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Friday, 13 December 2024

पैसे और गहने ले लिए ना?

 रात के 12 बज रहे थे। अनुज का फोन आया। फोन पर एक धीमी आवाज में फुसफुसाहट हुई - "हेलो..."

नेहा ने भी धीमे स्वर में जवाब दिया, "हां बोलो..."


अनुज ने पूछा, "सब तैयारी हो गई? सुबह 4 बजे की बस है।"

नेहा ने कहा, "हां, मेरे कपड़े पैक हो गए हैं। बस पैसे और गहने लेना बाकी है।"


अनुज ने फिर कहा, "अपने सारे डॉक्यूमेंट भी ले लेना। नया घर बसाना है, शायद दोनों को काम करना पड़े।"

नेहा ने जवाब दिया, "ठीक है, सब कुछ लेकर तुम्हें कॉल करती हूं।"


इसके बाद नेहा ने माँ की अलमारी खोली। उसमें से गहनों का डिब्बा निकाला और अपने लिए बनवाया गया मंगलसूत्र बैग में रखा। झुमके पहन लिए, और चूड़ियों का डिब्बा बैग में डाल ही रही थी कि माँ की तस्वीर गिर पड़ी। तस्वीर को उठाते हुए उसे याद आया कि माँ ने कितनी मेहनत से ये सब जोड़ा था। माँ की बातें उसे अंदर तक कचोट गईं।


फिर उसने घर के पैसे निकाले। यह वही रकम थी जो पापा, अनिकेत की पढ़ाई के लिए लोन लेकर आए थे। नेहा ने इसे भी बैग में रख लिया। उसके दिल में उलझन थी, लेकिन वह खुद को समझाने की कोशिश कर रही थी।


उसने अनिकेत के कमरे में झांका। अनिकेत पढ़ाई में डूबा हुआ था। माँ नींद की दवा लेकर सो रही थीं। पापा, हमेशा की तरह, वर्किंग टेबल पर बही खाता बना रहे थे। सब अपने काम में व्यस्त थे।


अपने कमरे में जाकर उसने अनुज को फोन लगाया। "सब कुछ तैयार है। घर में कोई जाग नहीं रहा।"

अनुज ने पूछा, "पैसे और गहने ले लिए ना?"

इस बार नेहा को अनुज का यह सवाल चुभा। उसने गुस्से में कहा, "हां ले लिए। लेकिन तुम बार-बार यही क्यों पूछ रहे हो?"


अनुज ने बहलाते हुए कहा, "अरे, नए घर के लिए पैसे तो चाहिए ही ना। मोबाइल भी लेना है। बस तुम फिक्र मत करो।"

नेहा ने एक पल के लिए सोचा और बोली, "सुनो, क्या तुममें इतनी हिम्मत नहीं है कि मेरे लिए कुछ कमा सको?"


अनुज बगलें झांकते हुए बोला, "अरे, ऐसी बात नहीं है। बस शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा।"

नेहा अब चुप हो गई। उसे अनुज की बातों में सच्चाई नहीं दिख रही थी।


थोड़ी देर की खामोशी के बाद उसने कहा, "सुनो, अभी के लिए ये भागने का प्लान कैंसल करते हैं। पहले तुम कुछ कमा कर दिखाओ। जब दो महीने का खर्च इकट्ठा कर सको, तब मुझे बुलाना। नहीं कर पाए, तो मुझे भूल जाना।"

अनुज कुछ बोलने ही वाला था कि नेहा ने फोन काट दिया।


नेहा ने पापा के कमरे का दरवाजा खटखटाया। पापा ने चौंककर पूछा, "क्या हुआ बेटा, अभी तक सोई नहीं?"

नेहा ने कहा, "पापा, मैं नौकरी करना चाहती हूं। जब तक अनिकेत की पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती, मुझे घर का हाथ बंटाने दीजिए।"

पापा ने स्नेह से नेहा के सिर पर हाथ फेरा। उनकी आंखों में गर्व था।

नेहा मन ही मन सोच रही थी कि भगवान ने उसे सही वक्त पर संभाल लिया। "थैंक यू गॉड, आपने मुझे एक बड़ी गलती करने से बचा लिया।"

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लेखक: सुनिल राठौड़ 

Monday, 9 December 2024

जवानी में क्यों हर लड़की की चाहत होती है

 जवानी में क्यों हर लड़की की चाहत होती है, इसमें कोई भी शामिल नहीं है कि ये शारीरिक ज़रूरत के साथ मानसिक ज़रूरत भी है जिसे आप किसी से प्यार करते हैं। तो उसके साथ अपने प्यार को अनंत सीमा तक ले जाने की दवा है सेक्स 

एक साधारण सी लड़की, जिसे कॉलेज में देखकर अपने सपनों की दुनिया मिल गई। वह वक्त मेरी जिंदगी में बेहद प्रभावशाली लग रहा था। पढ़ाई, दोस्त, और सबसे साहसी राहुल। राहुल...वो नाम नहीं, मेरी दुनिया थी।


पहली बार उन्हें पायल में देखा तो लगा, जैसे किसी फिल्म का हीरो हो। दोस्त से भरा, मुस्कुराता हुआ चेहरा और हर किसी की मदद का हाथ बढ़ाने वाला। पता नहीं कब और कैसे, हमारी दोस्ती प्यार में बदल गई। राहुल के साथ हर पल एक जादू जैसा लगता था। वह मेरी हर छोटी-बड़ी बात कहता है, मेरे सपने को सुनता है, और उन्हें पूरा करने का वादा करता है।


कॉलेज की लाइब्रेरी में एक साथ पढ़ना, कैंटीन में चाय के कप शेयर करना, और क्लास के बाद चौदह बातें करना—हमारी जिंदगी बस दोस्ती खुशियों से भरी थी। राहुल ने माय से कहा, "सीमा, चांदनी शादी करके ही मेरा सपना पूरा होगा। हम साथ रहेंगे, हमेशा के लिए।" मैं भी उनकी हर बात पर विश्वास रखता था।


