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Sunday, 18 August 2024

बंटवारा

 #बंटवारा

एक घर मे तीन भाई और एक बहन थी...बड़ा और छोटा पढ़ने मे बहुत तेज थे। उनके मा बाप उन चारो से बेहद प्यार करते थे मगर मझले बेटे से थोड़ा परेशान से थे।


बड़ा बेटा पढ़ लिखकर डाक्टर बन गया।


छोटा भी पढ लिखकर इंजीनियर बन गया। मगर मझला बिलकुल अवारा और गंवार बनके ही रह गया। सबकी शादी हो गई । बहन और मझले को छोड़ दोनों भाईयो ने Love मैरीज की थी।


बहन की शादी भी अच्छे घराने मे हुई थी।


आखीर भाई सब डाक्टर इंजीनियर जो थे।


अब मझले को कोई लड़की नहीं मिल रही थी। बाप भी परेशान मां भी।


बहन जब भी मायके आती सबसे पहले छोटे भाई और बड़े भैया से मिलती। मगर मझले से कम ही मिलती थी। क्योंकि वह न तो कुछ दे सकता था और न ही वह जल्दी घर पे मिलता था।


वैसे वह दिहाडी मजदूरी करता था। पढ़ नहीं सका तो...नौकरी कौन देता। मझले की शादी कीये बिना बाप गुजर गये ।


माँ ने सोचा कहीं अब बँटवारे की बात न निकले इसलिए अपने ही गाँव से एक सीधी साधी लड़की से मझले की शादी करवा दी।


शादी होते ही न जाने क्या हुआ की मझला बड़े लगन से काम करने लगा ।


दोस्तों ने कहा... ए चन्दू आज अड्डे पे आना।


चंदू - आज नहीं फिर कभी


दोस्त - अरे तू शादी के बाद तो जैसे बिबी का गुलाम ही हो गया?


चंदू - अरे ऐसी बात नहीं । कल मैं अकेला एक पेट था तो अपने रोटी के हिस्से कमा लेता था। अब दो पेट है आज


कल और होगा।


घरवाले नालायक कहते थे कहते हैं मेरे लिए चलता है।


मगर मेरी पत्नी मुझे कभी नालायक कहे तो मेरी मर्दानगी पर एक भद्दा गाली है। क्योंकि एक पत्नी के लिए उसका पति उसका घमंड इज्जत और उम्मीद होता है। उसके घरवालो ने भी तो मुझपर भरोसा करके ही तो अपनी बेटी दी होगी...फिर उनका भरोसा कैसे तोड़ सकता हूँ । कालेज मे नौकरी की डिग्री मिलती है और ऐसे संस्कार मा बाप से मिलते हैं ।


इधर घरपे बड़ा और छोटा भाई और उनकी पत्नीया मिलकर आपस मे फैसला करते हैं की...जायदाद का बंटवारा हो जाये क्योंकि हम दोनों लाखों कमाते है मगर मझला ना के बराबर कमाता है। ऐसा नहीं होगा।


मां के लाख मना करने पर भी...बंटवारा की तारीख तय होती है। बहन भी आ जाती है मगर चंदू है की काम पे निकलने के बाहर आता है। उसके दोनों भाई उसको पकड़कर भीतर लाकर बोलते हैं की आज तो रूक जा? बंटवारा कर ही लेते हैं । वकील कहता है ऐसा नहीं होता। साईन करना पड़ता है।


चंदू - तुम लोग बंटवारा करो मेरे हिस्से मे जो देना है दे देना। मैं शाम को आकर अपना बड़ा सा अगूंठा चिपका दूंगा पेपर पर।


बहन- अरे बेवकूफ ...तू गंवार का गंवार ही रहेगा। तेरी किस्मत अच्छी है की तू इतनी अच्छे भाई और भैया मिलें


मां- अरे चंदू आज रूक जा।


बंटवारे में कुल दस विघा जमीन मे दोनों भाई 5- 5 रख लेते हैं ।


और चंदू को पुस्तैनी घर छोड़ देते है


तभी चंदू जोर से चिल्लाता है।


अरे???? फिर हमारी छुटकी का हिस्सा कौन सा है?


