sunilrathod

Saturday, 17 August 2024

असली समस्या प्राइवेसी नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले विचार हैं।

 मेरे मन में यह धारणा थी कि अगर मैं अपनी पत्नी के साथ प्रेम, वासना और उसकी सभी जरूरतें पूरी करूं तो हमारा जीवन सुखदायी होगा। मेरी खुद की व्यापारिक पृष्ठभूमि थी, इसलिए मुझे ऐसी लड़की चाहिए थी, जो स्मार्ट हो और व्यापार में मेरी मदद कर सके। कई लड़कियों के बाद, मेरी शादी अंजली से हुई। अंजली न केवल सुंदर थी, बल्कि बुद्धिमान भी थी।

शादी के शुरुआती तीन महीनों में, मैंने उसे बहुत खुश रखा। हमारे बीच शारीरिक संबंध अच्छे थे, और मुझे ऐसा लगता था कि मुझे एक ऐसी लड़की मिल गई है जो बिना बोले मेरी जरूरतें समझती है। मुझे लगता था कि एक अच्छे वैवाहिक रिश्ते के लिए शारीरिक सुख का होना बहुत जरूरी है।

धीरे-धीरे, शारीरिक संबंधों में मेरी रुचि कम होने लगी और काम के दबाव के कारण भी यह करना कठिन हो गया। असली समस्या तब शुरू हुई जब अंजली ने मुझसे अलग फ्लैट में रहने की मांग की। उसने कहा कि उसे प्राइवेसी चाहिए, जो कि मम्मी-पापा के साथ रहते हुए संभव नहीं है।

जब मैंने इस बारे में अपने माता-पिता से बात की, तो पापा को कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन मां ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि बहू को उनके हिसाब से रहना होगा।

इस बीच, मैंने अंजली के फोन पर देखा कि वह इंस्टाग्राम पर एक कपल की रील देख रही थी, जिसमें बताया जा रहा था कि क्यों लोगों को अपने मां-बाप से अलग रहना चाहिए। यह रीलें देखने के बाद, मुझे समझ आया कि असली समस्या प्राइवेसी नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले विचार हैं।

मैंने तय किया कि मां-बाप को किसी भी कीमत पर छोड़ना सही नहीं है। इसके बजाय, मैंने अंजली को अपने ऑफिस में शामिल किया और जब भी वह रील देखती, मैं उसे कोई काम दे देता। धीरे-धीरे उसने रील देखना बंद कर दिया और हमारा वैवाहिक जीवन भी सामान्य हो गया।

आज भी, कभी-कभी मजाक में मैं उससे कहता हूं कि अलग घर ले लेते हैं, ताकि तुम छोटे कपड़े पहन सको। तो वह मुझे आंख दिखाने लगती है।

दोस्तों, यह समस्या हर घर में है। हमें यह समझना चाहिए कि मोबाइल और सोशल मीडिया अनजाने में हमारे परिवार, संस्कार और संस्कृति को तोड़ने का काम कर रहे हैं।

Friday, 16 August 2024

प्रेम और सम्भोग*

 **प्रेम और सम्भोग**

अगर कोई पुरुष किसी स्त्री के पास जाता है और कहता है कि "मैं तेरे करीब इस कारण हूँ कि मैं प्यार करता हूँ," तो यह धोखा है। यह गलत है। 


सम्भोग शरीर की जरूरत है, तो यह गलत नहीं है। पर सम्भोग को प्यार कहने की भूल से बचें। ईमानदार रहें। अगर सम्भोग करना है, तो सामने वाले को साफ शब्दों में कहें। और साथी से पहले, खुद को स्पष्ट कर लें कि आप प्यार में हैं या वासना में। 


स्त्री फूल की तरह कोमल होती है। और फूल को रगड़कर, नोचकर, उसके शरीर पर निशान बनाकर या बाहर-भीतर घिसकर, प्यार नहीं किया जाता। स्त्री का शरीर और उसकी योनि की नसें बेहद संवेदनशील होती हैं। बहुत ज्यादा बारीक होती हैं। 


आज जो महिलाएं अपनी डॉक्टर के पास जा रही हैं, उसका एक कारण यह भी है कि उनके शारीरिक संबंधों में हिंसा है। वासना के वेग के चलते, न तो पुरुष को होश रहता है और न स्त्री इतनी हिम्मत कर पाती कि पुरुष को 'न' कह सके। 


और फिर बच्चेदानी में हजारों बीमारियां लग जाती हैं। मासिक धर्म में भयानक दर्द, OCD, PCOD और पता नहीं क्या-क्या सहन करना पड़ता है। 


