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Monday, 19 August 2024

पापा, मैंने अपनी पसंद के लड़के से शादी कर ली है।

 पूनम के मन में उस दिन एक उथल-पुथल मची थी। उसने अपने पिता के सामने खड़े होकर एक भारी दिल के साथ कहा, "पापा, मैंने अपनी पसंद के लड़के से शादी कर ली है।" उसका चेहरा उतना ही दृढ़ था जितना कि उसके शब्द। उसके पिता, रमेश बाबू, यह सुनते ही गुस्से से भर उठे। लेकिन गुस्से की आग में जलते हुए उन्होंने केवल इतना ही कहा, "मेरे घर से निकल जाओ।" पूनम ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, "अभी उनके पास कोई काम नहीं है, हमें कुछ समय रहने दीजिए। हम जल्द ही चले जाएंगे।" परंतु रमेश बाबू के कठोर हृदय में बेटी की गुहार के लिए कोई जगह नहीं थी। उन्होंने उसकी एक न सुनी और उसे घर से बाहर निकाल दिया।


समय बीतता गया, और जीवन ने अपनी करवट बदल ली। कुछ सालों बाद रमेश बाबू का निधन हो गया। इधर, पूनम की जिंदगी भी बुरी तरह बदल गई। वह जिस लड़के के साथ प्रेम की बगिया सजाकर घर आई थी, वही उसे धोखा देकर चला गया। पूनम के दो बच्चे थे, एक बेटी और एक बेटा। हालात के आगे झुककर उसने खुद का एक छोटा सा रेस्टोरेंट खोला, जिससे उसका जीवन यापन हो रहा था।


जब पूनम को अपने पिता के निधन की खबर मिली, तो उसके मन में एक अजीब सा भाव आया। "अच्छा हुआ, उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया था। आज मैं उनके लिए नहीं रो रही हूँ।" पूनम ने सोचा कि वह उनकी अंतिम यात्रा में नहीं जाएगी। पर उसके ताऊजी, शंकरलाल, ने उसे समझाया, "पूनम, जाओ, जाने वाले के साथ दुश्मनी क्यों? वह तो अब इस दुनिया में नहीं रहे।"


शंकरलाल जी की बात मानकर पूनम ने अपने पिता की अंतिम यात्रा में शामिल होने का फैसला किया। वह जब अपने पिता के घर पहुंची, तो वहां अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थीं। पूनम के चेहरे पर कोई भाव नहीं था, वह बस ताऊजी की बात मानकर वहां आई थी। तेरहवीं के दिन उसके ताऊजी ने उसे एक लिफाफा दिया, जिसमें उसके पिता का लिखा एक खत था।


रात को पूनम ने उस खत को खोला और पढ़ना शुरू किया। खत में लिखा था:


"मेरी प्यारी बेटी, पूनम,


जब तुम ये खत पढ़ रही होगी, तो शायद मैं इस दुनिया में नहीं रहूँगा। मुझे मालूम है कि तुम मुझसे नाराज हो, और हो भी क्यों न? आखिर मैंने तुम्हें घर से निकाला था। लेकिन तुम्हारी नाराजगी के पीछे भी एक पिता का दिल धड़कता था, जो तुम्हें सिर्फ खुशी और सुरक्षा देना चाहता था।


याद है, जब तुम सिर्फ पाँच साल की थी, तुम्हारी माँ हमें छोड़कर चली गई थी। तुमने कितना रोया था, और मैं रातों को तुम्हारे साथ जागता था, तुम्हें अपने सीने से लगाकर। जब तुम स्कूल जाने से डरती थी, मैं तुम्हारे साथ स्कूल की खिड़की के बाहर खड़ा रहता था, और जैसे ही तुम बाहर आती थी, तुम्हें अपनी बाहों में भर लेता था।


वह समय भी याद है, जब तुमने पहली बार जीन्स पहनी थी, कॉलोनी के लोग क्या कुछ नहीं कहते थे। पर मैंने किसी की नहीं सुनी, बस तुम्हारे साथ खड़ा रहा। तुम्हारा देर रात घर लौटना, डिस्को जाना, दोस्तों के साथ घूमना—मैंने कभी तुम पर बंदिशें नहीं लगाईं, क्योंकि मुझे तुम्हारे विश्वास पर विश्वास था।


लेकिन जिस दिन तुम बिना बताए शादी करके घर आई, मेरा दिल टूट गया। मैंने तुम्हारे लिए कितने सपने देखे थे, तुम्हें एक राजकुमारी की तरह सजाने के, तुम्हारी शादी को धूमधाम से करने के। लेकिन तुमने मेरे सारे सपनों को एक पल में बिखेर दिया।


पूनम, मैं जानता हूँ, मैं कठोर था, पर मेरा कठोरता केवल उस लड़के के लिए थी जिसने तुम्हें धोखा दिया। मैंने सबकुछ छोड़ दिया, यहाँ तक कि तुम्हारी माँ की स्मृतियों को भी अपने भीतर दबाए रखा। तुम्हारी माँ के गहने, जो मैंने तुम्हारी शादी के लिए संजोए थे, वे सब आलमारी में तुम्हारे लिए रखे हैं। मैंने जो घर और संपत्ति जुटाई थी, वह सब अब तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के नाम कर दी है।


