sunilrathod

Monday, 12 August 2024

एक लड़की की शारीरिक जरूरत संभोग से पूरी होती है ,

 एक लड़की की शारीरिक जरूरत संभोग से पूरी होती है , 

एक सुखद संभोग स्त्रीत्व की पूर्ति करता है, दिमाग में ऐसे केमिकल निकालने में मदद करती है जिससे स्त्री पूर्ण महसूस करती है।

और मैने भी इस बात को महसूस किया है और ये सत प्रतिशत सही है ।


जब मैं कॉलेज में थी, तो नई नई फिल्म इंटरनेट पर लेख पढ़ती थी, और ये समझ आया कि स्त्री पुरुष की शारीरिक जरुरते होती हैं।

स्त्री की जरूरत को पूरा करने के लिए पुरुष की आवश्यकता होती है, और पुरुष को स्त्री की ओर एक दूसरे की आवश्यकता को पूर्ण करने में कोई गलत बात नहीं है।


वहीं दूसरी तरफ हमारे ग्रन्थ माता पिता इस बात के खिलाफ थे, उनका कहना था शादी से पहले ये सब गलत है। 

ऐसा क्यों था? 

मुझे समझ नहीं आया और मुझे खुद ये लगता था कि ये सब फिजूल की बातें हैं।


मेरा बॉयफ्रेंड बना, और मैने अपनी सहमति जाहिर की,

कि मैं संभोग का आनंद लेना चाहती हूं।


वो भी तैयार था, हम दोनो जाते हैं और इसे एक्सपीरियंस करते हैं।

ये जादुई एहसाह था शरीर में एक अलग तरह की ऊर्जा आने लगी थी। अब मुझे लगा कि ये शारीरिक जरूरत जरूर पूरी करनी चाहिए।

लेकिन कुछ समय बाद मेरा breakup हो गया।


और मैं किसी दूसरे लड़के के साथ सम्बन्ध बनाने लगी।

पर हमारी शादी नहीं हो सकती थी।


और अब शादी की उम्र आगई थी तो मां पापा ने एक अच्छा लड़का खोज के शादी कर दी।

पहले कुछ दिन तो संभोग अच्छा रहा।


लेकिन ना जाने क्यों मेरा मन इस बात से हटने लगा।

पति जब संभोग के बारे में पहल करते मैं बहाना बना देती 

हमारे रिश्तों में खटास आने लगी थी।


मैने डॉक्टर के पास नंबर लगाया और उन्हें अपनी समस्या बताई।

उन्होंने बोला उम्र के साथ ऐसा होता है,

और पूरा एक साल दवाई खाई।


इधर मेरे पति भी मुझसे खिन्न रहने लगे थे।

मुझे पता है, कि पुरुषों को सेक्स की चाहत होती है।

पर मैं चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पा रही थी।


हमारे बच्चे भी नहीं थे lऔर ना हमारे बीच ज्यादा शारीरिक संबंध था।


उन्होंने मुझ बोला कि पत्नी होते हुए भी मेरी शारीरिक जरूरत पूरी नहीं हो पा रही। तो अब हमारा साथ रहने का कोई मतलब नहीं है।


मुझे ये बात अंदर तक चुभ गई।

मैने बोला कुछ समय दो।

और मैं इस बार सब छोड़कर कर ऋषिकेश आई।

इस आस में की मेरी मानसिक स्थिति ठीक नहीं जिसकी वजह से ये सब हो रहा है।

वहां मुझे मेरी गुरु मा मिली जो मुझे ध्यान और योग सिखाती थी।

उन्होंने मुझसे मेरे बातो पर चर्चा किया।

तो मैने उन्हें बताया कि मेरी ये समस्या है।


उन्होंने पल भर में ही ये बोल दिया कि, शादी से पहले कितने पुरुषों के साथ सोई हो ? 


