sunilrathod

Thursday, 19 September 2024

माँ-बाप कभी अपने बच्चों पर बोझ नहीं बनते, पर बच्चे उन्हें बोझ मानने लगते हैं।

 पिताजी के अचानक घर आने पर पत्नी का चेहरा नाराजगी से भर गया।


"लगता है, बूढ़े को फिर से पैसों की जरूरत आ गई है। नहीं तो यहाँ कौन आने वाला था? खुद का पेट ठीक से भर नहीं पाते, और घरवालों का कैसे भरोगे?"


मैंने उसकी बातों को अनसुना करते हुए नजरें चुरा लीं और दूसरी ओर देखने लगा। पिताजी नल के पास खड़े होकर सफर की थकान मिटाने के लिए हाथ-मुँह धो रहे थे। इस बार हालात कुछ ज्यादा ही खराब थे। बड़े बेटे के जूते फट चुके थे, और वह हर रोज़ स्कूल जाते वक्त शिकायत करता था। पत्नी की दवाइयाँ भी पूरी नहीं खरीदी जा सकी थीं, और अब पिताजी भी आ गए थे, जिससे घर में एक अजीब सी चुप्पी छा गई थी।


खाना खत्म होने के बाद पिताजी ने मुझे अपने पास बुलाया। मन में सवाल उठने लगे कि कहीं वह किसी आर्थिक समस्या को लेकर तो नहीं आए। पिताजी ने कुर्सी पर आराम से बैठते हुए कहा, “सुनो बेटा, खेतों में काम बहुत बढ़ गया है, और मुझे रात की गाड़ी से वापस जाना है। तीन महीने हो गए, तुम्हारी कोई चिट्ठी नहीं आई। जब तुम परेशान होते हो, तब हमेशा ऐसा ही होता है।”


इसके बाद उन्होंने अपनी जेब से सौ-सौ के पचास नोट निकाले और मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले, "रख लो, काम आएंगे। धान की फसल इस बार अच्छी हुई है। घर में सब सही है। तुम बहुत कमजोर लग रहे हो, अपना ध्यान रखो और बहू का भी ख्याल रखना।”


मेरी आवाज जैसे गले में अटक गई। कुछ कहने से पहले ही पिताजी ने हंसते हुए कहा, "क्या हुआ, बड़े हो गए हो क्या?"


“नहीं तो,” मैंने धीरे से कहा और हाथ आगे बढ़ा दिया। पिताजी ने वह पैसे मेरी हथेली पर रख दिए।


कई साल पहले, पिताजी मुझे स्कूल भेजने से पहले इसी तरह मेरी हथेली पर चुपचाप पैसे रख दिया करते थे। पर उस वक्त मेरी नजरें झुकी नहीं होती थीं, जैसे आज हैं।


दोस्तों, एक बात हमेशा याद रखिए... माँ-बाप कभी अपने बच्चों पर बोझ नहीं बनते, पर बच्चे उन्हें बोझ मानने लगते हैं।

जीवन में कठिन परिस्थितियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, मेहनत, विश्वास और सही सोच से सबकुछ हासिल किया जा सकता है

 सरला एक विधवा महिला थी, और उसकी एक प्यारी बेटी कविता थी। कविता के पिता, रघुवीर, का दो साल पहले अचानक निधन हो गया था। रघुवीर ने अपनी बेटी की पढ़ाई के लिए काफी कर्ज लिया था, ताकि वह अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सके। लेकिन उनकी असामयिक मृत्यु के बाद सरला और कविता पर घर चलाने के साथ-साथ उस कर्ज को चुकाने का भारी बोझ आ गया।


सरला: "बेटी, अब क्या होगा? हम कैसे कर्जा चुकाएंगे और अपना पेट कैसे पालेंगे?"