पूनम, हो सकता है, तुम मेरे कठोर व्यवहार को कभी माफ न कर सको, लेकिन मैं हमेशा तुम्हें प्यार करता था। एक पिता के रूप में, मैंने वही किया जो मुझे सही लगा। और हाँ, शायद तुम अब समझ चुकी होगी कि औलाद का दिल तोड़ने पर कैसा लगता है। मैं तुम्हें वह दर्द नहीं देना चाहता, जो मैंने झेला है। तुमने जो किया, उसमें गलत क्या था, यह तुम्हारी सोच थी। मैं बस यही कहूँगा कि मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं था, तुम्हारा पापा था। वह पापा जिसने तुम्हारी खुशी के लिए अपनी सारी ख्वाहिशें कुर्बान कर दीं।


काश, तुमने मुझे समझा होता। अब मैं इस खत को यहीं खत्म करता हूँ। अगर हो सके तो अपने इस खराब पिता को माफ कर देना।


तुम्हारा पापा।"


खत पढ़ते-पढ़ते पूनम की आँखें नम हो गईं। उसके साथ एक छोटी सी ड्राइंग लगी थी, जो उसने बचपन में बनाई थी। उस पर लिखा था, "आई लव यू, मेरे पापा, मेरे हीरो। मैं आपकी हर बात मानूंगी।"


पूनम की आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। तभी उसके ताऊजी, शंकरलाल, कमरे में आए और बोले, "पूनम, तुम्हारे रेस्टोरेंट और घर के लिए जो पैसे मैंने दिए थे, वे तुम्हारे पापा ने ही दिए थे। औलाद चाहे कितनी भी बुरी हो, माँ-बाप कभी बुरे नहीं होते। वे मरने के बाद भी अपने बच्चों के लिए दुआ करते हैं।"


पूनम के पिता को सुकून मिला होगा या नहीं, यह तो नहीं पता, लेकिन उस खत को पढ़ने के बाद शायद पूनम को जीवनभर सुकून नहीं मिलेगा।


दोस्तों, प्यार करना और लव मैरिज करना गलत नहीं है, लेकिन अपने माँ-बाप की मर्जी और उनकी भावनाओं का सम्मान जरूर करें। हर पिता का सपना होता है कि वह अपनी बेटी को अपनी आँखों के सामने डोली में विदा करे। कोशिश करें कि उनके इस सपने को पूरा करें, ताकि किसी का दिल टूटने से बच सके।

जब तुम मेरे लिए अपने पति को धोखा दे सकती हो तो किसी और के लिए मुझे भी धोखा दे सकती हो।

 "जब तुम मेरे लिए अपने पति को धोखा दे सकती हो तो किसी और के लिए मुझे भी धोखा दे सकती हो। जो अपने पति की नहीं हुई वो मेरी क्या होगी" - आज नरेश के मुंह से ये शब्द सुनकर प्रिया अवाक रह गई थी। उसका दिल बुरी तरह तड़प कर रह गया था। वह बिना कुछ कहे नरेश की गाड़ी से उतरी और अपने घर आ गई। बच्चों को स्कूल से आने में अभी काफी समय था।


प्रिया ने एक नजर अपने घर को देखा, फिर सोफे पर बैठकर सोचने लगी कि आखिर क्या मिला उसे ऐसे ऑनलाइन रिश्ते से? प्रिया का पति अच्छी नौकरी पर था। दो प्यारे बच्चे, खुद का घर, गाड़ी - किसी चीज की कमी नहीं थी उसे सिवाय पति के समय की। और एक औरत के लिए उसके पति द्वारा दिया गया समय सभी सांसारिक चीज़ों से कीमती होता है। उसका पति ऑफिस के काम में इतना व्यस्त होता गया कि प्रेम विवाह होने के बावजूद उसे समय देना ही भूल गया था। वैसे भी मर्द का प्यार तब तक ही होता है जब तक वह उसे हासिल न कर ले।


इस शहर में प्रिया का अपना कोई नहीं था और न ही किसी से ज्यादा मिलना-जुलना उसे पसंद था। बस अपने रिश्तेदारों व दोस्तों से फोन पर बात हो जाती थी। अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन जी रही थी। नरेश उसके शहर में ही रहता था। शुरुआत में वह सिर्फ सोशल मीडिया पर ही कभी-कभार प्रिया को मैसेज करता था। प्रिया ने कभी रिप्लाई नहीं किया, पर नरेश की तारीफ उसे भी अच्छी लगती थी। कुछ समय बाद वह भी रिप्लाई करने लगी। फिर पता ही नहीं चला कि कैसे बात सोशल मीडिया पर मैसेज करने से फोन पर बातचीत होने तक पहुंच गई। प्रिया भी पति के ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद समय निकाल कर नरेश से फोन पर बात करने में व्यस्त रहने लगी। पति और बच्चों के घर आने तक जितना भी समय मिलता, दोनों फोन पर लगे रहते। हां, अगर कभी नरेश को कोई जरूरी काम होता, तब उनकी बात नहीं हो पाती। अपने अकेलेपन में प्रिया के कदम कब और कैसे नरेश की तरफ बढ़ते चले गए, उसे पता ही नहीं चला।


नरेश भी उसकी हर बात सुनता, समझता और उसकी परवाह करता था। यही तो प्रिया चाहती थी। कोई तो हो जिसे वह अपने दिल की हर बात बता सके। समय ऐसे ही गुजरता गया। अब प्रिया को अपने पति से कोई शिकायत नहीं रहती थी क्योंकि उसने अपना सुकून कहीं और तलाश लिया था।


