sunilrathod

Thursday, 5 September 2024

जिसमें प्यार का अंत बिछड़ने से हुआ..

 प्रिये..

बहुत वक्त हो गए तुमसे बिछड़े, पर अब न तुम याद आतीं हो न ही तुम्हारी सूरत, बस याद आती हैं तुम्हारे साथ बिताए वो पल, जिसकी यादों में मैं बेजुबान सा हो जाता हूँ..


नाम नहीं लिखूंगा तुम्हारा क्योंकि ये ना मैं जरूरी समझता हूं और न ही तुम्हें कोई नाम देने की जरूरत कभी महसूस हुई मुझे..

तुम्हारे बगैर शामें सिंदूरी रंग से सरोबार हो कर भी फीकी सी लगती हैं ,अब मुझे उतनी ही फीकी जितनी फीकी होती है तुम्हारी मुस्कुराहट मुझे दर्द में देखकर..


उतनी ही फीकी जितनी फीकी चाय नापसन्द है मुझे

उतनी फीकी जितना फीका पड़ जाता है मेरे चेहरे का रंग तुम्हें उदास देखकर..

इन दिनों ना जाने कहाँ गुम रहता हूँ बस आधी तुममे उलझा तो कुछ हिस्सा किताबो में उलझी किसी और ही दुनिया का गणित लगाता रहता हूँ..


बाल संवारने का ना अब वक्त मिलता है ना जरूरत महसूस होती है तुम्हारी आँखो में अपना दर्पण जो तलाश लिया था मैंने तबसे घर भर के आईनो से बैर बंध गया है मेरा..

तुम्हारे बगैर ये शामें बोझिल लगती हैं और सुबह की उदास शुरुआत..


हर दिन अनमने मन से क्षितिज तकता हूँ और दिनभर का हिसाब डायरी में लिख निश्चिंत होने की कोशिश करता हूँ..

पर तुम तो जानती हो ना मेरा सुकूँ किसमे हैं

मेरी उंगलियों पर रहते हैं इंतज़ार के दिन हमारी मुलाकातों की तारीखें मुझे मुँह जबानी याद हैं..


तुम्हारा ये फ़ितूर दिन पर दिन सर चढ़ता जा रहा है और तुम्हारी अनुपस्थिति से एक वैराग पलने लगा है मुझमे..

मैं बेमन ही लिखने बैठा था और इतना कुछ लिख गया मैं जब तुम्हें लिखने बैठता हूँ तो ना जाने क्यों वक्त कम पड़ जाते हैं मेरी पिछली डायरियां तुम्हारे खतों से अटी पड़ी हैं जिन्हें मैं कभी तुम्हें नहीं सौंपना चाहता..


ना जाने क्यों तुम्हारे हक़ की हर चीज़ तुमसे दूर रखता हूँ इसका जवाब तुम हो बेहतर जानती हो... खत लिखना नापसन्द है मुझे फिर आज ना जाने क्यों अचानक लिखने बैठ गया हूँ ..


यही खत्म करता हूँ तुम्हारी यादें जो बरसों से चलीं आ रहीं हैं और ये कभी-कभी भावावेश में इतना हावी हो जाता है मुझपर की मैं सम्पूर्ण ग्रन्थ लिखने लगता हूँ

तो बस यही विराम देता हूँ..


वरना ख़ामख़ा नाराज़गी का पात्र बन जाऊंगा

ये अधूरा सा खत एक पूरे इंसान के लिए 

जो दुनिया है मेरी..


पर वक्त और लोगों ने इस कदर फसाया हमें की न हम तुम्हारे हो सकें और न तुम हमारें, और हम दोनो अलग हो गए 

अब शायद बात या मुलाकात हो या न हो पर तुम्हारें साथ बिताए पल हमें, फिर से मिला जाता हैं..


तुम जहाँ भी रहो हमेशा खुश रहना

कही पढ़ा हैं ,जिसमें प्यार का अंत बिछड़ने से हुआ..❤️🥀

एक-दूसरे की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना और एक-दूसरे के बिना अधूरा महसूस करना।

 मेरी शादी के कुछ समय बाद मेरी पत्नी, नेहा, अपने मायके आगरा चली गईं। उस वक्त वह मायके में अपने परिवार के साथ कुछ दिन बिताने गई थीं, और उनके जाते ही मेरे लिए घर जैसे वीरान हो गया। एक-एक पल काटना मुश्किल होने लगा। शादी के बाद से नेहा के बिना रहना पहली बार हो रहा था, और हर कोने में उसकी कमी महसूस हो रही थी।


