sunilrathod

Saturday, 31 August 2024

उम्मीद है कि मेरे इस अनुभव से आप सभी को कुछ सीख मिलेगी

 शादी के शुरुआती दिनों में जो सुकून और खुशी मिलती है, उसका अनुभव शायद हर नई दुल्हन ने किया होगा। खासकर ठंड के मौसम में, जब अपने पति के साथ वक्त बिताने का अलग ही मज़ा होता है। मेरी शादी नवंबर में हुई थी, और मुझे एक प्यार करने वाला, रोमांटिक पति मिला था। हमारे बीच एक खास जुड़ाव था, और वो हर पल को रोमांटिक बना देते थे। वो कहते थे कि प्यार और विश्वास में गहराई लाने के लिए यह जरूरी है, और सच कहूं तो, उनके साथ वक्त बिताना मेरी जिंदगी का सबसे हसीन अनुभव था।


जनवरी का महीना था और कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। रात के एक बजे सभी अपने-अपने कमरों में आराम कर रहे थे। हम भी अपने कमरे में बातें कर रहे थे, लेकिन ठंड के कारण हमारी बातें अचानक से किसी और दिशा में मुड़ गईं। जैसे ही कुछ खास होने वाला था, मम्मी जी ने जोर से पुकारा। मैं तुरंत बाहर गई तो उन्होंने कहा कि बर्तन ऐसे ही पड़े हैं, यह शुभ नहीं है। मन में तो यही आ रहा था कि इतना अच्छा मूड था, फालतू में मम्मी जी ने बुला लिया। लेकिन मैंने बर्तन साफ किए और वापस आई।


समय बीतने के साथ, घर की जिम्मेदारियां और काम का बोझ बढ़ने लगा। मम्मी जी मुझे हर काम में टोकने लगीं। उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि मैं काम में देरी कर रही हूँ। धीरे-धीरे, यह बातें मेरी जेठानी तक पहुंचने लगीं, और घर का माहौल तनावपूर्ण हो गया। एक दिन, जब नाश्ता और लंच तैयार नहीं हो पाया, तो मम्मी जी ने हमें डांटा। मैंने जब इस बात की शिकायत अपने पति से की, तो उन्होंने भी मुझसे ही कहा कि मुझे समय का ध्यान रखना चाहिए। इसके बाद, घर का रूटीन बिगड़ने लगा। खाना देर से बनता, और हम दोनों देवरानी-जेठानी ने काम को जल्दी निपटाने के चक्कर में हर काम आधे मन से करना शुरू कर दिया।


घर का माहौल धीरे-धीरे और बिगड़ने लगा। मेरे पति, जो पहले बहुत प्यार करते थे, अब चिढ़ने लगे थे। एक दिन, सासु माँ ने हमसे हमारे फोन मांग लिए और कहा कि अब से फोन सिर्फ दोपहर 1 बजे से रात 7 बजे तक मिलेगा। इस बात पर हमें गुस्सा आया, लेकिन फिर भी हम चुप रहे। रक्षा बंधन पर जब मैंने यह बात अपने घरवालों को बताई, तो उन्होंने भी मुझे समझाया कि सासु माँ की बातों पर ध्यान देना चाहिए।


इस घटना के बाद, मैंने और मेरी जेठानी ने देखा कि जबसे हमने फोन का इस्तेमाल कम किया, हमारे काम तेजी से निपटने लगे। शॉर्ट वीडियो और रील्स देखने की आदत ने हमें इतना व्यस्त कर दिया था कि हम घर के काम में देरी कर रहे थे, और इसका असर हमारे रिश्तों पर भी पड़ रहा था। लेकिन जब हमने यह आदत छोड़ी, तो सब कुछ सामान्य होने लगा।


अब सोचिए, यह शॉर्ट्स और रील्स कितनी खतरनाक हो सकती हैं। यह मीठा जहर हमारे समय को चुपचाप खा जाता है, और हमें पता भी नहीं चलता। अगर आपको भी लगता है कि आपका समय जल्दी खत्म हो जाता है और आप कुछ खास नहीं कर पाते, तो एक महीने के लिए रील्स देखना बंद कर दीजिए। यह छोटा सा कदम आपके जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है। उम्मीद है कि मेरे इस अनुभव से आप सभी को कुछ सीख मिलेगी, और आप भी अपने जीवन को बेहतर बना पाएंगे।

आज खाना खाकर तुमने मेरा कितना बड़ा सम्मान किया मुझे माफ कर दो

 ग्रामीण बैंक में मैनेजर की पोस्टिंग होने के बाद पहली बार राजेश किराए के नए घर में शिफ्ट हुऐ थे. पर आज ही सीढ़ियों से फिसलने के कारण प्रिया के पैरों में जबरदस्त मोच आ गयी थी. डॉक्टर ने घर पर आकर पट्टियाँ तो बाँध दी. साथ ही साथ सख्त हिदायत दे दीं कि चलना फिरना बिल्कुल मना है.

एक सप्ताह पहले आये नए घर के आस पास कोई जान पहचान के लोग भी नहीं थे. ये तो बहुत अच्छी बात रही कि पिछले कुछ दिनों में प्रिया ने किचन के साथ साथ पूरे घर को व्यवस्थित कर लिया था.

चार साल पहले राजेश और प्रिया की परिवार वालों की सहमति से अर्रेंज मैरेज हुई थी. प्रिया खुद भी पढ़ने में काफी तेज थी और पढ़ लिख कर जीवन मे कुछ बनना चाहती थी. लेकिन पापा को कैंसर का पता चला और उसी वक़्त राजेश के यहाँ से रिश्ता आया तो मजबूरी के चलते शादी करनी पड़ी.

