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Sunday, 18 August 2024

जवानी के दिनों में शारीरिक चाहतें सिर चढ़कर बोलने लगती हैं

 जवानी के दिनों में शारीरिक चाहतें सिर चढ़कर बोलने लगती हैं


, और पहले 20 साल तेजी से बीत जाते हैं। इसके बाद नौकरी की खोज शुरू होती है—यह नौकरी नहीं, वह नौकरी नहीं, दूर नहीं, पास नहीं। कई नौकरियाँ बदलने के बाद आखिरकार एक नौकरी स्थिरता की शुरुआत करती है। पहली तनख्वाह का चेक हाथ में आते ही उसे बैंक में जमा किया जाता है, और शून्यों का अंतहीन खेल शुरू हो जाता है। दो-तीन साल और बीत जाते हैं और बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ने लगती है।

25 की उम्र में विवाह हो जाता है और जीवन की एक नई कहानी शुरू होती है। शुरू के एक-दो साल गुलाबी और सपनीले होते हैं—हाथ में हाथ डालकर घूमना, रंग-बिरंगे सपने देखना। लेकिन यह सब जल्दी ही खत्म हो जाता है। बच्चे के आने की आहट होती है और पालना झूलने लगता है। अब सारा ध्यान बच्चे पर केंद्रित हो जाता है—उठना, बैठना, खाना-पीना, लाड़-दुलार। समय कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता।

इस बीच, हाथ एक-दूसरे से छूट जाते हैं, बातें और घूमना-फिरना बंद हो जाता है। बच्चा बड़ा होता जाता है और वह बच्चे में व्यस्त हो जाती है, जबकि मैं अपने काम में व्यस्त रहता हूँ। घर, गाड़ी की किस्त, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा, भविष्य की चिंता, और बैंक में शून्यों की बढ़ती संख्या—इन सब में जीवन व्यस्त हो जाता है।

35 साल की उम्र में, घर, गाड़ी, परिवार और बैंक में बढ़ते शून्य सब कुछ होते हुए भी एक कमी महसूस होती है। चिड़चिड़ाहट बढ़ती जाती है और मैं उदासीन हो जाता हूँ। दिन बीतते जाते हैं, बच्चा बड़ा होता जाता है और खुद का संसार तैयार होता जाता है। कब 10वीं कक्षा आई और चली गई, पता ही नहीं चलता। चालीस की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ती जाती है।

एक एकांत क्षण में, गुजरे दिनों की यादें ताज़ा होती हैं और मैंने कहा, "जरा यहाँ आओ, पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कहीं घूमने चलते हैं।" उसने अजीब नजरों से देखा और कहा, "तुम्हें बातें सूझ रही हैं, यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है।" कमर में पल्लू खोंसकर वह चली जाती है। पैंतालीस की उम्र में, आँखों पर चश्मा चढ़ जाता है, बाल सफेद होने लगते हैं, और दिमाग में उलझनें बढ़ जाती हैं। बेटा कॉलेज में होता है और बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ती जाती है। बेटे के कॉलेज खत्म होने और परदेश चले जाने के बाद, घर अब बोझ लगने लगता है।

पचपन की ओर बढ़ते हुए, बैंक के शून्यों की कोई खबर नहीं होती। बाहर जाने-आने के कार्यक्रम बंद हो जाते हैं। दवाइयों का दिन और समय तय हो जाते हैं। बच्चे बड़े हो जाते हैं और अब हमें सोचने की जरूरत होती है कि वे कब लौटेंगे। एक दिन, सोफे पर बैठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वह पूजा में व्यस्त थी। तभी फोन की घंटी बजी। बेटे ने बताया कि उसने शादी कर ली है और परदेश में ही रहेगा। उसने यह भी कहा कि बैंक के शून्यों को किसी वृद्धाश्रम में दे देना और खुद भी वहीं रहना।

मैं सोफे पर आकर बैठ गया। उसकी पूजा खत्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी, "चलो, आज फिर हाथ में हाथ डालकर बातें करते हैं।" वह तुरंत बोली, "अभी आई।" मुझे विश्वास नहीं हुआ। चेहरा खुशी से चमक उठा। आँखे भर आईं और आँसुओं से गाल भीग गए। लेकिन अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गई और मैं निस्तेज हो गया—हमेशा के लिए।