पुरुष एक्टिव है स्वभाव से और स्त्री पैसिव। इसलिए यहां पुरुष को समझना चाहिए कि पल भर की वासना के लिए किसी स्त्री का शरीर खराब न करें। वैसे भी अगर सम्भोग को धैर्य और तरीके से किया जाए, और एक ठहराव हो भीतर तो उसके परिणाम दोनों व्यक्तियों के लिए सुखद होते हैं। और संतुष्टि भी मिलती है। 


लेकिन जोश में आकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने वाले पुरुष, कभी भी संतुष्टि को उपलब्ध नहीं होते। जो व्यक्ति विवाहित हैं, उन्होंने अनुभव किया होगा कि वर्षों तक सम्भोग करने पर भी उनके भीतर सम्भोग की इच्छा ज्यों की त्यों है। इसका कारण यही है कि उन्होंने गहराई से कभी इस चीज को नहीं जाना। 


४५ मिनट से पहले तो स्त्री का शरीर खुलता ही नहीं कि वह तुम्हें अपनी बाहों में भरे, या तुम्हें अनुमति दे कि तुम उसके भीतर प्रवेश करो। इसलिए फोरप्ले का इतना महत्व है। और ठीक उसी तरह आफ्टरप्ले भी अर्थ रखता है कि तुम्हारी वजह से मैं जीवन ऊर्जा का आनंद ले पाया। 


केवल पेनिट्रेशन को सम्भोग समझने वाले, बलात्कारी हैं। अपने ही साथी का बलपूर्वक हरण करना, बलात्कार ही होता है। आज जो ७० फीसदी महिलाएं ऑर्गेज़्म से अनजान हैं, उसका कारण सम्भोग की अज्ञानता है। इस बात को अहंकार पर चोट न समझें, बल्कि अपने आपको बेहतर बनाने का प्रयास करें। अपनी महिला मित्र के पैर छुएं, उससे अनुमति लें, उसके प्रति श्रद्धा भाव रखें, और इस बात का ध्यान रखें कि उसे दर्द न दें, आनंद दें। 


भले तुम दस मिनट, आधे घंटे का सेक्स कर लो, पर स्त्री अछूती ही रह जाती है तुम्हारे स्पर्श से, और तुम भी अधूरे ही लौटकर आते हो। बहुत धीरे-धीरे शरीर तैयार होता है, बहुत धीरे-धीरे वे द्वार खुलते हैं, जब तुम्हें अनुमति मिलती है। 


और यह सब समझने के लिए भीतर स्थिरता चाहिए। और बिना मेडिटेशन के यह संभव नहीं। बिना मेडिटेशन जीवन उथला ही रहता है। अगर गहराई चाहिए जीवन में, तो ध्यान बहुत जरूरी है। 


होश, ठहराव, स्थिरता, धीरज, प्रेम, श्रद्धा – ये सारे शब्द केवल ध्यान करने से ही जीवन में उतरेंगे। किताबें पढ़ने या ज्ञान सुनने से कुछ नहीं होगा।


जब तक बाप जिंदा रहता है, बेटी मायके में हक़ से आती है।

 जब तक बाप जिंदा रहता है, बेटी मायके में हक़ से आती है और घर में भी ज़िद कर लेती है और कोई कुछ कहे तो डट के बोल देती है कि मेरे बाप का घर है। पर जैसे ही बाप मरता है और बेटी आती है तो वो इतनी चीत्कार करके रोती है कि, सारे रिश्तेदार समझ जाते है कि बेटी आ गई है।*


*और वो बेटी उस दिन अपनी हिम्मत हार जाती है, क्योंकि उस दिन उसका बाप ही नहीं उसकी वो हिम्मत भी मर जाती हैं।*


*आपने भी महसूस किया होगा कि बाप की मौत के बाद बेटी कभी अपने भाई- भाभी के घर वो जिद नहीं करती जो अपने पापा के वक्त करती थी, जो मिला खा लिया, जो दिया पहन लिया क्योंकि जब तक उसका बाप था तब तक सब कुछ उसका था यह बात वो अच्छी तरह से जानती है।* 


आगे लिखने की हिम्मत नहीं है, बस इतना ही कहना चाहता हूं कि बाप के लिए बेटी उसकी जिंदगी होती है, पर वो कभी बोलता नहीं, और बेटी के लिए बाप दुनिया की सबसे बड़ी हिम्मत और घमंड होता है, पर बेटी भी यह बात कभी किसी को बोलती नहीं है। 

कहानी बहुत छोटी है मगर सारांश उसका बहुत बड़ा है। समझने वाले समझ जाएगी।


बाप बेटी का प्रेम समुद्र से भी गहरा है

       🌹 #Love_u_papa 🌹


      ♥♥♥♥♥♥♥♥♥

मेरा बाल विवाह आज से आठ साल पहले हुआ था।

 मेरा बाल विवाह आज से आठ साल पहले हुआ था। उस समय मैं खुद भी समझ नहीं पाया था कि शादी के क्या मायने होते हैं, और एक साथी के साथ जीवन की जिम्मेदारियां किस तरह निभाई जाती हैं। मेरी पत्नी जब 18 साल की हुई, तब वह पहली बार ससुराल आई। शुरुआती दिनों में सब कुछ ठीक ही रहा, और एक साल बाद हमारा बेटा भी हुआ। उस समय मेरे मन में उम्मीदों का एक नया सवेरा था, कि अब हम एक खुशहाल परिवार बनाकर साथ रहेंगे। लेकिन कहानी धीरे-धीरे एक अलग मोड़ लेने लगी।


