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Friday, 27 September 2024

महिलाएं अपने सारे राज़ नहीं बतातीं

 महिलाएं भी पुरुषों की तरह शारीरिक संबंधों की ओर आकर्षित होती हैं, लेकिन अक्सर वे अपनी रुचि को व्यक्त नहीं करतीं। वे अपने पति या साथी से भी इस बारे में खुलकर बात करने में हिचकिचाती हैं। इसके पीछे सामाजिक दबाव और दूसरों के विचारों की चिंता होती है। कई बार महिलाएं अपनी इच्छाओं को दबा देती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके बारे में बात करने पर उन्हें गलत समझा जा सकता है।


महिलाएं आमतौर पर गुप्त संबंधों के बारे में खुलकर बात नहीं करतीं

पुरुष अक्सर एक-दूसरे से शारीरिक संबंधों के बारे में खुलकर बात कर लेते हैं, जबकि महिलाएं इस तरह की बातें दूसरों से साझा करने में संकोच करती हैं। ज्यादातर महिलाएं केवल अपनी एक-दो करीबी दोस्तों से ही गुप्त बातें साझा करती हैं। आप अपनी गर्लफ्रेंड से इस बारे में बात कर सकते हैं, लेकिन वह भी शायद इसे केवल अपनी सबसे करीबी दोस्त तक ही सीमित रखेगी।


महिलाओं को सफल पुरुषों में दिलचस्पी होती है

महिलाएं अक्सर ऐसे पुरुषों की ओर आकर्षित होती हैं जो सफल होते हैं। उनकी रुचि उन पुरुषों में अधिक होती है जो करियर और जीवन में सफल माने जाते हैं, जबकि पुरुष अक्सर सुंदर और आकर्षक महिलाओं की ओर आकर्षित होते हैं।


महिलाएं दिखावे पर ध्यान देती हैं

कई महिलाएं खुद को सुंदर और आकर्षक दिखाने के लिए हर संभव प्रयास करती हैं। वे नए कपड़े पहनने और स्टाइलिश दिखने पर जोर देती हैं। सज-संवर कर बाहर जाना एक सामान्य व्यवहार है क्योंकि वे दूसरों की नजर में खूबसूरत दिखने की कोशिश करती हैं।


कुंवारी लड़कियां अक्सर अपने आदर्श पुरुष के बारे में सोचती हैं

अधिकतर कुंवारी लड़कियां अकेले में अपने भविष्य के पति या ब्वॉयफ्रेंड के बारे में सोचती हैं। वे अपने आदर्श साथी और उनके साथ बिताए जाने वाले भविष्य के पलों की कल्पना करती हैं।


शारीरिक असंतोष से अवैध संबंधों की संभावना बढ़ती है

यदि एक महिला अपने साथी के साथ शारीरिक रूप से संतुष्ट नहीं होती, तो अवैध संबंध बनने की संभावना बढ़ जाती है। यह कई बार विवाहेतर संबंधों का प्रमुख कारण होता है।


कुंवारी माताओं की संख्या में वृद्धि

अध्ययनों के अनुसार, कुछ महिलाएं कुंवारी होते हुए भी मां बन जाती हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि 30% महिलाएं इस स्थिति में होती हैं।


महिलाओं का सबसे अधिक उत्साहित होने का समय

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, पीरियड्स के चार से पांच दिन बाद महिलाओं में शारीरिक और मानसिक उत्तेजना अधिक होती है।


महिलाओं को परिपक्व पुरुष पसंद आते हैं

अधिकांश महिलाएं परिपक्व और स्थिर पुरुषों की ओर आकर्षित होती हैं, जबकि पुरुष अक्सर छोटी उम्र की महिलाओं को प्राथमिकता देते हैं।


महिलाएं चाहती हैं कि लोग उनकी ओर देखें

अधिकतर महिलाएं सजने-संवरने में रुचि रखती हैं क्योंकि वे चाहती हैं कि जहां भी जाएं, लोग उनकी ओर ध्यान दें।


महिलाएं अपने सारे राज़ नहीं बतातीं

महिलाएं अपने गहरे राज़ कभी-कभी अपने साथी से भी साझा नहीं करतीं। वे कुछ बातें अपने तक ही रखना पसंद करती हैं।


महिलाएं भावनात्मक रूप से कमजोर होती हैं

महिलाएं आमतौर पर पुरुषों से अधिक भावनात्मक होती हैं। वे अपनी भावनाओं को ज्यादा महसूस करती हैं और छोटे-छोटे मामलों में भी आंसू बहा सकती हैं।


इस लेख का अंत तक पढ़ने के लिए धन्यवाद! 🌸

Thursday, 26 September 2024

1993 में रिलीज हुई Indecent Proposal नामक फ़िल्म में कहानी है एक युगल "डेविड और डियाना" की,

 क्या हो कि आप भीषण दरिद्रता में जीवन बिता रहे हों और आपको कहीं से ऐसा ऑफर मिले, जिसमें जीवन भर के कष्ट दूर कर देने लायक धन का लालच हो - अपनी पत्नी की एक रात के बदले। 

सुनने में यह बड़ा अभद्र लगता है और कई लोग इस सिचुएशन को हाइपोथेटिकल करार देकर तुरंत मना कर देंगे। पर क्या हो, अगर ऑफर वास्तविक हो? 

