📘 सुनील राठौड़ – जीवन परिचय
(professional & step-by-step version)
1. प्रारम्भिक परिचय
नमस्ते दोस्तों,
मेरा नाम सुनील राठौड़, पिता नारायण राठौड़, माता भागी भाई राठौड़ है।
मेरा जन्म 22 अप्रैल 1987, बुधवार, सुबह 11:30 बजे, मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले के पीपलगांव रे– बोदरली गाँव में हुआ।
मैं एक साधारण, गरीब किसान परिवार से हूँ। मेरे पिता और भाई दोनों किसान हैं, जबकि मेरी माता एक गृहिणी हैं।
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2. परिवार – पत्नी और पुत्र
मेरी शादी 14 जून 2016 को पूजा पवार से हुई।
ईश्वर ने हमें एक प्यारा बेटा दिया—
पार्थ राठौड़, जिसका जन्म 15 मार्च 2017 को सुबह 9 बजे, मेयू हॉस्पिटल नागपुर में हुआ।
यह जन्म हमारे लिए बहुत खास था, क्योंकि वह 274 दिनों की कठिन यात्रा के बाद हमारे जीवन में आया।
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3. शिक्षा और सीख
मैंने अपने जीवन में लगातार सीखना और आगे बढ़ने की कोशिश की। मेरी शिक्षा–यात्रा इस प्रकार है—
M.A.
LL.B
B.ed.
D.C.A. (कंप्यूटर कोर्स)
textile designing course
mineral water project seminar – pune
शिक्षा मेरे लिए सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि संघर्षों से ऊपर उठने का रास्ता रही है।
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4. शुरुआती संघर्ष और कामकाज
स्कूल के दिनों में मैंने बस कंडक्टर का काम किया।
मेरी जिंदगी की पहली कमाई से मैंने अपनी माँ के लिए एक साड़ी खरीदी, जो आज भी मेरे लिए सबसे कीमती पल है।
इसके बाद मैंने कई क्षेत्रों में काम किया—
4.1 कपड़ा व्यापार (baba ramdev garment, burhanpur)
कपड़े की दुकान में काम करके मैंने व्यापार की समझ सीखी।
4.2 मनरेगा (2006–2011)
लगभग 5 साल तक “मेट” के पद पर काम किया।
4.3 महिंद्रा एंड महिंद्रा (RC & M)
यहाँ मैंने एंकरिंग और इवेंट मैनेजमेंट किया।
4.4 भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) – 2008 से 2019
लगभग 11 साल तक LIC के अभिकर्ता के रूप में कार्य किया।
4.5 अन्य कार्य
डीजे ऑपरेटिंग
JCB एजेंट
कॉल सेंटर जॉब (इंदौर, 2015)
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5. व्यापारिक अनुभव
ढाबा (2016–2018)
2016 में मैंने स्वयं का एक ढाबा शुरू किया।
सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन चोरी हो जाने के कारण मुझे ढाबा बंद करना पड़ा।
किराना व्यवसाय
ढाबा बंद होने के बाद मैंने बैंक से लोन लेकर अपने घर पर किराना दुकान शुरू की, जिसमें मैंने पूरी मेहनत से आगे बढ़ने की कोशिश की।
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6. शिक्षण सेवा
2019 में मैंने सरकारी हाई स्कूल सीतापुर में एक साल तक अतिथि शिक्षक के रूप में बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाया।
यह वर्ष मेरे जीवन के सबसे संतोषजनक वर्षों में से एक था।
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7. राजनीतिक सफर
22 जून 2022 को मैंने जनपद पंचायत चुनाव लड़ा।
पूरी मेहनत और लगन के बावजूद मुझे हार का सामना करना पड़ा।
लेकिन यह हार मेरे सपनों को तोड़ नहीं सकी—मैंने इसे सीख की तरह लिया।
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8. वर्तमान स्थिति
वर्तमान में मैं ओरिएंटल यूनिवर्सिटी, इंदौर में
03 अक्टूबर 2024 से कार्यरत हूँ।
समाज सेवा, राजनीति, पर्यावरण, धार्मिक कार्य, कमेंट्री, एंकरिंग और मोटिवेशन में मेरी गहरी रुचि रही है।
मैं सोशल मीडिया में भी काफी एक्टिव रहता हूँ।
