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Thursday, 15 August 2024

जीवन साथी सम्भोग साथी होते हैं पर सम्भोग साथी जीवन साथी नहीं..

 जीवन साथी सम्भोग साथी होते हैं पर सम्भोग साथी जीवन साथी नहीं... 🚫❤️


आज की नई लड़कियों और लड़कों को मैं यह बताना चाहती हूं। हमारे समाज में सामान्यत: जीवन साथी ही सम्भोग साथी होते हैं, पर इन दिनों मैं देख रही हूं कि एकल स्त्रियां, विवाह विच्छेद स्त्रियां और कई बार विवाहिता स्त्रियां भी ऐसे पुरुषों के साथ इन्वॉल्व हो रही हैं जो पहले से विवाहिता हैं और जिनका अपना घर-परिवार है। 😔


सेक्स के साथ ये स्त्रियां इमोशनली भी ऐसे पुरुषों से जुड़ जाती हैं और उन पर भरोसा भी कर बैठती हैं कि इन दोनों के बीच का रिश्ता सिर्फ़ इन दोनों तक है, किसी तीसरे को इसके बारे में ज़रा भी भनक नहीं लगेगी। 💔


पर रुकना मेरी जान, यहीं तुम शातिर पुरुष से मात खा जाती हो। जो अपनी बीवी-बच्चों को धोखे में रखकर तुम्हारे साथ होने का नाटक कर रहा हो, वो तुम्हारा कभी नहीं हो सकता। तुम्हें नहीं पता वो कहां-कहां, किसके-किसके बीच बैठकर तुम्हारे चरित्र का चीरहरण कर रहा है और बेशरम होकर तुम्हें मात्र ट्रॉफी की तरह देख रहा है। 😡

वो खुद को इतना कूल समझ रहा है कि बीवी होने के बाद भी कोई दूसरी स्त्री उस पर फ़िदा है। तुम उस पर भरोसा कर उस पर खुद को लुटाए जा रही हो और वो लुटेरा बनकर तुम्हारे शरीर और मन दोनों से खेल रहा है। साल दो साल, दस साल बाद भी वह अपने परिवार के साथ ही रहेगा। सारे गुनाह के बाद भी उसकी मां, बीवी, बच्चे सब उसे अपना लेंगे और बुरी होगी सिर्फ़ तुम। 🤯

क्योंकि ऐसे मामले में परिवार की नज़र में पुरुष बेचारा होता है, जिसे महिला ने अपने प्रेम जाल में फांस लिया था। तुम एक बार फिर से टूटे हुए मन से बुरे रिश्तों का मातम मनाती रह जाओगी। इसलिए ज़रा संभालो खुद को, एक आग की लपट से बचने के लिए दूसरे आग के कुएं में मत कूदो। 🔥

**समझदारी से काम लो और अपने आप को ऐसे धोखेबाजों से बचाओ।** 🚨

आपकी इस कहानी से क्या सीख मिली? कमेंट करके जरूर बताइएगा। 😊✨

Tuesday, 13 August 2024

शादी के बाद इसकी गहराई का एहसास हुआ।

 " जवान स्त्री का संभोग उसके मन से शुरू होता है, जबकि पुरुष का उसके जननांग से।" यह एक ऐसा वाक्य था, जिसे मैं तब पूरी तरह से नहीं समझ पाई थी, लेकिन शादी के बाद इसकी गहराई का एहसास हुआ।


मेरी शादी अक्षय से तय हुई थी। उनके परिवार के लोग मुझे देखने के लिए मंदिर आए थे। मैं उन लड़कियों में से थी जो ज्यादा बाहर नहीं निकलती थीं, और मेरी कोई खास सहेलियां भी नहीं थीं। जब अक्षय से मुलाकात हुई, तो हमारी बातचीत बहुत ही औपचारिक थी। उन्होंने अपने माता-पिता पर भरोसा किया और कहा कि अगर उन्हें लड़की ठीक लगती है, तो वह भी मान जाएंगे। मैंने भी अपने माता-पिता से कहा, "जो आपको सही लगे, वही ठीक है।"


शादी से पहले हमारी थोड़ी बहुत बातचीत शुरू हुई, लेकिन जल्दी ही हमारी बातें शारीरिक संबंधों की ओर मुड़ गईं। मैंने अक्षय की बातों में हां मिलाई, लेकिन अंदर ही अंदर घबराई हुई थी। मुझे नहीं पता था कि शादी के बाद के जीवन को कैसे संभालूंगी।


शादी के बाद, सुहागरात के दिन अक्षय ने मुझे छूने की कोशिश की, लेकिन मैं इसके लिए तैयार नहीं थी। मैंने उन्हें समय देने के लिए कहा। यह मेरे लिए भी शर्मिंदगी की बात थी, लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि बिना मन के कुछ भी करूं।


सप्ताह बीतते-बीतते अक्षय का व्यवहार मेरे प्रति रूखा हो गया। मुझे पता था कि इसका कारण क्या है, लेकिन यह समझ नहीं आ रहा था कि इसे कैसे ठीक किया जाए। मेरी सास, नीरा आंटी, ने मेरी हालत देखकर मुझसे पूछा कि सब ठीक है या नहीं। पहले तो मैंने कहा कि सब ठीक है, लेकिन फिर अपने आंसू रोक नहीं पाई और उन्हें सच्चाई बता दी।


नीरा आंटी ने मुझे समझाया कि शारीरिक संबंध एक विवाह के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं और यह एक पति को यह विश्वास दिलाता है कि उसकी पत्नी पूरी तरह से उसकी है। उन्होंने मुझे जबरदस्ती न करने की सलाह दी, लेकिन यह भी कहा कि अच्छे वैवाहिक संबंधों के लिए शारीरिक सुख का योगदान बहुत अहम होता है।