उसने शेष पूजा की और मेरे पास आकर बैठ गई। "बोलो, क्या बोल रहे थे?" लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छूकर देखा—ठंडा पड़ चुका था। मैंने उसकी ओर एकटक देखा। क्षण भर के लिए वह शून्य हो गई। "क्या करूँ?" उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन एक-दो मिनट में ही वह चेतन्य हो गई। धीरे से उठी, पूजा घर में गई, एक अगरबत्ती जलाई, ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से आकर सोफे पर बैठ गई। मेरा ठंडा हाथ अपने हाथों में लिया और बोली, "चलो, कहाँ घूमने चलना है तुम्हें? क्या बातें करनी हैं तुम्हें?"

ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं। वह एकटक मुझे देखती रही। आँसुओं की धारा बह निकली। मेरा सिर उसके कंधे पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था। क्या यही जीवन है?

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन को अपने तरीके से जीना चाहिए। धन और भौतिक सुख-सुविधाएँ महज एक भाग हैं, लेकिन सच्ची खुशी और संतोष प्रेम, समझदारी, और एक-दूसरे के साथ बिताए समय में होता है।

उसने कहा मुझ से कौन शादी करेगी..? उसने कहा- क्यों क्या कमी है आप में..? मैने कहा- ये तो तुम बताओगी... की क्या कमी थीं मुझ में..?

 मैने कहा क्यों मेरे लिए स्वयं को बर्बाद कर रहे हो, ये जानते हुए भी की मेरी शादी हो गई है, आप भी कोई अच्छी लड़की देख कर शादी क्यों नही कर लेते..?


उसने कहा मुझ से कौन शादी करेगी..? उसने कहा- क्यों क्या कमी है आप में..? मैने कहा- ये तो तुम बताओगी... की क्या कमी थीं मुझ में..?


मेरे आंखों से आंसू छलक के बाहर निकल गए, क्यों की मैं निशब्द थी, जिदंगी के ऐसे पड़ाव पर थी जहां से मैं चाहते हुए भी कुछ भी नही कर सकती थी 

ये सब शुरू हुआ जब मैं कॉलेज में थी  


कॉलेज का पहला साल प्रदीप और मैं सिर्फ दोस्त थे, लेकिन उसकी हाजिरजवाबी, समय पर सबके लिए उपलब्ध रहना सिर्फ कालेज के लड़के ही नहीं प्रोफेसरों को भी अपनी ओर आकर्षित करते थे, 

4 साल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान हमारी दोस्ती कब प्यार में बदल गई पता ही नही चला 


ना हमने कभी प्यार का इजहार किया ना उससे कभी इस बारे में पूछा, बस एक एहसास था की हम दोनो अब एक दुसरे से प्यार करते हैं 


हमारी बचकानी बातें अब जिम्मेदारी भरी बातों में बदल गई थी, पहले जहां हम साथ में घूमने की बात करते थे 

वही बात अब पैसे कहां save करने हैं इस बारे में होती थी 

भविष्य के ख्वाब साथ बैठ कर बुनते थे 


इसी दौरान एक कंपनी में प्लेसमेंट के लिए बैठते हैं 

दोनो का इंटर व्यू अच्छा जाता है 

अब हम दोनों को इस बात की खुशी थी की एक ही comapny में नौकरी होगी 

इससे अच्छा क्या हो सकता है, फिर घर पर बात कर के शादी की बात आगे बढ़ाई जाएगी 


आज interview का रिजल्ट आने वाला था 


ये रिजल्ट कम एक नोटिफिकेशन था की कंपनी में एक हो पोस्ट खाली है, हम दोनो mese किसी एक को नौकरी मिलेगी 


बिना एक पल गंवाए प्रदीप ने बोला तुम्हारी नौकरी ज्यादा जरूरी है क्यों की बिना इसके तुम्हारे घर वाले शायद ना माने 

