sunilrathod

Friday, 30 August 2024

संस्कार.परिवार.प्रेम.जीवन

 शादी के कुछ महीने बाद, मैं यह सोचता था कि अगर मैं अपनी पत्नी की सभी ज़रूरतें पूरी कर दूं, तो ज़िन्दगी में कोई परेशानी नहीं आएगी। मेरे खुद के व्यापार के चलते, मुझे एक ऐसी लड़की चाहिए थी जो स्मार्ट हो, मेरे काम में मेरा हाथ बंटा सके, और समाज में अच्छी तरह से मिलजुल सके। अंजली से मेरी शादी हुई, जो खूबसूरती और दिमाग, दोनों में बेमिसाल थी।


शुरुआत के तीन महीने शानदार थे। हमारे बीच जिस्मानी रिश्ते बहुत अच्छे थे, और मुझे लगा कि मैंने सही जीवनसाथी चुना है। मुझे विश्वास था कि एक सफल शादी के लिए शारीरिक सुख सबसे महत्वपूर्ण है। लेकिन धीरे-धीरे, सेक्स से भी मन हटने लगा और व्यापार के दबाव के कारण इस ओर ध्यान देने का समय भी कम हो गया।


लेकिन असली समस्या तब शुरू हुई जब अंजली ने मुझसे कहा कि वह अपने माता-पिता से अलग एक फ्लैट में रहना चाहती है। मैंने चौंकते हुए पूछा, "क्यों? ऐसा क्या दिक्कत है यहाँ?"


अंजली ने जवाब दिया, "मुझे प्राइवेसी चाहिए। मम्मी-पापा के साथ रहते हुए वो संभव नहीं है।" मैंने कहा, "लेकिन अपना घर है, अपना कमरा है। जैसा मन करो, वैसे रहो।"


उसने बताया, "तुम्हें शायद यह आसान लगता है, लेकिन मुझे दिनभर सलवार-सूट में रहना पड़ता है, जबकि मैं शर्ट्स और टी-शर्ट में ज्यादा कंफर्टेबल महसूस करती हूँ। मायके में पापा के सामने भी निक्कर और टी-शर्ट पहन सकती हूँ, लेकिन यहाँ मर्यादा का ख्याल रखना पड़ता है।"


मैंने सोचा, "बात तो सही कह रही है।" फिर मैंने मां-पापा से इस बारे में बात की। पापा को कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन मां ने साफ मना कर दिया। उनका कहना था कि बहू को उनके हिसाब से रहना होगा।


मैं दुविधा में पड़ गया—एक ओर मां, जिन्होंने मुझे जन्म दिया, और दूसरी ओर पत्नी, जिसके साथ पूरी ज़िन्दगी गुजारनी है। शादी को केवल आठ महीने हुए थे और अब यह सवाल उठने लगा था कि किसके साथ खड़ा रहूं।


इसी दौरान, मैंने एक दिन अंजली के फोन पर इंस्टाग्राम खोला और देखा कि वह रील्स देख रही थी। एक रील में बताया जा रहा था कि कैसे माता-पिता से अलग रहने से शादीशुदा जिंदगी बेहतर होती है। दूसरी रील में सास-ससुर के साथ रहने से महिलाओं की आजादी पर असर पड़ने की बात कही गई थी। मैंने तुरंत समझ लिया कि असली समस्या "प्राइवेसी" नहीं, बल्कि ये सोशल मीडिया क्रिएटर्स हैं जो ऐसे विचार फैला रहे हैं।


मैंने सोचा, भले ही ये बातें सही लग सकती हैं, लेकिन हमारे संस्कार और परिवार का महत्व इससे कहीं अधिक है। मैंने तय किया कि किसी भी कीमत पर मां-पापा को नहीं छोड़ूंगा। बल्कि अंजली को इस सोशल मीडिया के प्रभाव से दूर करना ज्यादा जरूरी है।


उस दिन के बाद से, मैंने अंजली को ऑफिस में अपने साथ लाना शुरू किया। जब भी वह रील देखती, मैं उसे कोई काम दे देता। ऑफिस में आए बड़े डॉक्टरों ने भी उसे बताया कि रील्स देखने से होने वाले नुकसान क्या-क्या हो सकते हैं। धीरे-धीरे, अंजली ने रील्स देखना बंद कर दिया और "अलग घर" या "प्राइवेसी" की बातें भी खत्म हो गईं। 😊


