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Friday, 30 August 2024

अमर विश्वास’

 मेरी बेटी की शादी थी, और मैं कुछ दिनों की छुट्टी लेकर शादी की तैयारियों में व्यस्त था। उस दिन, जब मैं सफर से लौटकर घर आया, तो मेरी पत्नी ने मुझे एक लिफाफा थमाया। लिफाफा अनजान था, लेकिन प्रेषक का नाम देखकर मेरी जिज्ञासा और आश्चर्य बढ़ गया।


**‘अमर विश्वास’**—एक ऐसा नाम, जिसे मिले हुए वर्षों बीत गए थे। मैंने लिफाफा खोला, तो उसमें **1 लाख डॉलर का चेक** और एक चिट्ठी थी। इतनी बड़ी राशि, वह भी मेरे नाम पर! मैंने जल्दी से चिट्ठी खोली और एक सांस में ही सब कुछ पढ़ डाला। पत्र किसी परी कथा जैसा था, जिसने मुझे अचंभित कर दिया। लिखा था...


**"आदरणीय सर, मैं एक छोटी सी भेंट आपको दे रहा हूं। मुझे नहीं लगता कि आपके एहसानों का कर्ज मैं कभी उतार पाऊंगा। यह उपहार मेरी अनदेखी बहन के लिए है। घर पर सभी को मेरा प्रणाम।"**


**आपका,

अमर।**


मेरी आँखों में वर्षों पुरानी यादें चलचित्र की तरह तैरने लगीं।


एक बार, मैं चंडीगढ़ में टहलते हुए एक किताबों की दुकान पर अपनी पसंदीदा पत्रिकाएं देख रहा था। तभी मेरी नजर बाहर, पुस्तकों के ढेर के पास खड़े एक लड़के पर पड़ी। वह लड़का हर संभ्रांत व्यक्ति से कुछ अनुनय-विनय करता, और कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर वापस अपनी जगह पर लौट जाता। मैं काफी देर तक उसे देखता रहा। उसकी निराशा सामान्य नहीं थी। वह बार-बार नई उम्मीद के साथ अपनी कोशिश करता, लेकिन फिर वही निराशा उसके चेहरे पर लौट आती।


आखिरकार, मैं अपनी उत्सुकता रोक नहीं पाया और उस लड़के के पास जाकर खड़ा हो गया। वह कुछ सामान्य सी विज्ञान की पुस्तकें बेच रहा था। मुझे देखकर उसमें फिर से उम्मीद जगी और उसने बड़ी ऊर्जा के साथ मुझे पुस्तकें दिखानी शुरू कीं। मैंने ध्यान से देखा—साफ-सुथरा चेहरा, आत्मविश्वास झलकता हुआ, लेकिन पहनावा साधारण। ठंड का मौसम था, और उसने केवल एक हल्का सा स्वेटर पहना हुआ था। 


**"बच्चे, ये सारी पुस्तकें कितने की हैं?"** मैंने पूछा।


**"आप कितना दे सकते हैं, सर?"**


**"अरे, कुछ तुमने सोचा तो होगा।"**


**"आप जो दे देंगे,"** लड़का थोड़ा निराश होकर बोला।


**"तुम्हें कितना चाहिए?"** मैंने पूछा, अब यह समझते हुए कि वह मेरे साथ समय बिता रहा है।


**"5 हजार रुपए,"** वह लड़का कुछ कड़वाहट के साथ बोला।


**"इन पुस्तकों का कोई 500 भी दे दे तो बहुत है,"** मैंने अनायास कह दिया, उसे दुखी नहीं करना चाहता था, लेकिन यह सुनकर उसके चेहरे पर निराशा का बादल छा गया। मुझे अपनी बात पर पछतावा हुआ, और मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रखकर सांत्वना भरे शब्दों में फिर पूछा, **"देखो बेटे, मुझे तुम पुस्तक बेचने वाले नहीं लगते, सच बताओ, क्या जरूरत है?"**


लड़का तब जैसे फूट पड़ा। **"सर, मैं 10+2 कर चुका हूं। मेरे पिता एक छोटे से रेस्तरां में काम करते हैं। मेरा मेडिकल में चयन हो चुका है। अब प्रवेश के लिए पैसे की जरूरत है। कुछ मेरे पिताजी दे रहे हैं, कुछ का इंतजाम वह अभी नहीं कर सकते,"** उसने एक ही सांस में अच्छी अंग्रेजी में कहा।


**"तुम्हारा नाम क्या है?"** मैंने मंत्रमुग्ध होकर पूछा।


**"अमर विश्वास।"**


**"तुम विश्वास हो और दिल छोटा करते हो? कितना पैसा चाहिए?"**


**"5 हजार,"** उसने इस बार दीनता से कहा।


**"अगर मैं तुम्हें यह रकम दे दूं, तो क्या मुझे वापस कर पाओगे? इन पुस्तकों की इतनी कीमत तो है नहीं,"** मैंने थोड़ा हंसते हुए पूछा।