दोनों भाई हंसकर बोलते हैं


अरे मूरख...बंटवारा भाईयो मे होता है और बहनों के हिस्से मे सिर्फ उसका मायका ही है।


चंदू - ओह... शायद पढ़ा लिखा न होना भी मूर्खता ही है।


ठीक है आप दोनों ऐसा करो।


मेरे हिस्से की वसीएत मेरी बहन छुटकी के नाम कर दो।


दोनों भाई चकीत होकर बोलते हैं ।


और तू?


चंदू मां की और देखके मुस्कुराके बोलता है


मेरे हिस्से में माँ है न......


फिर अपनी बिबी की ओर देखकर बोलता है..मुस्कुराके...क्यों चंदूनी जी...क्या मैंने गलत कहा?


चंदूनी अपनी सास से लिपटकर कहती है। इससे बड़ी वसीएत क्या होगी मेरे लिए की मुझे मां जैसी सासु मिली और बाप जैसा ख्याल रखना वाला पति।


बस येही शब्द थे जो बँटवारे को सन्नाटा मे बदल दिया ।


बहन दौड़कर अपने गंवार भैया से गले लगकर रोते हुए कहती है की..मांफ कर दो भैया मुझे क्योंकि मैं समझ न सकी आपको।


चंदू - इस घर मे तेरा भी उतना ही अधिकार है जीतना हम सभी का।


बहुओं को जलाने की हिम्मत कीसी मे नहीं मगर फिर भी जलाई जाती है क्योंकि शादी के बाद हर भाई हर बाप उसे पराया समझने लगते हैं । मगर मेरे लिए तुम सब बहुत अजीज हो चाहे पास रहो या दुर।


माँ का चुनाव इसलिए कीया ताकी तुम सब हमेशा मुझे याद आओ। क्योंकि ये वही कोख है जंहा हमने साथ साथ 9 - 9 महीने गुजारे। मां के साथ तुम्हारी यादों को भी मैं रख रहा हूँ।


दोनों भाई दौड़कर मझले से गले मिलकर रोते रोते कहते हैं


आज तो तू सचमुच का बाबा लग रहा है। सबकी पलको पे पानी ही पानी। सब एक साथ फिर से रहने लगते है।

Saturday, 17 August 2024

चौंक उठी गौरी ।

 गौरी का रिजर्वेशन जिस बोगी में था, उसमें लगभग सभी लड़के ही थे । टॉयलेट जाने के बहाने गौरी पूरी बोगी घूम आई, मुश्किल से दो या तीन औरतें होंगी । मन अनजाने भय से काँप सा गया । रात्रि का समय था और बीच के स्टेशनों पर यात्रियों की संख्या बढ़ भी सकती थी और घट भी सकती थी ।


पहली बार रात्रि में अकेली सफर कर रही थी, इसलिये पहले से ही घबराई हुई थी। अतः खुद को सहज रखने के लिए चुपचाप अपनी सीट पर बैठकर मोबाइल में देखने लगी।


नवयुवकों का झुंड जो शायद किसी कैम्प जा रहे थे, के हँसी - मजाक , चुटकुले उसके हिम्मत को और भी तोड़ रहे थे। गौरी के भय और घबराहट के बीच अनचाही सी रात धीरे - धीरे उतरने लगी ।


सहसा सामने के सीट पर बैठे लड़के ने मौन भंग किया "हेलो, मैं साकेत और आप ? "


भय से पीली पड़ चुकी गौरी ने कहा


" जी मैं "


" कोई बात नहीं , नाम मत बताइये । वैसे जा कहाँ रहीं हैं आप ?"


गौरी ने धीरे से कहा "वाराणसी"


" अच्छा क्या आप भी वाराणसी से ही हैं ? मेरा तो यहां ननिहाल है। इस रिश्ते से तो आप मेरी बहन लगीं ।" खुश होते हुए साकेत ने कहा और फिर वाराणसी की प्रशंसा चालू हो गई । गंगा,सारनाथ, गंगा घाटों और बनारस की गलियों की विशेषताएं । साकेत अपने ननिहाल की अनगिनत बातें बताता रहा कि उसके नाना जी काफी नामी व्यक्ति हैं , उसके दोनों मामा सेना में उच्च अधिकारी हैं, एक मामी पटना की हैं और दूसरी लखनऊ की । और भी ढेरों नई - पुरानी बातें । गौरी भी मुस्कुरा उठी । धीरे - धीरे सामान्य हो गई और उसके बातों में रूचि लेती रही ।


रात जैसे कुँवारी आई थी , वैसे ही पवित्र कुँवारी गुजर गई ।


सुबह गौरी ने कहा " मेरा मोबाइल नंबर फीड कर लीजिए , कभी ननिहाल आइये तो जरुर मिलने आइयेगा ।"


"कैसी ननिहाल बहन ?


