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Monday, 23 September 2024

समाज की नाक ऊंची रखने के लिए मुझे अपने प्यार को खोना पड़ा।

 मैंने दीप्ति के सारे कपड़े उतार दिए,पहली बार मुझे किसी लड़की के शरीर को महक इतनी ज्यादा अच्छी लग रही थी जिसके आगे सारे सेंट फेल थे


वो इस लिए, क्यों की मुझे उससे बहुत प्रेम था दीप्ति से मेरी मुलाकात मुंगेर में हुई थी, जब मैं बंगलोर में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर काम कर रहा था। एक दिन, जब मैं स्टेशन पर उतरा, मेरी ट्रॉली का व्हील टूट गया था। जैसे-तैसे मैं उसे उठा कर ले जा रहा था, तभी एक लड़की ने मेरी हालत देख कर कहा,


"भैया, दिक्कत हो रही है तो मैं उठा दूं।"


पहले तो मैंने मना कर दिया, लेकिन फिर सोचा कि इतनी सीढ़ियां चढ़नी हैं। शरमाते हुए मैंने कहा,


"एक तरफ से पकड़ लीजिए तो सीढ़ी चढ़ जाएंगे।"


उसने मदद की और हम सीढ़ियां चढ़ गए। बाहर निकलने पर मैंने शुक्रिया कहा और उसने मुस्कुरा कर कहा, "कोई बात नहीं भैया।" उस समय मुझे एहसास हुआ कि बड़े शहर के लोग मदद करते समय खुद को छोटा नहीं समझते, जबकि हमारे शहर के लोग अजनबियों की भी सहायता के लिए हाथ बढ़ाते हैं।


कुछ दिनों बाद, एक दुकान पर मुझे दीप्ति फिर से दिखी। हमने थोड़ी बात की और मुझे पता चला कि वह मेरे घर के पास वाले मुहल्ले में रहती है। हमने नंबर साझा किए और रात में मैंने उसे फोन किया। हमारी बातचीत में, दीप्ति ने बताया कि वह एक गरीब परिवार से है और अपने परिवार को सुविधाओं के अभाव में संभाल रही है। उसकी सादगी और संघर्ष ने मुझे प्रभावित किया और मुझे उससे प्रेम हो गया।


मैं बंगलोर वापस आया और रात में दीप्ति से बात करता तो मेरे मन को शांति मिलती। मैंने उसे अपने प्रेम के बारे में बताया और उसने भी सकारात्मक उत्तर दिया। हमारी बातचीत और प्यार गहरा हो गया। मैंने दीप्ति को बंगलोर आने का न्योता दिया और उसने इसे स्वीकार कर लिया।


तकरीबन तीन महीने बाद दीप्ति बंगलोर आई और मेरे घर रुकी। पहले दिन हमने बंगलोर की कई जगहें घूमीं और रात में घर आकर सो गए। सुबह जब मैं उठा तो देखा दीप्ति एक पत्नी की तरह मेरे लिए चाय और नाश्ता बना रही थी। इसे देख कर मुझे अजीब सी खुशी हुई। हमने साथ में नाश्ता किया और अपनी जिंदगी के बारे में बातें कीं।


अगले दिन फिर से हम घूमने निकले और शाम को दीप्ति ने कहा कि वह बाहर का खाना पसंद नहीं करती और घर पर खाना खाएंगे। उसने बिहारी अंदाज में दाल-चावल और भुजिया बनाया, जो बहुत स्वादिष्ट था। उसे देखकर मेरे दिल में उसके लिए इज्जत और प्यार और बढ़ गया।


रात में जब हम सोने जा रहे थे, हमने बातें की और मैंने दीप्ति के गालों को चूम लिया। दीप्ति थोड़ा असहज थी, लेकिन उसने मना नहीं किया। हमने एक-दूसरे के साथ समय बिताया और हमारे बीच पति-पत्नी जैसा संबंध बना।


दीप्ति को वापस जाना था और हम दोनों दुखी थे। मैंने अपनी मां को दीप्ति के बारे में बताया और शादी की इच्छा व्यक्त की। मां ने उसकी फोटो देखकर कहा कि वह एक डांसर है और लोगों की शादियों में नाचकर अपना खर्चा चलाती है। यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गया क्योंकि हमने कभी इस बारे में बात नहीं की थी।


मां-पापा ने दीप्ति से शादी करने से मना कर दिया और कहा कि अगर मैंने शादी की तो मुझे परिवार से रिश्ता तोड़ना पड़ेगा। मैंने कई बार समझाया लेकिन वे समाज के डर से राजी नहीं हुए।


आज इस बात को 5 साल हो गए हैं और मुझे किसी और लड़की से प्यार नहीं हुआ। दीप्ति ने भी मेरे लिए अपना काम छोड़ दिया था और अब उसे भी काम मिलने में दिक्कत हो रही है। मैंने कई बार उसे आर्थिक सहायता देने की कोशिश की, लेकिन उसने मना कर दिया।


आज, मैं खुद को और दीप्ति को इस स्थिति का दोषी मानता हूं। समाज की नाक ऊंची रखने के लिए मुझे अपने प्यार को खोना पड़ा।


Sunday, 22 September 2024

शादी का आधार संभोग होता है ये अच्छा तो सब अच्छा

 शादी का आधार संभोग होता है ये अच्छा तो सब अच्छा 

पर मॉर्डन जमाने में एक जरूरत और है वो है स्टेबल नौकरी पैसा और अच्छी लाइफस्टाइल 

जब मैं छोटी थी, तो मेरे ख्वाब बड़े थे। मुझे हमेशा लगता था कि मेरी शादी किसी अमीर और वेल-सेटल लड़के से होगी, जिसके पास बड़ी गाड़ी, शानदार घर, और बेहतरीन लाइफस्टाइल हो। मेरे पापा, मोहनलाल, हमेशा कहते थे कि पैसे में ही जिंदगी का सारा सुख नहीं होता, लेकिन मेरे लिए पैसा ही सब कुछ था। मुझे यकीन था कि अगर पैसा हो, तो सारी खुशियां अपने आप मिल जाती हैं।