बेटा जब सालभर का हुआ, तो मेरी पत्नी मायके से वापस आई। उसका मायका संपन्न था, और उसके पिता गैरकानूनी धंधों से खूब पैसा कमाते थे। उनके घर का जीवनस्तर बहुत ऊँचा था, और उस हिसाब से उनके खर्चे भी थे। दूसरी ओर, मैं एक मिडल क्लास परिवार से था। मेरे लिए हर एक रुपया महत्वपूर्ण था, और इस कारण से मैं ज्यादा खर्च नहीं कर पाता था, न ही बाहर घूमने-फिरने में पैसे उड़ा सकता था।


हमारे पास कृषि भूमि थी, जो मेरे ससुर को बहुत पसंद आई थी, और शायद यही वजह थी कि उन्होंने हमारी शादी को मंजूरी दी थी। इसके अलावा, मेरे स्वभाव और व्यवहार ने भी उन्हें प्रभावित किया था। मेरे ससुर के दो और दामाद थे, जो अच्छी तरह से खाते-पीते थे और अपनी जिंदगी में कई व्यसनों में लिप्त थे। जबकि मैं किसी भी प्रकार का व्यसन नहीं करता था। इस वजह से, मेरे ससुर मुझे अपना सबसे प्रिय दामाद मानते थे।


लेकिन, बीवी ने जिस माहौल में अपने मायके में पली-बढ़ी थी, वही वह ससुराल में भी चाहती थी। उसके पिता ने उसे जितनी छूट दी थी, उतनी ही आज़ादी और विलासिता वह मेरे घर में भी चाहती थी। वह चाहती थी कि ससुराल में भी उसी तरह का रहन-सहन हो, जैसा उसके मायके में था। लेकिन मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति और मानसिकता दोनों ही बहुत अलग थे। इन भिन्नताओं ने हमारे रिश्ते को धीरे-धीरे तनावपूर्ण बना दिया।


मेरे पिताजी ने सुझाव दिया कि हम दोनों अलग होकर रहने लगें, शायद यही समाधान हो। उन्होंने कहा कि बहू को लेकर अलग हो जाओ, शायद उसे यही चाहिए। लेकिन मेरी पत्नी को सर्वसुविधासंपन्न जीवन चाहिए था, जिसमें उसे किसी भी प्रकार का संघर्ष न करना पड़े। वह चाहती थी कि सब कुछ पका-पकाया मिल जाए, और उसे अपने जीवन में किसी भी तरह की चुनौतियों का सामना न करना पड़े।


जब उसे मन मुताबिक जीवन नहीं मिला, तो वह मुझसे झगड़ा करने लगी। बात इतनी बढ़ गई कि मैं कमरे से बाहर हॉल में सोने लगा। उसके बुरे बर्ताव और गालियों से तंग आकर, मैं अक्सर घर छोड़कर चला जाता और बहुत रात होने पर ही घर लौटता। रोज़-रोज़ की यह स्थिति मेरे लिए असहनीय हो गई थी। वह मुझे मारने की धमकी देती, झूठे केस में फंसाने की बात करती। उसकी हरकतों ने मुझे भीतर से तोड़ दिया था। उसके मायके वालों ने भी उसे पूरी तरह से समर्थन दिया। मेरे ससुर भी मुझसे गाली-गलौज करके बात करने लगे।


वह कहती कि मुझे मायके छोड़ आओ, लेकिन मैंने उसे नहीं पहुंचाया। उसके कहने के बावजूद मैं उसे वापस नहीं ले गया। अंततः एक साल पहले वह खुद ही मायके चली गई और हमारे बेटे को भी साथ ले गई।


अब, मेरे ससुर ने एक नई मांग रखी है। उनका कहना है कि अगर मैं दस लाख रुपये की सिक्योरिटी मनी दूं, तभी वे मेरी पत्नी और बेटे को वापस भेजेंगे। फिलहाल, उन्होंने कोर्ट में कोई केस नहीं किया है, लेकिन इस धमकी ने मुझे चिंता में डाल दिया है।


मेरे पिताजी ने कहा कि अब फैसला मुझे करना है। उन्होंने मुझसे कहा, "तुम्हें तय करना है कि बहू को वापस लाना है या नहीं। सोच-समझकर निर्णय लेना।"