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1993 में रिलीज हुई Indecent Proposal नामक फ़िल्म में कहानी है एक युगल "डेविड और डियाना" की, जो कर्जों में डूबे हुए हैं। घर बिकने की कगार पर है। जो कुछ जेब मे बचा होता है, उसे डबल करने के चक्कर में एक कैसिनों में जा कर ठन-ठन गोपाल हो जाते हैं। 

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उसी कैसिनो में मौजूद एक अरबपति बूढ़े "जॉन गेज" की नजर डियाना पर पड़ती है, जो एक नजर में उसे भा जाती है। और उसी रात जॉन इस युगल से दोस्ती करके बातों-बातों में एक मिलियन डॉलर का ऑफर देता है - डियाना की एक रात के बदले में। 

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फ़िल्म इंसानी जटिल मनोविज्ञान का क्या बख़ूबी चित्रण करती है - कुछ देर पहले उस अरबपति बूढ़े को इस ऑफर के लिए लताड़ के आये युगल की आंखों से नींद गायब हो गयी है। एक-दूसरे के मनोभावों को जान रहे दोनों बिस्तर पर करवटें बदल रहे हैं और अंततः एक-दूसरे से पूछ ही लेते हैं कि - तुम भी वही सोच रहे हो, जो मैं?

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इस ऑफर को कबूल करने के बाद इस युगल की जिंदगी में कुछ भी सामान्य नहीं रहता और वो रात उनके आगे के पूरे जीवन को खराब कर देती है। प्राइम पर मौजूद इस फ़िल्म को प्रेम और लालच के मिश्रण से उत्पन्न त्रासदी को समझने के लिए देखा जा सकता है। 

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और इस फ़िल्म की सबसे खास बात यह है कि फ़िल्म खत्म होते-होते प्रथमदृष्टया एक सनकी अरबपति बूढ़ा प्रतीत होते जॉन गेज के व्यक्तित्व से आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते और आपको उसके किरदार की गहराई से प्रेम हो चुका होता है।

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फ़िल्म के अंतिम दृश्य में डियाना को बिना अपराधबोध महसूस कराए डेविड के पास वापस भेजने के लिए जॉन गेज जानबूझकर एक नाटक करता है। जब डियाना उससे दूर जा रही होती है तो गेज का ड्राइवर उससे अचरज भरे स्वर में पूछता है कि - तुमने ऐसा क्यों किया?

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तो गेज जवाब देता है - क्योंकि कुछ देर पहले वो डेविड को जिन निगाहों से देख रही थी, उन निगाहों से वो मुझे कभी नहीं देखती। 

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फ़िल्म का सेंट्रल प्लाट इतना भर है कि - क्या पैसे से प्यार खरीदा जा सकता है? और मुझे लगता है कि इसी दृश्य में फ़िल्म अपना निष्कर्ष बता जाती है। 

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शायद पैसे से लोग खरीदे जा सकते हैं। उनका वक़्त, उनका साथ हासिल किया जा सकता है। 

पर उन निगाहों को हासिल कभी नहीं किया जा सकता - जिन निगाहों से कोई अपने प्रेम को देखता है। 

Wednesday, 25 September 2024

रेमंड ग्रुप के मालिक विजयपत सिंघानिया पैदल हो गए। बेटे ने पैसे-पैसे के लिए मोहताज कर दिया।

 दो खबरों पर जरा नजर डालिए। 

1- 12 हजार करोड़ रुपये की मालियत वाले रेमंड ग्रुप के मालिक विजयपत सिंघानिया पैदल हो गए। बेटे ने पैसे-पैसे के लिए मोहताज कर दिया। 

2- करोड़ों रुपये के फ्लैट्स की मालकिन आशा साहनी का मुंबई के उनके फ्लैट में कंकाल मिला।  

विजयपत सिंघानिया और आशा साहनी, दोनों ही अपने बेटों को अपनी दुनिया समझते थे। पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाकर उन्हें अपने से ज्यादा कामयाबी की बुलंदी पर देखना चाहते थे। हर मां, हर पिता की यही इच्छा होती है। विजयपत सिंघानिया ने यही सपना देखा होगा कि उनका बेटा उनकी विरासत संभाले, उनके कारोबार को और भी ऊंचाइयों पर ले जाए। आशा साहनी और विजयपत सिंघानिया दोनों की इच्छा पूरी हो गई। आशा का बेटा विदेश में आलीशान जिंदगी जीने लगा, सिंघानिया के बेटे गौतम ने उनका कारोबार संभाल लिया, तो फिर कहां चूक गए थे दोनों। क्यों आशा साहनी कंकाल बन गईं, क्यों विजयपत सिंघानिया 78 साल की उम्र में सड़क पर आ गए। मुकेश अंबानी के राजमहल से ऊंचा जेके हाउस बनवाया था, लेकिन अब किराए के फ्लैट में रहने पर मजबूर हैं। तो क्या दोषी सिर्फ उनके बच्चे हैं..? 

