sunilrathod

Wednesday, 11 September 2024

सीख

 करीब एक महीने पहले की बात है, जब मैं अपने मायके गई थी। चूंकि मुझे वहां ज्यादा समय नहीं रुकना था, मैंने घर पर आरामदायक जूते पहन रखे थे। जब मायके पहुंची, तो मेरी भाभी नेहा की चप्पलें देखकर सोचा कि इन्हें पहनकर और आराम मिलेगा, इसलिए मैंने उनकी चप्पलें पहन लीं।


नेहा की चप्पलें दिखने में साधारण थीं, पर जब मैं वॉशरूम गई, तो अचानक मेरा पैर फिसल गया। गिरते-गिरते बची, और उस पल मुझे एहसास हुआ कि चप्पलों की ग्रिप कितनी जरूरी होती है। मैंने नेहा को तुरंत सलाह दी, "नेहा, ये चप्पलें बदल लो। ऐसी पहनना जिनकी ग्रिप बेहतर हो, वरना फिसलने का खतरा बना रहेगा।"


नेहा ने मेरी बात को मजाक में लेते हुए कहा, "दीदी, मैं तो इन्हीं में सारा काम करती हूँ, बाथरूम में भी। आपको शायद आदत नहीं है।" उसकी बात सुनकर मैंने ज्यादा जोर नहीं दिया, और हम बात वहीं खत्म कर दी।


कुछ दिनों बाद, मैंने नेहा से हालचाल लेने के लिए फोन किया। उसकी आवाज़ में उदासी थी। मैंने पूछा, "सब ठीक तो है?" नेहा ने जवाब दिया, "दीदी, दो दिन पहले बाथरूम में फिसल गई। कमर और पैरों में बहुत दर्द है। डॉक्टर ने दवाइयां दी हैं। शुक्र है कि हड्डी नहीं टूटी।" उसकी बात सुनकर मुझे दुख हुआ और पूछा, "अब तो तुमने चप्पलें बदल लीं?"


नेहा हल्के से हंसते हुए बोली, "हाँ दीदी, आपकी बात सुन लेनी चाहिए थी। अब मैंने नई चप्पलें ली हैं और अपनी बेटियों के लिए भी ले आई हूं।" यह सुनकर मुझे तसल्ली हुई। यह घटना एक बड़ी सीख दे गई कि हम कई बार सलाह को नजरअंदाज कर देते हैं, जब तक कि खुद पर कुछ न गुजर जाए। अगर सही समय पर सही सलाह मान ली जाए, तो हम बहुत सी मुसीबतों से बच सकते हैं।

*सीख:**  

कई बार हम दूसरों की सलाह को हल्के में लेते हैं, लेकिन समझदारी इसी में है कि सही वक्त पर सही सलाह को मानकर अमल में लाया जाए। इससे हम अनचाही परेशानियों से बच सकते हैं।

संघ क्यों चुप है ?

 *संघ क्यों चुप है ??*

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आज मैं जब सुबह सुबह घूमने निकला, तो सामने से एक परिचित हिन्दू महानुभाव भी साथ हो लिये। देश- विदेश की चर्चा एवं राजनीतिक चर्चा आजकल प्रिय विषय है ही। तो वह बन्धु चर्चा करते करते कश्मीर से कैराना व केरल से बंगाल तक मानसिक व वाचालिक भ्रमण करने लगे।मैं चुप हो उनकी सुन रहा था। तभी अचानक बोले "वहां इन स्थानों पर हिन्दू परेशान है। आखिर संघ क्यों चुप है - इस मामले में आखिर संघ कर क्या रहा है?"


अब तो मुझे जवाब देना ही पड़ा। मैने कहा "संघ क्या है?" 

बोले "हिन्दुओं का संगठन।" 


मैं बोला "तो आप हिन्दू हैं?" 

वह बोले "कैसा प्रश्न है यह आपका? मैं कट्टर सनातन हिन्दू हूं।" 


तब मैने कहा तो क्या आप जुडे हैं संघ से?" 