शादी के बाद प्रिया पूरी तरह से ससुरालवालों की खुशियों के लिए खुद को न्योछावर कर दी. वो पूरी तरह से आदर्श बहू बन गयी. ससुराल में सब उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे. उसके व्यवहार ,कार्यकुशलता से सभी प्रभावित थे.

कुछ ही दिनों में उसने अपने ससुराल की काया बदल कर रख दी थी. पहले हर चीज जैसे तैसे होती थी. अब हर चीज साफ सुथरी और व्यवस्थित रहने लगी. खाना भी वो बड़े जतन से बनाती थी. हर लोग उसके बनाये लजीज खाने की खूब तारीफ करते. सिवाय उसके पति राजेश के.

राजेश को जरा भी खाने में नमक कम या ज्यादा लगता या मसाला कम होता तो वो एक कोर खाना खाकर छोड़ देता था. परसों खीर में थोड़ी चीनी कम क्या हुई? प्रिया के लाख मिन्नतों के बाद भी उसने खाने को दुबारा हाथ तक नहीं लगाया.

सबसे ज्यादा राजेश को मटर पनीर पसंद थी. कुछ दिनों पहले जब मटर पनीर बनी और मटर थोड़ी गल गयी तो भी राजेश ने खाना नहीं खाया. जबकि घर के सभी सदस्यों ने खूब मजे से खाये.

प्रिया के लाख मिन्नतें करने और मनाने के बाद भी राजेश खाना नहीं खाता था. और राजेश जब भूखा सो जाता तो प्रिया भी भूखी सो जाती थी. महीने में कई बार ऐसा होता था. अब पहली बार राजेश नौकरी के लिए घर से दूर आया था.

प्रिया को पलँग पर अच्छे से सुलाकर राजेश आज जिंदगी मे पहली बार खाना बनाने के ख्याल से घुसा. किचन में हर चीज प्रिया ने व्यवस्थित रखा था. राजेश ने एक तरफ थोड़ा सा चावल गैस चूल्हे पर चढ़ा दिया और दूसरी तरफ थोड़ी सी दाल एक पतीले में चढ़ा दी.

फिर वो थोड़े आलू प्याज लेकर भुजिया काटने लगा. काफी मेहनत के बाद बहुत ही बेतरतीब ढंग से आलू और प्याज कटे. उसे आभास होने लगा था खाना बनाने में बहुत मेहनत लगती है. दो घंटे की मेहनत के बाद उसने किसी तरह खाना बनाने में सफलता पाई.

एक थाली में भात और कटोरी में दाल और प्लेट में भुजिया लेकर वो पलँग पर प्रिया को अपने हाथों से खाना खिलाने लगा. वो कोर कोर प्रिया को खाना खिलाता जाता था और प्रिया बड़े आराम से खुशी-खुशी खाना खाती जाती थी.

खाना खत्म होने के बाद राजेश ने प्रिया से पूछा कैसा लगा खाना? प्रिया ने कहा बहुत अच्छा. मैं कितनी खुशनसीब हूँ आज जिन्दगी में पहली बार पति के हाथों बना गरमागरम खाना खाने को मिला. राजेश से सुनकर बहुत खुश हुआ. आखिर दो घंटे कड़ी मेहनत करके उसने खाना बनाया था.

खाने की तारीफ सुनकर वह फूला न समाया. उसे लगा उसकी मेहनत सफल रही. प्रिया को खाना खिलाने के बाद वो खुद खाना खाने बैठा. उसे जोरों की भूख लगी थी. दाल भात मिलाकर थोड़ी भुजिया का कोर बनाकर जैसे ही मुँह में डालकर राजेश ने चबाना शुरू किया. तेजी से वाश बेसिन की तरफ दौड़ा और मुँह का सारा खाना वाश बेसिन में उगल दिया.

चावल कच्चा पक्का था. दाल में नमक बहुत ज्यादा था. भुजिया भी कच्चा था. ऐसा घटिया खाना प्रिया ने बिना कोई शिकायत के खा लिया. सिर्फ इसलिए कि मैंने इतनी मेहनत से बनाया था. छोटी-छोटी बात पर पिछले सारे खाना न खाने वाले वक़्त की उसे याद आने लगी.

उसके दोनों आँखों से आँसू निकल पड़े. अपने बनाये जिस जिस खाने को वो एक कोर भी न खा सका. प्रिया ने बिना कुछ कहे पूरे खाने को खा लिए. राजेश प्रिया के सामने सर झुकाए हाथ जोड़े धीरे से बोला- "पिछले चार सालों में कई बार खाना न खाकर मैंने तुम्हारा जो अपमान किया. आज खाना खाकर तुमने मेरा कितना बड़ा सम्मान किया मुझे माफ कर दो.

प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, दूध गर्म कर चूड़ा के साथ आज खा लीजिए. एक दो दिनों में मैं ठीक हो जाऊँगी. फिर आपको कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.

इसके बाद कोई भी ऐसा वक़्त नहीं आया. जब प्रिया का बनाया खाना राजेश ने खुशी खुशी न खाया हो. एक बार खाना बनाने में लगी मेहनत ने राजेश को पत्नी का सम्मान करना सीख गया था।

दोपहर में पति के संभोग करने में जो सुकून है वो दुनिया के किसी और काम में नही है,

 ठंड के दिनों में दोपहर में पति के संभोग करने में जो सुकून है वो दुनिया के किसी और काम में नही है, खास तौर पर जब आप की नई नई शादी हुई है, और एक हैंडसम खूब प्यार करने वाला पति मिला हो

