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Thursday, 3 October 2024

बादाम छीलते हुए दो बादाम चुपके से अपने मुँह में डाल चुकी थी।

 सुनीता बादाम छीलते हुए दो बादाम चुपके से अपने मुँह में डाल चुकी थी। जब वह विजय के लिए दूध के साथ बादाम लेकर गई, तो उसकी सासू माँ का गुस्सा फूट पड़ा। सासू माँ ने झट से गिना कि पूरे बादाम नहीं थे, और नाराज़ होते हुए बोलीं, "मैंने पूरे बादाम भिगोए थे, फिर विजय को कम क्यों दे रही हो?" सुनीता की घबराहट उसकी आवाज़ में साफ झलक रही थी। उसने कांपते हुए कहा, "सासू माँ, छीलते वक्त दो बादाम नीचे गिर गए थे, अब कैसे देती उन्हें?"


सासू माँ की निगाहें जैसे सुनीता को दोषी करार दे रही थीं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, "तुम्हारे मायके से बादाम की बोरी तो आती नहीं, जो यूँ ही गिराती रहोगी।" सुनीता अंदर ही अंदर झूठ छुपाते हुए रसोई में बर्तन रखने चली गई। उसकी आंखों में मायके की यादें ताजा हो गईं, जहां कभी ऐसा भेदभाव नहीं था। उसकी सासू माँ के घर में, ताकत और पोषण की चीजें केवल पुरुषों के लिए मानी जाती थीं। सासू माँ का मानना था कि पुरुष ही मेहनत करते हैं, क्योंकि उन्हें बाहर काम करना पड़ता है, जबकि औरतों के काम को मेहनत के रूप में नहीं देखा जाता था।


सुनीता अकेली महिला थी, जिसे घर में 'औरत' का दर्जा मिला था। वह सोचने लगी कि अगर विजय उसका साथ न देते, तो उसकी स्थिति और कठिन हो जाती। दिनभर घर के काम में कब समय गुजर जाता, उसे पता भी नहीं चलता।

रात को खाना बनाकर और बर्तन धोने के बाद, जब सुनीता कमरे में आई, तो विजय उसका इंतजार कर रहे थे। जैसे ही वह अंदर आई, विजय ने उसे प्यार से गले लगाया और मुस्कुराते हुए कहा, "तुम्हारे लिए कुछ लाया हूँ।" उन्होंने बादाम का एक पैकेट सुनीता के हाथ में थमाते हुए कहा, "तुम्हें भीगे बादाम बहुत पसंद हैं, तो अलग से भिगो कर खा लिया करो।"

विजय की यह छोटी सी, लेकिन प्यारी बात ने सुनीता का दिल छू लिया। उसके अंदर का सारा तनाव जैसे बह गया हो। यह छोटे-छोटे प्यार भरे पल सुनीता के दिल को एक सुकून और आत्मीयता से भर देते थे, जैसे भीगे बादाम उसकी आत्मा को भी ताजगी और प्यार से भिगो रहे हों।

Tuesday, 1 October 2024

क्योंकि आज सही वक्त पर सही जवाब दे दिया गया था।

 " बहु डिलीवरी के लिए अपनी बहन को बुला लो। मेघा तो नहीं आ पाएगी। और मुझसे अकेले होगा नहीं। आखिर मेघा

भी ससुराल वाली है। उसके ससुराल वाले भेजे तो भेजे, नहीं तो नहीं भेजें" शोभा जी अपनी बहू नमिता से बोली। " पर मम्मी जी अगले महीने तो उसकी परीक्षा है। वो परीक्षा की तैयारी करेगी या मेरी सेवा करेगी"

नमिता ने कहा। " अब बहू तू खुद देख ले। मुझसे तो होगा नहीं। या फिर तु अपने मायके चली जा" " मम्मी जी मायके में कौन करेगा? मेरी मम्मी होती तो फिर इतनी परेशानी ही क्यों होती?" नमिता ने धीरे से कहा। 

" तो फिर अपनी बहन को ही बुला ले। उसे कौन सा पढ़ लिखकर बैरिस्टर बनना है। आकर कुछ दिनों के लिए संभाल जाएगी" "मम्मी जी इन्होंने कहा भी तो था कि कामवाली रख लेंगे" नमिता ने कहा। "ना बाबा ना, मैं अपने घर को कामवाली के भरोसे नहीं छोड़ सकती। और फिर उसकी निगरानी कौन करेगा। तू तो बस तेरी बहन को बुला ले" " मम्मी अगले महीने से तो तनु की परीक्षा है। वो भला यहां कैसे आएगी। और फिर उसे तैयारी भी तो करनी है" अचानक समीर ने कमरे में आते हुए कहा।

" अरे तो अपनी बहन को संभालते हुए पढ़ भी लेगी। कौन सा इतना काम करना है उसे। भला काम ही क्या है हमारे घर में" " अपना घर तो अपना घर ही होता है मम्मी। इंसान अपने घर में आराम से और बेफिक्री से पढ़ सकता है, वो किसी और के घर पर नहीं हो पाता। नहीं नहीं तनु की पढ़ाई का नुकसान होगा। मैं एक काम करता हूं। मैं मेघा दीदी के ससुराल बात कर लेता हूं। मुझे यकीन है कि उनके सास ससुर उन्हें जरूर भेज देंगे"

" रहने दे। उसके सास ससुर तो भेजने को तैयार है। पर मेघा पंद्रह दिन के लिए हिल स्टेशन पर घूमने जा रही है, इसलिए नहीं आ पाएगी" अचानक शोभा जी ने कहा तो कमरे में खामोशी सी छा गई। दोनों को इतना चुप देखकर शोभा जी ने फिर कहा,

