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Tuesday, 20 August 2024

सोने का अंडा देने वाली मुर्गी मेरे हाथ से फिसल गई

 सोने का अंडा देने वाली मुर्गी मेरे हाथ से फिसल गई 😢💔


मैं, संदीप, पुणे का रहने वाला एक साधारण युवक था। मेरी जिंदगी तब तक सामान्य गति से चल रही थी, जब तक कि मेरी मुलाकात एक महिला, स्नेहा, से नहीं हुई। स्नेहा, जोकि एक अकेली और आत्मनिर्भर महिला थी, ने मेरे जीवन में एक नया मोड़ ला दिया। हम दोनों ने पहली बार एक कॉफी शॉप में मुलाकात की थी, और जल्दी ही हमारी दोस्ती गहरी हो गई।


स्नेहा का व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक था। उसकी बातें सुनकर मेरे दिल में एक खास जगह बनने लगी थी। हम जल्दी ही अच्छे दोस्त बन गए और अक्सर मिलने लगे। मैं उसके घर भी जाने लगा, और वह मेरी बातों और संगत में आनंद महसूस करती थी।


धीरे-धीरे हमारी दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि हमारे बीच शारीरिक संबंध भी बन गए। स्नेहा ने मुझे हमेशा अपने पास बुलाना शुरू कर दिया, और हर बार हमारे बीच कुछ न कुछ नया होता रहा। वह मुझे अक्सर आर्थिक रूप से भी मदद करती थी, जिसे मैं उस समय सामान्य समझता था। यह सिलसिला करीब दो साल तक चलता रहा।


एक दिन, स्नेहा ने अपनी एक खास इच्छा जाहिर की। उसने मुझे बताया कि वह एक नए अनुभव की तलाश में है और चाहती है कि हम दोनों के साथ एक और व्यक्ति हो। मुझे यह सुनकर थोड़ा अजीब लगा, लेकिन उसने मुझे किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढने को कहा जिस पर मैं भरोसा कर सकूं।


मेरा एक पुराना दोस्त, अनीश, जो मेरे काफी करीब था, मुझे तुरंत याद आया। मैंने उसे इस प्रस्ताव के बारे में बताया और वह इसके लिए तैयार हो गया। हम दोनों ने योजना बनाई और एक दिन हम तीनों, स्नेहा के घर पर मिले। उस रात हमने साथ में समय बिताया, और स्नेहा की इच्छाओं को पूरा किया।


मेरे लिए सब कुछ ठीक था, लेकिन जल्द ही मुझे एहसास हुआ कि सब कुछ बदल गया है। उस घटना के बाद, स्नेहा ने मुझसे बात करना कम कर दिया। उसने मेरा फोन उठाना बंद कर दिया और जब भी मैं उसके घर जाता, वह मुझे देखकर ठंडी प्रतिक्रिया देती। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक यह सब क्यों हो रहा है।


कुछ दिन बाद, मैं और अनीश एक कैफे में बैठे हुए थे। बातचीत के दौरान, अनीश ने अचानक मुझे धन्यवाद दिया। मैंने हैरानी से पूछा, "धन्यवाद किस बात का?"


अनीश ने मुस्कुराते हुए कहा, "संदीप, तुमने जो स्नेहा से मिलवाया, उसके लिए धन्यवाद! अब वह मुझे रोज बुलाती है, और हम दोनों का समय बहुत अच्छा बीतता है। साथ ही, वह मुझे पैसे भी देती है।"


अनीश की बात सुनकर मेरे दिल में एक अजीब सा दर्द हुआ। मुझे समझ में आ गया था कि स्नेहा ने मुझे छोड़ दिया है क्योंकि उसे मुझसे बेहतर विकल्प मिल गया था।


वह दिन मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक बन गया। मैंने अपनी ही गलती से सब कुछ खो दिया। अगर मैंने उस दिन अनीश को स्नेहा से मिलवाने का फैसला नहीं किया होता, तो शायद आज भी सब कुछ मेरे पास होता।


स्नेहा अब मेरी जिंदगी से बाहर जा चुकी थी, और मैं खुद को बेहद अकेला महसूस करने लगा था।


इस कहानी से यह सीखने को मिलता है कि रिश्तों में भरोसा और समझदारी बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। किसी भी निर्णय को लेने से पहले उसके परिणामों के बारे में सोचने की जरूरत होती है, क्योंकि एक छोटी सी गलती हमारी जिंदगी को पूरी तरह बदल सकती है।

मैं अभी भी उस जीवनसाथी की तलाश में हूँ जो मुझे मेरी कमियों के साथ स्वीकार कर सके

 नीलम दुविधा में फँस गई कि वेटिंग रूम से उठकर इंटरव्यू के लिए अंदर जाए या नहीं? उसने राकेश को उसी कमरे में जाते देखा था जहाँ नौकरी चाहनेवालों का साक्षात्कार चल रहा था। नीलम के मन में कई विचार उथल-पुथल मचा रहे थे।