फिर एक दिन, पापा ने मेरी शादी अर्जुन से तय कर दी। अर्जुन साधारण इंसान था, न उसके पास बड़ी गाड़ी थी, न ही महंगा घर। जब पापा ने यह रिश्ता तय किया, तो मुझे बहुत बुरा लगा। मुझे लगा कि मेरी पूरी जिंदगी के सपने बर्बाद हो गए हैं, और मैं कभी खुश नहीं रह पाऊंगी। 


शादी के बाद जब मैंने अर्जुन के साथ जीवन शुरू किया, तो उसका साधारण जीवन मुझे बहुत अखरता था। हर दिन मैं यह सोचती थी कि मेरी जिंदगी कैसी हो सकती थी, अगर मेरी शादी किसी अमीर व्यक्ति से हुई होती। अर्जुन बहुत ही साधारण था, लेकिन उसने कभी मुझे किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी। उसने हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रखा और मुझे सम्मान दिया। फिर भी, मैं उसकी इन अच्छाइयों पर ध्यान नहीं दे रही थी, क्योंकि मेरा ध्यान बस उन चीज़ों पर था जो मेरे पास नहीं थीं।


कुछ महीने बीतने के बाद, मैंने अर्जुन की सादगी और ईमानदारी की गहराई को समझना शुरू किया। उसने बिना किसी भव्यता के, मेरे प्रति जो प्यार और सम्मान दिखाया, वह मेरी जिंदगी में असली खुशी लेकर आया। धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि जो चीजें मैंने अर्जुन के बारे में पहले नजरअंदाज की थीं, वे ही मेरी सच्ची खुशी की कुंजी थीं। 

आज, मैं अपने जीवन को देखती हूँ और महसूस करती हूँ कि मेरे पास वह सब कुछ है जिसकी मुझे ज़रूरत है। अर्जुन ने मेरे दिल को प्यार और सम्मान से भर दिया, और अब मुझे समझ में आता है कि असली दौलत पैसों में नहीं, बल्कि सच्चे प्यार और समझ में है। 

जब मैंने यह बात अपने पापा को बताई, तो वह मुस्कुराए और बोले, "बेटी, एक साधारण व्यक्ति दिल से प्यार और सम्मान करता है, और यही जीवन का असली सुख है।" अब मैं समझ चुकी हूँ कि असली दौलत प्यार और सम्मान में है, और मैं खुद को दुनिया की सबसे खुशकिस्मत लड़की मानती हूँ।

जीवन पुनरुक्त नहीं होता।

 मैंने सुना है कि एक रात ऐसा हुआ, एक पति घर वापस लौटा थका—मादा यात्रा से। प्यासा था, थका था। आकर बिस्तर पर बैठ गया। उसने अपनी पत्नी से कहा कि पानी ले आ, मुझे बड़ी प्यास लगी है। पत्नी पानी लेकर आयी, लेकिन वह इतना थका—मादा था कि लेट गया, उसकी नींद लग गयी। तो पत्नी रातभर पानी का गिलास लिए खड़ी रही बिस्तर के पास। क्योंकि उठाए, तो ठीक नहीं, नींद टूटेगी। खुद सो जाए, तो ठीक नहीं, पता नहीं कब नींद टूटे और पानी की मांग उठे, क्योंकि पति प्यासा सो गया है। तो रातभर गिलास लिए खड़ी रही।


सुबह पति की आंख खुली, तो उसने कहा, पागल, तू सो गयी होती! उसने कहा, यह संभव न था। तुम्हें प्यास थी, तुम कभी भी उठ आते! तो तू उठा लेती, पति ने कहा। उसने कहा, वह भी मुझसे न हो सका, क्योंकि तुम थके भी थे और तुम्हें नींद भी आ गयी थी। तो यही उचित था कि तुम सोए रहो, मैं गिलास लिए खड़ी रहूं। जब नींद खुलेगी, पानी पी लोगे। नहीं नींद खुलेगी, तो कोई हर्जा नहीं, एक रात जागने से कुछ बिगड़ा तो नहीं जाता है।


यह बात पूरे गांव में फैल गयी। सम्राट ने गांव के उस पत्नी को बुलाकर बहुत हीरे—जवाहरातों से स्वागत किया। उसने कहा कि ऐसी प्रेम की धारा मेरी इस राजधानी में थोड़ी भी बहती है, तो हम अभी मर नहीं गए हैं; अभी हमारी संस्कृति का प्राण जीवित है, स्पंदित है।


पड़ोस की महिला इससे बड़ी ईर्ष्या से भर गयी कि यह भी कोई खास बात थी! एक रात गिलास हाथ में लिए खड़े रहे, इसके लिए लाखों रुपए के हीरे—जवाहरात दे दिए हैं! यह भी कोई बात है?


उसने अपने पति से कहा कि देखो जी, आज तुम थके—मांदे होकर लौटना। आते से ही बिस्तर पर बैठ जाना। पानी मांगना। मैं पानी लेकर आ जाऊंगी। लेकिन तुम आंख बंद करके सो जाना और मैं खड़ी रहूंगी रातभर। और सुबह जब तुम्हारी आंख खुले, तो तुम इस—इस तरह के वचन मुझसे बोलना, कि तू क्यों रातभर खड़ी रही? तू उठा लेती। मैं कहूंगी, कैसे उठा सकती थी? तुम थके —मांदे थे। कि तू सो जाती! तो मैं कहूंगी, कैसे सो जाती? तुम्हें प्यास लगी थीं। और इतने जोर से यह बात चाहिए कि पड़ोस में लोगों को पता चल जाए, सुनाई पड़ जाए। क्योंकि यह तो हद हो गयी! जरा रातभर... और किसको पक्का पता है कि खड़ी भी रही कि नहीं, क्योंकि रात सो ली हो, झपकी ले ली हो और फिर सुबह उठ आयी हो, और बात फैला दी हो! मगर हमें भी यह सम्राट से पुरस्कार लेना है।