मेरे माता-पिता गांव में रहते थे, और मेरी नौकरी के कारण मुझे शहर में रहना पड़ता था। नेहा के जाते ही मेरा मन कहीं भी नहीं लग रहा था। हर तरफ एक सन्नाटा छा गया था, और मैं अकेलेपन में घिर गया था। काम से आकर जब भी घर आता, घर की दीवारें जैसे मुझसे बात करने लगतीं, पर नेहा के बिना वे बातें अधूरी लगतीं।


आखिरकार, एक हफ्ते का वक्त तो जैसे-तैसे गुजर गया। फिर मैंने सोचा, अब और नहीं सहा जा सकता। नेहा के बिना घर में रहना मुश्किल हो रहा था। मैंने अपने ऑफिस से अचानक छुट्टी ली और आगरा के लिए रवाना हो गया।


उस जमाने में मोबाइल फोन नहीं थे, सिर्फ चिट्ठियों का ही सहारा था। हम एक-दूसरे से चिट्ठियों के जरिए ही बात किया करते थे। मेरी चिट्ठियों में अक्सर थोड़ा-बहुत साहित्यिक रंग होता था, कभी कुछ शेरो-शायरी होती तो कभी कुछ हल्के-फुल्के मजाक। नेहा को मेरी चिट्ठियां बेहद पसंद आती थीं, और उसने आज भी उन चिट्ठियों को सहेज कर रखा है।


जब मैं अचानक बिना किसी सूचना के ससुराल पहुंचा, तो मेरी सास, शोभा आंटी, मुझे देखकर थोड़ी चौंकीं। उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आई, लेकिन वह मुस्कान जैसे थोड़ी उलाहना भरी थी। उन्होंने मेरा स्वागत किया और तुरंत ही कहा, "अरे, आप तो पंद्रह दिन बाद आने वाले थे, इतनी जल्दी कैसे आ गए?"


मैं अंदर से हंस रहा था, लेकिन उन्हें यह कैसे बताता कि मेरा तो एक-एक दिन काटना भारी पड़ रहा था। उनके इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं था, तो मैं चुप रहा। शायद उन्होंने मेरी चुप्पी को ठीक से समझा नहीं, और वह कहने लगीं, "मैं अभी सुधा को नहीं भेजने वाली। आप सात दिन बाद आइए और तब लेकर जाइए।"


नेहा वहीं बैठी हुई थी, और हमारी नजरें मिलते ही मैं समझ गया कि वह भी मेरे साथ वापस जाना चाहती थी। लेकिन अब सवाल यह था कि सासू मां को कैसे मनाया जाए। मेरी आदत है कि जब भी मुश्किल वक्त आता है, मैं जल्दी से कोई न कोई बहाना बना लेता हूँ। उस दिन भी ऐसा ही कुछ हुआ।


मैंने सासू मां से कहा, "मम्मी, खाना कौन बनाएगा? आपके बिना घर में खाना बनाना भी नहीं हो पाता। पिछले कुछ दिनों से मैं बस एक वक्त का खाना खा रहा हूँ, वो भी मुश्किल से। वैसे सात-आठ दिन और भूखे रह लूंगा, कोई बात नहीं।"


मैंने अपने चेहरे पर पूरी मासूमियत ला दी, और शायद मेरी मासूमियत काम कर गई। सासू मां के चेहरे पर चिंता उभर आई। कौन सी सास अपने दामाद को भूखा रहने देना चाहेगी? तुरंत ही उन्होंने फरमान जारी कर दिया, "ठीक है, इस बार मैं भेज रही हूँ, लेकिन अगली बार जब सुधा मायके आएगी, तो एक महीने के लिए छोड़ना होगा। समझे?"


मैंने मन ही मन सोचा, 'मरता क्या न करता!' मैंने भी सोचा, "अभी तो अपनी बात बनाओ, आगे की आगे देखी जाएगी।" हमने उनकी बात मान ली और नेहा को लेकर खुशी-खुशी घर लौट आए।


नेहा को घर लौटकर बहुत खुशी हुई। जैसे मुझे उसकी कमी महसूस हो रही थी, वैसे ही वह भी मेरे बिना रह नहीं पा रही थी। अब मुझे यह समझ में आया कि उसकी भावनाएं भी मेरी ही तरह थीं।


