मेरी शादी के कुछ समय बाद मेरी पत्नी, नेहा, अपने मायके आगरा चली गईं। उस वक्त वह मायके में अपने परिवार के साथ कुछ दिन बिताने गई थीं, और उनके जाते ही मेरे लिए घर जैसे वीरान हो गया। एक-एक पल काटना मुश्किल होने लगा। शादी के बाद से नेहा के बिना रहना पहली बार हो रहा था, और हर कोने में उसकी कमी महसूस हो रही थी।
मेरे माता-पिता गांव में रहते थे, और मेरी नौकरी के कारण मुझे शहर में रहना पड़ता था। नेहा के जाते ही मेरा मन कहीं भी नहीं लग रहा था। हर तरफ एक सन्नाटा छा गया था, और मैं अकेलेपन में घिर गया था। काम से आकर जब भी घर आता, घर की दीवारें जैसे मुझसे बात करने लगतीं, पर नेहा के बिना वे बातें अधूरी लगतीं।
आखिरकार, एक हफ्ते का वक्त तो जैसे-तैसे गुजर गया। फिर मैंने सोचा, अब और नहीं सहा जा सकता। नेहा के बिना घर में रहना मुश्किल हो रहा था। मैंने अपने ऑफिस से अचानक छुट्टी ली और आगरा के लिए रवाना हो गया।
उस जमाने में मोबाइल फोन नहीं थे, सिर्फ चिट्ठियों का ही सहारा था। हम एक-दूसरे से चिट्ठियों के जरिए ही बात किया करते थे। मेरी चिट्ठियों में अक्सर थोड़ा-बहुत साहित्यिक रंग होता था, कभी कुछ शेरो-शायरी होती तो कभी कुछ हल्के-फुल्के मजाक। नेहा को मेरी चिट्ठियां बेहद पसंद आती थीं, और उसने आज भी उन चिट्ठियों को सहेज कर रखा है।
जब मैं अचानक बिना किसी सूचना के ससुराल पहुंचा, तो मेरी सास, शोभा आंटी, मुझे देखकर थोड़ी चौंकीं। उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आई, लेकिन वह मुस्कान जैसे थोड़ी उलाहना भरी थी। उन्होंने मेरा स्वागत किया और तुरंत ही कहा, "अरे, आप तो पंद्रह दिन बाद आने वाले थे, इतनी जल्दी कैसे आ गए?"
मैं अंदर से हंस रहा था, लेकिन उन्हें यह कैसे बताता कि मेरा तो एक-एक दिन काटना भारी पड़ रहा था। उनके इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं था, तो मैं चुप रहा। शायद उन्होंने मेरी चुप्पी को ठीक से समझा नहीं, और वह कहने लगीं, "मैं अभी सुधा को नहीं भेजने वाली। आप सात दिन बाद आइए और तब लेकर जाइए।"
नेहा वहीं बैठी हुई थी, और हमारी नजरें मिलते ही मैं समझ गया कि वह भी मेरे साथ वापस जाना चाहती थी। लेकिन अब सवाल यह था कि सासू मां को कैसे मनाया जाए। मेरी आदत है कि जब भी मुश्किल वक्त आता है, मैं जल्दी से कोई न कोई बहाना बना लेता हूँ। उस दिन भी ऐसा ही कुछ हुआ।
मैंने सासू मां से कहा, "मम्मी, खाना कौन बनाएगा? आपके बिना घर में खाना बनाना भी नहीं हो पाता। पिछले कुछ दिनों से मैं बस एक वक्त का खाना खा रहा हूँ, वो भी मुश्किल से। वैसे सात-आठ दिन और भूखे रह लूंगा, कोई बात नहीं।"
मैंने अपने चेहरे पर पूरी मासूमियत ला दी, और शायद मेरी मासूमियत काम कर गई। सासू मां के चेहरे पर चिंता उभर आई। कौन सी सास अपने दामाद को भूखा रहने देना चाहेगी? तुरंत ही उन्होंने फरमान जारी कर दिया, "ठीक है, इस बार मैं भेज रही हूँ, लेकिन अगली बार जब सुधा मायके आएगी, तो एक महीने के लिए छोड़ना होगा। समझे?"
