sunilrathod

Thursday, 15 August 2024

जवानी के दिनों में शारीरिक चाहतें सिर चढ़कर बोलने लगती हैं, और पहले 20 साल तेजी से बीत जाते हैं।

 जवानी के दिनों में शारीरिक चाहतें सिर चढ़कर बोलने लगती हैं, और पहले 20 साल तेजी से बीत जाते हैं। इसके बाद नौकरी की खोज शुरू होती है—यह नौकरी नहीं, वह नौकरी नहीं, दूर नहीं, पास नहीं। कई नौकरियाँ बदलने के बाद आखिरकार एक नौकरी स्थिरता की शुरुआत करती है। पहली तनख्वाह का चेक हाथ में आते ही उसे बैंक में जमा किया जाता है, और शून्यों का अंतहीन खेल शुरू हो जाता है। दो-तीन साल और बीत जाते हैं और बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ने लगती है।

25 की उम्र में विवाह हो जाता है और जीवन की एक नई कहानी शुरू होती है। शुरू के एक-दो साल गुलाबी और सपनीले होते हैं—हाथ में हाथ डालकर घूमना, रंग-बिरंगे सपने देखना। लेकिन यह सब जल्दी ही खत्म हो जाता है। बच्चे के आने की आहट होती है और पालना झूलने लगता है। अब सारा ध्यान बच्चे पर केंद्रित हो जाता है—उठना, बैठना, खाना-पीना, लाड़-दुलार। समय कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता।

इस बीच, हाथ एक-दूसरे से छूट जाते हैं, बातें और घूमना-फिरना बंद हो जाता है। बच्चा बड़ा होता जाता है और वह बच्चे में व्यस्त हो जाती है, जबकि मैं अपने काम में व्यस्त रहता हूँ। घर, गाड़ी की किस्त, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा, भविष्य की चिंता, और बैंक में शून्यों की बढ़ती संख्या—इन सब में जीवन व्यस्त हो जाता है।

35 साल की उम्र में, घर, गाड़ी, परिवार और बैंक में बढ़ते शून्य सब कुछ होते हुए भी एक कमी महसूस होती है। चिड़चिड़ाहट बढ़ती जाती है और मैं उदासीन हो जाता हूँ। दिन बीतते जाते हैं, बच्चा बड़ा होता जाता है और खुद का संसार तैयार होता जाता है। कब 10वीं कक्षा आई और चली गई, पता ही नहीं चलता। चालीस की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ती जाती है।

एक एकांत क्षण में, गुजरे दिनों की यादें ताज़ा होती हैं और मैंने कहा, "जरा यहाँ आओ, पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कहीं घूमने चलते हैं।" उसने अजीब नजरों से देखा और कहा, "तुम्हें बातें सूझ रही हैं, यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है।" कमर में पल्लू खोंसकर वह चली जाती है। पैंतालीस की उम्र में, आँखों पर चश्मा चढ़ जाता है, बाल सफेद होने लगते हैं, और दिमाग में उलझनें बढ़ जाती हैं। बेटा कॉलेज में होता है और बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ती जाती है। बेटे के कॉलेज खत्म होने और परदेश चले जाने के बाद, घर अब बोझ लगने लगता है।

पचपन की ओर बढ़ते हुए, बैंक के शून्यों की कोई खबर नहीं होती। बाहर जाने-आने के कार्यक्रम बंद हो जाते हैं। दवाइयों का दिन और समय तय हो जाते हैं। बच्चे बड़े हो जाते हैं और अब हमें सोचने की जरूरत होती है कि वे कब लौटेंगे। एक दिन, सोफे पर बैठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वह पूजा में व्यस्त थी। तभी फोन की घंटी बजी। बेटे ने बताया कि उसने शादी कर ली है और परदेश में ही रहेगा। उसने यह भी कहा कि बैंक के शून्यों को किसी वृद्धाश्रम में दे देना और खुद भी वहीं रहना।