वह बोले.. "नहीं तो" 


तब मैने पूछा "आपका बेटा, पोता, नाती या परिवारजन कोई रिश्तेदार जुड़ा है क्या?"  

तब बोले "नहीं कोई नहीं। बेटा नौकरी पर है, फुर्सत नहीं मिलती उसे। पोता नाती विदेश में सैटल हो चुके हैं। रिश्तेदार बडे व्यवसायी हैं। उसी में व्यस्त हैं व शेष घर पर ही रहते हैं और बच्चों को तो कोचिंग से फुर्सत नहीं मिलती।" 


मैने कहा - इसका मतलब यह हुआ कि संघ आपके व आपके परिवार व रिश्तेदारों को छोडकर शेष अन्य हिन्दुओं का संगठन है?

वह चिढकर बोले "आज क्या हुआ है आपको? कैसी बात कर रहे हो आप? अरे भाई ऐसी स्थिति मेरी अकेले की थोड़े है। देश में 90% लोग ऐसे हैं जिनको अपने काम से फुर्सत ही नहीं मिलती है। तो यह आप केवल मुझ पर ही क्यों इशारा कर रहे हो? काम ही तो पूजा है, काम नहीं करेंगे तो देश कैसे चलेगा?" 


मैने फिर कहा "तो मतलब आपके हिसाब से संघ से केवल 10% हिन्दू लोग ही जुड़े हैं।" 


वह बोले "जी नहीं साहब, मेरे वार्ड में रहते सारे हिन्दू ही है। कुल 10000 की जनसंख्या है वार्ड में हिन्दुओं की। पर सुबह सुबह देखता हूं बस रोज तो उसमें से भी केवल 10-15 लोग ही नजर आते हैं संघ की शाखा में। बाकी कभी उत्सव त्योहार पर ही नजर आते हैं।"


मैने पूछ लिया कि कभी जाकर मिले उनसे?  

बोले "नहीं.." 


मैंने पूछा कभी उनकी कोई मदद की?" 

बोले "नहीं"


मैं "कभी उनके उत्सवों कार्यक्रमों में भागीदारी की?" 

बोले "नहीं" 


मैं "तो फिर आप की संघ से यह सारी अपेक्षा क्यों ?


मैं भी तो खीज गया था अन्दर से आखिर बोल ही पड़ा "तो ठेका लिया है संघ ने आप जैसे हिन्दुओं का? क्या वह संघ के सारे लोग बेरोजगार हैं? उनके पास अपना काम नहीं है,या उनका अपना कोई परिवार नहीं हैं क्या? आप तो अपने व्यवसाय व परिवार की चिन्ता करें, बस। और वह अपने व्यवसाय व परिवार की भी चिन्ता करें व साथ में आप जैसे अकर्मण्य, एकांकी, आत्मकेंद्रित हिन्दुओं की भी चिन्ता करें ?


 यह केवल उनसे ही क्यों चाहते हैं आप ?


 क्योंकि वह भारतमाता की जय बोलते हैं, देश से प्यार करते हैं, वन्देमातरम कहते हैं? 


क्या यह करना गुनाह है उनका? इसलिये उन से आप यह जजिया वसूलना चाहते हैं?जो आप सभी समर्थ होकर भी नहीं करना चाहते वह सब कुछ वह करें। वही कश्मीर, कैराना व बंगाल तथा आप जैसों की चिन्ता करें? देश व समाज की हर तरह की आपदा व संकटों में वही अपना श्रम या धन व जीवन तक बलिदान करें? उनको क्यों आपकी तरह मूक या तटस्थ बने रहने का हक नहीं है ? क्यों वही अपना घर परिवार सब छोडकर केवल आप जैसों के लिये ही जियें ?

