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Saturday, 31 August 2024

शादीशुदा जिंदगी को एंजॉय करेंगे और उसके बाद बच्चे के बारे में सोचेंगे।

 जब मेरी शादी हुई, तो हर दिन और रात मेरे पति के साथ प्यार और रोमांस से भरे हुए थे। हम दोनों एक-दूसरे के साथ वक्त बिताना चाहते थे, और मैं उनके पास रहकर खुद को खो देती थी। लेकिन जैसे ही कुछ हफ्ते बीते, हम पर परिवार और समाज का दबाव बढ़ने लगा - "अब जल्दी से बच्चा दे दो, दूधो नहाओ, पूतो फलो।"  

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ऐसा लगने लगा कि लोग हमारी शादी केवल एक बच्चे की जरूरत के लिए चाहते थे। लेकिन मेरे पति और मैं पढ़े-लिखे थे और हमें पता था कि बच्चे की जिम्मेदारी बहुत बड़ी होती है। हमने पहले ही तय कर लिया था कि पहले दो साल अपनी शादीशुदा जिंदगी को एंजॉय करेंगे और उसके बाद बच्चे के बारे में सोचेंगे।  

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हम दोनों बहुत रोमांटिक थे और हमारे मूड बनते देर नहीं लगती थी। कई बार बिना प्रोटेक्शन के हमने संबंध बनाए। सुबह होते ही चिंता सताने लगती कि अब क्या होगा। गर्भनिरोधक गोलियां लेने का सहारा लिया, लेकिन हम दोनों जानते थे कि यह स्थायी समाधान नहीं है। डॉक्टर ने हमें प्रतिदिन लेने वाली एक दवा दी और कहा कि जब बच्चा करने का प्लान हो, तो 23 दिन पहले इसे बंद कर दें।  

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हमने पूरे दो साल इस दवा का सेवन किया और अपनी शादीशुदा जिंदगी को एंजॉय किया। लेकिन जब दो साल बाद बच्चा पैदा करने की स्थिति आई, तो हम दोनों ने बहुत कोशिश की, पर मैं गर्भधारण नहीं कर पाई। डॉक्टर ने बताया कि मेरी नली सुख चुकी है और गर्भधारण नहीं हो पा रहा है। एक साल इलाज के बाद मेरी रिपोर्ट सही आई, लेकिन फिर भी बच्चा नहीं हो पाया। इस बार मेरे पति की जांच हुई और पता चला कि अत्याधिक संबंध बनाने से वीर्य की क्वालिटी खराब हो गई है। उनके इलाज में भी एक साल लग गया।  

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कुल मिलाकर, जब हमारी उम्र बच्चा पैदा करने की थी, तो हमने अपने पढ़े-लिखे होने के कारण फैसला लिया, लेकिन अब जब जरूरत है, तो हर कोशिश के बाद भी मैं मां नहीं बन पा रही हूं। आज मुझे समझ में आता है कि चंद किताबें पढ़ लेने से वह ज्ञान नहीं मिलता जो अनुभव से मिलता है। बड़े-बुजुर्गों की बात मानकर अगर मैंने पहले ही बच्चा किया होता, तो आज मुझे यह दिन नहीं देखना पड़ता।  

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हर चीज अपने समय से होना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। जीवन में सही समय पर सही निर्णय लेना जरूरी है, ताकि आगे चलकर पछताना न पड़े। यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में सही समय पर सही कदम उठाना कितना महत्वपूर्ण होता है। 🌸  

नीरा के बरसों से रुके आंसू उमड़ पड़े।

 नीरा बिस्तर पर लेटी हुई थी और छत पर घूमते पंखे की पंखुड़ियों को एकटक देख रही थी। जैसे ही पंखुड़ियाँ घूमती, नीरा के मन में पुराने समय की यादें उभरने लगीं। ⏳ उसकी यादों की किताब के पन्ने धीरे-धीरे खुलने लगे, जिसमें वक्त की स्याही भले ही धुंधली पड़ गई हो, लेकिन भावनाओं के निशान अब भी गहरे थे। 🕰️ उसे याद आया कि उसने सोलह साल की उम्र में ही शादी कर ली थी। उसके पति, राजीव, उससे सिर्फ दो साल बड़े थे - अल्हड़, मस्त और बेफिक्र। 💑 घर का पुश्तैनी बिज़नेस उनके पिता, सुरेश जी, संभाल रहे थे, इसलिए राजीव का दिन अपनी नई नवेली दुल्हन के इर्द-गिर्द घूमते हुए बीतता। 🏡 अम्मा अपने बेटे-बहू की हर दिन नज़र उतारतीं और उनके रिश्ते की बलैयाँ लेतीं। 


नीरा भी अम्मा के साथ बैठकर अमिया छीलती या चावल बीनती। 😌 वह घूंघट की ओट से तिरछी नज़रों से राजीव को देखती, और उसकी शरारती निगाहें राजीव के दिल के आर-पार हो जातीं। 💕 अम्मा उनकी प्रेम लीला देखकर भी अनदेखा कर देतीं। राजीव ने ब्याह से पहले ही महंगी मोटरसाइकिल खरीदी थी। 🏍️ सुरेश जी ने कहा भी था कि कार ले लो, बहू आएगी तो आराम रहेगा, पर राजीव का सपना था कि उसकी बहुरिया उसकी कमर पकड़कर बाइक पर पीछे बैठे और वे लॉंग ड्राइव पर जाएं। 🚗