मैं हैरान थी पर मैने उन्हें सही जवाब दे दिया।


उन्होंने बोला हमारा शरीर यादों से मिलकर बना है। जब किसी स्त्री किसी पुरुष के साथ सम्बद्ध बनती हैं तो उसके अंग अंग में उस पुरुष की याद बसती हैं ।

और इस वजह से दोनों के मध्य परस्पर प्रेम काम वासना धीरे धीरे बढ़ती है।


लेकिन जब यही काम 2 3 पुरुषों के साथ करो तो शरीर समझ ही नहीं पाता है कि किसे यादों में बसाना है और किसे निकाल फेकना ।

और आप को संभोग में अरुचि होती है धीरे धीरे प्रेम खत्म होने लगता ।


फिर मुझे समझ आया कि क्यों बड़े बुजुर्ग शादी के बाद ही संभोग करने की सलाह देते हैं।

जिससे हमारे रिश्ते मजबूत हो जाएं।


लेकिन आज मेरी तरह ना जाने कितनी लड़किया शादी से पहले संभोग करती हैं। बिना इसका दुष्प्रभाव डाले।

और ना चाहते हुए भी उनकी शादी शुदा जिंदगी बर्बाद होती है ।


इसके अलावा ऐसी भी लड़किया हैं जो अपने काम को निकालने या अपने स्टेटस को मेंटेन रखने मात्र के लिए अपनी कपड़े किसी के भी सामने खोल देती हैं।

पर ये बात गलत है।

 मुझे इसका एहसाह तब हुआ जब मेरे पति और मेरे रिश्तों के बीच खटास आने लगी।

किसी भी स्थिति में शादी से पहले सम्बन्ध बनाना गलत है। 

तुम्हे आज मजा आएगा।

लेकिन शादी के बाद सिर्फ पछताना पड़ेगा 

और तुम ये सोचेगी क्यों आखिर ऐसा किया मैने।

कॉलेज में सुखी वैवाहिक जीवन पर एक कार्यक्रम हो

 कॉलेज में सुखी वैवाहिक जीवन पर एक कार्यक्रम हो रहा था, जिसमे कुछ शादीशुदा जोड़े हिस्सा ले रहे थे। जिस समय प्रोफेसर मंच पर आए । उन्होने नोट किया कि सभी पति- पत्नी शादी पर जोक कह सुनकर हँस रहे थे । ये देख कर प्रोफेसर ने कहा कि चलो पहले एक Game खेलते हैं उसके बाद अपने विषय पर बातें करेंगे। सभी खुश हो गए और कहा कौन सा Game ?

प्रोफ़ेसर ने एक विवाहित महिला को खड़ा किया और कहा कि तुम ब्लैक बोर्ड पर ऐसे 25- 30 लोगों के नाम लिखो जो तुम्हे सबसे अधिक प्यारे हों ।

महिला ने पहले तो अपने परिवार के लोगों के नाम लिखे फिर अपने सगे सम्बन्धी, दोस्तों, पडोसी और सह कर्मियों के नाम लिख दिए । अब प्रोफ़ेसर ने उसमे से कोई भी कम पसंद वाले 5 नाम मिटाने को कहा । लड़की ने अपने सह कर्मियों के नाम मिटा दिए । प्रोफ़ेसर ने और 5 नाम मिटाने को कहा । लड़की ने थोडा सोच कर अपने पड़ोसियो के नाम मिटा दिए । अब प्रोफ़ेसर ने और 10 नाम मिटाने को कहा।लड़की ने अपने सगे सम्बन्धी और दोस्तों के नाम मिटा दिए ।अब बोर्ड पर सिर्फ 4 नाम बचे थे जो उसके मम्मी- पापा, पति और बच्चे का नाम था । अब प्रोफ़ेसर ने कहा इसमें से और 2 नाम मिटा दो । लड़की असमंजस में पड गयी । बहुत सोचने के बाद बहुत दुखी होते हुए उसने अपने मम्मी- पापा का नाम मिटा दिया सभी लोग स्तब्ध और शांत थे क्योंकि वो जानते थे कि ये गेम सिर्फ वो लड़की ही नहीं खेल रही थी उनके दिमाग में भी यही सब चल रहा था।अब सिर्फ 2 ही नाम बचे थे, पति और बेटे का ।


प्रोफ़ेसर ने कहा, "और एक नाम मिटा दो । " लड़की अब सहमी सी रह गयी । बहुत सोचने के बाद रोते हुए अपने बेटे का नाम काट दिया । प्रोफ़ेसर ने उस लड़की से कहा,"तुम अपनी जगह पर जाकर बैठ जाओ"। प्रोफेसर ने सभी की तरफ गौर से देखा और पूछा- "क्या कोई बता सकता है कि ऐसा क्यों हुआ कि सिर्फ पति का ही नाम बोर्ड पर रह गया।" कोई जवाब नहीं दे पाया । सभी मुँह लटका कर बैठे थे ।