कुछ महीने बीते और एक बार फिर से नेहा को उसके मायके भेजने का वक्त आ गया। इस बार साले साहब सुधा को लेने आए, और उनके साथ सासू मां का फरमान भी था—नेहा को इस बार पूरे एक महीने तक मायके में रहना था। हमने भी हंसते हुए हामी भर दी। इस बार नेहा अपने साथ ढेर सारे कपड़े लेकर गई, क्योंकि उसे पता था कि लंबा रुकना पड़ेगा। तब तक हमारा बेटा आर्यन भी हो गया था, और अब नेहा के बिना घर में रहना और भी मुश्किल लगने लगा था। लेकिन "जो वादा किया, वो निभाना पड़ेगा" की तर्ज पर मैंने खुद को संभाला और एक महीने के लिए तैयार हो गया।


लेकिन मुश्किल तो तब शुरू हुई जब आठ-दस दिन बीते ही थे कि नेहा की चिट्ठी आ गई। उसमें लिखा था, "तुम्हारे बिना एक-एक दिन काटे नहीं कटता। आकर ले जाओ ना।"


बस, अब और रुकना मुमकिन नहीं था। जैसे ही चिट्ठी मिली, मैंने फौरन अपनी पैकिंग की और आगरा पहुंच गया।


इस बार जब सासू मां ने मुझे अचानक दरवाजे पर देखा, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने मुझे देखते ही कहा, "आपने तो एक महीने का वादा किया था! इतनी जल्दी कैसे आ गए?"


मैं चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा, और नेहा कमरे के कोने में बैठी मुस्कुरा रही थी। मुझे लग रहा था जैसे उसने मुझे इस स्थिति में फंसा दिया है और अब मज़े ले रही है। लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। फिर भी, जब सासू मां ने गुस्से में अपनी बातें जारी रखीं, तो मैंने धीरे से नेहा को इशारे से बुलाया और उससे कहा, "तुम्हारी मम्मी मुझ पर पिल पड़ी हैं। कुछ तो बोलो उन्हें!"


नेहा ने हंसते हुए कहा, "ये आपकी समस्या है। मम्मी को आप ही संभालो। मैं नहीं जानती, लेकिन मुझे कल हर हाल में यहां से लेकर जाना है।"


अब मेरे पास और कोई चारा नहीं था। मैंने सासू मां को दिखाने के लिए अपनी उंगली पर पट्टी बांध रखी थी, जिसमें चोट लगी होने का बहाना किया था। मैंने अपनी चोट दिखाई और कहा, "मम्मी, इस चोट की वजह से खाना नहीं बना पाता। इसलिए मुझे सुधा को लेकर जाना ही पड़ेगा।"


सासू मां को यकीन नहीं हुआ। उन्हें लगा कि यह कोई बहाना है। मैंने उन्हें पट्टी खोलकर चोट दिखाई, तो उन्होंने राहत की सांस ली। लेकिन फिर भी वह आसानी से मानने वाली नहीं थीं। उन्होंने कहा, "मैं अभी भी भेजने के मूड में नहीं हूं।"


मुझे लगा कि अब तो कुछ और सोचना पड़ेगा। आखिरकार मैंने सासू मां से कहा, "मम्मी, एक बार सुधा से भी तो पूछिए कि क्या वह रुकना चाहती है या नहीं।"


सासू मां ने नेहा की ओर देखा, और वह तुरंत कमरे से बाहर भाग गई। सासू मां चौंककर बोलीं, "सुधा, तूने तो जुल्म कर दिया!"


थोड़ी देर बाद सासू मां और नेहा दोनों ड्राइंग रूम में वापस आईं। सासू मां ने कहा, "मुझे माफ करना, मैंने आपसे पता नहीं क्या-क्या कह दिया। मुझे नहीं पता था कि सुधा का मन अब यहां नहीं लग रहा। बेटी का मन अपने ससुराल में लगना हमारे लिए खुशी की बात है। अब मैं समझ गई हूं कि आप दोनों एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते। यही प्यार तो असली रिश्ते की पहचान है।"


यह सुनकर मेरी आंखों में भी खुशी के आंसू आ गए। सासू मां ने हमें आशीर्वाद दिया और कहा, "आप दोनों की जोड़ी हमेशा बनी रहे, यही मेरी दुआ है।"


उस दिन मुझे एहसास हुआ कि प्यार और रिश्तों का असली मतलब यही है—एक-दूसरे की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना और एक-दूसरे के बिना अधूरा महसूस करना।

भाभी, आपकी गुलाबी साड़ी चाहिए

 "भाभी, आपकी गुलाबी साड़ी चाहिए, मेरी दोस्त की शादी है," मीनाक्षी ने अपने भाभी कृतिका से कहा। कृतिका ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "इसमें पूछने की क्या बात है! अलमारी खुली है, जाकर ले लो।"