वो तो मैंने आपको डरते देखा तो झूठ - मूठ के रिश्ते गढ़ता रहा । मैं तो पहले कभी वाराणसी आया ही नहीं ।"


"क्या ?" -- चौंक उठी गौरी ।


" देखो बहन ऐसा नहीं है कि सभी लड़के बुरे ही होते हैं कि किसी अकेली लड़की को देखा नहीं कि उस पर गिद्ध की तरह टूट पड़ें । हम ही तो पिता और भाई भी होते हैं ।" कह कर प्यार से उसके सर पर हाथ रख मुस्कुराया था साकेत ।


गौरी साकेत को देखती रही जैसे अपना ही भाई उससे विदा ले रहा हो ।


गौरी की आँखें गीली हो चुकी थीं और वाराणसी स्टेशन भी आ चुका था।

हम राही

असली समस्या प्राइवेसी नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले विचार हैं।

 मेरे मन में यह धारणा थी कि अगर मैं अपनी पत्नी के साथ प्रेम, वासना और उसकी सभी जरूरतें पूरी करूं तो हमारा जीवन सुखदायी होगा। मेरी खुद की व्यापारिक पृष्ठभूमि थी, इसलिए मुझे ऐसी लड़की चाहिए थी, जो स्मार्ट हो और व्यापार में मेरी मदद कर सके। कई लड़कियों के बाद, मेरी शादी अंजली से हुई। अंजली न केवल सुंदर थी, बल्कि बुद्धिमान भी थी।

शादी के शुरुआती तीन महीनों में, मैंने उसे बहुत खुश रखा। हमारे बीच शारीरिक संबंध अच्छे थे, और मुझे ऐसा लगता था कि मुझे एक ऐसी लड़की मिल गई है जो बिना बोले मेरी जरूरतें समझती है। मुझे लगता था कि एक अच्छे वैवाहिक रिश्ते के लिए शारीरिक सुख का होना बहुत जरूरी है।

धीरे-धीरे, शारीरिक संबंधों में मेरी रुचि कम होने लगी और काम के दबाव के कारण भी यह करना कठिन हो गया। असली समस्या तब शुरू हुई जब अंजली ने मुझसे अलग फ्लैट में रहने की मांग की। उसने कहा कि उसे प्राइवेसी चाहिए, जो कि मम्मी-पापा के साथ रहते हुए संभव नहीं है।

जब मैंने इस बारे में अपने माता-पिता से बात की, तो पापा को कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन मां ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि बहू को उनके हिसाब से रहना होगा।

इस बीच, मैंने अंजली के फोन पर देखा कि वह इंस्टाग्राम पर एक कपल की रील देख रही थी, जिसमें बताया जा रहा था कि क्यों लोगों को अपने मां-बाप से अलग रहना चाहिए। यह रीलें देखने के बाद, मुझे समझ आया कि असली समस्या प्राइवेसी नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले विचार हैं।

मैंने तय किया कि मां-बाप को किसी भी कीमत पर छोड़ना सही नहीं है। इसके बजाय, मैंने अंजली को अपने ऑफिस में शामिल किया और जब भी वह रील देखती, मैं उसे कोई काम दे देता। धीरे-धीरे उसने रील देखना बंद कर दिया और हमारा वैवाहिक जीवन भी सामान्य हो गया।

आज भी, कभी-कभी मजाक में मैं उससे कहता हूं कि अलग घर ले लेते हैं, ताकि तुम छोटे कपड़े पहन सको। तो वह मुझे आंख दिखाने लगती है।

दोस्तों, यह समस्या हर घर में है। हमें यह समझना चाहिए कि मोबाइल और सोशल मीडिया अनजाने में हमारे परिवार, संस्कार और संस्कृति को तोड़ने का काम कर रहे हैं।

Friday, 16 August 2024

प्रेम और सम्भोग*

 **प्रेम और सम्भोग**

अगर कोई पुरुष किसी स्त्री के पास जाता है और कहता है कि "मैं तेरे करीब इस कारण हूँ कि मैं प्यार करता हूँ," तो यह धोखा है। यह गलत है। 