इस सवाल ने मुझे एक कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया है।


मैंने बहुत सोचने के बाद यह महसूस किया कि विवाह सिर्फ दो लोगों का बंधन नहीं होता, बल्कि यह दो परिवारों का भी जुड़ाव है। लेकिन जब दो परिवारों की सोच, आर्थिक स्थिति और मानसिकता में इतनी बड़ी खाई हो, तो यह जुड़ाव मुश्किल हो जाता है।


मेरे लिए, यह केवल पैसों का सवाल नहीं है, बल्कि आत्म-सम्मान और अपने मूल्यों का भी सवाल है। मैं जानता हूं कि एक बार अगर मैंने उनकी मांगें मान लीं, तो यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। मेरी पत्नी को वापस लाना सिर्फ एक कदम नहीं होगा, बल्कि यह एक नए संघर्ष की शुरुआत होगी, जिसमें मुझे बार-बार झुकना पड़ेगा।


मुझे यह भी समझ में आया कि रिश्ते का आधार केवल पैसे या सुविधाएं नहीं हो सकते। अगर रिश्ते में सम्मान, समझ और प्यार न हो, तो वह रिश्ता खोखला हो जाता है। मैंने यह भी सोचा कि अगर मैं इस रिश्ते को बनाए रखने की कोशिश करता हूं, तो क्या मैं और मेरी पत्नी वाकई खुश रह पाएंगे?


इसलिए, मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मुझे अपने आत्म-सम्मान और मूल्यों को बरकरार रखते हुए ही निर्णय लेना चाहिए। मैंने पिताजी से कहा, "मैंने फैसला कर लिया है। अगर वे दस लाख रुपये की मांग कर रहे हैं, तो यह साफ है कि इस रिश्ते में अब कोई सच्चाई या सम्मान नहीं बचा है। मैं इस संबंध को जबरदस्ती नहीं खींच सकता। इसलिए, मैं उन्हें पैसे देने के बजाय, इस रिश्ते से बाहर निकलने का निर्णय लूंगा।"


यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन मैंने यह समझा कि कभी-कभी जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए हमें कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। मैंने यह भी महसूस किया कि रिश्ते केवल प्यार और सम्मान के आधार पर ही फल-फूल सकते हैं। जब तक दोनों पक्ष इस रिश्ते को समझदारी और सम्मान के साथ निभाने के लिए तैयार नहीं होंगे, तब तक यह रिश्ता सफल नहीं हो सकता।


अब मेरे सामने एक नया सफर है, जिसमें मैं अपने भविष्य का निर्माण करूंगा, अपनी शर्तों पर। यह सफर अकेला हो सकता है, लेकिन यह मेरी शर्तों पर होगा, मेरे आत्म-सम्मान के साथ। मुझे विश्वास है कि सही निर्णय लेने से, मैं एक बेहतर और सुखद भविष्य की ओर बढ़ूंगा।

पूत और सपूत में बड़ा फर्क है जानें एक होनहार सपूत का सच,जो आपके रोंगटे खड़े कर देगा

 पूत और सपूत में बड़ा फर्क है जानें एक होनहार सपूत का सच,जो आपके रोंगटे खड़े कर देगा⭐✍️


बाहर बारिश हो रही थी और अन्दर क्लास चल रही थी, तभी टीचर ने बच्चों से पूछा कि अगर तुम सभी को 500 - 500 रुपये दिए जाए तो तुम सब क्या क्या खरीदोगे.. ?? किसी ने कहा कि मैं वीडियो गेम खरीदुंगा, किसी ने कहा मैं क्रिकेट का बेट खरीदुंगा, किसी ने कहा कि मैं अपने लिए प्यारी सी गुड़िया खरीदुंगी, तो किसी ने कहा मैं बहुत सी चॉकलेट्स खरीदुंगी | एक बच्चा कुछ सोचने में डुबा हुआ था, टीचर ने उससे पुछा कि तुम क्या सोच रहे हो ?? तुम क्या खरीदोगे ?? बच्चा बोला कि टीचर जी, मेरी माँ को थोड़ा कम दिखाई देता है तो मैं अपनी माँ के लिए एक चश्मा खरीदूंगा ‌! टीचर ने पूछाः तुम्हारी माँ के लिए चश्मा तो तुम्हारे पापा भी खरीद सकते है, तुम्हें अपने लिए कुछ नहीं खरीदना ? बच्चे ने जो जवाब दिया उससे टीचर का भी गला भर आया | बच्चे ने कहा कि मेरे पापा अब इस दुनिया में नहीं है | मेरी माँ लोगों के कपड़े सिलकर मुझे पढ़ाती है और कम दिखाई देने की वजह से वो ठीक से कपड़े नहीं सिल पाती है इसीलिए मैं मेरी माँ को चश्मा देना चाहता हुँ ताकि मैं अच्छे से पढ़ सकूँ, बड़ा आदमी बन सकूँ और माँ को सारे सुख दे सकूँ ! टीचर:-बेटा तेरी सोच ही तेरी कमाई है। ये 500 रूपये मेरे वादे के अनुसार और ये 500 रूपये और उधार दे रहा हूँ। जब कभी कमाओ तो लौटा देना। और मेरी इच्छा है तू इतना बड़ा आदमी बने कि तेरे सर पे हाथ फेरते वक्त मैं धन्य हो जाऊं। 15 वर्ष बाद......बाहर बारिश हो रही है, अंदर क्लास चल रही है।अचानक स्कूल के आगे जिला कलेक्टर की बत्ती वालीगाड़ी आकर रूकती है। स्कूल स्टाफ चौकन्ना हो जाता हैं।स्कूल में सन्नाटा छा जाता है। मगर ये क्या ? जिला कलेक्टर एक वृद्ध टीचर के पैरों में गिर जाते हैंऔर कहते हैं:-" सर मैं दामोदर दास उर्फ़ झंडू... !! आपके उधार के 500 रूपये लौटाने आया हूँ पूरा स्कूल स्टॉफ स्तब्ध !!! वृद्ध टीचर झुके हुए नौजवान कलेक्टर को उठाकर भुजाओं में कस लेता है और रो पड़ता हैं। हम चाहें तो अपने आत्मविश्वास और मेहनत के बल पर अपना भाग्य खुद लिख सकते है और अगर हमको अपना भाग्य लिखना नहीं आता तो परिस्थितियां हमारा भाग्य लिख देंगी... !


