sunilrathod

Friday, 23 August 2024

क्योंकि मैं पुरुष हूँ

 मैं पुरुष हूँ।

मैं भी घुटता हूँ, पिसता हूँ, टूटता हूँ , बिखरता हूँ,

भीतर ही भीतर, रो नही पाता, कह नही पाता

पत्थर हो चुका, तरस जाता हूँ पिघलने को,

क्योंकि मैं पुरुष हूँ।

मैं भी सताया जाता हूँ, जला दिया जाता हूँ,

उस दहेज की आग में, जो कभी मांगा ही नही था।

स्वाह कर दिया जाता हैं मेरे उस मान-सम्मान का,

तिनका-तिनका कमाया था जिसे मैंने,

मगर आह नही भर सकता,

क्योकि मैं पुरुष हूँ।

मैं भी देता हूँ आहुति विवाह की अग्नि में अपने रिश्तों की,

हमेशा धकेल दिया जाता हूँ रिश्तों का वजन बांध कर,

जिम्मेदारियों के उस कुँए में जिसे भरा नही जा सकता मेरे अंत तक कभी।

कभी अपना दर्द बता नही सकता,

किसी भी तरह जता नही सकता,

बहुत मजबूत होने का ठप्पा लगाए जीता हूँ।

क्योंकि मैं पुरुष हूँ।

हाँ, मेरा भी होता है बलात्कार,

उठा दिए जाते है मुझ पर कई हाथ,

बिना वजह जाने, बिना बात की तह नापे,

लगा दिया जाता है सलाखों के पीछे कई धाराओं में,

क्योंकि मैं पुरुष हूँ।

सुना है, जब मन भरता है, तब आँखों से बहता है,

मर्द होकर रोता है, मर्द को दर्द कब होता है,

टूट जाता है तब मन से, आंखों का वो रिश्ता, 

तब हर कोई कहता है,

हर स्त्री स्वेत स्वर्ण नही होती,

न ही हर पुरुष स्याह कालिख,

मुझे सही गलत कहने वालों,

पहले मेरे हालात क्यों नही जांचते?

क्योंकि मैं पुरुष हूँ?


#पंडिताइन

जब और समर्थन का सही मेल होता है, तो किसी भी इंसान को बेहतर बनने से कोई नहीं रोक सकता।

 कहानी एक छोटे से गाँव की है, जहाँ अर्जुन नाम का एक युवक अपने आलस और निकम्मेपन के लिए पूरे गाँव में बदनाम था। अर्जुन की पत्नी, संगीता, गाँव में अपनी मेहनत और बुद्धिमानी के लिए जानी जाती थी। वह हर दिन सूरज की पहली किरण के साथ उठती, खेतों में काम करती, और फिर घर लौटकर परिवार की देखभाल में जुट जाती। दूसरी ओर, अर्जुन दिनभर इधर-उधर घूमता, सोता या दोस्तों के साथ खेल-कूद में अपना समय बिताता।


गाँव के लोग अर्जुन को अक्सर चिढ़ाते और उसे "निकम्मा अर्जुन" कहकर बुलाते थे। संगीता को अपने पति से बहुत प्यार था, लेकिन कभी-कभी उसकी बेपरवाह आदतों पर उसे गुस्सा भी आता था। उसने सोचा कि शायद अर्जुन को सही दिशा में प्रेरित किया जाए, तो वह भी अपनी जिम्मेदारियों को समझने लगेगा।


एक दिन, संगीता ने अर्जुन से गंभीरता से बात करने का फैसला किया। उसने कहा, "अर्जुन, तुम्हारा इस तरह बेकार बैठे रहना न तो हमारे परिवार के लिए अच्छा है और न ही तुम्हारे लिए। क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें कुछ करना चाहिए? तुम्हारी मेहनत से हमारी जिंदगी बेहतर हो सकती है।"


अर्जुन ने हँसते हुए कहा, "मेरे काम करने से क्या फायदा? तुम ही सब कुछ अच्छे से संभाल लेती हो। मुझे कुछ करने की क्या जरूरत है?"