हमारा रिश्ता इतना गहरा हो गया कि हमने अपने प्यार को हर सरहद पार कर लिया। पहली बार जब राहुल ने मुझसे करीब आकर कहा, तो मुझे थोड़ा डर लगा, लेकिन उनके बयान ने मुझे हर डर से दूर कर दिया। मुझे लगता है, राहुल तो मेरा ही है, फिर यह डर कैसा? मैंने उसे अपना राजसी राजसी दिया, अपनी आत्मा, अपना शरीर, अपना विश्वास।


लेकिन हर बार जब मैं डरता हूं कि कहीं कुछ गलत न हो जाए, राहुल मुझे समझाता है। उन्होंने ही कहा था। मैं उसकी बात सहयोगी रही। ये छोटी-छोटी गोलियां मुझे असुरक्षा से बचाती रहीं, या शायद मैं यही बनी थी।


कॉलेज खत्म हो गया और मेरे दोस्तों को हमारे साथी की खबर मिल गई। मैंने सोचा था, जैसे फिल्मों में होता है, राहुल सब ठीक कर लेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मेरे परिवार ने उन्हें लॉरी से ज़मानत दे दी। दूसरी वह जाति का था, और मेरे साथियों के लिए यह संबंध नामुम्किन था।


मैंने बहुत लड़ाई की, रोई, गिड़गिड़ाई, लेकिन मेरे माता-पिता ने मेरी एक न सुनी। और आख़िरकार, मैंने हार मान ली। राहुल से दूर जाना मेरे लिए सबसे बड़ा दर्द था। मेरी शादी अजय से तय हो गई। अजय अच्छा इंसान था, लेकिन राहुल जैसा नहीं।


शादी के बाद मैंने खुद को नई जिंदगी में ढालने की कोशिश की। अजय मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार करता था। वह मेरी हर ज़रूरत का असली मतलब है, लेकिन मेरे दिल में राहुल की यादें अब भी ताज़ा हैं। मैंने खुद से वादा किया कि मुझे इस अवसर का एक मौका मिला।


शादी के कुछ महीने बाद जब मैं इस बात से अनजान हो गया तो अजय ने डॉक्टर से मिलकर फैसला किया। मुझे चिंता हो गई थी, लेकिन उम्मीद थी कि सब ठीक हो जाएगा। डॉक्टर ने जब मेरी नैतिकता देखी, तो उनका चेहरा गंभीर हो गया।


उन्होंने कहा, "आपकी प्रजनन क्षमता खत्म हो गई है। बार-बार क्वांटम कॉन्ट्रासेप्टिव का इस्तेमाल आपकी सेहत पर भारी पड़ गया है।" मेरी दुनिया वहीं थी। मैंने अजय को सच बताया-राहुल के साथ मेरा रिश्ता, मेरी ग़लतियाँ।


अजय ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके चेहरे की स्याही ब्यां कर रही थी। वह अवलोकन करता है, जैसे मैं कोई अजनबी हूं। उसने मुझे न अपनाता, न ही छोड़ा। हमारा रिश्ता अब सिर्फ एक समझौता बनकर रह गया है।


आज जब मैं अपने कमरे में बैठा था, तो सोच रहा था कि अगर मैंने उस समय राहुल के प्यार में अपने भविष्य के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाई, तो शायद आज मेरी जिंदगी अलग होगी।

राहुल का प्यार सच्चा था या नहीं, ये मुझे आज तक समझ नहीं आया। लेकिन मैंने जो सपना देखा था, वे राजनीतिक रह गए। मेरा आरज़ू अधूरा रह गया।

अगर आप मेरी कहानी पढ़ रहे हैं, तो एक गुज़ारिश है—प्यार की गहराई में जाने से पहले अपना भविष्य पहचानो और मत भूलिए। हमें कई सारी मशीनें मिलती हैं, लेकिन हर मौका एक नई ज़िम्मेदारी भी देता है।

Friday, 6 December 2024

विशेष निर्णय यह है कि विवाह पूर्व और संगीत कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है*

 *आज शहर के जैन समुदाय ने पिछले रविवार को एक अच्छा निर्णय लिया कि यदि किसी भी जैन समुदाय की शादी में 6 से अधिक व्यंजन हैं, तो उस शादी में दूल्हा और दुल्हन को केवल आशीर्वाद दिया जाना चाहिए, लेकिन खाया नहीं जाएगा, और फिर कल इसका पालन किया जाएगा। अग्रवाल समाज ने भी उक्त निर्णय को लागू करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही शादी के कार्ड न छपवाकर केवल व्हाट्सएप और फोन के जरिए ही निमंत्रण दें*

 *विशेष निर्णय यह है कि विवाह पूर्व और संगीत कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है*

        *उपरोक्त दोनों समाज (जैन और अग्रवाल) आर्थिक रूप से मजबूत हैं लेकिन उन्होंने उपरोक्त निर्णय लिया, दोनों समाजों को बधाई*


       *कब बदलेंगे हम, शादी में गन्ने जितना खर्च करने लगे हैं हम, शादी की खुशियां मनाने के लिए कभी-कभी कर्ज भी लेते हैं, अब हमें जरूर बदलना होगा।*

*नोट:- अनुकरणीय एवं आदर्श निर्णय का हृदय से स्वागत है। और सभी जाति, धर्म और पंथ इस निर्णय का पालन करें*।


 *समाज को विवाह संस्कार को विवाह संस्कार में बदलना चाहिए।*


  *कुछ दिन पहले कोरोना वायरस के कारण सरकार ने शादियों और कार्यक्रमों में उपस्थिति सीमित कर दी थी, लेकिन लोग इसे भूल गए और लाखों रुपये खर्च करने लगे।*

  *हम अनावश्यक रूप से लाखों रुपये बर्बाद कर रहे हैं और कर्ज में डूब रहे हैं। हमें अब बदलना होगा। वरना वक्त तुम्हें माफ नहीं करेगा.*