मैं सोफे पर आकर बैठ गया। उसकी पूजा खत्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी, "चलो, आज फिर हाथ में हाथ डालकर बातें करते हैं।" वह तुरंत बोली, "अभी आई।" मुझे विश्वास नहीं हुआ। चेहरा खुशी से चमक उठा। आँखे भर आईं और आँसुओं से गाल भीग गए। लेकिन अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गई और मैं निस्तेज हो गया—हमेशा के लिए।

उसने शेष पूजा की और मेरे पास आकर बैठ गई। "बोलो, क्या बोल रहे थे?" लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छूकर देखा—ठंडा पड़ चुका था। मैंने उसकी ओर एकटक देखा। क्षण भर के लिए वह शून्य हो गई। "क्या करूँ?" उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन एक-दो मिनट में ही वह चेतन्य हो गई। धीरे से उठी, पूजा घर में गई, एक अगरबत्ती जलाई, ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से आकर सोफे पर बैठ गई। मेरा ठंडा हाथ अपने हाथों में लिया और बोली, "चलो, कहाँ घूमने चलना है तुम्हें? क्या बातें करनी हैं तुम्हें?"

ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं। वह एकटक मुझे देखती रही। आँसुओं की धारा बह निकली। मेरा सिर उसके कंधे पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था। क्या यही जीवन है?

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन को अपने तरीके से जीना चाहिए। धन और भौतिक सुख-सुविधाएँ महज एक भाग हैं, लेकिन सच्ची खुशी और संतोष प्रेम, समझदारी, और एक-दूसरे के साथ बिताए समय में होता है।

शादी के शुरुआती दिनों में, पति के साथ बिताए गए अंतरंग पलों में दुनिया की सारी खुशियां सिमट जाती हैं

 शादी के शुरुआती दिनों में, पति के साथ बिताए गए अंतरंग पलों में दुनिया की सारी खुशियां सिमट जाती हैं। 🌟 एक महिला के लिए अपने स्त्रीत्व का असली एहसास तब होता है जब उसे अपने पति का अटूट प्यार और समर्पण मिलता है। मेरे पति, आर्यन, भी ऐसे ही थे। उन्होंने मेरे हर शारीरिक और मानसिक जरूरत का पूरा ध्यान रखा। 💖


समय के साथ, हमारी सैक्स लाइफ में भी बदलाव आया। शादी के पांच साल बाद, जहाँ पहले दिन में 2-3 बार संबंध बनते थे, अब महीने में 2-3 बार ही बनते थे। इस बदलाव ने मुझे चिंतित कर दिया और मेरे मन में नकारात्मक विचार आने लगे। 😔 मुझे लगा कि आर्यन का प्यार कहीं और चला गया है।


इस चिंता में घुलते हुए, मैंने आर्यन से खुलकर बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसा कुछ भी नहीं है, बल्कि वे मुझे पहले से भी ज्यादा प्यार करते हैं। लेकिन अब शारीरिक संबंधों में उनकी रुचि कम हो गई है। 😟 मैंने घबराकर डॉक्टर से परामर्श लिया, जहाँ दो महीने तक हमारी काउंसलिंग हुई।


डॉक्टर ने सम्मोहन के माध्यम से यह जानने की कोशिश की कि समस्या क्या है। उन्होंने बताया कि आर्यन अब वर्तमान से ज्यादा भविष्य की चिंता करते हैं। 🌱 वे सोचते हैं कि कैसे मेरी और परिवार की जरूरतों को पूरा करें। यह चिंता उनके शारीरिक संबंधों में अरुचि पैदा कर रही थी।


डॉक्टर ने हमें समझाया कि नियमित और एक ही तरीके से किया गया संभोग जीवन में उत्साह को खत्म कर देता है। उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं कुछ नया ट्राय करूं, और संभोग की पहल खुद करूं। 🥰 साथ ही, आर्यन को यह भरोसा दिलाऊं कि मैं हर कदम पर उनके साथ हूँ, सिर्फ पैसे के लिए नहीं, बल्कि कर्तव्य और धर्म से भी जुड़ी हूँ। 🤝