कविता: "माँ, तुम चिंता मत करो। मैंने एमबीए किया है। मुझे किसी कंपनी में नौकरी मिल जाएगी, और फिर हम बैंक से लोन लेकर सारा कर्ज चुका देंगे।"


कविता दिन-रात नौकरी ढूंढती रही, लेकिन उसे कहीं भी नौकरी नहीं मिली। एक दिन जब वह घर लौटी, तो उसने देखा कि एक आदमी उसकी माँ से लड़ रहा था। कविता को देखते ही वह आदमी घर से बाहर चला गया।


कविता: "माँ, ये कौन था और तुमसे क्या कह रहा था?"


सरला: "बेटी, यही आदमी है, जिससे तेरे पापा ने उधार लिया था। अब ये धमकी दे रहा है कि अगर हमने पैसे नहीं चुकाए, तो यह हमारे मकान पर कब्जा कर लेगा।"


कविता: "माँ, तुम चिंता मत करो। हम अब नौकरी के भरोसे नहीं बैठ सकते। मैंने काफी कोशिश की, लेकिन नौकरी नहीं मिली। अब मैंने बिजनेस करने का सोचा है।"


सरला: "बेटी, जब खाने के लिए भी पैसे नहीं हैं, तो बिना पैसों के बिजनेस कैसे करोगी?"


कविता: "माँ, तुम बस मुझ पर भरोसा रखो। सब हो जाएगा। बस एक बार मुझे करने दो।"


अगले दिन, कविता दोपहर में एक हाथ ठेला लेकर घर आई।


सरला: "ये क्या है? इसे क्यों लाईं?"


कविता: "माँ, इसी ठेले से हम अपना बिजनेस शुरू करेंगे।"


सरला: "लेकिन, तुम करोगी क्या?"


कविता: "माँ, तुम्हें तो पता है कि मुझे कुकिंग का कितना शौक है। मैंने एमबीए भी किया है, तो बिजनेस की समझ भी है। हम दोनों मिलकर टिक्की और चाट का ठेला लगाएंगे। मैंने एक दुकान वाले से बात की है, जो पापा को अच्छे से जानता था। वह हमें एक महीने के लिए सामान उधार देगा। बाद में हम उसे पैसे चुका देंगे।"


सरला: "मैंने और तेरे पापा ने तुझे इसी दिन के लिए पढ़ाया था कि तू बाजार में ठेली लगाए? समाज में हमारी इज्जत धूल में मिल जाएगी। यह सब बंद कर और कोई छोटी-मोटी नौकरी कर ले। मैं यह नहीं करने दूंगी।"


कविता: "माँ, मेरी पढ़ाई बेकार नहीं जाएगी। उसी पढ़ाई के दम पर मैं एक बिजनेस खड़ा करूंगी और दूसरों को नौकरी दूंगी। मुझे बस एक साल यह करने दो, अगर यह नहीं चला, तो मैं नौकरी कर लूंगी।"


सरला: "नहीं, मैं तुझे यह सब नहीं करने दूंगी।"


कविता: "माँ, मुझ पर भरोसा करो। आपको पापा की कसम है।"


आखिरकार, सरला मान गई और एक शर्त रखी कि अगर एक साल बाद बिजनेस नहीं चला, तो कविता को नौकरी करनी पड़ेगी। अगले दिन से सरला और कविता ने मिलकर टिक्की बेचने का काम शुरू किया।


संघर्ष की शुरुआत:

पहले दिन बहुत कम टिक्की बिकीं, और काफी सामान खराब होकर फेंकना पड़ा। अगले दिन भी ज्यादा कमाई नहीं हुई।


सरला: "मैंने पहले ही कहा था कि यह नहीं चलेगा।"


कविता: "माँ, देखती जाओ। मैं कुछ नया करके दिखाऊंगी।"


अगले दिन कविता ने ठेले पर एक बड़ा बैनर लगवाया, जिस पर लिखा था—'एमबीए टिक्की वाली: एक टिक्की के साथ एक फ्री'।


सरला: "अरे, इससे तो बहुत नुकसान हो जाएगा।"