अब जब कभी मैं उसे छेड़ता हूँ और कहता हूँ, "चलो, अलग घर ले लेते हैं, ताकि तुम आराम से छोटे कपड़े पहन सको," तो वह मुझे आंखें दिखाने लगती है। 😜


दोस्तों, यह समस्या सिर्फ मेरे घर में नहीं, बल्कि कई घरों में है। एक बार जरूर सोचिए कि यह मोबाइल और सोशल मीडिया अनजाने में हमारे परिवार और संस्कारों को तोड़ने का काम कर रहा है। ❤️


#संस्कार #परिवार #प्रेम #जीवन

वह पुरुष जो सचमुच तुमसे प्यार करता हैं

 #प्रेम_का_अंत


वह पुरुष जो सचमुच तुमसे प्यार करता हैं 

तुम्हें छोड़कर जानें का फैसला एक पल में नहीं करता, महीनों-सालो वह ख़ुद को समझाता हैं..

वह तुम्हारे याद में महिनों-सालों और बरसों तक

चेतना-शुन्य हों जाता हैं..


तुम्हें पाने के लिए वह इंतज़ार करता हैं की तुम कभी-न-कभी आओगी

पर उसका इंतज़ार तो एक कहानी 

बनकर रह जाता हैं..

कुछ पुरुष ख़ुद को सम्भलना और समझना सीख जाते है, सीख जाते हैं जीवन जिना..वह जानते है मेरे बुढे मां-बाप का सहारा मै ही हूं..


पर इन सब के बिच कुछ होते हैं ऐसे पुरुष जिन्हें तुम्हें पाना ही उनका आख़िरी मक़सद है 

अगर तुम मिल जाओ तो उनके लिए एवरेस्ट फतह होंगी...


तुम्हें उस दिन डरना चाहिए जिस दिन तुम्हारे प्रेम में पड़े 

किसी पुरुष को छोड़ कर हमेशा-हमेशा के लिए चली जाती हो..

ये वही पुरुष हैं जो तुमसे मिले प्रेम को अपने दिल में बसा लेते हैं ,और हमेशा-हमेशा के लिए दिल के दरवाज़े तुम्हारे लिए खुला रखतें हैं.. यह उसका अंतिम फैसला होता है , तुम्हें छोड़ कर जाने का, विद्रोही भीं नहीं होते, विद्रोह करने से पहले वह बार-बार तुम्हें एहसास कराते है कि' अब पहले जैसा प्रेम महसूस नहीं हो रहा हैं, प्रेम को कुछ वक्त दिया करो..


पर तुम उसे और उसकी बातों को लापरवाही से टाल देती हों, और एक दिन वह तमाम यादें और प्रेम समेट कर तुमसे दूर चला जाता है हमेशा-हमेशा के लिए..


तुम्हारे जिस प्रेम ने उसे कोमल और संतुलित बनाया था, तुम्हारा वही प्रेम उसे जीवन भर के लिए कठोर और निष्ठुर बना देता है..


हमेशा लापरवाह और अपनी मौज में रहने वाले पुरुष जो हमेशा उल्टी सीधी हरकते करते थे,

वो तुम्हारे प्रेम में आने के बाद बहुत बदल गये..


पर आज वही पुरुष जिसे तुमने छोड़ा है 

अपनी चाहतें अपना प्यार ,अपनी ख्वाहिशों की हत्या कर चुका है,जो वादा करता था अपने और तुम्हारे परिवार का हम सहारा बनेंगे 

आज बुढे मां बाप ख़ुद उसके सहारे बने हैं...


वह कभी बद्दुआ नहीं देता तुम्हें, पर वो मान लेता है की हमेशा-हमेशा के लिए तुम मर चुकी हो, हो चुका है अंत उसके प्यार का और बिना किसी से कहे, करवा लेता है अपना मुंडन, मिटा देता है दिल से हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारा नाम..