पर यह सब ज्यादा दिन नहीं चला। धीरे-धीरे प्रिया को महसूस होने लगा कि वक्त के साथ नरेश का व्यवहार काफी बदलने लगा है। अगर प्रिया का फोन दो मिनट के लिए भी व्यस्त होता, तो नरेश उस से सवाल करने लगता। नरेश नहीं चाहता था कि प्रिया उसके अलावा किसी से भी बात करे। यहां तक कि प्रिया ने अपने परिजनों को भी फोन करना बंद कर दिया था। उसके मम्मी-पापा, भाई-बहन खुद फोन करते, तो ही वह बात करती। उस पर भी अगर बीच में नरेश का फोन आ जाता, तो उसे हर बार अपनी सफाई पेश करनी होती। और अब तो नरेश उसके सोशल मीडिया अकाउंट पर भी नजर रखने लगा था। कभी किसी के कमेंट को लेकर, तो कभी किसी के लाइक करने को लेकर नरेश हर बात का विवाद बना देता। पर प्रिया नरेश को खोना नहीं चाहती थी, इसलिए वह वही करती जो नरेश कहता। कितने ही जानने वालों को तो प्रिया नरेश के कहने पर बिना किसी कारण ब्लॉक कर चुकी थी। सोशल मीडिया से शुरू हुए इस रिश्ते में मुलाकातों का दौर आ चुका था।


वैसे तो सब ठीक-ठीक था, पर कई बार नरेश बेमतलब की बातों पर प्रिया से लड़ाई करने लग जाता। वह बात-बात में प्रिया के चरित्र पर सवाल करता, उस पर शक करता। जब भी वे मिलते, नरेश उसका फोन जरूर चेक करता। एक बार तो इसी बात पर विवाद इतना बढ़ गया कि नरेश ने उसे सरेराह ही अपमानित कर दिया। वह तो खैर थी कि उन्हें वहां कोई जानता नहीं था!


उस दिन पहली बार प्रिया को अहसास हुआ कि उससे कितनी बड़ी गलती हो गई है। प्रिया के पति तो उससे कभी नहीं पूछते थे कि वह फोन पर किससे बात करती है, न ही वह कभी उसका फोन चेक करते थे। हमेशा उसका सम्मान करते थे। प्रिया पर शक करना तो दूर की बात थी। और इधर वह अकेलापन दूर करने के लिए ऐसे इंसान के चक्कर में पड़ गई थी, जो अब उसके मानसिक और भावनात्मक तनाव का कारण बन चुका था। उसे अब समझ आ गया था कि वह बैठे-बिठाए किस मकड़जाल में फंस चुकी है। उसी दिन प्रिया ने नरेश का नंबर अपने फोन और सोशल मीडिया पर ब्लॉक कर दिया था। पर कुछ दिन बाद नरेश ने फिर से प्रिया का पीछा करना शुरू कर दिया। वह जहां भी जाती, नरेश वहीं पहुंच जाता। नए-नए नंबरों से उसे फोन करता।


प्रिया कभी भी ऐसी नहीं थी जैसा उसे इन हालात ने बना दिया था। वह तो सिर्फ अपने पति से प्यार करती थी। नरेश ने ही उसे अपनी बातों के जाल में फंसाकर ऐसे हालात में पहुंचा दिया था। मगर अब वह इन सब से निकलना चाहती थी और इस रिश्ते को यहीं विराम देना चाहती थी। इसीलिए न चाहते हुए भी प्रिया को उससे मिलकर बात करनी पड़ी। प्रिया ने नरेश को काफी समझाया कि उनके बीच जो भी रिश्ता है उसका कोई भविष्य नहीं है, इसलिए यह सब खत्म कर देना चाहिए। इस तरह शक करके लड़ाई-झगड़े करने का क्या फायदा? और जब नरेश को उस पर विश्वास ही नहीं है, तो फिर ऐसे रिश्ते का क्या मतलब?


हालांकि नरेश को पता था कि प्रिया का अपना परिवार है और वह किसी के लिए भी अपने परिवार को नहीं छोड़ सकती। फिर भी नरेश ने रो-रो कर प्रिया से माफी मांग ली और दुबारा ऐसा न करने का वादा भी किया, साथ ही यह भी जता दिया कि यह सब ऐसे खत्म नहीं होने वाला। अब प्रिया समझ चुकी थी कि नरेश इतनी आसानी से उसका पीछा छोड़ने वाला नहीं है। यह रिश्ता उसके लिए एक मजबूरी बन चुका था, साथ ही यह भी डर था कि कहीं नरेश उसके पति को यह सब न बता दे। इसलिए उसने खुद को समझा लिया कि जैसा चल रहा है वैसे ही चलने दिया जाए।


फिर से वही सब फोन, मैसेज, चैटिंग, नरेश का बात-बात पर सुनाना - कहां बिजी थी? करो उसी से बात, उसने क्यों किया ऐसा कमेंट? इसको ब्लॉक करो। इतनी देर ऑनलाइन? किससे चैटिंग कर रही थी? फिर खुद ही रूठ जाना और न मनाओ तो पीछा करना, लड़ना-झगड़ना। बस यही सब रह गया था। इस सब से प्रिया बहुत परेशान हो चुकी थी। आज प्रिया नरेश से मिलने इसलिए गई थी, क्योंकि वह इस रिश्ते को हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहती थी।


पर प्रिया की बात सुनकर नरेश कहने लगा - अब तुम्हें कोई और मिल गया है ना इसलिए मुझे छोड़ रही हो। और उसका फोन चेक करने की जिद करने लगा। प्रिया को उम्मीद नहीं थी कि नरेश ऐसे रिएक्ट करेगा। पर इस बार प्रिया ने अपना फोन नरेश को नहीं दिखाया। प्रिया ने खुद को समझाया कि वह सही हो या गलत, किसी को हक नहीं है कि उसका फोन चेक करे। न ही उसे किसी को इतना हक देना चाहिए कि कोई उसे जलील करे या उसके आत्मसम्मान को चोटिल कर सके।