स्टोरी कैसी लगी दोस्तो कॉमेंट्स में बताइए

पति पत्नी के बीच एक भरोसे का काम करता है संभोग, लेकिन सेक्स कब आपके पति का से आप का विश्वास हिला दे ये कोई नहीं जानता,

 पति पत्नी के बीच एक भरोसे का काम करता है संभोग, लेकिन सेक्स कब आपके पति का से आप का विश्वास हिला दे ये कोई नहीं जानता,


2 भाइयों में मैं अकेली थी पापा मेरे काफी रसूख परिवार से थे, भगवान की दया हमारे पास हर वो चीज थी, जिसके लिए लोग सपना देखते हैं

12 पास करने के बाद मुझे मुझे कॉलेज में एडमिशन दिलाया गया और मैं कॉलेज जाना शुरू कर दी कॉलेज में ही मुझे अमित मिले मैं लाइन में लगी थी फार्म जमा करने के लिए और पीछे से अमित आते हैं और बोलते हैं इस तरह धूप में खड़ी रहेगी तो बेहोश होकर गिर जाएगी आ चल में तेरा फॉर्म जमा कर आता हूं।

अमित के साथ सीधे रजिस्टार ऑफिस में घुस गई और 2 मिनट के अंदर में फॉर्म जमा कर दिया अमित से पहली मुलाकात थी इतनी अजीब हुई थी कि मुझे मौका ही नहीं मिला कि उन्हें शुक्रिया कहूं या उनका नाम पूछो

और ना ही अमित ने इन चीजों में कोई रुचि दिखाई उन्होंने मेरा काम कराया और कहां गायब हो गए मुझे पता भी नहींचला

कॉलेज शुरू होने के 3 महीने बाद अमित मुझे फिर से दिखाई दिए और मैं जब उन्हें देखा तो तुरंत पहचान गई लेकिन उन्होंने तो मुझे पहचान भी नहीं बाद में पता चला कि यह मुझे एक साल सीनियर है मैं मौके को हाथ से छोड़कर जाने देना नहीं चाहती थी और मैं तुरंत अमित के पास पहुंचे और उन्हें शुक्रिया कहा

बाद में पता चला की अमित के पापा और मेरे पापा काफी घनिष्ठ दोस्त हैं उसके बाद हम दोनों के बीच में भी दोस्ती काफी अच्छी हो गई अमित का मेरे घर आना जाना हो गया और मन ही मन में अमित को पसंद करने लगी थी

इसी तरह हमारी दोस्ती को 5 साल हो गए थे और 5 साल में कब अमित और हम प्यार में फंस गए पता ही नहीं चला ना कभी आज तक अमित ने मुझे अपने प्यार का इजहार किया ना मैं अमित से कभी अपने प्यार का इजहार किया पर हम दोनों को पता था कि हम दोनों एक दूसरे से बहुत मोहब्बत करते हैं

अमित की नौकरी मुझे 1 साल पहले लग गई और 1 साल बाद मेरी भी नौकरी लग गई उसके बाद क्या हुआ कि हम और अमित दोनों एक ही शहर में पोस्ट ले लेते हैं

जिस तरह मेरे पापा काफी रसूखदार परिवार से थे उसी तरह अमित के पापा भी काफी बड़े परिवार से थे और समाज में अच्छी हैसियत रखते थे