संगीता ने गहरी सांस लेते हुए सोचा कि अगर अर्जुन को सही मौका और प्रेरणा मिले, तो शायद वह अपनी आदतें बदल सकता है। उसने एक योजना बनाई। अगले दिन, गाँव में एक बड़ा मेला लगना था। संगीता ने तय किया कि वह अर्जुन को उस मेले में ले जाएगी, ताकि वह गाँव के अन्य लोगों की मेहनत और सफलता को देख सके।


मेले में पहुँचते ही अर्जुन ने देखा कि गाँव के लोग अपनी मेहनत से कैसे तरक्की कर रहे हैं। किसी ने अपनी दुकान खोली थी, तो कोई खेती-बाड़ी में सफल हो रहा था। हर कोई अपने-अपने काम में लगा था और तरक्की कर रहा था। अर्जुन ने देखा कि उसके जैसे लोग, जो पहले कुछ नहीं करते थे, अब मेहनत करके अपनी जिंदगी को संवार रहे हैं।


मेले से वापस लौटते समय अर्जुन के मन में कुछ बदलने लगा। उसने देखा कि उसकी पत्नी संगीता कितनी मेहनत करती है और उसे इस बात का अहसास हुआ कि उसे भी कुछ करना चाहिए।


अगले दिन से अर्जुन ने छोटे-छोटे कामों में हाथ बंटाना शुरू किया। पहले तो संगीता को यह देखकर आश्चर्य हुआ, लेकिन धीरे-धीरे उसने देखा कि अर्जुन में एक नया जोश और लगन आ रहा है। उसने खुद से सब्जियाँ उगाने का फैसला किया और गाँव के बुजुर्गों से खेती के गुर सीखने लगा।


समय बीतता गया और अर्जुन अब गाँव के सबसे मेहनती किसानों में से एक बन गया। उसके खेतों में भरपूर फसल उगने लगी और संगीता को अपने पति पर गर्व महसूस होने लगा। गाँव के लोग, जो कभी अर्जुन को "निकम्मा" कहकर बुलाते थे, अब उसकी तारीफें करने लगे।


एक दिन, गाँव में एक समारोह का आयोजन हुआ, जिसमें अर्जुन को "सर्वश्रेष्ठ किसान" का पुरस्कार दिया गया। संगीता की आँखों में खुशी के आँसू थे। उसने अर्जुन से कहा, "देखो अर्जुन, तुम्हारी मेहनत ने तुम्हें इस मुकाम पर पहुँचाया है। यह सब तुम्हारे अंदर के बदलाव और दृढ़ संकल्प का नतीजा है।"


अर्जुन ने मुस्कुराते हुए कहा, "संगीता, यह सब तुम्हारी प्रेरणा और अटूट विश्वास का ही परिणाम है। तुमने मुझे सही रास्ता दिखाया और अब मैं समझ गया हूँ कि जीवन में मेहनत और जिम्मेदारी का कितना महत्व है।"


इस तरह, अर्जुन ने निकम्मे पति से एक मेहनती किसान का सफर तय किया। अब वह गाँव के सबसे सम्मानित नागरिकों में से एक था, और संगीता के साथ मिलकर उन्होंने एक खुशहाल और समर्पित जीवन बिताया। गाँव में उनकी जोड़ी अब मिसाल बन चुकी थी, और लोग कहते थे, "अर्जुन और संगीता की तरह मेहनत और प्यार से हर चुनौती का सामना किया जा सकता है।"


उनकी यह कहानी गाँव के हर घर में प्रेरणा का स्रोत बन गई। अर्जुन और संगीता ने अपने जीवन से यह साबित कर दिया कि जब और समर्थन का सही मेल होता है, तो किसी भी इंसान को बेहतर बनने से कोई नहीं रोक सकता।

Thursday, 22 August 2024

Ladki को भरपूर सेक्स दो मोबाइल अनजाने में हमारे परिवार, संस्कार और संस्कृति को तोड़ने का काम कर रहा है


और उसकी सभी जरूरतें पूरी करूं तो जीवन अच्छे से कटेगा और मैं पूरी तरह से शादी करने के लिए तैयार था। मेरा खुद का व्यापार है, तो मुझे ऐसी लड़की चाहिए थी, जो स्मार्ट हो और व्यापार में मेरा काम संभाल सके, 10 लोगों के साथ उठना-बैठना जानती हो। कई लड़कियों को देखने के बाद अंजली से मेरी शादी हुई। अंजली दिखने में किसी परी से कम नहीं थी, सुंदरता के साथ दिमाग भी तेज था। 


शादी के पहले तीन महीनों में मैंने उसे खूब खुश रखा, हमारे बीच जिस्मानी संबंध बहुत अच्छे थे। मुझे लगता था कि मुझे ऐसी लड़की मिल गई है जो बिना बोले मेरी जरूरत समझती है। एक अच्छे शादीशुदा रिश्ते के लिए शारीरिक सुख का होना बहुत जरूरी है। लेकिन धीरे-धीरे सेक्स से भी मन हटने लगा और काम के दबाव की वजह से भी इसका मन नहीं करता था।