कुछ साल पहले की बात है, नीलम एक प्रतिष्ठित कंपनी में अच्छी खासी तनख्वाह पर काम करती थी। उसके और राकेश के रिश्ते की बात चली थी। दोनों एक-दूसरे से मिले भी थे। लेकिन नीलम ने यह कहकर शादी से इनकार कर दिया था कि राकेश का वेतन उससे कम था। उस वक्त उसे लगा था कि एक ऐसी जिंदगी चाहिए जिसमें उसका जीवनसाथी उससे अधिक कमा सके, ताकि उसे समाज में गर्व महसूस हो।


लेकिन समय ने ऐसा मोड़ लिया कि नीलम की कंपनी में छँटनी हो गई और वह भी इस चपेट में आ गई। अब वह दूसरी नौकरी के लिए संघर्ष कर रही थी। इस इंटरव्यू में आकर पता चला कि जिस कंपनी में वह जॉब के लिए आई थी, राकेश उसी कंपनी में काम करता था और इंटरव्यू लेनेवाली टीम में शामिल था। एकबारगी नीलम के मन में आया कि राकेश के सामने अपनी बेइज्जती कराने से बेहतर है कि वह वापस चली जाए, लेकिन नौकरी की जरूरत ने उसे वहां रुकने पर मजबूर कर दिया।


अपनी बारी आने पर वह इंटरव्यू कमेटी के सामने बैठी। टीम के सदस्य सवाल पूछ रहे थे, और नीलम ने उन्हें अच्छे से जवाब दिए। तभी राकेश ने सीधे उसपर सवाल दागा, "आप हमारे पैकेज पर काम करने के लिए तैयार हैं?"


राकेश के इस सवाल ने मानो नीलम की दुखती रग पर हाथ रख दिया। उसने पुरानी बातों को याद करते हुए अपने मन में उठी कड़वाहट को दबाया और सधे हुए स्वर में जवाब दिया, "जी, मैं तैयार हूँ। पैकेज तो योग्यता पर भी निर्भर करता है। मुझे एक मौका दीजिए, मैं खुद को साबित करने की पूरी कोशिश करूँगी।"


राकेश के कारण नीलम को नौकरी मिल गई, लेकिन उसे यह समझ में आ गया था कि यह नौकरी उसके पुराने निर्णय का परिणाम भी हो सकती है। संयोगवश उसे राकेश की टीम में काम करने का मौका मिला, और वह उसकी अधीनस्थ बन गई।


पहले ही दिन, राकेश ने उससे सीधे सवाल किया, "मेरे साथ काम करने में कोई संकोच तो नहीं? वैसे अब तो मेरा पैकेज भी आपसे ज्यादा है।"


नीलम ने थोड़ी देर सोचा, फिर हिम्मत बटोरकर बोली, "आप पुरानी बातों को नहीं भूले हैं। तब से आज तक बहुत कुछ बदल गया है। मुझे अपनी गलती का एहसास हो चुका है। महिलाओं की बराबरी की चाहे कितनी भी बातें की जाएं, लेकिन जब मौका आता है, तो हम खुद ही पीछे हट जाते हैं। मैं उस वक्त ऐसे जीवनसाथी की तलाश में थी जो मुझसे अधिक कमा सके और उम्र में मुझसे बड़ा हो। लेकिन आज मुझे समझ में आ गया है कि यह सोच गलत थी। आखिर क्यों जरूरी है कि पति उम्र में बड़ा हो और ज्यादा कमाता हो? क्यों स्त्रियां खुद को पुरुषों से कमतर समझें?"


राकेश, जो इतनी साफगोई की उम्मीद नहीं कर रहा था, थोड़ी देर चुप रहा, फिर धीरे से बोला, "मैं अभी भी उस जीवनसाथी की तलाश में हूँ जो मुझे मेरी कमियों के साथ स्वीकार कर सके। वैसे बता दूं, अगर उस दिन आपने मुझसे शादी से मना नहीं किया होता, तो शायद मैं आज यहाँ नहीं होता। और हाँ, आपके रेज़्यूमे से पता चला कि आप अभी भी सिंगल हैं। क्या हम आज रात डिनर पर चल सकते हैं?"


नीलम ने मुस्कुराते हुए कहा, "शायद यह हमारे लिए दूसरा मौका है।"


क्या नीलम का जवाब बताने की जरूरत है? शायद नहीं, क्योंकि कभी-कभी जिंदगी हमें दूसरा मौका देती है, और यह सिर्फ हम पर निर्भर करता है कि हम उसे कैसे अपनाते हैं।

बहन बेटियाँ , सावधान

 बहन बेटियाँ , सावधान


जब कोई रिश्तेदार मामा, चाचा, ताऊ, फूफा, मौसा पड़ोसी, कज़िन भैया आदि प्रकार का रिश्ता किनारे रख कर तुमसे कहने लगे "रिश्ते अपनी जगह ,पर मैं तो तुम्हें अपनी फ्रेंड मानता हूँ।

तुम एक मॉर्डन गर्ल हो आज के ज़माने की तो पुराने टाइप के रिश्ते मत मानो।


"तो अपने माता पिता भाई को बता दो" क्योंकि उनकी नियत में खोट है।


फेसबुक के फ्रेंड किसी फ्रेंडशिप के प्रतीक नहीं हैं । फेसबुक फ्रेंड मतलब फालतू के फ्रेंड, सिर्फ ऑनलाइन हैं ये, 

इनसे जिंदगी पर तब तक कोई फर्क नही जबतक असल जिंदगी में न मिलो।।।

अतः फेसबुक पर उनकी फ्रेंड रिक्वेस्ट को संदेह से न देखो....