मीनाक्षी ने हँसते हुए कहा, "भाभी, मेकअप भी आपको ही करना पड़ेगा।" कृतिका ने प्यार से मुस्कुराते हुए हामी भरी, "अच्छा, ठीक है।"


यह सुनते ही कृतिका के मन में अतीत की यादें ताजा हो गईं। कृतिका के भी दो बड़े भाई थे, और दोनों की शादियाँ हो चुकी थीं। लेकिन उसकी भाभियाँ कृतिका से कभी प्यार नहीं करती थीं और उसके माता-पिता के साथ भी उनका व्यवहार ठीक नहीं था। एक बार, कृतिका ने अपनी भाभी से एक बैग माँगा था, तो भाभी ने उसे अपमानित करते हुए कहा, "तुम्हारी औकात नहीं है इतने महंगे बैग की। ये मेरे मायके से मिला है।"


कृतिका को यह सुनकर बहुत बुरा लगा था, जबकि उसके घर में कोई कमी नहीं थी। उसके पापा की अच्छी नौकरी थी और भाई की तनख्वाह भी शानदार थी। लेकिन उसकी भाभियाँ उसे पसंद नहीं करती थीं क्योंकि कृतिका अपने भाइयों की लाडली थी। फिर भी, कृतिका ने कभी भी अपने भाइयों से भाभियों की शिकायत नहीं की। उसके संस्कार बहुत अच्छे थे और वह रिश्तों की अहमियत समझती थी।


समय बीता, और कृतिका की शादी एक बेहद अच्छे परिवार में हुई। उसके पति आदित्य एक सफल इंजीनियर थे, और उनका परिवार काफी संपन्न था। कृतिका की शादी धूमधाम से हुई थी, और उसके मम्मी-पापा ने हर इंतजाम शानदार तरीके से किया था।


शादी के बाद, कृतिका ने अपने ससुराल में भी प्यार और अपनापन बिखेरा। खासकर अपनी ननद मीनाक्षी के साथ उसकी बेहद गहरी दोस्ती हो गई। कभी वह मीनाक्षी के लिए बड़ी बहन बन जाती, तो कभी उसकी सहेली। सासु माँ को भी कृतिका का यह व्यवहार बहुत पसंद आया। उन्हें इस बात की संतुष्टि थी कि कृतिका की वजह से मीनाक्षी को हमेशा उसका मायका जैसा प्यार और सम्मान मिलता रहेगा।


शादी के दो महीने बाद, कृतिका का जन्मदिन आया। आदित्य ने उसे एक बेहद खूबसूरत गुलाबी साड़ी और एक डायमंड रिंग उपहार में दी। सास-ससुर ने भी उसे प्यार और आशीर्वाद के साथ कई उपहार दिए। कृतिका का जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया गया, जिसमें उसके मायके वाले भी शामिल हुए थे।


कुछ दिनों बाद, मीनाक्षी की दोस्त की शादी थी, और वह कृतिका की वही गुलाबी साड़ी पहनना चाहती थी। जब उसने कृतिका से साड़ी मांगी, तो कृतिका ने बिना किसी झिझक के कहा, "इसमें पूछने की क्या बात है, मीनाक्षी! साड़ी अलमारी में रखी है, तुम खुद निकाल लो।"


कृतिका ने मीनाक्षी को खुद साड़ी पहनाई और उसका मेकअप भी किया। मीनाक्षी बेहद खुश थी, और यह देखकर सासु माँ भी बहुत खुश हो गईं। मीनाक्षी जब तैयार होकर घर से निकलने ही वाली थी, तभी कृतिका की भाभी, सुजाता, अचानक वहाँ आ गई। वह अपने भाई की शादी का कार्ड देने आई थी। उसने मीनाक्षी को गुलाबी साड़ी में देखकर कृतिका को एक कोने में बुलाया और कहा, "यह वही साड़ी है जो तुम्हारे पति ने तुम्हें उपहार में दी थी, फिर तुमने इसे अपनी ननद को क्यों दे दी?"