**"सर, आपने ही कहा कि मैं विश्वास हूं। आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं। मैं पिछले 4 दिन से यहां आता हूं, आप पहले आदमी हैं जिसने इतना पूछा। अगर पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया, तो मैं भी आपको किसी होटल में कप प्लेटें धोता हुआ मिलूंगा,"** उसके स्वर में अपने भविष्य की अनिश्चितता थी।


उसके स्वर ने मेरे दिल में उसके लिए सहानुभूति और मदद की भावना जगा दी। मैंने अपने पर्स से 5 हजार रुपए निकाले, जिन्हें मैं शेयर मार्केट में निवेश करने की सोच रहा था, और उसे दे दिए। वैसे इतने रुपए मेरे लिए भी मायने रखते थे, लेकिन न जाने किस भाव ने मुझसे वह पैसे निकलवा दिए।


**"देखो बेटे, मैं नहीं जानता कि तुम्हारी बातों में कितना दम है, लेकिन मेरा दिल कहता है कि तुम्हारी मदद करनी चाहिए, इसलिए कर रहा हूं।"** मैंने पैसे उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा।


अमर हतप्रभ था। उसकी आँखों में आंसू थे। उसने मेरे पैर छुए और कहा, **"सर, ये पुस्तकें मैं आपकी गाड़ी में रख दूं?"**


**"कोई जरूरत नहीं। यह मेरा कार्ड है, जब भी कोई जरूरत हो तो मुझे बताना।"**


वह मूक खड़ा रहा और मैंने उसका कंधा थपथपाया, फिर कार स्टार्ट कर दी। कार चलाते हुए वह घटना मेरे दिमाग में घूम रही थी और मैं अपने फैसले पर सोच रहा था।


दिन गुजरते गए। अमर ने अपने मेडिकल में दाखिले की सूचना मुझे एक पत्र के माध्यम से दी। मुझे अपनी मदद में कुछ मानवता नजर आई। मैंने फिर उसके पते पर कुछ और पैसे भेजे। दिन हवा होते गए। उसका संक्षिप्त सा पत्र आता, जिसमें वह मुझे और मिनी को याद करता। मैं कभी उसके पास जाकर अपने पैसे का उपयोग देखने नहीं गया, न कभी वह मेरे घर आया। कुछ साल तक यही क्रम चलता रहा। एक दिन उसका पत्र आया कि वह उच्च शिक्षा के लिए ऑस्ट्रेलिया जा रहा है। उसने छात्रवृत्तियों का जिक्र किया और एक लाइन मिनी के लिए भी लिखी।


समय पंख लगा कर उड़ता रहा। अमर ने अपनी शादी का कार्ड भेजा। मिनी भी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी। अब मुझे मिनी की शादी की तैयारियाँ करनी थीं, और इस बीच वह चेक? मैं फिर अपनी दुनिया में लौट आया और मिनी की शादी का एक कार्ड अमर को भी भेज दिया।


शादी की गहमागहमी के बीच, मैं और मेरी पत्नी व्यवस्थाओं में व्यस्त थे। अचानक एक बड़ी सी गाड़ी पोर्च में आकर रुकी। एक संभ्रांत व्यक्ति, जिसकी गोद में एक बच्चा था, गाड़ी से बाहर निकले। मैं उन्हें देखता रहा। 


उन्होंने आकर मेरे और मेरी पत्नी के पैर छुए। 


**"सर, मैं अमर..."** वह श्रद्धा से बोले।


मेरी पत्नी अचंभित रह गई, और मैंने गर्व से उसे सीने से लगा लिया। 🌟

वैसे उस की गलती क्या है

 जब मां का फोन आया, तब मैं बाथरूम से बाहर निकल रहा था. मेरे रिसीवर उठाने से पहले ही शिखा ने फोन पर वार्त्तालाप आरंभ कर दिया था. मां उस से कह रही थीं, ‘‘शिखा, मैं ने तुम्हें एक सलाह देने के लिए फोन किया है. मैं जो कुछ कहने जा रही हूं, वह सिर्फ मेरी सलाह है, सास होने के नाते आदेश नहीं. उम्मीद है तुम उस पर विचार करोगी और हो सका तो मानोगी भी…’’


‘‘बोलिए, मांजी?’’ ‘‘बेटी, तुम्हारे देवर पंकज की शादी है. वह कोई गैर नहीं, तुम्हारे पति का सगा भाई है. तुम दोनों के व्यापार अलग हैं, घर अलग हैं, कुछ भी तो साझा नहीं है. फिर भी तुम लोगों के बीच मधुर संबंध नहीं हैं बल्कि यह कहना अधिक सही होगा कि संबंध टूट चुके हैं. मैं तो समझती हूं कि अलगअलग रह कर संबंधों को निभाना ज्यादा आसान हो जाता है.