पति सांझ थका—मादा वापस लौटा। लौटना पड़ा, जब पत्नी कहे, थके—मांदे लौटो, लौटना पड़ा। आते ही बिस्तर पर बैठा। कहा, प्यास लगी है। पत्नी पानी लेकर आयी। पति आंख बंद करके लेट गया। कोई नींद तो आई नहीं, लेकिन मजबूरी है। जब पत्नी कहती है, तो मानना पड़ेगा। और फिर लाखों—करोड़ों के हीरे—जवाहरात उसके मन को भी भा गए।


अब पत्नी ने सोचा कि बाकी दृश्य तो सुबह ही होने वाला है। अब कोई रातभर बेकार खड़े रहने में भी क्या सार है? और किसको पता चलता है कि खड़े रहे कि नहीं खड़े रहे? वह भी सो गयी गिलास—विलास रखकर।


सुबह उठकर उसने जोर से बातचीत शुरू की कि पड़ोस जान ले। सम्राट के द्वार से उसके लिए भी बुलावा आया, तो बहुत प्रसन्न हुई। लेकिन जब दरबार में पहुंची, तो बड़ी हैरान हुई; सम्राट ने वहा कोड़े लिए हुए आदमी तैयार रखे थे, और उस पर कोड़ों की वर्षा करवा दी। वह चीखी—चिल्लाई कि यह क्या अन्याय है? एक को हीरे—जवाहरात; मुझे कोड़े? किया मैंने भी वही है!


सम्राट ने कहा, किया वही है, हुआ नहीं है। और होने का मूल्य है, करने का कोई मूल्य नहीं है। और जीवन में यह रोज होता है। अगर हृदय में स्पंदन न हो रहा हो, तो तुम कर सकते हो, लेकिन उस करने से क्या अर्थ है?


सारे मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे कर रहे हैं। धर्म क्रियाकांड है। हो नहीं रहा है। गीता पढ़ी जा रही है, की जा रही है; हो नहीं रही है। तुमने सुन लिया है कि गीता को पढ़ने वाले पाप से मुक्त हो गए, मोक्ष को उपलब्ध हो गए। तुमने सोचा, हम भी हो जाएं! तुमने भी पढ़ ली। लेकिन तुम्हारा पढ़ना उस दूसरी पत्नी जैसा है। तुम परमात्मा को धोखा न दे पाओगे। साधारण सम्राट भी धोखा न खा सका, वह भी समझ गया कि ऐसी घटनाएं रोज नहीं घटती। और पड़ोस में ही घट गई! और वही की वही घटी, बिलकुल वैसी ही घटी! यह तो कोई नाटक हुआ।


जीवन पुनरुक्त नहीं होता। हर भक्त ने परमात्मा की प्रार्थना अपने ढंग से की है, किसी और के ढंग से नहीं। हर प्रेमी ने प्रेम अपने ढंग से किया है। कोई मजनू और शीरी और फरिहाद, उनकी किताब रखकर और पन्ने पढ़—पढ़कर और कंठस्थ कर—करके प्रेम नहीं किया है।


कोई जीवन नाटक नहीं है कि उसमें पीछे प्राम्पटर खड़ा है, और वह कहे चले जा रहा है, अब यह कहो, अब यह कहो। जीवन जीवन है। तुम उसे पुनरुक्त करके खराब कर लोगे। गीता तुम हजार दफे पढ़ लो; लेकिन जैसे अर्जुन ने पूछा था, वैसी जिज्ञासा न होगी, वैसी प्राणपण से उठी हुई मुमुक्षा न होगी। तो जो कृष्ण को सरल हुआ कहना, जो अर्जुन को संभव हुआ समझना, वह तुम्हें न घट सकेगा।

दोहराया जा ही नहीं सकता जगत में कुछ। प्रत्येक घटना अनूठी है। इसलिए सभी रिचुअल, सभी क्रियाकाड धोखाधड़ी है, पाखंड है। तुम भूलकर भी किसी की पुनरुक्ति मत करना, क्योंकि वहीं धोखा आ जाता है और प्रामाणिकता खो जाती है।

प्रामाणिक के लिए मुक्ति है, पाखंड के लिए मुक्ति नहीं है। और तुम कितना ही लाख सिर पटको और कहो कि मैंने भी तो वैसा ही किया था, मैंने भी तो ठीक अक्षरश: पालन किया था नियम का, फिर यह अन्याय क्यों हो रहा है? अक्षरश: पालन का सवाल ही नहीं है। हृदय के साथ उठे स्वर। ....

पांच सालों के बाद भी मीरा प्रेग्नेंट नहीं हो पाई थी।

 पांच सालों के बाद भी मीरा प्रेग्नेंट नहीं हो पाई थी। आदित्य और मीरा ने बहुत से डॉक्टरों से सलाह ली, टेस्ट करवाए, लेकिन कोई भी इलाज सफल नहीं हुआ।


मीरा को बच्चे की बहुत चाह थी, और वह इस बात को लेकर अंदर ही अंदर टूट रही थी। वह देखती कि उसकी सहेलियों के बच्चे हो गए थे, और वे सभी अपनी मां बनने की खुशी में मग्न थीं। हर बार जब मीरा किसी गर्भवती महिला को देखती, उसकी आँखों में उदासी और निराशा घर कर जाती।


आदित्य, जो एक बेहद समझदार और धैर्यवान पति था, हमेशा मीरा को हिम्मत दिलाता रहता था। उसने कभी मीरा को इस बात के लिए दोषी नहीं ठहराया और उसे समझाया कि वे दोनों किसी और उपाय के बारे में सोच सकते हैं—जैसे कि सरोगेसी या गोद लेना। लेकिन मीरा को यह सब विकल्प सही नहीं लगते थे। वह खुद माँ बनना चाहती थी, वह अपने बच्चे को अपनी कोख में पालना चाहती थी।