बस साथ रह जाती हैं कुछ यादें, जिसे महसूस करके हंसता या रो लेता है... ख़त्म हो जाती है उसकी दुनिया...जिसे वो दुनिया मान चुका था, 

वह वेवफा भी नहीं कह पाता है, क्योंकि तुम्हें अपना जो मान चुका था..❤️🥀

कौन सा पति खरीदूँ...

 *कौन सा पति खरीदूँ...?*

शहर के बाज़ार में एक बड़ी दुकान खुली जिस पर लिखा था - *“यहाँ आप पतियों को ख़रीद सकती है |”*

देखते ही देखते औरतों का एक हुजूम वहां जमा होने लगा. सभी दुकान में दाख़िल होने के लिए बेचैन थी, लंबी क़तारें लग गयी.दुकान के मैन गेट पर लिखा था -

*“पति ख़रीदने के लिए निम्न शर्ते लागू”* 👇👇👇

✡ *इस दुकान में कोई भी औरत सिर्फ एक बार ही दाख़िल हो सकती है, आधार कार्ड लाना आवश्यक है ...*

✡ *दुकान की 6 मंज़िले है, और प्रत्येक मंजिल पर पतियों के प्रकार के बारे में लिखा है....*

✡ *ख़रीदार औरत किसी भी मंजिल से अपना पति चुन सकती है....*

✡ *लेकिन एक बार ऊपर जाने के बाद दोबारा नीचे नहीं आ सकती, सिवाय बाहर जाने के...*

एक खुबसूरत लड़की को दूकान में दाख़िल होने का मौक़ा मिला...

*पहली मंजिल* के दरवाज़े पर लिखा था - *“इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है और नेक है."*लड़की आगे बढ़ी ..

*दूसरी मंजिल* 

पर लिखा था - *“इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है, नेक है और बच्चों को पसंद करते है.”*लड़की फिर आगे बढ़ी ...

*तीसरी मंजिल* के दरवाजे पर लिखा था - *“इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है, नेक है और खुबसूरत भी है.”*यह पढ़कर लड़की कुछ देर के लिए रुक गयी मगर यह सोचकर कि चलो ऊपर की मंजिल पर भी जाकर देखते है, वह आगे बढ़ी...

*चौथी मंजिल* के दरवाज़े पर लिखा था - *“इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है, नेक है, खुबसूरत भी है और घर के कामों में मदद भी करते है.”*

यह पढ़कर लड़की को चक्कर आने लगे और सोचने लगी *“क्या ऐसे पति अब भी इस दुनिया में होते है ?*

यहीं से एक पति ख़रीद लेती हूँ...लेकिन दिल ना माना तो एक और मंजिल ऊपर चली गयी...

*पांचवीं मंजिल* पर लिखा था - *“इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है , नेक है और खुबसूरत है , घर के कामों में मदद करते है और अपनी बीबियों से प्यार करते है.”*

अब इसकी अक़ल जवाब देने लगी वो सोचने लगी *इससे बेहतर और भला क्या हो सकता है ?* मगर फिर भी उसका दिल नहीं माना और आखरी मंजिल की तरफ क़दम बढाने लगी...

*आखरी मंजिल*

 के दरवाज़े पर लिखा था - *“आप इस मंजिल पर आने वाली 3339 वीं औरत है , इस मंजिल पर कोई भी पति नहीं है , ये मंजिल सिर्फ इसलिए बनाई गयी है ताकि इस बात का सबूत सुप्रीम कोर्ट को दिया जा सके कि महिलाओं को पूर्णत संतुष्ट करना नामुमकिन है.*

हमारे स्टोर पर आने का धन्यवाद ! बांयी ओर 8सीढियाँ है जो बाहर की तरफ जाती है !


*सांराश - आज समाज की सभी कन्याओं और वर पक्ष के माता पिता यह सब कर रहे है एवं 'अच्छा' और "अच्छा" ... के चक्कर में शादी की सही उम्र तो खत्म ही हो रही है...