लेकिन असली दिक्कत अब शुरू हुई। अंजली की डिमांड थी कि हम अपने माता-पिता से अलग एक फ्लैट में रहें। मैंने पूछा, "क्यों, ऐसा क्या दिक्कत है?" उसने जवाब दिया, "मुझे प्राइवेसी चाहिए, जो मम्मी-पापा के रहते पॉसिबल नहीं है।" मैंने कहा, "अरे कैसी प्राइवेसी? अपना घर है, अपना कमरा है, जैसे मन करो वैसे रहो।" 


उसने कहा, "तुम्हें जितना आसान लगता है उतना नहीं है। तुम घर में क्या पहनते हो?" मैंने जवाब दिया, "निक्कर और बनियान।" वह बोली, "हां, तो मैं नहीं पहन सकती। अगर तुम हो तो पहन लूंगी, पर मम्मी-पापा के सामने नहीं। तुम्हें जैसे मन करता है तुम वैसे रहते हो, लेकिन मुझे दिन भर कुर्ती, लेगिंग, सलवार सूट ये सब पहनना होता है।"


मैंने पूछा, "तो क्या इसमें तुम कम्फर्टेबल नहीं हो?" उसने जवाब दिया, "हूं, लेकिन जितना शर्ट्स और टी-शर्ट में रहती हूं उतना नहीं हूं। जब मैं मायके जाती हूं तो पापा हो या मम्मी, आराम से निक्कर और टी-शर्ट पहनकर सोफे पर बैठ जाती हूं। लेकिन यहाँ मुझे मर्यादा में रहना पड़ता है, कहने को तो अपना घर है पर फिर भी ऐसा लगता है जैसे किसी पब्लिक प्लेस पर हूं।"


मुझे लगा, "यार, बात तो सही कह रही है ये।" मैंने इस बारे में अपने मां-पापा से बात की। पापा को कोई आपत्ति नहीं थी, पर मां राजी नहीं हुईं। उन्होंने कहा कि मेरा घर है, बहु को मेरे हिसाब से रहना होगा।


अब मैं इस दुविधा में था कि मां मेरी अपनी हैं जिन्होंने मुझे जन्म दिया है, पत्नी वो है जिसके साथ आगे की पूरी जिंदगी कटनी है। शादी को 8 महीने ही हुए हैं और पत्नी चाहती है कि मैं अलग रहूं, छोटे कपड़े पहनूं, मां चाहती हैं कि पत्नी उनके हिसाब से रहे। इस कारण दोनों में काफी अनबन होती है, जिसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ता है।


इसी दौरान मेरी नजर एक दिन अंजली के फोन पर गई और इंस्टाग्राम खुला हुआ था, जिसमें एक कपल जो IIT से पढ़ा-लिखा था, रील बना कर बता रहा था कि क्यों लोगों को अपने मां-बाप से अलग रहना चाहिए। एक बार स्क्रॉल किया तो नई रील आई, जिसमें बताया जा रहा था कि कैसे सास-ससुर के रहने से लड़कियों की आजादी छिन जाती है। तीसरी बार किया तो एक रील आई जिसमें बताया जा रहा था कि कैसे मां-बाप से अलग रहने पर आपस में प्यार बढ़ता है।


मैं तुरंत समस्या समझ गया कि वास्तव में दिक्कत प्राइवेसी या प्यार का नहीं है, दिक्कत है आजकल के क्रिएटर्स जो कुछ भी मन में आए वो बना देते हैं। मैंने सोचा, भले ही बना रहे हैं, पर बात तो सही कह रहे हैं। फिर मैंने अलग-अलग सोर्स से यह जानने की कोशिश की कि मां-बाप क्या चाहते हैं। जवाब मिला कि मां-बाप अपने बुढ़ापे में बस हमारा साथ चाहते हैं।


मैं स्तब्ध था और सोचा, किसी भी कीमत पर मां-बाप को छोड़ना सही नहीं है। बल्कि सही लड़की से शादी करना ज्यादा जरूरी है। और लड़की हो या लड़का, बच्चे या मां-बाप, उन्हें इन बेफिजूल के रील वाले कल्चर से अलग रखना चाहिए।