एक दिन, मीरा के मन में एक अजीब ख्याल आया। उसने सोचा, "अगर आदित्य और मैं बच्चे के माता-पिता नहीं बन सकते, तो क्या आदित्य का कोई दोस्त मुझे प्रेग्नेंट कर सकता है?" यह ख्याल अजीब था, लेकिन मीरा को लगता था कि यह एकमात्र उपाय हो सकता है।


आदित्य का सबसे करीबी दोस्त राहुल था, जो उनके परिवार का हिस्सा जैसा था। राहुल की शादी नहीं हुई थी, और वह मीरा और आदित्य के साथ काफी वक्त बिताता था। मीरा को राहुल पर हमेशा भरोसा था और वह उसे अपना अच्छा दोस्त मानती थी। धीरे-धीरे, मीरा के मन में यह ख्याल पक्का होता गया कि अगर वह राहुल से इस बारे में बात करे, तो शायद राहुल उनकी मदद करने के लिए तैयार हो जाए।


लेकिन यह बात आसान नहीं थी। मीरा जानती थी कि यह निर्णय न सिर्फ उनके रिश्ते को, बल्कि आदित्य और राहुल की दोस्ती को भी प्रभावित कर सकता है।


मीरा ने कई दिनों तक इस ख्याल को अपने दिल में रखा, लेकिन उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि वह राहुल से यह बात कैसे कहे। वह एक शाम राहुल और आदित्य के साथ बैठी हुई थी, जब राहुल ने मजाक में कहा, "तुम दोनों के बच्चे कब आएंगे? मैं तो चाचा बनने के लिए तैयार बैठा हूँ।"


मीरा का दिल धड़क उठा। उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "शायद तुम्हें ही कुछ करना पड़े।"


राहुल ने इसे मजाक के रूप में लिया, लेकिन मीरा के मन में यह बात बहुत गंभीर थी। उसने सोचा कि अब समय आ गया है कि वह राहुल से इस बारे में खुलकर बात करे।


कुछ दिन बाद, जब आदित्य ऑफिस में था, मीरा ने राहुल को मिलने के लिए बुलाया। वह बेहद नर्वस थी, लेकिन उसने साहस जुटाया और अपनी बात कहनी शुरू की।


"राहुल, मुझे तुमसे एक बहुत ही व्यक्तिगत और गंभीर बात करनी है," मीरा ने कहा, उसकी आवाज़ कांप रही थी।


राहुल ने ध्यान से उसकी ओर देखा और गंभीरता से कहा, "क्या हुआ मीरा? तुम तो परेशान लग रही हो। बताओ, मैं तुम्हारी कैसे मदद कर सकता हूँ?"


मीरा ने गहरी सांस ली और कहा, "राहुल, मैं और आदित्य पांच साल से बच्चे की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मैं प्रेग्नेंट नहीं हो पा रही हूँ। हमने सारे मेडिकल विकल्प आजमा लिए, लेकिन कुछ भी काम नहीं आया।"


राहुल ने सहानुभूति से सिर हिलाया, "यह बहुत दुखद है, मीरा। लेकिन तुम मुझसे यह क्यों कह रही हो?"


मीरा ने हिचकिचाते हुए कहा, "राहुल, मैं तुमसे कुछ मांगना चाहती हूँ, लेकिन मुझे नहीं पता कि तुम इसे कैसे लोगे। मैं चाहती हूँ कि तुम मेरी मदद करो... मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे प्रेग्नेंट करने में मदद करो।"


राहुल चौंक गया और कुछ देर तक कुछ नहीं बोला। उसकी आँखों में आश्चर्य और उलझन साफ दिखाई दे रही थी। "मीरा, यह तुम क्या कह रही हो? तुम समझ रही हो कि यह कितना बड़ा कदम है?"


मीरा ने आँसू भरी आँखों से कहा, "मैं जानती हूँ, राहुल। लेकिन मुझे लगता है कि यह एकमात्र उपाय हो सकता है। आदित्य को हमसे बहुत उम्मीदें हैं, और मैं चाहती हूँ कि हम माता-पिता बनें। लेकिन मैं उसे धोखा नहीं देना चाहती। मैं चाहती हूँ कि यह सब उसकी जानकारी और सहमति से हो।"


राहुल के लिए यह स्थिति बेहद कठिन थी। वह आदित्य का सबसे अच्छा दोस्त था और वह कभी नहीं चाहता था कि उसके दोस्त की शादी या उसकी दोस्ती पर कोई आंच आए। उसने मीरा की आँखों में देखा और फिर गहरी सोच में डूब गया।


कुछ देर की चुप्पी के बाद, राहुल ने कहा, "मीरा, मैं समझता हूँ कि तुम किस दर्द से गुजर रही हो। लेकिन यह रास्ता सही नहीं है। यह न सिर्फ तुम्हारे और आदित्य के रिश्ते को प्रभावित करेगा, बल्कि हमारी दोस्ती को भी खत्म कर सकता है। इस तरह की चीज़ें बहुत जटिल होती हैं। अगर तुम और आदित्य चाहो, तो कोई दूसरा वैज्ञानिक या सामाजिक उपाय ढूंढ सकते हो।"


मीरा ने अपनी आँखों से आँसू पोंछते हुए राहुल की बातों को सुना। वह समझ गई कि जो ख्याल उसके मन में था, वह गलत था। राहुल की बातों ने उसे यह समझाया कि रिश्तों में कोई भी कदम उठाने से पहले उसकी नैतिकता और भावनात्मक परिणामों के बारे में सोचना जरूरी होता है।


नई दिशा:

राहुल के समझदारी भरे जवाब ने मीरा को अपनी गलती का एहसास कराया। उसने महसूस किया कि उसका यह कदम उनके रिश्तों को और ज्यादा उलझा सकता था।


जब आदित्य घर आया, मीरा ने उससे खुलकर बात की और अपनी भावनाओं और संघर्षों के बारे में बताया। आदित्य ने उसकी बातें ध्यान से सुनीं और उसे समझाया कि वे दोनों मिलकर इसका कोई और हल निकाल सकते हैं। दोनों ने एक साथ मिलकर गोद लेने के बारे में सोचा, और उन्होंने तय किया कि वे एक बच्चे को गोद लेंगे और उसे अपना सच्चा प्यार देंगे।


निष्कर्ष:

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में कोई भी निर्णय लेते समय उसके दीर्घकालिक परिणामों और रिश्तों पर पड़ने वाले प्रभावों को समझना जरूरी होता है। कठिन परिस्थितियों में भी नैतिकता और रिश्तों की गरिमा बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण होता है। प्यार और रिश्तों में मुश्किलें आ सकती हैं, लेकिन उनका समाधान सोच-समझकर और ईमानदारी से किया जाना चाहिए।

Saturday, 21 September 2024

ननंद उसी दिन अपने घर चली गई.

 शादी कीं पहली रात ही मेरी ननंद नें मेरे पति के बारे ऐसी बात बताई जिसे सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गये.


हम लोग उनके मुकाबले कुछ भी नहीं है. पिताजी के पुराने परिचित होने के वजह से मेरी शादी उस घर में हो गई. विदा होकर घर में जाते ही मुझे पता चला कीं वो लोग कितने बड़े है. घर बहुत बड़ा था. पहली बार था जब उनका घर मैंने देखा था. सबकुछ बहुत अच्छा था.रात को मेरी ननंद मुझे अकेले में लें गई. मेरे समझ नहीं आया मुझे लगा कुछ बात करना होंगी.


उनका चहेरा उतरा हुआ था, जैसे की कोई बात वो मुझसे करना चाहती हो. मैंने उन्हें पूछा क्या हुआ आप डरी हुई सी क्यों हो?


मेरी नंद बोली भाभी मैं आपको कुछ बताना चाहती हूं . लेकिन तुम यह सुनकर आप हिम्मत रखना. इस बात को हमारे बीच में ही रखना. यह बड़ा घर है यहाँ बात फ़ैलते ज्यादा समय नहीं लगता और वो बात सबके सामने आ गई तो हमारे घर कीं इज़्ज़त मिट्टी में मिल जायेगी.


अब आप इस घर की बहू हो और आपको इस घर का मान रखना होगा. उनकी बाते सुनकर में सच में थोड़ा डर गई. मुझे समझ नहीं आए रहा था की वो क्या बोलना चाह रही है.


मैंने कहां आप बताये मुझे क्या बात है? मेरी नंद बोली की भाभी मेरा भाई आपको कोई सुख नहीं दे सकता.उसमें कुछ शारीरिक कमियां है जो कि मुझे पता है .आपसे यह बात छुपा कर शादी की गई है.


मेरा भाई रात में अक्सर बाथरूम में ही रहता है. पता नहीं वहाँ क्या करता जब भी उसे पूछो तो यही कहता है कीं उसका पेट ख़राब है.

कमरे में जानें के पहले अपने पति के लिये यह बाते सुनकर मुझे समझ नहीं आ रहा था कीं में क्या करू. 

मेरी ननंद ने कहा कि आप उनसे कोई बात मत करना, थोड़ा समय उसके साथ बिताओ. फिर उनसे खुल कर बात करो. अगर हमसे कुछ हो सकता है तो हम जरूर करेंगे. हम तुम्हारे साथ है

आपको अकेला नहीं छोडेंगे. 


सुहागरात वाली रात यह सब सुनकर मैं अपने कमरे में जा रही थी. मुझे अब डर लगने लगा था.

यही सब सोच रही थी, की मेरे पति कमरे में आये. कमरे का दरवाजा बंद किया. और दरवाजे से ही पेट पर हाथ लगाते हुऐ आये बिस्तर पर मेरी तरफ पीठ करके बैठ गए, और बोले कीं उनका पेट ख़राब. कुछ ही सेकंड में वो उठकर बाथरूम में चले गये. बिलकुल वैसा ही हुआ जैसा कीं मेरी नंद नें मुझसे कहा था.


पेट ख़राब हो तो थोड़ी देर बाद वो बाथरूम से बाहर आ जाते लेकिन वो करीब 1 घंटे तक बाथरूम में ही रहें. मैं बाहर चुपचाप अपने बिस्तर पर बैठी रही.


उन्हें मैंने आवाज भी नहीं दी. बस यही सब सोचते सोचते मैं बिस्तर पर लेट गई. करीब 2 घंटे बाद वो बाथरूम से निकले.


मेरा अब उनसे बात करने का मन ही नहीं था. मुझे लगा की मेरे साथ धोखा किया गया. वो भी अपने बिस्तर कीं साइड पर जाकर सो गये.


सुबह तक मैं अपने आप को खुश किस्मत मान रही थी और रात होते होते अपनी किस्मत को कोसने लगी. सुबह में जल्दी उठी और बाथरूम में गई.


बाथरूम में जैसे ही गई मेरे होश उड़ गये क्यों कीं बाथरूम में एक नयी नाइटी थी. साथ ही मेकअप का समान. यह सब क्या था मुझे समझ नहीं आ रहा था.


एक ऐसे इंसान से मेरी शादी क्यों करवा दी. सुबह मेरी ननंद नें मुझसे पूछा क्या हुआ रात में. मैंने कहा वही जो आपने बताया था .यह कहकर मैं रोने लगी.


मेरी ननंद ने कहां मैं माँ से कह रही थी ऐसे किसी लड़की की ज़िन्दगी ख़राब मत करो, लेकिन किसी नें मेरी बात नहीं मानी. अब आप क्या ऐसे ही घुट घुट कर यहाँ रहेगी?