प्रेम के सागर में डूबते-उतरते एक साल बीत गया और नीरा एक प्यारे से बेटे की माँ बन गई। 👶 पूरे नौ महीने सुरेश जी, उनकी पत्नी और राजीव ने नीरा को धरती पर पैर नहीं रखने दिया। अम्मा ने पोता होने की खुशी में अपना नौलखा हार नीरा को दे दिया। 💍 नीरा को डर लगता था कि कहीं किसी की नज़र न लग जाए। 😌


बेटे की छठी पर राजीव ने कहा कि वह नौलखा हार पहन ले, पर नीरा की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए वह हार पहन नहीं पाई। बेटे के पहले जन्मदिन की धूमधाम से तैयारी हो रही थी, और नीरा को एक सुंदर लाल बनारसी साड़ी में सजाया गया। 🎉 राजीव ने उसे देखा तो बस देखता ही रह गया। 😍 उसने कहा, "अब मैं सब्र नहीं कर सकता, बस तुम्हें अम्मा का नौलखा हार पहने देखना चाहता हूँ," और वह एक मिनट में बाइक उठाकर हार लाने चला गया। 


नीरा जैसे ही गले में नौलखा हार डालने वाली थी, तभी शोर मचा कि गली के नुक्कड़ पर एक तेज रफ्तार कार ने राजीव को टक्कर मार दी। 🚗💥 राजीव के हाथ में नीरा का मनपसंद सफेद मोगरे का गजरा था, जिसे लेने वह जल्दी में गया था। अस्पताल ले जाते-ले जाते राजीव नीरा और अपने माता-पिता को बिलखता छोड़कर इस दुनिया से चला गया। 😢 नन्हा सोनू तो अपनी मस्ती में था, उसे समझ ही नहीं आया कि उसके सर से पिता का साया उठ गया। 


राजीव के बिना जीना नीरा के लिए असंभव था, उसकी दुनिया तो राजीव से शुरू होकर उसी पर खत्म होती थी। 💔 लेकिन धीरे-धीरे, नीरा ने उन तीनों के लिए खुद को संभाला जो राजीव के बाद उसकी जिम्मेदारी बन गए थे। सुरेश जी और उनकी पत्नी ने नीरा से दोबारा घर बसाने की बात की, लेकिन नीरा ने साफ इंकार कर दिया। उसने सुरेश जी के साथ बिज़नेस संभालना शुरू किया और सोनू को पढ़ा-लिखाकर बड़ा करने में जुट गई। 📚


समय बीतता गया, सोनू इंजीनियर बन गया और सुरेश जी ने सारा बिज़नेस नीरा और सोनू के नाम कर दिया। 🏢 सोनू की शादी शीना से हो गई और सुरेश जी और उनकी पत्नी भी चल बसे। नीरा के पास सब कुछ था, लेकिन मन का सुकून नहीं था। 😔 राजीव के बिना उसका जीवन अधूरा था। एक दिन उसने शीना को सोनू से कहते सुना, "मम्मी के पास नौलखा हार है, उन्हें क्या वह बुढ़ापे में पहनेंगीं? मैं तो उनसे वह नौलखा हार लेकर रहूंगी।" 😡


शीना ने आकर नीरा से नौलखा हार मांगा। नीरा ने कहा, "वह मनहूस नौलखा हार मैं कभी तुम्हारे गले में नहीं पहनाऊंगी। राजीव उसे देखने की ललक में चला गया और अब सोनू? नहीं, कभी नहीं। इसे बेच देंगे और इसके पैसे किसी गरीब लड़की के विवाह में दान कर देंगे।" 💔


कहते हुए नीरा के बरसों से रुके आंसू उमड़ पड़े। 😢 सोनू और शीना का सिर दुःख और शर्म से झुक गया। 😔


मनुष्य कुछ सोचता है, लेकिन होता कुछ और है। किसी के चले जाने से जीवन रुकता नहीं, वक्त का पहिया अपनी रफ्तार से चलता रहता है। ⏳ जीना पड़ता है दूसरों के लिए, बिना किसी मंजिल के। नीरा भी राजीव के संग मर तो नहीं सकी, लेकिन अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए जीना पड़ा, जो काम राजीव अधूरे छोड़ गया था, उन्हें पूरा करने के लिए। 🌹 लेकिन ऐसा अधूरा जीवन, जीवन नहीं कहलाता। 😔

लड़की अपने बॉयफ्रेंड से पूछती है,

 लड़की अपने बॉयफ्रेंड से पूछती है, "अच्छा, किसी दूसरे लड़के से मेरा विवाह हो जाए तो तुम क्या करोगे?" 