🌷🙏

Thursday, 29 August 2024

सरकारी नौकरी** की चाहत ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी।

 **सेक्स एक औरत के शरीर को पूर्ण करता हैं** और सही उम्र में यदि संभोग ना हो तो एक औरत का शरीर उभर नहीं पाता। रति क्रिया के समय जब एक महिला संतुष्टि की प्राप्ति करती है, तब उसके शरीर में कुछ ऐसे **हार्मोन** बनते हैं जो मासिक धर्म की समस्या, चेहरे की चमक और उदर समस्या का समाधान करते हैं। 🌸


कॉलेज खत्म होने के बाद मेरी उम्र महज **23 साल** की थी। **पापा, चाचा** सभी मेरे लिए रिश्ता देख रहे थे। कई लड़कों के रिश्ते आते थे, पर किसी को सही नहीं समझा जाता था। कारण था **सरकारी नौकरी**। घर में **माँ** तरह-तरह के टोटके करती रहतीं कि मेरी शादी जल्दी हो जाए। एक दिन मैंने माँ से कहा, "माँ, इन टोटकों से क्या होगा? जहां शादी होनी होगी, वहीं हो जाएगी।" 😕


माँ ने जवाब दिया, "**तुम चुप रहो**। शादी-ब्याह अपने समय पर हो तो ठीक है।" मैं उनकी बात सुनकर हट गई।


तकरीबन **6 महीने** बाद एक लड़का मिला जो सरकारी विभाग में नौकरी करता था। उसकी उम्र **37 साल** थी, मुझसे तकरीबन **14 साल** बड़ा। सरकारी नौकरी देखकर **पापा-चाचा** ने हां कर दी, माँ ने भी हां कर दी। मुझसे पूछा भी नहीं गया कि क्या मुझे लड़का पसंद है या नहीं। 😔


फिर उनके घर वाले मेरे घर आए और मुझे देखकर पसंद कर लिया। मैंने उन्हें देखा, वो उम्र में काफी बड़े थे, पर इस बारे में कोई सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। हम दोनों को बात करने के लिए कमरे में छोड़ दिया गया, पर मेरे अंदर हिम्मत नहीं हो रही थी कि कुछ पूछूं। 🤐


जब सब चले गए, तो बहुत दबे मन से मैंने माँ से कहा कि ये उम्र में काफी बड़े हैं। माँ ने डांटकर बैठा दिया और बोली, **"इतना अंतर चलता है।"** माँ-पिता की मर्जी को मैं आशीर्वाद मानकर स्वीकार कर लिया, और हमारी शादी हो गई। 💍


**शादी की पहली रात** हम दोनों के बीच कुछ नहीं हुआ। मुझे लगा, शायद स्ट्रेस की वजह से है। धीरे-धीरे **2 हफ्ते** बीत गए। मैंने उनसे पूछा, "क्या मैं आपको पसंद नहीं हूं जो आप मेरे करीब नहीं आना चाहते?" उन्होंने हाथ पकड़कर कहा, **"ऐसा नहीं है।"**


फिर मौका देखकर मैं ही उनके करीब आई और जो एक लड़की का हक होता है, वो करने की कोशिश की। हम संभोग करने ही वाले थे कि तभी मेरे पति का सब कुछ हो गया। वो शर्मिंदा होकर कमरे से बाहर चले गए। मैंने उन्हें भरपूर समय दिया और एक हफ्ते बाद उनसे पूछा कि क्या इस समस्या के लिए डॉक्टर को दिखाया है। 😓


उन्होंने कहा, "**पिछले 2 साल से इलाज कर रहा हूँ, कोई फायदा नहीं हुआ।**" मेरा मन बैठ गया। एक स्त्री को जब संभोग सुख नहीं मिलता, तो वह पूर्ण महसूस नहीं कर पाती और ना ही वह माँ बन सकती। धीरे-धीरे हमारे बीच दूरी बढ़ने लगी। जब मैं डॉक्टर के पास गई, तो पता चला **अधिक उम्र** होने की वजह से नसें सूख चुकी हैं और इस उम्र में काम के प्रेशर से साथ लड़कों में कामेच्छा की कमी भी होने लगती है, जिसकी वजह से समस्या जल्दी ठीक नहीं होती। 🧑‍⚕️