मेरी ननंद बोली की आप जो भी फैसला लेंगी मैं आपके साथ हूं लेकिन आपको यह वचन देना होगा की यह राज बाहर नहीं निकलेगा.


अगली रात फिर वो कमरे में आये. मुझे अब उनकी तरफ देखने का भी मन नहीं हो रहा था. मैं चुपचाप अपनी साइड पर सो गई,क्योंकी अब बात करने को रखा क्या था.


उन्होंने भी अभी तक कुछ बात नहीं की,उसकी वजह भी मैं जानती थी. थोड़ी देर वो बिस्तर पर बैठे रहें और फिर उठकर वो बाथरूम में चले गये. मैं समझ गई थी कीं वो क्या करने गये है. थोड़ी देर बाद बाथरूम से चीज़े गिरने की आवाज आने लगी, कुछ टूटने की. थोड़ी देर बाद आवाज रुकी और इस बार वो जल्दी ही बाथरूम से बाहर आ गये. आकर बिस्तर पर सो गये.


हमारे बीच कोई बात नहीं हो रही थी. मैं सोच रही थी की मैं क्या करूं?


यही सब सोचते सोचते नींद आ गई. सुबह जल्दी उठी और फिर में बाथरूम में गई. लेकिन इस बार बाथरूम में जब गई तो सब कुछ बिखरा हुआ था. नयी नाइटी को फाड़ दिया था, मेकअप का समान बिखरा हुआ था. बाथरूम में कचरे में एक कागज भी था, जिस पर लिखा था टू माय बूटीफुल वाइफ.


मेरे मन में अब शक आया की यह समान और कपडे कहीं मेरे लिये तो इन्होने नहीं रखें. लेकिन फिर मैंने सोचा की मेरी ननंद मुझसे झूठ क्यों बोलेगी. अभी मैंने उनसे कुछ बात नहीं की. 


सुबह मेरी ननंद फिर मुझसे सहानुभूति जता रही थी मुझे उनकी बातो से लगा की वो चाहती है की मैं इस घर को छोड़ कर इस घर से चली जाऊं. मुझे अब मेरी ननद पर शक हुआ.


मैंने घर की पुरानी नौकरानी से बात की. मैंने बातों बातों उससे पूछा की मेरे पति कैसे इंसान है? वो बोली की वो तो बहुत सीधे है. उनकी माँ और बहन तो चाहती थी की उनकी शादी उनकी बहन के पति के रिश्तेदार से हो. बहन और माँ ने तो बहुत कोशिश कीं लेकिन उनके पिताजी नहीं माने और उनके दोस्त की बेटी यानि आपसे शादी करवा दी. वो दोनों तो आपकी शादी के खिलाफ थे. कई दिनों तक घर में विवाद भी होता था.


अब मुझे अब पता चल गया था की मेरी ननंद मुझे क्यों भगाना चाहती थी. इसलिये उन्होंने मुझसे झूठ कहा था. उन्होंने शायद मेरे पति यानी कि अपने भाई से भी मेरे बारे में कुछ कहा होगा. 


रात को मैं अपने पति से बात करने का इंतजार कर रही थी. वो कमरे में आये. तो उनका मुँह तो उतरा हुआ था.


यह पहली बार था जब मैं उनसे बात करने वाली थी. उनके आते ही मैंने कहा, आप मुझसे कुछ बात करना चाहते है? 


वो बोले अब बात करने को रखा क्या है? पापा का विश्वास था की वो घर अच्छा है. इसलिये मैंने माँ और बहन की ना सुनकर तुमसे शादी की और तुमने सच छिपाया. 

मैंने बोला सच, कौन सा सच?


यह सच की तुम मुझसे शादी नहीं करना चाहती थी. तुम्हारी ज़िन्दगी में अभी भी कोई और है. 


यह बात तुमने ही तो मेरी बहन को बताई थी. घर की इज़्ज़त और पापा के कारण मैं चुप हूं. कुछ कदम नहीं उठा रहा. मैंने भी देख लिया कि तुम्हारे लिए मैं कितना मायने रखता हूं.


सुहागरात ज़िन्दगी में बहुत स्पेशल होती है. लेकिन मेंरे बाथरूम में 2 घंटे रहने पर भी तुम्हे फर्क नहीं पड़ा. बहन नें सही कहा था, की तुम आवाज़ भी नहीं दोगी, बात भी नहीं करोगी.


मैंने पूछा आपसे बाथरूम में रुकने को उन्होंने कहा था? उन्होंने बोला, हां उसने ही कहा था कि तुम्हारी सच्चाई देखनी है तो मुझे यह करना ही पड़ेगा? 


और वो कपडे और मेकअप? 


वो मेरी बहन नें रखा था, कहा था पहली रात का गिफ्ट है, तुम्हारे लिये . 


मैं उठकर उनके पास गई और उनसे कहा आपको पता है उन्होंने मुझे क्या कहा? 


फिर मैंने उन्हें सारी बात समझाई. हम दोनों को यह बात समझ में आ चुकी थी कि वह चाहती थी, हम दोनों में गलतफहमी हो और हम अलग हो जाये. ताकि वो जो चाहती है वो पूरा हो जाये.


सारी सच्चाई जानकर मेरे पति को बहुत गुस्सा आया, लेकिन मैंने कहा नहीं, अब हम इस बात को यही ख़तम करेंगे और किसी को कुछ नहीं कहेँगे. 


उस रात मेरी सारी परेशानी और ग़लतफहमी दूर हो गई. वो थी मेरी सही मायने में सुहागरात. 


अगली सुबह मेरी ननंद नें मुझसे पूछा की मेरा क्या फैसला है? मैं क्या करने वाली हूं? 


मैंने कहा की मैं इस घर की बहू बनकर सारी जिंदगी इस घर में रहना चाहती हूं, जिसे सुनकर मेरी ननंद हैरान हो गई.