कभी सोचा है कि जब वह आप से चाहते हैं कि आप उनको बल दो, साथ दो, समर्थन दो, उन्हें ऐसे 10% पर ही अकेला मत छोड़ो। 

तब आप उनको निठल्ला, फालतू व पागल समझ कर उनकी उपेक्षा करते हो-और इतना ही नहीं उन्हैं साम्प्रदायिक कह कर गाली देते हो। अपने को सेक्यूलर मानकर अपनी शेखी बघारते हो।केवल अपने घर-परिवार, व्यवसाय को प्राथमिकता देते हो तथा अपने बच्चों का भविष्य बनाने में ही जुटे रहते हो।

अगर वह हिन्दू संगठन वाले हैं, तो आप जैसे भी तो सारे हिन्दू ही हैं। तो जो कर्तव्य उनका बनता है वह आपका क्यों नहीं बनता ? बस जरा यह तो स्पष्ट करें। कि क्या वही हिन्दू हैं आप हिन्दू नहीं है?

स्मरण करो, भगतसिंह को फांसी केवल इसलिये हुई थी एव॔ आजाद को भी इसीलिये अकेले लड़कर मौत को गले लगाना पडा था क्योंकि अगर यह आप जैसे शेष 90% हिन्दू हमें क्या करना कहकर सोये हुये ना होते, यह आप जैसे 90% हिन्दू आत्मकेन्द्रित हो हमें क्या फर्क पड़ता है कहकर ना जी रहे होते। उनके समर्थन में खुलकर आये होते तो उनको फांसी देने या मार सकने जितनी हिम्मत या औकात तब भी अग्रेजों में नहीं थी। अगर तब यह 90 % हिन्दू आपकी तरह तमाशा ना देखते, कभी इक्ठ्ठे होकर केवल एक बार अयोध्या पहुंच कर जय श्रीराम का नारा लगा देते तो मंदिर कब का बन गया होता।

अगर हिंदूओ मे जरा सी भी शर्म होती तो मात्र कुछ करोड़ गद्दार वंदेमातरम,भारत माता की जय का विरोध करने की हिम्मत नही कर पाते।

आज टहलते समय संघ स्थान पर हुयी वार्तालाप के. आधार पर मन के विचार -

*कभी मैं खुद भी रोज शाखा में जाता था आज न तो मेरा बेटा ना मैं दोनों ही नही जाते न किसी प्रोग्राम में support करते हाँ उम्मीद जरूर करते हैं कि देश बदलेगा but बदलेगा कौन ये बड़ा सवाल है इसलिए मैंने आज से ये सोच लिया है की मैं भी अपनी तरफ से संघ को पूरा support करूंगा साथ ही खुद भी उनके program में सम्मिलित भी होऊँगा आप भी हो सके तो थोड़ा समय निकाल कर प्रयास जरूर कीजियेगा* 😊🙏। 

Monday, 9 September 2024

काश मे भी उस दिन तेरे साथ स्कूल छोड़ कर भाग आया होता

 एक स्कूल के प्रिंसिपल एक बड़ी मीट की दुकान में घुसे और काउंटर पर बैठे लड़के से कहा कि मुझे दो किलो मीट दे दो।

वहां लड़के ने कहा हां सर आप बैठिए और एक कप चाय भी दी और अपने कर्मचारियों से दो किलो अच्छा मीट बनाने को कहा.

गोश्त को बैग में डालने के बाद कर्मचारियों ने खुद जाकर गाड़ी में रख दिया.

जब प्रिंसिपल ने पैसे देने चाहे तो लड़के ने बड़ी अज़ीज़ि से मना कर दिया और कहा कि आप तो हमारे टीचर हैं सर 

जब प्रिंसिपल ने पूछा बेटा तुमने मेरी इतनी खिदमत की और मीट के पैसे भी नहीं लिए, क्या तुम मुझे जानते हो? 

तो इस लड़के ने कहा आप मेरे टीचर हैं. 