इतनी जिल्लत प्रिया ने कभी महसूस नहीं की थी। हां, उससे एक बार गलती हुई थी पर वह इतनी गिरी हुई नहीं थी कि हर किसी से आशिकी करती फिरे। न ही उसे ऐसा करने की जरूरत थी। अब प्रिया ने सोच लिया था कि वह आज ही अपने पति को सब कुछ सच-सच बता देगी फिर चाहे जो सजा मिले। कम से कम उसे इस ब्लैकमेलिंग और जिल्लत से छुटकारा तो मिलेगा। उसका पति उसे जो भी सजा दे, वह इस जिल्लत और बेइज्जती से ज्यादा तो नहीं होगी। अपने पति से अच्छा दोस्त, साथी, प्यार, हमसफर दूसरा कोई नहीं हो सकता।

छवि निर्माण के लिए निर्देश

इस कहानी पर आधारित एक यथार्थवादी छवि बनाएँ, जिसमें दिखाया जाए:

1. प्रिया नरेश की गाड़ी से उतरी हुई, दिल टूटने के साथ घर की ओर जाती हुई।

2. प्रिया अपने घर के सोफे पर बैठी हुई, गहरी सोच में डूबी हुई।

3. नरेश गाड़ी में बैठा हुआ, प्रिया को जाते हुए देख रहा है।

4. प्रिया का पति अपने काम में व्यस्त है, प्रिया की मानसिक स्थिति से अनजान।

5. छवि में प्रिया की भावनात्मक यात्रा और उसके आत्म-साक्षात्कार के क्षणों को दिखाया जाए, जिसमें दुःख, पछतावा और दृढ़ संकल्प का मिश्रण हो।

पत्नी है तो दुनिया में सब कुछ है। राजा की तरह जीने और आज दुनिया में अपना सिर ऊंचा रखने के लिए

 पत्नी है तो दुनिया में सब कुछ है। राजा की तरह जीने और आज दुनिया में अपना सिर ऊंचा रखने के लिए अपनी पत्नी का धन्यवाद कीजिए। आपकी सुविधा-असुविधा, आपके बिना कारण के क्रोध को संभालती है। तुम्हारे सुख से सुखी है और तुम्हारे दुःख से दुःखी है। आप रविवार को देर से बिस्तर पर रहते हैं लेकिन इसका कोई रविवार या त्योहार नहीं होता है। चाय लाओ, पानी लाओ, खाना लाओ। ये ऐसा है और वो ऐसा है। कब अक्कल आएगी तुम्हें? ऐसे ताने हम मारते हैं। उसके पास बुद्धि है और केवल उसी के कारण तो आप जीवित हैं। वरना दुनिया में आपको कोई भी नहीं पूछेगा।


अब जरा इस स्थिति की सिर्फ कल्पना करें:

एक दिन *पत्नी* अचानक रात को गुजर जाती है!

घर में रोने की आवाज आ रही है। पत्नी का *अंतिम दर्शन* चल रहा था। उस वक्त पत्नी की आत्मा जाते-जाते जो कह रही है, उसका वर्णन:


"मैं अभी जा रही हूँ, अब फिर कभी नहीं मिलेंगे। जिस दिन विवाह के फेरे लिए थे, उस वक्त साथ-साथ जीने का वचन दिया था, पर अब अकेले जाना पड़ रहा है, यह मुझको पता नहीं था। मुझे जाने दो। अपने आंगन में अपना शरीर छोड़ कर जा रही हूँ। बहुत दर्द हो रहा है मुझे, लेकिन मैं मजबूर हूँ, अब मैं जा रही हूँ। मेरा मन नहीं मान रहा, पर अब मैं कुछ नहीं कर सकती। मुझे जाने दो।


बेटा और बहू रो रहे हैं, देखो। मैं ऐसा नहीं देख सकती और उनको दिलासा भी नहीं दे सकती हूँ। पोता 'बा बा बा' कर रहा है, उसे शांत करो, बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे हो। हाँ, और आप भी मन मजबूत रखना और बिल्कुल ढीले न होना। मुझे जाने दो।


अभी बेटी ससुराल से आएगी और मेरा मृत शरीर देखकर बहुत रोएगी। उसे संभालना और शांत करना। और आप भी बिल्कुल नहीं रोना। मुझे जाने दो। जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। जो भी इस दुनिया में आया है, वह यहाँ से ऊपर गया है। धीरे-धीरे मुझे भूल जाना, मुझे बहुत याद नहीं करना। और इस जीवन में फिर से काम में डूब जाना। अब मेरे बिना जीवन जीने की आदत जल्दी से डाल लेना। मुझे जाने दो।


आपने इस जीवन में मेरा कहा कभी नहीं माना है। अब जिद छोड़कर व्यवहार में विनम्र रहना। आपको अकेला छोड़कर जाते हुए मुझे बहुत चिंता हो रही है, लेकिन मैं मजबूर हूँ। मुझे जाने दो।


आपको BP और डायबिटीज है। गलती से भी मीठा नहीं खाना, अन्यथा परेशानी होगी। सुबह उठते ही दवा लेना न भूलना। चाय अगर आपको देर से मिलती है तो बहू पर गुस्सा न करना। अब मैं नहीं हूँ, यह समझकर जीना सीख लेना। मुझे जाने दो।