" अरे इसमें इतनी हैरानी की क्या बात है। बड़ी मुश्किल से उसके घूमने का प्रोग्राम बना है इसलिए मैंने ही उसे आने से मना कर दिया" " पर जीजा जी ने तो पहले कहा था कि वो मेघा दीदी को नमिता की डिलीवरी के समय यहां पर भेज देंगे। फिर अचानक कैसे प्रोग्राम बना दिया"

" तेरे जीजा जी नहीं जा रहे हैं। वो तो अपनी ननद और जेठानी के परिवार के साथ जा रही है"

" पर, ऐसे कैसे?" समीर ने धीरे से कहा। " ऐसे कैसे से क्या मतलब है? मेघा के भरोसे तो डिलीवरी नहीं हो रही है ना। बड़ी मुश्किल से उसका घूमने का प्रोग्राम बना है। मैं उसे मना नहीं करूंगी। कुछ दिनों की तो बात है। बुला लो तनु को। बाद में तो मेघा आ ही जाएगी" समीर ने नमिता की तरफ देखा तो नमिता ने भी फिर तनु को बुलाने के लिए कहा, " आप तनु को ही बुला लीजिए। आखिर पंद्रह बीस दिन बाद तो मेघा दीदी आ ही जाएगी" नमिता ने उसके बाद तनु को फोन कर दिया और उसे अपने पास बुला लिया। तनु भी खुशी खुशी नमिता के पास आ गई। आखिर नमिता को पूरा टाइम चल रहा था। डिलीवरी कभी भी हो सकती थी। तनु के आने के दो दिन बाद ही नमिता ने एक बेटे को जन्म दिया।

अस्पताल में तो समीर और शोभा जी ने जैसे तैसे संभाला। लेकिन जैसे ही नमिता को घर पर लेकर आए, उसके बाद सारी जिम्मेदारी शोभा जी ने तनु पर डाल दी। घर के काम तो फिर भी ठीक थे लेकिन नवजात बच्चे और नमिता को कैसे संभाले। शोभा जी तो रात को अपने कमरे में जाकर सो जाती और तनु को नमिता की जिम्मेदारी दे देती। तनु को भी कोई चीज समझ में नहीं आती। आखिर एक कॉलेज में पढ़ने वाली लड़की कितना क्या ध्यान रख लेती। जैसे नमिता कहती वैसे वो कर देती थी। समीर ने दो दिन तक ये सब देखा। उसके बाद उसने एक काम वाली रख ही ली। कामवाली नमिता और उसके बच्चे का काम कर जाती। उनकी मालिश करना,नहलाना, उनके कपड़े धोना सारा काम कामवाली करके जाती। इस पर भी शोभा जी को समस्या थी।

" क्या जरूरत थी तुझे कामवाली रखने की‌। अगर मेघा आती तब तो कामवाली नहीं रखता। अपनी साली के लिए तो कामवाली रख ली" " मम्मी मेघा दीदी के दो बच्चे हो चुके हैं। उन्हें अच्छे से पता है कि इस समय एक औरत को क्या जरूरत होती है। और बच्चे कैसे संभाले जाते हैं‌। तनु से आप क्या उम्मीद करते हो। आपने तो सारा काम तनु पर डाल दिया। तो फिर मैं क्या करता" लेकिन शोभा जी को तो जैसे चैन ही नहीं था। वो तो तनु के पीछे हाथ धोकर पड़ चुकी थी। घर के सारे काम करने के बाद जब तनु पढ़ने बैठती तो उसे कोई ना कोई काम बता ही देती। ये सब नमिता को भी समझ में आ रहा था। पर वो अभी कुछ नहीं कर सकती थी।

तनु के हर काम से उन्हें समस्या थी। " अरे पता नहीं अपनी मम्मी के जाने के बाद घर कैसे संभालती होगी। इसे तो कुछ भी नहीं आता है। ना ही ढ़ंग का 

खाना बनाना आता है, और ना ही घर के काम" कई बार तो ये सब वो तनु के मुंह पर बोल चुकी थी। पर तनु चुप ही रहती। आखिर दीदी का ससुराल था। ज्यादा कुछ कह भी नहीं सकते थे। जैसे तैसे कर बीस दिन निकले। मेघा अपने मायके आ गई। समीर ने तनु को घर छोड़कर आने के लिए कहा तो शोभा जी ने कहा," अरे दो दिन बाद तो नहावन है ही। तब इसके पापा आएंगे ही अपने नाती और बेटी के कपड़े लेकर। उस समय इसे लेते जाएंगे। क्यों बेवजह जाने का खर्चा कर रहा है"

" हां भाई, तनु दो दिन बाद चली जाएगी। वैसे मैं भी बहुत थकी हुई हूं। पहाड़ों की चढ़ाई चढ़कर हाथ पैर ही दुख रहे हैं। अभी तनु संभाल तो रही है। एक-दो दिन मुझे भी आराम मिल जाएगा। फिर तो भाभी की सेवा में ही लगना है" मेघा ने कहा। " ठीक है मम्मी, पर तनु के लिए कुछ ढंग का गिफ्ट ले आना। आखिर यहां से खाली हाथ थोड़ी ना जाएगी। या फिर बाजार जाकर उसे आप खुद ही दिलवा कर ले आओ। वो अपनी पसंद का ही कुछ ले आएगी" समीर ने कहा। " अरे उसे क्या देना है? पांच सौ रूपए दे देना और विदा कर देना" शोभा जी ने कहा। " मम्मी कैसी बातें कर रही हो? आखिर तनु नमिता की छोटी बहन है। ऊपर से उसने इतने दिन से काफी हद तक काम संभाल लिया। आखिर वो भी नेग की हकदार है" " देख समीर, अपने यहां तो रिवाज नहीं है बहू के मायके वालों को नेग देने का। तेरी इतनी ही इच्छा है तो ज्यादा से ज्यादा एक सूट और ₹500 दे देना। इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं देने दूंगी" शोभा जी तुनकते हुए बोली। " और जरा अपने ससुर जी को समझा देना कि नेग में क्या-क्या लगेगा। नहावन के दिन वो सारा सामान लेकर के आए। और कह देना कि मेरी और मेघा की साड़ी थोड़ी ढंग की लेकर आए। मैं हल्की-फुल्की साड़ी नहीं पहनूंगी और ना हीं मेरी बेटी पहनेगी"