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9. मेरा स्वभाव और जीवन दर्शन
मैं दिल से दयालु और सरल स्वभाव का हूँ।
हमेशा दूसरों के बारे में सोचता हूँ, उनकी मदद करना चाहता हूँ।
कई बार इसी स्वभाव के कारण मुझे नुकसान भी हुआ, और शायद यही वजह रही कि मैं उतनी सफलता हासिल नहीं कर सका, जितनी चाही थी।
लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी—
मैंने हमेशा नए रास्ते, नए अवसर खोजे।
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10. भविष्य की इच्छाएँ और योजनाएँ
मेरी सबसे बड़ी इच्छा है कि मैं अपनी खुद की
multi level marketing (mlm) कंपनी खोलूँ।
मेरे पास—
बाइनरी प्लान,
ट्राईनरी प्लान,
जेनेरेशन प्लान
और अन्य कई बिजनेस मॉडल की पूरी समझ है।
मेरी सोच बड़ी है, लेकिन पूँजी कम है।
फिर भी मैं मेहनत कर रहा हूँ, तलाश जारी है।
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11. हाल का प्रयास – बाइक टैक्सी ऐप
हाल ही में मैं अपनी खुद की bike taxi app पर कार्य कर रहा हूँ,
जो बहुत जल्द लॉन्च होने वाली है।
यह मेरा सपना है कि मैं युवाओं को रोजगार दूँ और अपने शहर–जिले को नई दिशा दूँ।
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जीवन का हर कदम एक कहानी बनाता है, और हर कहानी एक ऐसी ताकत रखती है जिसमें किसी का दिल बदलने, किसी को प्रेरित करने और किसी को फिर से उठ खड़े होने की हिम्मत देने की क्षमता होती है।
मेरे जीवन में भी उतार–चढ़ाव, प्यार–नफ़रत, संघर्ष–साहस, दोस्ती–फरेब और हार–जीत के कई अध्याय रहे हैं।
इन्हीं अनुभवों को सहेजते हुए मैंने तय किया कि अपनी कहानी दुनिया के सामने रखनी चाहिए—ताकि लोग समझ सकें कि हर साधारण इंसान के भीतर एक असाधारण संघर्ष छिपा होता है।
यह किताब सिर्फ मेरा जीवन–वृत्त नहीं है, बल्कि यह मेरी सोच, मेरी गलतियों, मेरी उपलब्धियों, मेरी टूटन, मेरी जीत और मेरी सीख का संग्रह है।
मैं चाहता हूँ कि मेरा सफ़र उन लोगों तक पहुँचे जो अपनी ज़िंदगी में लड़ रहे हैं, गिर रहे हैं, लेकिन आगे बढ़ने का इरादा रखते हैं।
युवा उम्र का संघर्ष
हर युवा की तरह मेरा सफर भी आसान नहीं था।
कभी पैसों की कमी,
कभी गलतफहमियाँ,
कभी अपनों से दूरी,
कभी सपनों का टूटना,
कभी अपनो का रूठना.
कभी बेवजह इलाजाम सहन.
और कभी खुद से लड़ाई।
लेकिन मैंने हार नहीं मानी।
क्योंकि मैं जानता था—
“मेरे जीवन की असली कहानी अभी लिखी जानी बाकी है।”
दोस्ती, खेल और मेरा स्वभाव
मेरी दोस्ती दिल से थी—
जो दोस्ती निभाता था, आखिरी सांस तक निभाने की सोच रखता था।
इसी स्वभाव ने मुझे लोगों के बेहद करीब भी किया, और कभी-कभी गहरे जख्म भी दिए।
क्रिकेट मेरा पहला प्यार था—
गली में खेलना, कमेंट्री करना, टीम बनाना…
इन सब ने मुझे नेतृत्व (Leadership) का गुण दिया।
लोग कहते थे—
“Sunil में बात करने का अंदाज़ अलग है।”
शायद यही अंदाज़ आगे चलकर राजनीति और समाज सेवा में काम आया।
गाँव की मिट्टी में पली मेरी जड़ें
मैं बोदरली गाँव की उस मिट्टी में पला-बढ़ा जहाँ लोग दिल से जीते थे, बातों में अपनापन झलकता था, और जीवन की सादगी ही सबसे बड़ी दौलत थी। हाप पैंट और पुरानी शर्ट पहन कर भी वही खुशी. धूल मिट्टी से लतपत होकर श्याम को घर जाना।बिना हात मुंह धोए खाने पर बैठ जाना। घर में बारिश की बूंदे टपकती जगह पर. खाली बर्तन रखना.. ठंड में चुले के पास परिवार के साथ बैठना. सुबह 4 बजे कड़कड़ाती थड में लोखंडिया मेले में.. बेल गाड़ी से जाने का उत्साह। गांव में पंगत पर बिन बुयाले जाने की जिद्द। भंडारे पर school नही जाने की खुशी.