कविता: "नहीं माँ, यह बिजनेस का एक तरीका है। पहले हम लोगों को फ्री देंगे, जिससे वे हमारे स्वाद को पसंद करेंगे। बाद में, यह स्कीम बंद कर देंगे और तब तक लोग हमारे ग्राहक बन जाएंगे। वैसे भी, जो सामान बचता है, वह फेंक ही देते हैं।"


कुछ दिनों के भीतर, कविता की टिक्कियां मशहूर हो गईं। लोग फ्री वाली स्कीम के बाद भी उसकी टिक्कियों के दीवाने हो गए और रोज़ ठेले पर लाइन लगने लगी।


मुसीबत का सामना:

एक दिन, जब सरला और कविता टिक्कियां बना रही थीं, वही आदमी फिर से आ धमका।


आदमी: "तुम यहां मजे से दुकान चला रही हो, और मेरे पैसे देने का नाम नहीं ले रही हो?"


सरला: "आप नाराज मत होइए। हम धीरे-धीरे पैसे इकट्ठे कर रहे हैं और जल्द ही आपका कर्ज चुका देंगे। थोड़ा समय दीजिए।"


आदमी: "कल तक मेरे पैसे नहीं मिले, तो मैं ठेला फेंक दूंगा।"


तभी एक नौजवान लड़का, राहुल, वहां आया और बोला—


राहुल: "माँजी, ये आदमी आपको क्यों परेशान कर रहा है?"


आदमी: "तुझे क्या मतलब? चल भाग यहां से।"


राहुल: "माँजी, क्या बात है?"


सरला ने राहुल को सारी बात बताई।


राहुल: "देखो, कल तक पैसे तैयार रहेंगे। इसके बाद अगर तुमने इन्हें फिर से तंग किया, तो मैं तुम्हें पुलिस के हवाले करवा दूंगा।"


आदमी ने धमकी दी, "कल मेरे पैसे तैयार रखना, वरना अंजाम बुरा होगा।" कहकर वह चला गया।


सरला चिंता में डूब गई।


सरला: "बेटा, कल कहां से पैसे आएंगे?"


राहुल: "माँजी, चिंता मत करो। मैं आपके कर्ज का भुगतान करूंगा, और इसके साथ ही मैं आपके बिजनेस में भी पैसा लगाऊंगा।"


राहुल ने सारा कर्ज चुका दिया और कविता के बिजनेस में भी पैसा लगाना शुरू कर दिया। उसकी मदद से कविता ने पूरे शहर में टिक्की की छोटी-छोटी दुकानों की श्रृंखला शुरू कर दी। कुछ ही समय में उनका बिजनेस तेजी से बढ़ने लगा और उन्हें बहुत मुनाफा हुआ।


नई शुरुआत:

समय के साथ, सरला और कविता का बिजनेस बहुत सफल हो गया। राहुल की मदद से उन्होंने अपने सपने को साकार किया। एक दिन सरला ने राहुल से बात की और उसे अपनी बेटी के लिए सबसे अच्छा जीवन साथी माना।

जल्द ही, सरला ने राहुल और कविता की शादी करा दी। दोनों ने मिलकर अपने टिक्की बिजनेस को और भी ऊँचाइयों तक पहुंचाया, और वे शहर के मशहूर उद्यमी बन गए।

निष्कर्ष:

यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में कठिन परिस्थितियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, मेहनत, विश्वास और सही सोच से सबकुछ हासिल किया जा सकता है। कविता ने अपने पिता के कर्ज को चुकाने और समाज की बाधाओं के बावजूद सफलता हासिल की। उसने साबित कर दिया कि सही दृष्टिकोण से किसी भी सपने को साकार किया जा सकता है।