और ऊपर से सोने पर सुहागा मेरे पापा और अमित के पापा की 15 साल पुरानी दोस्ती भी थी

चंडीगढ़ में साथ काम करते-करते हम दोनों का एक दूसरे के फ्लैट पर आना-जाना बढ़ गया मैं हर वक्त अमित के करीब आना चाहती थी क्योंकि मैं उनसे बेइंतहा प्यार करती थी पर वह हर बार मुझे दूर करते थे और बोलते थे

देख किट्टू एक दिन तू यह करना ही है तो इंतजार करते हैं ना शादी करते हैं फिर करेंगे और मैं उनके ऊपर जोर-जोर से हंस दिया करती थी

खैर हम दोनों अपने लाइफ में काफी अच्छे से सेटल थे अब मेरे घर पर शादी की बात चलना शुरू हुई थी मैंने मौका ना गवाते हुए तुरंत ही अमित के बारे में अपने पापा को बताया पापा ने मुझे कुछ बोला नहीं और चुपचाप वहां से चले गए

मैं अंदर से बहुत खुश थी कि चलो पापा समझते हैं मुझे लेकिन तभी शाम को मेरे बड़े भैया आते हैं और मुझे जोर से एक थप्पड़ मारते हैं और बोलते हैं यही सब करने के लिए तुझे बाहर भेजा गया था

मैं बोलता हूं मैं क्या गलत किया भैया उन्होंने बोला अगर प्यार करना भी था तो किसी अपने बराबर के लोगों के साथ करती

मैंने बोला मैं 6 साल से अमित को जान रही हूं और 3 साल से प्यार कर रही हूं क्या इतना समय कम होता है किसी को जानने के लिए इस पर भैया ने मुझे कुछ बोला नहीं और बोला कि तेरी शादी उससे नहीं हो सकती है और भूल जाओ उसे

मैं अमित को यह बात बताई तो अमित ने बोला कोई बात नहीं है तू टेंशन ना ले मैं हैंडल करता हूं

अमित ने घर पर आकर के अपने पापा से यह बात बोली कि मैं किट्टू से प्यार करता हूं और मैं उससे शादी करना चाहता हूं उसके पापा काफी ज्यादा खुश थे और वह अगले ही दिन मेरे घर आते हैं

और बहुत गर्म जोशी से पापा से मिलते हैं पर मेरे पापा का व्यवहार काफी ठंडा रहता है

उन्होंने अपनी बात मेरे पापा के सामने रखी की अपनी दोस्ती को रिश्ते में बदलते हैं और किट्टू और अमित की शादी करते हैं

मेरे पापा उन्हें कुछ बोलते नहीं है पर हाथ जोड़ते हैं और बोलते हैं ऐसा संभव नहीं है

इसके बाद अमित के पापा कुछ भी नहीं बोलते और सीधा वहां से उठकर वापस चले जाते हैं

घर पर बहुत बार बोलने के बाद भी मेरे पापा और मेरे भाई मेरी शादी के लिए राशि नहीं हुए काफी समय इंतजार करने के बाद मुझे भी यह लगने लगा कि शायद मैंने कुछ गलत किया है क्योंकि मेरा परिवार कभी भी मेरे किसी डिसीजन के खिलाफ नहीं जाता था फिर इसी के खिलाफ क्यों

फिर बाद में मुझे पता चला कि हमारी शादी न होने का सबसे बड़ा कारण है हमारी जात का एक न होना हम दोनों ही जनरल केटेगरी से थे पर फिर भी मैं उच्च कूल की ब्राह्मण थी और वह एक वैश्य था

फिर पापा ने अपने ही हैसियत के बराबर के एक लड़के से मेरी शादी कराई रसूखदार परिवार था मेरे शहर से तकरीबन 100 किलोमीटर दूर काफी बड़ी कोठी और सबसे बड़ीबात इस बार लड़का अपनी जात का था

शादी की बात फिक्स होते ही सबसे पहले मेरे पापा आते हैं और मुझे बोलते हैं देखा कि तू मैं एक ऐसा लड़का तेरे लिए ढूंढा है जिसके घर में शराब सिगरेट तो दूर कोई सुपारी भी नहीं खाता

मैंने अपने पापा से पूछा आपको कैसे पता चला पापा ने बोला उनके घर में एक भी पान का पत्ता या शराब जैसी कोई चीज नहीं दिखाई थी अगल-बगल से भी पता लगाया तो किसी ने भी नहीं बोला कि यह लोग कुछ ऐसा काम करते हैं

मेरी शादी होती है काफी धूमधाम से काफी ज्यादा दहेज दिया जाता है सिर्फ इसलिए कि लड़का अपनी जात का है और काफी रसूखदार परिवार से है

सुहागरात की सेज पर में बैठी रहती हूं और मेरे पति कमरे में आने में काफी देरी करते हैं