उस दिन के बाद से मैंने अपनी पत्नी को साथ में ऑफिस लाना शुरू किया। जब भी वह रील देखती, मैं उसे कोई काम दे देता, जिससे वह फोन नीचे रख देती। ऑफिस में बड़े डॉक्टर आते, उन्होंने भी रील से होने वाले नुकसान को बताया। धीरे-धीरे अंजली ने रील देखना बंद कर दिया और अलग घर में रहने या प्राइवेसी की समस्या भी खत्म हो गई। 


आज भी कभी-कभी उसे छेड़ने के लिए बोल देता हूं कि "अलग घर ले लेते हैं, तुम्हें छोटे कपड़े पहनने में दिक्कत होगी," तो वह मुझे आंखें दिखाने लगती है। दोस्तों, यह समस्या सभी के घर में है। एक बार जरूर देखिए कि यह मोबाइल अनजाने में हमारे परिवार, संस्कार और संस्कृति को तोड़ने का काम कर रहा है।

पार्वती ने न सिर्फ अपने परिवार का सम्मान बचाया, बल्कि समाज को भी यह सिखाया

 गाँव के किनारे बसा था एक छोटा सा परिवार, जिसमें रहती थी पार्वती। पार्वती का जीवन बेहद सरल था, उसका पति रमेश एक मजदूर था और दोनों अपनी छोटी-सी झोपड़ी में सुख-दुख साझा करते थे। गरीबी ने उनके जीवन को कठिन बना दिया था, लेकिन पार्वती की हिम्मत कभी नहीं टूटी। वह हर दिन चूल्हे पर लकड़ी जलाकर खाना बनाती थी, और लकड़ियाँ जुटाने के लिए अक्सर जंगल का रुख करती थी।


पार्वती ने एक दिन सोचा कि बरसात के मौसम में लकड़ी इकट्ठा करना कठिन हो जाएगा, इसलिए उसने जंगल से थोड़ी ज्यादा लकड़ी इकट्ठा करने का मन बनाया। वह अपनी कुल्हाड़ी उठाकर जंगल चली गई। वहाँ पहुँचकर उसने एक हरे पेड़ की मजबूत डाल पर नज़र डाली और उसे काटने लगी। पेड़ की डाल आधी कट चुकी थी, तभी अचानक वहाँ वन अधिकारी, सुरेश, आ पहुँचा। सुरेश का काम था जंगल की सुरक्षा करना, लेकिन उसकी नीयत कुछ और ही थी।


सुरेश ने पार्वती को डांटते हुए कहा, "तुम्हें पता है कि हरा पेड़ काटना अपराध है? मैं तुम्हारे खिलाफ शिकायत दर्ज करूँगा, और तुम्हें सजा होगी।"


पार्वती ने विनम्रता से जवाब दिया, "साहब, गुस्सा मत होइए। यह डाल अब तक आधी कट चुकी है और बस गिरने ही वाली है। आप मुझे नीचे उतरने दीजिए, फिर जो करना है कर लीजिए।"


सुरेश ने उसकी बात मान ली और डाल को खींचकर गिरा दिया। पार्वती नीचे उतर आई और फिर बोली, "साहब, पहली बार है, गलती माफ कर दीजिए। मैं पेड़ नहीं काट रही थी, बस डाल ही तो काटी है।"


सुरेश की नजरें पार्वती के गठीले और मेहनती बदन पर टिक गईं। उसकी नीयत अब साफ दिखाई देने लगी। उसने पार्वती से कहा, "अगर तुम थोड़ी देर मेरे साथ बिताओ और मुझे खुश कर दो, तो मैं कोई शिकायत नहीं दर्ज करूँगा। तुम जितनी लकड़ी चाहो काट सकती हो, मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा।"


पार्वती ने तुरंत अपनी सख्त और ईमानदार नजरों से सुरेश की ओर देखा। "साहब, आप मुझे गलत समझ रहे हैं। मैं ऐसी औरत नहीं हूँ। मेरे पास दो बच्चे हैं, और मैं अपने पति को धोखा नहीं दे सकती।"


सुरेश ने हंसते हुए कहा, "आजकल बहुत सी औरतें अपने घर से बाहर ही आनंद लेती हैं। मैं तुम्हें कुछ पैसे भी दूँगा, इससे तुम्हारी गरीबी दूर हो जाएगी।"


पार्वती ने उसकी बात का तीखा जवाब दिया, "साहब, हम गरीब हैं, लेकिन हमारी इज्जत सबसे बड़ी दौलत है। हम लालच में नहीं पड़ते। जो लोग लालची होते हैं, वे ही ऐसे काम करते हैं, चाहे वे गरीब हों या अमीर। मेरे पास जो है, वही मेरे लिए काफी है।"