रिश्ता एक दोस्ती और समझदारी का प्रतीक बन गया

 रवि, 22 साल का एक होनहार और पढ़ाई में व्यस्त युवक, अपने माता-पिता के साथ एक छोटे से मोहल्ले में रहता था। उस मोहल्ले की सबसे बड़ी रौनक थी नेहा भाभी, जो अपनी खूबसूरती और सादगी से सभी का ध्यान आकर्षित करती थीं। 28 वर्षीय नेहा की शादी को तीन साल हो चुके थे, लेकिन उनके पति विनोद, जो एक बिजनेसमैन थे, अक्सर काम के सिलसिले में बाहर रहते थे। इस कारण नेहा को ज्यादातर वक्त अकेले ही गुजारना पड़ता था।


रवि का कमरा ठीक नेहा के आँगन की ओर था, और दीवार काफी छोटी होने के कारण, अक्सर वह नेहा भाभी को देखता रहता। धीरे-धीरे, नेहा के प्रति रवि के दिल में एक अलग सा आकर्षण पनपने लगा। उसकी मासूमियत और सहजता रवि को दिल से छूने लगी। 


एक दिन, रवि छत पर पढ़ाई कर रहा था, तभी उसने देखा कि नेहा भाभी आँगन में पौधों को पानी दे रही थीं। गुलाबी साड़ी में लिपटी हुई नेहा की खूबसूरती ने रवि के दिल को बेचैन कर दिया। वह इस बात को समझ रहा था कि यह केवल एकतरफा आकर्षण था, लेकिन अपने दिल की धड़कनों को रोक पाना उसके लिए मुश्किल हो गया था।


नेहा भाभी, जो सुलझी हुई और हंसमुख महिला थीं, रवि की मासूमियत से काफी प्रभावित थीं। कभी-कभी वह उसे अपने छोटे-छोटे कामों में मदद करने के लिए बुला लेतीं, और रवि इस बात से बेहद खुश हो जाता था। एक दिन नेहा ने रवि से कहा, "रवि, क्या तुम मेरे साथ बाजार चल सकते हो? मुझे कुछ सामान लेना है, और अकेले जाना ठीक नहीं लग रहा।" 


यह सुनकर रवि का दिल खुशी से झूम उठा। उसे नेहा के साथ कुछ समय बिताने का मौका जो मिल रहा था। बाजार जाते हुए, हल्की-फुल्की बातचीत के बीच, रवि ने अचानक कहा, "भाभी, आप बहुत अच्छी हैं, और मैं आपको बहुत पसंद करता हूँ।"


नेहा हैरान होकर रुक गईं। उन्होंने थोड़ी मुस्कान के साथ पूछा, "रवि, ये क्या कह रहे हो?"


रवि ने धीरे से कहा, "भाभी, मुझे पता है कि यह सही नहीं है, लेकिन मैं आपको भूल नहीं पाता। शायद यह सिर्फ एकतरफा है, लेकिन मुझे लगा कि आपको बताना चाहिए।"


नेहा ने रवि के मासूम चेहरे की ओर देखा, उसकी आँखों में सच्चाई और मासूमियत दिखाई दी। वह जानती थीं कि यह आकर्षण उम्र और परिस्थितियों के कारण था। उन्होंने समझाते हुए कहा, "रवि, तुम्हारी भावनाएँ बहुत प्यारी हैं, लेकिन यह सिर्फ एक आकर्षण है। प्यार और आकर्षण में फर्क होता है। समय के साथ ये भावनाएँ बदल जाएंगी। तुम एक अच्छे इंसान हो, और तुम्हें अपनी जिंदगी में बहुत कुछ हासिल करना है।"


रवि ने सिर झुका लिया और समझ गया कि नेहा सही कह रही थीं। वह अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने लगा। इसके बाद, रवि ने खुद को पढ़ाई में और भी ज्यादा डूबा लिया और नेहा को एक आदर्श और प्रेरणा के रूप में देखने लगा।