‘‘वैसे उस की गलती क्या है…बस यही कि उस ने तुम दोनों को इस नए शहर में बुलाया, अपने साथ रखा और नए सिरे से व्यापार शुरू करने को प्रोत्साहित किया. हो सकता है, उस के साथ रहने में तुम्हें कुछ परेशानी हुई हो, एकदूसरे से कुछ शिकायतें भी हों, किंतु इन बातों से क्या रिश्ते समाप्त हो जाते हैं? उस की सगाई में तो तुम नहीं आई थीं, किंतु शादी में जरूर आना. बहू का फर्ज परिवार को जोड़ना होना चाहिए.’’ ‘‘तो क्या मैं ने रिश्तों को तोड़ा है? पंकज ही सब जगह हमारी बुराई करते फिरते हैं. लोगों से यहां तक कहा है, ‘मेरा बस चले तो भाभी को गोली मार दूं. उस ने आते ही हम दोनों भाइयों के बीच दरार डाल दी.’ मांजी, दरार डालने वाली मैं कौन होती हूं? असल में पंकज के भाई ही उन से खुश नहीं हैं. मुझे तो अपने पति की पसंद के हिसाब से चलना पड़ेगा. वे कहेंगे तो आ जाऊंगी.’’


‘‘देखो, मैं यह तो नहीं कहती कि तुम ने रिश्ते को तोड़ा है, लेकिन जोड़ने का प्रयास भी नहीं किया. रही बात लोगों के कहने की, तो कुछ लोगों का काम ही यही होता है. वे इधरउधर की झूठी बातें कर के परिवार में, संबंधों में फूट डालते रहते हैं और झगड़ा करा कर मजा लूटते हैं. तुम्हारी गलती बस इतनी है कि तुम ने दूसरों की बातों पर विश्वास कर लिया. ‘‘देखो शिखा, मैं ने आज तक कभी तुम्हारे सामने चर्चा नहीं की है, किंतु आज कह रही हूं. तुम्हारी शादी के बाद कई लोगों ने हम से कहा, ‘आप कैसी लड़की को बहू बना कर ले आए. इस ने अपनी भाभी को चैन से नहीं जीने दिया, बहुत सताया. 


‘‘अगर शादी से पहले हमें यह समाचार मिलता तो शायद हम सचाई जानने के लिए प्रयास भी करते, लेकिन तब तक तुम बहू बन कर हमारे घर आ चुकी थीं. कहने वालों को हम ने फटकार कर भगा दिया था. यह सब बता कर मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहती, बल्कि कहना यह चाहती हूं कि आंखें बंद कर के लोगों की बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए. खैर, मैं ने तुम्हें शादी में आने की सलाह देने के लिए फोन किया है, मानना न मानना तुम्हारी मरजी पर निर्भर करता है,’’ इतना कह कर मां ने फोन काट दिया था. मां ने कई बार मुझे भी समझाने की कोशिश की थी, किंतु मैं ने उन की पूरी बात कभी नहीं सुनी. बल्कि,? उन पर यही दोषारोपण करता रहा कि वह मुझ से ज्यादा पंकज को प्यार करती हैं, इसलिए उन्हें मेरा ही दोष नजर आता है, पंकज का नहीं. 


लेकिन सचाई तो यह थी कि मैं खुद भी पंकज के खिलाफ था. हमेशा दूसरों की बातों पर विश्वास करता रहा. इस तरह हम दोनों भाइयों के बीच खाई चौड़ी होती चली गई. लेकिन फोन पर की गई मां की बातें सुन कर कुछ हद तक उन से सहमत ही हुआ. मां यहां नहीं रहती थीं. शादी की वजह से ही पंकज के पास उस के घर आई हुई थीं. वे हम दोनों भाइयों के बीच अच्छे संबंध न होने की वजह से बहुत दुखी रहतीं 


इसमें दोष शिखा का नहीं, मेरा था. मैं ही अपने निकटतम रिश्तों के प्रति ईमानदार नहीं रहा. जब मैं ने ही उन के प्रति उपेक्षा का भाव अपनाया तो मेरी पत्नी शिखा भला उन रिश्तों की कद्र क्यों करती?


कुछ बातों को नजरअंदाज क्यों नहीं कर पाते? तिल का ताड़ क्यों बना देते हैं? मैं सोचने लगा, पंकज मेरा सगा भाई है. यदि जानेअनजाने उस ने कुछ गलत किया या कहा भी है तो आपस में मिलबैठ कर मतभेद मिटाने का प्रयास भी तो कर सकते थे. गलतफहमियों को दूर करने के बदले हम रिश्तों को समाप्त करने के लिए कमर कस लें, यह तो समझदारी नहीं है. असलियत तो यह है कि कुछ शातिर लोगों ने दोस्ती का ढोंग रचाते हुए हमें एकदूसरे के विरुद्ध भड़काया, हमारे बीच की खाई को गहरा किया. हमारी नासमझी की वजह से वे अपनी कोशिश में कामयाब भी रहे, क्योंकि हम ने अपनों की तुलना में गैरों पर विश्वास किया.