खैर, नहावन का दिन भी आ गया। नमिता के पापा जब आए तो अपने साथ नाती और अपनी बेटी के साथ साथ घर के 

सभी सदस्यों के लिए कपड़े और शगुन के लिफाफे लेकर आए थे।

जब नमिता के पापा जाने लगे तो तनु भी उनके साथ रवाना होने लगी। उसी समय शोभा जी ने एक सूट और ₹500 का 

लिफाफा उसे पकड़ाते हुए कहा, 

" ये हमारी तरफ से तुम्हारा नेग। आखिर तुमने इतने दिन अपनी बहन की सेवा जो की है। उसका तो ये प्रतिफल बनता ही है"

लेकिन तभी समीर वहां आ गया और उसने एक और लिफाफा तनु के हाथ में पकड़ा दिया। और कहा," ये मेरे और नमिता की तरफ से तुम्हारे लिए। तुम्हें जो खरीदना है, अपनी पसंद का खरीद लेना" ये देखकर शोभा जी गुस्सा हो गई। लेकिन उस समय उन्होंने कुछ नहीं कहा। तनु अपने पापा के साथ रवाना हो गई। उनके जाते ही शोभा जी ने कहा, " समीर यह क्या हरकत है? जब मैंने तनु को विदाई दे दी थी तो तुझे अलग लिफाफा देने की क्या जरूरत थी" " मम्मी इसमें गलत क्या है? आखिर वो भी तो नेग की हकदार है। अपनी पढ़ाई लिखाई छोड़कर वो यहां अपनी बहन की सेवा करने आ गई, वही बड़ी बात है। उसके बदले अगर हमने खुश होकर उसे थोड़ा बहुत दे दिया तो क्या हर्ज है" " पर हमारे यहां बहू की बहन को नेग देने का रिवाज नहीं है। ये क्या उल्टी गंगा बहा रहा है" अब की बार मेघा ने कहा। " क्यों दीदी? जब जरूरत थी तब बहू की छोटी बहन को बुला लो। और नेग देने के नाम पर रिवाज नहीं है। भला ये क्या बात हुई। नेग का असल हालदार तो वही होना चाहिए जो असल में काम कर रहा है। सिर्फ रिश्ते नाते से नेग के हकदार नहीं बन जाते। उसके मायके वालों से तो नेग लेने के लिए आप लोग तैयार हो गए। लेकिन जब काम की बात थी तो पीछे हट गए। मम्मी दीदी की डिलीवरी के समय तो आपने भाग भाग कर काम किया था। फिर बहू के डिलीवरी के समय क्या हो गया। बुरा मत मानना मम्मी। लेकिन अभी जो व्यवहार आप बहू के साथ करोगी, वही उसे जिंदगी भर याद रहने वाला है। क्योंकि अपने डिलीवरी के समय को कोई औरत नहीं भूलती"समीर ने कहा तो शोभा जी आगे कुछ कह नहीं पाई। आखिर बोल भी क्या सकती थी। समीर गलत तो नहीं कह रहा था। इसलिए अपने आप ही सब चुप हो गए, क्योंकि आज सही वक्त पर सही जवाब दे दिया गया था।

Friday, 27 September 2024

महिलाएं अपने सारे राज़ नहीं बतातीं

 महिलाएं भी पुरुषों की तरह शारीरिक संबंधों की ओर आकर्षित होती हैं, लेकिन अक्सर वे अपनी रुचि को व्यक्त नहीं करतीं। वे अपने पति या साथी से भी इस बारे में खुलकर बात करने में हिचकिचाती हैं। इसके पीछे सामाजिक दबाव और दूसरों के विचारों की चिंता होती है। कई बार महिलाएं अपनी इच्छाओं को दबा देती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके बारे में बात करने पर उन्हें गलत समझा जा सकता है।


महिलाएं आमतौर पर गुप्त संबंधों के बारे में खुलकर बात नहीं करतीं

पुरुष अक्सर एक-दूसरे से शारीरिक संबंधों के बारे में खुलकर बात कर लेते हैं, जबकि महिलाएं इस तरह की बातें दूसरों से साझा करने में संकोच करती हैं। ज्यादातर महिलाएं केवल अपनी एक-दो करीबी दोस्तों से ही गुप्त बातें साझा करती हैं। आप अपनी गर्लफ्रेंड से इस बारे में बात कर सकते हैं, लेकिन वह भी शायद इसे केवल अपनी सबसे करीबी दोस्त तक ही सीमित रखेगी।


महिलाओं को सफल पुरुषों में दिलचस्पी होती है

महिलाएं अक्सर ऐसे पुरुषों की ओर आकर्षित होती हैं जो सफल होते हैं। उनकी रुचि उन पुरुषों में अधिक होती है जो करियर और जीवन में सफल माने जाते हैं, जबकि पुरुष अक्सर सुंदर और आकर्षक महिलाओं की ओर आकर्षित होते हैं।


