भाभी, रिश्ते ऐसे ही होते हैं। प्यार चीज़ों से नहीं, लोगों से होता है। मीनाक्षी के पहनने से साड़ी घिस नहीं जाएगी, लेकिन उसका दिल खुश हो जाएगा। अगर वह खुश है, तो मैं भी खुश हूँ। हमारे घर में किसी चीज़ पर 'तेरा-मेरे' का कोई अधिकार नहीं होता। यहाँ सबको बराबर का हक है। आज बात साड़ी की है, कल अगर अपने गहने भी देने पड़ें, तो मैं वो भी खुशी-खुशी दूँगी, क्योंकि यहाँ प्यार और अपनापन सबसे महत्वपूर्ण है।"


भाभी सुजाता यह सुनकर चुप हो गईं, लेकिन यह बात वहीं नहीं रुकी। आदित्य और सासु माँ, जो दूर खड़े थे, कृतिका की बातें सुन रहे थे। दोनों के चेहरे पर गर्व की मुस्कान थी, क्योंकि उन्हें एहसास हो चुका था कि कृतिका सिर्फ एक अच्छी बहू नहीं, बल्कि एक आदर्श इंसान भी है, जिसने रिश्तों की अहमियत समझ ली थी।


कृतिका की सोच ने न सिर्फ ससुराल वालों के दिलों में अपनी जगह बनाई थी, बल्कि उसने अपने जीवन में एक उदाहरण पेश किया था कि असली रिश्ते चीज़ों से नहीं, दिलों से बनते हैं।

रिश्ते टूटते नहीं। बस रिश्ते दिल से होना चाहिए

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