मेरे चेहरे पर मुस्कान देखकर उनका चेहरा उतर गया और उन्हें समझ में आ गया कि हम दोनों को सारी सच्चाई पता चल चुकी है और हमारे बीच की सारी गलतफहमियां दूर हो गई है. ननंद उसी दिन अपने घर चली गई.


Thursday, 19 September 2024

माँ-बाप कभी अपने बच्चों पर बोझ नहीं बनते, पर बच्चे उन्हें बोझ मानने लगते हैं।

 पिताजी के अचानक घर आने पर पत्नी का चेहरा नाराजगी से भर गया।


"लगता है, बूढ़े को फिर से पैसों की जरूरत आ गई है। नहीं तो यहाँ कौन आने वाला था? खुद का पेट ठीक से भर नहीं पाते, और घरवालों का कैसे भरोगे?"


मैंने उसकी बातों को अनसुना करते हुए नजरें चुरा लीं और दूसरी ओर देखने लगा। पिताजी नल के पास खड़े होकर सफर की थकान मिटाने के लिए हाथ-मुँह धो रहे थे। इस बार हालात कुछ ज्यादा ही खराब थे। बड़े बेटे के जूते फट चुके थे, और वह हर रोज़ स्कूल जाते वक्त शिकायत करता था। पत्नी की दवाइयाँ भी पूरी नहीं खरीदी जा सकी थीं, और अब पिताजी भी आ गए थे, जिससे घर में एक अजीब सी चुप्पी छा गई थी।


खाना खत्म होने के बाद पिताजी ने मुझे अपने पास बुलाया। मन में सवाल उठने लगे कि कहीं वह किसी आर्थिक समस्या को लेकर तो नहीं आए। पिताजी ने कुर्सी पर आराम से बैठते हुए कहा, “सुनो बेटा, खेतों में काम बहुत बढ़ गया है, और मुझे रात की गाड़ी से वापस जाना है। तीन महीने हो गए, तुम्हारी कोई चिट्ठी नहीं आई। जब तुम परेशान होते हो, तब हमेशा ऐसा ही होता है।”


इसके बाद उन्होंने अपनी जेब से सौ-सौ के पचास नोट निकाले और मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले, "रख लो, काम आएंगे। धान की फसल इस बार अच्छी हुई है। घर में सब सही है। तुम बहुत कमजोर लग रहे हो, अपना ध्यान रखो और बहू का भी ख्याल रखना।”


मेरी आवाज जैसे गले में अटक गई। कुछ कहने से पहले ही पिताजी ने हंसते हुए कहा, "क्या हुआ, बड़े हो गए हो क्या?"


“नहीं तो,” मैंने धीरे से कहा और हाथ आगे बढ़ा दिया। पिताजी ने वह पैसे मेरी हथेली पर रख दिए।


कई साल पहले, पिताजी मुझे स्कूल भेजने से पहले इसी तरह मेरी हथेली पर चुपचाप पैसे रख दिया करते थे। पर उस वक्त मेरी नजरें झुकी नहीं होती थीं, जैसे आज हैं।


दोस्तों, एक बात हमेशा याद रखिए... माँ-बाप कभी अपने बच्चों पर बोझ नहीं बनते, पर बच्चे उन्हें बोझ मानने लगते हैं।

जीवन में कठिन परिस्थितियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, मेहनत, विश्वास और सही सोच से सबकुछ हासिल किया जा सकता है

 सरला एक विधवा महिला थी, और उसकी एक प्यारी बेटी कविता थी। कविता के पिता, रघुवीर, का दो साल पहले अचानक निधन हो गया था। रघुवीर ने अपनी बेटी की पढ़ाई के लिए काफी कर्ज लिया था, ताकि वह अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सके। लेकिन उनकी असामयिक मृत्यु के बाद सरला और कविता पर घर चलाने के साथ-साथ उस कर्ज को चुकाने का भारी बोझ आ गया।


सरला: "बेटी, अब क्या होगा? हम कैसे कर्जा चुकाएंगे और अपना पेट कैसे पालेंगे?"


कविता: "माँ, तुम चिंता मत करो। मैंने एमबीए किया है। मुझे किसी कंपनी में नौकरी मिल जाएगी, और फिर हम बैंक से लोन लेकर सारा कर्ज चुका देंगे।"


कविता दिन-रात नौकरी ढूंढती रही, लेकिन उसे कहीं भी नौकरी नहीं मिली। एक दिन जब वह घर लौटी, तो उसने देखा कि एक आदमी उसकी माँ से लड़ रहा था। कविता को देखते ही वह आदमी घर से बाहर चला गया।


कविता: "माँ, ये कौन था और तुमसे क्या कह रहा था?"


सरला: "बेटी, यही आदमी है, जिससे तेरे पापा ने उधार लिया था। अब ये धमकी दे रहा है कि अगर हमने पैसे नहीं चुकाए, तो यह हमारे मकान पर कब्जा कर लेगा।"


कविता: "माँ, तुम चिंता मत करो। हम अब नौकरी के भरोसे नहीं बैठ सकते। मैंने काफी कोशिश की, लेकिन नौकरी नहीं मिली। अब मैंने बिजनेस करने का सोचा है।"


सरला: "बेटी, जब खाने के लिए भी पैसे नहीं हैं, तो बिना पैसों के बिजनेस कैसे करोगी?"


कविता: "माँ, तुम बस मुझ पर भरोसा रखो। सब हो जाएगा। बस एक बार मुझे करने दो।"


अगले दिन, कविता दोपहर में एक हाथ ठेला लेकर घर आई।


सरला: "ये क्या है? इसे क्यों लाईं?"


कविता: "माँ, इसी ठेले से हम अपना बिजनेस शुरू करेंगे।"


सरला: "लेकिन, तुम करोगी क्या?"