मैंने डॉक्टर की सलाह मानी और धीरे-धीरे हमारी जिंदगी में फिर से खुशियां लौट आईं। 😊 आज, जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो समझ में आता है कि हर पति-पत्नी के जीवन में ऐसा समय आता है। यकीन मानिए, आपके पति आपकी भलाई के लिए अपनी शारीरिक और मानसिक संतुष्टि की कुर्बानी देते हैं। हमें यह समझना होगा और उन्हें सहारा देना हमारी जिम्मेदारी है, ताकि हमारे रिश्ते में फिर से वही उत्साह और प्यार लौट आए। 

मेरीइस यात्रा में, वह रिक्शा वाला मेरे लिए किसी देवदूत से कम नहीं

 एक दिन की बात है, जब मुझे सूरत जाना पड़ा। मेरे पास वहां एक दिन का काम था, जिसे निपटाने के लिए मैं ट्रेन से सफर कर रही थी। सूरत पहुंचने पर, मैंने एक छोटा सा होटल देखा, जो देखने में साधारण और आरामदायक लग रहा था। वहां मैंने अपना सामान रखा और कार्यक्रम स्थल के लिए निकल गई। दिनभर की भागदौड़ के बाद, जब मैं शाम को लौटने लगी, तो रात का अंधेरा गहराने लगा था।


कार्यक्रम स्थल से निकलकर मैंने एक ऑटो लिया और उस गली के करीब पहुंची जहां मेरा होटल था। ऑटो से उतरकर मैंने एक रिक्शा लिया, क्योंकि वह गली तंग थी और वहां तक पहुंचने के लिए पैदल या रिक्शे का सहारा लेना पड़ता था। लेकिन जैसे ही गली तक पहुंची, मुझे महसूस हुआ कि मैं रास्ता भूल गई हूँ। हड़बड़ी में होटल का पूरा पता लेना भूल गई थी, सिर्फ होटल का नाम याद था। लेकिन सूरत की तंग गलियों में हर ओर सिर्फ गलियां ही नजर आ रही थीं, और मुझे पता नहीं चल रहा था कि किस दिशा में जाऊं।


मैंने रिक्शा वाले से होटल का नाम बताया, लेकिन उसे भी उस जगह की जानकारी नहीं थी। मेरी चिंता बढ़ने लगी। मैंने उसे कहा कि वह मुझे उतार दे, मैं खुद ही रास्ता ढूंढ लूंगी। उसने मुझे एक मोड़ पर उतार दिया, और मैं अकेले ही होटल की तलाश में चलने लगी।


लेकिन जैसे ही मैं आगे बढ़ी, मुझे महसूस हुआ कि कोई मेरा पीछा कर रहा है। मैंने पलटकर देखा, तो वही रिक्शा वाला दूर से मेरे पीछे-पीछे चल रहा था। मैं थोड़ी देर रुकी, उसने भी वहीं रुककर इंतजार किया। इस तरह की स्थिति में मैंने खुद को असहज महसूस किया और थोड़ी बेचैनी भी होने लगी। मुझे लगा कि यह कुछ गलत है, और मैंने अपनी गति तेज कर दी, लेकिन वह आदमी अब भी मेरी ही दिशा में बढ़ रहा था।


आखिरकार, मैंने हिम्मत जुटाई और वापस लौटकर उस रिक्शा वाले के पास गई। मेरे मन में डर और गुस्सा दोनों थे, और मैंने उससे पूछा, "आप क्या कर रहे हैं? मेरे पीछे-पीछे क्यों आ रहे?"


उसने शांत स्वर में जवाब दिया, "आपका रास्ता भटक गया है, इसलिए देख रहा हूँ कि आप सही जगह पहुंच जाएं।"


मेरी नाराजगी और बढ़ गई, "इससे आपको क्या? आप जाइए, मुझे अकेला छोड़ दीजिए।"


उसने थोड़ा झुंझलाकर कहा, "नहीं, हम कहीं नहीं जाएंगे। रात का समय है और आप इस शहर से अनजान लगती हैं। मुझे पैसे की चिंता नहीं है, बस यही खड़ा रहूंगा जब तक आपको आपका होटल नहीं मिल जाता।"


उसके शब्दों में एक सच्चाई थी, जो मैंने धीरे-धीरे महसूस की। वह कहीं जाने को तैयार नहीं था, और मैं भी थक चुकी थी। मैंने आगे बढ़ने का फैसला किया, और जब भी पलटकर देखती, वह व्यक्ति दूर खड़ा मिलता, लेकिन कहीं जाता नहीं था।