 *1)कृषि आय दिन-ब-दिन घटती जा रही है।*

 *2)कृषि उपज की कोई कीमत नहीं होती।*

 *3) अब कोई सरकारी नौकरी नहीं।*

 *4)निजी रोजगार में कोई गारंटी नहीं है।*

 *5)लड़की की शादी में 100 रुपये का खर्च होता है, जबकि लड़के की शादी में भी 80 रुपये का खर्च होता है।*

 *6) कर्ज में जन्मा, कर्ज में ही बड़ा हुआ और कर्ज में ही मर गया, कुछ पीढ़ियाँ बीत गईं।

 *7) विवाह एक समारोह नहीं बल्कि एक 'संस्कार' है। 16 संस्कारों में से एक संस्कार समझना चाहिए।*

 *8)चाहे कितनी भी बड़ी शादी क्यों न हो, लोग उसे भूल जाते हैं। इतनी बड़ी शादी करने पर आज तक किसी को पुरस्कार नहीं मिला।*

 *9) हम खेत बेचकर गुंठा आ गए, जबकि व्यापारी एक दुकान से चार दुकानें चला रहा है। व्यापारी वर्ग का नाम लेने के बजाय उनके अर्थशास्त्र को समझना चाहिए।*

 *10)ईर्ष्या नहीं बल्कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए।*

 *11)भाईचारे में घातक प्रतिस्पर्धा की कोई आवश्यकता नहीं है। शादी के मौके पर ऐसा नहीं चाहिए.*

 *12) दूल्हा-दुल्हन को हमेशा उपयोगी पोशाक पहननी चाहिए।*

 *13) वर्मई को भी शोर नहीं करना चाहिए। हमारी एक बेटी भी है. बहू आपकी बेटी है जो कल आपका ख्याल रखेगी. यह भावना जड़ पकड़नी चाहिए।*

 *14) खाने-पीने का तरीका बंद करें और खर्च कम करें और वर-वधू की भविष्य की प्रगति में योगदान दें।*

 *15) ऐसे बर्तन/फर्नीचर नहीं चाहिए जो दुनिया में कभी काम न आएं।*

*16) हल्दी के कार्यक्रम में मेहंदी, वैदिक विधि, भीड़ से बचना चाहिए। स्वागत समारोह में सादगी लानी चाहिए।*

 *17) क्रिकेट 5-दिवसीय, वनडे से 20-20 हो गया। तो हम शादी को छोटा/प्रबंधनीय क्यों बनाते हैं?*

 *18) केवल कुछ लोग ही सभी मेहमानों के साथ आराम से बातचीत कर सकते हैं।*

 *19) शादी के कार्ड की कीमत पढ़ें और शादी का कार्ड व्हाट्सएप के माध्यम से भेजें और कार्ड भेजने के बाद संबंधित व्यक्ति को फोन करके जिद करने के लिए आमंत्रित करें, शादी से दो दिन पहले दोबारा याद दिलाने के लिए फोन करें।

 *20) किसी भी जाति और धर्म की अच्छी बातें स्वीकार करनी चाहिए।*


  *21)समाज को बेहतर बनाने के लिए सभी को एक कदम आगे बढ़ाना चाहिए।*

 *आइये सुधारों की शुरुआत स्वयं से करें! धीरे-धीरे पूरा समाज बदल जाएगा और एक दिन समाज 100% प्रगति करेगा!*

 *सिर्फ पढ़ो मत...!*

 *आप भी सोचिये...!*

 *(यह सन्देश समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचायें।)*

         *🙏🏻यह विनम्र निवेदन है।*

        *💯यह समय की मांग है।*

धन्यवाद

तुममें इतनी हिम्मत नहीं है कि मेरे लिए कुछ कमा सको?"

 रात के 12 बज रहे थे। आदित्य का फोन आया। फोन पर एक धीमी आवाज में फुसफुसाहट हुई - "हेलो..."

बिट्टू ने भी धीमे स्वर में जवाब दिया, "हां बोलो..."


आदित्य ने पूछा, "सब तैयारी हो गई? सुबह 4 बजे की बस है।"

बिट्टू ने कहा, "हां, मेरे कपड़े पैक हो गए हैं। बस पैसे और गहने लेना बाकी है।"


आदित्य ने फिर कहा, "अपने सारे डॉक्यूमेंट भी ले लेना। नया घर बसाना है, शायद दोनों को काम करना पड़े।"

बिट्टू ने जवाब दिया, "ठीक है, सबकुछ लेकर तुम्हें कॉल करती हूं।"


इसके बाद बिट्टू ने माँ की अलमारी खोली। उसमें से गहनों का डिब्बा निकाला और अपने लिए बनवाया गया मंगलसूत्र बैग में रखा। झुमके पहन लिए, और चूड़ियों का डिब्बा बैग में डाल ही रही थी कि माँ की तस्वीर गिर पड़ी। तस्वीर को उठाते हुए उसे याद आया कि माँ ने कितनी मेहनत से ये सब जोड़ा था। माँ की बातें उसे अंदर तक कचोट गईं।


फिर उसने घर के पैसे निकाले। यह वही रकम थी जो पापा अमन की पढ़ाई के लिए लोन लेकर आए थे। बिट्टू ने इसे भी बैग में रख लिया। उसके दिल में उलझन थी, लेकिन वह खुद को समझाने की कोशिश कर रही थी।


उसने अमन के कमरे में झांका। अमन पढ़ाई में डूबा हुआ था। माँ नींद की दवा लेकर सो रही थीं। पापा, हमेशा की तरह, वर्किंग टेबल पर बही खाता बना रहे थे। सब अपने काम में व्यस्त थे।


अपने कमरे में जाकर उसने आदित्य को फोन लगाया। "सब कुछ तैयार है। घर में कोई जाग नहीं रहा।"

आदित्य ने पूछा, "पैसे और गहने ले लिए ना?"

इस बार बिट्टू को आदित्य का यह सवाल चुभा। उसने गुस्से में कहा, "हां ले लिए। लेकिन तुम बार-बार यही क्यों पूछ रहे हो?"