शिखा की सिसकियों की आवाज से मेरा ध्यान भंग हुआ. वह बाहर वाले कमरे में थी. उसे मालूम नहीं था कि मैं नहा कर बाहर आ चुका हूं और फोन की पैरलेल लाइन पर मां व उस की पूरी बातें सुन चुका हूं. मैं सहजता से बाहर गया और उस से पूछा, ‘‘शिखा, रो क्यों रही हो?’’ ‘‘मुझे रुलाने का ठेका तो तुम्हारे घर वालों ने ले रखा है. अभी आप की मां का फोन आया था. आप की मां ने आरोप लगाया है कि मैंने अपनी शादी से पहले अपनी भाभी को बहुत सताया है, कह कर वह जोर से रोने लगी.


‘‘बस, यही आरोप लगाने के लिए उन्होंने फोन किया था?’’ ‘‘उन के हिसाब से मैं ने रिश्तों को तोड़ा है. फिर भी वे चाहती हैं कि मैं पंकज की शादी में जाऊं. मैं इस शादी में हरगिज नहीं जाऊंगी, यह मेरा अंतिम फैसला है. 


 मैं चाहते हुए भी तुम्हें पंकज के यहां चलने के लिए बाध्य नहीं करना चाहता.,तो तुम जाओगे? पंकज तुम्हारे व मेरे लिए जगहजगह इतना जहर उगलता फिरता है, फिर भी जाओगे?’’


‘‘उस ने कभी मुझ से या मेरे सामने ऐसा नहीं कहा. लोगों के कहने पर हमें पूरी तरह विश्वास नहीं करना चाहिए. लोगों के कहने की परवाह मैंने की होती तो तुम को कभी भी वह प्यार न दे पाता, जो मैं ने तुम्हें दिया है. अभी तुम मांजी द्वारा आरोप लगाए जाने की बात कर रही थीं. पर वह उन्होंने नहीं लगाया. लोगों ने उन्हें ऐसा बताया होगा. आज तक मैं ने भी इस बारे में तुम से कुछ पूछा या कहा नहीं. आज कह रहा हूं… तुम्हारे ही कुछ परिचितों व रिश्तेदारों ने मुझ से भी कहा कि शिखा बहुत तेजमिजाज लड़की है. अपनी भाभी को इस ने कभी चैन से नहीं जीने दिया. लेकिन मैं ने उन लोगों की परवाह नहीं की…’’ तुम ने उन की बातों पर विश्वास कर लिया? अगर विश्वास किया होता तो तुम से शादी न करता. तुम से बस एक सवाल करना चाहता हूं, लोग जब किसी के बारे में कुछ कहते हैं तो क्या हमें उस बात पर विश्वास कर लेना चाहिए.’’


‘‘मैं तो बस इतना जानती हूं कि वह सब झूठ है. हम से जलने वालों ने यह अफवाह फैलाई थी. इसी वजह से मेरी शादी में कई बार रुकावटें आईं.’’ ‘‘मैं ने भी उसे सच नहीं माना, बस तुम्हें यह एहसास कराना चाहता हूं कि जैसे ये सब बातें झूठी हैं, वैसे ही पंकज के खिलाफ हमें भड़काने वालों की बातें भी झूठी हो सकती हैं. उन्हें हम सत्य क्यों मान रहे हैं?’’


‘‘लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे बातें झूठी हैं. खैर, लोगों ने सच कहा हो या झूठ, मैं तो नहीं जाऊंगी. एक बार भी उन्होंने मुझ से शादी में आने को नहीं कहा.’’ ‘‘कैसे कहता, सगाई पर आने के लिए तुम से कितना आग्रह कर के गया था. यहां तक कि उस ने तुम से माफी भी मांगी थी. फिर भी तुम नहीं गईं. इतना घमंड अच्छा नहीं. उस की जगह मैं होता तो दोबारा बुलाने न आता.’’


‘‘सब नाटक था, लेकिन आज अचानक तुम्हें हो क्या गया है? आज तो पंकज की बड़ी तरफदारी की जा रही है?’’


तभी द्वार की घंटी बजी. पंकज आया था. उस ने शिखा से कहा, ‘‘भाभी, भैया से तो आप को साथ लाने को कह ही चुका हूं, आप से भी कह रहा हूं. आप आएंगी तो मुझे खुशी होगी. अब मैं चलता हूं, बहुत काम करने हैं.’’ पंकज प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किए बिना लौट गया.


मैं ने पूछा, ‘‘अब तो तुम्हारी यह शिकायत भी दूर हो गई कि तुम से उस ने आने को नहीं कहा? अब क्या इरादा है?’’


‘‘इरादा क्या होना है, हमारे पड़ोसियों से तो एक सप्ताह पहले ही आने को कह गया था. मुझे एक दिन पहले न्योता देने आया है. असली बात तो यह है कि मेरा मन उन से इतना खट्टा हो गया है कि मैं जाना नहीं चाहती. मैं नहीं जाऊंगी.’’ ‘‘तुम्हारी मरजी,’’ कह कर मैं दुकान चला गया.