कृतिका ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "भाभी, रिश्ते ऐसे ही होते हैं। प्यार चीज़ों से नहीं, लोगों से होता है। मीनाक्षी के पहनने से साड़ी घिस नहीं जाएगी, लेकिन उसका दिल खुश हो जाएगा। अगर वह खुश है, तो मैं भी खुश हूँ। हमारे घर में किसी चीज़ पर 'तेरा-मेरे' का कोई अधिकार नहीं होता। यहाँ सबको बराबर का हक है। आज बात साड़ी की है, कल अगर अपने गहने भी देने पड़ें, तो मैं वो भी खुशी-खुशी दूँगी, क्योंकि यहाँ प्यार और अपनापन सबसे महत्वपूर्ण है।"


भाभी सुजाता यह सुनकर चुप हो गईं, लेकिन यह बात वहीं नहीं रुकी। आदित्य और सासु माँ, जो दूर खड़े थे, कृतिका की बातें सुन रहे थे। दोनों के चेहरे पर गर्व की मुस्कान थी, क्योंकि उन्हें एहसास हो चुका था कि कृतिका सिर्फ एक अच्छी बहू नहीं, बल्कि एक आदर्श इंसान भी है, जिसने रिश्तों की अहमियत समझ ली थी।


कृतिका की सोच ने न सिर्फ ससुराल वालों के दिलों में अपनी जगह बनाई थी, बल्कि उसने अपने जीवन में एक उदाहरण पेश किया था कि असली रिश्ते चीज़ों से नहीं, दिलों से बनते हैं।

अगर आप मॉडलिंग या फिल्मी करियर चुनना चाहते हैं,

 आपमें से कई लोगों ने मुझे बोल्ड फिल्मों में देखा होगा, उन फिल्मों में जहाँ अंजान मर्दों के साथ शारीरिक संबंध बनाने पड़ते हैं। मैं असम के एक छोटे से शहर से हूं, जहां मूलभूत सुविधाओं की भी कमी होती है। पहले मैं केंद्रीय विद्यालय में एक अध्यापक थी, लेकिन पिता की मृत्यु के बाद मुझे वापस अपने होमटाउन आना पड़ा।

वहां पर मैंने सरकारी नौकरी के लिए प्रयास किया और परीक्षा पास कर ली। पांच साल तक मैंने सरकारी नौकरी की, लेकिन मेरा मन मॉडलिंग और एक्टिंग में करियर बनाने का था, जिसके लिए मैं निरंतर प्रयासरत थी।

यह इंडस्ट्री ऐसी है जिसमें नए लोगों को मौका जल्दी नहीं मिलता। अगर आप मौका मांगते हैं, तो बदले में कंप्रोमाइज करने को कहा जाता है या फिर आपके पास एक अच्छा सोर्स होना चाहिए। लेकिन सोर्स लगाने वाला भी अक्सर हमबिस्तर होना चाहता है।

छोटे शहर की होने की वजह से मैंने सोचा कि अगर मैं फोटोशूट करवा लूं, तो मुझे मौका मिल सकता है। मैंने बोल्ड फोटोशूट कराया और उसे कई लोगों को दिखाया, लेकिन मुझे हर जगह से रिजेक्शन ही मिलता रहा। काफी समय बाद मुझे एक फिल्म का ऑफर आया। यह फिल्म काफी बोल्ड थी और इसमें कई हॉट सीन थे।


पहले मैंने मना कर दिया, लेकिन बाद में डायरेक्टर और प्रोड्यूसर ने समझाया कि यह फिल्म केवल एक विशेष ऐप पर ही रिलीज होगी, जिसमें गिनती के सब्सक्राइबर होते हैं और वे पैसे देकर आपकी वीडियो देखते हैं।


चूंकि मैं छोटे शहर से थी, मुझे इसका अंदाजा नहीं था कि ऐप क्या होता है और यह कैसे काम करता है। काफी सोचने-समझने के बाद, मैंने प्रोजेक्ट के लिए हां बोल दिया। प्रोजेक्ट की शूटिंग मुंबई में होनी थी और मैं असम में रहती थी।


मेरी फ्लाइट टिकट कराई गई और मुझे मुंबई बुलाया गया। वहां मुझे एक फाइव स्टार होटल में रोका गया। यह सब मेरे लिए एक नया अनुभव था। पहली बार हवाई जहाज में बैठना और फाइव स्टार होटल में रुकना, ऐसा लग रहा था मानो मैं सच में एक बड़ी स्टार और सेलिब्रिटी बन गई हूं।


फिर बारी आई शूटिंग की। शूटिंग काफी बोल्ड थी, जिसमें कई न्यूड सीन भी थे। इतने सारे लोगों के सामने नग्न खड़ा होना मेरे लिए कठिन था। फिर भी मैंने सोचा कि मौका एक बार मिला है, इसे अच्छे से करना चाहिए। शूटिंग खत्म हुई और मैं वापस अपने घर आ गई और काम में व्यस्त हो गई। एक साल बाद मेरी फिल्म ऐप पर रिलीज हुई।