काफी देर बाद, जब मैं थककर एक जगह रुक गई और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए, तभी मेरी नजर उस होटल पर पड़ी, जहां मैंने सुबह अपना सामान रखा था। वह होटल मेरे ठीक सामने था, और मैंने चैन की सांस ली। मैंने राहत की मुस्कान के साथ उस आदमी को इशारा किया, और वह पास आया।


मैंने पास की दुकान से मिठाई खरीदी और उसे दी। मैंने उसके साथ देने और मेरे लिए रुके रहने के लिए शुक्रिया कहा। वह पहली बार मुस्कुराया और बोला, "मेरी दो बेटियां हैं। एक तुम्हारी उम्र की है। इसलिए मैं खड़ा रहा, ताकि तुम सुरक्षित रहो।"


उसकी बात सुनकर मेरा दिल भर आया। मैं उसे देखती रही, जबकि वह धीरे-धीरे अंधेरे में गुम हो गया। उसकी बातों ने मुझे गहराई से छू लिया। उस रात मैंने महसूस किया कि हमारा ईश्वर वास्तव में हमारे साथ सड़कों पर चलता है, भटकने पर वह हमें सही राह दिखाने के लिए पास ही खड़ा होता है।


मैंने बाहर की एक दुकान से चाय ली और अपने भीतर एक नई ऊर्जा और विश्वास महसूस किया। मेरीइस यात्रा में, वह रिक्शा वाला मेरे लिए किसी देवदूत से कम नहीं था, जिसने मेरे विश्वास को और मजबूत किया। सच में, भगवान हमें कभी अकेला नहीं छोड़ता, वह हमारे आसपास के लोगों में हमें सुरक्षा और स्नेह देने के लिए उपस्थित रहता है।

झगड़ा इतना बढ़ गया कि पत्नी के दिल में ठान लिया कि वह अब और इस घर में नहीं रहेगी। रात का समय था, पति और बच्चे खाना खाकर

 एक बार की बात है, एक पत्नी और पति के बीच एक तीखा झगड़ा हो गया। झगड़ा इतना बढ़ गया कि पत्नी के दिल में ठान लिया कि वह अब और इस घर में नहीं रहेगी। रात का समय था, पति और बच्चे खाना खाकर सो गए, लेकिन पत्नी का मन बेचैन था। अपने फैसले पर अडिग, उसने दरवाज़ा खोला और चुपचाप घर से बाहर निकल गई। ठंडी हवा के झोंके और शांत गलियों ने उसे घेर लिया, लेकिन उसके मन में उठते विचारों का शोर बढ़ता जा रहा था।


वह मोहल्ले की गलियों में इधर-उधर भटकने लगी, सोचते हुए कि अब वह कहाँ जाएगी और क्या करेगी। उसकी नज़रें तो आगे की ओर थीं, लेकिन मन में वह बीते झगड़े के हर शब्द को दोहरा रही थी। जैसे ही वह आगे बढ़ी, अचानक एक घर से धीमी-धीमी आवाज़ सुनाई दी। उसने रुककर सुना, तो समझ में आया कि अंदर एक स्त्री अपने बच्चे के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी। उसकी प्रार्थना थी, "हे भगवान, आज मेरे बच्चे के लिए रोटी का जुगाड़ हो जाए।" वह स्त्री गहरी चिंता में डूबी थी, उसकी आवाज़ में भरी हुई बेबसी ने पत्नी के दिल को छू लिया।


थोड़ा और आगे बढ़ने पर, उसे एक और घर से आवाज़ सुनाई दी। वहाँ एक औरत ईश्वर से अपने बेटे के लिए दुआ मांग रही थी, "भगवान, मेरे बेटे को हर परेशानी से बचा लेना। उसे हिम्मत और सहारा देना।" उस माँ की आवाज़ में छिपी चिंता और ममता ने पत्नी के दिल को और भी विचलित कर दिया।