इस लिए मैं कल इंटरव्यू में नही बैठूंगा 


और ऐसा ही हुआ मेरी नौकरी मेरे हाथ में थी मैंने घर में सबको बताई 


अब बारी थी प्रदीप की जॉब की कई कोशिश के बाद प्रदीप की नौकरी अच्छी लग गई 


और हम दोनो ने साथ 5 साल बिता दिए, 

शादी की बात दोनो के घर होने लगी 


अब सही समय था अपने 9 साल पुराने प्यार को घर पर बताने का 


जैसे मैने घर पर इसकी चर्चा की सब मेरे अगेंस्ट हो गए 

मुझे सबसे ज्यादा उम्मीद अपनी मां से थी लेकिन उन्होंने भी मेरा सपोर्ट नही किया 


घर पर ये बात पता चलाने के बाद और तेज़ी से मेरे लिए रिश्ते देखे जाने लगे 

प्रदीप को मै कुछ बता नही पा रही थी 


और घर वालो के सामने मेरी आवाज नही निकल रही थी 


मैने मां को समझाया की 9 साल से एक दुसरे को जानते है लेकिन उन्हें और पापा को इससे कोई फर्क नही पड़ रहा था, 


ना चाहते हुए भी मेरी शादी अरुण से हुई, आज भी हमारे और अरुण के बीच पति पत्नी का रिश्ता है लेकिन सिर्फ शारीरिक तौर पर, ना चाहते हुए भी मैं अरुण को मन में नही समा पा रही ना प्रदीप को मन से निकाल पा रही हूं 


बस अपने मन पर एक पत्नी धर्म का और मां बाप की इज्जत का बोझ धो रही हूं 


3 साल बाद वापस घर आई तो हिम्मत जुटा कर प्रदीप को बुलाया 

और ये हमारी आखिरी बात थी 


 कहा क्यों मेरे लिए स्वयं को बर्बाद कर रहे हो, ये जानते हुए भी की मेरी शादी हो गई है, आप भी कोई अच्छी लड़की देख कर शादी क्यों नही कर लेते..?


उसने कहा मुझ से कौन शादी करेगी..? उसने कहा- क्यों क्या कमी है आप में..? मैने कहा- ये तो तुम बताओगी... की क्या कमी थीं मुझ में..?


मेरे आंखों से आंसू छलक के बाहर निकल गए, क्यों की मैं निशब्द थी, जिदंगी के ऐसे पड़ाव पर थी जहां से मैं चाहते हुए भी कुछ भी नही कर सकती थी 


ये सिर्फ मेरी कहानी नही है बल्कि हजारों ऐसे युवाओं की है जिसके मां बाप के इगो की वजह से से अकसर 3 जिंदगिया बरबाद होती है


बंटवारा

 #बंटवारा

एक घर मे तीन भाई और एक बहन थी...बड़ा और छोटा पढ़ने मे बहुत तेज थे। उनके मा बाप उन चारो से बेहद प्यार करते थे मगर मझले बेटे से थोड़ा परेशान से थे।


बड़ा बेटा पढ़ लिखकर डाक्टर बन गया।


छोटा भी पढ लिखकर इंजीनियर बन गया। मगर मझला बिलकुल अवारा और गंवार बनके ही रह गया। सबकी शादी हो गई । बहन और मझले को छोड़ दोनों भाईयो ने Love मैरीज की थी।


बहन की शादी भी अच्छे घराने मे हुई थी।


आखीर भाई सब डाक्टर इंजीनियर जो थे।


अब मझले को कोई लड़की नहीं मिल रही थी। बाप भी परेशान मां भी।


बहन जब भी मायके आती सबसे पहले छोटे भाई और बड़े भैया से मिलती। मगर मझले से कम ही मिलती थी। क्योंकि वह न तो कुछ दे सकता था और न ही वह जल्दी घर पे मिलता था।


वैसे वह दिहाडी मजदूरी करता था। पढ़ नहीं सका तो...नौकरी कौन देता। मझले की शादी कीये बिना बाप गुजर गये ।


माँ ने सोचा कहीं अब बँटवारे की बात न निकले इसलिए अपने ही गाँव से एक सीधी साधी लड़की से मझले की शादी करवा दी।


शादी होते ही न जाने क्या हुआ की मझला बड़े लगन से काम करने लगा ।


दोस्तों ने कहा... ए चन्दू आज अड्डे पे आना।


चंदू - आज नहीं फिर कभी


दोस्त - अरे तू शादी के बाद तो जैसे बिबी का गुलाम ही हो गया?