महिलाएं दिखावे पर ध्यान देती हैं

कई महिलाएं खुद को सुंदर और आकर्षक दिखाने के लिए हर संभव प्रयास करती हैं। वे नए कपड़े पहनने और स्टाइलिश दिखने पर जोर देती हैं। सज-संवर कर बाहर जाना एक सामान्य व्यवहार है क्योंकि वे दूसरों की नजर में खूबसूरत दिखने की कोशिश करती हैं।


कुंवारी लड़कियां अक्सर अपने आदर्श पुरुष के बारे में सोचती हैं

अधिकतर कुंवारी लड़कियां अकेले में अपने भविष्य के पति या ब्वॉयफ्रेंड के बारे में सोचती हैं। वे अपने आदर्श साथी और उनके साथ बिताए जाने वाले भविष्य के पलों की कल्पना करती हैं।


शारीरिक असंतोष से अवैध संबंधों की संभावना बढ़ती है

यदि एक महिला अपने साथी के साथ शारीरिक रूप से संतुष्ट नहीं होती, तो अवैध संबंध बनने की संभावना बढ़ जाती है। यह कई बार विवाहेतर संबंधों का प्रमुख कारण होता है।


कुंवारी माताओं की संख्या में वृद्धि

अध्ययनों के अनुसार, कुछ महिलाएं कुंवारी होते हुए भी मां बन जाती हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि 30% महिलाएं इस स्थिति में होती हैं।


महिलाओं का सबसे अधिक उत्साहित होने का समय

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, पीरियड्स के चार से पांच दिन बाद महिलाओं में शारीरिक और मानसिक उत्तेजना अधिक होती है।


महिलाओं को परिपक्व पुरुष पसंद आते हैं

अधिकांश महिलाएं परिपक्व और स्थिर पुरुषों की ओर आकर्षित होती हैं, जबकि पुरुष अक्सर छोटी उम्र की महिलाओं को प्राथमिकता देते हैं।


महिलाएं चाहती हैं कि लोग उनकी ओर देखें

अधिकतर महिलाएं सजने-संवरने में रुचि रखती हैं क्योंकि वे चाहती हैं कि जहां भी जाएं, लोग उनकी ओर ध्यान दें।


महिलाएं अपने सारे राज़ नहीं बतातीं

महिलाएं अपने गहरे राज़ कभी-कभी अपने साथी से भी साझा नहीं करतीं। वे कुछ बातें अपने तक ही रखना पसंद करती हैं।


महिलाएं भावनात्मक रूप से कमजोर होती हैं

महिलाएं आमतौर पर पुरुषों से अधिक भावनात्मक होती हैं। वे अपनी भावनाओं को ज्यादा महसूस करती हैं और छोटे-छोटे मामलों में भी आंसू बहा सकती हैं।


इस लेख का अंत तक पढ़ने के लिए धन्यवाद! 🌸

Thursday, 26 September 2024

1993 में रिलीज हुई Indecent Proposal नामक फ़िल्म में कहानी है एक युगल "डेविड और डियाना" की,

 क्या हो कि आप भीषण दरिद्रता में जीवन बिता रहे हों और आपको कहीं से ऐसा ऑफर मिले, जिसमें जीवन भर के कष्ट दूर कर देने लायक धन का लालच हो - अपनी पत्नी की एक रात के बदले। 

सुनने में यह बड़ा अभद्र लगता है और कई लोग इस सिचुएशन को हाइपोथेटिकल करार देकर तुरंत मना कर देंगे। पर क्या हो, अगर ऑफर वास्तविक हो? 

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1993 में रिलीज हुई Indecent Proposal नामक फ़िल्म में कहानी है एक युगल "डेविड और डियाना" की, जो कर्जों में डूबे हुए हैं। घर बिकने की कगार पर है। जो कुछ जेब मे बचा होता है, उसे डबल करने के चक्कर में एक कैसिनों में जा कर ठन-ठन गोपाल हो जाते हैं। 

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उसी कैसिनो में मौजूद एक अरबपति बूढ़े "जॉन गेज" की नजर डियाना पर पड़ती है, जो एक नजर में उसे भा जाती है। और उसी रात जॉन इस युगल से दोस्ती करके बातों-बातों में एक मिलियन डॉलर का ऑफर देता है - डियाना की एक रात के बदले में। 

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फ़िल्म इंसानी जटिल मनोविज्ञान का क्या बख़ूबी चित्रण करती है - कुछ देर पहले उस अरबपति बूढ़े को इस ऑफर के लिए लताड़ के आये युगल की आंखों से नींद गायब हो गयी है। एक-दूसरे के मनोभावों को जान रहे दोनों बिस्तर पर करवटें बदल रहे हैं और अंततः एक-दूसरे से पूछ ही लेते हैं कि - तुम भी वही सोच रहे हो, जो मैं?

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इस ऑफर को कबूल करने के बाद इस युगल की जिंदगी में कुछ भी सामान्य नहीं रहता और वो रात उनके आगे के पूरे जीवन को खराब कर देती है। प्राइम पर मौजूद इस फ़िल्म को प्रेम और लालच के मिश्रण से उत्पन्न त्रासदी को समझने के लिए देखा जा सकता है। 

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और इस फ़िल्म की सबसे खास बात यह है कि फ़िल्म खत्म होते-होते प्रथमदृष्टया एक सनकी अरबपति बूढ़ा प्रतीत होते जॉन गेज के व्यक्तित्व से आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते और आपको उसके किरदार की गहराई से प्रेम हो चुका होता है।

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फ़िल्म के अंतिम दृश्य में डियाना को बिना अपराधबोध महसूस कराए डेविड के पास वापस भेजने के लिए जॉन गेज जानबूझकर एक नाटक करता है। जब डियाना उससे दूर जा रही होती है तो गेज का ड्राइवर उससे अचरज भरे स्वर में पूछता है कि - तुमने ऐसा क्यों किया?