आगे चलते-चलते, उसे एक और घर से पति-पत्नी के बीच की बातचीत सुनाई दी। पति अपनी पत्नी से कह रहा था, "तुम मकान मालिक से कुछ और दिन की मोहलत मांग लो। उससे विनती करो कि हमें रोज-रोज तंग न करे। हम किसी तरह से पैसों का इंतजाम कर लेंगे।" उनकी आवाज़ में छिपी लाचारी और बेबसी ने पत्नी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि हर घर में कोई न कोई समस्या होती है, जिसे शायद बाहर से देखा नहीं जा सकता।


वह कुछ और आगे बढ़ी, तो एक बुज़ुर्ग दादी और उसके पोते की बातचीत ने उसका ध्यान खींचा। दादी अपने पोते से शिकायत कर रही थी, "बेटा, कितने दिन हो गए तुम मेरे लिए दवाई नहीं लाए।" पोता, जो शायद खुद संघर्ष में था, धीरे से बोला, "दादी, अब मेडिकल वाला भी उधार नहीं देता और मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं तुम्हारे लिए दवाई ले आऊं।" उसकी आवाज़ में झलकती बेबसी ने पत्नी को एहसास दिलाया कि आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोग कितने असहाय होते हैं।


थोड़ा और आगे बढ़ने पर, एक और घर से एक औरत की आवाज़ सुनाई दी। वह अपने भूखे बच्चों को कह रही थी, "सो जाओ मेरे बच्चों, तुम्हारे बाबा जरूर कुछ खाने के लिए लाएंगे। जब वे आएंगे, तो मैं तुम्हें जगा दूंगी।" उस औरत की आवाज़ में छिपी चिंता और मजबूरी ने पत्नी के दिल को और भी गहरा छू लिया। उसने देखा कि हर घर में कोई न कोई दर्द छिपा हुआ है, जिसे बाहर से देखने पर समझना मुश्किल है।


यह सब सुनने के बाद, पत्नी के दिल में अचानक एक गहरा एहसास जागा। उसने सोचा, "मैं तो सिर्फ अपने पति से हुई नोक-झोंक की वजह से घर छोड़ने का सोच रही थी, लेकिन इस दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जिनकी परेशानियां मुझसे कहीं ज्यादा बड़ी हैं।" उसने महसूस किया कि उसके पास एक घर है, बच्चे हैं, और एक पति है, जो भले ही उससे कभी-कभी बहस कर ले, लेकिन फिर भी उसका ख्याल रखता है।


वह सोचने लगी कि झगड़े तो हर रिश्ते में होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमें हार मान लेनी चाहिए। उसने महसूस किया कि जिंदगी में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने के लिए हमें अपने रिश्तों की अहमियत को समझना चाहिए और उन्हें संभालकर रखना चाहिए। दूसरों की समस्याओं को देखकर उसने जाना कि उसे अपने जीवन की छोटी-छोटी बातों के लिए ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए।


इस एहसास के साथ, उसने घर लौटने का फैसला किया। वह अपने घर वापस आ गई और ईश्वर का धन्यवाद करने लगी कि उसके पास अपना एक मकान, बच्चे, और एक अच्छा पति है। उसने सोचा कि हाँ, कभी-कभी पति से नोक-झोंक हो जाती है, लेकिन वह भी उसे प्यार करता है और उसके जीवन का एक अहम हिस्सा है। उसे एहसास हुआ कि वह कितनी भाग्यशाली है कि उसे अपनी जिंदगी में इतने सारे आशीर्वाद मिले हैं।


सीख: जरूरी नहीं कि जो लोग बाहर से खुश और सुखी दिखते हैं, उनके जीवन में कोई समस्या न हो। हर किसी के जीवन में कोई न कोई संघर्ष या पीड़ा छिपी होती है, जिसे वह अपनी मुस्कान के पीछे छुपा लेता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि हमें अपने जीवन की छोटी-छोटी खुशियों की कद्र करनी चाहिए और अपने रिश्तों को मजबूती से थामे रखना चाहिए, चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों। असली जिंदगी वही है जो कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करते हुए जी जाए।