लड़का जवाब देता है, "तुम्हें भूल जाऊंगा।" (लड़के ने बहुत छोटा सा जवाब दिया)  


ये सुनकर लड़की गुस्से में दूसरी तरफ घूम कर बैठ गई। फिर लड़के ने कहा, "सबसे बड़ी बात कि तुम मुझे भूल जाओगी। जितना जल्दी मैं तुम्हें भुला सकूंगा, उससे ज्यादा जल्दी तुम मुझे भुला दोगी।"  

"कैसे?" लड़की ने पूछा।  

लड़के ने बोलना शुरू किया, "सोचो, विवाह का पहला दिन है। तुम एक नए घर में हो, शरीर पर जेवर, चेहरे पर मेकअप, चारों तरफ कैमरे का फ्लैश और लोगों की भीड़। तुम चाह कर भी मुझे याद नहीं कर पाओगी।"  


"और मैं तुम्हारे विवाह की खबर सुनकर दोस्तों के साथ कुछ उटपटांग पीकर किसी कोने में पड़ा रहूंगा। फिर जब मुझे होश आएगा, तो मैं तुम्हें धोखेबाज बेवफा बोलकर गाली दूंगा।"  


"फिर जब तुम्हारी याद आएगी, तो दोस्त के कंधे पर सर रखकर रो लूंगा। विवाह के बाद तुम्हारा बिजी टाइम शुरू होगा। तुम अपने पति और हजार तरह के रस्मों को निभाने में बिजी रहोगी। फिर कभी-कभी तुम्हें मेरी याद आएगी जब तुम अपने पति का हाथ पकड़ोगी या उसके साथ बाइक पर बैठोगी।"  


"और मैं आवारा की तरह इधर-उधर घूमता रहूंगा, जैसे जिंदगी का कोई मकसद ही नहीं। अपने दोस्तों को समझाऊंगा कि 'कभी प्यार मत करना, कुछ नहीं मिलता, जिंदगी खतम हो जाती है प्यार के चक्कर में।'"  


"कुछ वक्त बाद तुम अपने पति के साथ हनीमून पर जाओगी। नया घर होगा, शॉपिंग होगी, नई जिम्मेदारियां होंगी। तब अचानक तुम्हें मेरी याद आएगी और तुम सोचोगी, 'पता नहीं किस हाल में होगा।' मेरी खुशी की प्रार्थना मांगते हुए वापस अपने परिवार में बिजी हो जाओगी।"  

🌅💼 मै अब तक मम्मी, पापा, भाई या फिर दोस्तों से डांट सुन-सुन कर लगभग सुधर गया हूं। सोच लिया है, अब कोई काम करना है, एक अच्छी सी लड़की से विवाह करके तुम्हें भी दिखा देना है। सबको यही बोलूंगा कि भुला दिया है मैंने तुम्हें, लेकिन तब भी मैं तुम्हारे मैसेजेस को आधी रात को निकालकर पढूंगा और सोचूंगा, शायद मेरे प्यार में ही कमी थी जो तुम्हें न पा सका। फिर अपनी तकलीफ को कम करने की कोशिश करूंगा।"  

📱😢


"दो वर्ष बाद अब तुम कोई प्रेमिका या नई दुल्हन नहीं रही, अब तुम माँ बन चुकी हो। पुराने आशिक की याद और पति के प्यार को छोड़कर तुम अपने बच्चे के लिए सोचोगी। अब तुम अपने बच्चे के साथ बिजी रहोगी, मतलब अब तक मैं तुम्हारी जिंदगी से परमानेन्टली डिलीट हो चुका हूं।"  

👶💔


"इधर मुझे भी एक अच्छा काम मिल गया है, विवाह की बात चल रही है और लड़की भी पसंद आ गई है। अब मेरा बिजी टाइम शुरू हो गया है। अब मैं तुम्हें सचमुच भूल गया हूं। अगर किसी जोड़ी को देखता हूं तो तुम्हारी याद आती है, लेकिन अब तकलीफ नहीं होती।"  

यहां तक सुनने के बाद लड़के ने देखा, लड़की की आंखों में आंसू छलक रहे हैं। लड़की भरी आंखों से लड़के की तरफ देखती है। दोनों बिल्कुल चुप हैं, पर आंखें बरस रही हैं। थोड़ी देर बाद लड़की ने पूछा, "तो क्या सब कुछ यहीं खतम हो जाएगा?"  

लड़के ने जवाब दिया, "नहीं। किसी दिन जब तुम रूठ जाओगी अपने पति से किसी बात पर, लेकिन तुम्हारे पति आराम से सो रहे होंगे। पर उस रात तुम्हारी आंखों में नींद नहीं होगी। इधर मैं भी अपनी पत्नी से किसी बात पर खफा होकर तुम्हारी तरह जागूंगा। पूरी दुनिया सो रही होगी सिर्फ हम दोनों के अलावा। फिर हम अपने अतीत को याद करके खूब रोएंगे, एक दूसरे को बहुत महसूस करेंगे, लेकिन इस बात का भगवान के अलावा और किसी को पता नहीं चलेगा।"  

उम्मीद है कि मेरे इस अनुभव से आप सभी को कुछ सीख मिलेगी

 शादी के शुरुआती दिनों में जो सुकून और खुशी मिलती है, उसका अनुभव शायद हर नई दुल्हन ने किया होगा। खासकर ठंड के मौसम में, जब अपने पति के साथ वक्त बिताने का अलग ही मज़ा होता है। मेरी शादी नवंबर में हुई थी, और मुझे एक प्यार करने वाला, रोमांटिक पति मिला था। हमारे बीच एक खास जुड़ाव था, और वो हर पल को रोमांटिक बना देते थे। वो कहते थे कि प्यार और विश्वास में गहराई लाने के लिए यह जरूरी है, और सच कहूं तो, उनके साथ वक्त बिताना मेरी जिंदगी का सबसे हसीन अनुभव था।