पर इनबॉक्स और व्हाट्सअप में वीडियो कोटेशन शेयर करने लगें तो सावधान।


पुरुषों के हथकंडे -

वे तुमसे ऐसे बातें करेंगे कि दर्द आंखों से छलक पड़े

स्वयं को अपनी पत्नी के पिछड़ेपन से त्रस्त दिखाएंगे 

खुद हैंडसम बने रह कर जताएंगे कि बहुत पुराने विचारों की पत्नी मिली है,दर्द किससे कहे...

  

तुम अगर कह बैठी कि मुझसे कहिये, मै हूँ न तो बस तुम्हारा जीवन उनके हवाले हो गया।


पत्नी को बीमार बता सकते हैं

पत्नी के अवैध संबंधों की झूठी बात बता कर सहानुभूति लूटेंगे..


तुम्हें सुंदर और इंटेलीजेंट बता कर काबू करेंगे,

तुम में उन्हें अचानक ऐश्वर्या, सानिया, कल्पना चावला दिखने लगेगी।

तुम्हारी मम्मी - पापा की ज़्यादा केअर शुरू करेंगे,


तुम्हें वो गिफ्ट करना शुरू करेंगे जो पापा नहीं दे सकते 

कोई कुछ कहेगा भी नहीं 

उनसे रिश्ता ही ऐसा है अचानक गिफ्ट बढ़ जाएं

कपड़े ज़्यादा प्राप्त होने लगें घर आना जाना बढ़ जाये

तुम्हें एग्जाम दिलाने वे स्वयं जाने लगे।


सावधान


कोई पुरुष रिश्ते की आड़ में तुम्हें लूटने की तैयारी में है।

अच्छी नियत वाले भी अलग दिख जाते हैं, सबसे सुरक्षित रहें।।।

माँ - बाप, सगे भाई- बहन के अलावा कोई हितैषी नही!!...

कॉपी पेस्ट शेयर जरूर करें।।

जय मातृशक्ति 🚩🚩

Monday, 19 August 2024

सभी पिताओं को समर्पित*

 यह कमाल है


   1. माँ 9 महीने पालती है, बाप 25 साल पालता है, दोनों बराबर है, फिर भी पता नहीं क्यों बाप पीछे है।


   2. माँ बिना तनख्वाह के परिवार चलाती है, पिता अपनी सारी तनख्वाह परिवार के लिए खर्च कर देता है, दोनों के प्रयास समान हैं, फिर भी पता नहीं क्यों पिता पिछड़ रहे हैं।


   3. माँ जो चाहे पकाती है, बाप जो चाहता है खरीदता है, उनका प्यार बराबर होता है, लेकिन माँ का प्यार श्रेष्ठ दिखाया जाता है। पता नहीं पापा क्यों पीछे हैं।


   4. अगर आप फोन पर बात करते हैं, तो आप सबसे पहले अपनी मां से बात करना चाहते हैं, जब आप मुसीबत में होते हैं, तो आप 'मां' के रूप में रोते हैं। जरूरत पड़ने पर ही आप पापा को याद करते हैं, लेकिन क्या डैड को कभी इस बात का बुरा नहीं लगता कि आप उन्हें दूसरी बार याद नहीं करते? मुझे नहीं पता कि बच्चों से प्यार पाने के मामले में पिता पीढ़ियों से क्यों पिछड़ रहे हैं।


   5. कोठरी रंग-बिरंगी साड़ियों और ढेर सारे बच्चों के कपड़ों से भरी होगी लेकिन पिता के कपड़े बहुत कम हैं, उन्हें अपनी जरूरतों की परवाह नहीं है, फिर भी उन्हें पता नहीं है कि पिता क्यों पिछड़ रहे हैं।


   6. मां के पास सोने के बहुत से आभूषण हैं, लेकिन पिता के पास एक ही अंगूठी है जो उन्हें उनकी शादी में दी गई थी। फिर भी माँ कम गहनों की शिकायत कर सकती हैं और पिताजी नहीं करते। फिर भी न जाने क्यों पापा पीछे हैं।


   7. पापा पूरी जिंदगी परिवार को संभालने के लिए मेहनत करते हैं, लेकिन जब बात पहचान की आती है तो पता नहीं क्यों वो हमेशा पीछे रह जाते हैं।