आदित्य ने बहलाते हुए कहा, "अरे, नए घर के लिए पैसे तो चाहिए ही ना। मोबाइल भी लेना है। बस तुम फिक्र मत करो।"

बिट्टू ने एक पल के लिए सोचा और बोली, "सुनो, क्या तुममें इतनी हिम्मत नहीं है कि मेरे लिए कुछ कमा सको?"


आदित्य बगलें झांकते हुए बोला, "अरे, ऐसी बात नहीं है। बस शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा।"

बिट्टू अब चुप हो गई। उसे आदित्य की बातों में सच्चाई नहीं दिख रही थी।


थोड़ी देर की खामोशी के बाद उसने कहा, "सुनो, अभी के लिए ये भागने का प्लान कैंसल करते हैं। पहले तुम कुछ कमा कर दिखाओ। जब दो महीने का खर्च इकट्ठा कर सको, तब मुझे बुलाना। नहीं कर पाए, तो मुझे भूल जाना।"

आदित्य कुछ बोलने ही वाला था कि बिट्टू ने फोन काट दिया।


बिट्टू ने पापा के कमरे का दरवाजा खटखटाया। पापा ने चौंककर पूछा, "क्या हुआ बेटा, अभी तक सोई नहीं?"

बिट्टू ने कहा, "पापा, मैं नौकरी करना चाहती हूं। जब तक अमन की पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती, मुझे घर का हाथ बंटाने दीजिए।"

पापा ने स्नेह से बिट्टू के सिर पर हाथ फेरा। उनकी आंखों में गर्व था।

बिट्टू मन ही मन सोच रही थी कि भगवान ने उसे सही वक्त पर संभाल लिया। "थैंक यू गॉड, आपने मुझे एक बड़ी गलती करने से बचा लिया।"

आपको यह कहानी कैसी लगी? अपने विचार हमें जरूर बताएं। 

Thursday, 5 December 2024

मेरी शादी को 20 साल से ज़्यादा हो गए हैं।

 पत्नियां संभोग सुख की चेष्टा रखती हैं लेकिन जल्दी संतुष्टि नहीं प्राप्त करती हैं 


मेरी शादी को 20 साल से ज़्यादा हो गए हैं।


जब मैंने अपनी पत्नी को पहली बार देखा तो उनके चेहरे के हाव भाव देखकर महसूस हुआ कि शायद वो मेरे लिए ठीक नहीं हैं। किन्तु घर मे सभी को पसंद थीं, बाकी सभी मानदंडों पर खरा उतर रहीं थीं और मेरे पास अपना कोई विकल्प नहीं था तो मैंने हाँ कह दी।

जिसका डर था वो ही हुआ हमारा स्वभाव एक दूसरे से काफी भिन्न है। इसलिए आजतक मतभेद भी बहुत चलते रहते हैं।

शादी के लगभग 2 वर्ष उपरांत हमारी साली जी हमारे ही गृह शहर में स्वयं की शादी के लिए अपने मामा जी के यहाँ रहने आईं।

हमारा मेलजोल बढ़ा। वो अपने स्त्री सुलभ तरीके से अंजाने में हमें आकर्षित करती थीं, किन्तु हमने सब समझते हुए भी नज़रअंदाज़ किया। हम शादीशुदा जो थे।

इधर कुछ महीनों के बाद पत्नी जी को आगे की पढ़ाई अथवा नौकरी के सिलसिले में हमारा गृह शहर छोड़ना पड़ा। खट-पट हमारी कभी बन्द हुई ही नहीं।

एक बार कुछ दिनों के लिए में बाहर गया था और वापस गृह शहर लौट कर कॉल किया तो हमारी साली जी ने फ़ोन उठाते ही हम पर " I LOVE YOU" दाग दिया।

साली जी का यही स्त्री सुलभ तरीका, जो कि शायद उनका स्वाभाव था, हम पर असर करना शुरू कर गया। आखिर कब तक बचते?


उनकी शादी के 15 वर्ष बीत गए और उस वाकये को भी लगभग 17 वर्ष हो गए। उनके अपने पति और श्वसुराल वालों के प्रति स्वभाव एवं समर्पण को और गहराई से समझने का मौका मिला।

चूँकि एक ही परिवार से सम्बद्ध हैं तो मुलाक़ात होती रहती है। भले ही हमारे बीच बात न होती हो, एक दूसरे के जीवन मे क्या चल रहा है उसकी खबर भी लगती रहती है।

इसलिए आज भी मुझे ये महसूस होता है कि शायद हम एक दूसरे के लिए ही बने थे। लेकिन नियति नहीं चाहती थी कि हम एक हों।

उनका तो पता नहीं हम आजतक उस टीस से बाहर नहीं निकल पाए। आज भी मन के किसी कोने में ये इच्छा दबी हुई है कि उनके साथ कुछ पल गहनता के साथ बिताने को मिलें।

शादी के कुछ सालों बाद ही रंभा और आशुतोष का वैवाहिक जीवन टूटने की कगार पर पहुंच गया.

 शादी के कुछ सालों बाद ही रंभा और आशुतोष का वैवाहिक जीवन टूटने की कगार पर पहुंच गया.


आज सलोनी विदा हो गई. एअरपोर्ट से लौट कर रंभा दी ड्राइंगरूम में ही सोफे पर निढाल सी लेट गईं. 1 महीने की गहमागहमी, भागमभाग के बाद आज घर बिलकुल सूनासूना सा लग रहा था. बेटी की विदाई से निकल रहे आंसुओं के सैलाब को रोकने में रंभा दी की बंद पलकें नाकाम थीं. मन था कि आंसुओं से भीग कर नर्म हुई उन यादों को कुरेदे जा रहा था, जिन्हें 25 साल पहले दफना कर रंभा दी ने अपने सुखद वर्तमान का महल खड़ा किया था.