प्रोफ़ेसर ने फिर उस लड़की को खड़ा किया और कहा "ऐसा क्यों ! जिसने तुम्हे जन्म दिया और पाल पोस कर इतना बड़ा किया उनका नाम तुमने मिटा दिया और तो और तुमने अपनी कोख से जिस बच्चे को जन्म दिया उसका भी नाम तुमने मिटा दिया ? "


लड़की ने जवाब दिया "अब मम्मी- पापा बूढ़े हो चुके हैं, कुछ साल के बाद वो मुझे और इस दुनिया को छोड़ के चले जायेंगे । मेरा बेटा जब बड़ा हो जायेगा तो जरूरी नहीं कि वो शादी के बाद मेरे साथ ही रहे।लेकिन मेरे पति जब तक मेरी जान में जान है तब तक मेरा आधा शरीर बनकर मेरा साथ निभायेंगे इसलिए मेरे लिए सबसे अजीज मेरे पति हैं ।"


प्रोफ़ेसर और बाकी स्टूडेंट ने तालियों की गूंज से लड़की को सलामी दी ।प्रोफ़ेसर ने कहा, " बिलकुल सही कहा कि तुम और सभी के बिना रह सकती हो पर अपने आधे अंग अर्थात अपने पति के बिना नहीं रह सकतीं l मजाक मस्ती तक तो ठीक है पर हर इंसान का अपना जीवन साथी ही उसको सब से ज्यादा अजीज होता है ।"

अपने जीवनसाथी का सम्मान करें दोस्तों

Friday, 9 August 2024

एक अखबार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस

 एक अखबार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस समय वह अख़बार देने आता था, उस समय मैं उसको अपने मकान की 'गैलरी' में टहलता हुआ मिल जाता था। अत: वह मेरे आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए मेरे आवास में अख़बार फेंकता और मुझको 'नमस्ते डॉक्टर साब' वाक्य से अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था। 

क्रमश: समय बीतने के साथ मेरे सोकर उठने का समय बदल कर प्रात: 7:00 बजे हो गया।

जब कई दिनों तक मैं उसको प्रात: नहीं दिखा तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:00 बजे वह मेरा कुशल-क्षेम लेने मेरे आवास पर आ गया। जब उसको ज्ञात हुआ कि घर में सब कुशल- मंगल है, मैं बस यूँ ही देर से उठने लगा था।

वह बड़े सविनय भाव से हाथ जोड़ कर बोला, 

"डॉक्टर साब! एक बात कहूँ?"

मैंने कहा... "बोलो"

वह बोला... "आप सुबह तड़के सोकर जगने की अपनी इतनी अच्छी आदत को क्यों बदल रहे हैं? आप के लिए ही मैं सुबह तड़के विधान सभा मार्ग से अख़बार उठा कर और फिर बहुत तेज़ी से साइकिल चला कर आप तक अपना पहला अख़बार देने आता हूँ...सोचता हूँ कि आप प्रतीक्षा कर रहे होंगे।"

मैने विस्मय से पूछा... "और आप! विधान सभा मार्ग से अखबार लेकर आते हैं?"

हाँ! सबसे पहला वितरण वहीं से प्रारम्भ होता है," उसने उत्तर दिया।

“तो फिर तुम जगते कितने बजे हो?"

“ढाई बजे.... फिर साढ़े तीन तक वहाँ पहुँच जाता हूँ।"

फिर?" मैंने पूछा।

“फिर लगभग सात बजे अख़बार बाँट कर घर वापस आकर सो जाता हूँ..... फिर दस बजे कार्यालय...... अब बच्चों को बड़ा करने के लिए ये सब तो करना ही होता है।”


मैं कुछ पलों तक उसकी ओर देखता रह गया और फिर बोला, “ठीक! तुम्हारे बहुमूल्य सुझाव को ध्यान में रखूँगा।"


घटना को लगभग पन्द्रह वर्ष बीत गये। एक दिन प्रात: नौ बजे के लगभग वह मेरे आवास पर आकर एक निमंत्रण-पत्र देते हुए बोला, “डॉक्टर साब! बिटिया का विवाह है..... आप को सपरिवार आना है।“


निमंत्रण-पत्र के आवरण में अभिलेखित सामग्री को मैंने सरसरी निगाह से जो पढ़ा तो संकेत मिला कि किसी डाक्टर लड़की का किसी डाक्टर लड़के से परिणय का निमंत्रण था। तो जाने कैसे मेरे मुँह से निकल गया, “तुम्हारी लड़की?"