विरह में सिर्फ स्त्रियां ही नहीं सूखती सूख जाते हैं पुरुष भी

 विरह में सिर्फ स्त्रियां ही नहीं सूखती

सूख जाते हैं पुरुष भी

होंठ पर पड़ जाती हैं पपड़ियां

लटक जाते हैं गाल

झाड़ियों सी फैलती है दाढ़ी

नहीं सुहाती रंगीन कमीज़ें

आंखों में समा जाता अथाह पीलापन

अनगिनत काली रातों में

जलती हैं ख़ाली आंखें

जलाता है सूरज, बुझ जाती है सुबह

बंजर हो जाती है छाती

जम जाता है हृदय का महासागर

हांथों में नहीं बचता स्पर्श का एहसास

लकीरें काटने को दौड़ती हैं

शिथिल बोझिल सा हो जाता है शरीर

निकल नहीं पाता कोई गुबार मुख से

सुप्त हो जाता है मन का लावा

पसर जाती है सीलन दिलों दीवार पर

वीरान मरुस्थल सा हो जाता है मन

जिनमे रेंगता है मौन ही मौन

 उगते रहते हैं असंख्य कांटें

वे फूंकते हैं धुआं, खुद धुआं हो जाने तक

बटुए में तस्वीर के रिक्त स्थान को 

निहारते हैं, सोचते हैं 

फिर बंद कर देते हैं...

सहेजते हैं वे भी प्रेम के अवशेष

उनके आंसू सुप्त जल स्त्रोत की

तरह होते हैं

रोते हैं पर दिखते नहीं आंसू

पत्थर हो जाता है तकिया

धंस जाता है बिस्तर का गद्दा

एक टक ताकते रहते हैं कमरे

में ऊपर चलते पंखे को गोल गोल 

और समाहित हो जातें है भीतरी भंवर में

प्रेम के अभाव में सिर्फ स्त्रियां ही नहीं मरती 

मर जाते हैं पुरुष भी....

समय से शादी कीजिए बच्चा पैदा कीजिए,

 22 साल की उम्र में जब शरीर का यौवन उफान मारता है

तो इस उम्र में सभी लड़कियों का मन होता है शादी करने का अपने पति के साथ आलिंगन होने का क्यों की शरीर के हार्मोन हमे संकेत देते हैं की हमारा शरीर अब शारीरिक संभोग के लिए तैयार है

ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी होता था, हर एक नए लड़के में अपना जीवनसाथी तलाशती अपने सुहागरात के सपने दिन में देखती इसका ये मतलब कभी नहीं होता की मैं कैरेक्टर less हूं हर महिला उमर के इस पड़ाव पर अपने शरीर में ये बदलाव महसूस करती है

लेकिन ऑफिस के काम की वजह से शादी नही हो रही थी या यूं बोले तो मुझे नशा था की पहले करियर सेट करना है उसके बाद कुछ और

23 साल में मेरी दादी मां मेरे ऊपर जोर डालने लगी की बिट्टी की शादी जल्दी करो नही तो मैं मर जाऊंगी मरने से पहले मैं चाहती हूं की अपने दामाद को देख लूं

लेकिन मैं करियर को लेके ज्यादा सीरियस थी ऐसे करते करते उम्र कब 28 साल पहुंच गई पता ही नहीं चला

अब मेरी मां भी शादी के लिए जोर डालती, और बोलती बुढ़ापे में घर बसाओगी क्या, तो मैं उनसे झगड़ती की अभी मेरी उम्र क्या है 28 साल कोई उम्र होती है

असल में इसका कारण एक था आए दिन बड़ी बड़ी हीरोइन की रील देखती सोशल मीडिया पे एक नई वीडियो देखती जिसमे वो बोलती की शादी तभी करो जब तुम मानसिक तौर पर तैयार हो और ये बातें इतनी ज्यादा दिमाग में घुसी की मुझे भी यही लगा की पहले करियर बाद में सब कुछ

ऐसे ही मेरी उम्र 31 साल हुई, और मुझे पीरियड्स में काफी दिक्कत आने लगी जैसे ब्लीडिंग में दर्द होना, फ्लो ज्यादा होना

जब डॉक्टर के पास गई तो उन्होंने ने भी दवाई दी और बोला शादी सही उम्र में करो नही तो बच्चे पैदा होने में दिक्कत होगी