वो लड़कियाँ इस बात को ज्यादा समझ पाएंगी जिनकी नई-नई शादी हुई हो। नवंबर में मेरी शादी हुई थी, मुझे एक अच्छा परिवार और प्यार करने वाला पति मिला था। दोस्त की तरह एक ननद और दो जेठानियाँ मिली थीं। पतिदेव इतने रोमांटिक थे कि जब भी मौका मिले, शुरू हो जाते थे। उनका कहना था कि ऐसा करने से प्यार और विश्वास में गहराई आती है। सच कहूं तो प्यार और विश्वास का तो ज्यादा नहीं पता, पर पति रोमांटिक मिल जाए तो जिंदगी मजेदार हो जाती है।

जनवरी का महीना था और कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। तकरीबन एक बजे रात को खाना खाकर सभी अपने-अपने कमरे में आराम करने चले गए। मैं और मेरे पतिदेव भी अपने कमरे में चले गए। थोड़ी बातें हो रही थीं, लेकिन ठंडी में बातें कहाँ से कहाँ पहुंच जाती हैं, कोई नहीं जानता।

हम दोनों का भी यही हाल था। जैसे ही कुछ होने वाला था, तभी मम्मी जी ने जोर से बुलाया। तुरंत दरवाजा खोला और बाहर चली गई। मम्मी जी ने कहा, "बर्तन ऐसे ही पड़े हैं, ये शुभ नहीं है। जाओ आराम करो, आगे से ध्यान देना। मैं साफ कर देती हूँ अभी।"

मैंने कहा, "मम्मी, आप रहने दीजिए, मैं कर देती हूँ।" और मन ही मन सोचने लगी कि इतना अच्छा सीन था, फालतू मम्मी जी ने बुला लिया।

धीरे-धीरे, जैसे-जैसे पुरानी होती गई, मम्मी जी मुझे हर चीज पर टोकने लगीं। उनका सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात पर होता कि मैं काम करने में देरी कर रही हूँ, जबकि मैं हर काम अपने हिसाब से करती थी। धीरे-धीरे यह बात जेठानी जी को भी कहने लगीं।

एक दिन सभी को ऑफिस जाना था, लेकिन नाश्ता और लंच तैयार नहीं हो पाया। इस पर मां जी ने हमें डांटा। शाम को जब पतिदेव घर आए तो मैंने यह बात बताई, तो वो मेरे ऊपर ही बोलने लगे कि तुम्हें ध्यान देना चाहिए, ऑफिस का समय इधर-उधर नहीं हो सकता।

धीरे-धीरे, पता नहीं कैसे, शाम का खाना जो पहले 8 बजे तक हो जाता था, अब 11 बजे तक होने लगा था। माँ का गुस्सा हम पर फूटने लगा कि तुम लोगों ने आते ही घर का सारा रूटीन बदल दिया। 11 बजे खाने के बाद सोते-सोते 1 बज जाता, और सुबह उठने में तकलीफ होती। फिर नाश्ता बनाने में आलस आता। हम दोनों देवरानी-जेठानी इस चक्कर में पड़ गए कि जल्दी से बिना मेहनत का खाना बना दें।

इस बात का फर्स्ट्रेशन पतिदेव और बड़े भैया में भी देखने को मिलने लगा था, लेकिन गलती कहाँ हो रही थी, समझ में नहीं आ रहा था। धीरे-धीरे घर की शांति भी भंग होने लगी। जो आदमी शादी के समय इतना प्यार करता था, वो अब हर सवाल का जवाब चिढ़कर देने लगा।

फिर एक दिन हद हो गई। सासु माँ ने हम दोनों से कहा कि तुम दोनों अपना फोन मुझे दे दो। हम दोनों को गुस्सा आता है। मैं तो कुछ नहीं बोलती, पर जेठानी जी बोल देती हैं कि मम्मी घर को घर रहने दीजिए, इसे जेल मत बनाइए। उन्होंने एक ना सुनी और फोन ले लिया और कहा, "अब से फोन सिर्फ दोपहर 1 बजे से रात 7 बजे तक मिलेगा।"

हमें अपनी सास का यह रवैया काफी खराब लगा। दो दिन बाद रक्षा बंधन था। मैंने माँ और पापा से सारी बात बताई जब मैं अपने भाई को राखी बांधने गई थी। मेरी माँ और भाई भड़क गए और बोले कि अभी बात करता हूँ, किसी की पर्सनल चीज को लेने का क्या हक बनता है।

पापा ने भाई को समझाया और बोले, "तुम इतने बड़े नहीं हुए हो जो इसकी सास से ऐसे पेश आओ।" फिर पापा मुझे कोने में ले जाते हैं और बोलते हैं, "बेटा, तुम्हारी सास तुमसे उम्र में बड़ी है, एक बार उनकी बात मानो, आखिर इसमें कुछ सच्चाई हो।"

मैं घर आती हूँ और अगले दिन सुबह जल्दी उठकर खाना बनाती हूँ, समय पर सबको खाना देती हूँ और घर के सारे काम भी निपटा देती हूँ। लगभग एक महीने बाद मुझे और मेरी जेठानी को यह बात समझ आई कि हम दोनों का हाथ धीमा क्यों चल रहा था। जो काम पहले 8 बजे होता था, वो अब 11 बजे क्यों हो रहा था। इसके पीछे कारण था मोबाइल, और मोबाइल में भी सबसे खतरनाक चीज छोटी शॉर्ट वीडियो, जो एक के बाद एक देखते जाओ, कैसे समय को खा रही है, पता ही नहीं चलता।

मैंने यह भी देखा कि जबसे शॉर्ट देखना बंद किया, किसी चीज पर ज्यादा ध्यान टिकने लगा। कोई भी बात काफी जल्दी समझ में आने लगी। और सबसे बड़ी बात, पहले घर का सारा काम करके 2 बजे खाली होते थे, अब 12 बजे हो जाते हैं।