लगभग रात को 1:00 बजे आते हैं और वह दारू के नशे में रहते हैं और मुझे बोलते हैं आई एम सॉरी दोस्तों ने जबरदस्ती पिला दी क्योंकि आज मेरी शादी है और मैं उन्हें मना नहीं कर सकता

मैंने कुछ बोला नहीं और दूसरी तरफ मुंह करके सो गई और दूसरी तरफ मुंह करके वह भी सो गए पर मेरे मन में ही यह सवाल आया कि पापा ने तो कहा था कि लड़का और उसका पूरा परिवार शराब तो छोड़ो सुपारी भी नहीं खाता इस बात का क्या

अगले दिन सुबह सब कुछ सही रहता है घर में सारी रस्म की जाती है और रात का समय होता है मैं वापस अपने कमरे में जाती हूं

जब मैं अपने पति को फोन करती हूं तो वह मुझे बोलना है कि तुम खाना खाकर सो जाओ मुझे थोड़ा समय लगेगा

मैंने बोला कोई बात नहीं है आपको जितना भी समय लगे आप लगाइए मैं आपका इंतजार करूंगी

इस बार वह रात को 3:00 बजे आए और पूरे तरीके से नशे में थे

मेरी सब्र का बांध टूट गया और मैं तुरंत बोला आप तो शराब नहीं पीते ना तो फिर रोज-रोज शराब पी के कैसे आतेहैं

वह हंस के मुझे बोलते हैं चल सो जा पगली मुझसे सवाल जवाब ना कर

मैंने बोला मेरा हक बनता है मैं आपकी पत्नी हूं

और वह एक हवन की तरह मेरे ऊपर झापड़ पड़ते हैं और मेरे साथ संभोग करना शुरू करते हैं और बोलते हैं पत्नी है तो पत्नी धर्म निभा चल मुझे खुश कर

वह संभोग जो एक पति-पत्नी के लिए उनके विश्वास की कड़ी रहता है मेरे लिए मेरी सुहागरात के दिन ही डर का कारण बन गया

मैं यह बात किसी से भी नहीं कह सकती थी क्योंकि मेरे दोनों भाइयों की शादी नहीं हुई थी और पापा से तो बोलने का सवाल ही नहीं होता

जब मैं यह बात अपनी मां को बताई तो मां ने बोला यह तो हमेशा से होता आया है तुम उसकी पत्नी हो तुम नहीं उसके साथ यह करोगी तो कौन करेगा कोशिश करो बातों को भूलने की

उसे दिन के बाद से मैं हर रोज रात में दर में सोती हूं मुझे नहीं पता होता कि मेरे साथ संभोग किया जाएगा या मेरा बलात्कार होगा वह भी मेरे पति के द्वारा

मैं उसे समाज की हिस्सा हूं जहां पर यदि मैं किसी को 5-7 साल से जान रही हूं तो वह मेरे लिए अजनबी है

मेरी उससे शादी नहीं कराई जाएगी पर वही मेरे पिता और मेरे भाई मुझे किसी अनजान के बिस्तर पर फेंक देते हैं ताकि वह नशे में आकर के मेरा बलात्कार कर सके

मैं निशब्द हूं समय रहते यदि मैं अपने प्यार के लिए लड़ाई की होती तो आज मेरी यह स्थिति ना होती

और मैं प्रत्येक मां-बाप से यह बोलना चाहूंगी की हम बेटियां हैं हमें ऐसे संस्कार दिए जाते हैं कि हम ज्यादा खुलकर आपके सामने नहीं बोल सकते पर हमारे भविष्य का निर्णय लेना आपके हाथ मेंहै

यदि आपकी बेटी को किसी से प्यार है और वह काफी लंबे समय से इस घोर कलयुग में उसके साथ है उसे जानरहा है

तो जात-पात का चक्कर छोड़ पैसे का चक्कर छोड़ उसे उसके साथ जिंदगी बिताने दीजिए

तभी सही मायने में आप एक अच्छे मां-बाप कहलाएंगे क्योंकि आपकी खुशी आपके बच्चों से है ना कि इस समाज से जो की जात की वजह से आपको और आपके परिवार का आकलन करता है


Thursday, 15 August 2024

जवानी के दिनों में शारीरिक चाहतें सिर चढ़कर बोलने लगती हैं, और पहले 20 साल तेजी से बीत जाते हैं।

 जवानी के दिनों में शारीरिक चाहतें सिर चढ़कर बोलने लगती हैं, और पहले 20 साल तेजी से बीत जाते हैं। इसके बाद नौकरी की खोज शुरू होती है—यह नौकरी नहीं, वह नौकरी नहीं, दूर नहीं, पास नहीं। कई नौकरियाँ बदलने के बाद आखिरकार एक नौकरी स्थिरता की शुरुआत करती है। पहली तनख्वाह का चेक हाथ में आते ही उसे बैंक में जमा किया जाता है, और शून्यों का अंतहीन खेल शुरू हो जाता है। दो-तीन साल और बीत जाते हैं और बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ने लगती है।