मेरी ननद, अनुष्का, और जीजा, विक्रम, ने भी अक्षय से बात की और उन्हें समझाया कि एक स्त्री के लिए शारीरिक संबंध का मतलब केवल शारीरिकता नहीं होता, यह उसके मन से शुरू होता है। अक्षय ने धीरे-धीरे मेरे साथ और समय बिताना शुरू किया, और हम दोस्त बनने लगे।


धीरे-धीरे, हम दोनों के बीच की दूरी मिट गई, और कब हम दो जिस्म एक जान बन गए, हमें पता ही नहीं चला। सेक्स के प्रति मेरी सारी अरुचि खत्म हो गई थी, और अक्षय को भी यह समझ में आ गया था कि एक स्त्री के लिए संभोग सिर्फ शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि मन से जुड़ी प्रक्रिया है।

अगर नीरा आंटी, अनुष्का, और विक्रम नहीं होते, तो शायद हमारी शादी इतनी आसानी से नहीं चल पाती। परिवार का सहारा और मार्गदर्शन हमें सही दिशा में लेकर गया। आजकल लोग ऐसे जीवनसाथी की तलाश करते हैं, जो अपने माता-पिता से अलग रह रहा हो, लेकिन सच तो यह है कि परिवार के साथ रहने के अनगिनत फायदे होते हैं। बंदिशें तो हर जगह होती हैं, लेकिन परिवार का साथ किसी भी रिश्ते को मजबूती से बांधे रखने के लिए जरूरी है।

प्रेम करें, लेकिन आज़ादी के साथ।

 #जबरदस्ती !!!

कई बार जीवन में हमें ऐसे मोड़ पर आकर रुकना पड़ता है जहाँ हमें यह महसूस होता है कि हमें किसी को जबरदस्ती अपने साथ नहीं रखना चाहिए। यह हमारे आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की परीक्षा होती है। यह पोस्ट उसी विचार को लेकर है: "मैं कभी जबरदस्ती नहीं करता अगर कोई भी मुझे चुनता है, अगर उन्हें लगता है कि वे मुझसे बेहतर पा सकते हैं, तो मैं उन्हें जाने देता हूं।"

यह वाक्य हमें यह सिखाता है कि प्रेम और संबंधों में स्वतंत्रता और सम्मान कितना महत्वपूर्ण होता है। जब हम किसी को अपने जीवन में रखते हैं, तो यह उनकी पसंद होनी चाहिए, न कि हमारी मजबूरी। जबरदस्ती से जुड़े रिश्ते अक्सर दर्द और निराशा ही देते हैं। 

जब कोई व्यक्ति हमारे साथ रहना चाहता है, तो वह हमारे गुणों और हमारी आत्मा को देखकर हमें चुनता है। लेकिन अगर उन्हें लगता है कि कहीं और उनके लिए कुछ बेहतर है, तो हमें उन्हें जाने देना चाहिए। यह केवल उनका निर्णय नहीं है, बल्कि यह हमारे आत्मसम्मान की भी पहचान है। 

खुद से यह सवाल पूछें: क्या हम किसी को इसलिए चाहते हैं क्योंकि हम उनके साथ रहकर खुश हैं, या केवल इसलिए क्योंकि हम उन्हें खोना नहीं चाहते? अगर हमारा उत्तर दूसरा है, तो हमें अपने विचारों को बदलने की आवश्यकता है। 

यह याद रखें कि किसी को जाने देना कमजोरी नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ी ताकत का प्रतीक है। यह दिखाता है कि हम अपने आप पर विश्वास रखते हैं और यह जानते हैं कि जो सही होगा, वही हमारे पास वापस आएगा। 

अपने आत्मसम्मान को बढ़ावा दें और अपनी स्वतंत्रता को महत्व दें। जीवन का सफर लंबा है और इसमें कई लोग आएंगे और जाएंगे। जो वास्तव में हमारे लिए बने हैं, वे हमारे जीवन में हमेशा बने रहेंगे, चाहे हालात कैसे भी हों।

इसलिए, जब आप किसी को जाने देने का निर्णय लेते हैं, तो यह मानें कि यह आपका सबसे सशक्त निर्णय है। आप केवल अपने आत्मसम्मान की रक्षा कर रहे हैं और अपने लिए नए रास्ते खोल रहे हैं। किसी के प्रति प्यार का मतलब उन्हें जबरदस्ती पकड़ना नहीं, बल्कि उन्हें स्वतंत्रता देना है। 

अपने जीवन में खुशी और संतोष लाने के लिए हमें यह सीखना होगा कि कब किसी को जाने देना है। यह एक नई शुरुआत का संकेत हो सकता है और एक ऐसा मौका जिसे आपने कभी सोचा नहीं था। 

आइए, हम सब इस भावना को समझें और अपने जीवन को इस नई दृष्टिकोण से देखें। हमारे पास जो भी है, वह हमारे पास इसलिए है क्योंकि हम उसके योग्य हैं, न कि इसलिए क्योंकि हमने उसे मजबूर किया है। 

हमेशा अपने दिल की सुनें और अपने आत्मसम्मान का पालन करें। एक सच्चे प्रेम में किसी को भी अपने निर्णय के लिए दोषी नहीं ठहराना चाहिए। प्रेम का वास्तविक अर्थ स्वतंत्रता और आत्म-सम्मान है। सच्चा प्रेम स्वतंत्रता से पैदा होता है, और जब हम किसी को जबरदस्ती अपने साथ रखते हैं, तो वह प्रेम नहीं, बल्कि बंधन होता है। इसलिए, प्रेम करें, लेकिन आज़ादी के साथ। 