मुझे और जेठानी जी को इस बात को समझने में समय लगा, लेकिन आज एक साल हो गया है। अब सुबह उठकर फोन ना देखना अपने आप में एक अच्छी आदत बन गई है। शायद मेरे पापा यह बात जानते थे, इसलिए बड़ी सहूलियत से बोल दिया कि जो सासु माँ बोल रही हैं, कुछ दिन करके देखो। हमारे घर में होने वाली किचकिच खत्म हो गई।

अब सोचिए, ये शॉर्ट्स कितनी खतरनाक चीज है। मेरा जो हाल था, वही हाल आज की हर लड़की और लड़के का है। शॉर्ट और रील के चक्कर में जो काम 10 मिनट का है, वो 2 घंटे में पूरा होता है।

यदि आप भी अपने परिवार को ठीक से संभाल नहीं पा रहे हैं या आपको लगता है कि समय बहुत जल्दी खत्म हो जाता है और आप सारा दिन कुछ कर नहीं पाते, तो मात्र 1 महीने के लिए रील देखना बंद कर दीजिए। यह मीठा जहर है, जो अंदर से दिमाग और हमारे समय को धीरे-धीरे खा रहा है।

उम्मीद है, मेरे इस अनुभव से बहुत सी गृहणियों को कुछ फायदा होगा। कमेंट करके यह भी बताएं कि क्या आपने यह नोटिस किया है कि रील देखने से बिना अंदाज का समय नष्ट होता है

अरे भाग्यवान तुम्हारा बेटा किसी का पति भी है

 *# अरे भाग्यवान तुम्हारा बेटा किसी का पति भी है*


रात के 11:00 बज चुके थे। श्रीनाथ जी को बहुत नींद आ रही थी, पर पत्नी थी कि अभी तक बेटे तरुण के कमरे से निकलकर नहीं आई थी। दो बार श्रीनाथजी उसके कमरे में चक्कर लगाकर आ चुके थे और अपनी पत्नी को बुला चुके थे। आखिर बहू नव्या को रसोई में जाते देखकर उठ गए और तरुण के कमरे में जाकर बोले,


"अरी भाग्यवान, कब तक तरुण के कमरे में ही बैठी रहोगी? अब इन्हें भी सोने दो और खुद भी सो जा"


" आपको भी क्या चैन नहीं है? कुछ पल मेरे बेटे से बातें कर रही हूँ लेकिन आपको वो भी नहीं सुहाता"


" अरे मुझे तो सब सुहाता है। पर तुम दवाई लेना भूल जाती हो और फिर मुझ से ही झगड़ा करती हो कि आप याद नहीं दिला सकते थे क्या?"

" हां तो ठीक है ना, दवाई लेकर आ कर बैठ जाती हूं"


" नहीं नहीं, तुम दवाई कमरे में ही लो और फिर आराम करो। डॉक्टर ने दवा लेने के बाद आराम करने के लिए कहा है"

" लेकिन कब?"

" इस बार जब गए थे तब डॉक्टर ने कहा था"

" पर मेरे सामने तो ऐसा कुछ नहीं कहा"

" अरे तुम बाहर निकल गई थी तब कहा था"


आखिर सुषमा जी को मन मार कर अपने कमरे में आना पड़ा। सुषमा जी के कमरे में आते ही श्रीनाथजी ने कहा,

" क्या तुम बच्चों के कमरे में बैठी रहती हो। अच्छा लगता है क्या?"

" इसमें अच्छा लगने की क्या बात है? मेरे बेटे से ही तो बात कर रही हूँ। पहले भी तो रात को मैं उससे बातें करती थी"

" पर पहले की बात और थी। अब बात और है। अब घर में बहू आ चुकी है। और पहले कौन सा तुम उसके कमरे में ग्यारह बारह बजे तक बैठी रहती थी"


" तो? बहू के आने के बाद भी मेरा बेटा तो बेटा ही रहेगा ना"

सुषमा जी ने तुनक कर कहा और अपनी दवाई लेकर सोने चली गईं। श्रीनाथजी अपना सिर पकड़ कर बैठ गए।

दूसरे दिन सुबह श्रीनाथजी अपने मॉर्निंग वॉक से लौट कर आए तो घड़ी में 8:00 बज चुके थे। तरुण अपना नाश्ता कर रहा था और सुषमा जी वहीं डाइनिंग टेबल पर बैठी हुई थीं जबकि बहू नव्या नाश्ता सर्व कर रही थी। सुषमा जी नव्या को बिल्कुल भी तरुण के पास रुकने नहीं दे रही थीं। जैसे ही नव्या कुछ सर्व करने के लिए भी आती तो सुषमा जी बर्तन उसके हाथ से ले लेतीं।


श्रीनाथजी अपने साथ गरमा गरम कचोरियां लेकर आए थे। उसे नव्या को देकर बोले,

" ले बहू तरुण को भी परोस दे"


नव्या कचौरियाँ लेकर तरुण की तरफ बढ़ ही रही थी कि सुषमा जी ने उसके हाथ से कचोरियाँ भी ले लीं और उससे कहा,

" जा बहू तू तरुण का टिफिन पैक कर दे। मैं ही कचौरियाँ परोस दूंगी"


'हे भगवान! इस औरत को कब समझ आएगा' यही बात सोचते हुए श्रीनाथजी वहीं सोफे पर बैठ गए। और सुषमा जी के तमाशे देखने लगे। थोड़ी देर बाद तरुण घर से निकलने लगा तो उसने नव्या को आवाज देकर कहा,

" नव्या शाम को जल्दी तैयार हो जाना। प्रवीण के यहाँ पार्टी में जाना है। मेरे सारे दोस्त आ रहे हैं"

इससे पहले कि नव्या कुछ कहती सुषमा जी बोलीं,


" अरे फिक्र मत कर बेटा, हम लोग टाइम से तैयार हो जाएंगे। तू जा"

सुषमा जी की बात सुनकर तरुण एक पल के लिए रुक गया। यहां तक कि श्रीनाथजी भी हैरानी से अपनी पत्नी की तरफ देखने लगे तो सुषमा जी ने कहा,

"अरे खड़ा क्या है? जाता क्यों नहीं? देर हो जाएगी ऑफिस में"

तरुण ने अपने पापा की तरफ देखा, तो उन्होंने उसे जाने का इशारा किया। अपने पापा का आश्वासन पाते हैं वो वहां से रवाना हो गया, वहीं नव्या भी रसोई में चली गई। आखिर बोलती भी तो बोलती क्या?