25 की उम्र में विवाह हो जाता है और जीवन की एक नई कहानी शुरू होती है। शुरू के एक-दो साल गुलाबी और सपनीले होते हैं—हाथ में हाथ डालकर घूमना, रंग-बिरंगे सपने देखना। लेकिन यह सब जल्दी ही खत्म हो जाता है। बच्चे के आने की आहट होती है और पालना झूलने लगता है। अब सारा ध्यान बच्चे पर केंद्रित हो जाता है—उठना, बैठना, खाना-पीना, लाड़-दुलार। समय कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता।

इस बीच, हाथ एक-दूसरे से छूट जाते हैं, बातें और घूमना-फिरना बंद हो जाता है। बच्चा बड़ा होता जाता है और वह बच्चे में व्यस्त हो जाती है, जबकि मैं अपने काम में व्यस्त रहता हूँ। घर, गाड़ी की किस्त, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा, भविष्य की चिंता, और बैंक में शून्यों की बढ़ती संख्या—इन सब में जीवन व्यस्त हो जाता है।

35 साल की उम्र में, घर, गाड़ी, परिवार और बैंक में बढ़ते शून्य सब कुछ होते हुए भी एक कमी महसूस होती है। चिड़चिड़ाहट बढ़ती जाती है और मैं उदासीन हो जाता हूँ। दिन बीतते जाते हैं, बच्चा बड़ा होता जाता है और खुद का संसार तैयार होता जाता है। कब 10वीं कक्षा आई और चली गई, पता ही नहीं चलता। चालीस की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ती जाती है।

एक एकांत क्षण में, गुजरे दिनों की यादें ताज़ा होती हैं और मैंने कहा, "जरा यहाँ आओ, पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कहीं घूमने चलते हैं।" उसने अजीब नजरों से देखा और कहा, "तुम्हें बातें सूझ रही हैं, यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है।" कमर में पल्लू खोंसकर वह चली जाती है। पैंतालीस की उम्र में, आँखों पर चश्मा चढ़ जाता है, बाल सफेद होने लगते हैं, और दिमाग में उलझनें बढ़ जाती हैं। बेटा कॉलेज में होता है और बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ती जाती है। बेटे के कॉलेज खत्म होने और परदेश चले जाने के बाद, घर अब बोझ लगने लगता है।

पचपन की ओर बढ़ते हुए, बैंक के शून्यों की कोई खबर नहीं होती। बाहर जाने-आने के कार्यक्रम बंद हो जाते हैं। दवाइयों का दिन और समय तय हो जाते हैं। बच्चे बड़े हो जाते हैं और अब हमें सोचने की जरूरत होती है कि वे कब लौटेंगे। एक दिन, सोफे पर बैठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वह पूजा में व्यस्त थी। तभी फोन की घंटी बजी। बेटे ने बताया कि उसने शादी कर ली है और परदेश में ही रहेगा। उसने यह भी कहा कि बैंक के शून्यों को किसी वृद्धाश्रम में दे देना और खुद भी वहीं रहना।

मैं सोफे पर आकर बैठ गया। उसकी पूजा खत्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी, "चलो, आज फिर हाथ में हाथ डालकर बातें करते हैं।" वह तुरंत बोली, "अभी आई।" मुझे विश्वास नहीं हुआ। चेहरा खुशी से चमक उठा। आँखे भर आईं और आँसुओं से गाल भीग गए। लेकिन अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गई और मैं निस्तेज हो गया—हमेशा के लिए।

उसने शेष पूजा की और मेरे पास आकर बैठ गई। "बोलो, क्या बोल रहे थे?" लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छूकर देखा—ठंडा पड़ चुका था। मैंने उसकी ओर एकटक देखा। क्षण भर के लिए वह शून्य हो गई। "क्या करूँ?" उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन एक-दो मिनट में ही वह चेतन्य हो गई। धीरे से उठी, पूजा घर में गई, एक अगरबत्ती जलाई, ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से आकर सोफे पर बैठ गई। मेरा ठंडा हाथ अपने हाथों में लिया और बोली, "चलो, कहाँ घूमने चलना है तुम्हें? क्या बातें करनी हैं तुम्हें?"

ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं। वह एकटक मुझे देखती रही। आँसुओं की धारा बह निकली। मेरा सिर उसके कंधे पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था। क्या यही जीवन है?

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन को अपने तरीके से जीना चाहिए। धन और भौतिक सुख-सुविधाएँ महज एक भाग हैं, लेकिन सच्ची खुशी और संतोष प्रेम, समझदारी, और एक-दूसरे के साथ बिताए समय में होता है।

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...