समय बीता, और रवि ने अपनी पढ़ाई पूरी करके एक सफल करियर बनाया। नेहा भाभी अब उसकी प्रेरणा थीं, और वह उन्हें एक मार्गदर्शक के रूप में देखने लगा, न कि किसी आकर्षण के रूप में। 

**कहानी का संदेश:** 

यह कहानी हमें सिखाती है कि उम्र के साथ हमारी भावनाएं बदलती रहती हैं। कभी-कभी हमें उन लोगों से प्यार हो जाता है जो हमारी पहुंच से बाहर होते हैं, लेकिन सही मार्गदर्शन और समझदारी से हम उन भावनाओं को सही दिशा में मोड़ सकते हैं। रवि और नेहा का रिश्ता एक दोस्ती और समझदारी का प्रतीक बन गया, जिसमें आपसी सम्मान और भावना की सही समझ थी। 😊❤️

प्यार में सादगी और सम्मान भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि भावनाएँ।

 मेरी शादी मेरी मर्जी के खिलाफ एक साधारण लड़के के साथ कर दी गई थी। उसका नाम था अमन। उसके परिवार में बस उसकी माँ, सविता जी थीं। न कोई भाई, न बहन, और न ही कोई बड़ा परिवार। घर की हालत भी कुछ खास नहीं थी। शादी में उसे ढेर सारे उपहार और पैसे मिले थे, मगर मेरा दिल कहीं और था। मैं अरमान नाम के एक लड़के से प्यार करती थी, और उसने भी मुझसे शादी करने का वादा किया था। पर किस्मत ने मुझे कहीं और ला खड़ा किया—अमन के ससुराल में।


शादी की पहली रात, अमन मेरे पास एक कप दूध लेकर आया। मेरी नज़रें उसकी सादगी और शांति पर टिकी थीं। मैंने गुस्से में उससे पूछा, "एक पत्नी की मर्जी के बिना अगर पति उसे छूता है, तो क्या उसे बलात्कार कहेंगे या फिर हक?" अमन मेरी आंखों में देखकर शांतिपूर्वक बोला, "आपको इतनी गहराई में जाने की जरूरत नहीं है। मैं सिर्फ शुभ रात्रि कहने आया हूँ," और बिना कोई बहस किए, वह कमरे से बाहर चला गया।


उस समय, मैं सोच रही थी कि कोई झगड़ा हो, ताकि मैं इस अनचाहे रिश्ते से छुटकारा पा सकूं। मगर, अमन ने मुझसे कोई सवाल नहीं पूछा, कोई दबाव नहीं डाला। दिन बीतते गए, और मैं उस घर में रहते हुए भी कभी किसी काम में हाथ नहीं लगाती थी। मेरा दिन इंटरनेट पर बीतता—अक्सर अरमान से बातें करती, या सोशल मीडिया पर समय बिताती। सविता जी, अमन की माँ, बिना किसी शिकायत के घर का सारा काम करती रहतीं। उनके चेहरे पर हमेशा एक प्यारी मुस्कान होती, मानो किसी तपस्वी की शांति हो।


अमन भी दिन-रात अपनी साधारण नौकरी में मेहनत करता रहता। वह एक छोटे से कार्यालय में काम करता था, और उसकी ईमानदारी की लोग मिसाल दिया करते थे। हमारी शादी को एक महीना बीत चुका था, लेकिन हम कभी पति-पत्नी की तरह एक साथ नहीं सोए। मैंने मन ही मन तय कर लिया था कि इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है।


एक दिन, मैंने जानबूझकर सविता जी के बनाए खाने को बुरा-भला कह दिया और खाने की थाली ज़मीन पर फेंक दी। इस बार अमन ने पहली बार मुझ पर हाथ उठाया। लेकिन उसकी आंखों में कोई क्रोध नहीं था, बल्कि एक अजीब सा दर्द था। वह चिल्लाया नहीं, बस मुझे घूरते हुए बोला, "इतनी नफरत क्यों है?" मुझे उसी बहाने की तलाश थी। मैंने पैर पटके, दरवाजा खोला, और सीधा अरमान के पास चली गई। मैंने उससे कहा, "चलो, कहीं भाग चलते हैं। अब इस जेल में नहीं रहना मुझे।"