क्या आपको याद है 10-12 साल पहले जब मे आपके स्कूल मे पड़ता था जब मैंने क्लास मे एक में गलती की थी, आपने कहा था कि जब तक आप अपने वालिद को अपने साथ नहीं लाओगे तब तक आप क्लास में प्रवेश नहीं कर सकते, इसलिए मैं स्कूल से भाग गया था और एक कसाई के यहाँ काम पे लग गया 


उसके बाद मेने काम सीख कर तरक़्क़ी करता गया और आज मेरे पास शहर मे 4 दुकानें, 2 घर, 1 फार्म हाउस और 3 लगज़री गाड़िया हैं 

अगर आप मुझे उस दिन स्कूल से न भगाते तो मे भी आज कही 15-20 हजार की नौकरी कर रहा होता या रेजयुम हाथ मे लेकर ऑफिस ऑफिस घूम रहा होता 


इतना सुनकर प्रिंसिपल साहब ज़ारो क़तार रोने लगे और बोले की काश मे भी उस दिन तेरे साथ स्कूल छोड़ कर भाग आया होता

लेखक सुनिल राठौड़ 


Sunday, 8 September 2024

ये सब बिटिया की ज़िंदगी में बहुत काम आएगा

 जवान होती लड़की पर सभी की नजर होती है। परिवार के जितने भी रिश्तेदार थे, वे अक्सर पापा से कहते थे, "बिटिया बड़ी हो रही है, शादी के लिए लड़का देखना शुरू करो।" कभी दादी कहती थीं, "बिटिया बड़ी हो रही है, अब अच्छा लड़का देखना चाहिए।" पिताजी हां तो कर देते, पर ध्यान नहीं देते थे। 🤔


धीरे-धीरे मैंने इंटर पास कर लिया और ग्रेजुएशन शुरू कर दिया। अब मैं बाहर शहर में रहने लगी। घर में रिश्तेदारों की वही बातचीत चलती रहती थी, "बिटिया बड़ी हो गई है, क्यों नहीं देख रहे हो लड़का?" 🏠


समय गुजरता गया और पापा और भैया बस सुनते रहे, पर कोई कदम नहीं उठाया। धीरे-धीरे ग्रेजुएशन फाइनल ईयर आ गया और मैं 20 साल की हो गई थी। 🎓 मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन मैंने अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहा। इसलिए मैंने ऑप्टोमेट्री में एडमिशन ले लिया और कंप्यूटर भी सीखने लगी। 💻📚


कुछ महीनों बाद, एक दिन मैंने पापा को मेरे लिए लड़के के बारे में बात करते हुए सुना। तब मैंने उनसे पूछा, "अब आप लड़का क्यों पूछ रहे हैं? जब पहले इतने रिश्ते आए थे, तब आपने किसी को नहीं देखा। अब आप क्यों पूछ रहे हो, ये समझ में नहीं आ रहा।" 😕 


पापा ने जो जवाब दिया, वह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था। उन्होंने कहा, "तब तुम इंटर कर रही थी, तुम इतनी मजबूत नहीं थी। अगर तुम्हें उस समय किसी मुश्किल का सामना करना पड़ता, तो शायद तुम सही फैसला नहीं ले पातीं। मैंने तुम्हें ग्रेजुएशन तक इसीलिए रोका, ताकि तुम और मजबूत हो सको। अब जब तुम ऑप्टोमेट्री कर रही हो, तो मुझे यकीन है कि मेरी बेटी अपने पैरों पर खड़ी हो सकेगी, अगर उसे जीवन में कभी आर्थिक मजबूती की जरूरत पड़ी।" 🥺❤️


उन्होंने आगे कहा, "मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटी सिर्फ रिश्ते में बंधे नहीं, बल्कि रिश्ते को प्यार से संजोए। और अगर जीवन में कभी अकेली पड़ जाए, तो वह स्वाभिमान से अपना जीवन जी सके।" 🌸


पापा की ये बातें उस वक्त तो मुझे पूरी तरह समझ में नहीं आई थीं, पर आज जब मैं सोचती हूँ, तो उनकी बातों का गहरा मतलब समझ आता है। सच में, बेटियों की महंगी शादी भले न करो, पर उन्हें काबिलियत ज़रूर दो। 💪