सम्भोग शरीर की जरूरत है, तो यह गलत नहीं है। पर सम्भोग को प्यार कहने की भूल से बचें। ईमानदार रहें। अगर सम्भोग करना है, तो सामने वाले को साफ शब्दों में कहें। और साथी से पहले, खुद को स्पष्ट कर लें कि आप प्यार में हैं या वासना में। 


स्त्री फूल की तरह कोमल होती है। और फूल को रगड़कर, नोचकर, उसके शरीर पर निशान बनाकर या बाहर-भीतर घिसकर, प्यार नहीं किया जाता। स्त्री का शरीर और उसकी योनि की नसें बेहद संवेदनशील होती हैं। बहुत ज्यादा बारीक होती हैं। 


आज जो महिलाएं अपनी डॉक्टर के पास जा रही हैं, उसका एक कारण यह भी है कि उनके शारीरिक संबंधों में हिंसा है। वासना के वेग के चलते, न तो पुरुष को होश रहता है और न स्त्री इतनी हिम्मत कर पाती कि पुरुष को 'न' कह सके। 


और फिर बच्चेदानी में हजारों बीमारियां लग जाती हैं। मासिक धर्म में भयानक दर्द, OCD, PCOD और पता नहीं क्या-क्या सहन करना पड़ता है। 


पुरुष एक्टिव है स्वभाव से और स्त्री पैसिव। इसलिए यहां पुरुष को समझना चाहिए कि पल भर की वासना के लिए किसी स्त्री का शरीर खराब न करें। वैसे भी अगर सम्भोग को धैर्य और तरीके से किया जाए, और एक ठहराव हो भीतर तो उसके परिणाम दोनों व्यक्तियों के लिए सुखद होते हैं। और संतुष्टि भी मिलती है। 


लेकिन जोश में आकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने वाले पुरुष, कभी भी संतुष्टि को उपलब्ध नहीं होते। जो व्यक्ति विवाहित हैं, उन्होंने अनुभव किया होगा कि वर्षों तक सम्भोग करने पर भी उनके भीतर सम्भोग की इच्छा ज्यों की त्यों है। इसका कारण यही है कि उन्होंने गहराई से कभी इस चीज को नहीं जाना। 


४५ मिनट से पहले तो स्त्री का शरीर खुलता ही नहीं कि वह तुम्हें अपनी बाहों में भरे, या तुम्हें अनुमति दे कि तुम उसके भीतर प्रवेश करो। इसलिए फोरप्ले का इतना महत्व है। और ठीक उसी तरह आफ्टरप्ले भी अर्थ रखता है कि तुम्हारी वजह से मैं जीवन ऊर्जा का आनंद ले पाया। 


केवल पेनिट्रेशन को सम्भोग समझने वाले, बलात्कारी हैं। अपने ही साथी का बलपूर्वक हरण करना, बलात्कार ही होता है। आज जो ७० फीसदी महिलाएं ऑर्गेज़्म से अनजान हैं, उसका कारण सम्भोग की अज्ञानता है। इस बात को अहंकार पर चोट न समझें, बल्कि अपने आपको बेहतर बनाने का प्रयास करें। अपनी महिला मित्र के पैर छुएं, उससे अनुमति लें, उसके प्रति श्रद्धा भाव रखें, और इस बात का ध्यान रखें कि उसे दर्द न दें, आनंद दें। 


भले तुम दस मिनट, आधे घंटे का सेक्स कर लो, पर स्त्री अछूती ही रह जाती है तुम्हारे स्पर्श से, और तुम भी अधूरे ही लौटकर आते हो। बहुत धीरे-धीरे शरीर तैयार होता है, बहुत धीरे-धीरे वे द्वार खुलते हैं, जब तुम्हें अनुमति मिलती है। 


और यह सब समझने के लिए भीतर स्थिरता चाहिए। और बिना मेडिटेशन के यह संभव नहीं। बिना मेडिटेशन जीवन उथला ही रहता है। अगर गहराई चाहिए जीवन में, तो ध्यान बहुत जरूरी है। 


होश, ठहराव, स्थिरता, धीरज, प्रेम, श्रद्धा – ये सारे शब्द केवल ध्यान करने से ही जीवन में उतरेंगे। किताबें पढ़ने या ज्ञान सुनने से कुछ नहीं होगा।