मुंगेर के सब से प्रतिष्ठित, धनाढ्य मधुसूदन परिवार को भला कौन नहीं जानता था. घर के प्रमुख मधुसूदन शहर के ख्यातिप्राप्त वकील थे. वृद्धावस्था में भी उन के यहां मुवक्किलों का तांता लगा रहता था. वे अब तक खानदानी इज्जत को सहेजे हुए थे. लेकिन उन्हीं के इकलौते रंभा के पिता शंभुनाथ कुल की मर्यादा के साथसाथ धनदौलत को भी दारू में उड़ा रहे थे. उन्हें संभालने की तमाम कोशिशें नाकाम हो चुकी थीं. पिता ने किसी तरह वकालत की डिगरी भी दिलवा दी थी ताकि अपने साथ बैठा कर कुछ सिखा सकें. लेकिन दिनरात नशे में धुत्त लड़खड़ाती आवाज वाले वकील को कौन पूछता?


बहू भी समझदार नहीं थी. पति या बच्चों को संभालने के बजाय दिनरात अपने को कोसती, कलह करती. ऐसे वातावरण में बच्चों को क्या संस्कार मिलेंगे या उन का क्या भविष्य होगा, यह दादाजी समझ रहे थे. पोते की तो नहीं, क्योंकि वह लड़का था, दादाजी को चिंता अपनी रूपसी, चंचल पोती रंभा की थी. उसे वे गैरजिम्मेदार मातापिता के भरोसे नहीं छोड़ना चाहते थे. इसी कारण मैट्रिक की परीक्षा देते ही मात्र 18 साल की उम्र में रंभा की शादी करवा दी.


आशुतोषजी का पटना में फर्नीचर का एक बहुत बड़ा शोरूम था. अपने परिवार में वे अकेले लड़के थे. उन की दोनों बहनों की शादी हो चुकी थी. मां का देहांत जब ये सब छोटे ही थे तब ही हो गया था. बच्चों की परवरिश उन की बालविधवा चाची ने की थी.


शादी के बाद रंभा भी पटना आ गईं. रिजल्ट निकलने के बाद उन का आगे की पढ़ाई के लिए दाखिला पटना में ही हो गया. आशुतोषजी और रंभा में उम्र के साथसाथ स्वभाव में भी काफी अंतर था. जहां रंभा चंचल, बातूनी और मौजमस्ती करने वाली थीं, वहीं आशुतोषजी शांत और गंभीर स्वभाव के थे. वे पूरा दिन दुकान पर ही रहते. फिर भी रंभा दी को कोई शिकायत नहीं थी.


नया बड़ा शहर, कालेज का खुला माहौल, नईनई सहेलियां, नई उमंगें, नई तरंगें. रंभा दी आजाद पक्षी की तरह मौजमस्ती में डूबी रहतीं. कोई रोकनेटोकने वाला था नहीं. उन दिनों चाचीसास आई हुई थीं. फिर भी उन की उच्छृंखलता कायम थी. एक रात करीब 9 बजे रंभा फिल्म देख कर लौटीं. आशुतोषजी रात 11 बजे के बाद ही घर लौटते थे, लेकिन उस दिन समय पर रंभा दी के घर नहीं पहुंचने पर चाची ने घबरा कर उन्हें बुला लिया था. वे बाहर बरामदे में ही चाची के साथ बैठे मिले.


‘‘कहां से आ रही हो?’’ उन की आवाज में गुस्सा साफ झलक रहा था.


‘‘क्लास थोड़ी देर से खत्म हुई,’’ रंभा दी ने जवाब दिया.


‘‘मैं 5 बजे कालेज गया था. कालेज तो बंद था?’’


अपने एक झूठ को छिपाने के लिए रंभा दी ने दूसरी कहानी गढ़ी, ‘‘लौटते वक्त सीमा दीदी के यहां चली गई थी.’’ सीमा दी आशुतोषजी के दोस्त की पत्नी थीं जो रंभा दी के कालेज में ही पढ़ती थीं.


आशुतोषजी गुस्से से हाथ में पकड़ा हुआ गिलास रंभा की तरफ जोर से फेंक कर चिल्लाए, ‘‘कुछ तो शर्म करो… सीमा और अरुण अभीअभी यहां से गए हैं… घर में पूरा दिन चाची अकेली रहती हैं… कालेज जाने तक तो ठीक है… उस के बाद गुलछर्रे उड़ाती रहती हो. अपने घर के संस्कार दिखा रही हो?’’


आशुतोषजी आपे से बाहर हो गए थे. उन का गुस्सा वाजिब भी था. शादी को 1 साल हो गया था. उन्होंने रंभा दी को किसी बात के लिए कभी नहीं टोका. लेकिन आज मां तुल्य चाची के सामने उन्हें रंभा दी की आदतों के कारण शर्मिंदा होना पड़ा था.


रंभा दी का गुस्सा भी 7वें आसमान पर था. एक तो नादान उम्र उस पर दूसरे के सामने हुई बेइज्जती के कारण वे रात भर सुलगती रहीं.


सुबह बिना किसी को बताए मायके आ गईं. घर में किसी ने कुछ पूछा भी नहीं. देखने, समझने, समझाने वाले दादाजी तो पोती की विदाई के 6 महीने बाद ही दुनिया से विदा हो गए थे.


आशुतोषजी ने जरूर फोन कर के उन के पहुंचने का समाचार जान लिया. फिर कभी फोन नहीं किया. 3-4 दिनों के बाद रंभा दी ने मां से उस घटना का जिक्र किया. लेकिन मां उन्हें समझाने के बजाय और उकसाने लगीं, ‘‘क्या समझाते हैं… हाथ उठा दिया… केस ठोंक देंगे तब पता चलेगा.’’ शायद अपने दुखद दांपत्य के कारण बेटी के प्रति भी वे कू्रर हो गई थीं. उन की ममता जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम कर रही थी. रंभा दी अपनी विगत जिंदगी की कहानी अकसर टुकड़ोंटुकड़ों में बताती रहतीं, ‘‘मुझे आज भी जब अपनी नादानियां याद आती हैं तो अपने से ज्यादा मां पर क्रोध आता है. मेरे 5 अनमोल साल मां के कारण मुझ से छिन गए. लेकिन शायद मेरा कुछ भला ही होना था…’’ और वे फिर यादों में खो जातीं…