उसने भी जाने मेरे इस प्रश्न का क्या अर्थ निकाल लिया कि विस्मय के साथ बोला, “कैसी बात कर रहे हैं, डॉक्टर साबजी! मेरी ही बेटी।"


मैं अपने को सम्भालते हुए और कुछ अपनी झेंप को मिटाते हुए बोला, “नहीं! मेरा तात्पर्य कि अपनी लड़की को तुम डाक्टर बना सके, इसी प्रसन्नता में वैसा कहा।“


“हाँ सरजी! लड़की ने मेकाहारा से एमबीबीएस किया है और उसका होने वाला पति भी वहीं से एमडी है ....... और सरजी! मेरा लड़का इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र है।”


मैं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा सोच रहा था कि उससे अन्दर आकर बैठने को कहूँ कि न कहूँ कि वह स्वयम् बोला, “अच्छा सरजी! अब चलता हूँ..... अभी और कई कार्ड बाँटने हैं...... आप लोग आइयेगा अवश्य।"


मैंने भी फिर सोचा आज अचानक अन्दर बैठने को कहने का आग्रह मात्र एक छलावा ही होगा। अत: औपचारिक नमस्ते कहकर मैंने उसे विदाई दे दी।


उस घटना के दो वर्षों के बाद जब वह मेरे आवास पर आया तो ज्ञात हुआ कि उसका बेटा जर्मनी में कहीं कार्यरत था। उत्सुक्तावश मैंने उससे प्रश्न कर ही डाला कि आखिर उसने अपनी सीमित आय में रहकर अपने बच्चों को वैसी उच्च शिक्षा कैसे दे डाली?


“सर जी! इसकी बड़ी लम्बी कथा है फिर भी कुछ आप को बताये देता हूँ। अख़बार, नौकरी के अतिरिक्त भी मैं ख़ाली समय में कुछ न कुछ कमा लेता था। साथ ही अपने दैनिक व्यय पर इतना कड़ा अंकुश कि भोजन में सब्जी के नाम पर रात में बाज़ार में बची खुची कद्दू, लौकी, बैंगन जैसी मौसमी सस्ती-मद्दी सब्जी को ही खरीद कर घर पर लाकर बनायी जाती थी।

एक दिन मेरा लड़का परोसी गयी थाली की सामग्री देखकर रोने लगा और अपनी माँ से बोला, 'ये क्या रोज़ बस वही कद्दू, बैंगन, लौकी, तरोई जैसी नीरस सब्ज़ी... रूख़ा-सूख़ा ख़ाना...... ऊब गया हूँ इसे खाते-खाते। अपने मित्रों के घर जाता हूँ तो वहाँ मटर-पनीर, कोफ़्ते, दम आलू आदि....। और यहाँ कि बस क्या कहूँ!!'"

मैं सब सुन रहा था तो रहा न गया और मैं बड़े उदास मन से उसके पास जाकर बड़े प्यार से उसकी ओर देखा और फिर बोला, "पहले आँसू पोंछ फिर मैं आगे कुछ कहूँ।"

मेरे ऐसा कहने पर उसने अपने आँसू स्वयम् पोछ लिये। फिर मैं बोला, "बेटा! सिर्फ़ अपनी थाली देख। दूसरे की देखेगा तो तेरी अपनी थाली भी चली जायेगी...... और सिर्फ़ अपनी ही थाली देखेगा तो क्या पता कि तेरी थाली किस स्तर तक अच्छी होती चली जाये। इस रूख़ी-सूख़ी थाली में मैं तेरा भविष्य देख रहा हूँ। इसका अनादर मत कर। इसमें जो कुछ भी परोसा गया है उसे मुस्करा कर खा ले ....।"

उसने फिर मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और जो कुछ भी परोसा गया था खा लिया। उसके बाद से मेरे किसी बच्चे ने मुझसे किसी भी प्रकार की कोई भी माँग नहीं रक्खी। डॉक्टर साब! आज का दिन बच्चों के उसी त्याग का परिणाम है।

उसकी बातों को मैं तन्मयता के साथ चुपचाप सुनता रहा।

आज जब मैं यह संस्मरण लिख रहा हूँ तो यह भी सोच रहा हूँ कि आज के बच्चों की कैसी विकृत मानसिकता है कि वे अपने अभिभावकों की हैसियत पर दृष्टि डाले बिना उन पर ऊटपटाँग माँगों का दबाव डालते रहते हैं..