कभी उनकी पढ़ाई ससुराल वालों के भरोसे मत छोड़ना, खुद पढ़ाना और फिर ही शादी करना। नौकरी करना जरूरी नहीं है, पर उन्हें इतना काबिल बनाना कि वे बुरे वक्त में अपने हुनर का उपयोग कर सकें और किसी के सामने हाथ फैलाने की मजबूरी न हो। 🙏


बहुत सी बेटियां आज भी ना चाहते हुए अपने भविष्य को लेकर बुरे ससुराल में इसलिए अटकी रहती हैं क्योंकि वे आगे क्या करेंगी, ये नहीं जानतीं। या पति के ना होने पर लाचार हो जाती हैं और अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में संघर्ष करती हैं। 😔


बेटियों को शादी के लिए नहीं, बल्कि उन्हें मजबूत बनाने के लिए शिक्षा और हुनर जरूर सिखाएं। हां, सही समय पर शादी करना जरूरी है, पर उससे पहले बेटी को इतना सक्षम बनाएं कि वह किसी भी मुश्किल घड़ी में खुद को संभाल सके। 🌟💖


बेटियों को कोई हुनर ज़रूर सिखाएं ताकि जीवन में अगर कोई मुश्किल आए तो वे डटकर सामना कर सकें, किसी पर निर्भर न रहें। सभी माता-पिता धनवान नहीं होते, इसलिए संस्कार, इज्जत और घर के कामकाज के साथ-साथ हुनर भी सिखाएं। ✨


ये सब बिटिया की ज़िंदगी में बहुत काम आएगा। दोस्तों, पोस्ट अच्छी लगी हो तो लाइक, फॉलो, कमेंट और शेयर ज़रूर करें। 🙏🙏

"मैं, साक्षी। दरवाजा खोलो

 "कौन है?" दरवाजे पर कई बार दस्तक देने के बाद अंदर से धीमी सी आवाज आई, पर दरवाजा अब भी नहीं खुला था। खिड़की से हल्का सा पर्दा हिला, जैसे किसी ने झाँका हो।


"मैं, साक्षी। दरवाजा खोलो," साक्षी बोली, "कब से दरवाजा खटखटा रही हूँ।"


"सॉरी," श्रुति ने नींद से जागकर उबासी लेते हुए कहा, "तू कहीं और कमरा ढूंढ ले।"


"कमरा ढूंढ लूं?" साक्षी ने हैरानी से श्रुति की ओर देखा, "कमरा तुझे ढूंढना है, मुझे क्यों?"


"अब मुझे नहीं, तुझे कमरा तलाशना है," श्रुति ने ठंडे स्वर में कहा।


"क्यों?" साक्षी ने चौंकते हुए पूछा।


"क्योंकि मैंने और आदित्य ने शादी कर ली है," श्रुति ने अपनी उंगलियों से सिंदूर को हल्के से छूते हुए कहा।


"क्या?" साक्षी का चेहरा हतप्रभ हो गया। उसने श्रुति के माथे की बिंदी और मांग में भरा सिंदूर देखा। ये सब उसके नए जीवन की पुष्टि कर रहे थे।


"अब पतिपत्नी के बीच तेरा क्या काम?" श्रुति ने हल्की मुस्कान के साथ कहा और खिड़की का पर्दा पूरी तरह से बंद कर लिया।


साक्षी दरवाजे के बाहर खड़ी-खड़ी कभी खिड़की को देखती, तो कभी दरवाजे को। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसका इतना करीबी दोस्त, जिसे वह अपना समझती थी, अब किसी और का हो चुका था। उसका मन अतीत की यादों में खोने लगा, जहाँ आदित्य और उसकी कहानी ने शुरुआत की थी।


साक्षी और आदित्य ने एक साथ दिल्ली के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की थी। दोनों ने साथ पढ़ाई की, साथ प्लेसमेंट्स के लिए तैयारी की, और आखिरकार दोनों की नौकरी मुंबई की एक बड़ी कंपनी में लग गई। मुंबई में नए जीवन की शुरुआत करते हुए उन्होंने साथ रहने का निर्णय लिया और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगे। वे एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए थे।


एक रात, जब आदित्य ने साक्षी का हाथ पकड़ते हुए उसकी ओर खींचा, तो साक्षी चौंकते हुए बोली, "क्या कर रहे हो आदित्य?"