जनवरी का महीना था और कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। रात के एक बजे सभी अपने-अपने कमरों में आराम कर रहे थे। हम भी अपने कमरे में बातें कर रहे थे, लेकिन ठंड के कारण हमारी बातें अचानक से किसी और दिशा में मुड़ गईं। जैसे ही कुछ खास होने वाला था, मम्मी जी ने जोर से पुकारा। मैं तुरंत बाहर गई तो उन्होंने कहा कि बर्तन ऐसे ही पड़े हैं, यह शुभ नहीं है। मन में तो यही आ रहा था कि इतना अच्छा मूड था, फालतू में मम्मी जी ने बुला लिया। लेकिन मैंने बर्तन साफ किए और वापस आई।


समय बीतने के साथ, घर की जिम्मेदारियां और काम का बोझ बढ़ने लगा। मम्मी जी मुझे हर काम में टोकने लगीं। उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि मैं काम में देरी कर रही हूँ। धीरे-धीरे, यह बातें मेरी जेठानी तक पहुंचने लगीं, और घर का माहौल तनावपूर्ण हो गया। एक दिन, जब नाश्ता और लंच तैयार नहीं हो पाया, तो मम्मी जी ने हमें डांटा। मैंने जब इस बात की शिकायत अपने पति से की, तो उन्होंने भी मुझसे ही कहा कि मुझे समय का ध्यान रखना चाहिए। इसके बाद, घर का रूटीन बिगड़ने लगा। खाना देर से बनता, और हम दोनों देवरानी-जेठानी ने काम को जल्दी निपटाने के चक्कर में हर काम आधे मन से करना शुरू कर दिया।


घर का माहौल धीरे-धीरे और बिगड़ने लगा। मेरे पति, जो पहले बहुत प्यार करते थे, अब चिढ़ने लगे थे। एक दिन, सासु माँ ने हमसे हमारे फोन मांग लिए और कहा कि अब से फोन सिर्फ दोपहर 1 बजे से रात 7 बजे तक मिलेगा। इस बात पर हमें गुस्सा आया, लेकिन फिर भी हम चुप रहे। रक्षा बंधन पर जब मैंने यह बात अपने घरवालों को बताई, तो उन्होंने भी मुझे समझाया कि सासु माँ की बातों पर ध्यान देना चाहिए।


इस घटना के बाद, मैंने और मेरी जेठानी ने देखा कि जबसे हमने फोन का इस्तेमाल कम किया, हमारे काम तेजी से निपटने लगे। शॉर्ट वीडियो और रील्स देखने की आदत ने हमें इतना व्यस्त कर दिया था कि हम घर के काम में देरी कर रहे थे, और इसका असर हमारे रिश्तों पर भी पड़ रहा था। लेकिन जब हमने यह आदत छोड़ी, तो सब कुछ सामान्य होने लगा।


अब सोचिए, यह शॉर्ट्स और रील्स कितनी खतरनाक हो सकती हैं। यह मीठा जहर हमारे समय को चुपचाप खा जाता है, और हमें पता भी नहीं चलता। अगर आपको भी लगता है कि आपका समय जल्दी खत्म हो जाता है और आप कुछ खास नहीं कर पाते, तो एक महीने के लिए रील्स देखना बंद कर दीजिए। यह छोटा सा कदम आपके जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है। उम्मीद है कि मेरे इस अनुभव से आप सभी को कुछ सीख मिलेगी, और आप भी अपने जीवन को बेहतर बना पाएंगे।

आज खाना खाकर तुमने मेरा कितना बड़ा सम्मान किया मुझे माफ कर दो

 ग्रामीण बैंक में मैनेजर की पोस्टिंग होने के बाद पहली बार राजेश किराए के नए घर में शिफ्ट हुऐ थे. पर आज ही सीढ़ियों से फिसलने के कारण प्रिया के पैरों में जबरदस्त मोच आ गयी थी. डॉक्टर ने घर पर आकर पट्टियाँ तो बाँध दी. साथ ही साथ सख्त हिदायत दे दीं कि चलना फिरना बिल्कुल मना है.

एक सप्ताह पहले आये नए घर के आस पास कोई जान पहचान के लोग भी नहीं थे. ये तो बहुत अच्छी बात रही कि पिछले कुछ दिनों में प्रिया ने किचन के साथ साथ पूरे घर को व्यवस्थित कर लिया था.

चार साल पहले राजेश और प्रिया की परिवार वालों की सहमति से अर्रेंज मैरेज हुई थी. प्रिया खुद भी पढ़ने में काफी तेज थी और पढ़ लिख कर जीवन मे कुछ बनना चाहती थी. लेकिन पापा को कैंसर का पता चला और उसी वक़्त राजेश के यहाँ से रिश्ता आया तो मजबूरी के चलते शादी करनी पड़ी.

शादी के बाद प्रिया पूरी तरह से ससुरालवालों की खुशियों के लिए खुद को न्योछावर कर दी. वो पूरी तरह से आदर्श बहू बन गयी. ससुराल में सब उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे. उसके व्यवहार ,कार्यकुशलता से सभी प्रभावित थे.