अब जरा जिंदगी के क्रम पर नजर डालें। बचपन में ढेर सारे नाते रिश्तेदार, ढेर सारे दोस्त, ढेर सारे खेल, खिलौने..। थोड़े बड़े हुए तो पाबंदियां शुरू। जैसे जैसे पढ़ाई आगे बढ़ी, कामयाबी का फितूर, आंखों में ढेर सारे सपने। कामयाबी मिली, सपने पूरे हुए, आलीशान जिंदगी मिली, फिर अपना घर, अपना निजी परिवार। हम दो, हमारा एक, किसी और की एंट्री बैन। दोस्त-नाते रिश्तेदार छूटे। यही तो है शहरी जिंदगी। दो पड़ोसी बरसों से साथ रहते हैं, लेकिन नाम नहीं जानते हैं एक-दूसरे का। क्यों जानें, क्या मतलब है। हम क्यों पूछें..। फिर एक तरह के डायलॉग-हम लोग तो बच्चों के लिए जी रहे हैं। 

मेरी नजर में ये दुनिया का सबसे घातक डायलॉग है-'हम तो अपने बच्चों के लिए जी रहे हैं, बस सब सही रास्ते पर लग जाएं।' अगर ये सही है तो फिर बच्चों के कामयाब होने के बाद आपके जीने की जरूरत क्यों है। यही तो चाहते थे कि बच्चे कामयाब हो जाएं। कहीं ये हिडेन एजेंडा तो नहीं था कि बच्चे कामयाब होंगे तो उनके साथ बुढ़ापे में हम लोग मौज मारेंगे..? अगर नहीं तो फिर आशा साहनी और विजयपत सिंघानिया को शिकायत कैसी। दोनों के बच्चे कामयाब हैं, दोनों अपने बच्चों के लिए जिए, तो फिर अब उनका काम खत्म हो गया, जीने की जरूरत क्या है। 

आपको मेरी बात बुरी लग सकती है, लेकिन ये जिंदगी अनमोल है, सबसे पहले अपने लिए जीना सीखिए। जंगल में हिरन से लेकर भेड़िए तक झुंड बना लेते हैं, लेकिन इंसान क्यों अकेला रहना चाहता है। गरीबी से ज्यादा अकेलापन तो अमीरी देती है। क्यों जवानी के दोस्त बढ़ती उम्र के साथ छूटते जाते हैं। नाते रिश्तेदार सिमटते जाते हैं..। करोड़ों के फ्लैट की मालकिन आशा साहनी के साथ उनकी ननद, भौजाई, जेठ, जेठानी के बच्चे पढ़ सकते थे..? क्यों खुद को अपने बेटे तक सीमित कर लिया। सही उम्र में क्यों नहीं सोचा कि बेटा अगर नालायक निकल गया तो कैसे जिएंगी। जब दम रहेगा, दौलत रहेगी, तब सामाजिक सरोकार टूटे रहेंगे, ऐसे में उम्र थकने पर तो अकेलापन ही हासिल होगा।

इस दुनिया का सबसे बड़ा भय है अकेलापन। व्हाट्सएप, फेसबुक के सहारे जिंदगी नहीं कटने वाली। जीना है तो घर से निकलना होगा, रिश्ते बनाने होंगे। दोस्ती गांठनी होगी। पड़ोसियों से बातचीत करनी होगी। आज के फ्लैट कल्चर वाले महानगरीय जीवन में सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि खुदा न खासता आपकी मौत हो गई तो क्या कंधा देने वाले चार लोगों का इंतजाम आपने कर रखा है..? जिन पड़ोसियों के लिए नो एंट्री का बोर्ड लगा रखा था, जिन्हें कभी आपने घर नहीं बुलाया, वो भला आपको घाट तक पहुंचाने क्यों जाएंगे..?