वहीं सुषमा जी कमरे में आकर अलमारी खोलकर अलमारी के सामने खड़ी हो गईं। पीछे पीछे श्रीनाथजी भी कमरे में आ गए,

" क्या कर रही हो भाग्यवान?"


" अरे शाम की पार्टी के लिए क्या पहनूँ? बस यही सोच रही हूं"

" मैं यही तो पूछना चाहता हूं कि तुम कर क्या रही हो?"

" मतलब???"

" तुम्हें कुछ समझ है कि नहीं या तरुण की शादी के बाद समझ बेच खाई। तरुण के दोस्तों की पार्टी है, वहां तुम कहां अच्छी लगोगी?"

" अरे तो मैं तो उसके सारे दोस्तों को जानती हूं। वो सब भी तो मेरे बच्चे जैसे ही हैं"

" अरे बच्चे जैसे हैं तो भी तो उन्हें स्पेस तो चाहिए ना"

" ऐसा है तो वो अकेला चला जाएगा। जरूरी है क्या नव्या को साथ लेकर जाना? नव्या तो उसके सारे दोस्तों को भी ठीक से जानती भी नहीं"

" अरे नहीं जानती तो जान जाएगी। वो दोनों पति पत्नी हैं। तुम्हें शोभा देता है क्या बच्चों के साथ जाना"

" अरे! पर तरुण मेरा बेटा है"

" पर भाग्यवान, तुम्हारा बेटा अब किसी का पति भी है। अगर इतना ज्यादा इन दोनों के रिश्ते के बीच में आओगी तो एक दिन ऐसा आएगा कि तुम इस घर में अकेली रह जाओगी। हर रिश्ते की अपनी मर्यादा होती है। इतनी मर्यादा क्या तोड़ना कि मजबूर होकर बेटे बहू को तुम्हारे सामने खड़े होकर बोलना पड़े."

" ऐसे कैसे जी? मेरी बड़ी जीजी ने भी अपने बच्चों को कितनी छूट दी थी। क्या हुआ? बाद में बहू बेटे को लेकर के हमेशा हमेशा के लिए अलग हो गई। ना बाबा ना, मैं अपने बेटे को इस तरह अकेला नहीं छोड़ सकती और मैं नव्या को कोई मौका नहीं दूंगी कि वो मेरे बेटे को लेकर अलग हो"


" जब इतना ही डर था तो फिर बेटे की शादी ही क्यों की थी? देखो भाग्यवान, हर बात के दो पहलू होते हैं। जीजी का बेटा बहू लेकर अलग हुई। इल्जाम लगाना आसान है पर क्या उनके बेटे में अक्ल नहीं थी"

" लेकिन"

" लेकिन वेकिन कुछ नहीं। शाम को सिर्फ नव्या और तरुण जा रहे हैं। कुछ तो अपने संस्कारों पर भी विश्वास करो। थोड़ा स्पेस तो दो बच्चों को। और आइंदा मैंने इस तरह की हरकत देखी ना तो याद रखना मैं तरुण को कह दूंगा कि अपना ट्रांसफर दूसरे शहर करवा ले। फिर बैठी रहना अकेली."


जब श्रीनाथजी ने थोड़ा सख्त होते हुए कहा, तब जाकर सुषमा जी चुप हो गईं। आखिर पति को गुस्से में देख कर उन्होने चुप रहना ही ठीक समझा। क्योंकि वो जानती थीं, आखिर गलत वो खुद ही हैं। आखिर शाम को तरुण और नव्या ही पार्टी में गए।

रिश्तों मे नफा नुकशान नही देखा जाता।

 रिश्तों मे नफा नुकशान नही देखा जाता।


विनोद हाईवे पर गाड़ी चला रहा था।

सड़क के किनारे उसे एक 12-13 साल की लड़की तरबूज बेचती दिखाई दी। विनोद ने गाड़ी रोक कर पूछा "तरबूज की क्या रेट है बेटा? " लड़की बोली " 50 रुपये का एक तरबूज है साहब।"


पीछे की सीट पर बैठी विनोद की पत्नी बोली " इतना महंगा तरबूज नही लेना जी। चलो यहाँ से। "विनोद बोला "महंगा कहाँ है इसके पास जितने तरबूज है कोई भी पांच किलो के कम का नही होगा। 50 रुपये का एक दे रही है तो 10 रुपये किलो पड़ेगा हमें। बाजार से तो तू बीस रुपये किलो भी ले आती है। "


विनोद की पत्नी ने कहा तुम रुको मुझे मोल भाव करने दो।” फिर वह लड़की से बोली "30 रुपये का एक देना है तो दो वरना रहने दो। " लड़की बोली " 40 रुपये का एक तरबूज तो मै खरीद कर लाती हूँ आंटी। आप 45 रुपये का एक ले लो। इससे सस्ता मै नही दे पाऊँगी।"


विनोद की पत्नी बोली" झूठ मत बोलो बेटा। सही रेट लगाओ देखो ये तुम्हारा छोटा भाई है न? इसी के लिए थोड़ा सस्ता कर दो।" उसने खिड़की से झाँक रहे अपने चार वर्षीय बेटे की तरफ इशारा करते हुए कहा।