बेटा और बहू कुछ बोले तो चुपचाप सब सुन लेना। कभी गुस्सा नहीं करना। हमेशा मुस्कुराते रहना, कभी उदास नहीं होना। मुझे जाने दो। अपने बेटे के बेटे के साथ खेलना। अपने दोस्तों के साथ समय बिताना। अब थोड़ा धार्मिक जीवन जीएं ताकि जीवन को संयमित किया जा सके। अगर मेरी याद आये तो चुपचाप रो लेना लेकिन कभी कमजोर नहीं होना। मुझे जाने दो।


मेरा रूमाल कहां है, मेरी चाबी कहां है, अब ऐसे चिल्लाना नहीं। सब कुछ ध्यान से रखने और याद रखने की आदत डालना। सुबह और शाम नियमित रूप से दवा ले लेना। अगर बहू भूल जाये तो सामने से याद कर लेना। जो भी खाने को मिले, प्यार से खा लेना और गुस्सा नहीं करना। मेरी अनुपस्थिति खलेगी, पर कमजोर नहीं होना। मुझे जाने दो।


बुढ़ापे की छड़ी भूलना नहीं और धीरे-धीरे चलना। यदि बीमार हो गए और बिस्तर में लेट गए तो किसी को भी सेवा करना पसंद नहीं आएगा। मुझे जाने दो। शाम को बिस्तर पर जाने से पहले एक लोटा पानी मांग लेना। प्यास लगे तो ही पानी पी लेना। अगर आपको रात को उठना पड़े तो अंधेरे में कुछ लगे नहीं, इसका ध्यान रखना। मुझे जाने दो।


शादी के बाद हम बहुत प्यार से साथ रहे। परिवार में फूल जैसे बच्चे दिए। अब उस फूलों की सुगंध मुझे नहीं मिलेगी। मुझे जाने दो। उठो, सुबह हो गई, अब ऐसा कोई नहीं कहेगा। अब अपने आप उठने की आदत डाल लेना, किसी की प्रतीक्षा नहीं करना। मुझे जाने दो।


और हाँ, एक बात तुमसे छिपाई है, मुझे माफ कर देना। आपको बिना बताए बाजू की पोस्ट ऑफिस में बचत खाता खुलवाकर १४ लाख रुपये जमा किये हैं। मेरी दादी ने सिखाया था। एक-एक रुपया जमा करके कोने में रख दिया। इसमें से पाँच-पाँच लाख बहू और बेटी को देना और अपने खाते में चार लाख रखना अपने लिए। मुझे जाने दो।


भगवान की भक्ति और पूजा करना भूलना नहीं। अब फिर कभी नहीं मिलेंगे! मुझसे कोई भी गलती हुई हो तो मुझे माफ कर देना।"

इस आत्मीय संदेश में पत्नी की भावनाएं और उसकी देखभाल की जिम्मेदारी को दर्शाया गया है, जो उसके जाने के बाद भी परिवार को संभालने का संदेश देती है।

Sunday, 18 August 2024

बड़ी दुकान पर आकर आम का भाव पूछा तो वह बोला 120 रूपये किलो हैं

 ड्यूटी से फ्री होते ही मैं घर फ़ोन करता हूँ कि कुछ लाना तो नहीं है।

तो आज घर वालों ने कहा एक किलो आम 

 लेते आना। 

तभी मुझे सड़क किनारे मीठे और ताज़ा आम बेचते हुए 

एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी।

वैसे तो वह फल हमेशा जिओ मार्ट से

ही लेता था, 

पर आज मुझे लगा कि क्यों न 

बुढ़िया से ही खरीद लूँ ?

मैंने बुढ़िया से पूछा, "माई, आम कैसे दिए" 

बुढ़िया बोली, बाबूजी 70 रूपये किलो, 

मैं बोला, माई 50 रूपये दूंगा। 

.

बुढ़िया ने कहा, 60 रूपये दे देना, 

दो पैसे मै भी कमा लूंगी। 

.

मैं बोला, 50 रूपये लेने हैं तो बोलो, 

बुझे चेहरे से बुढ़िया ने,"न" मे गर्दन हिला दी।

मैं बिना कुछ कहे चल पडा 

और फल की बड़ी दुकान पर आकर आम का भाव पूछा तो वह बोला 120 रूपये किलो हैं 

.

बाबूजी, कितने दूँ ? 

मैं बोला, 5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ,  

ठीक भाव लगाओ। 

.

तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया। 

बोर्ड पर लिखा था- "मोल भाव करने वाले माफ़ करें" 

मुझ को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा, 

मैं कुछ सोचकर वापस हुआ


.सोचते सोचते उस बुढ़िया के पास पहुँच गया। 

बुढ़िया ने मुझे पहचान लिया और बोली, 

.

"बाबूजी आम दे दूँ, पर भाव 55 रूपये से कम नही लगाउंगी। 

मैं ने मुस्कराकर कहा, 

माई एक नही दो किलो दे दो और भाव की चिंता मत करो। 

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बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा। 

आम देते हुए बोली। बाबूजी मेरे पास थैली नही है ।

फिर बोली, एक टाइम था जब मेरा आदमी जिन्दा था 

.

तो मेरी भी छोटी सी दुकान थी। 

सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर। 

आदमी की बीमारी मे दुकान चली गयी, 

आदमी भी नही रहा। अब खाने के भी लाले पड़े हैं। 

किसी तरह पेट पाल रही हूँ। कोई औलाद भी नही है 

.