Monday, 12 August 2024

रात में पत्नी से लिपट के सो जाओ, और रात भर आलिंगन करो, सुबह उठो तो पत्नी खुश 😊

 रात में पत्नी से लिपट के सो जाओ, और रात भर आलिंगन करो, सुबह उठो तो पत्नी खुश 😊❤️


**और पत्नी खुश तो मैं खुश, और मैं खुश तो पूरा परिवार खुश।** 🌸


शादी की उम्र हो रही थी मेरे लिए लड़कियाँ देखी जा रही थीं। मैं भी मन ही मन में काफी खुश था कि चलो कोई तो ऐसा होगा जिसे मैं अपना हमसफर बोलूंगा, जिसके साथ जब मन करे प्यार करूंगा। 💑 मेरी अच्छी खासी नौकरी है, घर में बूढ़ी माँ है, पापा हैं और इतनी कमाई तो हो ही जाती है कि अपनी पत्नी का खर्चा उठा सकूं। ये सारी बातें सोच-सोच के खुश होता था। माँ की उम्र भी हो गई थी, तो एक प्वाइंट ये भी लोगों को बताता कि यार मुझे शादी की कोई जल्दी नहीं, ये तो माँ हैं जिनकी उम्र निकल रही है उनके लिए शादी करनी है। माँ ने भी मेरी बात मान ली, लेकिन मन ही मन में तो मेरी भी चाहत थी कि मेरी शादी हो जाए। 💍


मेरी शादी दिव्या से फिक्स होती है। मैंने कहा, दिव्या, हम आगे जाकर बहुत अच्छी जिंदगी जीने वाले हैं, क्योंकि मेरे घर में कोई नहीं है। बस तुम्हें मेरे माँ-बाप का ध्यान रखना होगा। दिव्या ने तुरंत कहा, "आपके माँ-बाप भी मेरे माँ-बाप हो जाएंगे शादी के बाद।" दिव्या की अच्छी बातों से मुझे दिन-रात और ज्यादा प्रेम होने लगा था। कभी परिवार संभालने की बातें, कभी शरारत भरी रोमांटिक बातें सुनकर मैं बहुत खुश था। मानो एक परफेक्ट जिंदगी मुझे मिल गई हो। 💕💑

शादी के बाद हम दोनों घूमने गए, सब कुछ बहुत अच्छा था। ना जाने क्यों इस पल हम दोनों को ऐसा लगता था कि बस हम एक-दूसरे से लिपटे रहें। जिनकी शादी हुई होगी वे समझ पा रहे होंगे कि मैं क्या बोलना चाहता हूँ। घूमने के बाद जब घर आया तो ज्यादातर समय ऑफिस के लिए ही होता था। छुट्टी में जब कभी मम्मी-पापा बाहर जाते तो दिव्या मैडम मूड में रहती थी। कब, क्या, कहाँ, कैसे कुछ हो जाता था पता नहीं चलता था। 😍🌙

मुझे अब लगने लगा था, एक ऐसी पत्नी मिली है, जो घर की जरूरतों को समझती है, साथ में मेरी शारीरिक जरूरतों का भी ध्यान रखती है। संबंध बनाने के लिए खुद ही पहल करती है, और यदि कभी मैं कर दूं तो मना नहीं करती बल्कि पूरा साथ देती है। अब जिंदगी में इससे अच्छा क्या होगा? फालतू में मेरे दोस्त बोलते थे कि शादी मत करो, लाइफ खराब हो जाती है। 

हमारी शादी को 2 महीने हुए थे, दिव्या ने कहा, "अजी, मुझे साड़ी में दिक्कत होती है, क्या मैं घर पर सूट पहन सकती हूँ?" मैंने तुरंत कहा, "हाँ, क्यों नहीं पहन सकती हो, चलो अभी दिलाता हूँ।" हम दोनों बाजार से घर आते हैं। मम्मी ने उसके हाथ में सूट देखा, कुछ बोली नहीं। अगली सुबह जब वो नहाकर सूट पहन कर निकली तो मम्मी ने कहा, "तुमने सूट क्यों पहन लिया, हमारे यहां शादी के 6 महीने तक नई बहू को सिर्फ साड़ी पहननी होती है। रोज कोई ना कोई मेहमान देखने आता है, सबके सामने सूट पहन कर जाओगी तो अच्छा नहीं लगेगा। और बार-बार दिन भर कपड़ा बदलना भी अच्छा नहीं है।"

इस पर दिव्या ने मां को सॉरी कहा और बोली, "मैंने तो इनसे पूछ के लिया था।" तभी मां बोलती हैं, "ये कौन होता है ये सब डिसाइड करने वाला? अभी मैं हूँ तो मैं करूंगी, जब मैं मर जाऊं तो जैसे मन वैसे रहना।" इसे सुनने के बाद मुझे पहली बार घर में अपनी औकात का पता चला। 😔

मासूमियत से दिव्या मेरी तरफ देख रही थी शायद यह बताना चाह रही थी कि मेरी वजह से उसे डांट पड़ गई। पत्नी प्रेम में लिप्त होकर मैंने मां से बोल दिया, "अरे मम्मी, इसकी गलती नहीं है, मुझसे पूछी थी वो।" मां ने तुरंत बोला, "2 महीना हुआ नहीं और आगए पत्नी का पक्ष लेने। इस घर में मालिक मैं हूँ या तुम हो?" अब मेरे पास कोई जवाब नहीं था। हम दोनों एक-दूसरे को देखते रहे और अंदर चले गए। 

इस बात से दिव्या डर गई थी और अब वो हर काम मां से पूछ कर करने लगी। लेकिन मां के लिए यह भी एक आफत था। अब उनका कहना था कि तुम 28 साल की हो, तुम्हें खुद बुद्धि होनी चाहिए क्या करना है क्या नहीं। हर चीज के लिए मेरे पास मत आया करो। लेकिन अब इस बार दिव्या भी चिढ़ गई, पर मां से कुछ नहीं बोली। 