याद कीजिए दो फिल्मों को। एक अवतार, दूसरी बागबां। अवतार फिल्म में नायक अवतार (राजेश खन्ना) बेटों से बेदखल होकर अगर जिंदगी में दोबारा उठ खड़ा हुआ तो उसके पीछे दो वजहें थीं। एक तो अवतार के दोस्त थे, दूसरे एक वफादार नौकर, जिसे अवतार ने अपने बेटों की तरह पाला था। वक्त पड़ने पर यही लोग काम आए। बागबां के राज मल्होत्रा (अमिताभ बच्चन) बेटों से बेइज्जत हुए, लेकिन दूसरी पारी में बेटों से बड़ी कामयाबी कैसे हासिल की, क्योंकि उन्होंने एक अनाथ बच्चे (सलमान खान) को अपने बेटे की तरह पाला था, उन्हें मोटा भाई कहने वाला दोस्त (परेश रावल) था, नए दौर में नई पीढ़ी से जुड़े रहने की कूव्वत थी।  

विजयपत सिंघानिया के मरने के बाद सब कुछ तो वैसे भी गौतम सिंघानिया का ही होने वाला था, तो फिर क्यों जीते जी सब कुछ बेटे को सौंप दिया..? क्यों संतान की मुहब्बत में ये भूल गए कि इंसान की फितरत किसी भी वक्त बदल सकती है। जो गलती विजयपत सिंघानिया ने की, आशा साहनी ने की, वो आप मत कीजिए। रिश्तों और दोस्ती की बागबानी को सींचते रहिए, ये जिंदगी आपकी है, बच्चों की बजाय पहले खुद के लिए जिंदा रहिए। आप जिंदा रहेंगे, बच्चे जिंदा रहेंगे। अपेक्षा किसी से भी मत कीजिए, क्योंकि अपेक्षाएं ही दुख का कारण हैं।

उसकी शादी गांव की एक सीधी-साधी लड़की से करवा दी। लड़की का नाम कुमुद है।

 मेरे बेटे की शादी मैंने मुश्किल से करवाई। वह एक लड़की से प्यार करता था, लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि उसकी शादी उसी से हो।


मैंने उसे बहुत समझाया और उसकी शादी गांव की एक सीधी-साधी लड़की से करवा दी। लड़की का नाम कुमुद है।


मुझे पता था कि यह लड़की मेरे बेटे और इस घर के लिए बहुत अच्छी है, इसलिए मैंने उस लड़की की शादी मेरे बेटे से करवा दी।


कुमुद हमारे घर में आई। लड़की घरेलू थी, बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करती थी और घर का काम भी करती थी। अभी 10 ही महीने हुए थे शादी को, लेकिन मुझे लगने लगा कि मैंने अपने बेटे की शादी इस लड़की से करवा कर अच्छा किया। मेरा बेटा अरविंद भी खुश लग रहा था।


लेकिन उस रात के बाद मेरी यह सोच बदल गई। एक रात करीब 2 बजे मेरे बेटे के कमरे से चीखने की आवाज आने लगी।


ये चीखें मेरी बहू की थीं। मैंने थोड़ी देर तक सुना फिर वह चीखना बंद हो गया। अरविंद के पिता, मेरे पति, को यह सब सुनाई दिया था लेकिन फिर हमने उन्हें रात में पूछना उचित नहीं समझा। इसलिए दरवाजा नहीं खटखटाया। सुबह मेरी बेटी भी बोल रही थी कि मम्मी, रात को कौन चीख रहा था?


मैंने उसकी बात काट दी, कहा कि कोई नहीं, शायद कोई बाहर से चीख रहा था। मेरी बहू का स्वभाव उस दिन से बदल गया। वह चुप थी सारा दिन।


मैंने सोचा शायद पति-पत्नी के बीच की कोई बात होगी, इसलिए मैंने कुछ पूछा नहीं। अगली रात फिर 2 बजे वही हुआ, मेरे बेटे के कमरे से फिर चीखने और रोने की आवाज आने लगी। इस रात वह आवाज करीब 10 मिनट तक चली। मेरी बेटी उठ गई और उसने हमारे कमरे का दरवाजा बजाया।


मैंने दरवाजा खोला। देखा तो वह बहुत डरी हुई थी। बोली, मम्मी, यह क्या है? भाभी रोज रात को रोती और चीखती क्यों है? क्या होता है?


कमरे के अंदर चलो, अभी दरवाजा खुलवाते हैं। मैं दरवाजे के पास जाने लगी तो मेरे पति ने मुझे रोक लिया, कहा कि रुको, अभी बात मत करो, कल सुबह दोनों से बात करते हैं।


उस रात को मेरा सोना मुश्किल हो गया था। सुबह मेरी बहू जल्दी उठकर घर के काम में लग गई। मैंने सुबह अपने बेटे के कमरे में जाकर पूछा कि क्या बात है, रात को बहू रोती क्यों है? उसका चेहरा पूरा उतर चुका था। उसने कहा कुछ नहीं। उसकी बातों और आंखों से साफ दिखाई दे रहा था कि वह कुछ छिपा रहा है। उन्होंने भी उससे पूछा लेकिन वह कुछ नहीं बोल कर घर से बाहर चला गया। मैंने अपनी बहू से पूछा। वह कुछ काम कर रही थी।


उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे रात में ठीक से सोई नहीं है। आंखें साफ बता रही थीं। मैंने उसे पूछा, क्या हुआ, तुम रात को रो क्यों रही थी?