   8. माँ कहती है कि हमें इस महीने कॉलेज ट्यूशन देना है, कृपया मेरे लिए त्योहार के लिए एक साड़ी खरीद लें, लेकिन पिताजी ने नए कपड़े के बारे में सोचा भी नहीं था। दोनों में है बराबर का प्यार, फिर भी न जाने पापा क्यों पिछड़ रहे हैं।


   9. जब माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं, तो बच्चे कहते हैं, माँ कम से कम घर का काम देखने के लिए उपयोगी है, लेकिन वे कहते हैं, पिताजी बेकार हैं।


   10. पिताजी पीछे हैं क्योंकि वे परिवार की रीढ़ हैं। और हमारी रीढ़ हमारे शरीर के पीछे होती है। लेकिन उनकी वजह से हम अपने दम पर खड़े हो सकते हैं। शायद इसीलिए वो पीछे है...!!!!


   *मुझे नहीं पता कि इसे किसने लिखा है।

   सभी पिताओं को समर्पित*

   यह कमाल है


   1. माँ 9 महीने पालती है, बाप 25 साल पालता है, दोनों बराबर है, फिर भी पता नहीं क्यों बाप पीछे है।


   2. माँ बिना तनख्वाह के परिवार चलाती है, पिता अपनी सारी तनख्वाह परिवार के लिए खर्च कर देता है, दोनों के प्रयास समान हैं, फिर भी पता नहीं क्यों पिता पिछड़ रहे हैं।


   3. माँ जो चाहे पकाती है, बाप जो चाहता है खरीदता है, उनका प्यार बराबर होता है, लेकिन माँ का प्यार श्रेष्ठ दिखाया जाता है।  पता नहीं पापा क्यों पीछे हैं।


   4. अगर आप फोन पर बात करते हैं, तो आप सबसे पहले अपनी मां से बात करना चाहते हैं, जब आप मुसीबत में होते हैं, तो आप 'मां' के रूप में रोते हैं।  जरूरत पड़ने पर ही आप पापा को याद करते हैं, लेकिन क्या डैड को कभी इस बात का बुरा नहीं लगता कि आप उन्हें दूसरी बार याद नहीं करते?  मुझे नहीं पता कि बच्चों से प्यार पाने के मामले में पिता पीढ़ियों से क्यों पिछड़ रहे हैं।


   5. कोठरी रंग-बिरंगी साड़ियों और ढेर सारे बच्चों के कपड़ों से भरी होगी लेकिन पिता के कपड़े बहुत कम हैं, उन्हें अपनी जरूरतों की परवाह नहीं है, फिर भी उन्हें पता नहीं है कि पिता क्यों पिछड़ रहे हैं।


   6. मां के पास सोने के बहुत से आभूषण हैं, लेकिन पिता के पास एक ही अंगूठी है जो उन्हें उनकी शादी में दी गई थी।  फिर भी माँ कम गहनों की शिकायत कर सकती हैं और पिताजी नहीं करते।  फिर भी न जाने क्यों पापा पीछे हैं।


   7. पापा पूरी जिंदगी परिवार को संभालने के लिए मेहनत करते हैं, लेकिन जब बात पहचान की आती है तो पता नहीं क्यों वो हमेशा पीछे रह जाते हैं।


   8. माँ कहती है कि हमें इस महीने कॉलेज ट्यूशन देना है, कृपया मेरे लिए त्योहार के लिए एक साड़ी खरीद लें, लेकिन पिताजी ने नए कपड़े के बारे में सोचा भी नहीं था।  दोनों में है बराबर का प्यार, फिर भी न जाने पापा क्यों पिछड़ रहे हैं।


   9. जब माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं, तो बच्चे कहते हैं, माँ कम से कम घर का काम देखने के लिए उपयोगी है, लेकिन वे कहते हैं, पिताजी बेकार हैं।


   10. पिताजी पीछे हैं क्योंकि वे परिवार की रीढ़ हैं।  और हमारी रीढ़ हमारे शरीर के पीछे होती है।  लेकिन उनकी वजह से हम अपने दम पर खड़े हो सकते हैं।  शायद इसीलिए वो पीछे है...!!!!

  मुझे नहीं पता कि इसे किसने लिखा है।

   सभी पिताओं को समर्पित*

   दुनिया के सभी पिताओं को नमन! के सभी पिताओं को नमन!

औरत कभी संतुष्ट नहीं होती .....

 औरत कभी संतुष्ट नहीं होती .....


औरत से प्रेम में अगर आप ये उम्मीद करते हैं कि वो आपसे पूरी तरह खुश है तो आप नादानी में हैं


ये औरत के मूल में ही नहीं है अगर आप बहुत ज्यादा केयर करते है तो उससे भी ऊब जाएगी


अगर आप बहुत उग्र हैं तो वो उससे भी बिदक जाएगी


अगर आप बहुत ज्यादा विनम्र हैं तो वो उससे भी चिढ जाएगी


अगर आप उससे बहुत ज्यादा बात करते हैं तो वो आपको टेक इट फौर ग्रांटड लेने लगेगी


अगर आप उससे बहुत कम बात करते हैं तो वो मान लेगी कि आपका चक्कर कहीं और चल रहा है


यानी आप कुछ भी कर लीजिए वो संतुष्ट नहीं हो सकती


ये उसका स्वभाव है वो एक ऐसा डेडली काॅम्बीनेशन खोजती है जो बना ही न हो बन ही न सकता हो


ठीक वैसे ही जैसे कपड़ा खरीदने जाती है तो कहती कि इसी कलर में कोई दूसरा डिजाइन दिखाओ,


इसी डिजाइन में कोई दूसरा कलर दिखाओ


कपड़े का गट्ठर लगा देती है...