सुरेश की नीयत अब साफ थी। उसने धमकाते हुए कहा, "इसका मतलब तुम मेरी बात नहीं मानोगी? अब मुझे कुछ करना ही होगा।"


पार्वती ने साहस के साथ जवाब दिया, "आप मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। जब मेरे हाथ इतनी भारी लकड़ियाँ काट सकते हैं और सर पर उठा सकते हैं, तो मैं अपनी सुरक्षा भी कर सकती हूँ। और रही बात कार्यवाही की, तो याद रखिए कि आप खुद इसमें शामिल हैं। मैं डाल काटी हूँ, लेकिन उसे गिराने वाले आप हैं।"


सुरेश पार्वती की दृढ़ता और आत्मसम्मान के आगे हार गया। उसने पार्वती को छोड़ दिया और वहाँ से चला गया, लेकिन पार्वती का आत्मविश्वास और उसकी सच्चाई का प्रकाश जंगल में छा गया। इस घटना ने साबित कर दिया कि सच्चाई और आत्मसम्मान से बढ़कर कुछ नहीं होता। पार्वती ने न सिर्फ अपने परिवार का सम्मान बचाया, बल्कि समाज को भी यह सिखाया कि कोई भी महिला अपनी इज्जत और गरिमा की रक्षा करने में सक्षम होती है, चाहे उसकी स्थिति कैसी भी हो।


पार्वती का यह साहसिक कदम उसके गाँव में एक मिसाल बन गया, और उसकी कहानी दूर-दूर तक लोगों के दिलों में गूंजने लगी।

जो 35+ की महिलाऐं हैं ना मैं उनको बोलना चाहती हूं कि तुम अभी -बुढ़ी नहीं हुई हो..न तो तुम्हारी उम्र निकली है...

 ये जो 35+ की महिलाऐं हैं ना मैं उनको बोलना चाहती हूं कि तुम अभी -बुढ़ी नहीं हुई हो..न तो तुम्हारी उम्र निकली है...


घर में पड़े पड़े क्यूं अपनी मिट्टी पलीद ख़राब कर रही हो,निकलो घर से,जिम जाओ ,पार्लर जाओ,डांस सिखो, सिलाई कढ़ाई बुनाई सिखो,ड्राईविंग सिखो बहुत कुछ बचा है जीवन में सिखने को जो हम अपनी जवानी में देखते देखते मन मसोसकर रह गये की एक दिन अपना समय भी आयेगा तो सिख लेंगें....


अपने लिऐ समय निकाल लेनें से तुम्हारे मातृत्व पर कोई दाग नहीं लग जाएगा ...और ये रोना -धोना बंद करो कि तुम्हारा पति समय नहीं देता है,वो तुम्हे देखता भी नहीं है...

अरे! वो तो तुम्हे देखेगा तो तब जब तुमने खुद को देखने लायक छोड़ा हो..


तुम खुद को फ़िजीकली और मेंटली फ़िट करके तो देखो,फ़िर पति तो क्या पूरा मुहल्ला तुम्हे देखेगा....तुम 40 की उम्र में अगर 50 की दिखोगी तो तुम्हे कौन देखेगा ? तुम खुद को इतना फिट बना लो कि 40 की उम्र में 30 की दिखो और 50 की उम्र में 40 की दिखो...!


छोटा सा तो जीवन है...इसी में जो करना है कर लो वरना बुढ़ापा तो वैसे भी आ ही रहा है... बाकि मर्जी तुम्हारी है...


मैं सच बताऊं हमारी सही जिंदगी 35+ के बाद ही शुरू होता है...करने को तो बहुत कुछ है पर कोई करनें दे तब ना ?इन सब से निकलो...लड़ो ख़ुब लड़ो अपने विरोधियों से क्यूंकि तुम्हारे लिऐ कोई और लड़ने नहीं आयेगा....


अपने अंदर के छोटे से बच्चे को कभी मत मरने दैना...उसको हमेशा जिंदा रखो 40+ 50+ 60+ 70+ -80+ तक जबतक जिंदा रहो तबतक...अपने नाती - पोतों के साथ अपना बचपन जीयो....बस जीयो ..अपने लिए जीना भी किसी पुण्य से कम नहीं....अपनी खुशियां ख़ुद को भी दान करो....बहुत सबके लिए जी चुकी....