पर मुझे नहीं पता था कि इस इंडस्ट्री में पायरेसी नाम की भी एक चीज होती है। मेरी फिल्म अलग-अलग वेबसाइटों पर चलने लगी, टेलीग्राम और व्हाट्सएप पर शेयर होने लगी, और वायरल हो गई। मेरे जानने वाले भी इसे देखने लगे।


अब कार्यस्थल पर काम करना मेरे लिए कठिन हो गया था। लोग मुझे घूरते, सामने से ऑफर करते, मेरे घर पर आ जाते। मैंने इसे एक कलाकार के रूप में किया था, लेकिन लोग इसे वेश्यावृत्ति से तुलना करने लगे।


मजबूरन मुझे नौकरी छोड़नी पड़ी। इसके बाद मुझे दूसरी फिल्म का ऑफर मिला। नौकरी न होने की वजह से मैंने झट से हां बोल दिया और डॉक्यूमेंट्स नहीं पढ़े कि फिल्म किस बारे में है। वहां जाकर पता चला कि इस फिल्म में संभोग क्रिया शामिल है। पहले मैं डर गई और मना कर दिया, लेकिन वादा करने और साइन करने की वजह से मुझे यह फिल्म करनी पड़ी।


यह एक ऐसा दलदल था जिसमें एक बार फंस गए तो बाहर निकलना मुश्किल है। शुरुआत में दो, फिर चार और फिर 12 ऐसी बोल्ड फिल्में करने के बाद, यह मेरी कमाई का मुख्य जरिया बन गया। एक फिल्म के लिए मुझे 1 से 1.5 लाख रुपये मिलने लगे।


अब मैं इस मुकाम पर थी कि अपनी पुरानी जिंदगी में लौटना असंभव हो गया था। इस इंडस्ट्री की एक कड़वी सच्चाई यह है कि अगर आप फिल्में, सीरियल या मॉडलिंग में हैं, तो कमाई का मुख्य जरिया यही होता है।


बड़े-बड़े पॉलीटिशियन, व्यापारी, एक्टर और फिल्म निर्माता इसके सबसे बड़े ग्राहक होते हैं। एक फिल्म के लिए जहां 50 हजार से 1 लाख मिलते हैं, वहीं एक रात गुजारने के लिए 5 लाख तक मिल सकते हैं।


मेरी छोटी सी गलती की वजह से अच्छी खासी सरकारी नौकरी और सामाजिक जीवन को छोड़ना पड़ा। आज भी मेरी सोशल लाइफ है, लेकिन सिर्फ वही लोग हैं जो इस फिल्म उद्योग से जुड़े हैं, खासतौर से बोल्ड फिल्मों से।


मैं छोटी शहर की उन लड़कियों को कहना चाहूंगी कि अगर आप मॉडलिंग और एक्टिंग में करियर बनाना चाहती हैं और एक अच्छी फैमिली से आती हैं, तो संभोग या वेश्यावृत्ति आपको पसंद नहीं है, तो इस करियर को न चुनें।


हो सकता है 100 में से दो लड़कियां इस चीज का शिकार न हों, लेकिन 98 लड़कियां इस दलदल में फंस जाती हैं और फिर निकलना मुश्किल हो जाता है। हमारी जिंदगी बाहर से ग्लैमरस लगती है, लेकिन अंदर से खोखली होती है। लोग सिर्फ मतलब के लिए आपसे जुड़े रहते हैं और रिश्ते खोखले होते हैं।

अंत में मैं आप सभी से कहना चाहूंगी कि अगर आप मॉडलिंग या फिल्मी करियर चुनना चाहते हैं, तो उसकी सच्चाई से अवगत रहें। दूर से सब सुहावना लगता है, लेकिन सच्चाई हमेशा छुपाई जाती है क्योंकि यह धंधा बड़े-बड़े फिल्मी कलाकारों, पॉलीटिशियन और अंडरवर्ल्ड के लोगों द्वारा चलता है, जिसका शिकार छोटे शहर की लड़कियां और लड़के होते हैं और अंत में केवल पछतावा बचता है।


औरतों का त्रिया चरित्र

 एक प्यासा आदमी एक कुएं के पास गया,

जहां एक जवान_औरत पानी भर रही थी

उस आदमी ने औरत से थोड़ा पानी पिलाने के लिए कहा खुशी से उस औरत ने उसे पानी पिलाया। 

पानी पीने के बाद उस आदमी ने औरत से पूछा कि आप मुझे औरतों की त्रिया चरित्र के बारे में कुछ बता सकती हैं???