वह बोली, रो रही थी कब? नहीं, मैं तो सो रही थी और मुझे तो कोई आवाज नहीं आई। आप क्या बात कर रही हैं? उस कमरे में ऐसा क्या हो रहा था, यह बात या तो मेरी बहू जानती थी या बेटा, लेकिन दोनों ही कुछ नहीं बता रहे थे। लेकिन दोनों के चेहरे से साफ पता चल रहा था कि कुछ है जो ये दोनों छिपा रहे हैं। लेकिन क्या?


अब जब भी रात आती, मुझे नींद ही नहीं आती। क्यों कि आधी रात को फिर वही होता। बहू ज़ोर से चीखती और रोती।


मेरे मन में कई सवाल थे, क्या होता है उस कमरे में? फिर एक रात करीब 2 बजे मेरे घर में वो हुआ जो मैंने सोचा भी नहीं था।


मेरी बहू रात को कमरे से बाहर आ गई। उसके कपड़े कहीं भी जा रहे थे, उसे कुछ होश ही नहीं था। बाल खुले थे और वह घर के चौक में आकर बैठ गई। ज़ोर से चीखने और रोने लगी। हम सभी घर वाले बाहर आ गए। मेरा बेटा भी कमरे से डरा हुआ बाहर आया। बहू की ऐसी हालत देखकर हम सब ही डर गए थे।


मैंने अपने बेटे से पूछा, यह क्या है? वह बोला, बस माँ, देख लो, यह रोज रात 2 बजे ऐसी ही करती है। मैं आप लोगों को क्या बताता?


सुबह जब उसे पूछता हूं तो उसे कुछ याद ही नहीं रहता है। बोलती है मैंने तो कुछ नहीं किया। बहू जब थोड़ी देर बाद शांत हुई तो मेरे बेटे ने उसे कमरे में ले जाकर सुला दिया।


मैं सोच रही थी, यह क्या है? मैंने अपने बेटे को कहा, तू उसे उसके घर छोड़ आ सुबह। मैं उसकी माँ से बात करूंगी।


सुबह होते ही मेरे बेटे ने उसे कुछ बहाना करके उसके घर छोड़ दिया। मैंने उसकी माँ से बात की। उसकी माँ ने कहा, यह क्या बोल रही हैं? मेरी बेटी बिल्कुल ऐसा नहीं करती है। मैंने जो सोचकर अरविंद की शादी उससे की थी, वैसा हो नहीं सका। बहू को छोड़े अब 20 दिन हो चुके थे।


इस दौरान उसके घर से फोन आता रहा लेकिन मैंने टाल दिया। मेरा बेटा भी कह रहा था कि मेरे वह दिन कैसे निकले हैं, मैं ही जानता हूं।


मैंने उस पर फिर ज्यादा दबाव नहीं डाला। पर मैं अपने आप को कोस रही थी कि मैंने अपने बेटे की शादी उस लड़की से क्यों करवाई। अब मेरे घर में कोई नहीं चाहता था कि वह वापस आए। इन्हीं सब बातों में 3 महीने निकल गए।


फिर एक दिन अचानक ही मेरी बहू अपने सामान के साथ वापस मेरे घर आ गई। वह आते ही मुझसे कहती है, माँजी, मैं जानती हूं कि आप मेरे बारे में क्या सोच रही हैं, लेकिन सच क्या है, यह आपको पता नहीं है।


उसकी बातों से मुझे लगा कि कुछ है जो वह बताना चाहती है। मेरा बेटा घर आया और उसे देखकर गुस्सा हो गया, कहा, यह यहाँ वापस आ गई। मैं अब इस घर में नहीं रह सकता, मैं जा रहा हूं। मेरी बहू ने उसी समय कहा, क्यों, सच सामने आ जाएगा, इसलिए डर रहे हैं। बताइये सबको सच क्या है। मैं उस तरह से क्यों करती थी।


बेटा बोला, क्या सच, सच यह है कि तुम पागल हो और रोज रात उस तरह से करती हो। बहू बोली, माँजी, आज अगर सबसे ज्यादा दुखी और परेशान है तो वह और कोई नहीं, मैं हूं।


मैंने अपने पति की बात मानी, उन पर विश्वास किया। मैंने कहा, तुम क्या कहना चाहती हो? फिर मेरी बहू ने जो बताया, उसे सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