चंदू - अरे ऐसी बात नहीं । कल मैं अकेला एक पेट था तो अपने रोटी के हिस्से कमा लेता था। अब दो पेट है आज


कल और होगा।


घरवाले नालायक कहते थे कहते हैं मेरे लिए चलता है।


मगर मेरी पत्नी मुझे कभी नालायक कहे तो मेरी मर्दानगी पर एक भद्दा गाली है। क्योंकि एक पत्नी के लिए उसका पति उसका घमंड इज्जत और उम्मीद होता है। उसके घरवालो ने भी तो मुझपर भरोसा करके ही तो अपनी बेटी दी होगी...फिर उनका भरोसा कैसे तोड़ सकता हूँ । कालेज मे नौकरी की डिग्री मिलती है और ऐसे संस्कार मा बाप से मिलते हैं ।


इधर घरपे बड़ा और छोटा भाई और उनकी पत्नीया मिलकर आपस मे फैसला करते हैं की...जायदाद का बंटवारा हो जाये क्योंकि हम दोनों लाखों कमाते है मगर मझला ना के बराबर कमाता है। ऐसा नहीं होगा।


मां के लाख मना करने पर भी...बंटवारा की तारीख तय होती है। बहन भी आ जाती है मगर चंदू है की काम पे निकलने के बाहर आता है। उसके दोनों भाई उसको पकड़कर भीतर लाकर बोलते हैं की आज तो रूक जा? बंटवारा कर ही लेते हैं । वकील कहता है ऐसा नहीं होता। साईन करना पड़ता है।


चंदू - तुम लोग बंटवारा करो मेरे हिस्से मे जो देना है दे देना। मैं शाम को आकर अपना बड़ा सा अगूंठा चिपका दूंगा पेपर पर।


बहन- अरे बेवकूफ ...तू गंवार का गंवार ही रहेगा। तेरी किस्मत अच्छी है की तू इतनी अच्छे भाई और भैया मिलें


मां- अरे चंदू आज रूक जा।


बंटवारे में कुल दस विघा जमीन मे दोनों भाई 5- 5 रख लेते हैं ।


और चंदू को पुस्तैनी घर छोड़ देते है


तभी चंदू जोर से चिल्लाता है।


अरे???? फिर हमारी छुटकी का हिस्सा कौन सा है?


दोनों भाई हंसकर बोलते हैं


अरे मूरख...बंटवारा भाईयो मे होता है और बहनों के हिस्से मे सिर्फ उसका मायका ही है।


चंदू - ओह... शायद पढ़ा लिखा न होना भी मूर्खता ही है।


ठीक है आप दोनों ऐसा करो।


मेरे हिस्से की वसीएत मेरी बहन छुटकी के नाम कर दो।


दोनों भाई चकीत होकर बोलते हैं ।


और तू?


चंदू मां की और देखके मुस्कुराके बोलता है


मेरे हिस्से में माँ है न......


फिर अपनी बिबी की ओर देखकर बोलता है..मुस्कुराके...क्यों चंदूनी जी...क्या मैंने गलत कहा?


चंदूनी अपनी सास से लिपटकर कहती है। इससे बड़ी वसीएत क्या होगी मेरे लिए की मुझे मां जैसी सासु मिली और बाप जैसा ख्याल रखना वाला पति।


बस येही शब्द थे जो बँटवारे को सन्नाटा मे बदल दिया ।


बहन दौड़कर अपने गंवार भैया से गले लगकर रोते हुए कहती है की..मांफ कर दो भैया मुझे क्योंकि मैं समझ न सकी आपको।


चंदू - इस घर मे तेरा भी उतना ही अधिकार है जीतना हम सभी का।


बहुओं को जलाने की हिम्मत कीसी मे नहीं मगर फिर भी जलाई जाती है क्योंकि शादी के बाद हर भाई हर बाप उसे पराया समझने लगते हैं । मगर मेरे लिए तुम सब बहुत अजीज हो चाहे पास रहो या दुर।


माँ का चुनाव इसलिए कीया ताकी तुम सब हमेशा मुझे याद आओ। क्योंकि ये वही कोख है जंहा हमने साथ साथ 9 - 9 महीने गुजारे। मां के साथ तुम्हारी यादों को भी मैं रख रहा हूँ।


दोनों भाई दौड़कर मझले से गले मिलकर रोते रोते कहते हैं


आज तो तू सचमुच का बाबा लग रहा है। सबकी पलको पे पानी ही पानी। सब एक साथ फिर से रहने लगते है।