कुछ ही दिनों में उसने अपने ससुराल की काया बदल कर रख दी थी. पहले हर चीज जैसे तैसे होती थी. अब हर चीज साफ सुथरी और व्यवस्थित रहने लगी. खाना भी वो बड़े जतन से बनाती थी. हर लोग उसके बनाये लजीज खाने की खूब तारीफ करते. सिवाय उसके पति राजेश के.

राजेश को जरा भी खाने में नमक कम या ज्यादा लगता या मसाला कम होता तो वो एक कोर खाना खाकर छोड़ देता था. परसों खीर में थोड़ी चीनी कम क्या हुई? प्रिया के लाख मिन्नतों के बाद भी उसने खाने को दुबारा हाथ तक नहीं लगाया.

सबसे ज्यादा राजेश को मटर पनीर पसंद थी. कुछ दिनों पहले जब मटर पनीर बनी और मटर थोड़ी गल गयी तो भी राजेश ने खाना नहीं खाया. जबकि घर के सभी सदस्यों ने खूब मजे से खाये.

प्रिया के लाख मिन्नतें करने और मनाने के बाद भी राजेश खाना नहीं खाता था. और राजेश जब भूखा सो जाता तो प्रिया भी भूखी सो जाती थी. महीने में कई बार ऐसा होता था. अब पहली बार राजेश नौकरी के लिए घर से दूर आया था.

प्रिया को पलँग पर अच्छे से सुलाकर राजेश आज जिंदगी मे पहली बार खाना बनाने के ख्याल से घुसा. किचन में हर चीज प्रिया ने व्यवस्थित रखा था. राजेश ने एक तरफ थोड़ा सा चावल गैस चूल्हे पर चढ़ा दिया और दूसरी तरफ थोड़ी सी दाल एक पतीले में चढ़ा दी.

फिर वो थोड़े आलू प्याज लेकर भुजिया काटने लगा. काफी मेहनत के बाद बहुत ही बेतरतीब ढंग से आलू और प्याज कटे. उसे आभास होने लगा था खाना बनाने में बहुत मेहनत लगती है. दो घंटे की मेहनत के बाद उसने किसी तरह खाना बनाने में सफलता पाई.

एक थाली में भात और कटोरी में दाल और प्लेट में भुजिया लेकर वो पलँग पर प्रिया को अपने हाथों से खाना खिलाने लगा. वो कोर कोर प्रिया को खाना खिलाता जाता था और प्रिया बड़े आराम से खुशी-खुशी खाना खाती जाती थी.

खाना खत्म होने के बाद राजेश ने प्रिया से पूछा कैसा लगा खाना? प्रिया ने कहा बहुत अच्छा. मैं कितनी खुशनसीब हूँ आज जिन्दगी में पहली बार पति के हाथों बना गरमागरम खाना खाने को मिला. राजेश से सुनकर बहुत खुश हुआ. आखिर दो घंटे कड़ी मेहनत करके उसने खाना बनाया था.

खाने की तारीफ सुनकर वह फूला न समाया. उसे लगा उसकी मेहनत सफल रही. प्रिया को खाना खिलाने के बाद वो खुद खाना खाने बैठा. उसे जोरों की भूख लगी थी. दाल भात मिलाकर थोड़ी भुजिया का कोर बनाकर जैसे ही मुँह में डालकर राजेश ने चबाना शुरू किया. तेजी से वाश बेसिन की तरफ दौड़ा और मुँह का सारा खाना वाश बेसिन में उगल दिया.

चावल कच्चा पक्का था. दाल में नमक बहुत ज्यादा था. भुजिया भी कच्चा था. ऐसा घटिया खाना प्रिया ने बिना कोई शिकायत के खा लिया. सिर्फ इसलिए कि मैंने इतनी मेहनत से बनाया था. छोटी-छोटी बात पर पिछले सारे खाना न खाने वाले वक़्त की उसे याद आने लगी.

उसके दोनों आँखों से आँसू निकल पड़े. अपने बनाये जिस जिस खाने को वो एक कोर भी न खा सका. प्रिया ने बिना कुछ कहे पूरे खाने को खा लिए. राजेश प्रिया के सामने सर झुकाए हाथ जोड़े धीरे से बोला- "पिछले चार सालों में कई बार खाना न खाकर मैंने तुम्हारा जो अपमान किया. आज खाना खाकर तुमने मेरा कितना बड़ा सम्मान किया मुझे माफ कर दो.

प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, दूध गर्म कर चूड़ा के साथ आज खा लीजिए. एक दो दिनों में मैं ठीक हो जाऊँगी. फिर आपको कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.