कभी-कभी ख़ुद को भी समय देना आवश्यक होता है, तो क्यूं ना ख़ुद को संवारा जाऐ,चाहे कोई समय दे या न दे |

क्यूंकि हमें देखकर हमारे बच्चे भी सिखेंगें उत्साह भरी जिंदगी जीना....


मेरे लिए स्वयं को बर्बाद कर रहे हो..?

 मैने कहा क्यों मेरे लिए स्वयं को बर्बाद कर रहे हो, ये जानते हुए भी की मेरी शादी हो गई है, आप भी कोई अच्छी लड़की देख कर शादी क्यों नही कर लेते..?

उसने कहा मुझ से कौन शादी करेगी..? उसने कहा- क्यों क्या कमी है आप में..? मैने कहा- ये तो तुम बताओगी... की क्या कमी थीं मुझ में..?

मेरे आंखों से आंसू छलक के बाहर निकल गए, क्यों की मैं निशब्द थी, जिदंगी के ऐसे पड़ाव पर थी जहां से मैं चाहते हुए भी कुछ भी नही कर सकती थी 

ये सब शुरू हुआ जब मैं कॉलेज में थी  

कॉलेज का पहला साल प्रदीप और मैं सिर्फ दोस्त थे, लेकिन उसकी हाजिरजवाबी, समय पर सबके लिए उपलब्ध रहना सिर्फ कालेज के लड़के ही नहीं प्रोफेसरों को भी अपनी ओर आकर्षित करते थे, 

4 साल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान हमारी दोस्ती कब प्यार में बदल गई पता ही नही चला 

ना हमने कभी प्यार का इजहार किया ना उससे कभी इस बारे में पूछा, बस एक एहसास था की हम दोनो अब एक दुसरे से प्यार करते हैं 

हमारी बचकानी बातें अब जिम्मेदारी भरी बातों में बदल गई थी, पहले जहां हम साथ में घूमने की बात करते थे 

वही बात अब पैसे कहां save करने हैं इस बारे में होती थी 

भविष्य के ख्वाब साथ बैठ कर बुनते थे 

इसी दौरान एक कंपनी में प्लेसमेंट के लिए बैठते हैं 

दोनो का इंटर व्यू अच्छा जाता है 

अब हम दोनों को इस बात की खुशी थी की एक ही comapny में नौकरी होगी 

इससे अच्छा क्या हो सकता है, फिर घर पर बात कर के शादी की बात आगे बढ़ाई जाएगी 

आज interview का रिजल्ट आने वाला था 

ये रिजल्ट कम एक नोटिफिकेशन था की कंपनी में एक हो पोस्ट खाली है, हम दोनो mese किसी एक को नौकरी मिलेगी 

बिना एक पल गंवाए प्रदीप ने बोला तुम्हारी नौकरी ज्यादा जरूरी है क्यों की बिना इसके तुम्हारे घर वाले शायद ना माने 

इस लिए मैं कल इंटरव्यू में नही बैठूंगा 

और ऐसा ही हुआ मेरी नौकरी मेरे हाथ में थी मैंने घर में सबको बताई 

अब बारी थी प्रदीप की जॉब की कई कोशिश के बाद प्रदीप की नौकरी अच्छी लग गई 

और हम दोनो ने साथ 5 साल बिता दिए, 

शादी की बात दोनो के घर होने लगी 

अब सही समय था अपने 9 साल पुराने प्यार को घर पर बताने का 

जैसे मैने घर पर इसकी चर्चा की सब मेरे अगेंस्ट हो गए 

मुझे सबसे ज्यादा उम्मीद अपनी मां से थी लेकिन उन्होंने भी मेरा सपोर्ट नही किया 

घर पर ये बात पता चलाने के बाद और तेज़ी से मेरे लिए रिश्ते देखे जाने लगे 

प्रदीप को मै कुछ बता नही पा रही थी 

और घर वालो के सामने मेरी आवाज नही निकल रही थी 

मैने मां को समझाया की 9 साल से एक दुसरे को जानते है लेकिन उन्हें और पापा को इससे कोई फर्क नही पड़ रहा था, 

ना चाहते हुए भी मेरी शादी अरुण से हुई, आज भी हमारे और अरुण के बीच पति पत्नी का रिश्ता है लेकिन सिर्फ शारीरिक तौर पर, ना चाहते हुए भी मैं अरुण को मन में नही समा पा रही ना प्रदीप को मन से निकाल पा रही हूं 

बस अपने मन पर एक पत्नी धर्म का और मां बाप की इज्जत का बोझ धो रही हूं 

3 साल बाद वापस घर आई तो हिम्मत जुटा कर प्रदीप को बुलाया 

और ये हमारी आखिरी बात थी 

 कहा क्यों मेरे लिए स्वयं को बर्बाद कर रहे हो, ये जानते हुए भी की मेरी शादी हो गई है, आप भी कोई अच्छी लड़की देख कर शादी क्यों नही कर लेते..?