Saturday, 3 August 2024

इन समाज में बच्चों के विवाह को लेकर इतनी

 आजकल समाज में बच्चों के विवाह को लेकर इतनी सजगता आ गई है कि आपसी रिश्ते नहीं हो पा रहे हैं। 27-28-32 वर्ष की बहुत सी लड़कियाँ घर बैठी हैं, क्योंकि उनके सपने हैसियत से बहुत ज्यादा हैं। यह स्थिति समाज की छवि को खराब कर रही है। सबसे बड़ा मानव सुख, सुखी वैवाहिक जीवन होता है। पैसा भी आवश्यक है, लेकिन कुछ हद तक। पैसों की वजह से अच्छे रिश्ते ठुकराना गलत है। पहली प्राथमिकता सुखी संसार और अच्छा घर-परिवार होना चाहिए। ज्यादा धन के चक्कर में अच्छे रिश्तों को नजरअंदाज करना गलत है। "संपत्ति खरीदी जा सकती है, लेकिन गुण नहीं।"


30 की उम्र के बाद विवाह नहीं होता, समझौता होता है और मेडिकल स्थिति से भी इसमें बहुत सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। आज इससे भी बुरी स्थिति कुंडली मिलान के कारण हो गई है। हम अच्छे लड़के और घर के होने के बावजूद कुंडली की वजह से रिश्ते छोड़ देते हैं। 36 में से 20 या फिर 36/36 गुण मिलने पर भी जीवन में तकलीफें हो रही हैं, क्योंकि हमने लड़के के गुण नहीं देखे।


समाज में लोग बेटी के रिश्ते के लिए (लड़के में) चौबीस कैरेट का सोना खरीदने जाते हैं और चार-पाँच साल व्यतीत हो जाते हैं। उच्च "शिक्षा" या "जॉब" के नाम पर भी समय व्यतीत कर देते हैं। लड़के देखने का अंदाज भी समय व्यतीत का अनोखा उदाहरण हो गया है। खुद का मकान, फर्नीचर, कमरे, गाड़ी, रहन-सहन, खान-पान, भाई-बहन, बंटवारा, माँ-बाप का स्वभाव, नाते-रिश्तेदार, कद, रंग-रूप, शिक्षा, कमाई, बैंक बैलेंस और सोशल मीडिया पर एक्टिवनेस जैसी बातें पूछी जाती हैं।


हालात ऐसे हैं कि माँ-बाप की नींद 30 की उम्र पर खुलती है। फिर चार-पाँच साल की दौड़-धूप बच्चों की जवानी को बर्बाद कर देती है। इस वजह से अच्छे रिश्ते हाथ से निकल जाते हैं और माँ-बाप अपने ही बच्चों के सपनों को चूर-चूर कर देते हैं। एक समय था जब खानदान देखकर रिश्ते होते थे, जो लम्बे भी निभते थे। समधी-समधन में मान-मनुहार थी, सुख-दु:ख में साथ था, रिश्तों की अहमियत का अहसास था। धन-माया कम थी, मगर खुशियाँ घर-आँगन में झलकती थीं।


आज की स्थिति में, माता-पिता को जागरूक होना होगा और लड़कियों की शादी 22-24 साल की उम्र में करनी चाहिए और लड़के की 25-26 साल की उम्र में। "घर, गाड़ी, बंगला से पहले व्यवहार तौलो।" माँ-बाप भी आर्थिक चकाचौंध में बह रहे हैं। पैसे की भागमभाग में रिश्ते-नातेदार छूट रहे हैं, घर-परिवार टूट रहे हैं, प्रेम और प्यार सूख रहा है। समाज को अब जागना जरूरी है अन्यथा रिश्ते ढूंढते रह जाएं

Thursday, 1 August 2024

तुम और माही कब शादी करने वाले हो?