इसके बाद कोई भी ऐसा वक़्त नहीं आया. जब प्रिया का बनाया खाना राजेश ने खुशी खुशी न खाया हो. एक बार खाना बनाने में लगी मेहनत ने राजेश को पत्नी का सम्मान करना सीख गया था।

दोपहर में पति के संभोग करने में जो सुकून है वो दुनिया के किसी और काम में नही है,

 ठंड के दिनों में दोपहर में पति के संभोग करने में जो सुकून है वो दुनिया के किसी और काम में नही है, खास तौर पर जब आप की नई नई शादी हुई है, और एक हैंडसम खूब प्यार करने वाला पति मिला हो

वो लड़कियाँ इस बात को ज्यादा समझ पाएंगी जिनकी नई-नई शादी हुई हो। नवंबर में मेरी शादी हुई थी, मुझे एक अच्छा परिवार और प्यार करने वाला पति मिला था। दोस्त की तरह एक ननद और दो जेठानियाँ मिली थीं। पतिदेव इतने रोमांटिक थे कि जब भी मौका मिले, शुरू हो जाते थे। उनका कहना था कि ऐसा करने से प्यार और विश्वास में गहराई आती है। सच कहूं तो प्यार और विश्वास का तो ज्यादा नहीं पता, पर पति रोमांटिक मिल जाए तो जिंदगी मजेदार हो जाती है।

जनवरी का महीना था और कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। तकरीबन एक बजे रात को खाना खाकर सभी अपने-अपने कमरे में आराम करने चले गए। मैं और मेरे पतिदेव भी अपने कमरे में चले गए। थोड़ी बातें हो रही थीं, लेकिन ठंडी में बातें कहाँ से कहाँ पहुंच जाती हैं, कोई नहीं जानता।

हम दोनों का भी यही हाल था। जैसे ही कुछ होने वाला था, तभी मम्मी जी ने जोर से बुलाया। तुरंत दरवाजा खोला और बाहर चली गई। मम्मी जी ने कहा, "बर्तन ऐसे ही पड़े हैं, ये शुभ नहीं है। जाओ आराम करो, आगे से ध्यान देना। मैं साफ कर देती हूँ अभी।"

मैंने कहा, "मम्मी, आप रहने दीजिए, मैं कर देती हूँ।" और मन ही मन सोचने लगी कि इतना अच्छा सीन था, फालतू मम्मी जी ने बुला लिया।

धीरे-धीरे, जैसे-जैसे पुरानी होती गई, मम्मी जी मुझे हर चीज पर टोकने लगीं। उनका सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात पर होता कि मैं काम करने में देरी कर रही हूँ, जबकि मैं हर काम अपने हिसाब से करती थी। धीरे-धीरे यह बात जेठानी जी को भी कहने लगीं।

एक दिन सभी को ऑफिस जाना था, लेकिन नाश्ता और लंच तैयार नहीं हो पाया। इस पर मां जी ने हमें डांटा। शाम को जब पतिदेव घर आए तो मैंने यह बात बताई, तो वो मेरे ऊपर ही बोलने लगे कि तुम्हें ध्यान देना चाहिए, ऑफिस का समय इधर-उधर नहीं हो सकता।

धीरे-धीरे, पता नहीं कैसे, शाम का खाना जो पहले 8 बजे तक हो जाता था, अब 11 बजे तक होने लगा था। माँ का गुस्सा हम पर फूटने लगा कि तुम लोगों ने आते ही घर का सारा रूटीन बदल दिया। 11 बजे खाने के बाद सोते-सोते 1 बज जाता, और सुबह उठने में तकलीफ होती। फिर नाश्ता बनाने में आलस आता। हम दोनों देवरानी-जेठानी इस चक्कर में पड़ गए कि जल्दी से बिना मेहनत का खाना बना दें।

इस बात का फर्स्ट्रेशन पतिदेव और बड़े भैया में भी देखने को मिलने लगा था, लेकिन गलती कहाँ हो रही थी, समझ में नहीं आ रहा था। धीरे-धीरे घर की शांति भी भंग होने लगी। जो आदमी शादी के समय इतना प्यार करता था, वो अब हर सवाल का जवाब चिढ़कर देने लगा।

फिर एक दिन हद हो गई। सासु माँ ने हम दोनों से कहा कि तुम दोनों अपना फोन मुझे दे दो। हम दोनों को गुस्सा आता है। मैं तो कुछ नहीं बोलती, पर जेठानी जी बोल देती हैं कि मम्मी घर को घर रहने दीजिए, इसे जेल मत बनाइए। उन्होंने एक ना सुनी और फोन ले लिया और कहा, "अब से फोन सिर्फ दोपहर 1 बजे से रात 7 बजे तक मिलेगा।"

हमें अपनी सास का यह रवैया काफी खराब लगा। दो दिन बाद रक्षा बंधन था। मैंने माँ और पापा से सारी बात बताई जब मैं अपने भाई को राखी बांधने गई थी। मेरी माँ और भाई भड़क गए और बोले कि अभी बात करता हूँ, किसी की पर्सनल चीज को लेने का क्या हक बनता है।

पापा ने भाई को समझाया और बोले, "तुम इतने बड़े नहीं हुए हो जो इसकी सास से ऐसे पेश आओ।" फिर पापा मुझे कोने में ले जाते हैं और बोलते हैं, "बेटा, तुम्हारी सास तुमसे उम्र में बड़ी है, एक बार उनकी बात मानो, आखिर इसमें कुछ सच्चाई हो।"

मैं घर आती हूँ और अगले दिन सुबह जल्दी उठकर खाना बनाती हूँ, समय पर सबको खाना देती हूँ और घर के सारे काम भी निपटा देती हूँ। लगभग एक महीने बाद मुझे और मेरी जेठानी को यह बात समझ आई कि हम दोनों का हाथ धीमा क्यों चल रहा था। जो काम पहले 8 बजे होता था, वो अब 11 बजे क्यों हो रहा था। इसके पीछे कारण था मोबाइल, और मोबाइल में भी सबसे खतरनाक चीज छोटी शॉर्ट वीडियो, जो एक के बाद एक देखते जाओ, कैसे समय को खा रही है, पता ही नहीं चलता।