मेरी उम्र **24 साल** थी, जहां मेरा शरीर संभोग सुख की डिमांड कर रहा था, और दूसरी तरफ **38 साल** के पति, जिनमें कामेच्छा मर सी गई थी। यह मेरे लिए जीते जी मरने के समान था। मेरे पति मुझे **शारीरिक सुख** नहीं दे सकते, पर इंसान अच्छे हैं। मैं भी उनसे प्रेम करती हूँ और वो भी मुझसे। ❤️


पर **सरकारी नौकरी** की चाहत ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी। मुझे लगता है, अगर अपने **हम उम्र** के लड़के के साथ शादी करती, भले ही वो कम पैसा कमाता, पर मुझे खुश रखता। आज स्थिति ऐसी है कि सारी सुख-सुविधाएं भी फीकी पड़ती जा रही हैं। 😔


मैं सभी लड़कियों के **माता-पिता** से कहना चाहूंगी कि सरकारी नौकरी की तलाश में अपने बच्चे की जिंदगी से खिलवाड़ मत कीजिए। जीवन में खुश रहने के लिए **पैसे** ही सबकुछ नहीं होते। सही समय पर, सही उम्र के लड़के के साथ शादी करें। 👰


आज के जमाने में **50 साल** के बूढ़े में भी 25 साल के लड़के जैसी ताकत नहीं रहती। आज तो लोग **30 में** ही बूढ़े हो रहे हैं। जीवन एक बार मिलता है, इसे अच्छे से जीएं और सही समय पर सही फैसले लें। 🌟

अर्जुन ने हमें सिखाया कि सच्ची खुशी और सुकून कहीं और नहीं, बल्कि अपने परिवार और अपनों के साथ ही मिलती है।

 मेरा मित्र, अर्जुन, जिसे मैंने पांच साल पहले आखिरी बार देखा था, अचानक दुबई चला गया था। उसकी जिंदगी का मकसद बड़ा स्पष्ट था—अपनी बहनों की शादियाँ करना, घर का कर्ज़ उतारना, और अपने बूढ़े माता-पिता की सेवा करना। हालांकि, हम फेसबुक पर अक्सर बात कर लिया करते थे, फिर भी जब वह पांच साल बाद लौटकर आया, तो उसकी आँखों में एक अलग ही गहराई दिखी। उसकी जिंदगी की कहानी कुछ ऐसी थी जिसे सुनकर हम सभी मित्र मंडली गहरी सोच में डूब गए।


एक दिन हम सभी दोस्तों ने मिलकर अर्जुन को घेरा और उससे पूछा, "और भाई, कैसी रही अरब की जिंदगी?"


अर्जुन ने गहरी सांस ली, जैसे एक लंबी कहानी कहने की तैयारी कर रहा हो। फिर उसने कहना शुरू किया:


"देखो, भाई, पाँच साल हो गए थे सऊदी में काम करते हुए। पहले साल की सारी कमाई तो कर्ज़ उतारने में चली गई। दूसरा साल बहनों की शादियों में खर्च हो गया। तुम जानते हो ना, परिवार की जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। तीसरे साल कुछ पैसे बचाने की सोची, लेकिन अब्बा की तबियत खराब हो गई। लौटने की हिम्मत नहीं हो रही थी, फिर अब्बा भी दुनिया से चले गए। चौथा साल अब्बा के इलाज और उनकी मौत के सदमे में निकल गया।"


हम सबके चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। अर्जुन ने कहानी को जारी रखते हुए कहा, "अम्मा बूढ़ी हो गई थीं, घर पर अकेली थीं, लेकिन मेरे पास कोई बचत नहीं थी। पांच साल सऊदी में बिताने के बाद भी, जब घर लौटने का समय आया, तो खाली हाथ लौटना पड़ा। अम्मा की जिद और बहनों की पुकार ने मेरी हिम्मत बढ़ाई, 'भाई, बस आ जाओ, हमें कुछ नहीं चाहिए।' सोचा, चलो अब यहां ही कुछ कर लेंगे।"