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तो गेज जवाब देता है - क्योंकि कुछ देर पहले वो डेविड को जिन निगाहों से देख रही थी, उन निगाहों से वो मुझे कभी नहीं देखती। 

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फ़िल्म का सेंट्रल प्लाट इतना भर है कि - क्या पैसे से प्यार खरीदा जा सकता है? और मुझे लगता है कि इसी दृश्य में फ़िल्म अपना निष्कर्ष बता जाती है। 

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शायद पैसे से लोग खरीदे जा सकते हैं। उनका वक़्त, उनका साथ हासिल किया जा सकता है। 

पर उन निगाहों को हासिल कभी नहीं किया जा सकता - जिन निगाहों से कोई अपने प्रेम को देखता है। 

Wednesday, 25 September 2024

रेमंड ग्रुप के मालिक विजयपत सिंघानिया पैदल हो गए। बेटे ने पैसे-पैसे के लिए मोहताज कर दिया।

 दो खबरों पर जरा नजर डालिए। 

1- 12 हजार करोड़ रुपये की मालियत वाले रेमंड ग्रुप के मालिक विजयपत सिंघानिया पैदल हो गए। बेटे ने पैसे-पैसे के लिए मोहताज कर दिया। 

2- करोड़ों रुपये के फ्लैट्स की मालकिन आशा साहनी का मुंबई के उनके फ्लैट में कंकाल मिला।  

विजयपत सिंघानिया और आशा साहनी, दोनों ही अपने बेटों को अपनी दुनिया समझते थे। पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाकर उन्हें अपने से ज्यादा कामयाबी की बुलंदी पर देखना चाहते थे। हर मां, हर पिता की यही इच्छा होती है। विजयपत सिंघानिया ने यही सपना देखा होगा कि उनका बेटा उनकी विरासत संभाले, उनके कारोबार को और भी ऊंचाइयों पर ले जाए। आशा साहनी और विजयपत सिंघानिया दोनों की इच्छा पूरी हो गई। आशा का बेटा विदेश में आलीशान जिंदगी जीने लगा, सिंघानिया के बेटे गौतम ने उनका कारोबार संभाल लिया, तो फिर कहां चूक गए थे दोनों। क्यों आशा साहनी कंकाल बन गईं, क्यों विजयपत सिंघानिया 78 साल की उम्र में सड़क पर आ गए। मुकेश अंबानी के राजमहल से ऊंचा जेके हाउस बनवाया था, लेकिन अब किराए के फ्लैट में रहने पर मजबूर हैं। तो क्या दोषी सिर्फ उनके बच्चे हैं..? 

अब जरा जिंदगी के क्रम पर नजर डालें। बचपन में ढेर सारे नाते रिश्तेदार, ढेर सारे दोस्त, ढेर सारे खेल, खिलौने..। थोड़े बड़े हुए तो पाबंदियां शुरू। जैसे जैसे पढ़ाई आगे बढ़ी, कामयाबी का फितूर, आंखों में ढेर सारे सपने। कामयाबी मिली, सपने पूरे हुए, आलीशान जिंदगी मिली, फिर अपना घर, अपना निजी परिवार। हम दो, हमारा एक, किसी और की एंट्री बैन। दोस्त-नाते रिश्तेदार छूटे। यही तो है शहरी जिंदगी। दो पड़ोसी बरसों से साथ रहते हैं, लेकिन नाम नहीं जानते हैं एक-दूसरे का। क्यों जानें, क्या मतलब है। हम क्यों पूछें..। फिर एक तरह के डायलॉग-हम लोग तो बच्चों के लिए जी रहे हैं। 

मेरी नजर में ये दुनिया का सबसे घातक डायलॉग है-'हम तो अपने बच्चों के लिए जी रहे हैं, बस सब सही रास्ते पर लग जाएं।' अगर ये सही है तो फिर बच्चों के कामयाब होने के बाद आपके जीने की जरूरत क्यों है। यही तो चाहते थे कि बच्चे कामयाब हो जाएं। कहीं ये हिडेन एजेंडा तो नहीं था कि बच्चे कामयाब होंगे तो उनके साथ बुढ़ापे में हम लोग मौज मारेंगे..? अगर नहीं तो फिर आशा साहनी और विजयपत सिंघानिया को शिकायत कैसी। दोनों के बच्चे कामयाब हैं, दोनों अपने बच्चों के लिए जिए, तो फिर अब उनका काम खत्म हो गया, जीने की जरूरत क्या है। 

आपको मेरी बात बुरी लग सकती है, लेकिन ये जिंदगी अनमोल है, सबसे पहले अपने लिए जीना सीखिए। जंगल में हिरन से लेकर भेड़िए तक झुंड बना लेते हैं, लेकिन इंसान क्यों अकेला रहना चाहता है। गरीबी से ज्यादा अकेलापन तो अमीरी देती है। क्यों जवानी के दोस्त बढ़ती उम्र के साथ छूटते जाते हैं। नाते रिश्तेदार सिमटते जाते हैं..। करोड़ों के फ्लैट की मालकिन आशा साहनी के साथ उनकी ननद, भौजाई, जेठ, जेठानी के बच्चे पढ़ सकते थे..? क्यों खुद को अपने बेटे तक सीमित कर लिया। सही उम्र में क्यों नहीं सोचा कि बेटा अगर नालायक निकल गया तो कैसे जिएंगी। जब दम रहेगा, दौलत रहेगी, तब सामाजिक सरोकार टूटे रहेंगे, ऐसे में उम्र थकने पर तो अकेलापन ही हासिल होगा।