मैंने मन ही मन सोचा, 'मरता क्या न करता!' मैंने भी सोचा, "अभी तो अपनी बात बनाओ, आगे की आगे देखी जाएगी।" हमने उनकी बात मान ली और नेहा को लेकर खुशी-खुशी घर लौट आए।
नेहा को घर लौटकर बहुत खुशी हुई। जैसे मुझे उसकी कमी महसूस हो रही थी, वैसे ही वह भी मेरे बिना रह नहीं पा रही थी। अब मुझे यह समझ में आया कि उसकी भावनाएं भी मेरी ही तरह थीं।
कुछ महीने बीते और एक बार फिर से नेहा को उसके मायके भेजने का वक्त आ गया। इस बार साले साहब सुधा को लेने आए, और उनके साथ सासू मां का फरमान भी था—नेहा को इस बार पूरे एक महीने तक मायके में रहना था। हमने भी हंसते हुए हामी भर दी। इस बार नेहा अपने साथ ढेर सारे कपड़े लेकर गई, क्योंकि उसे पता था कि लंबा रुकना पड़ेगा। तब तक हमारा बेटा आर्यन भी हो गया था, और अब नेहा के बिना घर में रहना और भी मुश्किल लगने लगा था। लेकिन "जो वादा किया, वो निभाना पड़ेगा" की तर्ज पर मैंने खुद को संभाला और एक महीने के लिए तैयार हो गया।
लेकिन मुश्किल तो तब शुरू हुई जब आठ-दस दिन बीते ही थे कि नेहा की चिट्ठी आ गई। उसमें लिखा था, "तुम्हारे बिना एक-एक दिन काटे नहीं कटता। आकर ले जाओ ना।"
बस, अब और रुकना मुमकिन नहीं था। जैसे ही चिट्ठी मिली, मैंने फौरन अपनी पैकिंग की और आगरा पहुंच गया।
इस बार जब सासू मां ने मुझे अचानक दरवाजे पर देखा, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने मुझे देखते ही कहा, "आपने तो एक महीने का वादा किया था! इतनी जल्दी कैसे आ गए?"
मैं चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा, और नेहा कमरे के कोने में बैठी मुस्कुरा रही थी। मुझे लग रहा था जैसे उसने मुझे इस स्थिति में फंसा दिया है और अब मज़े ले रही है। लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। फिर भी, जब सासू मां ने गुस्से में अपनी बातें जारी रखीं, तो मैंने धीरे से नेहा को इशारे से बुलाया और उससे कहा, "तुम्हारी मम्मी मुझ पर पिल पड़ी हैं। कुछ तो बोलो उन्हें!"
नेहा ने हंसते हुए कहा, "ये आपकी समस्या है। मम्मी को आप ही संभालो। मैं नहीं जानती, लेकिन मुझे कल हर हाल में यहां से लेकर जाना है।"
अब मेरे पास और कोई चारा नहीं था। मैंने सासू मां को दिखाने के लिए अपनी उंगली पर पट्टी बांध रखी थी, जिसमें चोट लगी होने का बहाना किया था। मैंने अपनी चोट दिखाई और कहा, "मम्मी, इस चोट की वजह से खाना नहीं बना पाता। इसलिए मुझे सुधा को लेकर जाना ही पड़ेगा।"
सासू मां को यकीन नहीं हुआ। उन्हें लगा कि यह कोई बहाना है। मैंने उन्हें पट्टी खोलकर चोट दिखाई, तो उन्होंने राहत की सांस ली। लेकिन फिर भी वह आसानी से मानने वाली नहीं थीं। उन्होंने कहा, "मैं अभी भी भेजने के मूड में नहीं हूं।"
मुझे लगा कि अब तो कुछ और सोचना पड़ेगा। आखिरकार मैंने सासू मां से कहा, "मम्मी, एक बार सुधा से भी तो पूछिए कि क्या वह रुकना चाहती है या नहीं।"
सासू मां ने नेहा की ओर देखा, और वह तुरंत कमरे से बाहर भाग गई। सासू मां चौंककर बोलीं, "सुधा, तूने तो जुल्म कर दिया!"
थोड़ी देर बाद सासू मां और नेहा दोनों ड्राइंग रूम में वापस आईं। सासू मां ने कहा, "मुझे माफ करना, मैंने आपसे पता नहीं क्या-क्या कह दिया। मुझे नहीं पता था कि सुधा का मन अब यहां नहीं लग रहा। बेटी का मन अपने ससुराल में लगना हमारे लिए खुशी की बात है। अब मैं समझ गई हूं कि आप दोनों एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते। यही प्यार तो असली रिश्ते की पहचान है।"
यह सुनकर मेरी आंखों में भी खुशी के आंसू आ गए। सासू मां ने हमें आशीर्वाद दिया और कहा, "आप दोनों की जोड़ी हमेशा बनी रहे, यही मेरी दुआ है।"
उस दिन मुझे एहसास हुआ कि प्यार और रिश्तों का असली मतलब यही है—एक-दूसरे की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना और एक-दूसरे के बिना अधूरा महसूस करना।