बहुत परिश्रम के बाद एक पसंद आ भी गया, तो भी संतुष्ट नहीं हो सकती...


आखिरी तक सोचती है कि इसमे ये डिजाइन ऐसे होता तो परफैक्ट होता...


इन सबके बावजूद एक बहुत बड़ी खूबी भी है औरत के अंदर ...


एक बार उसे कुछ पसंद आ गया तो उसे आखिरी दम तक सजो के रखती है वो चाहे रिश्ते हो या चूड़ी


रंग उतर जाएगा चमक खत्म हो जाएगी पर खुद से जुदा नहीं करेगी


बस यही खूबी औरत को विशिष्ट बनाती है


औरत से प्रेम में अगर आप ये उम्मीद करते हैं कि वो आपसे पूरी तरह खुश है तो आप नादानी में हैं...


ये औरत के मूल में ही नहीं है...

पापा, मैंने अपनी पसंद के लड़के से शादी कर ली है।

 पूनम के मन में उस दिन एक उथल-पुथल मची थी। उसने अपने पिता के सामने खड़े होकर एक भारी दिल के साथ कहा, "पापा, मैंने अपनी पसंद के लड़के से शादी कर ली है।" उसका चेहरा उतना ही दृढ़ था जितना कि उसके शब्द। उसके पिता, रमेश बाबू, यह सुनते ही गुस्से से भर उठे। लेकिन गुस्से की आग में जलते हुए उन्होंने केवल इतना ही कहा, "मेरे घर से निकल जाओ।" पूनम ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, "अभी उनके पास कोई काम नहीं है, हमें कुछ समय रहने दीजिए। हम जल्द ही चले जाएंगे।" परंतु रमेश बाबू के कठोर हृदय में बेटी की गुहार के लिए कोई जगह नहीं थी। उन्होंने उसकी एक न सुनी और उसे घर से बाहर निकाल दिया।


समय बीतता गया, और जीवन ने अपनी करवट बदल ली। कुछ सालों बाद रमेश बाबू का निधन हो गया। इधर, पूनम की जिंदगी भी बुरी तरह बदल गई। वह जिस लड़के के साथ प्रेम की बगिया सजाकर घर आई थी, वही उसे धोखा देकर चला गया। पूनम के दो बच्चे थे, एक बेटी और एक बेटा। हालात के आगे झुककर उसने खुद का एक छोटा सा रेस्टोरेंट खोला, जिससे उसका जीवन यापन हो रहा था।


जब पूनम को अपने पिता के निधन की खबर मिली, तो उसके मन में एक अजीब सा भाव आया। "अच्छा हुआ, उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया था। आज मैं उनके लिए नहीं रो रही हूँ।" पूनम ने सोचा कि वह उनकी अंतिम यात्रा में नहीं जाएगी। पर उसके ताऊजी, शंकरलाल, ने उसे समझाया, "पूनम, जाओ, जाने वाले के साथ दुश्मनी क्यों? वह तो अब इस दुनिया में नहीं रहे।"


शंकरलाल जी की बात मानकर पूनम ने अपने पिता की अंतिम यात्रा में शामिल होने का फैसला किया। वह जब अपने पिता के घर पहुंची, तो वहां अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थीं। पूनम के चेहरे पर कोई भाव नहीं था, वह बस ताऊजी की बात मानकर वहां आई थी। तेरहवीं के दिन उसके ताऊजी ने उसे एक लिफाफा दिया, जिसमें उसके पिता का लिखा एक खत था।


रात को पूनम ने उस खत को खोला और पढ़ना शुरू किया। खत में लिखा था:


"मेरी प्यारी बेटी, पूनम,


जब तुम ये खत पढ़ रही होगी, तो शायद मैं इस दुनिया में नहीं रहूँगा। मुझे मालूम है कि तुम मुझसे नाराज हो, और हो भी क्यों न? आखिर मैंने तुम्हें घर से निकाला था। लेकिन तुम्हारी नाराजगी के पीछे भी एक पिता का दिल धड़कता था, जो तुम्हें सिर्फ खुशी और सुरक्षा देना चाहता था।


याद है, जब तुम सिर्फ पाँच साल की थी, तुम्हारी माँ हमें छोड़कर चली गई थी। तुमने कितना रोया था, और मैं रातों को तुम्हारे साथ जागता था, तुम्हें अपने सीने से लगाकर। जब तुम स्कूल जाने से डरती थी, मैं तुम्हारे साथ स्कूल की खिड़की के बाहर खड़ा रहता था, और जैसे ही तुम बाहर आती थी, तुम्हें अपनी बाहों में भर लेता था।