अर्जुन ने गहरी नजरों से हमारी तरफ देखा और फिर बोला, "जब घर लौटा, तो लगा कि ये पांच साल जैसे एक सपना था, एक ऐसा सपना जिसे पूरा करने की जद्दोजहद में सब कुछ दांव पर लग गया। अगले ही दिन बहनों से मिलने गया। पहली बहन के बच्चों के हाथ पर सौ रुपये रखकर आया, लेकिन जब दूसरी बहन के घर पहुंचा, तो पास में एक भी पैसा नहीं बचा था। सोचा, चलो ये तो अपनी है, समझ जाएगी। पर वह समझी नहीं। घर वापस आया तो अम्मा ने बताया कि बड़ी बहन का फोन आया था। उसने कहा, 'भाई पांच साल बाद सऊदी से आया था, बच्चों के हाथों पर सौ रुपये रखकर गया, इतना तो किसी फकीर को भी दे देते हैं।'"


अर्जुन की आवाज में दर्द साफ झलक रहा था। उसने आगे कहा, "दूसरी बहन बोली, 'भाई, पांच साल बाद सऊदी से आए और बच्चों के हाथ पर दस रुपये भी नहीं रखे। बच्चों ने कहा कि मामू आए थे, खाली हाथ। मेरी ससुराल में मेरी नाक कटवा दी।'"


हम सब सुनकर चुप हो गए। अर्जुन की आँखों में एक अजीब सी निराशा थी। उसने कहा, "मैं खड़ा था, और अपने पिछले पाँच सालों की कमाई का हिसाब लगा रहा था। ये सिर्फ मेरी कहानी नहीं है, भाई। हम में से कई लोग, जो पैसे कमाने के लिए घर से दूर जाते हैं, उनके साथ यही होता है। जब आप कमा रहे होते हैं, तो सब आपको सर पर उठाते हैं, लेकिन जब कभी कमाने का सिलसिला टूट जाता है, तो सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है। मान-सम्मान, रिश्ते, सब एक पल में धुंधले हो जाते हैं।"


अर्जुन की बात ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया। उसने हमें एक ऐसी सच्चाई दिखाई, जिसे हम शायद अपने आरामदायक जीवन में कभी समझ ही नहीं पाए थे। हमने अपने दोस्त के साथ वो समय बिताया, उसकी बातें सुनीं और महसूस किया कि जिंदगी में धन और दौलत से बढ़कर भी कुछ है—समय, प्रेम, और वो रिश्ते जिनकी कद्र शायद हम अक्सर भूल जाते हैं।


अर्जुन ने हमें सिखाया कि सच्ची खुशी और सुकून कहीं और नहीं, बल्कि अपने परिवार और अपनों के साथ ही मिलती है।

भाई सिर्फ नाम से नहीं, बल्कि दिल से भी होते हैं।

 शिवानी का रिजर्वेशन जिस बोगी में था, उसमें ज्यादातर लड़के ही थे। टॉयलेट जाने के बहाने शिवानी पूरी बोगी घूम आई थी, और उसे वहां मुश्किल से दो-तीन महिलाएं दिखीं। मन अनजाने भय से घबराने लगा।


यह पहली बार था जब शिवानी अकेली सफर कर रही थी, इसलिए वह पहले से ही चिंतित और डरी हुई थी। उसने खुद को सहज रखने की कोशिश करते हुए चुपचाप अपनी सीट पर बैठकर मैगज़ीन निकाल ली और पढ़ने लगी।


वहीं, पास के कुछ नवयुवक, जो शायद किसी कैम्प के लिए जा रहे थे, जोर-जोर से हंसी-मजाक और चुटकुले कर रहे थे। उनके शोर ने शिवानी की हिम्मत को और भी तोड़ दिया। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा, जैसे हर पल कुछ अनहोनी की आशंका हो।


शिवानी के मन में उठ रहे भय और घबराहट के बीच रात धीरे-धीरे उतरने लगी। अचानक सामने बैठे एक युवक ने कहा, "हेलो, मैं विनय हूँ, और आप?" शिवानी ने भय से कांपते हुए धीरे से कहा, "जी, मैं...," इससे पहले कि वह कुछ और कह पाती, विनय ने मुस्कुराते हुए कहा, "कोई बात नहीं, नाम बताने की ज़रूरत नहीं। वैसे, कहाँ जा रही हैं आप?"