अरमान, जो कभी मुझसे प्यार की बातें किया करता था, आज कुछ अजीब सा व्यवहार कर रहा था। वह बोला, "इस तरह हम कैसे भाग सकते हैं? मेरे पास भी कुछ नहीं है, और तुम्हारे पास भी अब कुछ नहीं बचा।" उसकी बातें सुनकर मेरा दिल टूट गया। वह मुझसे प्यार नहीं करता था, वह बस मेरे पैसों और गहनों का लालच रखता था।


वहां से लौटने के बाद, मैं सीधी अपने ससुराल आई। घर खाली था, अमन और उसकी माँ कहीं बाहर गए थे। मेरे मन में हलचल थी। मैंने अमन की अलमारी खोली, और जो मैंने देखा, वह मेरे पैरों तले जमीन खिसका देने वाला था। अलमारी में मेरी सारी चीजें—मेरे बैंक पासबुक, एटीएम कार्ड, गहने—सब वहाँ सुरक्षित रखे हुए थे। और पास में ही एक खत रखा था, जिसमें अमन ने लिखा था, "मैं जानता हूँ कि यह रिश्ता तुम्हारे लिए बोझ है। लेकिन मैंने तुम्हारी हर चीज को संभालकर रखा है, ताकि एक दिन जब तुम खुद को इस घर का हिस्सा मानोगी, तो यह सब तुम्हारा हो।"


खत में उसने यह भी लिखा था, "मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, और तुम्हारी मर्जी का हमेशा सम्मान करूंगा। मैं जबरदस्ती से नहीं, बल्कि तुम्हारे प्यार से तुम्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता हूँ।"


इस खत को पढ़ने के बाद, मेरे मन में अमन के प्रति एक नई भावना जागी। उसने कभी मुझ पर कोई हक नहीं जमाया, उसने हमेशा मेरा सम्मान किया। मुझे एहसास हुआ कि सच्चा प्यार सिर्फ अरमान जैसे दिखावे में नहीं होता, बल्कि अमन जैसे सादगी में भी हो सकता है।


अगली सुबह, मैंने पहली बार अपनी मांग में सिंदूर गाढ़ा किया और अपने पति के ऑफिस पहुँची। सबके सामने मैंने कहा, "अमन, हमें लंबी छुट्टी पर जाना है। अब से सब कुछ ठीक है।"


उस दिन मुझे समझ आया कि जो फैसले मैंने गलत समझे थे, वे मेरे लिए सबसे सही साबित हुए। मेरे माता-पिता ने मेरे लिए जो सोचा था, वही मेरे जीवन का सबसे अच्छा फैसला था। अमन ने मुझे बिना कुछ कहे, बिना कुछ जताए, सच्चे प्यार का एहसास कराया।


अब मैं अपने ससुराल को अपना घर मान चुकी थी। और अमन, जो कभी मुझे साधारण लगता था, मेरे लिए अब दुनिया का सबसे अनमोल व्यक्ति था।**


यह कहानी सिखाती है कि कभी-कभी जिंदगी में हमें जो मिलता है, वह हमारे अपने सपनों से कहीं बेहतर होता है। प्यार में सादगी और सम्मान भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि भावनाएँ।

हर पिता के भाग्य में बेटी नहीं होती*

 **हर पिता के भाग्य में बेटी नहीं होती**

राजा दशरथ जब अपने चारों बेटो की बरात लेकर जनक के द्वारा पहुंचे तो राजा जनक ने सम्मानपूर्वक बारात का स्वागत किया 

तभी दशरथ जी ने आगे बढ़कर जनक जी के चरण छु लिए 

चौंककर जनक जी ने दशरथ जी को थाम लिया और कहा महराज आप बड़े है वरपक्ष वाले हैं ये उल्टी गंगा कैसे बह रहा है 