वह समय भी याद है, जब तुमने पहली बार जीन्स पहनी थी, कॉलोनी के लोग क्या कुछ नहीं कहते थे। पर मैंने किसी की नहीं सुनी, बस तुम्हारे साथ खड़ा रहा। तुम्हारा देर रात घर लौटना, डिस्को जाना, दोस्तों के साथ घूमना—मैंने कभी तुम पर बंदिशें नहीं लगाईं, क्योंकि मुझे तुम्हारे विश्वास पर विश्वास था।


लेकिन जिस दिन तुम बिना बताए शादी करके घर आई, मेरा दिल टूट गया। मैंने तुम्हारे लिए कितने सपने देखे थे, तुम्हें एक राजकुमारी की तरह सजाने के, तुम्हारी शादी को धूमधाम से करने के। लेकिन तुमने मेरे सारे सपनों को एक पल में बिखेर दिया।


पूनम, मैं जानता हूँ, मैं कठोर था, पर मेरा कठोरता केवल उस लड़के के लिए थी जिसने तुम्हें धोखा दिया। मैंने सबकुछ छोड़ दिया, यहाँ तक कि तुम्हारी माँ की स्मृतियों को भी अपने भीतर दबाए रखा। तुम्हारी माँ के गहने, जो मैंने तुम्हारी शादी के लिए संजोए थे, वे सब आलमारी में तुम्हारे लिए रखे हैं। मैंने जो घर और संपत्ति जुटाई थी, वह सब अब तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के नाम कर दी है।


पूनम, हो सकता है, तुम मेरे कठोर व्यवहार को कभी माफ न कर सको, लेकिन मैं हमेशा तुम्हें प्यार करता था। एक पिता के रूप में, मैंने वही किया जो मुझे सही लगा। और हाँ, शायद तुम अब समझ चुकी होगी कि औलाद का दिल तोड़ने पर कैसा लगता है। मैं तुम्हें वह दर्द नहीं देना चाहता, जो मैंने झेला है। तुमने जो किया, उसमें गलत क्या था, यह तुम्हारी सोच थी। मैं बस यही कहूँगा कि मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं था, तुम्हारा पापा था। वह पापा जिसने तुम्हारी खुशी के लिए अपनी सारी ख्वाहिशें कुर्बान कर दीं।


काश, तुमने मुझे समझा होता। अब मैं इस खत को यहीं खत्म करता हूँ। अगर हो सके तो अपने इस खराब पिता को माफ कर देना।


तुम्हारा पापा।"


खत पढ़ते-पढ़ते पूनम की आँखें नम हो गईं। उसके साथ एक छोटी सी ड्राइंग लगी थी, जो उसने बचपन में बनाई थी। उस पर लिखा था, "आई लव यू, मेरे पापा, मेरे हीरो। मैं आपकी हर बात मानूंगी।"


पूनम की आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। तभी उसके ताऊजी, शंकरलाल, कमरे में आए और बोले, "पूनम, तुम्हारे रेस्टोरेंट और घर के लिए जो पैसे मैंने दिए थे, वे तुम्हारे पापा ने ही दिए थे। औलाद चाहे कितनी भी बुरी हो, माँ-बाप कभी बुरे नहीं होते। वे मरने के बाद भी अपने बच्चों के लिए दुआ करते हैं।"


पूनम के पिता को सुकून मिला होगा या नहीं, यह तो नहीं पता, लेकिन उस खत को पढ़ने के बाद शायद पूनम को जीवनभर सुकून नहीं मिलेगा।


दोस्तों, प्यार करना और लव मैरिज करना गलत नहीं है, लेकिन अपने माँ-बाप की मर्जी और उनकी भावनाओं का सम्मान जरूर करें। हर पिता का सपना होता है कि वह अपनी बेटी को अपनी आँखों के सामने डोली में विदा करे। कोशिश करें कि उनके इस सपने को पूरा करें, ताकि किसी का दिल टूटने से बच सके।

जब तुम मेरे लिए अपने पति को धोखा दे सकती हो तो किसी और के लिए मुझे भी धोखा दे सकती हो।

 "जब तुम मेरे लिए अपने पति को धोखा दे सकती हो तो किसी और के लिए मुझे भी धोखा दे सकती हो। जो अपने पति की नहीं हुई वो मेरी क्या होगी" - आज नरेश के मुंह से ये शब्द सुनकर प्रिया अवाक रह गई थी। उसका दिल बुरी तरह तड़प कर रह गया था। वह बिना कुछ कहे नरेश की गाड़ी से उतरी और अपने घर आ गई। बच्चों को स्कूल से आने में अभी काफी समय था।