थोड़ी देर बाद ही शिखा का फोन आया, ‘‘सुनो, एक खुशखबरी है. मेरे भाई हिमांशु की शादी तय हो गई है. 10 दिन बाद ही शादी है. उस के बाद कई महीने तक शादियां नहीं होंगी. इसीलिए जल्दी शादी करने का निर्णय लिया है.’’


‘‘बधाई हो, कब जा रही हो?’’ ‘‘पूछ तो ऐसे रहे हो जैसे मैं अकेली ही जाऊंगी. तुम नहीं जाओगे?’’


‘‘तुम ने सही सोचा, तुम्हारे भाई की शादी है, तुम जाओ, मैं नहीं जाऊंगा.’’ ‘‘यह क्या हो गया है तुम्हें, कैसी बातें कर रहे हो? मेरे मांबाप की जगहंसाई कराने का इरादा है क्या? सब पूछेंगे, दामाद क्यों नहीं आया तो


क्या जवाब देंगे? लोग कई तरह की बातें बनाएंगे…’’ ‘‘बातें तो लोगों ने तब भी बनाई होंगी, जब एक ही शहर में रहते हुए, सगी भाभी हो कर भी तुम देवर की सगाई में नहीं गईं…और अब शादी में भी नहीं जाओगी. जगहंसाई क्या


यहां नहीं होगी या फिर इज्जत का ठेका तुम्हारे खानदान ने ही ले रखा है, हमारे खानदान की तो कोई इज्जत ही नहीं है?’’


‘‘तो क्या तुम्हारा अंतिम फैसला है कि तुम मेरे भाई की शादी में नहीं जाओगे?’’ ‘‘अंतिम ही समझो. यदि तुम मेरे भाई की शादी में नहीं जाओगी तो


मैं भला तुम्हारे भाई की शादी में क्यों जाऊंगा?’’


‘‘अच्छा, तो तुम मुझे ब्लैकमेल कर रहे हो?’’ कह कर शिखा ने फोन रख दिया.


दूसरे दिन पंकज की शादी में शिखा को आया देख कर मांजी का चेहरा खुशी से खिल उठा था. पंकज भी बहुत खुश था.


मांजी ने स्नेह से शिखा की पीठ पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘बेटी, तुम आ गई, मैं बहुत खुश हूं. मुझे तुम से यही उम्मीद थी.’’ ‘‘आती कैसे नहीं, मैं आप की बहुत इज्जत करती हूं. आप के आग्रह को कैसे टाल सकती थी?’’


मैं मन ही मन मुसकराया. शिखा किन परिस्थितियों के कारण यहां आई, यह तो बस मैं ही जानता था. उस के ये संवाद भले ही झूठे थे, पर अपने सफल अभिनय द्वारा उस ने मां को प्रसन्न कर दिया था. यह हमारे बीच हुए समझौते की एक सुखद सफलता थी.

ये स्त्री के मूल में ही नहीं है...

 स्त्री कभी संतुष्ट नहीं होती ..... स्त्री से प्रेम में अगर आप ये उम्मीद करते हैं कि वो आपसे पूरी तरह खुश है तो आप नादानी में हैं

ये स्त्री के मूल में ही नहीं है अगर आप बहुत ज्यादा केयर करते है तो उससे भी ऊब जाएगी


अगर आप बहुत उग्र हैं तो वो उससे भी बिदक जाएगी


अगर आप बहुत ज्यादा विनम्र हैं तो वो उससे भी चिढ जाएगी


अगर आप उससे बहुत ज्यादा बात करते हैं तो वो आपको टेक इट फौर ग्रांटड लेने लगेगी


अगर आप उससे बहुत कम बात करते हैं तो वो मान लेगी कि आपका चक्कर कहीं और चल रहा है


यानी आप कुछ भी कर लीजिए वो संतुष्ट नहीं हो सकती


ये उसका स्वभाव है वो एक ऐसा डेडली काॅम्बीनेशन खोजती है जो बना ही न हो बन ही न सकता हो


ठीक वैसे ही जैसे कपड़ा खरीदने जाती है तो कहती कि इसी कलर में कोई दूसरा डिजाइन दिखाओ,


इसी डिजाइन में कोई दूसरा कलर दिखाओ


कपड़े का गट्ठर लगा देती है...


बहुत परिश्रम के बाद एक पसंद आ भी गया, तो भी संतुष्ट नहीं हो सकती...


आखिरी तक सोचती है कि इसमे ये डिजाइन ऐसे होता तो परफैक्ट होता...


इन सबके बावजूद एक बहुत बड़ी खूबी भी है स्त्री के अंदर ...


एक बार उसे कुछ पसंद आ गया तो उसे आखिरी दम तक सजो के रखती है वो चाहे रिश्ते हो या चूड़ी


रंग उतर जाएगा चमक खत्म हो जाएगी पर खुद से जुदा नहीं करेगी


बस यही खूबी स्त्री को विशिष्ट बनाती है


स्त्री से प्रेम में अगर आप ये उम्मीद करते हैं कि वो आपसे पूरी तरह खुश है तो आप नादानी में हैं...