इस दुनिया का सबसे बड़ा भय है अकेलापन। व्हाट्सएप, फेसबुक के सहारे जिंदगी नहीं कटने वाली। जीना है तो घर से निकलना होगा, रिश्ते बनाने होंगे। दोस्ती गांठनी होगी। पड़ोसियों से बातचीत करनी होगी। आज के फ्लैट कल्चर वाले महानगरीय जीवन में सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि खुदा न खासता आपकी मौत हो गई तो क्या कंधा देने वाले चार लोगों का इंतजाम आपने कर रखा है..? जिन पड़ोसियों के लिए नो एंट्री का बोर्ड लगा रखा था, जिन्हें कभी आपने घर नहीं बुलाया, वो भला आपको घाट तक पहुंचाने क्यों जाएंगे..?

याद कीजिए दो फिल्मों को। एक अवतार, दूसरी बागबां। अवतार फिल्म में नायक अवतार (राजेश खन्ना) बेटों से बेदखल होकर अगर जिंदगी में दोबारा उठ खड़ा हुआ तो उसके पीछे दो वजहें थीं। एक तो अवतार के दोस्त थे, दूसरे एक वफादार नौकर, जिसे अवतार ने अपने बेटों की तरह पाला था। वक्त पड़ने पर यही लोग काम आए। बागबां के राज मल्होत्रा (अमिताभ बच्चन) बेटों से बेइज्जत हुए, लेकिन दूसरी पारी में बेटों से बड़ी कामयाबी कैसे हासिल की, क्योंकि उन्होंने एक अनाथ बच्चे (सलमान खान) को अपने बेटे की तरह पाला था, उन्हें मोटा भाई कहने वाला दोस्त (परेश रावल) था, नए दौर में नई पीढ़ी से जुड़े रहने की कूव्वत थी।  

विजयपत सिंघानिया के मरने के बाद सब कुछ तो वैसे भी गौतम सिंघानिया का ही होने वाला था, तो फिर क्यों जीते जी सब कुछ बेटे को सौंप दिया..? क्यों संतान की मुहब्बत में ये भूल गए कि इंसान की फितरत किसी भी वक्त बदल सकती है। जो गलती विजयपत सिंघानिया ने की, आशा साहनी ने की, वो आप मत कीजिए। रिश्तों और दोस्ती की बागबानी को सींचते रहिए, ये जिंदगी आपकी है, बच्चों की बजाय पहले खुद के लिए जिंदा रहिए। आप जिंदा रहेंगे, बच्चे जिंदा रहेंगे। अपेक्षा किसी से भी मत कीजिए, क्योंकि अपेक्षाएं ही दुख का कारण हैं।

उसकी शादी गांव की एक सीधी-साधी लड़की से करवा दी। लड़की का नाम कुमुद है।

 मेरे बेटे की शादी मैंने मुश्किल से करवाई। वह एक लड़की से प्यार करता था, लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि उसकी शादी उसी से हो।


मैंने उसे बहुत समझाया और उसकी शादी गांव की एक सीधी-साधी लड़की से करवा दी। लड़की का नाम कुमुद है।


मुझे पता था कि यह लड़की मेरे बेटे और इस घर के लिए बहुत अच्छी है, इसलिए मैंने उस लड़की की शादी मेरे बेटे से करवा दी।


कुमुद हमारे घर में आई। लड़की घरेलू थी, बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करती थी और घर का काम भी करती थी। अभी 10 ही महीने हुए थे शादी को, लेकिन मुझे लगने लगा कि मैंने अपने बेटे की शादी इस लड़की से करवा कर अच्छा किया। मेरा बेटा अरविंद भी खुश लग रहा था।


लेकिन उस रात के बाद मेरी यह सोच बदल गई। एक रात करीब 2 बजे मेरे बेटे के कमरे से चीखने की आवाज आने लगी।


ये चीखें मेरी बहू की थीं। मैंने थोड़ी देर तक सुना फिर वह चीखना बंद हो गया। अरविंद के पिता, मेरे पति, को यह सब सुनाई दिया था लेकिन फिर हमने उन्हें रात में पूछना उचित नहीं समझा। इसलिए दरवाजा नहीं खटखटाया। सुबह मेरी बेटी भी बोल रही थी कि मम्मी, रात को कौन चीख रहा था?


मैंने उसकी बात काट दी, कहा कि कोई नहीं, शायद कोई बाहर से चीख रहा था। मेरी बहू का स्वभाव उस दिन से बदल गया। वह चुप थी सारा दिन।


मैंने सोचा शायद पति-पत्नी के बीच की कोई बात होगी, इसलिए मैंने कुछ पूछा नहीं। अगली रात फिर 2 बजे वही हुआ, मेरे बेटे के कमरे से फिर चीखने और रोने की आवाज आने लगी। इस रात वह आवाज करीब 10 मिनट तक चली। मेरी बेटी उठ गई और उसने हमारे कमरे का दरवाजा बजाया।


मैंने दरवाजा खोला। देखा तो वह बहुत डरी हुई थी। बोली, मम्मी, यह क्या है? भाभी रोज रात को रोती और चीखती क्यों है? क्या होता है?