वह बोली, आपके बेटे ने मुझे पहली रात से यह नाटक करने को कहा था, लेकिन मैंने नहीं माना। वह कहते थे कि हम दोनों अलग बड़े शहर में जाकर रहेंगे। उन्हें कहा कि अगर ऐसे मेरे घर वाले मुझे नहीं छोड़ेंगे, लेकिन तुम इस तरह का नाटक करोगी तो वे डर जाएंगे और फिर हम अलग रहेंगे।


पहले मैंने बोला कि यहाँ सबके साथ अच्छा है, लेकिन फिर जब वह मुझसे बात नहीं करते थे तो मुझे उनकी बात माननी पड़ी। और फिर मैंने जब सब नाटक किया तो उन्होंने मुझे घर छोड़ दिया। मुझे आप सभी की नजरों में पागल और न जाने क्या साबित कर दिया।


उसके बाद मेरा फोन भी नहीं उठाया। मैं उनका वहाँ मेरे घर इंतजार कर रही थी लेकिन वह नहीं आए। मैंने समझ लिया कि उन्होंने मुझे बेवकूफ बनाया है। मुझसे झूठ बोला है। यह मुझे अपनी ज़िंदगी से भगाना चाहते थे। मैं इस बात को समझ गई। अब मैं खुद ही इनसे दूर चली जाऊंगी लेकिन मैं चाहती थी कि सच आप सभी के सामने आ जाए।


मुझे बहू की बातों पर पूरा विश्वास हो गया था। मेरे बेटे ने कहा, तुम्हें इसे रखना है तो रखो। मेरी शादी तुमने उससे नहीं होने दी जिससे मैं चाहता था और इस गाँव की लड़की से करवा दी। मैं चाहता था कि यह भी यहाँ से चली जाए। तुम परेशान हो, सोचो कि मैंने क्या किया।


अब भी मैं इसे अपनी पत्नी नहीं मानता। मैंने अपने बेटे को कहा कि बेटा, तुझे इस घर में रहना है या नहीं, इसका फैसला तू कर ले। मेरी बहू इस घर में ही रहेगी। और जो इसे इसका हक और इज़्ज़त नहीं देगा, वह इस घर में नहीं रह सकता। तू इस तरह की साज़िश कर सकता है, वो भी सिर्फ अपनी माँ से बदला लेने के लिए। एक भोली लड़की को कुछ भी करने को कह सकता है। लेकिन बेटा, जरा सोच, तूने इसे जो करने को कहा, इसने किया अपने बारे में और किसी के बारे में कुछ नहीं सोचा। सिर्फ तेरा सोचा। सोच ऐसी पत्नी कहाँ मिलेगी। तू बहुत बड़ा अभागा है जो इस लड़की को छोड़ेगा। मैंने अपने बेटे की शादी के लिए हीरा चुना था, लेकिन शायद मेरा बेटा ही उसके लायक नहीं था। मैंने अपनी बहू को प्यार से गले लगाया। मेरा बेटा भी कहीं नहीं गया। थोड़े समय तक जरूर नाराज़ रहा। लेकिन मुझे पता था कि उस लड़की से प्यार किए बिना कैसे रह सकता था। आखिर धीरे-धीरे सब ठीक होने लगा।

हर इंसान की ज़िंदगी में किसी ना किसी से प्यार होता है एक बार, जब दिल टूट जाता है तो फिर वैसी मोहब्बत नही होती दुबारा, जिस से प्यार हो उसी से शादी हो कोई ज़रूरी नहीं, होता है लेकिन, सच्चा प्यार मिलता कहा है आजकल 

Tuesday, 24 September 2024

सुहागरात की वो घटना मेरे जीवन की एक यादगार और मजेदार घटना है

 सुहागरात की वो घटना मेरे जीवन की एक यादगार और मजेदार घटना है, जिसे याद कर आज भी हंसी आ जाती है। उस रात मैं और मेरी पत्नी रिया एक-दूसरे के साथ समय बिता रहे थे, जब अचानक हमारे पलंग पर एक अनचाहा मेहमान आ गया—एक मकड़ी। 🕷


रिया मकड़ी देखकर जोर से चीख उठी, और उसकी चीख ने मुझे हैरान कर दिया। मुझे लगा कि शायद मुझसे कोई गलती हो गई है, लेकिन जब रिया ने मकड़ी की ओर इशारा किया, तब जाकर मुझे असली वजह समझ में आई। मैं हंसते हुए मकड़ी को भगाने में जुट गया। उस वक्त मकड़ी जैसे हमारे प्यारे पल को बर्बाद करने की पूरी कोशिश कर रही थी। आखिरकार, मैंने उस मकड़ी से निजात पा ली और हमारी प्यारी रात फिर से सामान्य हो गई। 