इंटर की परीक्षा करीब थी. वे अपनी पढ़ाई का नुकसान नहीं चाहती थीं, इसलिए परीक्षा देने पटना में दूर के एक मामा के यहां गईं. वहां मामा के दानव जैसे 2 बेटे अपनी तीखी निगाहों से अकसर उन का पीछा करते रहते. उन की नजरें उन के शरीर का ऐसे मुआयना करतीं कि लगता वे वस्त्रविहीन हो गई हैं. एक रात अपनी कमर के पास किसी का स्पर्श पा कर वे घबरा कर बैठ गईं. एक छाया को उन्होंने दौड़ते हुए बाहर जाते देखा. उस दिन के बाद से वे दरवाजा बंद कर के सोतीं. किसी तरह परीक्षा दे कर वे वापस आ गईं.


मां की अव्यावहारिक सलाह पर एक बार फिर वे अपनी मौसी की लड़की के यहां दिल्ली गईं. उन्होंने सोचा था कि फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर के बुटीक वगैरह खोल लेंगी. लेकिन वहां जाने पर बहन को अपने 2 छोटेछोटे बच्चों के लिए मुफ्त की आया मिल गई. वे अकसर उन्हें रंभा दी के भरोसे छोड़ कर पार्टियों में व्यस्त रहतीं. बच्चों के साथ रंभा को अच्छा तो लगता था, लेकिन यहां आने का उन का एक मकसद था. एक दिन रंभा ने मौसी की लड़की के पति से पूछा, ‘‘सुशांतजी, थोड़ा कोर्स वगैरह का पता करवाइए, ऐसे कब तक बैठी रहूंगी.’’


बहन उस वक्त घर में नहीं थी. बहनोई मुसकराते हुए बोले, ‘‘अरे, आराम से रहिए न… यहां किसी चीज की कमी है क्या? किसी चीज की कमी हो तो हम से कहिएगा, हम पूरी कर देंगे.’’


उन की बातों के लिजलिजे एहसास से रंभा को घिन आने लगी कि उन के यहां पत्नी की बड़ी बहन को बहुत आदर की नजरों से देखते हैं… उन के लिए ऐसी सोच? फिर रंभा दी दृढ़ निश्चय कर के वापस मायके आ गईं.


मायके की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. पिताजी का लिवर खराब हो गया था. उन के इलाज के लिए भी पैसे नहीं थे. रंभा के बारे में सोचने की किसी को फुरसत नहीं थी. रंभा ने अपने सारे गहने बेच कर पैसे बैंक में जमा करवाए और फिर बी.ए. में दाखिला ले लिया. एम.ए. करने के बाद रंभा की उसी कालेज में नौकरी लग गई.


5 साल का समय बीत चुका था. पिताजी का देहांत हो गया था. भाई भी पिता के रास्ते चल रहा था. घर तक बिकने की नौबत आ गई थी. आमदनी का एक मात्र जरीया रंभा ही थीं. अब भाई की नजर रंभा की ससुराल की संपत्ति पर थी. वह रंभा पर दबाव डाल रहा था कि तलाक ले लो. अच्छीखासी रकम मिल जाएगी. लेकिन अब तक की जिंदगी से रंभा ने जान लिया था कि तलाक के बाद उसे पैसे भले ही मिल जाएं, लेकिन वह इज्जत, वह सम्मान, वह आधार नहीं मिल पाएगा जिस पर सिर टिका कर वे आगे की जिंदगी बिता सकें.


आशुतोषजी के बारे में भी पता चलता रहता. वे अपना सारा ध्यान अपने व्यवसाय को बढ़ाने में लगाए हुए थे. उन की जिंदगी में रंभा की जगह किसी ने नहीं भरी थी. भाई के तलाक के लिए बढ़ते दबाव से तंग आ कर एक दिन बहुत हिम्मत कर के रंभा ने उन्हें फोन मिलाया, ‘‘हैलो.’’


‘‘हैलो, कौन?’’


आशुतोषजी की आवाज सुन कर रंभा की सांसों की गति बढ़ गई. लेकिन आवाज गुम हो गई.


हैलो, हैलो…’’ उन्होंने फिर पूछा, ‘‘कौन? रंभा.’’


‘‘हां… कैसे हैं? उन की दबी सी आवाज निकली.’’


‘‘5 साल, 8 महीने, 25 दिन, 20 घंटों के बाद आज कैसे याद किया? उन की बातें रंभा के कानों में अमृत के समान घुलती जा रही थीं.’’


‘‘आप क्या चाहते हैं?’’ रंभा ने प्रश्न किया.


‘‘तुम क्या चाहती हो?’’ उन्होंने प्रतिप्रश्न किया.


‘‘मैं तलाक नहीं चाहती.’’


‘‘तो लौट आओ, मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं.’’ और सचमुच दूसरे दिन बिना किसी को बताए जैसे रंभा अपने घर लौट गईं. फिर साहिल पैदा हुआ और फिर सलोनी.


रंभा दी मुंगेर के जिस कालेज में इकोनौमिक्स की विभागाध्यक्ष और सहप्राचार्या थीं, उसी कालेज में मैं हिंदी की प्राध्यापिका थी. उम्र और स्वभाव में अंतर के बावजूद हम दोनों की दोस्ती मशहूर थी.


रंभा दी को पूरा कालेज हिटलर के नाम से जानता था. आभूषण और शृंगारविहीन कठोर चेहरा, भिंचे हुए होंठ, बड़ीबड़ी आंखों को ढकता बड़ा सा चश्मा. बेहद रोबीला व्यक्तित्व था. जैसा व्यक्तित्व था वैसी ही आवाज. बिना माइक के भी जब बोलतीं तो परिसर के दूसरे सिरे तक साफ सुनाई देता.