Saturday, 17 August 2024

चौंक उठी गौरी ।

 गौरी का रिजर्वेशन जिस बोगी में था, उसमें लगभग सभी लड़के ही थे । टॉयलेट जाने के बहाने गौरी पूरी बोगी घूम आई, मुश्किल से दो या तीन औरतें होंगी । मन अनजाने भय से काँप सा गया । रात्रि का समय था और बीच के स्टेशनों पर यात्रियों की संख्या बढ़ भी सकती थी और घट भी सकती थी ।


पहली बार रात्रि में अकेली सफर कर रही थी, इसलिये पहले से ही घबराई हुई थी। अतः खुद को सहज रखने के लिए चुपचाप अपनी सीट पर बैठकर मोबाइल में देखने लगी।


नवयुवकों का झुंड जो शायद किसी कैम्प जा रहे थे, के हँसी - मजाक , चुटकुले उसके हिम्मत को और भी तोड़ रहे थे। गौरी के भय और घबराहट के बीच अनचाही सी रात धीरे - धीरे उतरने लगी ।


सहसा सामने के सीट पर बैठे लड़के ने मौन भंग किया "हेलो, मैं साकेत और आप ? "


भय से पीली पड़ चुकी गौरी ने कहा


" जी मैं "


" कोई बात नहीं , नाम मत बताइये । वैसे जा कहाँ रहीं हैं आप ?"


गौरी ने धीरे से कहा "वाराणसी"


" अच्छा क्या आप भी वाराणसी से ही हैं ? मेरा तो यहां ननिहाल है। इस रिश्ते से तो आप मेरी बहन लगीं ।" खुश होते हुए साकेत ने कहा और फिर वाराणसी की प्रशंसा चालू हो गई । गंगा,सारनाथ, गंगा घाटों और बनारस की गलियों की विशेषताएं । साकेत अपने ननिहाल की अनगिनत बातें बताता रहा कि उसके नाना जी काफी नामी व्यक्ति हैं , उसके दोनों मामा सेना में उच्च अधिकारी हैं, एक मामी पटना की हैं और दूसरी लखनऊ की । और भी ढेरों नई - पुरानी बातें । गौरी भी मुस्कुरा उठी । धीरे - धीरे सामान्य हो गई और उसके बातों में रूचि लेती रही ।


रात जैसे कुँवारी आई थी , वैसे ही पवित्र कुँवारी गुजर गई ।


सुबह गौरी ने कहा " मेरा मोबाइल नंबर फीड कर लीजिए , कभी ननिहाल आइये तो जरुर मिलने आइयेगा ।"


"कैसी ननिहाल बहन ?


वो तो मैंने आपको डरते देखा तो झूठ - मूठ के रिश्ते गढ़ता रहा । मैं तो पहले कभी वाराणसी आया ही नहीं ।"


"क्या ?" -- चौंक उठी गौरी ।


" देखो बहन ऐसा नहीं है कि सभी लड़के बुरे ही होते हैं कि किसी अकेली लड़की को देखा नहीं कि उस पर गिद्ध की तरह टूट पड़ें । हम ही तो पिता और भाई भी होते हैं ।" कह कर प्यार से उसके सर पर हाथ रख मुस्कुराया था साकेत ।


गौरी साकेत को देखती रही जैसे अपना ही भाई उससे विदा ले रहा हो ।


गौरी की आँखें गीली हो चुकी थीं और वाराणसी स्टेशन भी आ चुका था।

हम राही

असली समस्या प्राइवेसी नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले विचार हैं।

 मेरे मन में यह धारणा थी कि अगर मैं अपनी पत्नी के साथ प्रेम, वासना और उसकी सभी जरूरतें पूरी करूं तो हमारा जीवन सुखदायी होगा। मेरी खुद की व्यापारिक पृष्ठभूमि थी, इसलिए मुझे ऐसी लड़की चाहिए थी, जो स्मार्ट हो और व्यापार में मेरी मदद कर सके। कई लड़कियों के बाद, मेरी शादी अंजली से हुई। अंजली न केवल सुंदर थी, बल्कि बुद्धिमान भी थी।