जब तक बाप जिंदा रहता है, बेटी मायके में हक़ से आती है।

 जब तक बाप जिंदा रहता है, बेटी मायके में हक़ से आती है और घर में भी ज़िद कर लेती है और कोई कुछ कहे तो डट के बोल देती है कि मेरे बाप का घर है। पर जैसे ही बाप मरता है और बेटी आती है तो वो इतनी चीत्कार करके रोती है कि, सारे रिश्तेदार समझ जाते है कि बेटी आ गई है।*


*और वो बेटी उस दिन अपनी हिम्मत हार जाती है, क्योंकि उस दिन उसका बाप ही नहीं उसकी वो हिम्मत भी मर जाती हैं।*


*आपने भी महसूस किया होगा कि बाप की मौत के बाद बेटी कभी अपने भाई- भाभी के घर वो जिद नहीं करती जो अपने पापा के वक्त करती थी, जो मिला खा लिया, जो दिया पहन लिया क्योंकि जब तक उसका बाप था तब तक सब कुछ उसका था यह बात वो अच्छी तरह से जानती है।* 


आगे लिखने की हिम्मत नहीं है, बस इतना ही कहना चाहता हूं कि बाप के लिए बेटी उसकी जिंदगी होती है, पर वो कभी बोलता नहीं, और बेटी के लिए बाप दुनिया की सबसे बड़ी हिम्मत और घमंड होता है, पर बेटी भी यह बात कभी किसी को बोलती नहीं है। 

कहानी बहुत छोटी है मगर सारांश उसका बहुत बड़ा है। समझने वाले समझ जाएगी।


बाप बेटी का प्रेम समुद्र से भी गहरा है

       🌹 #Love_u_papa 🌹


      ♥♥♥♥♥♥♥♥♥

मेरा बाल विवाह आज से आठ साल पहले हुआ था।

 मेरा बाल विवाह आज से आठ साल पहले हुआ था। उस समय मैं खुद भी समझ नहीं पाया था कि शादी के क्या मायने होते हैं, और एक साथी के साथ जीवन की जिम्मेदारियां किस तरह निभाई जाती हैं। मेरी पत्नी जब 18 साल की हुई, तब वह पहली बार ससुराल आई। शुरुआती दिनों में सब कुछ ठीक ही रहा, और एक साल बाद हमारा बेटा भी हुआ। उस समय मेरे मन में उम्मीदों का एक नया सवेरा था, कि अब हम एक खुशहाल परिवार बनाकर साथ रहेंगे। लेकिन कहानी धीरे-धीरे एक अलग मोड़ लेने लगी।


बेटा जब सालभर का हुआ, तो मेरी पत्नी मायके से वापस आई। उसका मायका संपन्न था, और उसके पिता गैरकानूनी धंधों से खूब पैसा कमाते थे। उनके घर का जीवनस्तर बहुत ऊँचा था, और उस हिसाब से उनके खर्चे भी थे। दूसरी ओर, मैं एक मिडल क्लास परिवार से था। मेरे लिए हर एक रुपया महत्वपूर्ण था, और इस कारण से मैं ज्यादा खर्च नहीं कर पाता था, न ही बाहर घूमने-फिरने में पैसे उड़ा सकता था।


हमारे पास कृषि भूमि थी, जो मेरे ससुर को बहुत पसंद आई थी, और शायद यही वजह थी कि उन्होंने हमारी शादी को मंजूरी दी थी। इसके अलावा, मेरे स्वभाव और व्यवहार ने भी उन्हें प्रभावित किया था। मेरे ससुर के दो और दामाद थे, जो अच्छी तरह से खाते-पीते थे और अपनी जिंदगी में कई व्यसनों में लिप्त थे। जबकि मैं किसी भी प्रकार का व्यसन नहीं करता था। इस वजह से, मेरे ससुर मुझे अपना सबसे प्रिय दामाद मानते थे।


लेकिन, बीवी ने जिस माहौल में अपने मायके में पली-बढ़ी थी, वही वह ससुराल में भी चाहती थी। उसके पिता ने उसे जितनी छूट दी थी, उतनी ही आज़ादी और विलासिता वह मेरे घर में भी चाहती थी। वह चाहती थी कि ससुराल में भी उसी तरह का रहन-सहन हो, जैसा उसके मायके में था। लेकिन मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति और मानसिकता दोनों ही बहुत अलग थे। इन भिन्नताओं ने हमारे रिश्ते को धीरे-धीरे तनावपूर्ण बना दिया।