लेकिन रंभा दी की सारी कठोरता कक्षा में पढ़ाते वक्त बालसुलभ कोमलता में बदल जाती. अर्थशास्त्र जैसे जटिल विषय को भी वे अपने पढ़ाने की अद्भुत कला से सरल बना देतीं. कला संकाय की लड़कियों में शायद इसी कारण इकोनौमिक्स लेने की होड़ लगी रहती थी. हर साल इस विषय की टौपर हमारे कालेज की ही छात्रा होती थी.


मैं तब भी रंभा दी के विगत जीवन की तुलना वर्तमान से करती तो हैरान हो जाती कि कितना प्यार, तालमेल है उन के परिवार में. अगर रंभा दी किसी काम के लिए बस नजर उठा कर आशुतोषजी की तरफ देखतीं तो वे उन की बात समझ कर जब तक नजर घुमाते साहिल उसे करने को दौड़ता. तब तक तो सलोनी उस काम को कर चुकी होती.


दोनों बच्चे रूपरंग में मां पर गए थे. सलोनी थोड़ी सांवली थी, लेकिन तीखे नैननक्श और छरहरी काया के कारण बहुत आकर्षक लगती थी. वह एम.एससी. की परीक्षा दे चुकी थी. साहिल एम.बी.ए. कर के बैंगलुरु में एक अच्छी फर्म में मैनेजर के पद पर नियुक्त था. उस ने एक सिंधी लड़की को पसंद किया था. मातापिता की मंजूरी उसे मिल चुकी थी मगर वह सलोनी की शादी के बाद अपनी शादी करना चाहता था.


लेकिन सलोनी शादी के नाम से ही बिदक जाती थी. शायद अपनी मां के शुरुआती वैवाहिक जीवन के कारण उस का शादी से मन उचट गया था.


फिर एक दिन रंभा दी ने ही समझाया, ‘‘बेटी, शादी में कोई शर्त नहीं होती. शादी एक ऐसा पवित्र बंधन है जिस में तुम जितना बंधोगी उतना मुक्त होती जाओगी… जितना झुकोगी उतना ऊपर उठती जाओगी. शुरू में हम दोनों अपनेअपने अहं के कारण अड़े रहे तो खुशियां हम से दूर रहीं. फिर जहां एक झुका दूसरे ने उसे थाम के उठा लिया, सिरमाथे पर बैठा लिया. बस शादी की सफलता की यही कुंजी है. जहां अहं की दीवार गिरी, प्रेम का सोता फूट पड़ता है.’’


धीरेधीरे सलोनी आश्वस्त हुई और आज 7 फेरे लेने जा रही थी. सुबह से रंभा दी का 4-5 बार फोन आ चुका था, ‘‘सुभि, देख न सलोनी तो पार्लर जाने को बिलकुल तैयार नहीं है. अरे, शादी है कोई वादविवाद प्रतियोगिता नहीं कि सलवारकमीज पहनी और स्टेज पर चढ़ गई. तू ही जरा जल्दी आ कर उस का हलका मेकअप कर दे.’’


5 बज गए थे. साहिल गेट के पास खड़ा हो कर सजावट वाले को कुछ निर्देश दे रहा था. जब से शादी तय हुई थी वह एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह घरबाहर दोनों के सारे काम संभाल रहा था. मुझे देख कर वह हंसता हुआ बोला, ‘‘शुक्र है मौसी आप आ गईं. मां अंदर बेचैन हुए जा रही हैं.’’


मैं हंसते हुए घर में दाखिल हुई. पूरा घर मेहमानों से भरा था. किसी रस्म की तैयारी चल रही थी. मुझे देखते ही रंभा दी तुरंत मेरे पास आ गईं. मैं ठगी सी उन्हें निहार रही थी. पीली बंधेज की साड़ी, पूरे हाथों में लाल चूडि़यां, पैरों में आलता, कानों में झुमके, गले में लटकी चेन और मांग में सिंदूर. मैं तो उन्हें पहचान ही नहीं पाई.


‘‘रंभा दी, कहीं समधी तुम्हारे साथ ही फेरे लेने की जिद न कर बैठें,’’ मैं ने छेड़ा.


‘‘आशुतोषजी पीली धोती में मंडप में बैठे कुछ कर रहे थे. यह सुन कर ठठा कर हंस पड़े. फिर रंभा दी की तरफ प्यार से देखते हुए कहा, ‘‘आज कहीं, बेटी और बीवी दोनों को विदा न करना पड़ जाए.’’


रंभा दीदी शर्म से लाल हो गईं. मुझे खींचते हुए सलोनी के कमरे में ले गईं. शाम कोजब सलोनी सजधज कर तैयार हुई तो मांबाप, भाई सब उसे निहार कर निहाल हो गए. रंभा दी ने उसे सीने से लगा लिया. मैं ने सलोनी को चेताया, ‘‘खबरदार जो 1 भी आंसू टपकाया वरना मेरी सारी मेहनत बेकार हो जाएगी.’’


सलोनी धीमे से हंस दी. लेकिन आंखों ने मोती बिखेर ही दिए. रंभा दी ने हौले से उसे अपने आंचल में समेट लिया.


स्टेज पर पूरे परिवार का ग्रुप फोटो लिया जा रहा था. रंभा दी के परिवार की 4 मनकों की माला में आज दामाद के रूप में 1 और मनका जुड़ गया था.


उन लोगों को देख कर मुझे एक बार रंभा दी की कही बात याद आ गई. कालेज के सालाना जलसे में समाज में बढ़ रही तलाक की घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था कि प्रेम का धागा मत तोड़ो, अगर टूटे तो फिर से जोड़ो

आज उन्हें और उन के परिवार को देख कर यह बात सिद्ध भी हो रही थी. रंभा दी के प्रेम का धागा एक बार टूटने के बावजूद फिर जुड़ा और इतनी दृढ़ता से जुड़ा कि गांठ की बात तो दूर उस की कोई निशानी भी शेष नहीं है. उन के सच्चे, निष्कपट प्यार की ऊष्मा में इतनी ऊर्जा थी जिस ने सभी गांठों को पिघला कर धागे को और चिकना और सुदृढ़ कर दिया.