जब घर आई और इसके बारे में इंटरनेट पर देखा तो तो पाया की बड़ी बड़ी एक्ट्रेस egg freez कराती हैं

जिसमे मेरे भ्रुड से अंडा निकाल कर उसे कई सालो के लिए फ्रिज कर दिया जाएगा, और जब भी मैं मां बनना चाहूं तो इस egg ka इस्तेमाल कर सकती हूं

एक बार फिर फिल्मी और इंटरनेट का अधूरा ज्ञान प्राप्त कर के मैं खुश थी

लेकिन अब मुझे भी लग रहा था या तो #eggfreez Kara लिया जाए या शादी की जाए

तो मुंबई के एक बड़े अस्पताल गई dr से बात किया तो पता चला egg की क्वालिटी 25 से 27 तक सबसे अच्छी होती है, आप खुद अभी 31 की है जिसमे egg ki quality गिर चुकी है

जिसे सुनकर बुरा लगा लेकिन उससे भी बुरा ये जानकर लगा की egg freez करने के लिए हर महीने मुझे 30000 देने होंगे ये सुनकर मेरी हालत खराब

मुझे एहसास हुआ की शादी और परिवार बसाने की उम्र अब निकल चुकी है

मैने लड़का देखना शुरू किया और 33 साल की उम्र में एक 36 साल के आदमी से मेरी शादी हुई

लेकिन आज शादी को 4 साल हो गए हैं लेकिन मां बाप बनने का सुख अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है

अब मुझे दादी की वो बात याद आती है जब वो बोला करती थी की शादी कर लो नही तो बहुत देर हो जाएगी

जिस करियर को सेटअप करने के लिए इतने साल का इंतजार किया और पैसे कमाए वो अब हमारी ट्रीटमेंट और हजार तरह के टेस्ट में जा रहे है

मैं उन सभी लड़के और लड़कियों को ये बोलना चाहती हूं। करियर बाद में भी बनता है

आप किसी इंसान के साथ हैं तो प्यार उनसे भी हो जाता है

हमारा शरीर के लिए हर चीज का समय डिसाइड है जैसे पहली महावारी 12 साल में आना और 50 में खत्म होना

वैसे ही बच्चे पैदा करने का भी एक समय है सारी चीज समय के साथ फिर प्राप्त की जा सकती है लेकिन समय दुबारा प्राप्त नहीं किया जा सकता

और ना आप की उम्र दुबारा कम की जा सकती है

एक्ट्रेस हीरोइन और टीवी पे आने वाली 55 साल की अदाकारा को देख कर अपने जीवन का फैसला कभी ना लें क्यों की ये पैसे के दम पर जवान दिखते हैं

पैसे के दम पर दूसरे की कोख किराए पर लेके अपने बच्चे उनके कोख में पैदा करवाते हैं

ये साधारण लोगो के लिए एक #ब्रेनवाश का काम करते हैं जिसे हमारी जैसी लड़किया देख कर अपना शरीर और समय दोनों बर्बाद करती है,

समय से शादी कीजिए बच्चा पैदा कीजिए, क्योंकि समय रहते आप नही सचेत होंगे तो सारी जिंदगी सिर्फ पछतावा होगा और कुछ नहीं..।।

माँ के बलिदानों को हमेशा याद रखना चाहिए, उन्हें कभी भी बोझ नहीं समझना चाहिए

 दिनभर की थकान से चूर वह स्त्री जैसे ही झुग्गी में दाखिल हुई, उसके सामने बैठे उसके शराबी पति ने जोर से आवाज दी, "आ गई? चल जल्दी से २० रुपए निकाल, तीन दिन से गला सूखा पड़ा है।"


स्त्री ने बिना कुछ कहे पानी पीने के लिए कदम बढ़ाए ही थे कि फिर से पति की कर्कश आवाज गूंजी, "साली, सुनती नहीं है? जल्दी कर!"