"प्यार... तुम्हारे बिना नहीं रह सकता," आदित्य ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा।


"नहीं, अभी नहीं। हम शादीशुदा नहीं हैं," साक्षी ने थोड़ा झिझकते हुए कहा।


"क्या शादी से पहले प्यार करना गलत है?" आदित्य ने सवाल किया।


"हमारे संस्कार यही कहते हैं," साक्षी ने समझाने की कोशिश की। "हम शादी के बाद ही यह सब करेंगे।"


"शादी की ज़रूरत ही क्या है? हम दोनों साथ हैं, यही काफी नहीं है?" आदित्य ने तर्क दिया। "शादी बस एक औपचारिकता है।"


साक्षी को आदित्य पर पूरा विश्वास था, और आदित्य ने अपने प्यार का यकीन दिलाकर उसे भी इस रिश्ते में खींच लिया। साक्षी ने धीरे-धीरे खुद को आदित्य के हवाले कर दिया। शुरू में उसे थोड़ी हिचक थी, लेकिन बाद में वह भी इस रिश्ते में डूब गई। उसे आदित्य के प्यार पर पूरा भरोसा था। वह मानने लगी थी कि शादी का बंधन सिर्फ एक औपचारिकता है। वह आदित्य से कभी शादी की बात भी नहीं करती, क्योंकि उसे यकीन था कि आदित्य हमेशा उसका रहेगा।


लेकिन जब श्रुति उनकी जिंदगी में आई, तो सबकुछ बदल गया।


श्रुति हाल ही में उनकी कंपनी में जॉइन हुई थी। वह दिल्ली की थी और मुंबई में उसका कोई जान-पहचान वाला नहीं था। जब तक उसे कोई जगह नहीं मिल जाती, आदित्य और साक्षी ने उसे अपने साथ रहने का ऑफर दिया। साक्षी को तब तक अंदाजा भी नहीं था कि उसकी जिंदगी में तूफान आने वाला है।


श्रुति बेहद खूबसूरत और आत्मविश्वास से भरी हुई लड़की थी। आदित्य धीरे-धीरे उसकी तरफ आकर्षित होने लगा। श्रुति की हाजिरजवाबी और उसकी शरारतों ने आदित्य को उस पर मोहित कर दिया। आदित्य, जो साक्षी को दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की मानता था, अब श्रुति के इर्द-गिर्द मंडराने लगा।


साक्षी ने कई बार आदित्य को चेताया, लेकिन उसने उसकी बातों को अनसुना कर दिया। धीरे-धीरे साक्षी को लगने लगा कि अगर उसने आदित्य को शादी के बंधन में नहीं बाँधा, तो वह उसे खो देगी। उसने इस बारे में अपनी माँ से बात करने का निर्णय लिया और छुट्टी लेकर दिल्ली चली गई। उसने माँ से अपने और आदित्य के रिश्ते की पूरी कहानी बताई। उसकी माँ ने उसे डांटते हुए कहा, "देर मत कर, जाकर उससे शादी कर ले।"


साक्षी जल्दी-जल्दी वापस मुंबई आई, ताकि आदित्य से शादी की बात कर सके। लेकिन जब वह वापस आई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आदित्य और श्रुति ने उससे पहले ही शादी कर ली थी।


साक्षी, जिसने आदित्य पर पूरी तरह विश्वास किया था, अब ठगी सी महसूस कर रही थी। उसने अपने प्यार, अपने विश्वास और अपनी भावनाओं को पूरी तरह आदित्य के नाम कर दिया था। लेकिन इस सबके बावजूद वह उसे अपना नहीं बना सकी।


अब वह दरवाजे के बाहर खड़ी थी, और उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके जीवन का यह मोड़ उसे कहाँ लेकर जाएगा। उसने अपनी पूरी दुनिया आदित्य के नाम कर दी थी, और अब वही दुनिया उसके सामने ढह रही थी।