इस पर दशरथ जी ने बड़ी सुंदर बात कही महराज आप दाता है कन्यादान कर रहे हैं मैं तो याचक हु आपके द्वारा कन्या लेने आया हूं अब आप ही बताइए दाता 

         और

याचक में कौन बड़ा है 

यह सुनकर जनक जी के नेत्रों से आंसु बह निकली भाग्यशाली हैं वो जिनके घर बेटियां हर बेटी के भाग्य में पिता होता है लेकिन हर पिता के भाग्य में बेटी नहीं होती 

     **जय श्री राम**

रसोई बनाने के कुछ नियम....!!

 कितनी बार पोस्ट कर चूका हूँ ओर करता रहूंगा शायद इसे पढ़ कर कुछ ओर लोग शाकाहारी बन जायें...!


रसोई बनाने के कुछ नियम....!!


गुस्से से अगर खाना बनाया गया है उसे सात्विक अन्न नही कहेंगे, इसलिए खाना बनाने वालों को कभी भी नाराज, परेशान स्थिति में खाना नही बनाना चाहिए।


और कभी भी माँ, बीबी, बहनों को (या जो खाना बनाते है उनको) डांटना नहीं, उनसे कभी लड़ना नहीं क्योंकि वो रसोईघर में जाके और आपके ही खाने में गुस्से वाली Vibrations मिला के.....आपको ही एक घंटे में खिलाने वाले है... ये ध्यान में रखने वाली अत्यन्त ही महत्वपूर्ण बात है।


 किसी को डांट दो, गुस्सा कर दो और बोलो जाके खाना बनाओ.....अब....?

खाना तो हाथ बना रहा है मन क्या कर रहा है अन्दर मन तो लगतार खिन्न है -......तो वो सारे प्रभाव खाने के अंदर जा रहे है..


 भोजन तीन प्रकार का होता है-

1. जो हम होटल में खाते है

2. जो घर में माँ बनाती है और 

3. जो हम मंदिर और गुरूद्वारे में खाते है

तीनो के प्रभाव अलग अलग होते हैं ।


(1) जो Hotel में खाना बनाते है उनके Vibration कैसे होते है 

आप खाओ और हम कमायें जो ज्यादा बाहर खाता है ... असल मे उनका रोज़ रोज़ बाहर खाना ही उसकी सारी कमाई खा जाता है।


(2) घर में जो माँ खाना बनाती है

वो बड़े प्यार से खाना बनाती है...

परंतु ,घर में आजकल जो Cook (नौकर) रख लिए है खाना बनाने के लिए और वो जो खाना बना रहे है वो भी.. इसी सोच से कि आप खाओ हम कमाए.... एक बच्चा अपनी माँ को बोले कि..एक रोटी और खानी है तो माँ का चेहरा ही खिल जाता है।कितनी प्यार से वो एक और रोटी बनाएगी। कि मेरे बच्चे ने रोटी तो और मांगी वो उस रोटी में बहुत ज्यादा प्यार भर देती है... अगर आप अपने खाना बनाने वाले नौकर को बोलो एक रोटी और खानी है.... तो..? वो सोचेगा ...रोज 2 रोटी खाते है, आज एक और चाहिए आज ज्यादा भूख लगी है अब मेरे लिए एक कम पडेगी या ..आटा भी ख़त्म हो गया अब और आटा गुंथना पड़ेगा एक रोटी के लिए..मुसीबत...!!!

 ऐसी रोटी नही खानी है..ऐसी रोटी खाने से..ना खाना ही भला....


(3) जो मंदिर और गुरूद्वारे में

खाना बनता है प्रसाद बनता है वो किस भावना से बनता है...वो परमात्मा को याद करके खाना बनाया जाता है, सबके पेट और आत्मतृप्ति के लिए वह भोजन पकाया जाता है तो , क्यों न हम अपने घर में परमात्मा की याद में प्रसाद बनाना शुरू कर दें. 