 “आदित्य, बेटा ज़रा सुनो, तुम और माही कब शादी करने वाले हो?”


“ममा, माही से तो मेरा कब का ब्रेकअप हो गया और अगले हफ्ते उसकी शादी है…” आदित्य ने बेपरवाह स्वर में कहा और वहां से चला गया। मैं हैरत में पड़ गई। आज के बच्चे इतने बिंदास... इन्हें मोहब्बत खेल लगती है। प्यार को यूं भुला देना जैसे क्रिकेट के मैदान में छक्का लगाते वक्त बॉल गुम हो गई हो... मैं गुमसुम-सी खड़ी अपने अतीत में झांकने लगी।


पापा का लखनऊ से दिल्ली ट्रांसफर हो गया था। मैंने वहां एक नए स्कूल में दाखिला लिया। बीच सत्र में एडमिशन लेने के कारण मेरे लिए पूरी क्लास अपरिचित थी। शिफ्टिंग के कारण मैं काफी दिन स्कूल नहीं जा पाई, इसलिए मेरा सिलेबस भी छूट गया था। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मेरी क्लास टीचर ने उसी क्लास में पढ़ने वाले आर्यन से मेरा परिचय करवाया और उसे हिदायत दी, “आर्यन, तुम काव्या की पढ़ाई में मदद करना।” आर्यन ने मुझे अपने नोट्स दिए, जिससे मुझे पढ़ाई में काफी मदद मिली।


यह संयोग ही था कि मैं और आर्यन एक ही कॉलोनी में रहते थे, फिर हम स्कूल भी साथ आने-जाने लगे। एक-दूसरे के घर जाकर पढ़ाई भी करते और पढ़ाई के साथ अन्य विषयों पर भी चर्चा करते थे। कभी-कभी साथ मूवी देखने जाते, तो कभी छत पर यूं ही टहलते। धीरे-धीरे हमारे मम्मी-पापा भी जान गए कि हम अच्छे दोस्त हैं।


हम दोनों ने स्कूल में टॉप किया। इसके बाद हम कॉलेज में आ गए। आर्यन इंजीनियरिंग करने रुड़की चला गया और मैं दिल्ली में पास कोर्स करने लगी। कॉलेज पूरा होते-होते पापा ने मेरी शादी के लिए लड़का ढूंढना शुरू कर दिया। छुट्टियों में आर्यन के घर आने पर मैंने उसे अपनी शादी की चर्चा के बारे में बताया। वह एकाएक गंभीर हो गया। मेरा हाथ पकड़कर बोला, “काव्या, मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूं। आज से नहीं, जब से पहली बार देखा था, तब से ही। मैंने रात-दिन तुम्हारे ख्वाब देखे हैं। प्लीज़ मेरी नौकरी लगने तक इंतज़ार कर लो। मेरे अलावा किसी से शादी की सोचना मत।” मुझे भी आर्यन पसंद था। मैंने उसे हां कह दिया।


दो महीने बाद पापा ने अभिनव को पसंद कर लिया। उनके मान-सम्मान के आगे मैं अपनी पसंद नहीं बता पाई। एक बार मां से ज़िक्र किया था, “मां, मैं आर्यन को पसंद करती हूं और उससे ही शादी...” बात पूरी होती उससे पहले ही मां ने एक थप्पड़ मार दिया। “बड़ों के सामने यूं मुंह खोलते हुए शर्म नहीं आती? चुपचाप पापा के बताए हुए रिश्ते के बंधन में बंध जाओ वरना अच्छा नहीं होगा।”


मां की धमकी के आगे मैं मजबूर थी। मैं चुपचाप शादी करने के लिए तैयार हो गई। उस वक्त मोबाइल नहीं होते थे। मैं आर्यन को अपनी शादी के बारे में नहीं बता पाई। शादी के बाद मैं आगरा आ गई।


करीब दो साल बाद मेरी मुलाकात आर्यन से हुई। हम दोनों के बीच सुनने-सुनाने को कुछ शेष नहीं था। आर्यन ने ही अपनी बात कही, “ज़रूर तुम्हारी कोई मजबूरी रही होगी, वरना कोई यूं बेवफा नहीं होता। तुम्हारी शादी हो गई तो इसका मतलब यह नहीं है कि मैं तुमसे मोहब्बत करना छोड़ दूं। तुम अपनी शादी निभाओ और मुझे अपने इश्क से वफ़ा करने‌ दो…” हम दोनों की आंखें नम हो गईं।