सुंदर से बच्चे को देख कर लड़की एक तरबूज हाथों मे उठाते हुए गाड़ी के करीब आ गई। फिर लड़के के गालों पर हाथ फेर कर बोली " सचमुच मेरा भाई तो बहुत सुंदर है आँटी।" विनोद की पत्नी बच्चे से बोली "दीदी को नमस्ते बोलो बेटा। " बच्चा प्यार से बोला "नमस्ते दीदी। लड़की ने गाड़ी की खिड़की खोल कर बच्चे को बाहर निकाल लिया फिर बोली " "तुम्हारा नाम क्या भैया? "


लड़का बोला " मेरा नाम गोलू है दीदी। " बेटे को बाहर निकालने के कारण विनोद की पत्नी कुछ असहज हो गई। तुरंत बोली "अरे बेटा इसे वापस अंदर भेजो। इसे डस्ट से एलर्जी है।"लड़की उसकी आवाज पर ध्यान न देते हुए लड़के से बोली "तु तो सचमुच गोल मटोल है रे भाई। तरबूज खाएगा? "लड़के ने हाँ मे गर्दन हिलाई तो लड़की ने तरबूज उसके हाथों मे थमा दिया।


पाँच किलो का तरबूज गोलू नही संभाल पाया। तरबूज फिसल कर उसके हाथ से नीचे गिर गया और फूट कर तीन चार टुकड़ों मे बंट गया। तरबूज के गिर कर फुट जाने से लड़का रोने लगा।


लड़की उसे पुचकारते हुए बोली अरे भाई रो मत। मै दूसरा लाती हूँ। फिर वह दौड़कर गई और एक और बड़ा सा तरबूज उठा लाई।


जब तक वह तरबूज उठा कर लाई इतनी देर मे विनोद की पत्नी ने बच्चे को अंदर गाड़ी मे खींच कर खिड़की बन्द कर ली। लड़की खुले हुए शीशे से तरबूज अंदर देते हुए बोली "ले भाई ये बहुत मिठा निकलेगा।” विनोद चुपचाप बैठा लड़की की हरकतें देख रहा था।


विनोद की पत्नी बोली "जो तरबूज फूटा है मै उसके पैसे नही दूँगी। वह तुम्हारी गलती से फूटा है। "लड़की मुस्कराते हुए बोली "उसको छोड़ो आंटी। आप इस तरबूज के पैसे भी मत देना। ये मैने अपने भाई के लिए दिया है। "

इतना सुनते ही विनोद और उसकी पत्नी दोनों एक साथ चौंक पड़े। विनोद बोला " नही बिटिया तुम अपने दोनों तरबूज के पैसे लो।" फिर सौ का नोट उस लड़की की तरफ बढ़ा दिया। लड़की हाथ के इशारे से मना करते हुए वहाँ से हट गई। औ अपने बाकी बचे तरबुजों के पास जाकर खड़ी हो गई।


विनोद भी गाड़ी से निकल कर वहाँ आ गया था। आते ही बोला "पैसे ले लो बेटा वरना तुम्हारा बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा।" लड़की बोली "माँ कहती है जब बात रिश्तों की हो तो नफा नुकसान नही देखा जाता। आपने गोलू को मेरा भाई बताया मुझे बहुत अच्छा लगा। मेरा भी एक छोटा सा भाई था मगर.."


विनोद बोला "क्या हुआ तुम्हारे भाई को? "

वह बोली "जब वह दो साल का था तब उसे रात मे बुखार हुआ था। सुबह माँ हॉस्पिटल मे ले जा पाती उससे पहले ही उसने दम तौड़ दिया था। मुझे मेरे भाई की बहुत याद आती है। उससे एक साल पहले पापा भी ऐसे ही हमे छोड़ कर गुजर गए थे।


विनोद की पत्नी बोली "ले बिटिया अपने पैसे ले ले। " लड़की बोली "पैसे नही लुंगी आंटी।"

विनोद की पत्नी गाड़ी मे गई फिर अपने बैग से एक पाजेब की जोड़ी निकाली। जो उसने अपनी आठ वर्षीय बेटी के लिए आज ही तीन हजार मे खरीदी थी। लड़की को देते हुए बोली। तुमने गोलू को भाई माना तो मै तुम्हारी माँ जैसी हुई ना। अब तू ये लेने से मना नही कर सकती।


लड़की ने हाथ नही बढ़ाया तो उसने जबरदस्ती लड़की की गोद मे पाजेब रखते हुए कहा "रख ले। जब भी पहनेगी तुझे हम सब की याद आयेगी। "इतना कहकर वह वापस गाड़ी मे जाकर बैठ गई।


फिर विनोद ने गाड़ी स्टार्ट की और लड़की को बाय बोलते हुए वे चले पड़े। विनोद गाड़ी चलाते हुए सोच रहा था कि भावुकता भी क्या चीज है। कुछ देर पहले उसकी पत्नी दस बीस रुपये बचाने के लिए हथकण्डे अपना रही थी।कुछ देर मे ही इतनी बदल गई जो तीन हजार की

पाजेब दे आई।


फिर अचानक विनोद को लड़की की एक बात याद आई "रिश्तों मे नफा नुकसान नही देखा जाता।"


विनोद का प्रॉपर्टी के विवाद को लेकर अपने ही बड़े भाई से कोर्ट मे मुकदमा चल रहा था।।

उसने तुरंत अपने बड़े भाई को फोन मिलाया। फोन उठाते ही बोला " भैया मै विनोद बोल रहा हूँ। "


भाई बोला "फोन क्यों किया? " विनोद बोला "भैया आप वो मैन मार्केट वाली दुकान ले लो। मेरे लिए मंडी वाली छोड़ दो। और वो बड़े वाला प्लॉट भी आप ले लो। मै छोटे वाला ले लूंगा। मै कल ही मुकदमा वापस ले रहा हूँ। " सामने से काफी देर तक आवाज नही आई।