जब मैं ऑफिस से आया तो अंदर आते ही मां बोलने लगी, "तुम्हारी धर्मपत्नी को बुद्धि नाम की चीज नहीं है।" मैंने मां को समझाया कि जाने दो, सीख जाएगी। थोड़ा समय दो। इस पर मां ने मुझसे मुंह फुला लिया और उदास रोते हुए कहा, "तुम बदल गए हो।" और पीछे से धीरे-धीरे मेरे पिता जी देखते हुए हंस रहे थे, मानो ऐसा जताने कि उन्होंने पहले ही भविष्य देखा हुआ था। 😅

इसके बाद कमरे में गया तो वहां दिव्या का मुंह खुला हुआ था। कमरे में घुसते ही उसने मुझसे कहा, "मैं कितनी भी कोशिश कर लूं, मां मुझसे कभी खुश नहीं होती। हर चीज की एक सीमा होती है और यह सारी बातें सीमा से भी ऊपर हैं।" 

मैंने उसे पकड़ा और बोला, "घबराओ मत, थोड़ा समय लगेगा मां को संभालने में। क्योंकि तुम्हारे अलावा उनका कोई और नहीं है, वह तुम्हें अपना मानती हैं इसलिए तुमसे ऐसी बातें करती हैं। चलो चल के नीचे खाना खाते हैं, बहुत तेज भूख लगी है।" ऐसा बोलकर हम नीचे आते हैं और मैं मन में ही सोचता हूं कि दिव्या को तो मैं धीरे से किसी भी तरह से मना लूंगा। एक रात की बात है, एक बार जहां लिपट के सोया सब कुछ सुबह ठीक हो जाएगा। मां के लिए कुछ सोचना पड़ेगा। 

नीचे खाना खाने के बाद हम अपने कमरे में जाते हैं। दिव्या अभी भी थोड़ी नाराज लग रही थी। मैंने उसे बोला, "क्यों मन की बात का इतना बुरा मानती हो?" उसने तुरंत मुझसे कहा, "मेरी कोई गलती भी नहीं होती और हर चीज के लिए मुझे दोषी ठहराया जाता है। मैं कुछ अच्छा भी करने जाती हूं तो उसमें भी मेरी बुराई निकल जाती है।" 

मैंने उसे जोर से गले लगाया और बोला, "ऐसा कुछ नहीं है, समय के साथ सारी चीज ठीक हो जाएगी।" और अब बारी थी कुछ करने की, लेकिन उसने मुझे अपने से दूर कर दिया और बोला, "मेरा मन नहीं है।" अब जो मुझे लगता था कि एक रात लिपट के सोने से अगली सुबह सब कुछ ठीक हो जाएगा, यह बातें झूठी समझ आने लगीं। 

धीरे-धीरे हर छोटी-छोटी चीज पर घर में लड़ाई-झगड़ा होने लगे। मां को दिव्या की कुछ चीजें नहीं पसंद थीं और दिव्या को मां की बहुत सारी चीजें पसंद नहीं आती थीं। दिव्या का कहना था कि घर उसका भी है और हर छोटी चीज के लिए परमिशन लेना उसे ठीक नहीं लगता। उधर मां का कहना था कि इस गृहस्थी को मैंने बसाया है और तुम्हें हैंडोवर किया है, इसलिए अभी भी इसकी मालकिन मैं ही हूं। तुम्हें जो भी करना है, मुझसे पूछकर करो।

दोनों अपनी बात पर बिल्कुल सही थे। एक तरफ दिव्या, जिसके साथ मुझे पूरी जिंदगी बितानी थी, दूसरी तरफ मेरी मां, जिन्होंने इस गृहस्थी को संभाला था, मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया था। 

लेकिन इन दोनों की लड़ाई का असर सीधा-सीधा मेरे ऊपर दिख रहा था और मैं पिसता जा रहा था। धीरे-धीरे बात कहीं ज्यादा बढ़ने लगी और घर में प्रतिदिन लड़ाई-झगड़े की नौबत आ गई। अब मुझे भी लगने लगा था कि जो मेरे दोस्त बोलते थे कि शादी करने से बहुत ज्यादा खुशी नहीं मिलती बल्कि लाइफ में टेंशन आता है, वे क्यों बोलते थे। 

इसी तरह एक दिन अत्यधिक बात बढ़ने पर मैं रात को दोनों के कमरे में गया। सबसे पहले मैं मां के कमरे में गया और मां को समझाया कि देखो मां, तुम दोनों के झगड़े की वजह से मेरा करियर खराब हो रहा है और मैं ठीक से रह नहीं पा रहा हूं। मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता और ना मैं दिव्या को छोड़ सकता हूं, तो इसलिए थोड़ी नरम हो जाओ। जो चीज जैसे चल रही है, चलने दो। इस बार मैं थोड़ा कठोर था।

मां से तुरंत बोलने के बाद मैं अपनी पत्नी के कमरे में गया और मैं यही बात उससे भी कही कि देखो, मां की उम्र हो चुकी है। यदि तुम यह सोच रही हो कि मां अपने आप को बदल सकती हैं, तो यह होना मुमकिन नहीं है। बदलना तुम्हें खुद को होगा जिसमें मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगा। मैं ना तुम्हें छोड़ सकता हूं क्योंकि तुम मेरा भविष्य हो, और ना मैं अपनी मां को छोड़ सकता हूं क्योंकि उन्होंने मुझे पाल-पोसकर इस लायक बनाया है। तो कोई बीच का रास्त