शिवानी ने हिचकिचाते हुए कहा, "वाराणसी।"


विनय ने उत्साहित होकर कहा, "अरे वाह, वाराणसी तो मेरी मामी का घर है! इस रिश्ते से तो आप मेरी बहन हुईं, है न?" विनय की इस बात पर शिवानी थोड़ी हैरान हुई, लेकिन वह उसकी बातों में रुचि लेने लगी। विनय ने उसे वाराणसी की कई बातें बतानी शुरू कर दीं। उसने कहा कि उसके मामा एक प्रसिद्ध व्यक्ति हैं, और उसके मामा के बेटे सेना में उच्च पदों पर हैं। इन सब बातों ने शिवानी को कुछ हद तक आराम दिया, और वह धीरे-धीरे सामान्य हो गई।


शिवानी पूरी रात विनय से बातें करती रही। उसके साथ उसने अपना भय और अनिश्चितता भूलकर कुछ सुकून के पल बिताए। उसे लगा जैसे वह वास्तव में अपने भाई के साथ है। रात जैसे कुँवारी आई थी, वैसे ही पवित्र कुँवारी गुजर गई।


सुबह होते ही शिवानी ने विनय से कहा, "लीजिए, मेरा पता रख लीजिए। कभी वाराणसी आना हो, तो जरूर मिलने आइएगा।"


विनय ने हंसते हुए जवाब दिया, "बहन, सच कहूं तो मैंने कभी वाराणसी देखा ही नहीं है। मैंने सिर्फ आपको सहज महसूस कराने के लिए ये बातें गढ़ीं।"


शिवानी चौंक गई, "क्या? आपने तो कहा था कि..."


विनय ने उसकी बात काटते हुए कहा, "बहन, ऐसा नहीं है कि सभी लड़के बुरे होते हैं। हर किसी का इरादा खराब नहीं होता। हम में ही तो वे लोग होते हैं जो पिता, भाई और मित्र बनते हैं। यह समाज वैसा नहीं है जैसा हम अक्सर सोचते हैं।"


इतना कहकर विनय ने प्यार से शिवानी के सिर पर हाथ फेरा और मुस्कुराते हुए बोला, "अपना ख्याल रखना, बहन।"


शिवानी उसे देखती रही, जैसे कोई अपना भाई उससे विदा ले रहा हो। उसकी आंखें गीली हो चुकी थीं। वह सोच रही थी, काश, इस संसार में सभी ऐसे ही होते—न कोई अत्याचार, न कोई व्यभिचार। एक भयमुक्त समाज का स्वरूप, जहां हर बहन-बेटी खुली हवा में सांस ले सके, निर्भय होकर कहीं भी, कभी भी जा सके। जहां हर कोई एक-दूसरे का मददगार हो।


तभी एक रिक्शे वाले ने आवाज दी, "बहन, कहां चलना है?"


शिवानी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "कॉलेज तक, भाई। ले चलोगे?"


आज, वह डर नहीं रही थी। क्योंकि अब वह जान गई थी कि भाई सिर्फ नाम से नहीं, बल्कि दिल से भी होते हैं।

रिश्तों का महत्व समझें, उन्हें संजोएं,

 सुनैना एक प्रतिष्ठित बैंक में उच्च पद पर कार्यरत थी। शादी के बाद से वह अपने ससुराल में अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने और करियर के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी। घर में बस तीन लोग थे—सुनैना, उसके पति अनुराग, जो खुद का व्यापार करते थे, और उनके वृद्ध ससुर, श्री रमेश तिवारी। सुनैना की सास का देहांत एक साल पहले ही हो चुका था, और उसके बाद से ही घर का माहौल थोड़ा सा उदासीन हो गया था।


हर दिन, जब सुनैना सुबह जल्दी उठकर घर के काम निपटाकर ऑफिस के लिए तैयार होती, ठीक उसी समय उसके ससुर, जो अक्सर अपने कमरे में रहते थे, उसे बुलाते और कहते, "बहू, मेरा चश्मा साफ कर दो, और मुझे दे दो।" सुनैना को ऑफिस के लिए देर हो रही होती थी, और वह मन ही मन झुंझलाती, लेकिन ससुर की बात का मान रखते हुए चश्मा साफ कर देती थी। यह सिलसिला रोज़ का हो गया था, और सुनैना के लिए यह बात धीरे-धीरे असहनीय हो चली थी।