शादी के शुरुआती तीन महीनों में, मैंने उसे बहुत खुश रखा। हमारे बीच शारीरिक संबंध अच्छे थे, और मुझे ऐसा लगता था कि मुझे एक ऐसी लड़की मिल गई है जो बिना बोले मेरी जरूरतें समझती है। मुझे लगता था कि एक अच्छे वैवाहिक रिश्ते के लिए शारीरिक सुख का होना बहुत जरूरी है।

धीरे-धीरे, शारीरिक संबंधों में मेरी रुचि कम होने लगी और काम के दबाव के कारण भी यह करना कठिन हो गया। असली समस्या तब शुरू हुई जब अंजली ने मुझसे अलग फ्लैट में रहने की मांग की। उसने कहा कि उसे प्राइवेसी चाहिए, जो कि मम्मी-पापा के साथ रहते हुए संभव नहीं है।

जब मैंने इस बारे में अपने माता-पिता से बात की, तो पापा को कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन मां ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि बहू को उनके हिसाब से रहना होगा।

इस बीच, मैंने अंजली के फोन पर देखा कि वह इंस्टाग्राम पर एक कपल की रील देख रही थी, जिसमें बताया जा रहा था कि क्यों लोगों को अपने मां-बाप से अलग रहना चाहिए। यह रीलें देखने के बाद, मुझे समझ आया कि असली समस्या प्राइवेसी नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले विचार हैं।

मैंने तय किया कि मां-बाप को किसी भी कीमत पर छोड़ना सही नहीं है। इसके बजाय, मैंने अंजली को अपने ऑफिस में शामिल किया और जब भी वह रील देखती, मैं उसे कोई काम दे देता। धीरे-धीरे उसने रील देखना बंद कर दिया और हमारा वैवाहिक जीवन भी सामान्य हो गया।

आज भी, कभी-कभी मजाक में मैं उससे कहता हूं कि अलग घर ले लेते हैं, ताकि तुम छोटे कपड़े पहन सको। तो वह मुझे आंख दिखाने लगती है।

दोस्तों, यह समस्या हर घर में है। हमें यह समझना चाहिए कि मोबाइल और सोशल मीडिया अनजाने में हमारे परिवार, संस्कार और संस्कृति को तोड़ने का काम कर रहे हैं।

Friday, 16 August 2024

प्रेम और सम्भोग*

 **प्रेम और सम्भोग**

अगर कोई पुरुष किसी स्त्री के पास जाता है और कहता है कि "मैं तेरे करीब इस कारण हूँ कि मैं प्यार करता हूँ," तो यह धोखा है। यह गलत है। 


सम्भोग शरीर की जरूरत है, तो यह गलत नहीं है। पर सम्भोग को प्यार कहने की भूल से बचें। ईमानदार रहें। अगर सम्भोग करना है, तो सामने वाले को साफ शब्दों में कहें। और साथी से पहले, खुद को स्पष्ट कर लें कि आप प्यार में हैं या वासना में। 


स्त्री फूल की तरह कोमल होती है। और फूल को रगड़कर, नोचकर, उसके शरीर पर निशान बनाकर या बाहर-भीतर घिसकर, प्यार नहीं किया जाता। स्त्री का शरीर और उसकी योनि की नसें बेहद संवेदनशील होती हैं। बहुत ज्यादा बारीक होती हैं। 


आज जो महिलाएं अपनी डॉक्टर के पास जा रही हैं, उसका एक कारण यह भी है कि उनके शारीरिक संबंधों में हिंसा है। वासना के वेग के चलते, न तो पुरुष को होश रहता है और न स्त्री इतनी हिम्मत कर पाती कि पुरुष को 'न' कह सके। 


और फिर बच्चेदानी में हजारों बीमारियां लग जाती हैं। मासिक धर्म में भयानक दर्द, OCD, PCOD और पता नहीं क्या-क्या सहन करना पड़ता है। 


पुरुष एक्टिव है स्वभाव से और स्त्री पैसिव। इसलिए यहां पुरुष को समझना चाहिए कि पल भर की वासना के लिए किसी स्त्री का शरीर खराब न करें। वैसे भी अगर सम्भोग को धैर्य और तरीके से किया जाए, और एक ठहराव हो भीतर तो उसके परिणाम दोनों व्यक्तियों के लिए सुखद होते हैं। और संतुष्टि भी मिलती है। 