जिसकी ओर मदद के लिए देखूं। 

इतना कहते कहते बुढ़िया रुआंसी हो गयी, 

और उसकी आंखों मे आंसू आ गए ।

.

मैंने 200 रूपये का नोट बुढ़िया को दिया तो 

वो बोली "बाबूजी मेरे पास छुट्टे नही हैं। 

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मैं ने "माई चिंता मत करो, रख लो, 

अब मै तुमसे ही फल खरीदूंगा, 

और कल मै तुम्हें 1000 रूपये दूंगा। 

धीरे धीरे चुका देना और परसों से बेचने के लिए 

मंडी से दूसरे फल भी ले आना। 

.

बुढ़िया कुछ कह पाती उसके पहले ही 

मैं घर की ओर रवाना हो गया।

रास्ते भर,मैं सोचते आया 

न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से 

पेट पालने वाले, थड़ी लगा कर सामान बेचने वालों से 

मोल भाव करते हैं किन्तु बड़ी दुकानों पर 

मुंह मांगे पैसे दे आते हैं। 

.

शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है। 

गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर 

अधिक ध्यान देने लगे हैं।

.

अगले दिन मैंने बुढ़िया को 500 रूपये देते हुए कहा, 

"माई लौटाने की चिंता मत करना। 

जो फल खरीदूंगा, उनकी कीमत से ही चुक जाएंगे। 

जब मैंने अपने दोस्तों को ये किस्सा बताया तो 

सबने बुढ़िया से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया। 

लगभग तीन महीने उसने हाथठेला भी खरीद लिया।

बुढ़िया अब बहुत खुश है।

उचित खान पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी 

पहले से बहुत अच्छा है ।

जीवन मे किसी बेसहारा की मदद करके देखो यारों, 

अपनी पूरी जिंदगी मे किये गए सभी कार्यों से 

ज्यादा संतोष मिलेगा...

भाई बहन के पवित्र त्यौहार रक्षाबंधन की ढेर सारी शुभकामनाएं।।

 ✍️✍️आज से 6 साल पहले घर की हालत बहुत खराब हो चुकी थी।। खैती कारोबार सब घाटे में चल रहा था।।इसी बीच रक्षाबंधन का त्योहार आया ।।

✍️✍️ हर वर्ष की तरह उस वर्ष भी बहन राखी बांधने आई ।।मैं चारों तरफ से परेशान होकर घर में बैठा था।। बहिन के आते ही परिवार के बच्चों ने बुआ के आने की खुशी जाहिर की।।

✍️✍️जेसे ही मैंने अपनी पत्नी को बहिन के लिए चाय नाश्ते का बोला वह तुरंत मुंह फुला कर अंदर चली गई।।

✍️✍️ मुझे कमरे में बुलाया और बोली एक तो उपर से इतनी तंगी आ चुकी हैं और ऊपर से आपकी बहन और आ गई।। इनका तो काम ही यही है कोई भी थोड़ा सा त्यौहार आता है तो मुंह उठाकर चली आती है ।। इनको पता है भाई से कुछ पैसे और कपड़े मिल जाएंगे।। लेकिन अबकी बार मेरे पास इसको देने के लिए कुछ भी नहीं है।।

✍️✍️ मैं पत्नी की बातों को सुनता रहा लेकिन कुछ नहीं बोला ।। कुछ समय बाद बहिन ने राखी बांधी लेकिन उस दिन बहन को देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था।।

✍️✍️ बहिन ने दिन दिन में आते ही वापस जाने की तैयारियां शुरू कर ली मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं बहन को एक रात का बोलकर रोक सकूं।।

✍️✍️ जाते वक्त बहन ने मुझे एक कपड़े में बंधा कुछ सामान दिया और वापस जाने की इजाजत ली ।।मैं बहन को बस स्टैंड तक छोड़ कर आना चाहता था लेकिन पत्नी के हाव भाव देखकर हिम्मत नहीं हुई।। बहन के चले जाने के 10 मिनट बाद मैंने कपड़े में बंधे समान को खोला जिसमें एक पत्र था।। पत्र में लिखा था 👇👇

✍️✍️प्यारे भैया मुझे पता है आप किन परिस्थितियों से गुजर रहे हो और आपके घर की हालत क्या है ।।आपके दुख दर्द को मुझसे ज्यादा कोई नहीं समझ सकता।। मैं आपके चेहरे को कभी भी उदास नहीं देख सकती ।। मुझे पता है आप बहुत घाटे में चल रहे हैं इसलिए मैं मेरे सारे गहने, जेवरात आपको देके जा रही हुं ताकि आप इनको बेचकर अपना कारोबार शुरू कर सकें और वापस आपके चेहरे पर खुशी आ सके ।। बच्चों और भाभी का ध्यान रखना।।

✍️✍️ पत्र पढ़ते ही मेरे हाथ कांपने लगे आंखों में आंसू रुक नहीं रहे थे जल्दबाजी में मोटरसाइकिल उठाया और बस स्टैंड की तरफ दौड़ा लेकिन जब बस स्टैंड पर पहुंचा बहन जा चुकी थी।।

✍️✍️ रोते रोते घर वापस आया जाने अनजाने में हम दोनों ने बहन का बहुत दिल दुखा दिया ।। आज मुझको एहसास हो गया था की मुसीबत के समय केवल भाई ही नहीं बहन भी भाई की रक्षा करती है।।

✍️✍️दोस्तों यह कहानी मेरी खुद की नहीं है मैंने इसको कहीं पढ़ा था पढ़कर मेरी भी आंखों में आंसू आ गए थे मैंने सोचा इस कहानी को लिखकर इसे दोस्तों में प्रेषित किया जाए।। सच में बहन कभी भाई का बुरा नहीं चाहती। 