इतना कहने पर वह औरत जोर जोर से चिल्लाने लगी बचाओ... बचाओ...


उसकी आवाज सुनकर गांव के लोग कुएं की तरफ दौड़ने लगे तो उस आदमी ने कहा कि आप ऐसा क्यों कर रही हैं, तो उस औरत ने कहा ताकि गांव वाले आएं और आपको खूब पीटें और इतना पीटें की आपके होश ठिकाने लग जाएं। 


यह बात सुनकर उस आदमी ने कहा मुझे माफ करें, मैं तो आपको एक भली और इज्ज़तदार औरत समझ रहा था। 


तभी उस औरत ने कुएं के पास रखा मटके का सारा पानी अपने शरीर पर डाल लिया और अपने शरीर को पूरी तरह भींगा डाला। इतने देर में गांव वाले भी कुएं के पास पहुंच गए।

गांव वालों ने उस औरत से पूछा कि क्या हुआ ? 


औरत ने कहा मैं कुएं में गिर गई थी इस भले आदमी ने मुझको बचा लिया। यदि यह आदमी यहां नही रहता तो आज मेरी जान चली जाती। 

गांव वालों ने उस आदमी की बहुत तारीफ की और उसको कंधों पर उठा लिया। उसका खूब आदर सत्कार किया और उसको इनाम भी दिया।


जब गांव वाले चले गए तो औरत ने उस आदमी से कहा कि अब समझ में आया औरतों का त्रिया चरित्र???


अगर आप औरत को दुःख देंगे और उसे परेशान करेंगे तो वह आपका सब सुख- चैन छीन लेगी और अगर आप उसे खुश रखेंगे तो वह आपको मौत के मुंह से भी निकाल लेगी,,,

लिव-इन रिलेशनशिप में प्रवेश करते समय सतर्क रहना

 बिना विवाह के शारीरिक सम्बन्ध के सुख को भोगने का आसान उपाय ,लिव-इन रिलेशनशिप , आजकल कई लोगों के लिए एक आम विकल्प बन गया है। यह मुख्यतः उन लोगों के लिए होता है जो एक दूसरे के साथ समय बिताना चाहते हैं और शारीरिक संतुष्टि की आवश्यकता को पूरा करना चाहते हैं। लेकिन इसे सही रूप में समझना और अपनाना महत्वपूर्ण है, अन्यथा यह कई समस्याओं का कारण बन सकता है।


लिव-इन रिलेशनशिप में शामिल लोग एक दूसरे की शारीरिक और आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास करते हैं। हालांकि, यदि इस संबंध को सिर्फ शारीरिक भूख और आर्थिक फायदे के लिए अपनाया जाता है, तो यह असफलता की ओर बढ़ सकता है।


यदि कोई महिला 40 वर्ष के बाद इस प्रकार के संबंध में प्रवेश करती है, तो उसे विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए। इस उम्र में स्थायित्व और सुरक्षा की आवश्यकता अधिक होती है, और किसी अस्थाई संबंध में प्रवेश करना कठिनाई पैदा कर सकता है।


हमारे समाज में पारंपरिक विवाह संबंधों में भी कई चुनौतियाँ होती हैं। माता-पिता, रिश्तेदार और समाज का दबाव होता है, जिससे पति-पत्नी का साथ बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। लिव-इन रिलेशनशिप में इस प्रकार का कोई सामाजिक समर्थन नहीं होता, जिससे यह और भी अधिक जोखिम भरा हो सकता है।


बड़े शहरों में लिव-इन रिलेशनशिप का चलन बढ़ रहा है। अमीर महिलाएँ इसे अपने शौक के लिए अपनाती हैं, और कुछ मामलों में यह एक फैशन बन गया है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि यह संबंध कितने टिकाऊ और सुरक्षित हैं।


यदि कोई वृद्ध व्यक्ति किसी युवा के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में है, तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। लेकिन यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि यह संबंध वास्तविकता में प्रेम और सहारा पर आधारित हो, न कि आर्थिक लाभ पर।


लिव-इन रिलेशनशिप में प्रवेश करने से पहले दोनों पक्षों को अपनी जिम्मेदारियों और अधिकारों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। यदि आप इस प्रकार के संबंध में प्रवेश करने की सोच रहे हैं, तो इन बिंदुओं को ध्यान में रखें:


भरोसा और पारदर्शिता: दोनों पक्षों के बीच विश्वास और पारदर्शिता होनी चाहिए।

आर्थिक समझौते: आर्थिक मामलों में स्पष्टता होनी चाहिए, ताकि किसी प्रकार की धोखाधड़ी से बचा जा सके।

कानूनी सुरक्षा: कानूनी दस्तावेजों और समझौतों की जांच करवा लें, ताकि किसी प्रकार के विवाद से बचा जा सके।

इस प्रकार, लिव-इन रिलेशनशिप में प्रवेश करते समय सतर्क रहना और सभी संभावित खतरों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

_अच्छे ने अच्छा और_ _बुरे ने बुरा "जाना" मुझे,_

 *मुंशी प्रेमचंद जी की एक "सुंदर कविता", जिसके एक-एक शब्द को, बार-बार "पढ़ने" को "मन करता" है-_*


ख्वाहिश नहीं, मुझे

मशहूर होने की,"


        _आप मुझे "पहचानते" हो,_

        _बस इतना ही "काफी" है।_😇


_अच्छे ने अच्छा और_

_बुरे ने बुरा "जाना" मुझे,_


        _जिसकी जितनी "जरूरत" थी_

        _उसने उतना ही "पहचाना "मुझे!_


_जिन्दगी का "फलसफा" भी_

_कितना अजीब है,_


        _"शामें "कटती नहीं और_

  -"साल" गुजरते चले जा रहे हैं!_


_एक अजीब सी_

_'दौड़' है ये जिन्दगी,_


   -"जीत" जाओ तो कई_

 -अपने "पीछे छूट" जाते हैं और_


_हार जाओ तो,_

_अपने ही "पीछे छोड़ "जाते हैं!_😥


_बैठ जाता हूँ_

_मिट्टी पे अक्सर,_


        _मुझे अपनी_

        _"औकात" अच्छी लगती है।_


_मैंने समंदर से_

_"सीखा "है जीने का तरीका,_


        _चुपचाप से "बहना "और_

        _अपनी "मौज" में रहना।_


_ऐसा नहीं कि मुझमें_

_कोई "ऐब "नहीं है,_


        _पर सच कहता हूँ_

        _मुझमें कोई "फरेब" नहीं है।_


_जल जाते हैं मेरे "अंदाज" से_,

_मेरे "दुश्मन",_


   -एक मुद्दत से मैंने_

       _न तो "मोहब्बत बदली"_ 

      _और न ही "दोस्त बदले "हैं।_


_एक "घड़ी" खरीदकर_,

_हाथ में क्या बाँध ली,_


        _"वक्त" पीछे ही_

        _पड़ गया मेरे!_😓


_सोचा था घर बनाकर_

_बैठूँगा "सुकून" से,_


  -पर घर की जरूरतों ने_

        _"मुसाफिर" बना डाला मुझे!_


_"सुकून" की बात मत कर-

-बचपन वाला, "इतवार" अब नहीं आता!_😓😥


_जीवन की "भागदौड़" में_

_क्यूँ वक्त के साथ, "रंगत "खो जाती है ?_


  -हँसती-खेलती जिन्दगी भी_

        _आम हो जाती है!_😢


_एक सबेरा था_

_जब "हँसकर "उठते थे हम,_😊


  -और आज कई बार, बिना मुस्कुराए_

        _ही "शाम" हो जाती है!_😓


_कितने "दूर" निकल गए_

_रिश्तों को निभाते-निभाते,_😘


        _खुद को "खो" दिया हमने_

        _अपनों को "पाते-पाते"।_😥


_लोग कहते हैं_

_हम "मुस्कुराते "बहुत हैं,_😊


        _और हम थक गए_,

        _"दर्द छुपाते-छुपाते"!😥😥


_खुश हूँ और सबको_

_"खुश "रखता हूँ,_


        _ *"लापरवाह" हूँ ख़ुद के लिए_*

 *-मगर सबकी "परवाह" करता हूँ।_😇🙏*


*_मालूम है_*

*कोई मोल नहीं है "मेरा" फिर भी_*


   *कुछ "अनमोल" लोगों से_*

   *-"रिश्ते" रखता हूँ।*

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रिश्ते टूटते नहीं। बस रिश्ते दिल से होना चाहिए

 कोर्ट में पेपर पर आखिरी साइन होते ही वकील मुस्कुराया और बोला, “लो मैडम, अब आपका डिवोर्स हो गया है। कोर्ट ने आपको 10 लाख रुपये हर्जाने के तौ...