ा निकालो और घर में शांति से रहो।

यह बात होने की कुछ दिन बाद तक तो चीजें ठीक थीं, लेकिन धीरे-धीरे कुछ समय बाद फिर झगड़ा होना शुरू हो गया। और इस बार मैंने दोनों को आमने-सामने बैठाकर कहा कि लास्ट टाइम मैंने आप लोगों से बात की थी पर उसका कोई भी मतलब नहीं निकला। अगर आज के बाद फिर घर में कभी झगड़ा होता है, तो मैं यह घर छोड़कर चला जाऊंगा। मैं कहीं बाहर रहूंगा और हर महीने की सैलरी आधी मां को और आधी दिव्या को दे दिया करूंगा। इस बात का दोनों के ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।

हफ्ता बीतता है और घर में फिर झगड़ा होता है। इस बार समय था एक्शन लेने का। मैं झगड़ा होते हुए देखता हूं, पर इस बार कुछ भी नहीं बोलता। मैं ऑफिस जाता हूं और इस बार देर रात तक ऑफिस में ही रुकता हूं। जब दिव्या मुझे फोन करती है कि आप कहां हैं तो मैं उनसे कहता हूं कि मुझे नहीं पता मैं कहां हूं। कुछ देर बाद मां का फोन आता है और मां भी मुझसे यही पूछती हैं कि तुम कहां हो, इतना देर क्यों हो रहा है? मैंने मां को भी बोल दिया कि मैं कहां हूं, मुझे भी नहीं पता।

इस दौरान मैं अपने एक अविवाहित दोस्त के घर पर रुका हुआ था, जिसके बारे में मेरे घर में किसी को नहीं पता था। सिर्फ मेरे पिता जानते थे। जब दिव्या का फोन आता है या मां का फोन आता तो मैं उनसे नॉर्मल बात करता और यह बोल देता कि कई बार मैंने उन लोगों को समझाया है कि घर में लड़ाई-झगड़ा मत करो जिससे घर की शांति भंग होती है। इस वजह से मैं अब घर छोड़कर बाहर आ गया हूं और हमेशा के लिए बाहर हूं।

यह सुनने के बाद मेरी मां घबरा गईं, दिव्या घबरा गई कि आखिर ऐसा क्या हो गया। और ये दोनों मुझे फोन करके समय-समय पर यह एहसास दिलाते कि दोबारा उनसे यह गलती कभी नहीं होगी। मुझे जल्दी से जल्दी घर आ जाना चाहिए। मां ने तो यह तक बोल दिया कि "तू क्या चाहता है, मैं बिना पोते का मुंह देखे मर जाऊं?" और दिव्या फोन करके मुझे यह बोलती कि "आपकी मां आपके लिए बहुत परेशान हैं, मेरे लिए ना सही, कम से कम उनके लिए तो वापस आजाइए।"

मुझे यह देखकर बहुत खुशी हो रही थी कि दोनों लोग मेरे चक्कर में एक-दूसरे के बारे में सोच रहे थे। बस फर्क इतना था कि दिव्या खुलकर मुझे बोल रही थी, पर मां इशारों में बोल रही थी।

एक हफ्ते बाद मैं घर आता हूं और घर जाकर सबसे पहले मां को देखता हूं और पिताजी से मिलता हूं। पापा मुझे बताते हैं कि एक हफ्ते से घर में काफी शांति है और उम्मीद है आगे भी ऐसा झगड़ा नहीं होगा। और यकीन मानिए, उस दिन के बाद से ऐसा झगड़ा दोबारा कभी नहीं हुआ। मेरी मां मेरी पत्नी के साथ अच्छे से रहती हैं और मेरी पत्नी मेरी मां के साथ अच्छे से रहती हैं। 😊

आज दिव्या के साथ मुझे पूरे 5 साल हो चुके हैं और हमारा एक बेटा भी है। लेकिन आज हमारे घर में गृहकलह नाम की चीज नहीं है और इसका पूरा श्रेय मैं अपने पिता को देना चाहता हूं। 🙏 क्योंकि उस दिन जब हम पेंशन का काम करने कचहरी गए थे, तो उन्होंने ही मुझे यह आईडिया दिया कि "तुम एक हफ्ते के लिए घर से बाहर भाग जाओ और बोल देना कि अब तुम दोबारा लौट के कभी नहीं आओगे।"

मुझे पता है मेरा यह कदम काफी ज्यादा हास्यास्पद और कुछ लोगों को बेकार लगेगा। पर यकीन मानिए, इस चीज ने मेरी जिंदगी बदल दी। अगर मैंने आज यह कदम न उठाया होता, तो शायद हर घर की तरह मेरे घर में भी रोज लड़ाई-झगड़ा हो रहा होता।

भारत में शादी सिर्फ लड़के और लड़की की नहीं होती बल्कि लड़की और लड़के की फैमिली की भी होती है। शादी के बाद सिर्फ पत्नी के साथ जी भर के प्यार करने से खुशी नहीं प्राप्त होती। असली खुशी तब मिलती है जब आपका परिवार भी खुश हो। और परिवार को खुश करने की जिम्मेदारी सिर्फ लड़की की नहीं होती बल्कि पूरे परिवार की होती है। इसमें आप, मैं, आपकी मां, आपके पापा और लड़की सभी शामिल होते हैं।

❤️

एक लड़की की शारीरिक जरूरत संभोग से पूरी होती है ,

 एक लड़की की शारीरिक जरूरत संभोग से पूरी होती है , 

एक सुखद संभोग स्त्रीत्व की पूर्ति करता है, दिमाग में ऐसे केमिकल निकालने में मदद करती है जिससे स्त्री पूर्ण महसूस करती है।

और मैने भी इस बात को महसूस किया है और ये सत प्रतिशत सही है ।


जब मैं कॉलेज में थी, तो नई नई फिल्म इंटरनेट पर लेख पढ़ती थी, और ये समझ आया कि स्त्री पुरुष की शारीरिक जरुरते होती हैं।

स्त्री की जरूरत को पूरा करने के लिए पुरुष की आवश्यकता होती है, और पुरुष को स्त्री की ओर एक दूसरे की आवश्यकता को पूर्ण करने में कोई गलत बात नहीं है।


वहीं दूसरी तरफ हमारे ग्रन्थ माता पिता इस बात के खिलाफ थे, उनका कहना था शादी से पहले ये सब गलत है। 

ऐसा क्यों था? 

