औरत अपना जिस्म लुटाकर मर्द को अपना बनाने की कोशिश करती है, और मर्द अपनी जेब खर्च करता है बस औरत का साथ पाने के लिए...
ये रिश्ता अक्सर प्रेम का कम और सौदेबाज़ी का ज़्यादा बन जाता है...
क्योंकि जहां औरत समझती है कि उसकी नज़दीकियाँ किसी को बाँध लेंगी,
वहीं मर्द ये सोचता है कि उसका खर्चा, उसकी कमाई,
उसकी काबिलियत किसी को रोक लेगी...
लेकिन सच्चाई ये है —
ना जिस्म किसी को रोक सकता है,
और ना ही पैसा किसी को हमेशा के लिए बाँध सकता है!
रिश्ते सिर्फ तब टिकते हैं,
जब न ज़रूरत हो जिस्म की,
न गिनती हो पैसों की,
बल्कि हो सिर्फ एक सच्चा मन से मन का जुड़ाव।
वरना...
जिस्म बदलते देर नहीं लगती,
और जेब खाली होते ही साथ छूट जाता है...
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