कविता: "माँ, तुम्हें तो पता है कि मुझे कुकिंग का कितना शौक है। मैंने एमबीए भी किया है, तो बिजनेस की समझ भी है। हम दोनों मिलकर टिक्की और चाट का ठेला लगाएंगे। मैंने एक दुकान वाले से बात की है, जो पापा को अच्छे से जानता था। वह हमें एक महीने के लिए सामान उधार देगा। बाद में हम उसे पैसे चुका देंगे।"


सरला: "मैंने और तेरे पापा ने तुझे इसी दिन के लिए पढ़ाया था कि तू बाजार में ठेली लगाए? समाज में हमारी इज्जत धूल में मिल जाएगी। यह सब बंद कर और कोई छोटी-मोटी नौकरी कर ले। मैं यह नहीं करने दूंगी।"


कविता: "माँ, मेरी पढ़ाई बेकार नहीं जाएगी। उसी पढ़ाई के दम पर मैं एक बिजनेस खड़ा करूंगी और दूसरों को नौकरी दूंगी। मुझे बस एक साल यह करने दो, अगर यह नहीं चला, तो मैं नौकरी कर लूंगी।"


सरला: "नहीं, मैं तुझे यह सब नहीं करने दूंगी।"


कविता: "माँ, मुझ पर भरोसा करो। आपको पापा की कसम है।"


आखिरकार, सरला मान गई और एक शर्त रखी कि अगर एक साल बाद बिजनेस नहीं चला, तो कविता को नौकरी करनी पड़ेगी। अगले दिन से सरला और कविता ने मिलकर टिक्की बेचने का काम शुरू किया।


संघर्ष की शुरुआत:

पहले दिन बहुत कम टिक्की बिकीं, और काफी सामान खराब होकर फेंकना पड़ा। अगले दिन भी ज्यादा कमाई नहीं हुई।


सरला: "मैंने पहले ही कहा था कि यह नहीं चलेगा।"


कविता: "माँ, देखती जाओ। मैं कुछ नया करके दिखाऊंगी।"


अगले दिन कविता ने ठेले पर एक बड़ा बैनर लगवाया, जिस पर लिखा था—'एमबीए टिक्की वाली: एक टिक्की के साथ एक फ्री'।


सरला: "अरे, इससे तो बहुत नुकसान हो जाएगा।"


कविता: "नहीं माँ, यह बिजनेस का एक तरीका है। पहले हम लोगों को फ्री देंगे, जिससे वे हमारे स्वाद को पसंद करेंगे। बाद में, यह स्कीम बंद कर देंगे और तब तक लोग हमारे ग्राहक बन जाएंगे। वैसे भी, जो सामान बचता है, वह फेंक ही देते हैं।"


कुछ दिनों के भीतर, कविता की टिक्कियां मशहूर हो गईं। लोग फ्री वाली स्कीम के बाद भी उसकी टिक्कियों के दीवाने हो गए और रोज़ ठेले पर लाइन लगने लगी।


मुसीबत का सामना:

एक दिन, जब सरला और कविता टिक्कियां बना रही थीं, वही आदमी फिर से आ धमका।


आदमी: "तुम यहां मजे से दुकान चला रही हो, और मेरे पैसे देने का नाम नहीं ले रही हो?"


सरला: "आप नाराज मत होइए। हम धीरे-धीरे पैसे इकट्ठे कर रहे हैं और जल्द ही आपका कर्ज चुका देंगे। थोड़ा समय दीजिए।"


आदमी: "कल तक मेरे पैसे नहीं मिले, तो मैं ठेला फेंक दूंगा।"


तभी एक नौजवान लड़का, राहुल, वहां आया और बोला—


राहुल: "माँजी, ये आदमी आपको क्यों परेशान कर रहा है?"


आदमी: "तुझे क्या मतलब? चल भाग यहां से।"


राहुल: "माँजी, क्या बात है?"


सरला ने राहुल को सारी बात बताई।


राहुल: "देखो, कल तक पैसे तैयार रहेंगे। इसके बाद अगर तुमने इन्हें फिर से तंग किया, तो मैं तुम्हें पुलिस के हवाले करवा दूंगा।"


आदमी ने धमकी दी, "कल मेरे पैसे तैयार रखना, वरना अंजाम बुरा होगा।" कहकर वह चला गया।


सरला चिंता में डूब गई।


सरला: "बेटा, कल कहां से पैसे आएंगे?"


राहुल: "माँजी, चिंता मत करो। मैं आपके कर्ज का भुगतान करूंगा, और इसके साथ ही मैं आपके बिजनेस में भी पैसा लगाऊंगा।"


राहुल ने सारा कर्ज चुका दिया और कविता के बिजनेस में भी पैसा लगाना शुरू कर दिया। उसकी मदद से कविता ने पूरे शहर में टिक्की की छोटी-छोटी दुकानों की श्रृंखला शुरू कर दी। कुछ ही समय में उनका बिजनेस तेजी से बढ़ने लगा और उन्हें बहुत मुनाफा हुआ।


नई शुरुआत:

समय के साथ, सरला और कविता का बिजनेस बहुत सफल हो गया। राहुल की मदद से उन्होंने अपने सपने को साकार किया। एक दिन सरला ने राहुल से बात की और उसे अपनी बेटी के लिए सबसे अच्छा जीवन साथी माना।

जल्द ही, सरला ने राहुल और कविता की शादी करा दी। दोनों ने मिलकर अपने टिक्की बिजनेस को और भी ऊँचाइयों तक पहुंचाया, और वे शहर के मशहूर उद्यमी बन गए।

निष्कर्ष:

यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में कठिन परिस्थितियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, मेहनत, विश्वास और सही सोच से सबकुछ हासिल किया जा सकता है। कविता ने अपने पिता के कर्ज को चुकाने और समाज की बाधाओं के बावजूद सफलता हासिल की। उसने साबित कर दिया कि सही दृष्टिकोण से किसी भी सपने को साकार किया जा सकता है।

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