हम दोनों काफी देर बाद सोए और अगली सुबह जब मैं उठकर बाहर आया, तो सामने भाभीजी खड़ी थीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा, "रात को कोई हॉरर फिल्म देख रहे थे?" मैं थोड़ा असहज हो गया, लेकिन फिर हंसते हुए सच्चाई बता दी कि कमरे में एक मकड़ी आ गई थी, जिसकी वजह से रिया चिल्ला उठी थी। भाभीजी ने भी हंसते हुए कहा, "अरे, मकड़ियां तो इन दिनों हर जगह हैं, ध्यान रखना कहीं काट न लें।"

उसके बाद मैंने सोचा, अगर भाभीजी ने रात की आवाजें सुनीं, तो शायद मेरे छोटे भाई-बहन ने भी सुनी होंगी, लेकिन उन्होंने इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा। हालांकि, मुझे अंदर ही अंदर यह एहसास हुआ कि उन दोनों के मन में भी कुछ न कुछ जरूर आया होगा। 

उस घटना के बाद हमने यह सुनिश्चित किया कि कमरे में कोई और अनचाहा मेहमान न हो। हम दोनों ने मिलकर पूरा कमरा छान मारा और फिर जाकर अगली रात चैन से सो पाए।

Monday, 23 September 2024

समाज की नाक ऊंची रखने के लिए मुझे अपने प्यार को खोना पड़ा।

 मैंने दीप्ति के सारे कपड़े उतार दिए,पहली बार मुझे किसी लड़की के शरीर को महक इतनी ज्यादा अच्छी लग रही थी जिसके आगे सारे सेंट फेल थे


वो इस लिए, क्यों की मुझे उससे बहुत प्रेम था दीप्ति से मेरी मुलाकात मुंगेर में हुई थी, जब मैं बंगलोर में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर काम कर रहा था। एक दिन, जब मैं स्टेशन पर उतरा, मेरी ट्रॉली का व्हील टूट गया था। जैसे-तैसे मैं उसे उठा कर ले जा रहा था, तभी एक लड़की ने मेरी हालत देख कर कहा,


"भैया, दिक्कत हो रही है तो मैं उठा दूं।"


पहले तो मैंने मना कर दिया, लेकिन फिर सोचा कि इतनी सीढ़ियां चढ़नी हैं। शरमाते हुए मैंने कहा,


"एक तरफ से पकड़ लीजिए तो सीढ़ी चढ़ जाएंगे।"


उसने मदद की और हम सीढ़ियां चढ़ गए। बाहर निकलने पर मैंने शुक्रिया कहा और उसने मुस्कुरा कर कहा, "कोई बात नहीं भैया।" उस समय मुझे एहसास हुआ कि बड़े शहर के लोग मदद करते समय खुद को छोटा नहीं समझते, जबकि हमारे शहर के लोग अजनबियों की भी सहायता के लिए हाथ बढ़ाते हैं।


कुछ दिनों बाद, एक दुकान पर मुझे दीप्ति फिर से दिखी। हमने थोड़ी बात की और मुझे पता चला कि वह मेरे घर के पास वाले मुहल्ले में रहती है। हमने नंबर साझा किए और रात में मैंने उसे फोन किया। हमारी बातचीत में, दीप्ति ने बताया कि वह एक गरीब परिवार से है और अपने परिवार को सुविधाओं के अभाव में संभाल रही है। उसकी सादगी और संघर्ष ने मुझे प्रभावित किया और मुझे उससे प्रेम हो गया।


मैं बंगलोर वापस आया और रात में दीप्ति से बात करता तो मेरे मन को शांति मिलती। मैंने उसे अपने प्रेम के बारे में बताया और उसने भी सकारात्मक उत्तर दिया। हमारी बातचीत और प्यार गहरा हो गया। मैंने दीप्ति को बंगलोर आने का न्योता दिया और उसने इसे स्वीकार कर लिया।


तकरीबन तीन महीने बाद दीप्ति बंगलोर आई और मेरे घर रुकी। पहले दिन हमने बंगलोर की कई जगहें घूमीं और रात में घर आकर सो गए। सुबह जब मैं उठा तो देखा दीप्ति एक पत्नी की तरह मेरे लिए चाय और नाश्ता बना रही थी। इसे देख कर मुझे अजीब सी खुशी हुई। हमने साथ में नाश्ता किया और अपनी जिंदगी के बारे में बातें कीं।


अगले दिन फिर से हम घूमने निकले और शाम को दीप्ति ने कहा कि वह बाहर का खाना पसंद नहीं करती और घर पर खाना खाएंगे। उसने बिहारी अंदाज में दाल-चावल और भुजिया बनाया, जो बहुत स्वादिष्ट था। उसे देखकर मेरे दिल में उसके लिए इज्जत और प्यार और बढ़ गया।


रात में जब हम सोने जा रहे थे, हमने बातें की और मैंने दीप्ति के गालों को चूम लिया। दीप्ति थोड़ा असहज थी, लेकिन उसने मना नहीं किया। हमने एक-दूसरे के साथ समय बिताया और हमारे बीच पति-पत्नी जैसा संबंध बना।