लेकिन जोश में आकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने वाले पुरुष, कभी भी संतुष्टि को उपलब्ध नहीं होते। जो व्यक्ति विवाहित हैं, उन्होंने अनुभव किया होगा कि वर्षों तक सम्भोग करने पर भी उनके भीतर सम्भोग की इच्छा ज्यों की त्यों है। इसका कारण यही है कि उन्होंने गहराई से कभी इस चीज को नहीं जाना। 


४५ मिनट से पहले तो स्त्री का शरीर खुलता ही नहीं कि वह तुम्हें अपनी बाहों में भरे, या तुम्हें अनुमति दे कि तुम उसके भीतर प्रवेश करो। इसलिए फोरप्ले का इतना महत्व है। और ठीक उसी तरह आफ्टरप्ले भी अर्थ रखता है कि तुम्हारी वजह से मैं जीवन ऊर्जा का आनंद ले पाया। 


केवल पेनिट्रेशन को सम्भोग समझने वाले, बलात्कारी हैं। अपने ही साथी का बलपूर्वक हरण करना, बलात्कार ही होता है। आज जो ७० फीसदी महिलाएं ऑर्गेज़्म से अनजान हैं, उसका कारण सम्भोग की अज्ञानता है। इस बात को अहंकार पर चोट न समझें, बल्कि अपने आपको बेहतर बनाने का प्रयास करें। अपनी महिला मित्र के पैर छुएं, उससे अनुमति लें, उसके प्रति श्रद्धा भाव रखें, और इस बात का ध्यान रखें कि उसे दर्द न दें, आनंद दें। 


भले तुम दस मिनट, आधे घंटे का सेक्स कर लो, पर स्त्री अछूती ही रह जाती है तुम्हारे स्पर्श से, और तुम भी अधूरे ही लौटकर आते हो। बहुत धीरे-धीरे शरीर तैयार होता है, बहुत धीरे-धीरे वे द्वार खुलते हैं, जब तुम्हें अनुमति मिलती है। 


और यह सब समझने के लिए भीतर स्थिरता चाहिए। और बिना मेडिटेशन के यह संभव नहीं। बिना मेडिटेशन जीवन उथला ही रहता है। अगर गहराई चाहिए जीवन में, तो ध्यान बहुत जरूरी है। 


होश, ठहराव, स्थिरता, धीरज, प्रेम, श्रद्धा – ये सारे शब्द केवल ध्यान करने से ही जीवन में उतरेंगे। किताबें पढ़ने या ज्ञान सुनने से कुछ नहीं होगा।


जब तक बाप जिंदा रहता है, बेटी मायके में हक़ से आती है।

 जब तक बाप जिंदा रहता है, बेटी मायके में हक़ से आती है और घर में भी ज़िद कर लेती है और कोई कुछ कहे तो डट के बोल देती है कि मेरे बाप का घर है। पर जैसे ही बाप मरता है और बेटी आती है तो वो इतनी चीत्कार करके रोती है कि, सारे रिश्तेदार समझ जाते है कि बेटी आ गई है।*


*और वो बेटी उस दिन अपनी हिम्मत हार जाती है, क्योंकि उस दिन उसका बाप ही नहीं उसकी वो हिम्मत भी मर जाती हैं।*


*आपने भी महसूस किया होगा कि बाप की मौत के बाद बेटी कभी अपने भाई- भाभी के घर वो जिद नहीं करती जो अपने पापा के वक्त करती थी, जो मिला खा लिया, जो दिया पहन लिया क्योंकि जब तक उसका बाप था तब तक सब कुछ उसका था यह बात वो अच्छी तरह से जानती है।* 


आगे लिखने की हिम्मत नहीं है, बस इतना ही कहना चाहता हूं कि बाप के लिए बेटी उसकी जिंदगी होती है, पर वो कभी बोलता नहीं, और बेटी के लिए बाप दुनिया की सबसे बड़ी हिम्मत और घमंड होता है, पर बेटी भी यह बात कभी किसी को बोलती नहीं है। 

कहानी बहुत छोटी है मगर सारांश उसका बहुत बड़ा है। समझने वाले समझ जाएगी।


बाप बेटी का प्रेम समुद्र से भी गहरा है

       🌹 #Love_u_papa 🌹


      ♥♥♥♥♥♥♥♥♥

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...