स्त्री ने शांत स्वर में जवाब दिया, "पैसे नहीं हैं मेरे पास।"


पति का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। वह बोला, "झूठ बोलती है! सारा दिन बाहर रही और कहती है पैसे नहीं हैं। अच्छा, १० ही दे दे, किसी से दो घूंट लेकर पी लूंगा।"

स्त्री ने फिर से वही बात दोहराई, "कहा ना, काम नहीं मिला आज।"

यह सुनते ही शराबी पति का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उसकी मर्दानगी को जैसे किसी ने चुनौती दे दी हो। वह उठा और अंदर का क्रूर इंसान जाग उठा। बिना सोचे-समझे, वह औरत पर लात-घूंसों की बौछार करने लगा। वह गालियाँ बकता रहा, उसे पीटता रहा, और वह बेचारी चुपचाप मार खाती रही।

इस पूरे घटनाक्रम को चारपाई के नीचे छुपा उसका पाँच वर्ष का बेटा सिसकते हुए देख रहा था। उसकी मासूम आँखों में डर और असहायता की गहरी छाप थी।

स्त्री मार खाती-खाती सोच रही थी, उसकी माँ हमेशा कहती थी कि पति परमेश्वर होता है। उसका घर ही तेरा घर है। मायके से लड़की डोली में जाती है और ससुराल से अर्थी पर। उसने कितनी बार सोचा कि इस दुख और पीड़ा से मर ही जाए, पर बेटे के लिए जीना है, इसलिए हर बार अपने आपको संभाल लेती थी।

चार-पाँच घंटे तक पीटने के बाद जब उसका शराबी पति थक गया, तो बड़बड़ाता हुआ सो गया। वह रातभर दर्द और आँसुओं में डूबी रही, अपनी किस्मत को कोसती रही। सुबह जब सूरज की किरणें झुग्गी के अंदर आईं, तो उसका बेटा धीरे से उसके पास आकर बोला, "माँ, मैं आज स्कूल नहीं जाऊँगा। सबने अपनी फीस जमा कर दी है, मुझे छोड़कर। कल मास्टर जी ने मुझे मुर्गा बनाया था, आज छड़ी से मारेंगे।"

माँ ने अपने बेटे की दुखभरी आँखों को देखा और उसका दर्द महसूस किया। उसने अपने पेटी कोट के घेरे से २० रुपए निकालते हुए कहा, "मेरे लाल, तू स्कूल में ना पीटे, इसलिए तेरी माँ रातभर पिटती रही। ये ले, अपनी फीस जमा कर दे।"

बेटे की आँखें खुशी से चमक उठीं। उसने रोती माँ के आँसू पोछते हुए कहा, "माँ, जब मैं पढ़-लिखकर बड़ा हो जाऊँगा ना, तब कभी तेरी आँखों में आँसू नहीं आने दूँगा।"

माँ ने अपने बेटे को गले से लगा लिया, आँसुओं में डूबे उस क्षण में भी उसने एक उम्मीद की किरण देखी।

दोस्तों, यह कहानी केवल एक माँ की नहीं है, बल्कि दुनिया की हर माँ की है, जो अपने बच्चों के भविष्य के लिए हर तरह के दुख और दर्द को सहन करती है। वह दिन-रात मेहनत करती है, केवल इस उम्मीद में कि उसका बच्चा बड़ा होकर एक सफल और खुशहाल व्यक्ति बने।

लेकिन अफसोस, कुछ बच्चे बड़े होकर अपनी माँ के किए बलिदानों को भूल जाते हैं। वे यह सोचने लगते हैं कि वे अपनी माँ को पाल रहे हैं, जबकि सच तो यह है कि वही माँ उनकी जिंदगी की नींव रखती है। उन्होंने उन्हें नौ महीने अपनी कोख में रखा, तीन साल तक सीने से चिपकाए रखा, और जिंदगी भर अपने दिल में जगह दी। अगर वह माँ न होती, तो शायद उनका अस्तित्व भी न होता।

इसलिए, हमें अपनी माँ के बलिदानों को हमेशा याद रखना चाहिए, उन्हें कभी भी बोझ नहीं समझना चाहिए। वे ही हमारे जीवन का असली आधार हैं। उनके प्रेम और त्याग का सम्मान करना ही हमारी सच्ची जिम्मेदारी है।

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...