प्रिया ने एक नजर अपने घर को देखा, फिर सोफे पर बैठकर सोचने लगी कि आखिर क्या मिला उसे ऐसे ऑनलाइन रिश्ते से? प्रिया का पति अच्छी नौकरी पर था। दो प्यारे बच्चे, खुद का घर, गाड़ी - किसी चीज की कमी नहीं थी उसे सिवाय पति के समय की। और एक औरत के लिए उसके पति द्वारा दिया गया समय सभी सांसारिक चीज़ों से कीमती होता है। उसका पति ऑफिस के काम में इतना व्यस्त होता गया कि प्रेम विवाह होने के बावजूद उसे समय देना ही भूल गया था। वैसे भी मर्द का प्यार तब तक ही होता है जब तक वह उसे हासिल न कर ले।


इस शहर में प्रिया का अपना कोई नहीं था और न ही किसी से ज्यादा मिलना-जुलना उसे पसंद था। बस अपने रिश्तेदारों व दोस्तों से फोन पर बात हो जाती थी। अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन जी रही थी। नरेश उसके शहर में ही रहता था। शुरुआत में वह सिर्फ सोशल मीडिया पर ही कभी-कभार प्रिया को मैसेज करता था। प्रिया ने कभी रिप्लाई नहीं किया, पर नरेश की तारीफ उसे भी अच्छी लगती थी। कुछ समय बाद वह भी रिप्लाई करने लगी। फिर पता ही नहीं चला कि कैसे बात सोशल मीडिया पर मैसेज करने से फोन पर बातचीत होने तक पहुंच गई। प्रिया भी पति के ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद समय निकाल कर नरेश से फोन पर बात करने में व्यस्त रहने लगी। पति और बच्चों के घर आने तक जितना भी समय मिलता, दोनों फोन पर लगे रहते। हां, अगर कभी नरेश को कोई जरूरी काम होता, तब उनकी बात नहीं हो पाती। अपने अकेलेपन में प्रिया के कदम कब और कैसे नरेश की तरफ बढ़ते चले गए, उसे पता ही नहीं चला।


नरेश भी उसकी हर बात सुनता, समझता और उसकी परवाह करता था। यही तो प्रिया चाहती थी। कोई तो हो जिसे वह अपने दिल की हर बात बता सके। समय ऐसे ही गुजरता गया। अब प्रिया को अपने पति से कोई शिकायत नहीं रहती थी क्योंकि उसने अपना सुकून कहीं और तलाश लिया था।


पर यह सब ज्यादा दिन नहीं चला। धीरे-धीरे प्रिया को महसूस होने लगा कि वक्त के साथ नरेश का व्यवहार काफी बदलने लगा है। अगर प्रिया का फोन दो मिनट के लिए भी व्यस्त होता, तो नरेश उस से सवाल करने लगता। नरेश नहीं चाहता था कि प्रिया उसके अलावा किसी से भी बात करे। यहां तक कि प्रिया ने अपने परिजनों को भी फोन करना बंद कर दिया था। उसके मम्मी-पापा, भाई-बहन खुद फोन करते, तो ही वह बात करती। उस पर भी अगर बीच में नरेश का फोन आ जाता, तो उसे हर बार अपनी सफाई पेश करनी होती। और अब तो नरेश उसके सोशल मीडिया अकाउंट पर भी नजर रखने लगा था। कभी किसी के कमेंट को लेकर, तो कभी किसी के लाइक करने को लेकर नरेश हर बात का विवाद बना देता। पर प्रिया नरेश को खोना नहीं चाहती थी, इसलिए वह वही करती जो नरेश कहता। कितने ही जानने वालों को तो प्रिया नरेश के कहने पर बिना किसी कारण ब्लॉक कर चुकी थी। सोशल मीडिया से शुरू हुए इस रिश्ते में मुलाकातों का दौर आ चुका था।


वैसे तो सब ठीक-ठीक था, पर कई बार नरेश बेमतलब की बातों पर प्रिया से लड़ाई करने लग जाता। वह बात-बात में प्रिया के चरित्र पर सवाल करता, उस पर शक करता। जब भी वे मिलते, नरेश उसका फोन जरूर चेक करता। एक बार तो इसी बात पर विवाद इतना बढ़ गया कि नरेश ने उसे सरेराह ही अपमानित कर दिया। वह तो खैर थी कि उन्हें वहां कोई जानता नहीं था!


उस दिन पहली बार प्रिया को अहसास हुआ कि उससे कितनी बड़ी गलती हो गई है। प्रिया के पति तो उससे कभी नहीं पूछते थे कि वह फोन पर किससे बात करती है, न ही वह कभी उसका फोन चेक करते थे। हमेशा उसका सम्मान करते थे। प्रिया पर शक करना तो दूर की बात थी। और इधर वह अकेलापन दूर करने के लिए ऐसे इंसान के चक्कर में पड़ गई थी, जो अब उसके मानसिक और भावनात्मक तनाव का कारण बन चुका था। उसे अब समझ आ गया था कि वह बैठे-बिठाए किस मकड़जाल में फंस चुकी है। उसी दिन प्रिया ने नरेश का नंबर अपने फोन और सोशल मीडिया पर ब्लॉक कर दिया था। पर कुछ दिन बाद नरेश ने फिर से प्रिया का पीछा करना शुरू कर दिया। वह जहां भी जाती, नरेश वहीं पहुंच जाता। नए-नए नंबरों से उसे फोन करता।