फिर उसके बड़े भाई ने कहा "इससे तो तुम्हे बहुत नुकसान हो जाएगा छोटे? "विनोद बोला " भैया आज मुझे समझ मे आ गया है रिश्तों मे नफ़ा-नुकसान नही देखा जाता। एक दूसरे की खुशी देखी जाती है। उधर से फिर खानोशी छा गई। फिर विनोद को बड़े भाई की रोने की आवाज सुनाई दी।


विनोद बोला "रो रहे हो क्या भैया?" बड़ा भाई बोला " इतने प्यार से पहले बात करता तो सब कुछ मै तुझे दे देता रे। अब घर आ जा। दोनों प्रेम से बैठ कर बंटवारा करेंगे। इतनी बड़ी कड़वाहट कुछ मीठे बोल बोलते ही न जाने कहाँ चली गई थी। कल जो एक एक इंच जमीन के लिए लड़ रहे थे वे आज भाई को सब कुछ देने के लिए तैयार हो गए थे।


कहानी का मोरल:-

त्याग की भावना रखिये। अगर हमेशा देने को तत्पर रहोगे तो लेने वाले का भी हृदय परिवर्तन हो जाएगा।

याद रखे रिश्तों मे नफा-नुकसान नही देखा जाता।

अपनो को करीब रखने के लिए अपना हक भी छोड़ना पड़ता है

🐄🐄🚩🚩🙏🙏

शारीरिक संबंध के दौरान फोरप्ले और आफ्टरप्ले से आप भी हैं अनजान? 🤔

 शारीरिक संबंध के दौरान फोरप्ले और आफ्टरप्ले से आप भी हैं अनजान? 🤔


खुशहाल दांपत्य जीवन के लिए कपल्स के बीच सेक्सुअल एक्टिविटी आवश्यक होती है। कुछ लोग सेक्स को प्यार और प्रेम इज़हार करने का तरीका मानते हैं, तो कुछ के लिए यह बच्चे पैदा करने का साधन है। अगर आप भी सेक्स की बुनियादी बातों से अनजान हैं, तो नीचे पूरा लेख पढ़िये। 📚


अधिकतर महिलाओं की शिकायत होती है कि सेक्स के बाद पति उनकी तरफ ध्यान नहीं देते, जिससे उन्हें बहुत बुरा लगता है। उन्हें लगता है कि पति सिर्फ अपनी संतुष्टि के बारे में सोचते हैं। दरअसल, इसमें पुरुषों की गलती नहीं होती। सेक्स को स्त्री और पुरुष दोनों अलग तरह से महसूस करते हैं। पुरुष के लिए सेक्स में शारीरिक भागीदारी ज्यादा मायने रखती है, जबकि स्त्री के लिए यह मन से जुड़ा रिश्ता होता है। 💑


पुरुष बिना प्यार के अपनी इच्छा से सेक्स कर सकता है, लेकिन स्त्री जब तक किसी पुरुष को मन से नहीं चाहेगी, वह सेक्स के लिए तैयार नहीं होगी। पुरुष सेक्स को तन से जोड़कर देखते हैं, लेकिन स्त्री के लिए मानसिक जुड़ाव ज्यादा जरूरी है। इसीलिए महिलाओं को सेक्स से पहले फोरप्ले और सेक्स के बाद आफ्टरप्ले की जरूरत होती है। 💕🔥


सेक्स से पहले पति-पत्नी जब फोरप्ले करते हैं, एक-दूसरे के बॉडी पार्ट्स को छूते हैं, किस करते हैं, तो इससे उनमें उत्तेजना बढ़ती है और वे शारीरिक संबंध को एंजॉय करते हैं। इसी तरह, सेक्स के बाद स्त्री की इच्छा होती है कि पति कुछ पल उसके पास रहे, उसे छुए, प्यार करे। ऐसा करने से स्त्री को संतुष्टि मिलती है। 🥰💋


कई पुरुष अपनी पत्नी से प्यार तो बहुत करते हैं, लेकिन उसकी शारीरिक जरूरतों को समझ नहीं पाते, जिसके कारण बिना गलती के पत्नी उन्हें दोषी मान लेती है। सेक्स को लेकर महिलाओं की क्या इच्छाएं और जरूरतें हैं, इसके बारे में उन्हें पति से बात जरूर करनी चाहिए। इससे पति आपके मन की बात समझ पाएंगे और आपकी सेक्स लाइफ और हेल्दी हो जाएगी। 💌💑


यह एक सामान्य जानकारी है। अगर आप किसी भी बीमारी से ग्रसित हैं या कोई भी परेशानी, कारण या लक्षण दिखा रहे हैं, तो इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें। अगर इससे संबंधित कोई भी समस्या हो रही है, तो आपको डॉक्टर से जरूर सलाह लेना चाहिए और डॉक्टर के सुझावों के आधार पर ही कोई निर्णय लेना चाहिए। इलाज कराना भी जरूरी है। 🩺👩‍⚕️


कमेंट करेगा उसका जवाब सबसे पहले दूंगा। तो जल्दी से कमेंट करना याद से! 😉💬

"एक पत्नी अपने पति से प्यार करती है

 अप्रैल का महीना था और शादी-विवाह का सीजन जोरों पर था। मैं भी एक बारात में शामिल होने का मौका पाकर काफी उत्साहित था। मेरे नजदीकी दोस्त श्याम नारायण जी के साढ़ू भाई के घर से बारात जानी थी। हम दोनों दोपहर को ही वहां पहुंच गए। जैसे ही पहुंचे, उनके साढ़ू भाई ने हमें स्वागत करते हुए पानी मंगवाया। थोड़ी देर में एक नौजवान महिला, जो बहुत आकर्षक और सजी-धजी हुई थी, पानी और मिठाई लेकर आई। मैंने उसे नमस्ते किया, और उसने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया। मैंने मजाक में कहा, "पहचान नहीं रही हैं क्या?" वह मुस्कुराई और बोली, "क्यों नहीं, पिछली बार भी तो आप आए थे, याद है।"