✍️✍️ सभी दोस्तों को भाई बहन के पवित्र त्यौहार रक्षाबंधन की ढेर सारी शुभकामनाएं।।

              

जवानी के दिनों में शारीरिक चाहतें सिर चढ़कर बोलने लगती हैं

 जवानी के दिनों में शारीरिक चाहतें सिर चढ़कर बोलने लगती हैं


, और पहले 20 साल तेजी से बीत जाते हैं। इसके बाद नौकरी की खोज शुरू होती है—यह नौकरी नहीं, वह नौकरी नहीं, दूर नहीं, पास नहीं। कई नौकरियाँ बदलने के बाद आखिरकार एक नौकरी स्थिरता की शुरुआत करती है। पहली तनख्वाह का चेक हाथ में आते ही उसे बैंक में जमा किया जाता है, और शून्यों का अंतहीन खेल शुरू हो जाता है। दो-तीन साल और बीत जाते हैं और बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ने लगती है।

25 की उम्र में विवाह हो जाता है और जीवन की एक नई कहानी शुरू होती है। शुरू के एक-दो साल गुलाबी और सपनीले होते हैं—हाथ में हाथ डालकर घूमना, रंग-बिरंगे सपने देखना। लेकिन यह सब जल्दी ही खत्म हो जाता है। बच्चे के आने की आहट होती है और पालना झूलने लगता है। अब सारा ध्यान बच्चे पर केंद्रित हो जाता है—उठना, बैठना, खाना-पीना, लाड़-दुलार। समय कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता।

इस बीच, हाथ एक-दूसरे से छूट जाते हैं, बातें और घूमना-फिरना बंद हो जाता है। बच्चा बड़ा होता जाता है और वह बच्चे में व्यस्त हो जाती है, जबकि मैं अपने काम में व्यस्त रहता हूँ। घर, गाड़ी की किस्त, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा, भविष्य की चिंता, और बैंक में शून्यों की बढ़ती संख्या—इन सब में जीवन व्यस्त हो जाता है।

35 साल की उम्र में, घर, गाड़ी, परिवार और बैंक में बढ़ते शून्य सब कुछ होते हुए भी एक कमी महसूस होती है। चिड़चिड़ाहट बढ़ती जाती है और मैं उदासीन हो जाता हूँ। दिन बीतते जाते हैं, बच्चा बड़ा होता जाता है और खुद का संसार तैयार होता जाता है। कब 10वीं कक्षा आई और चली गई, पता ही नहीं चलता। चालीस की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ती जाती है।

एक एकांत क्षण में, गुजरे दिनों की यादें ताज़ा होती हैं और मैंने कहा, "जरा यहाँ आओ, पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कहीं घूमने चलते हैं।" उसने अजीब नजरों से देखा और कहा, "तुम्हें बातें सूझ रही हैं, यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है।" कमर में पल्लू खोंसकर वह चली जाती है। पैंतालीस की उम्र में, आँखों पर चश्मा चढ़ जाता है, बाल सफेद होने लगते हैं, और दिमाग में उलझनें बढ़ जाती हैं। बेटा कॉलेज में होता है और बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ती जाती है। बेटे के कॉलेज खत्म होने और परदेश चले जाने के बाद, घर अब बोझ लगने लगता है।

पचपन की ओर बढ़ते हुए, बैंक के शून्यों की कोई खबर नहीं होती। बाहर जाने-आने के कार्यक्रम बंद हो जाते हैं। दवाइयों का दिन और समय तय हो जाते हैं। बच्चे बड़े हो जाते हैं और अब हमें सोचने की जरूरत होती है कि वे कब लौटेंगे। एक दिन, सोफे पर बैठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वह पूजा में व्यस्त थी। तभी फोन की घंटी बजी। बेटे ने बताया कि उसने शादी कर ली है और परदेश में ही रहेगा। उसने यह भी कहा कि बैंक के शून्यों को किसी वृद्धाश्रम में दे देना और खुद भी वहीं रहना।

मैं सोफे पर आकर बैठ गया। उसकी पूजा खत्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी, "चलो, आज फिर हाथ में हाथ डालकर बातें करते हैं।" वह तुरंत बोली, "अभी आई।" मुझे विश्वास नहीं हुआ। चेहरा खुशी से चमक उठा। आँखे भर आईं और आँसुओं से गाल भीग गए। लेकिन अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गई और मैं निस्तेज हो गया—हमेशा के लिए।

उसने शेष पूजा की और मेरे पास आकर बैठ गई। "बोलो, क्या बोल रहे थे?" लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छूकर देखा—ठंडा पड़ चुका था। मैंने उसकी ओर एकटक देखा। क्षण भर के लिए वह शून्य हो गई। "क्या करूँ?" उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन एक-दो मिनट में ही वह चेतन्य हो गई। धीरे से उठी, पूजा घर में गई, एक अगरबत्ती जलाई, ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से आकर सोफे पर बैठ गई। मेरा ठंडा हाथ अपने हाथों में लिया और बोली, "चलो, कहाँ घूमने चलना है तुम्हें? क्या बातें करनी हैं तुम्हें?"

ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं। वह एकटक मुझे देखती रही। आँसुओं की धारा बह निकली। मेरा सिर उसके कंधे पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था। क्या यही जीवन है?