ये स्त्री के मूल में ही नहीं है...

सेक्स एक ऐसा विषय है..

 सेक्स एक ऐसा विषय है.......

जिसे हर कोई अनुभव करना चाहता है, चाहे वह महिला हो या पुरुष। कामुकता और सेक्स से जुड़ी बातें हर किसी को आकर्षित करती हैं, और ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि यह हमारी प्रकृति का हिस्सा है। सहमति से किया गया सेक्स बिल्कुल गलत नहीं है, बल्कि इसे भी अन्य सामान्य क्रियाओं की तरह ही समझा जाना चाहिए। 


सेक्स, जब सही ढंग से किया जाए, तो यह सबसे सुखद अनुभव हो सकता है। महर्षि वात्स्यायन जैसे महान दार्शनिक ने कामसूत्र जैसी पुस्तक में सेक्स का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, जो दर्शाता है कि यह विषय चर्चा के योग्य है और इसे खुले मन से स्वीकार किया जाना चाहिए। 


हालांकि, समाज में कुछ लोग खुद को अत्यधिक संस्कारवान दिखाने का प्रयास करते हैं। जब भी कोई सेक्स की बातें करता है, तो ये लोग बड़ी मर्यादा और नैतिकता का दिखावा करते हैं, जैसे वे इस विषय से बिल्कुल अनभिज्ञ हों। परंतु, वास्तविकता यह है कि यही लोग कामवासना में सबसे अधिक लिप्त होते हैं और अकेले में पोर्न वीडियो देखने से भी नहीं चूकते, लेकिन सबके सामने एक अलग चेहरा दिखाते हैं। 


महान दार्शनिक रजनीश ओशो ने कहा है कि जैसे नहाना, खाना, सोना-जागना हमारी दैनिक क्रियाएं हैं, ठीक वैसे ही सेक्स भी एक सामान्य क्रिया है। यह बस एकांत में की जाने वाली क्रिया है, लेकिन इसके बारे में बात करने में कोई बुराई नहीं होनी चाहिए। 


मैं हर विषय पर खुलकर लिखता हूं, चाहे वह सेक्स हो या कोई अन्य मुद्दा। सेक्स पर बात करने में कोई बुराई नहीं है, क्योंकि बुराई तो किसी भी अच्छे काम में ढूंढी जा सकती है। इसलिए, क्यों न हम इस डर को छोड़कर इस पर भी खुलकर चर्चा करें? ✨

     सुनिल राठौड़   👈👈👈

हमें जो चीजें बहुत सुख देती हैं उसमें धन की कोई भूमिका नहीं होती

 हमें जो चीजें बहुत सुख देती हैं उसमें धन की कोई भूमिका नहीं होती। जैसे बॉयफ्रेंड/गर्लफ्रेंड के साथ बाहों में बाहें डालकर घूमना, चुम्बन, सेक्स। मुक्त होकर घूमना। पेड़ पर चढ़ जाना। खरगोश, बिल्ली, कुत्ते के साथ खेलना। नदी किनारे गर्लफ्रेंड/बॉयफ्रेंड के साथ बैठना, पानी के बहाव को निहारना,पानी मे दूर तक कंकड़ फेंकना। यूँ ही टहलते रहना।

इसमें किसी चीज में धन का रोल नहीं है। केवल पेट भरने के लिए धन को इतना जरूरी कर दिया गया, उसके बाद इतनी आवश्यकताएं क्रिएट की गईं कि सुख वाली चीजें लोग भूल ही गए। उन पर नैतिकता के इतने पहरे लगा दिए गए कि वह अपराध बन गया। 

असल चीज वह बन चुकी है जिसका हमारे सुख से दरअसल कोई लेना देना ही नहीं है। एक इल्यूजन में हम जीने को बाध्य हैं और वहाँ सुख ढूंढते हैं जहां सुख है ही नहीं।

देखो बे लौंडों! जब कभी जिंदगी में इतना टूट जाओ

 देखो बे लौंडों! जब कभी जिंदगी में इतना टूट जाओ और लगे कि सब कुछ खत्म हो चुका है अब साला कुछ नही बचा जीने को! सुसाइड का खयाल आए और सोंचने लगो कि अब मर ही जातें हैं, या पागल होने के कगार पर पहुँच जाओ...मतलब एकदम वर्स केस हो जाए, चाहें वो किसी ऐसे के चले जाने की वजह से हो जिसे तुम अपना सब कुछ मानते थे या फिर साला ये emi भरने के लिए नौकरी करने की वजह से हो या फिर चाहें जो कुछ भी रीज़न हो तो एक काम करना। सब कुछ छोड़-छाड़ के निकल जाना बस। अगर नौकरी करते हो तो नौकरी छोड़ देना अगर पढ़ाई करते हो तो पढ़ाई बन्द कर देना क्योंकि भोसd के जीना बहुत जरूरी है और जिंदगी उतनी ही खूबसूरत है पर ये सब बातें तुम तभी जान पाओगे जब ये सारा बुरा फेस बिताकर जिंदा बच जाओगे। जानता हूँ कि ये सब इतना आसान नही है पर बस तुम सोचना मत, कर देना इतना! क्योंकि मर जाना सबसे आसान होता है। 