तब से लेकर आज तक आर्यन ने मेरी हर तकलीफ, हर दुख और हर खुशी में साथ दिया। मैं आर्यन जैसा सच्चा दोस्त पाकर निहाल हो गई। अभिनव और आर्यन की अच्छी बनती भी है। उसने शादी नहीं की। एक बार मेरे ज़ोर देने पर कहा, “मेरे मन में बसी मूरत के जैसी कोई मिली तो इन यादों को एक पल में ही अलविदा कह दूंगा…”


वह अक्सर कहता है…


“तुझे पा लेते तो यह किस्सा ही खत्म हो जाता,

तुझे खोकर बैठे हैं यकीनन कहानी लंबी होगी।”

 


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खो गईं वो चिठ्ठियाँ जिसमें “लिखने के सलीके” छुपे होते थे

खो गईं वो चिठ्ठियाँ जिसमें “लिखने के सलीके” छुपे होते थे, “कुशलता” की कामना से शुरू होते थे। बडों के “चरण स्पर्श” पर खत्म होते थे..


और बीच में लिखी होती थी “जिंदगी


नन्हें के आने की “खबर

माँ” की तबियत का दर्द

और पैसे भेजने का “अनुनय

फसलों” के खराब होने की वजह..


कितना कुछ सिमट जाता था एक

“नीले से कागज में


*जिसे नवयौवना भाग कर “सीने” से लगाती

और ..अकेले” में आंखो से आंसू बहाती !


माँ” की आस थी “पिता” का संबल थी

*बच्चों का भविष्य थी और*

गाँव का गौरव थी ये “चिठ्ठियां


डाकिया चिठ्ठी” लायेगा कोई बाँच कर सुनायेगा

*देख-देख चिठ्ठी को कई-कई बार छू कर चिठ्ठी को अनपढ भी “एहसासों” को पढ़ लेते थे...!


अब तो “स्क्रीन” पर अंगूठा दौडता हैं

और *अक्सर ही दिल तोड़ता है

“मोबाइल” का स्पेस भर जाए तो

सब कुछ दो मिनट में “डिलीट” होता है...


सब कुछ “सिमट” गया है 6 इंच में

जैसे “मकान” सिमट गए फ्लैटों में

जज्बात सिमट गए “मैसेजों” में

चूल्हे” सिमट गए गैसों में

और 

इंसान सिमट गए पैसों में

Friday, 19 July 2024

जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा

 अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल, हरी काई नहीं जमेगी और पानी सड़ेगा भी नहीं।


जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है।


पहले के जमाने में गांवो में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता था जिसे जमोट कहते है।


दिल्ली की निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में हुए जीर्णोद्धार से ज्ञात हुआ 700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहाँ जल के स्तोत्र बंद नहीं हुए हैं।


भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख के.एन. श्रीवास्तव के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहाँ लकड़ी की वो तख्ती साबुत है जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। श्रीवास्तव जी के अनुसार उत्तर भारत के अधिकतर कुँओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था।


स्वास्थ्य की दृष्टि से विटामिन सी और आयरन से भरपूर जामुन शरीर में न केवल हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाता। पेट दर्द, डायबिटीज, गठिया, पेचिस, पाचन संबंधी कई अन्य समस्याओं को ठीक करने में अत्यंत उपयोगी है।


एक रिसर्च के मुताबिक, जामुन के पत्तियों में एंटी डायबिटिक गुण पाए जाते हैं, जो रक्त शुगर को नियंत्रित करने करती है। ऐसे में जामुन की पत्तियों से तैयार चाय का सेवन करने से डायबिटीज के मरीजों को काफी लाभ मिलेगा।


सबसे पहले आप एक कप पानी लें। अब इस पानी को तपेली में डालकर अच्छे से उबाल लें। इसके बाद इसमें जामुन की कुछ पत्तियों को धो कर डाल दें। अगर आपके पास जामुन की पत्तियों का पाउडर है, तो आप इस पाउडर को 1 चम्मच पानी में डालकर उबाल सकते हैं। जब पानी अच्छे से उबल जाए, तो इसे कप में छान लें। अब इसमें आप शहद या फिर नींबू के रस की कुछ बूंदे मिक्स करके पी सकते हैं।