करना क्या है ... ?

घर, रसोई साफ़, मन शांत, रसोई में अच्छे गीत चलाये और उनको सुनते हुए खाना बनाये ।

या फिर,

 घर में जो समस्या है उसके लिए जो समाधान है उसके बारे में परमात्मा को याद करते हुए खाना बनाये.

 परमात्मा को कहे मेरे बच्चे के कल परीक्षा है, इस खाने में बहुत ताकत भर दो.! शांति भर दो.! ताकि मेरे बच्चे का मन एकदम शांत हो, ताकि उसकी सारी चिंता खत्म हो जाये. 

हे परमात्मा, मेरे पति को व्यवसाय में बहुत चिंता है और वो बहुत गुस्सा करते हैं, इस खाने में ऐसी शक्ति भरो, कि उनका मन शांत हो जाये... 

जैसा अन्न वैसा मन..

 जादू है खाने में। 

    असर है पकाने में।

शुद्ध शाकाहारी 

रोटी

आलू 

दही

सलाद❤️🙏

जिसका प्रेम बदलता रहता हैं वो तलाश में ही रहते हैं, अगर मन चित इस्थिर नही हैं तो उसकी इच्छा आकांशा बदलता रहता हैं,

 प्रेम तो सब करना चाहते हैं,पर प्रेम में कोई होना नहीं चाहते हैं। कहते हैं प्रेम कभी भी हो सकता हैं और कितने बार भी हो सकता हैं। पर आज मैं आप को कहता हूँ ,

प्रेम में सिर्फ़ आप एक बार ही हो सकते हो और यदि आप एक बार जिसके भी हो जाओगे उसके बाद आप कभी किसी के नही हो पाओगे, यही तो सास्वत प्रेम की निसानी हैं। 

यंहा सब को शिकवा शिकायत हैं कि

मेरा वाला मुझसे प्यार नहीं करता,

मुझें याद नही करता, मुझे समय नही देता, मुझें समझता नहीं, ये अपेक्षा करने से पहले ये तो जान लो कि तुम क्या करते हो,

प्रतीक्षा के बिना प्रेम और मन शांति के बिना ध्यान, या काहू की बिना कर्मकाण्ड के पूजा कभी संभव नही हुआ हैं ।

नही ना फिर बिना धैर्य और बिना प्रतीक्षा का तुम प्रेम कैसे कर पाओगे,

जिसका प्रेम बदलता रहता हैं वो तलाश में ही रहते हैं, अगर मन चित इस्थिर नही हैं तो उसकी इच्छा आकांशा बदलता रहता हैं,

प्रेम में एक भावना होता हैं आपका भावना और सामने वाले के भावना में अंतर ही प्रेम की परिधि हैं।

आप इच्छा से नही स्वेक्षा से प्रेम करिये इच्छा बदलता रहता हैं स्वेक्षा कभी नहीं बदलता और जो इच्छा से करते हैं वो भटकते हैं और जो स्वेक्षा के करते हैं वो निखड़ जाते हैं, वो इस बनावटी दुनिया से अलग हो जाते हैं।

हो सकता हैं इन बातों से आप इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते हो पर कभी चिंतन करना मालूम हो जायेगा प्रेम इतना भी जटिल नहीं हैं। बस जरूरत हैं तो स्वार्थ को तिलांजलि देने का निःस्वार्थ में प्रेम करिये फिर देखिए ज़िन्दगी कैसे हसीन हो जाता हैं।

सुनिल राठौड़ 

रिश्ते टूटते नहीं। बस रिश्ते दिल से होना चाहिए

 कोर्ट में पेपर पर आखिरी साइन होते ही वकील मुस्कुराया और बोला, “लो मैडम, अब आपका डिवोर्स हो गया है। कोर्ट ने आपको 10 लाख रुपये हर्जाने के तौ...