मैंने यह भी देखा कि जबसे शॉर्ट देखना बंद किया, किसी चीज पर ज्यादा ध्यान टिकने लगा। कोई भी बात काफी जल्दी समझ में आने लगी। और सबसे बड़ी बात, पहले घर का सारा काम करके 2 बजे खाली होते थे, अब 12 बजे हो जाते हैं।

मुझे और जेठानी जी को इस बात को समझने में समय लगा, लेकिन आज एक साल हो गया है। अब सुबह उठकर फोन ना देखना अपने आप में एक अच्छी आदत बन गई है। शायद मेरे पापा यह बात जानते थे, इसलिए बड़ी सहूलियत से बोल दिया कि जो सासु माँ बोल रही हैं, कुछ दिन करके देखो। हमारे घर में होने वाली किचकिच खत्म हो गई।

अब सोचिए, ये शॉर्ट्स कितनी खतरनाक चीज है। मेरा जो हाल था, वही हाल आज की हर लड़की और लड़के का है। शॉर्ट और रील के चक्कर में जो काम 10 मिनट का है, वो 2 घंटे में पूरा होता है।

यदि आप भी अपने परिवार को ठीक से संभाल नहीं पा रहे हैं या आपको लगता है कि समय बहुत जल्दी खत्म हो जाता है और आप सारा दिन कुछ कर नहीं पाते, तो मात्र 1 महीने के लिए रील देखना बंद कर दीजिए। यह मीठा जहर है, जो अंदर से दिमाग और हमारे समय को धीरे-धीरे खा रहा है।

उम्मीद है, मेरे इस अनुभव से बहुत सी गृहणियों को कुछ फायदा होगा। कमेंट करके यह भी बताएं कि क्या आपने यह नोटिस किया है कि रील देखने से बिना अंदाज का समय नष्ट होता है

अरे भाग्यवान तुम्हारा बेटा किसी का पति भी है

 *# अरे भाग्यवान तुम्हारा बेटा किसी का पति भी है*


रात के 11:00 बज चुके थे। श्रीनाथ जी को बहुत नींद आ रही थी, पर पत्नी थी कि अभी तक बेटे तरुण के कमरे से निकलकर नहीं आई थी। दो बार श्रीनाथजी उसके कमरे में चक्कर लगाकर आ चुके थे और अपनी पत्नी को बुला चुके थे। आखिर बहू नव्या को रसोई में जाते देखकर उठ गए और तरुण के कमरे में जाकर बोले,


"अरी भाग्यवान, कब तक तरुण के कमरे में ही बैठी रहोगी? अब इन्हें भी सोने दो और खुद भी सो जा"


" आपको भी क्या चैन नहीं है? कुछ पल मेरे बेटे से बातें कर रही हूँ लेकिन आपको वो भी नहीं सुहाता"


" अरे मुझे तो सब सुहाता है। पर तुम दवाई लेना भूल जाती हो और फिर मुझ से ही झगड़ा करती हो कि आप याद नहीं दिला सकते थे क्या?"

" हां तो ठीक है ना, दवाई लेकर आ कर बैठ जाती हूं"


" नहीं नहीं, तुम दवाई कमरे में ही लो और फिर आराम करो। डॉक्टर ने दवा लेने के बाद आराम करने के लिए कहा है"

" लेकिन कब?"

" इस बार जब गए थे तब डॉक्टर ने कहा था"

" पर मेरे सामने तो ऐसा कुछ नहीं कहा"

" अरे तुम बाहर निकल गई थी तब कहा था"


आखिर सुषमा जी को मन मार कर अपने कमरे में आना पड़ा। सुषमा जी के कमरे में आते ही श्रीनाथजी ने कहा,

" क्या तुम बच्चों के कमरे में बैठी रहती हो। अच्छा लगता है क्या?"

" इसमें अच्छा लगने की क्या बात है? मेरे बेटे से ही तो बात कर रही हूँ। पहले भी तो रात को मैं उससे बातें करती थी"

" पर पहले की बात और थी। अब बात और है। अब घर में बहू आ चुकी है। और पहले कौन सा तुम उसके कमरे में ग्यारह बारह बजे तक बैठी रहती थी"


" तो? बहू के आने के बाद भी मेरा बेटा तो बेटा ही रहेगा ना"

सुषमा जी ने तुनक कर कहा और अपनी दवाई लेकर सोने चली गईं। श्रीनाथजी अपना सिर पकड़ कर बैठ गए।

दूसरे दिन सुबह श्रीनाथजी अपने मॉर्निंग वॉक से लौट कर आए तो घड़ी में 8:00 बज चुके थे। तरुण अपना नाश्ता कर रहा था और सुषमा जी वहीं डाइनिंग टेबल पर बैठी हुई थीं जबकि बहू नव्या नाश्ता सर्व कर रही थी। सुषमा जी नव्या को बिल्कुल भी तरुण के पास रुकने नहीं दे रही थीं। जैसे ही नव्या कुछ सर्व करने के लिए भी आती तो सुषमा जी बर्तन उसके हाथ से ले लेतीं।