साक्षी के दिल में एक अजीब सी खालीपन था, लेकिन उसने खुद को कमजोर नहीं होने दिया। वह जानती थी कि अब उसे अपने जीवन की दिशा खुद तय करनी होगी।

Friday, 6 September 2024

, मुझे 10 किलो बादाम दे दी मौज करो, रोज करो, नहीं मिले तो ख़ोज करो।जिए।

 किराने की एक दुकान में एक ग्राहक आया और दुकानदार से बोला - भइया, मुझे 10 किलो बादाम दे दीजिए। 

 दुकानदार 10 किलो तौलने लगा।

 तभी एक कीमती कार उसकी दुकान के सामने रुकी और उससे उतर कर एक सूटेड बूटेड आदमी दुकान पर आया,और बोला - भाई 1 किलो बादाम तौल दीजिये।


दुकानदार ने पहले ग्राहक को 10 किलो बादाम दी,,फिर दूसरे ग्राहक को 1 किलो दी..।


जब 10 किलो वाला ग्राहक चला गया तब कार सवार ग्राहक ने कौतूहलवश दुकानदार से पूछा - ये जो ग्राहक अभी गये है यह कोई बड़े आदमी है या इनके घर में कोई कार्यक्रम है क्योंकि ये 10 किलो लेकर गए हैं।


दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा - अरे नहीं भइया, ये एक सरकारी विभाग में चपरासी हैं लेकिन पिछले साल जब से इन्होंने एक विधवा से शादी की है जिसका पति लाखों रुपये उसके लिए छोड़ गया था, तब से उसी के पैसे को खर्च कर रहे हैं.. ये महाशय 10 किलो हर माह ले जाते हैं। "


इतना सुनकर दूसरे ग्राहक ने भी 1 की बजाय 10 किलो बादाम ले ली ।


10 किलो बादाम लेकर जब घर पहुँचे तो उसकी बीवी चौंक कर बोली - ये किसी और का सामान उठा लाये क्या? 10 किलो की क्या जरूरत अपने घर में..?


भैया जी ने उत्तर दिया - पगली मेरे मरने के बाद कोई चपरासी मेरे ही पैसे से 10 किलो बादाम खाए.. तो जीते जी, मैं क्यों 1 किलो खाऊं..।"


निष्कर्ष: अपनी कमाई को बैंक में जमा करते रहने के बजाय अपने ऊपर भी खर्च करते रहना चाहिए। क्या पता आपके बाद आपकी गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग ही हो।


आनंद लीजिए जीवन के हर पल का


मौज करो, रोज करो, नहीं मिले तो ख़ोज करो।


😀😃😄😁😆😅😂🤣😀

फॉलो करने के चक्कर में अपनी अस्मिता को दांव पर लगा देती हैं

 मेरी एक दोस्त थी, जिसका नाम नेहा था। नेहा को सोशल मीडिया पर रील्स बनाने का बहुत शौक था और वह हर नए ट्रेंड को फॉलो करने में माहिर थी। एक नया ट्रेंड चल पड़ा था, जिसे #GRWM यानी "गेट रेडी विद मी" के नाम से जाना जाता था। पहले तो इसमें लड़कियां सिर्फ सज-धज कर दिखाती थीं—काजल लगाना, झुमके पहनना, बाल सेट करना—ये सब चीजें दिखाई जाती थीं।


लेकिन जैसे-जैसे ये ट्रेंड पुराना होने लगा, लोग इससे एक कदम आगे बढ़ गए। अब लड़कियां मेकअप करने से पहले अपने कपड़े पहनने की पूरी प्रक्रिया दिखाने लगीं। बाथरूम से निकलकर, सिर्फ अंडरगार्मेंट्स में वीडियो बनाना, फिर धीरे-धीरे पूरी ड्रेस पहनना... और इस तरह की वीडियो अचानक वायरल होने लगीं।