मेरे पिताजी ने सुझाव दिया कि हम दोनों अलग होकर रहने लगें, शायद यही समाधान हो। उन्होंने कहा कि बहू को लेकर अलग हो जाओ, शायद उसे यही चाहिए। लेकिन मेरी पत्नी को सर्वसुविधासंपन्न जीवन चाहिए था, जिसमें उसे किसी भी प्रकार का संघर्ष न करना पड़े। वह चाहती थी कि सब कुछ पका-पकाया मिल जाए, और उसे अपने जीवन में किसी भी तरह की चुनौतियों का सामना न करना पड़े।


जब उसे मन मुताबिक जीवन नहीं मिला, तो वह मुझसे झगड़ा करने लगी। बात इतनी बढ़ गई कि मैं कमरे से बाहर हॉल में सोने लगा। उसके बुरे बर्ताव और गालियों से तंग आकर, मैं अक्सर घर छोड़कर चला जाता और बहुत रात होने पर ही घर लौटता। रोज़-रोज़ की यह स्थिति मेरे लिए असहनीय हो गई थी। वह मुझे मारने की धमकी देती, झूठे केस में फंसाने की बात करती। उसकी हरकतों ने मुझे भीतर से तोड़ दिया था। उसके मायके वालों ने भी उसे पूरी तरह से समर्थन दिया। मेरे ससुर भी मुझसे गाली-गलौज करके बात करने लगे।


वह कहती कि मुझे मायके छोड़ आओ, लेकिन मैंने उसे नहीं पहुंचाया। उसके कहने के बावजूद मैं उसे वापस नहीं ले गया। अंततः एक साल पहले वह खुद ही मायके चली गई और हमारे बेटे को भी साथ ले गई।


अब, मेरे ससुर ने एक नई मांग रखी है। उनका कहना है कि अगर मैं दस लाख रुपये की सिक्योरिटी मनी दूं, तभी वे मेरी पत्नी और बेटे को वापस भेजेंगे। फिलहाल, उन्होंने कोर्ट में कोई केस नहीं किया है, लेकिन इस धमकी ने मुझे चिंता में डाल दिया है।


मेरे पिताजी ने कहा कि अब फैसला मुझे करना है। उन्होंने मुझसे कहा, "तुम्हें तय करना है कि बहू को वापस लाना है या नहीं। सोच-समझकर निर्णय लेना।"


इस सवाल ने मुझे एक कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया है।


मैंने बहुत सोचने के बाद यह महसूस किया कि विवाह सिर्फ दो लोगों का बंधन नहीं होता, बल्कि यह दो परिवारों का भी जुड़ाव है। लेकिन जब दो परिवारों की सोच, आर्थिक स्थिति और मानसिकता में इतनी बड़ी खाई हो, तो यह जुड़ाव मुश्किल हो जाता है।


मेरे लिए, यह केवल पैसों का सवाल नहीं है, बल्कि आत्म-सम्मान और अपने मूल्यों का भी सवाल है। मैं जानता हूं कि एक बार अगर मैंने उनकी मांगें मान लीं, तो यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। मेरी पत्नी को वापस लाना सिर्फ एक कदम नहीं होगा, बल्कि यह एक नए संघर्ष की शुरुआत होगी, जिसमें मुझे बार-बार झुकना पड़ेगा।


मुझे यह भी समझ में आया कि रिश्ते का आधार केवल पैसे या सुविधाएं नहीं हो सकते। अगर रिश्ते में सम्मान, समझ और प्यार न हो, तो वह रिश्ता खोखला हो जाता है। मैंने यह भी सोचा कि अगर मैं इस रिश्ते को बनाए रखने की कोशिश करता हूं, तो क्या मैं और मेरी पत्नी वाकई खुश रह पाएंगे?


इसलिए, मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मुझे अपने आत्म-सम्मान और मूल्यों को बरकरार रखते हुए ही निर्णय लेना चाहिए। मैंने पिताजी से कहा, "मैंने फैसला कर लिया है। अगर वे दस लाख रुपये की मांग कर रहे हैं, तो यह साफ है कि इस रिश्ते में अब कोई सच्चाई या सम्मान नहीं बचा है। मैं इस संबंध को जबरदस्ती नहीं खींच सकता। इसलिए, मैं उन्हें पैसे देने के बजाय, इस रिश्ते से बाहर निकलने का निर्णय लूंगा।"


यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन मैंने यह समझा कि कभी-कभी जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए हमें कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। मैंने यह भी महसूस किया कि रिश्ते केवल प्यार और सम्मान के आधार पर ही फल-फूल सकते हैं। जब तक दोनों पक्ष इस रिश्ते को समझदारी और सम्मान के साथ निभाने के लिए तैयार नहीं होंगे, तब तक यह रिश्ता सफल नहीं हो सकता।


अब मेरे सामने एक नया सफर है, जिसमें मैं अपने भविष्य का निर्माण करूंगा, अपनी शर्तों पर। यह सफर अकेला हो सकता है, लेकिन यह मेरी शर्तों पर होगा, मेरे आत्म-सम्मान के साथ। मुझे विश्वास है कि सही निर्णय लेने से, मैं एक बेहतर और सुखद भविष्य की ओर बढ़ूंगा।

पूत और सपूत में बड़ा फर्क है जानें एक होनहार सपूत का सच,जो आपके रोंगटे खड़े कर देगा

 पूत और सपूत में बड़ा फर्क है जानें एक होनहार सपूत का सच,जो आपके रोंगटे खड़े कर देगा⭐✍️


बाहर बारिश हो रही थी और अन्दर क्लास चल रही थी, तभी टीचर ने बच्चों से पूछा कि अगर तुम सभी को 500 - 500 रुपये दिए जाए तो तुम सब क्या क्या खरीदोगे.. ?? किसी ने कहा कि मैं वीडियो गेम खरीदुंगा, किसी ने कहा मैं क्रिकेट का बेट खरीदुंगा, किसी ने कहा कि मैं अपने लिए प्यारी सी गुड़िया खरीदुंगी, तो किसी ने कहा मैं बहुत सी चॉकलेट्स खरीदुंगी | एक बच्चा कुछ सोचने में डुबा हुआ था, टीचर ने उससे पुछा कि तुम क्या सोच रहे हो ?? तुम क्या खरीदोगे ?? बच्चा बोला कि टीचर जी, मेरी माँ को थोड़ा कम दिखाई देता है तो मैं अपनी माँ के लिए एक चश्मा खरीदूंगा ‌! टीचर ने पूछाः तुम्हारी माँ के लिए चश्मा तो तुम्हारे पापा भी खरीद सकते है, तुम्हें अपने लिए कुछ नहीं खरीदना ? बच्चे ने जो जवाब दिया उससे टीचर का भी गला भर आया | बच्चे ने कहा कि मेरे पापा अब इस दुनिया में नहीं है | मेरी माँ लोगों के कपड़े सिलकर मुझे पढ़ाती है और कम दिखाई देने की वजह से वो ठीक से कपड़े नहीं सिल पाती है इसीलिए मैं मेरी माँ को चश्मा देना चाहता हुँ ताकि मैं अच्छे से पढ़ सकूँ, बड़ा आदमी बन सकूँ और माँ को सारे सुख दे सकूँ ! टीचर:-बेटा तेरी सोच ही तेरी कमाई है। ये 500 रूपये मेरे वादे के अनुसार और ये 500 रूपये और उधार दे रहा हूँ। जब कभी कमाओ तो लौटा देना। और मेरी इच्छा है तू इतना बड़ा आदमी बने कि तेरे सर पे हाथ फेरते वक्त मैं धन्य हो जाऊं। 15 वर्ष बाद......बाहर बारिश हो रही है, अंदर क्लास चल रही है।अचानक स्कूल के आगे जिला कलेक्टर की बत्ती वालीगाड़ी आकर रूकती है। स्कूल स्टाफ चौकन्ना हो जाता हैं।स्कूल में सन्नाटा छा जाता है। मगर ये क्या ? जिला कलेक्टर एक वृद्ध टीचर के पैरों में गिर जाते हैंऔर कहते हैं:-" सर मैं दामोदर दास उर्फ़ झंडू... !! आपके उधार के 500 रूपये लौटाने आया हूँ पूरा स्कूल स्टॉफ स्तब्ध !!! वृद्ध टीचर झुके हुए नौजवान कलेक्टर को उठाकर भुजाओं में कस लेता है और रो पड़ता हैं। हम चाहें तो अपने आत्मविश्वास और मेहनत के बल पर अपना भाग्य खुद लिख सकते है और अगर हमको अपना भाग्य लिखना नहीं आता तो परिस्थितियां हमारा भाग्य लिख देंगी... !


स्टोरी कैसी लगी दोस्तो कॉमेंट्स में बताइए

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...