उसने कहा मुझ से कौन शादी करेगी..? उसने कहा- क्यों क्या कमी है आप में..? मैने कहा- ये तो तुम बताओगी... की क्या कमी थीं मुझ में..?

मेरे आंखों से आंसू छलक के बाहर निकल गए, क्यों की मैं निशब्द थी, जिदंगी के ऐसे पड़ाव पर थी जहां से मैं चाहते हुए भी कुछ भी नही कर सकती थी 

ये सिर्फ मेरी कहानी नही है बल्कि हजारों ऐसे युवाओं की है जिसके मां बाप के इगो की वजह से से अकसर 3 जिंदगिया बरबाद होती है

मेरा बाल विवाह आज से आठ साल पहले हुआ था

 मेरा बाल विवाह आज से आठ साल पहले हुआ था। उस समय मैं खुद भी समझ नहीं पाया था कि शादी के क्या मायने होते हैं, और एक साथी के साथ जीवन की जिम्मेदारियां किस तरह निभाई जाती हैं। मेरी पत्नी जब 18 साल की हुई, तब वह पहली बार ससुराल आई। शुरुआती दिनों में सब कुछ ठीक ही रहा, और एक साल बाद हमारा बेटा भी हुआ। उस समय मेरे मन में उम्मीदों का एक नया सवेरा था, कि अब हम एक खुशहाल परिवार बनाकर साथ रहेंगे। लेकिन कहानी धीरे-धीरे एक अलग मोड़ लेने लगी।

बेटा जब सालभर का हुआ, तो मेरी पत्नी मायके से वापस आई। उसका मायका संपन्न था, और उसके पिता गैरकानूनी धंधों से खूब पैसा कमाते थे। उनके घर का जीवनस्तर बहुत ऊँचा था, और उस हिसाब से उनके खर्चे भी थे। दूसरी ओर, मैं एक मिडल क्लास परिवार से था। मेरे लिए हर एक रुपया महत्वपूर्ण था, और इस कारण से मैं ज्यादा खर्च नहीं कर पाता था, न ही बाहर घूमने-फिरने में पैसे उड़ा सकता था।

हमारे पास कृषि भूमि थी, जो मेरे ससुर को बहुत पसंद आई थी, और शायद यही वजह थी कि उन्होंने हमारी शादी को मंजूरी दी थी। इसके अलावा, मेरे स्वभाव और व्यवहार ने भी उन्हें प्रभावित किया था। मेरे ससुर के दो और दामाद थे, जो अच्छी तरह से खाते-पीते थे और अपनी जिंदगी में कई व्यसनों में लिप्त थे। जबकि मैं किसी भी प्रकार का व्यसन नहीं करता था। इस वजह से, मेरे ससुर मुझे अपना सबसे प्रिय दामाद मानते थे।

लेकिन, बीवी ने जिस माहौल में अपने मायके में पली-बढ़ी थी, वही वह ससुराल में भी चाहती थी। उसके पिता ने उसे जितनी छूट दी थी, उतनी ही आज़ादी और विलासिता वह मेरे घर में भी चाहती थी। वह चाहती थी कि ससुराल में भी उसी तरह का रहन-सहन हो, जैसा उसके मायके में था। लेकिन मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति और मानसिकता दोनों ही बहुत अलग थे। इन भिन्नताओं ने हमारे रिश्ते को धीरे-धीरे तनावपूर्ण बना दिया।

मेरे पिताजी ने सुझाव दिया कि हम दोनों अलग होकर रहने लगें, शायद यही समाधान हो। उन्होंने कहा कि बहू को लेकर अलग हो जाओ, शायद उसे यही चाहिए। लेकिन मेरी पत्नी को सर्वसुविधासंपन्न जीवन चाहिए था, जिसमें उसे किसी भी प्रकार का संघर्ष न करना पड़े। वह चाहती थी कि सब कुछ पका-पकाया मिल जाए, और उसे अपने जीवन में किसी भी तरह की चुनौतियों का सामना न करना पड़े।