कमरे के अंदर चलो, अभी दरवाजा खुलवाते हैं। मैं दरवाजे के पास जाने लगी तो मेरे पति ने मुझे रोक लिया, कहा कि रुको, अभी बात मत करो, कल सुबह दोनों से बात करते हैं।


उस रात को मेरा सोना मुश्किल हो गया था। सुबह मेरी बहू जल्दी उठकर घर के काम में लग गई। मैंने सुबह अपने बेटे के कमरे में जाकर पूछा कि क्या बात है, रात को बहू रोती क्यों है? उसका चेहरा पूरा उतर चुका था। उसने कहा कुछ नहीं। उसकी बातों और आंखों से साफ दिखाई दे रहा था कि वह कुछ छिपा रहा है। उन्होंने भी उससे पूछा लेकिन वह कुछ नहीं बोल कर घर से बाहर चला गया। मैंने अपनी बहू से पूछा। वह कुछ काम कर रही थी।


उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे रात में ठीक से सोई नहीं है। आंखें साफ बता रही थीं। मैंने उसे पूछा, क्या हुआ, तुम रात को रो क्यों रही थी?


वह बोली, रो रही थी कब? नहीं, मैं तो सो रही थी और मुझे तो कोई आवाज नहीं आई। आप क्या बात कर रही हैं? उस कमरे में ऐसा क्या हो रहा था, यह बात या तो मेरी बहू जानती थी या बेटा, लेकिन दोनों ही कुछ नहीं बता रहे थे। लेकिन दोनों के चेहरे से साफ पता चल रहा था कि कुछ है जो ये दोनों छिपा रहे हैं। लेकिन क्या?


अब जब भी रात आती, मुझे नींद ही नहीं आती। क्यों कि आधी रात को फिर वही होता। बहू ज़ोर से चीखती और रोती।


मेरे मन में कई सवाल थे, क्या होता है उस कमरे में? फिर एक रात करीब 2 बजे मेरे घर में वो हुआ जो मैंने सोचा भी नहीं था।


मेरी बहू रात को कमरे से बाहर आ गई। उसके कपड़े कहीं भी जा रहे थे, उसे कुछ होश ही नहीं था। बाल खुले थे और वह घर के चौक में आकर बैठ गई। ज़ोर से चीखने और रोने लगी। हम सभी घर वाले बाहर आ गए। मेरा बेटा भी कमरे से डरा हुआ बाहर आया। बहू की ऐसी हालत देखकर हम सब ही डर गए थे।


मैंने अपने बेटे से पूछा, यह क्या है? वह बोला, बस माँ, देख लो, यह रोज रात 2 बजे ऐसी ही करती है। मैं आप लोगों को क्या बताता?


सुबह जब उसे पूछता हूं तो उसे कुछ याद ही नहीं रहता है। बोलती है मैंने तो कुछ नहीं किया। बहू जब थोड़ी देर बाद शांत हुई तो मेरे बेटे ने उसे कमरे में ले जाकर सुला दिया।


मैं सोच रही थी, यह क्या है? मैंने अपने बेटे को कहा, तू उसे उसके घर छोड़ आ सुबह। मैं उसकी माँ से बात करूंगी।


सुबह होते ही मेरे बेटे ने उसे कुछ बहाना करके उसके घर छोड़ दिया। मैंने उसकी माँ से बात की। उसकी माँ ने कहा, यह क्या बोल रही हैं? मेरी बेटी बिल्कुल ऐसा नहीं करती है। मैंने जो सोचकर अरविंद की शादी उससे की थी, वैसा हो नहीं सका। बहू को छोड़े अब 20 दिन हो चुके थे।


इस दौरान उसके घर से फोन आता रहा लेकिन मैंने टाल दिया। मेरा बेटा भी कह रहा था कि मेरे वह दिन कैसे निकले हैं, मैं ही जानता हूं।


मैंने उस पर फिर ज्यादा दबाव नहीं डाला। पर मैं अपने आप को कोस रही थी कि मैंने अपने बेटे की शादी उस लड़की से क्यों करवाई। अब मेरे घर में कोई नहीं चाहता था कि वह वापस आए। इन्हीं सब बातों में 3 महीने निकल गए।


फिर एक दिन अचानक ही मेरी बहू अपने सामान के साथ वापस मेरे घर आ गई। वह आते ही मुझसे कहती है, माँजी, मैं जानती हूं कि आप मेरे बारे में क्या सोच रही हैं, लेकिन सच क्या है, यह आपको पता नहीं है।


उसकी बातों से मुझे लगा कि कुछ है जो वह बताना चाहती है। मेरा बेटा घर आया और उसे देखकर गुस्सा हो गया, कहा, यह यहाँ वापस आ गई। मैं अब इस घर में नहीं रह सकता, मैं जा रहा हूं। मेरी बहू ने उसी समय कहा, क्यों, सच सामने आ जाएगा, इसलिए डर रहे हैं। बताइये सबको सच क्या है। मैं उस तरह से क्यों करती थी।


बेटा बोला, क्या सच, सच यह है कि तुम पागल हो और रोज रात उस तरह से करती हो। बहू बोली, माँजी, आज अगर सबसे ज्यादा दुखी और परेशान है तो वह और कोई नहीं, मैं हूं।


मैंने अपने पति की बात मानी, उन पर विश्वास किया। मैंने कहा, तुम क्या कहना चाहती हो? फिर मेरी बहू ने जो बताया, उसे सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


वह बोली, आपके बेटे ने मुझे पहली रात से यह नाटक करने को कहा था, लेकिन मैंने नहीं माना। वह कहते थे कि हम दोनों अलग बड़े शहर में जाकर रहेंगे। उन्हें कहा कि अगर ऐसे मेरे घर वाले मुझे नहीं छोड़ेंगे, लेकिन तुम इस तरह का नाटक करोगी तो वे डर जाएंगे और फिर हम अलग रहेंगे।