नेहा ने भी यही किया। एक दिन उसने बाथरूम से टॉवल लपेटकर बाहर निकली और अपने कमरे में कैमरा ऑन करके वीडियो बनानी शुरू कर दी। उसने ब्रा और पैंटी पहनी, फिर झुमके, काजल और अपनी कुर्ती डाली। नेहा ने इस वीडियो को पोस्ट किया और कुछ ही घंटों में उसका वीडियो वायरल हो गया। उसे लाखों व्यूज़ मिले, और वह बहुत खुश थी कि उसकी पहली ही वीडियो पर इतना अच्छा रिस्पॉन्स आया।


कुछ ही हफ्तों बाद, नेहा का एक इंटरव्यू था। जब वह इंटरव्यू देने पहुंची, तो इंटरव्यूअर ने उसे पहचान लिया। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं आपकी रील्स का बड़ा फैन हूँ। आपके वीडियो वाकई शानदार हैं!" नेहा को नौकरी तो मिल गई, लेकिन कुछ दिनों बाद उसके मैनेजर का व्यवहार बदलने लगा। वह आते-जाते उसे छूने की कोशिश करता, जिससे नेहा असहज हो जाती।


एक दिन उसने खुलकर नेहा से कहा, "तुम मुझे बहुत पसंद हो, कल मेरे फ्लैट पर आओ, साथ में लंच करेंगे और थोड़ा मज़ा भी करेंगे।" नेहा ने साफ मना कर दिया। मगर कुछ दिनों बाद वह फिर से उसे कहने लगा, "चलो, अब तो फ्लैट पर चलते हैं।" नेहा ने फिर से इंकार कर दिया। इस पर मैनेजर हंसते हुए बोला, "प्राइवेट में कपड़े उतारने में शर्म आती है, लेकिन ऑनलाइन पूरी दुनिया के सामने नंगा होना तुम्हें मंजूर है!"


धीरे-धीरे यह बात ऑफिस में फैल गई कि नेहा सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो बनाती है। उसके सामने लोग तारीफ करते, लेकिन पीठ पीछे उसे 'वैश्य' कहकर बुलाने लगे। कुछ लोग यह भी कहने लगे कि उसकी नौकरी बस एक बहाना है, असली काम तो लोगों के साथ पैसे लेकर सोना है।


इस सब से आहत होकर नेहा ने अपनी वीडियो डिलीट कर दी और नौकरी छोड़ दी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसकी वीडियो कई अन्य अकाउंट्स पर वायरल हो चुकी थी। वह जहां से वीडियो डिलीट करने की कोशिश करती, वहीं से नए अकाउंट्स पर वीडियो अपलोड हो जाती।


नेहा की इस एक रील ने उसकी जिंदगी को बर्बाद कर दिया। उसे एक सोशल मीडिया वीडियो बनाने की भारी कीमत चुकानी पड़ी—अपनी इज्जत और आत्म-सम्मान खोकर।


यह कहानी नेहा की ही नहीं, बल्कि उन कई लड़कियों की है जो सोशल मीडिया पर ट्रेंड फॉलो करने के चक्कर में अपनी अस्मिता को दांव पर लगा देती हैं। उन्हें यह समझने की जरूरत है कि जो मॉडल्स और एक्ट्रेसेस ऐसे वीडियो बनाती हैं, उन्हें इसके लिए पैसे मिलते हैं और यह उनका काम है। लेकिन आम लड़कियां, जो सिर्फ व्यूज़ पाने की चाहत में ऐसा करती हैं, अपनी इज्जत खो बैठती हैं।


इसलिए, ट्रेंड को आंख मूंदकर फॉलो करने से पहले सोचिए कि कहीं आप भी नेहा की तरह अपने सम्मान को खोने की राह पर तो नहीं हैं।

रिश्ते टूटते नहीं। बस रिश्ते दिल से होना चाहिए

 कोर्ट में पेपर पर आखिरी साइन होते ही वकील मुस्कुराया और बोला, “लो मैडम, अब आपका डिवोर्स हो गया है। कोर्ट ने आपको 10 लाख रुपये हर्जाने के तौ...