यह जानकर मुझे तसल्ली हुई कि उसने मुझे पहचाना था। उसके बाद वह वापस अंदर चली गई। मैंने नारायण जी के साढ़ू भाई से उसके बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि वह दूर के रिश्ते में उनकी बहन लगती है और उसका नाम सोनम है।


शाम होते ही दूल्हे को तैयार किया गया और बारात निकलने की तैयारी शुरू हो गई। डी.जे. बजने लगा और औरतें खुशी से नाचने लगीं। सोनम भी उनमें शामिल थी। उसका नृत्य बहुत ही मनमोहक और सजीव था, जो सबका ध्यान खींच रहा था। कुछ देर बाद, शायद वह थक गई और उसने नाचना बंद कर तालियाँ बजाने लगी। मैं वहां पास खड़ा होकर यह सब देख रहा था, और उसकी कला की प्रशंसा कर रहा था। तभी सोनम की नजर मुझ पर पड़ी। वह पास आई और मुझे भी नाचने के लिए खींचने लगी। मैं मन रखने के लिए थोड़ा नाचने लगा। नृत्य खत्म होते ही मैंने उसकी तारीफ की, "आप बहुत अच्छा नाचती हैं।" वह मुस्कुराई और बोली, "आप भी बहुत अच्छे लगते हैं।"


बारात के भोजन और नाश्ते के बाद, गांव के कुछ लोग बारात से जल्दी घर लौटने की योजना बनाने लगे। मैंने भी सोचा कि क्यों न हम भी लौट चलें, ताकि सुबह जल्दी उठकर इलाहाबाद के लिए निकल सकें।


रात करीब एक बजे हम लोग बारात से घर लौट आए। गांव के बाराती अपने-अपने घर चले गए, और हम दोनों बैठे थे। घर के सामने एक बैठका था, जिसमें हमने दो चारपाई बिछाई। नारायण जी अंधेरे में अंदर की तरफ की चारपाई पर लेट गए, और मैं दरवाजे के पास की चारपाई पर, जहां बाहर की रोशनी पड़ रही थी। मैंने उनसे एक चादर मांगी, तो उन्होंने कहा कि जाओ, घर से मांग लो, औरतें अभी जाग रही हैं।


मैं घर के अंदर गया और देखा कि औरतें अभी भी नाच-गाने में मगन थीं। मैंने आवाज दी, तो साढ़ू भाई की मां खुद आईं। मैंने उनसे एक चादर मांगी, और वे उसे लेने अंदर चली गईं। तभी सोनम ने उन्हें देखा और उनसे चादर ले ली, "मां जी, आप बैठिए, मैं दे आती हूं।" वह चादर लेकर आई और मुस्कुराते हुए बोली, "चलो, बिछा दूं?" मैं हंसते हुए मजाक किया, "अरे नहीं, अभी आप सोने के लिए भी कह देंगी, तो?" वह हंसकर बोली, "नहीं-नहीं, आपको खोजने की जरूरत नहीं पड़ेगी।"


मैंने चादर ली और अपनी चारपाई पर बिछाकर बैठ गया। सोचते-सोचते कि सोनम कितनी मजाकिया और खुशदिल है, मुझे नींद आने लगी। करीब पैंतालीस मिनट बाद, जब मैं लेटने ही वाला था, तभी वह फिर से आई और अचानक मुझे पकड़कर चारपाई पर लेटा दिया। वह मुझसे किस करने की कोशिश कर रही थी। मैं हड़बड़ाकर बोला, "अरे...रे...रे, ये क्या?" वह बोली, "मैंने कहा था न, आप बहुत अच्छे लगते हैं।"


इस पर मेरी आवाज सुनकर नारायण जी भी हड़बड़ा कर उठ बैठे और बोले, "अरे, क्या हुआ? कौन है?" सोनम नारायण जी की आवाज सुनकर सन्न रह गई और तेजी से वहां से चली गई।


मेरे दिल में एक अजीब सी राहत महसूस हुई, और मैंने सोचा कि ये सब कितना गलत था। मैंने नारायण जी से कहा, "मैं तो समझ रहा था कि वह एक अच्छी महिला है, लेकिन यह तो बिल्कुल गलत निकली। उसे शर्म नहीं आई, लाज नहीं आई?" नारायण जी बोले, "अरे कैसी लाज? उसका पति विदेश में है और वह चरित्रहीन है। तुम्हें चुपचाप मजे लेने चाहिए थे, मौका गंवा दिया।"


मैंने गंभीरता से कहा, "नारायण जी, आप कैसी बातें कर रहे हैं? वह एक महिला है, और अगर वह अपने पति के अलावा किसी और के साथ संबंध बनाती है, तो यह उसका चरित्र है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम भी अपना चरित्र गिराकर उसी स्तर पर आ जाएं। मैं अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता हूं, और अगर मेरी पत्नी ऐसा कुछ करे, तो मुझे बहुत बुरा लगेगा।"


मैंने आगे कहा, "एक पत्नी अपने पति से प्यार करती है और उम्मीद करती है कि उसका पति भी उससे वफादार रहेगा। एक पत्नी किसी के साथ अपना सब कुछ साझा कर सकती है, लेकिन अपने पति को नहीं। इसलिए हमें भी अपने रिश्ते और खुद की इज्जत करनी चाहिए।"


उस रात के बाद, मैंने तय कर लिया कि मैं अपने मूल्यों और आदर्शों से कभी समझौता नहीं करूंगा, चाहे हालात कुछ भी हों।

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...