जामुन की पत्तियों में एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं. इसका सेवन मसूड़ों से निकलने वाले खून को रोकने में और संक्रमण को फैलने से रोकता है। जामुन की पत्तियों को सुखाकर टूथ पाउडर के रूप में प्रयोग कर सकते हैं. इसमें एस्ट्रिंजेंट गुण होते हैं जो मुंह के छालों को ठीक करने में मदद करते हैं। मुंह के छालों में जामुन की छाल के काढ़ा का इस्तेमाल करने से फायदा मिलता है। जामुन में मौजूद आयरन खून को शुद्ध करने में मदद करता है।


जामुन की लकड़ी न केवल एक अच्छी दातुन है अपितु पानी चखने वाले (जलसूंघा) भी पानी सूंघने के लिए जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं।


हर व्यक्ति अपने घर की पानी की टंकी में जामुन की लकड़ी का एक टुकड़ा जरूर रखें, एक रुपए का खर्चा भी नहीं और लाभ ही लाभ। आपको मात्र जामुन की लकड़ी को घर लाना है और अच्छी तरह से साफ सफाई करके पानी की टंकी में डाल देना है। इसके बाद आपको फिर पानी की टंकी की साफ सफाई करवानें की जरूरत नहीं पड़ेगी।


क्या आप जानते हैं कि नाव की तली में जामुन की लकड़ी क्यों लगाते हैं, जबकि वह तो बहुत कमजोर होती है..?


भारत की विभिन्न नदियों में यात्रियों को एक किनारे से दूसरे किनारे पर ले जाने वाली नाव की तली में जामुन की लकड़ी लगाई जाती है। सवाल यह है कि जो जामुन पेट के रोगियों के लिए एक घरेलू आयुर्वेदिक औषधि है, जिसकी लकड़ी से दांतो को कीटाणु रहित और मजबूत बनानें वाली दातुन बनती है, उसी जामुन की लकड़ी को नाव की निचली सतह पर क्यों लगाया जाता है। वह भी तब जबकि जामुन की लकड़ी बहुत कमजोर होती है। मोटी से मोटी लकड़ी को हाथ से तोड़ा जा सकता है। क्योंकि इसके प्रयोग से नदियों का पानी पीनें योग्य बना रहता है।


बावड़ी की तलहटी में 700 साल बाद भी जामुन की लकड़ी खराब नहीं हुई…


जामुन की लकड़ी के चमत्कारी परिणामों का प्रमाण हाल ही में मिला है। देश की राजधानी दिल्ली में स्थित निजामुद्दीन की बावड़ी की जब सफाई की गई तो उसकी तलहटी में जामुन की लकड़ी का एक स्ट्रक्चर मिला है। भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख के0 एन0 श्रीवास्तव जी नें बताया कि जामुन की लकड़ी के स्ट्रक्चर के ऊपर पूरी बावड़ी बनाई गई थी। शायद इसीलिए 700 साल बाद तक इस बावड़ी का पानी मीठा है और किसी भी प्रकार के कचरे और गंदगी के कारण बावड़ी के वाटर सोर्स बंद नहीं हुए। जबकि 700 साल तक इसकी किसी ने सफाई नहीं की थी।


आपके घर में जामुन की लकड़ी का उपयोग…


यदि आप अपनी छत पर पानी की टंकी में जामुन की लकड़ी डाल देते हैं तो आप के पानी में कभी काई नहीं जमेगी। 700 साल तक पानी का शुद्धिकरण होता रहेगा। आपके पानी में एक्स्ट्रा मिनरल्स मिलेंगे और उसका टीडीएस बैलेंस रहेगा। यानी कि जामुन हमारे खून को साफ करने के साथ-साथ नदी के पानी को भी साफ करता है और प्रकृति को भी साफ रखता है।


कृपया हमेशा याद रखिए कि दुनियाभर के तमाम राजे रजवाड़े और वर्तमान में अरबपति रईस जो अपने स्वास्थ्य के प्रति चिंता करते हैं। जामुन की लकड़ी के बनें गिलास में पानी पीते हैं.

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...