देखो! पढ़ाई या नौकरी छोड़कर जायेंगे भी कहाँ। कब तक भागेंगे यही ना? तो बस 2-3 महीने के लिए घर पर चले आओ सबसे पहले तो। और साला एक बात बताएं! जिंदगी में चाहें कितनी भी परेशानियां हो न अगर तुम्हारे पास 2-4 ढंग के दोस्त हैं न तो सब ठीक हो जाता है और अगर वो नही हैं न तो साला तुम आज तक जी ही नही रहे थे। तो फ़ोन करो उन्हें या जाओ उन ख़ास दोस्तों के पास और मन भर रो लो। जितना मन करे खुल के रो लो पहिले। ऐसा नही है कि एक बार रो देने भर से तुम्हारे सारे आँसू निकल जाएंगे या सारा दर्द। रोने का ये सिलसिला चलता रहेगा अभी कुछ दिनों तक पर यकीन करो बहुत कुछ हल्का हो जाएगा एक बार किसी के सामने खुल के रो लेने पर।


कुछ बहुत बुरा होने के बाद इससे पहले कि तुम खुद को शराब और सिगरेट में झोंकों उससे पहले ही मेडिटेशन की तरफ मुड़ जाओ। ऐसे बहुत से फ्री कोर्सेज हैं जो तुम्हें हफ्ते-दश दिन अपने पास रखेंगे और तुम्हारे अंदर बहुत कुछ सकारात्मक बदलाव ले आएंगे! तो उनको करो। फिर जब निकलो तो अगर पैसे-रुपये ना हों तो उधार लो दोस्तों से और निकल पड़ो किसी भी शहर में। यूँ ही भटकने को। किसी दिन पूरी दोपहरी किसी चौराहे पर पेड़ के नीचे बैठकर यूँ ही लोगों को आते जाते देखते हुए बिता दो। हाँ पता है यही कहोगे कि अकेलेपन में बुरी चीजें और भी याद आती हैं पर नही बे! जब तुम किसी दुपहरी को ऐसे बिता दोगे न तो देखोगे और खुद ही समझ पाओगे कि साला सच में दुनिया क्या है और क्या तमाशा चल रहा है यहाँ और यकीन मानो वो चीज़ बिना तुम्हारे खुद के अनुभव किए बिना नही आएगी और ना ही कोई समझा पाएगा तुम्हें।


साला ऐसे टाइम में सबसे ज्यादा जरूरत होती है प्यार की! पर कभी भी ऐसे बुरे वक्त में प्यार मत करना। क्योंकि इस वक़्त इंसान प्यार कम सहारा ज्यादा ढूंढ़ता है और ऐसे में तुम्हें तो सहारा मिल जाता है और अच्छा भी लगने लगता है पर कुछ समय बाद जब होश आता है तो पता चलता है कि तुम सामने वाले इंसान की फीलिंग्स के साथ पूरी तरह से न्याय नही कर पा रहे हो और कहीं न कहीं धोका दे रहे हो उसे और अगर उस वक्त तुम्हारा जमीर फिर से जाग गया! जो कि जागेगा ही क्योंकि अगर तुम्हारे अंदर अगर जमीर नही होता तो तुम्हारी ये कंडीशन ही नही होती, तो उस वक्त गुरु! तुम्हें मरने से कोई नही बचा नही बचा पाएगा। तो इन सब चूतियापे में मत पड़ना कि एक सब्स्टीट्यूट के सहारे तुम ठीक हो जाओगे। अगर सब्स्टीट्यूट वाले तुम होते न तुम्हारी इतनी गांd ही नही फटती कभी। 


बाकी तुम्हें अगर सेक्स चाहिए तो करो! और हो सके तो किसी ऐसे इंसान से करो जिसको तुम्हारी न बोली समझ आती हो न भाषा! इसका एक बड़ा फायदा ये होगा कि तुम्हारे अंदर के जज़्बात उसके साथ नही जुड़ पाएंगे न ही उस वक्त तुम्हारी एकतरफा कही बातों का कोई मतलब होगा। तो जाओ उसके पास और रोते हुए जो कुछ भी कहना चाहते थे किसी और से सब कह लो! और सेक्स करने के लिए हैं बहुत से लीगल जगहें तो इस बात का ख़ास ध्यान रखना कि इसके लिए किसी की फीलिंग्स के साथ मत खेलना कभी, किसी को नुकसान ना पहुंचाना। जो करना है करो, जितनी तकलीफें देनी हैं दो! लेकिन खुद को! पर बेटीचो* जिंदा रहो! बस कुछ दिन! साला अगर मर गए न झांt ये देखकर अफसोस करने को भी नही मिलेगा कि जिंदगी कितनी खूबसूरत थी। जो जाना चाहता है उसे जाने दो! जो गया उसे भूल जाओगे! सबको अपनी जिंदगी जीने का हक अपने हिसाब से है तो इस बात का रंDरोना मत रोओ कि मेरे साथ ऐसा क्यों किया या मेरे साथ वैसा क्यों किया। तुम्हारे साथ न कोई अच्छा कर सकता है और न कोई बुरा जब तक तुम न चाहो। बाकी जीने दो सबको खुशी-खुशी! फिर धीरे-धीरे देखोगे की कैसे साला जिंदगी मजे से पटरी पर चढने लगती है और फिर से फूल रफ्तार में भागना शुरू कर देती है। बस जिंदा रहना और कभी जरूरत हो तो बताना! लव गुरु खाली fm पर नही मिला करते 🖤