दीप्ति को वापस जाना था और हम दोनों दुखी थे। मैंने अपनी मां को दीप्ति के बारे में बताया और शादी की इच्छा व्यक्त की। मां ने उसकी फोटो देखकर कहा कि वह एक डांसर है और लोगों की शादियों में नाचकर अपना खर्चा चलाती है। यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गया क्योंकि हमने कभी इस बारे में बात नहीं की थी।


मां-पापा ने दीप्ति से शादी करने से मना कर दिया और कहा कि अगर मैंने शादी की तो मुझे परिवार से रिश्ता तोड़ना पड़ेगा। मैंने कई बार समझाया लेकिन वे समाज के डर से राजी नहीं हुए।


आज इस बात को 5 साल हो गए हैं और मुझे किसी और लड़की से प्यार नहीं हुआ। दीप्ति ने भी मेरे लिए अपना काम छोड़ दिया था और अब उसे भी काम मिलने में दिक्कत हो रही है। मैंने कई बार उसे आर्थिक सहायता देने की कोशिश की, लेकिन उसने मना कर दिया।


आज, मैं खुद को और दीप्ति को इस स्थिति का दोषी मानता हूं। समाज की नाक ऊंची रखने के लिए मुझे अपने प्यार को खोना पड़ा।


Sunday, 22 September 2024

शादी का आधार संभोग होता है ये अच्छा तो सब अच्छा

 शादी का आधार संभोग होता है ये अच्छा तो सब अच्छा 

पर मॉर्डन जमाने में एक जरूरत और है वो है स्टेबल नौकरी पैसा और अच्छी लाइफस्टाइल 

जब मैं छोटी थी, तो मेरे ख्वाब बड़े थे। मुझे हमेशा लगता था कि मेरी शादी किसी अमीर और वेल-सेटल लड़के से होगी, जिसके पास बड़ी गाड़ी, शानदार घर, और बेहतरीन लाइफस्टाइल हो। मेरे पापा, मोहनलाल, हमेशा कहते थे कि पैसे में ही जिंदगी का सारा सुख नहीं होता, लेकिन मेरे लिए पैसा ही सब कुछ था। मुझे यकीन था कि अगर पैसा हो, तो सारी खुशियां अपने आप मिल जाती हैं।


फिर एक दिन, पापा ने मेरी शादी अर्जुन से तय कर दी। अर्जुन साधारण इंसान था, न उसके पास बड़ी गाड़ी थी, न ही महंगा घर। जब पापा ने यह रिश्ता तय किया, तो मुझे बहुत बुरा लगा। मुझे लगा कि मेरी पूरी जिंदगी के सपने बर्बाद हो गए हैं, और मैं कभी खुश नहीं रह पाऊंगी। 


शादी के बाद जब मैंने अर्जुन के साथ जीवन शुरू किया, तो उसका साधारण जीवन मुझे बहुत अखरता था। हर दिन मैं यह सोचती थी कि मेरी जिंदगी कैसी हो सकती थी, अगर मेरी शादी किसी अमीर व्यक्ति से हुई होती। अर्जुन बहुत ही साधारण था, लेकिन उसने कभी मुझे किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी। उसने हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रखा और मुझे सम्मान दिया। फिर भी, मैं उसकी इन अच्छाइयों पर ध्यान नहीं दे रही थी, क्योंकि मेरा ध्यान बस उन चीज़ों पर था जो मेरे पास नहीं थीं।


कुछ महीने बीतने के बाद, मैंने अर्जुन की सादगी और ईमानदारी की गहराई को समझना शुरू किया। उसने बिना किसी भव्यता के, मेरे प्रति जो प्यार और सम्मान दिखाया, वह मेरी जिंदगी में असली खुशी लेकर आया। धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि जो चीजें मैंने अर्जुन के बारे में पहले नजरअंदाज की थीं, वे ही मेरी सच्ची खुशी की कुंजी थीं। 

आज, मैं अपने जीवन को देखती हूँ और महसूस करती हूँ कि मेरे पास वह सब कुछ है जिसकी मुझे ज़रूरत है। अर्जुन ने मेरे दिल को प्यार और सम्मान से भर दिया, और अब मुझे समझ में आता है कि असली दौलत पैसों में नहीं, बल्कि सच्चे प्यार और समझ में है। 

जब मैंने यह बात अपने पापा को बताई, तो वह मुस्कुराए और बोले, "बेटी, एक साधारण व्यक्ति दिल से प्यार और सम्मान करता है, और यही जीवन का असली सुख है।" अब मैं समझ चुकी हूँ कि असली दौलत प्यार और सम्मान में है, और मैं खुद को दुनिया की सबसे खुशकिस्मत लड़की मानती हूँ।

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...