जब उसे मन मुताबिक जीवन नहीं मिला, तो वह मुझसे झगड़ा करने लगी। बात इतनी बढ़ गई कि मैं कमरे से बाहर हॉल में सोने लगा। उसके बुरे बर्ताव और गालियों से तंग आकर, मैं अक्सर घर छोड़कर चला जाता और बहुत रात होने पर ही घर लौटता। रोज़-रोज़ की यह स्थिति मेरे लिए असहनीय हो गई थी। वह मुझे मारने की धमकी देती, झूठे केस में फंसाने की बात करती। उसकी हरकतों ने मुझे भीतर से तोड़ दिया था। उसके मायके वालों ने भी उसे पूरी तरह से समर्थन दिया। मेरे ससुर भी मुझसे गाली-गलौज करके बात करने लगे।

वह कहती कि मुझे मायके छोड़ आओ, लेकिन मैंने उसे नहीं पहुंचाया। उसके कहने के बावजूद मैं उसे वापस नहीं ले गया। अंततः एक साल पहले वह खुद ही मायके चली गई और हमारे बेटे को भी साथ ले गई।

अब, मेरे ससुर ने एक नई मांग रखी है। उनका कहना है कि अगर मैं दस लाख रुपये की सिक्योरिटी मनी दूं, तभी वे मेरी पत्नी और बेटे को वापस भेजेंगे। फिलहाल, उन्होंने कोर्ट में कोई केस नहीं किया है, लेकिन इस धमकी ने मुझे चिंता में डाल दिया है।

मेरे पिताजी ने कहा कि अब फैसला मुझे करना है। उन्होंने मुझसे कहा, "तुम्हें तय करना है कि बहू को वापस लाना है या नहीं। सोच-समझकर निर्णय लेना।"

इस सवाल ने मुझे एक कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया है।

मैंने बहुत सोचने के बाद यह महसूस किया कि विवाह सिर्फ दो लोगों का बंधन नहीं होता, बल्कि यह दो परिवारों का भी जुड़ाव है। लेकिन जब दो परिवारों की सोच, आर्थिक स्थिति और मानसिकता में इतनी बड़ी खाई हो, तो यह जुड़ाव मुश्किल हो जाता है।

मेरे लिए, यह केवल पैसों का सवाल नहीं है, बल्कि आत्म-सम्मान और अपने मूल्यों का भी सवाल है। मैं जानता हूं कि एक बार अगर मैंने उनकी मांगें मान लीं, तो यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। मेरी पत्नी को वापस लाना सिर्फ एक कदम नहीं होगा, बल्कि यह एक नए संघर्ष की शुरुआत होगी, जिसमें मुझे बार-बार झुकना पड़ेगा।

मुझे यह भी समझ में आया कि रिश्ते का आधार केवल पैसे या सुविधाएं नहीं हो सकते। अगर रिश्ते में सम्मान, समझ और प्यार न हो, तो वह रिश्ता खोखला हो जाता है। मैंने यह भी सोचा कि अगर मैं इस रिश्ते को बनाए रखने की कोशिश करता हूं, तो क्या मैं और मेरी पत्नी वाकई खुश रह पाएंगे?

इसलिए, मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मुझे अपने आत्म-सम्मान और मूल्यों को बरकरार रखते हुए ही निर्णय लेना चाहिए। मैंने पिताजी से कहा, "मैंने फैसला कर लिया है। अगर वे दस लाख रुपये की मांग कर रहे हैं, तो यह साफ है कि इस रिश्ते में अब कोई सच्चाई या सम्मान नहीं बचा है। मैं इस संबंध को जबरदस्ती नहीं खींच सकता। इसलिए, मैं उन्हें पैसे देने के बजाय, इस रिश्ते से बाहर निकलने का निर्णय लूंगा।"

यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन मैंने यह समझा कि कभी-कभी जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए हमें कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। मैंने यह भी महसूस किया कि रिश्ते केवल प्यार और सम्मान के आधार पर ही फल-फूल सकते हैं। जब तक दोनों पक्ष इस रिश्ते को समझदारी और सम्मान के साथ निभाने के लिए तैयार नहीं होंगे, तब तक यह रिश्ता सफल नहीं हो सकता।

अब मेरे सामने एक नया सफर है, जिसमें मैं अपने भविष्य का निर्माण करूंगा, अपनी शर्तों पर। यह सफर अकेला हो सकता है, लेकिन यह मेरी शर्तों पर होगा, मेरे आत्म-सम्मान के साथ। मुझे विश्वास है कि सही निर्णय लेने से, मैं एक बेहतर और सुखद भविष्य की ओर बढ़ूंगा।

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...