मलाल

किसी भी गरीब** की गरीबी का मजाक बनाने के बजाय उसकी **प्रतिभा** का उचित सम्मान करें। 😀

 एक **फटी धोती** और **फटी कमीज** पहने एक व्यक्ति अपनी **15-16 साल की बेटी** के साथ एक बड़े होटल में पहुंचा। उन्हें कुर्सी पर बैठते देख एक वेटर ने उनके सामने **दो गिलास साफ ठंडा पानी** रख दिया और पूछा, "आपके लिए क्या लाना है?" 💧


उस व्यक्ति ने कहा, "मैंने मेरी बेटी से वादा किया था कि यदि तुम **कक्षा दस में जिले में प्रथम** आओगी तो मैं तुम्हें शहर के सबसे बड़े होटल में एक **डोसा** खिलाऊंगा। इसने वादा पूरा कर दिया। कृपया इसके लिए एक **डोसा** ले आओ।" 🥇🥘


वेटर ने पूछा, "आपके लिए क्या लाना है?" उसने कहा, "मेरे पास एक ही डोसे का पैसा है।" 💔


पूरी बात सुनकर वेटर मालिक के पास गया और पूरी कहानी बताकर कहा, "मैं इन दोनों को भर पेट नाश्ता कराना चाहता हूँ। अभी मेरे पास पैसे नहीं हैं, इसलिए इनके बिल की रकम आप मेरी सैलरी से काट लेना।" 🤝


मालिक ने कहा, "आज हम होटल की तरफ से इस होनहार बेटी की सफलता की **पार्टी** देंगे।" 🎉


होटलवालों ने एक **टेबल** को अच्छी तरह से सजाया और बहुत ही शानदार ढंग से सभी उपस्थित ग्राहकों के साथ उस गरीब बच्ची की सफलता का जश्न मनाया। मालिक ने उन्हें एक बड़े थैले में **तीन डोसे** और पूरे मोहल्ले में बांटने के लिए **मिठाई** उपहार स्वरूप पैक करके दे दी। इतना **सम्मान** पाकर आंखों में **खुशी के आंसू** लिए वे अपने घर चले गए। 🎁😢


समय बीतता गया और एक दिन वही लड़की **I.A.S.** की परीक्षा पास कर उसी शहर में **कलेक्टर** बनकर आई। उसने सबसे पहले उसी होटल में एक सिपाही भेजकर कहलवाया कि **कलेक्टर साहिबा** नाश्ता करने आएंगी। होटल मालिक ने तुरन्त एक **टेबल** को अच्छी तरह से सजा दिया। यह खबर सुनते ही पूरा होटल ग्राहकों से भर गया। 🏛️👮‍♂️


कलेक्टर रूपी वही लड़की होटल में मुस्कराती हुई अपने माता-पिता के साथ पहुंची। सभी उसके सम्मान में खड़े हो गए। होटल के मालिक ने उन्हें **गुलदस्ता** भेंट किया और ऑर्डर के लिए निवेदन किया। 🌸🙇‍♂️


उस लड़की ने खड़े होकर होटल मालिक और उस वेटर के आगे **नतमस्तक** होकर कहा, "शायद आप दोनों ने मुझे पहचाना नहीं। मैं वही लड़की हूँ जिसके पिता के पास दूसरा **डोसा** लेने के पैसे नहीं थे और आप दोनों ने **मानवता की सच्ची मिसाल** पेश करते हुए, मेरे पास होने की खुशी में एक शानदार पार्टी दी थी और मेरे पूरे मोहल्ले के लिए भी मिठाई पैक करके दी थी।" 🥰🙏


"आज मैं आप दोनों की बदौलत ही **कलेक्टर** बनी हूँ। आप दोनों का **एहसान** मैं सदैव याद रखूंगी। आज यह **पार्टी** मेरी तरफ से है और उपस्थित सभी ग्राहकों एवं पूरे होटल स्टाफ का बिल मैं दूंगी। कल आप दोनों को '**श्रेष्ठ नागरिक**' का सम्मान एक नागरिक मंच पर किया जाएगा।" 🎖️👩‍💼


### **शिक्षा**

**किसी भी गरीब** की गरीबी का मजाक बनाने के बजाय उसकी **प्रतिभा** का उचित सम्मान करें। 😀

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...