श्रीनाथजी अपने साथ गरमा गरम कचोरियां लेकर आए थे। उसे नव्या को देकर बोले,

" ले बहू तरुण को भी परोस दे"


नव्या कचौरियाँ लेकर तरुण की तरफ बढ़ ही रही थी कि सुषमा जी ने उसके हाथ से कचोरियाँ भी ले लीं और उससे कहा,

" जा बहू तू तरुण का टिफिन पैक कर दे। मैं ही कचौरियाँ परोस दूंगी"


'हे भगवान! इस औरत को कब समझ आएगा' यही बात सोचते हुए श्रीनाथजी वहीं सोफे पर बैठ गए। और सुषमा जी के तमाशे देखने लगे। थोड़ी देर बाद तरुण घर से निकलने लगा तो उसने नव्या को आवाज देकर कहा,

" नव्या शाम को जल्दी तैयार हो जाना। प्रवीण के यहाँ पार्टी में जाना है। मेरे सारे दोस्त आ रहे हैं"

इससे पहले कि नव्या कुछ कहती सुषमा जी बोलीं,


" अरे फिक्र मत कर बेटा, हम लोग टाइम से तैयार हो जाएंगे। तू जा"

सुषमा जी की बात सुनकर तरुण एक पल के लिए रुक गया। यहां तक कि श्रीनाथजी भी हैरानी से अपनी पत्नी की तरफ देखने लगे तो सुषमा जी ने कहा,

"अरे खड़ा क्या है? जाता क्यों नहीं? देर हो जाएगी ऑफिस में"

तरुण ने अपने पापा की तरफ देखा, तो उन्होंने उसे जाने का इशारा किया। अपने पापा का आश्वासन पाते हैं वो वहां से रवाना हो गया, वहीं नव्या भी रसोई में चली गई। आखिर बोलती भी तो बोलती क्या?

वहीं सुषमा जी कमरे में आकर अलमारी खोलकर अलमारी के सामने खड़ी हो गईं। पीछे पीछे श्रीनाथजी भी कमरे में आ गए,

" क्या कर रही हो भाग्यवान?"


" अरे शाम की पार्टी के लिए क्या पहनूँ? बस यही सोच रही हूं"

" मैं यही तो पूछना चाहता हूं कि तुम कर क्या रही हो?"

" मतलब???"

" तुम्हें कुछ समझ है कि नहीं या तरुण की शादी के बाद समझ बेच खाई। तरुण के दोस्तों की पार्टी है, वहां तुम कहां अच्छी लगोगी?"

" अरे तो मैं तो उसके सारे दोस्तों को जानती हूं। वो सब भी तो मेरे बच्चे जैसे ही हैं"

" अरे बच्चे जैसे हैं तो भी तो उन्हें स्पेस तो चाहिए ना"

" ऐसा है तो वो अकेला चला जाएगा। जरूरी है क्या नव्या को साथ लेकर जाना? नव्या तो उसके सारे दोस्तों को भी ठीक से जानती भी नहीं"

" अरे नहीं जानती तो जान जाएगी। वो दोनों पति पत्नी हैं। तुम्हें शोभा देता है क्या बच्चों के साथ जाना"

" अरे! पर तरुण मेरा बेटा है"

" पर भाग्यवान, तुम्हारा बेटा अब किसी का पति भी है। अगर इतना ज्यादा इन दोनों के रिश्ते के बीच में आओगी तो एक दिन ऐसा आएगा कि तुम इस घर में अकेली रह जाओगी। हर रिश्ते की अपनी मर्यादा होती है। इतनी मर्यादा क्या तोड़ना कि मजबूर होकर बेटे बहू को तुम्हारे सामने खड़े होकर बोलना पड़े."

" ऐसे कैसे जी? मेरी बड़ी जीजी ने भी अपने बच्चों को कितनी छूट दी थी। क्या हुआ? बाद में बहू बेटे को लेकर के हमेशा हमेशा के लिए अलग हो गई। ना बाबा ना, मैं अपने बेटे को इस तरह अकेला नहीं छोड़ सकती और मैं नव्या को कोई मौका नहीं दूंगी कि वो मेरे बेटे को लेकर अलग हो"


" जब इतना ही डर था तो फिर बेटे की शादी ही क्यों की थी? देखो भाग्यवान, हर बात के दो पहलू होते हैं। जीजी का बेटा बहू लेकर अलग हुई। इल्जाम लगाना आसान है पर क्या उनके बेटे में अक्ल नहीं थी"

" लेकिन"

" लेकिन वेकिन कुछ नहीं। शाम को सिर्फ नव्या और तरुण जा रहे हैं। कुछ तो अपने संस्कारों पर भी विश्वास करो। थोड़ा स्पेस तो दो बच्चों को। और आइंदा मैंने इस तरह की हरकत देखी ना तो याद रखना मैं तरुण को कह दूंगा कि अपना ट्रांसफर दूसरे शहर करवा ले। फिर बैठी रहना अकेली."


जब श्रीनाथजी ने थोड़ा सख्त होते हुए कहा, तब जाकर सुषमा जी चुप हो गईं। आखिर पति को गुस्से में देख कर उन्होने चुप रहना ही ठीक समझा। क्योंकि वो जानती थीं, आखिर गलत वो खुद ही हैं। आखिर शाम को तरुण और नव्या ही पार्टी में गए।

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...