मुझे समझ नहीं आया और मुझे खुद ये लगता था कि ये सब फिजूल की बातें हैं।


मेरा बॉयफ्रेंड बना, और मैने अपनी सहमति जाहिर की,

कि मैं संभोग का आनंद लेना चाहती हूं।


वो भी तैयार था, हम दोनो जाते हैं और इसे एक्सपीरियंस करते हैं।

ये जादुई एहसाह था शरीर में एक अलग तरह की ऊर्जा आने लगी थी। अब मुझे लगा कि ये शारीरिक जरूरत जरूर पूरी करनी चाहिए।

लेकिन कुछ समय बाद मेरा breakup हो गया।


और मैं किसी दूसरे लड़के के साथ सम्बन्ध बनाने लगी।

पर हमारी शादी नहीं हो सकती थी।


और अब शादी की उम्र आगई थी तो मां पापा ने एक अच्छा लड़का खोज के शादी कर दी।

पहले कुछ दिन तो संभोग अच्छा रहा।


लेकिन ना जाने क्यों मेरा मन इस बात से हटने लगा।

पति जब संभोग के बारे में पहल करते मैं बहाना बना देती 

हमारे रिश्तों में खटास आने लगी थी।


मैने डॉक्टर के पास नंबर लगाया और उन्हें अपनी समस्या बताई।

उन्होंने बोला उम्र के साथ ऐसा होता है,

और पूरा एक साल दवाई खाई।


इधर मेरे पति भी मुझसे खिन्न रहने लगे थे।

मुझे पता है, कि पुरुषों को सेक्स की चाहत होती है।

पर मैं चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पा रही थी।


हमारे बच्चे भी नहीं थे lऔर ना हमारे बीच ज्यादा शारीरिक संबंध था।


उन्होंने मुझ बोला कि पत्नी होते हुए भी मेरी शारीरिक जरूरत पूरी नहीं हो पा रही। तो अब हमारा साथ रहने का कोई मतलब नहीं है।


मुझे ये बात अंदर तक चुभ गई।

मैने बोला कुछ समय दो।

और मैं इस बार सब छोड़कर कर ऋषिकेश आई।

इस आस में की मेरी मानसिक स्थिति ठीक नहीं जिसकी वजह से ये सब हो रहा है।

वहां मुझे मेरी गुरु मा मिली जो मुझे ध्यान और योग सिखाती थी।

उन्होंने मुझसे मेरे बातो पर चर्चा किया।

तो मैने उन्हें बताया कि मेरी ये समस्या है।


उन्होंने पल भर में ही ये बोल दिया कि, शादी से पहले कितने पुरुषों के साथ सोई हो ? 


मैं हैरान थी पर मैने उन्हें सही जवाब दे दिया।


उन्होंने बोला हमारा शरीर यादों से मिलकर बना है। जब किसी स्त्री किसी पुरुष के साथ सम्बद्ध बनती हैं तो उसके अंग अंग में उस पुरुष की याद बसती हैं ।

और इस वजह से दोनों के मध्य परस्पर प्रेम काम वासना धीरे धीरे बढ़ती है।


लेकिन जब यही काम 2 3 पुरुषों के साथ करो तो शरीर समझ ही नहीं पाता है कि किसे यादों में बसाना है और किसे निकाल फेकना ।

और आप को संभोग में अरुचि होती है धीरे धीरे प्रेम खत्म होने लगता ।


फिर मुझे समझ आया कि क्यों बड़े बुजुर्ग शादी के बाद ही संभोग करने की सलाह देते हैं।

जिससे हमारे रिश्ते मजबूत हो जाएं।


लेकिन आज मेरी तरह ना जाने कितनी लड़किया शादी से पहले संभोग करती हैं। बिना इसका दुष्प्रभाव डाले।

और ना चाहते हुए भी उनकी शादी शुदा जिंदगी बर्बाद होती है ।


इसके अलावा ऐसी भी लड़किया हैं जो अपने काम को निकालने या अपने स्टेटस को मेंटेन रखने मात्र के लिए अपनी कपड़े किसी के भी सामने खोल देती हैं।

पर ये बात गलत है।

 मुझे इसका एहसाह तब हुआ जब मेरे पति और मेरे रिश्तों के बीच खटास आने लगी।

किसी भी स्थिति में शादी से पहले सम्बन्ध बनाना गलत है। 

तुम्हे आज मजा आएगा।

लेकिन शादी के बाद सिर्फ पछताना पड़ेगा 

और तुम ये सोचेगी क्यों आखिर ऐसा किया मैने।

कॉलेज में सुखी वैवाहिक जीवन पर एक कार्यक्रम हो

 कॉलेज में सुखी वैवाहिक जीवन पर एक कार्यक्रम हो रहा था, जिसमे कुछ शादीशुदा जोड़े हिस्सा ले रहे थे। जिस समय प्रोफेसर मंच पर आए । उन्होने नोट किया कि सभी पति- पत्नी शादी पर जोक कह सुनकर हँस रहे थे । ये देख कर प्रोफेसर ने कहा कि चलो पहले एक Game खेलते हैं उसके बाद अपने विषय पर बातें करेंगे। सभी खुश हो गए और कहा कौन सा Game ?