Wednesday, 4 December 2024

शादी होती है तो संभोग होना लाज़मी है,

 शादी होती है तो संभोग होना लाज़मी है, एक लड़का शादी करता है तो उसके पीछे मुख्य कारण लड़की का शरीर है, लेकिन अगर गहराई से समझा जाए तो ऐसा नहीं है बात इससे कहीं ज्यादा बड़ी है 

मेरी शादी को छह साल हो गए थे। मेरे पति, राकेश, एक साधारण आदमी थे। बैंक में नौकरी करते थे और बस, उनकी दुनिया मेरे और हमारे छोटे से घर तक ही सीमित थी।, न कोई बड़े-बड़े सपने दिखाते थे। उनकी बातें, उनकी आदतें, सब मुझे साधारण लगती थीं। मैं अक्सर सोचती, "काश मेरी शादी किसी और से हुई होती, जो ज्यादा रोमांचक होता, मेरे लिए कुछ अलग करता।"


मेरे करीब तभी आते थे जब उन्हें शारीरिक संतुष्टि चाहिए होती थी और यही से मेरे मन में ये बात घर कर गई कि लडको को सिर्फ इस ही चीज से मतलब है 


मुझे कभी उनकी कद्र ही नहीं हुई। छोटी-छोटी बातों पर मैं उन्हें टोक देती। कभी कपड़े सही से नहीं पहने, कभी दाल में नमक ज्यादा डाल दिया, तो कभी बच्चों के होमवर्क में मदद करते-करते थक जाते। मुझे उनकी ये मुझे ये सब कभी अच्छी नहीं लगी।


मुझे इस बात से नफरत होती थी जब मैं बाहर माडर्न कपड़े पहन कर जाती और वो बोलते बाहर निकलने से पहले ध्यान दिया करो क्या पहनना है क्या नहीं

पर मैं बेपरवाह उनकी बात ध्यान नहीं देती थी


एक दिन राकेश जल्दी उठकर काम के लिए तैयार हो रहे थे। मैंने बिना देखे ही कहा, "ऑफिस के बाद सब्जी ले आना। हर बार भूल जाते हो।" उन्होंने सिर हिलाया और मुस्कुराते हुए बोले, "ठीक है।" वो दरवाजे से बाहर निकले और फिर... वो कभी वापस नहीं आए।


राकेश का ऑफिस जाते वक्त एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। जब पुलिस की गाड़ी मेरे घर के बाहर रुकी और उन्होंने खबर दी, तो जैसे मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।


चंद दिनों बाद मुझे पता चला कि राकेश ने हमारे नाम पर बीमा लिया था। एक करोड़ की रकम मेरे खाते में आ गई। रिश्तेदारों ने कहा, "बहुत अच्छा किया राकेश ने। देखो, तुम्हारे और बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर दिया।" मैं बस चुपचाप सुनती रही।


वो एक करोड़ रुपये मेरे सामने थे, लेकिन मेरे पास राकेश नहीं था। मैंने सोचा, इस पैसे से मैं क्या खरीद सकती हूं? उनके चाय बनाने का तरीका? उनका बच्चों के साथ खेलना? वो हर शाम मुझे दफ्तर से फोन कर कहना, "कुछ चाहिए क्या?"


आज राकेश नहीं है, और मैं खुद माडर्न कपड़े नहीं पहनती क्यों की पहले मै बेपरवाह थी क्यों की लोग गंदी नजरों से नहीं देखते थे क्यों की राकेश साथ रहते थे 

आज ऐसा करने से पहले 100 बार सोचना पड़ता है


अब सब कुछ वही था, लेकिन उनके बिना सब अधूरा। जब मैं सुबह उठती, तो उनकी आदत थी चाय बनाकर मेरे पास लाने की। अब चाय का कप खाली था। जब मैं गुस्से में होती, तो वो मजाक करके मेरा मूड हल्का कर देते। अब वो खामोशी थी जो मेरे दिल को हर दिन तोड़ती थी।


मुझे याद आता है, कैसे वो हर महीने सैलरी मिलते ही मेरे लिए चुपचाप मेरी पसंद की साड़ी खरीद लाते थे। मैं शिकायत करती, "जरूरत नहीं थी, पैसे बचाया करो।" और वो कहते, "तुम्हारी मुस्कान के लिए इतना खर्च कर सकता हूं।"


अब मुझे एहसास हुआ कि वो छोटे-छोटे पल ही असली खुशियां थे। वो 'साधारण' पल ही मेरी जिंदगी का आधार थे। जिन बातों को मैं नज़रअंदाज़ करती थी, वो ही मेरे जीवन का हिस्सा थीं।


जीवन का सबक


अब जब मैं अकेली हूं, तो हर पल राकेश को महसूस करती हूं। हर चीज, हर कोना उनकी याद दिलाता है। जो बातें पहले मुझे शिकायतें लगती थीं, आज वही मेरी सबसे कीमती यादें हैं।


पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है, लेकिन वो जो रिश्ता, जो प्यार, जो अपनापन राकेश ने मुझे दिया, उसे कोई नहीं खरीद सकता। अब मैं समझती हूं कि प्यार दिखावा नहीं, बल्कि छोटी-छोटी चीजों में छुपा होता है।


काश, मैंने उनकी कदर पहले की होती। काश, मैंने उनकी हर छोटी बात को समझा होता। पर अब सिर्फ यही सोचती हूं—उनकी कमी हर पल महसूस होती है।


आज मैं नई लड़कियों की पोस्ट और वीडियो देखती हूं उसपे वो पति की बुराई करती हैं, और ज्यादातर महिलाएं आज अपने पति से संतुष्ट नहीं है और रोज घर में किसी ना किसी बात को लेके क्लेश करती है 


बस एक बात बोलूंगी, एक बार आंख बंद कर के देखो और सोचो अगर तुम्हारा पति तुम्हारे साथ ना रहे तो तुम्हारी दुनिया कैसी रहेगी

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...