पहले मैंने बोला कि यहाँ सबके साथ अच्छा है, लेकिन फिर जब वह मुझसे बात नहीं करते थे तो मुझे उनकी बात माननी पड़ी। और फिर मैंने जब सब नाटक किया तो उन्होंने मुझे घर छोड़ दिया। मुझे आप सभी की नजरों में पागल और न जाने क्या साबित कर दिया।


उसके बाद मेरा फोन भी नहीं उठाया। मैं उनका वहाँ मेरे घर इंतजार कर रही थी लेकिन वह नहीं आए। मैंने समझ लिया कि उन्होंने मुझे बेवकूफ बनाया है। मुझसे झूठ बोला है। यह मुझे अपनी ज़िंदगी से भगाना चाहते थे। मैं इस बात को समझ गई। अब मैं खुद ही इनसे दूर चली जाऊंगी लेकिन मैं चाहती थी कि सच आप सभी के सामने आ जाए।


मुझे बहू की बातों पर पूरा विश्वास हो गया था। मेरे बेटे ने कहा, तुम्हें इसे रखना है तो रखो। मेरी शादी तुमने उससे नहीं होने दी जिससे मैं चाहता था और इस गाँव की लड़की से करवा दी। मैं चाहता था कि यह भी यहाँ से चली जाए। तुम परेशान हो, सोचो कि मैंने क्या किया।


अब भी मैं इसे अपनी पत्नी नहीं मानता। मैंने अपने बेटे को कहा कि बेटा, तुझे इस घर में रहना है या नहीं, इसका फैसला तू कर ले। मेरी बहू इस घर में ही रहेगी। और जो इसे इसका हक और इज़्ज़त नहीं देगा, वह इस घर में नहीं रह सकता। तू इस तरह की साज़िश कर सकता है, वो भी सिर्फ अपनी माँ से बदला लेने के लिए। एक भोली लड़की को कुछ भी करने को कह सकता है। लेकिन बेटा, जरा सोच, तूने इसे जो करने को कहा, इसने किया अपने बारे में और किसी के बारे में कुछ नहीं सोचा। सिर्फ तेरा सोचा। सोच ऐसी पत्नी कहाँ मिलेगी। तू बहुत बड़ा अभागा है जो इस लड़की को छोड़ेगा। मैंने अपने बेटे की शादी के लिए हीरा चुना था, लेकिन शायद मेरा बेटा ही उसके लायक नहीं था। मैंने अपनी बहू को प्यार से गले लगाया। मेरा बेटा भी कहीं नहीं गया। थोड़े समय तक जरूर नाराज़ रहा। लेकिन मुझे पता था कि उस लड़की से प्यार किए बिना कैसे रह सकता था। आखिर धीरे-धीरे सब ठीक होने लगा।

हर इंसान की ज़िंदगी में किसी ना किसी से प्यार होता है एक बार, जब दिल टूट जाता है तो फिर वैसी मोहब्बत नही होती दुबारा, जिस से प्यार हो उसी से शादी हो कोई ज़रूरी नहीं, होता है लेकिन, सच्चा प्यार मिलता कहा है आजकल 

Tuesday, 24 September 2024

सुहागरात की वो घटना मेरे जीवन की एक यादगार और मजेदार घटना है

 सुहागरात की वो घटना मेरे जीवन की एक यादगार और मजेदार घटना है, जिसे याद कर आज भी हंसी आ जाती है। उस रात मैं और मेरी पत्नी रिया एक-दूसरे के साथ समय बिता रहे थे, जब अचानक हमारे पलंग पर एक अनचाहा मेहमान आ गया—एक मकड़ी। 🕷


रिया मकड़ी देखकर जोर से चीख उठी, और उसकी चीख ने मुझे हैरान कर दिया। मुझे लगा कि शायद मुझसे कोई गलती हो गई है, लेकिन जब रिया ने मकड़ी की ओर इशारा किया, तब जाकर मुझे असली वजह समझ में आई। मैं हंसते हुए मकड़ी को भगाने में जुट गया। उस वक्त मकड़ी जैसे हमारे प्यारे पल को बर्बाद करने की पूरी कोशिश कर रही थी। आखिरकार, मैंने उस मकड़ी से निजात पा ली और हमारी प्यारी रात फिर से सामान्य हो गई। 


हम दोनों काफी देर बाद सोए और अगली सुबह जब मैं उठकर बाहर आया, तो सामने भाभीजी खड़ी थीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा, "रात को कोई हॉरर फिल्म देख रहे थे?" मैं थोड़ा असहज हो गया, लेकिन फिर हंसते हुए सच्चाई बता दी कि कमरे में एक मकड़ी आ गई थी, जिसकी वजह से रिया चिल्ला उठी थी। भाभीजी ने भी हंसते हुए कहा, "अरे, मकड़ियां तो इन दिनों हर जगह हैं, ध्यान रखना कहीं काट न लें।"

उसके बाद मैंने सोचा, अगर भाभीजी ने रात की आवाजें सुनीं, तो शायद मेरे छोटे भाई-बहन ने भी सुनी होंगी, लेकिन उन्होंने इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा। हालांकि, मुझे अंदर ही अंदर यह एहसास हुआ कि उन दोनों के मन में भी कुछ न कुछ जरूर आया होगा। 

उस घटना के बाद हमने यह सुनिश्चित किया कि कमरे में कोई और अनचाहा मेहमान न हो। हम दोनों ने मिलकर पूरा कमरा छान मारा और फिर जाकर अगली रात चैन से सो पाए।

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...