एक दिन, जब यह रोज़ की बात उसके सहनशक्ति की सीमा को पार करने लगी, तो उसने यह बात अपने पति अनुराग से साझा की। अनुराग को भी यह सुनकर आश्चर्य हुआ, क्योंकि उनके पिता ने कभी ऐसी आदत नहीं दिखाई थी। अनुराग ने सुनैना को सलाह दी, "तुम सुबह उठते ही पिताजी का चश्मा साफ करके उनके कमरे में रख दिया करो, शायद इससे उनका बार-बार बुलाना बंद हो जाए।"


सुनैना ने पति की सलाह मान ली और अगले दिन से हर सुबह सबसे पहले ससुर का चश्मा साफ कर उनके कमरे में रख आती। लेकिन ससुर के बुलाने का सिलसिला थमा नहीं। सुनैना के प्रयास के बावजूद, जब वह ऑफिस के लिए निकलने लगती, तो ससुर फिर से उसे चश्मा साफ करने के लिए बुला लेते। इस आदत से सुनैना और भी अधिक परेशान हो गई थी।


समय के साथ, सुनैना ने इस स्थिति को अनदेखा करना शुरू कर दिया। ससुर की आवाज़ अब उसके लिए कोई महत्व नहीं रखती थी, और वह अपने काम में मग्न रहती। धीरे-धीरे, रिश्तों में वह गर्माहट भी कम होने लगी थी। फिर एक दिन, ससुर अचानक बीमार हो गए और कुछ ही दिनों में चल बसे। सुनैना के दिल में कहीं न कहीं पछतावा था, लेकिन उसने खुद को व्यस्त रखकर उस दर्द को दबा दिया।


ससुर के देहांत के दो साल बाद, एक दिन सुनैना ने सोचा कि घर की सफाई की जाए। सफाई करते समय, उसे अपने ससुर की एक पुरानी डायरी मिली। सुनैना ने वह डायरी खोली और उसमें लिखे पन्ने पलटने लगी। एक पन्ने पर लिखा था:


"दिनांक 24-08-09... आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में बच्चे अक्सर घर से निकलते समय बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं। यही आशीर्वाद उनके जीवन की कठिनाइयों में ढाल बनता है। इसलिए, जब तुम चश्मा साफ कर मुझे देने के लिए झुकती थी, तो मैं मन ही मन तुम्हारे सिर पर अपना हाथ रखकर तुम्हें आशीर्वाद देता था। तुम्हारी सास ने मुझसे वादा लिया था कि मैं तुम्हें अपनी बेटी की तरह ही प्यार दूंगा और तुम्हें कभी महसूस नहीं होने दूंगा कि तुम अपने ससुराल में हो, बल्कि हमेशा ऐसा लगे कि यह तुम्हारा अपना घर है।"


डायरी के ये शब्द पढ़ते ही सुनैना की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने महसूस किया कि जिस आशीर्वाद को वह अनदेखा करती आई थी, वही उसकी असली ताकत थी। अपने ससुर के उस अनकहे प्यार और आशीर्वाद की गहराई को समझकर वह फूट-फूटकर रोने लगी।


आज भी, ससुर के जाने के वर्षों बाद, सुनैना रोज़ सुबह घर से निकलते समय उनका चश्मा साफ कर, उसी टेबल पर रख देती है। उसे यह यकीन है कि उसके ससुर की आत्मा कहीं न कहीं से उसे देख रही होगी और उसे अपने आशीर्वाद से सराबोर कर रही होगी।


इस घटना ने सुनैना को रिश्तों की असली महत्ता सिखाई। अब वह समझ गई थी कि रिश्ते शब्दों से नहीं, भावनाओं से सहेजे जाते हैं। वह जीवनभर उस आशीर्वाद को संजोकर रखेगी, जो ससुर के हाथों से उसे अनकहे मिलते रहे।


रिश्तों का महत्व समझें, उन्हें संजोएं, क्योंकि जब हम उन्हें खो देते हैं, तब उनकी कीमत का एहसास होता है।

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...