प्रोफ़ेसर ने एक विवाहित महिला को खड़ा किया और कहा कि तुम ब्लैक बोर्ड पर ऐसे 25- 30 लोगों के नाम लिखो जो तुम्हे सबसे अधिक प्यारे हों ।

महिला ने पहले तो अपने परिवार के लोगों के नाम लिखे फिर अपने सगे सम्बन्धी, दोस्तों, पडोसी और सह कर्मियों के नाम लिख दिए । अब प्रोफ़ेसर ने उसमे से कोई भी कम पसंद वाले 5 नाम मिटाने को कहा । लड़की ने अपने सह कर्मियों के नाम मिटा दिए । प्रोफ़ेसर ने और 5 नाम मिटाने को कहा । लड़की ने थोडा सोच कर अपने पड़ोसियो के नाम मिटा दिए । अब प्रोफ़ेसर ने और 10 नाम मिटाने को कहा।लड़की ने अपने सगे सम्बन्धी और दोस्तों के नाम मिटा दिए ।अब बोर्ड पर सिर्फ 4 नाम बचे थे जो उसके मम्मी- पापा, पति और बच्चे का नाम था । अब प्रोफ़ेसर ने कहा इसमें से और 2 नाम मिटा दो । लड़की असमंजस में पड गयी । बहुत सोचने के बाद बहुत दुखी होते हुए उसने अपने मम्मी- पापा का नाम मिटा दिया सभी लोग स्तब्ध और शांत थे क्योंकि वो जानते थे कि ये गेम सिर्फ वो लड़की ही नहीं खेल रही थी उनके दिमाग में भी यही सब चल रहा था।अब सिर्फ 2 ही नाम बचे थे, पति और बेटे का ।


प्रोफ़ेसर ने कहा, "और एक नाम मिटा दो । " लड़की अब सहमी सी रह गयी । बहुत सोचने के बाद रोते हुए अपने बेटे का नाम काट दिया । प्रोफ़ेसर ने उस लड़की से कहा,"तुम अपनी जगह पर जाकर बैठ जाओ"। प्रोफेसर ने सभी की तरफ गौर से देखा और पूछा- "क्या कोई बता सकता है कि ऐसा क्यों हुआ कि सिर्फ पति का ही नाम बोर्ड पर रह गया।" कोई जवाब नहीं दे पाया । सभी मुँह लटका कर बैठे थे ।


प्रोफ़ेसर ने फिर उस लड़की को खड़ा किया और कहा "ऐसा क्यों ! जिसने तुम्हे जन्म दिया और पाल पोस कर इतना बड़ा किया उनका नाम तुमने मिटा दिया और तो और तुमने अपनी कोख से जिस बच्चे को जन्म दिया उसका भी नाम तुमने मिटा दिया ? "


लड़की ने जवाब दिया "अब मम्मी- पापा बूढ़े हो चुके हैं, कुछ साल के बाद वो मुझे और इस दुनिया को छोड़ के चले जायेंगे । मेरा बेटा जब बड़ा हो जायेगा तो जरूरी नहीं कि वो शादी के बाद मेरे साथ ही रहे।लेकिन मेरे पति जब तक मेरी जान में जान है तब तक मेरा आधा शरीर बनकर मेरा साथ निभायेंगे इसलिए मेरे लिए सबसे अजीज मेरे पति हैं ।"


प्रोफ़ेसर और बाकी स्टूडेंट ने तालियों की गूंज से लड़की को सलामी दी ।प्रोफ़ेसर ने कहा, " बिलकुल सही कहा कि तुम और सभी के बिना रह सकती हो पर अपने आधे अंग अर्थात अपने पति के बिना नहीं रह सकतीं l मजाक मस्ती तक तो ठीक है पर हर इंसान का अपना जीवन साथी ही उसको सब से ज्यादा अजीज होता है ।"

अपने जीवनसाथी का सम्मान करें दोस्तों

Friday, 9 August 2024

एक अखबार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस

 एक अखबार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस समय वह अख़बार देने आता था, उस समय मैं उसको अपने मकान की 'गैलरी' में टहलता हुआ मिल जाता था। अत: वह मेरे आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए मेरे आवास में अख़बार फेंकता और मुझको 'नमस्ते डॉक्टर साब' वाक्य से अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था। 

क्रमश: समय बीतने के साथ मेरे सोकर उठने का समय बदल कर प्रात: 7:00 बजे हो गया।

जब कई दिनों तक मैं उसको प्रात: नहीं दिखा तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:00 बजे वह मेरा कुशल-क्षेम लेने मेरे आवास पर आ गया। जब उसको ज्ञात हुआ कि घर में सब कुशल- मंगल है, मैं बस यूँ ही देर से उठने लगा था।

वह बड़े सविनय भाव से हाथ जोड़ कर बोला, 

"डॉक्टर साब! एक बात कहूँ?"

मैंने कहा... "बोलो"

वह बोला... "आप सुबह तड़के सोकर जगने की अपनी इतनी अच्छी आदत को क्यों बदल रहे हैं? आप के लिए ही मैं सुबह तड़के विधान सभा मार्ग से अख़बार उठा कर और फिर बहुत तेज़ी से साइकिल चला कर आप तक अपना पहला अख़बार देने आता हूँ...सोचता हूँ कि आप प्रतीक्षा कर रहे होंगे।"

मैने विस्मय से पूछा... "और आप! विधान सभा मार्ग से अखबार लेकर आते हैं?"

हाँ! सबसे पहला वितरण वहीं से प्रारम्भ होता है," उसने उत्तर दिया।

“तो फिर तुम जगते कितने बजे हो?"