प्रिया कभी भी ऐसी नहीं थी जैसा उसे इन हालात ने बना दिया था। वह तो सिर्फ अपने पति से प्यार करती थी। नरेश ने ही उसे अपनी बातों के जाल में फंसाकर ऐसे हालात में पहुंचा दिया था। मगर अब वह इन सब से निकलना चाहती थी और इस रिश्ते को यहीं विराम देना चाहती थी। इसीलिए न चाहते हुए भी प्रिया को उससे मिलकर बात करनी पड़ी। प्रिया ने नरेश को काफी समझाया कि उनके बीच जो भी रिश्ता है उसका कोई भविष्य नहीं है, इसलिए यह सब खत्म कर देना चाहिए। इस तरह शक करके लड़ाई-झगड़े करने का क्या फायदा? और जब नरेश को उस पर विश्वास ही नहीं है, तो फिर ऐसे रिश्ते का क्या मतलब?


हालांकि नरेश को पता था कि प्रिया का अपना परिवार है और वह किसी के लिए भी अपने परिवार को नहीं छोड़ सकती। फिर भी नरेश ने रो-रो कर प्रिया से माफी मांग ली और दुबारा ऐसा न करने का वादा भी किया, साथ ही यह भी जता दिया कि यह सब ऐसे खत्म नहीं होने वाला। अब प्रिया समझ चुकी थी कि नरेश इतनी आसानी से उसका पीछा छोड़ने वाला नहीं है। यह रिश्ता उसके लिए एक मजबूरी बन चुका था, साथ ही यह भी डर था कि कहीं नरेश उसके पति को यह सब न बता दे। इसलिए उसने खुद को समझा लिया कि जैसा चल रहा है वैसे ही चलने दिया जाए।


फिर से वही सब फोन, मैसेज, चैटिंग, नरेश का बात-बात पर सुनाना - कहां बिजी थी? करो उसी से बात, उसने क्यों किया ऐसा कमेंट? इसको ब्लॉक करो। इतनी देर ऑनलाइन? किससे चैटिंग कर रही थी? फिर खुद ही रूठ जाना और न मनाओ तो पीछा करना, लड़ना-झगड़ना। बस यही सब रह गया था। इस सब से प्रिया बहुत परेशान हो चुकी थी। आज प्रिया नरेश से मिलने इसलिए गई थी, क्योंकि वह इस रिश्ते को हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहती थी।


पर प्रिया की बात सुनकर नरेश कहने लगा - अब तुम्हें कोई और मिल गया है ना इसलिए मुझे छोड़ रही हो। और उसका फोन चेक करने की जिद करने लगा। प्रिया को उम्मीद नहीं थी कि नरेश ऐसे रिएक्ट करेगा। पर इस बार प्रिया ने अपना फोन नरेश को नहीं दिखाया। प्रिया ने खुद को समझाया कि वह सही हो या गलत, किसी को हक नहीं है कि उसका फोन चेक करे। न ही उसे किसी को इतना हक देना चाहिए कि कोई उसे जलील करे या उसके आत्मसम्मान को चोटिल कर सके।


इतनी जिल्लत प्रिया ने कभी महसूस नहीं की थी। हां, उससे एक बार गलती हुई थी पर वह इतनी गिरी हुई नहीं थी कि हर किसी से आशिकी करती फिरे। न ही उसे ऐसा करने की जरूरत थी। अब प्रिया ने सोच लिया था कि वह आज ही अपने पति को सब कुछ सच-सच बता देगी फिर चाहे जो सजा मिले। कम से कम उसे इस ब्लैकमेलिंग और जिल्लत से छुटकारा तो मिलेगा। उसका पति उसे जो भी सजा दे, वह इस जिल्लत और बेइज्जती से ज्यादा तो नहीं होगी। अपने पति से अच्छा दोस्त, साथी, प्यार, हमसफर दूसरा कोई नहीं हो सकता।

छवि निर्माण के लिए निर्देश

इस कहानी पर आधारित एक यथार्थवादी छवि बनाएँ, जिसमें दिखाया जाए:

1. प्रिया नरेश की गाड़ी से उतरी हुई, दिल टूटने के साथ घर की ओर जाती हुई।

2. प्रिया अपने घर के सोफे पर बैठी हुई, गहरी सोच में डूबी हुई।

3. नरेश गाड़ी में बैठा हुआ, प्रिया को जाते हुए देख रहा है।

4. प्रिया का पति अपने काम में व्यस्त है, प्रिया की मानसिक स्थिति से अनजान।

5. छवि में प्रिया की भावनात्मक यात्रा और उसके आत्म-साक्षात्कार के क्षणों को दिखाया जाए, जिसमें दुःख, पछतावा और दृढ़ संकल्प का मिश्रण हो।

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

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