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन को अपने तरीके से जीना चाहिए। धन और भौतिक सुख-सुविधाएँ महज एक भाग हैं, लेकिन सच्ची खुशी और संतोष प्रेम, समझदारी, और एक-दूसरे के साथ बिताए समय में होता है।

उसने कहा मुझ से कौन शादी करेगी..? उसने कहा- क्यों क्या कमी है आप में..? मैने कहा- ये तो तुम बताओगी... की क्या कमी थीं मुझ में..?

 मैने कहा क्यों मेरे लिए स्वयं को बर्बाद कर रहे हो, ये जानते हुए भी की मेरी शादी हो गई है, आप भी कोई अच्छी लड़की देख कर शादी क्यों नही कर लेते..?


उसने कहा मुझ से कौन शादी करेगी..? उसने कहा- क्यों क्या कमी है आप में..? मैने कहा- ये तो तुम बताओगी... की क्या कमी थीं मुझ में..?


मेरे आंखों से आंसू छलक के बाहर निकल गए, क्यों की मैं निशब्द थी, जिदंगी के ऐसे पड़ाव पर थी जहां से मैं चाहते हुए भी कुछ भी नही कर सकती थी 

ये सब शुरू हुआ जब मैं कॉलेज में थी  


कॉलेज का पहला साल प्रदीप और मैं सिर्फ दोस्त थे, लेकिन उसकी हाजिरजवाबी, समय पर सबके लिए उपलब्ध रहना सिर्फ कालेज के लड़के ही नहीं प्रोफेसरों को भी अपनी ओर आकर्षित करते थे, 

4 साल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान हमारी दोस्ती कब प्यार में बदल गई पता ही नही चला 


ना हमने कभी प्यार का इजहार किया ना उससे कभी इस बारे में पूछा, बस एक एहसास था की हम दोनो अब एक दुसरे से प्यार करते हैं 


हमारी बचकानी बातें अब जिम्मेदारी भरी बातों में बदल गई थी, पहले जहां हम साथ में घूमने की बात करते थे 

वही बात अब पैसे कहां save करने हैं इस बारे में होती थी 

भविष्य के ख्वाब साथ बैठ कर बुनते थे 


इसी दौरान एक कंपनी में प्लेसमेंट के लिए बैठते हैं 

दोनो का इंटर व्यू अच्छा जाता है 

अब हम दोनों को इस बात की खुशी थी की एक ही comapny में नौकरी होगी 

इससे अच्छा क्या हो सकता है, फिर घर पर बात कर के शादी की बात आगे बढ़ाई जाएगी 


आज interview का रिजल्ट आने वाला था 


ये रिजल्ट कम एक नोटिफिकेशन था की कंपनी में एक हो पोस्ट खाली है, हम दोनो mese किसी एक को नौकरी मिलेगी 


बिना एक पल गंवाए प्रदीप ने बोला तुम्हारी नौकरी ज्यादा जरूरी है क्यों की बिना इसके तुम्हारे घर वाले शायद ना माने 

इस लिए मैं कल इंटरव्यू में नही बैठूंगा 


और ऐसा ही हुआ मेरी नौकरी मेरे हाथ में थी मैंने घर में सबको बताई 


अब बारी थी प्रदीप की जॉब की कई कोशिश के बाद प्रदीप की नौकरी अच्छी लग गई 


और हम दोनो ने साथ 5 साल बिता दिए, 

शादी की बात दोनो के घर होने लगी 


अब सही समय था अपने 9 साल पुराने प्यार को घर पर बताने का 


जैसे मैने घर पर इसकी चर्चा की सब मेरे अगेंस्ट हो गए 

मुझे सबसे ज्यादा उम्मीद अपनी मां से थी लेकिन उन्होंने भी मेरा सपोर्ट नही किया 


घर पर ये बात पता चलाने के बाद और तेज़ी से मेरे लिए रिश्ते देखे जाने लगे 

प्रदीप को मै कुछ बता नही पा रही थी 


और घर वालो के सामने मेरी आवाज नही निकल रही थी 


मैने मां को समझाया की 9 साल से एक दुसरे को जानते है लेकिन उन्हें और पापा को इससे कोई फर्क नही पड़ रहा था, 


ना चाहते हुए भी मेरी शादी अरुण से हुई, आज भी हमारे और अरुण के बीच पति पत्नी का रिश्ता है लेकिन सिर्फ शारीरिक तौर पर, ना चाहते हुए भी मैं अरुण को मन में नही समा पा रही ना प्रदीप को मन से निकाल पा रही हूं 


बस अपने मन पर एक पत्नी धर्म का और मां बाप की इज्जत का बोझ धो रही हूं 


3 साल बाद वापस घर आई तो हिम्मत जुटा कर प्रदीप को बुलाया 

और ये हमारी आखिरी बात थी 


 कहा क्यों मेरे लिए स्वयं को बर्बाद कर रहे हो, ये जानते हुए भी की मेरी शादी हो गई है, आप भी कोई अच्छी लड़की देख कर शादी क्यों नही कर लेते..?


उसने कहा मुझ से कौन शादी करेगी..? उसने कहा- क्यों क्या कमी है आप में..? मैने कहा- ये तो तुम बताओगी... की क्या कमी थीं मुझ में..?


मेरे आंखों से आंसू छलक के बाहर निकल गए, क्यों की मैं निशब्द थी, जिदंगी के ऐसे पड़ाव पर थी जहां से मैं चाहते हुए भी कुछ भी नही कर सकती थी 


ये सिर्फ मेरी कहानी नही है बल्कि हजारों ऐसे युवाओं की है जिसके मां बाप के इगो की वजह से से अकसर 3 जिंदगिया बरबाद होती है


हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...