“ढाई बजे.... फिर साढ़े तीन तक वहाँ पहुँच जाता हूँ।"

फिर?" मैंने पूछा।

“फिर लगभग सात बजे अख़बार बाँट कर घर वापस आकर सो जाता हूँ..... फिर दस बजे कार्यालय...... अब बच्चों को बड़ा करने के लिए ये सब तो करना ही होता है।”


मैं कुछ पलों तक उसकी ओर देखता रह गया और फिर बोला, “ठीक! तुम्हारे बहुमूल्य सुझाव को ध्यान में रखूँगा।"


घटना को लगभग पन्द्रह वर्ष बीत गये। एक दिन प्रात: नौ बजे के लगभग वह मेरे आवास पर आकर एक निमंत्रण-पत्र देते हुए बोला, “डॉक्टर साब! बिटिया का विवाह है..... आप को सपरिवार आना है।“


निमंत्रण-पत्र के आवरण में अभिलेखित सामग्री को मैंने सरसरी निगाह से जो पढ़ा तो संकेत मिला कि किसी डाक्टर लड़की का किसी डाक्टर लड़के से परिणय का निमंत्रण था। तो जाने कैसे मेरे मुँह से निकल गया, “तुम्हारी लड़की?"


उसने भी जाने मेरे इस प्रश्न का क्या अर्थ निकाल लिया कि विस्मय के साथ बोला, “कैसी बात कर रहे हैं, डॉक्टर साबजी! मेरी ही बेटी।"


मैं अपने को सम्भालते हुए और कुछ अपनी झेंप को मिटाते हुए बोला, “नहीं! मेरा तात्पर्य कि अपनी लड़की को तुम डाक्टर बना सके, इसी प्रसन्नता में वैसा कहा।“


“हाँ सरजी! लड़की ने मेकाहारा से एमबीबीएस किया है और उसका होने वाला पति भी वहीं से एमडी है ....... और सरजी! मेरा लड़का इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र है।”


मैं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा सोच रहा था कि उससे अन्दर आकर बैठने को कहूँ कि न कहूँ कि वह स्वयम् बोला, “अच्छा सरजी! अब चलता हूँ..... अभी और कई कार्ड बाँटने हैं...... आप लोग आइयेगा अवश्य।"


मैंने भी फिर सोचा आज अचानक अन्दर बैठने को कहने का आग्रह मात्र एक छलावा ही होगा। अत: औपचारिक नमस्ते कहकर मैंने उसे विदाई दे दी।


उस घटना के दो वर्षों के बाद जब वह मेरे आवास पर आया तो ज्ञात हुआ कि उसका बेटा जर्मनी में कहीं कार्यरत था। उत्सुक्तावश मैंने उससे प्रश्न कर ही डाला कि आखिर उसने अपनी सीमित आय में रहकर अपने बच्चों को वैसी उच्च शिक्षा कैसे दे डाली?


“सर जी! इसकी बड़ी लम्बी कथा है फिर भी कुछ आप को बताये देता हूँ। अख़बार, नौकरी के अतिरिक्त भी मैं ख़ाली समय में कुछ न कुछ कमा लेता था। साथ ही अपने दैनिक व्यय पर इतना कड़ा अंकुश कि भोजन में सब्जी के नाम पर रात में बाज़ार में बची खुची कद्दू, लौकी, बैंगन जैसी मौसमी सस्ती-मद्दी सब्जी को ही खरीद कर घर पर लाकर बनायी जाती थी।

एक दिन मेरा लड़का परोसी गयी थाली की सामग्री देखकर रोने लगा और अपनी माँ से बोला, 'ये क्या रोज़ बस वही कद्दू, बैंगन, लौकी, तरोई जैसी नीरस सब्ज़ी... रूख़ा-सूख़ा ख़ाना...... ऊब गया हूँ इसे खाते-खाते। अपने मित्रों के घर जाता हूँ तो वहाँ मटर-पनीर, कोफ़्ते, दम आलू आदि....। और यहाँ कि बस क्या कहूँ!!'"

मैं सब सुन रहा था तो रहा न गया और मैं बड़े उदास मन से उसके पास जाकर बड़े प्यार से उसकी ओर देखा और फिर बोला, "पहले आँसू पोंछ फिर मैं आगे कुछ कहूँ।"

मेरे ऐसा कहने पर उसने अपने आँसू स्वयम् पोछ लिये। फिर मैं बोला, "बेटा! सिर्फ़ अपनी थाली देख। दूसरे की देखेगा तो तेरी अपनी थाली भी चली जायेगी...... और सिर्फ़ अपनी ही थाली देखेगा तो क्या पता कि तेरी थाली किस स्तर तक अच्छी होती चली जाये। इस रूख़ी-सूख़ी थाली में मैं तेरा भविष्य देख रहा हूँ। इसका अनादर मत कर। इसमें जो कुछ भी परोसा गया है उसे मुस्करा कर खा ले ....।"

उसने फिर मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और जो कुछ भी परोसा गया था खा लिया। उसके बाद से मेरे किसी बच्चे ने मुझसे किसी भी प्रकार की कोई भी माँग नहीं रक्खी। डॉक्टर साब! आज का दिन बच्चों के उसी त्याग का परिणाम है।

उसकी बातों को मैं तन्मयता के साथ चुपचाप सुनता रहा।

आज जब मैं यह संस्मरण लिख रहा हूँ तो यह भी सोच रहा हूँ कि आज के बच्चों की कैसी विकृत मानसिकता है कि वे अपने अभिभावकों की हैसियत पर दृष्टि डाले बिना उन पर ऊटपटाँग माँगों का दबाव डालते रहते हैं..

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...