गाँव की पगडंडियाँ, खेतों की खुशबू, स्कूल जाते हुए रास्ते में दोस्तों का इंतजार… ये सब मेरे जीवन का वह हिस्सा हैं जो आज भी दिल में ताज़ा हैं।
गाँव ने ही मुझे सिखाया—
काम को छोटा या बड़ा मत समझो,
बस मन से करो।
यही गाँव मेरी पहचान है, मेरी ताकत है, और मेरी सोच की नींव भी।
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**📘 स्कूल–कॉलेज के संघर्ष भरे दिन
(बड़े मुश्किल से पढ़ाई की — मेरा शिक्षा संघर्ष)**
मेरी स्कूल लाइफ़ बहुत साधारण थी, लेकिन हर दिन अपने भीतर एक नई सीख छुपाए बैठा था।
कभी होमवर्क समय पर न करना, दोस्तों के साथ खेल में खो जाना,
कभी मास्टरजी की झिड़की, तो कभी उनकी शाबाशी—
ये सब पल आज याद आते हैं तो मुस्कुरा देता हूँ।
कक्षा 5वीं में 77% लाकर जब मुझे 21 रुपये का इनाम मिला था,
तब ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया जीत ली हो।
गरीब बच्चे की मेहनत का वो पहला इनाम, आज भी दिल में चमकता है।
इंग्लिश का डर और संघर्ष की शुरुआत
कक्षा 6 आते ही इंग्लिश मेरा सबसे बड़ा डर बन गई।
ABCD से शुरुआत करने वाला मैं,
धीरे–धीरे डर को हराकर 8वीं तक पहुँच गया।
लेकिन संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ—
8वीं के पेपर देने के लिए 9 किलोमीटर दूर दरियापुर जाना पड़ता था।
कभी साइकिल से, तो कभी पैदल…
गर्मी, सर्दी, बरसात—कुछ भी हमें रोक नहीं पाता था।
9वीं में एडमिशन का संघर्ष — गरीबी की पहली दीवार
8वीं पास करने के बाद 9वीं में एडमिशन लेना था,
लेकिन घर की गरीबी सामने खड़ी थी।
मम्मी–पापा पढ़े लिखे नहीं थे,
उनके अनुसार “8वीं तक पढ़ लिया, काफी है… आगे पढ़ाई की जरूरत नहीं।”
पर मेरे मन में सवाल था—
“अगर मेरे दोस्त पढ़ सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं?”
एक दिन हिम्मत जुटाकर मैंने माँ से कहा—
“मुझे और पढ़ना है।”
माँ ने अपनी गरीबी छुपाते हुए,
आँखों में चिंता के साथ कुछ रुपए दिए और कहा—
“जा, दरियापुर में एडमिशन कर ले… मैं खेत में काम करके तेरी फीस देती रहूँगी।”
उस दिन मुझे पहली बार समझ आया—
गरीबी समस्या है, लेकिन माँ की ममता समाधान।
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10वीं की पहली असफलता — 2004
मैंने 10वीं में एडमिशन तो ले लिया,
लेकिन पढ़ाई में कमजोर होने के कारण सन 2004 में फेल हो गया।
घर वालों ने यही कहा—
“अब बस, पढ़ाई बंद कर दे।”
लेकिन मैं टूटने वाला इंसान नहीं था।
मैंने ठान लिया—
“जो भी हो जाए, 10वीं पास करके दिखाऊँगा।”
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दूसरी कोशिश — नया राज्य, नया संघर्ष
मैंने अपने पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के एनपुर में फिर से 10वीं में दाखिला लिया।
वहीं से 10वीं बोर्ड पास किया।
फिर 12वीं के लिए महाराष्ट्र के रावेर (केराला) में एडमिशन लिया।
लेकिन किस्मत ने परीक्षा ली—
एक बार फिर मैं इंग्लिश में फेल हो गया।
इस दूसरी हार ने मुझे हिला दिया।
मैंने पढ़ाई का ख्याल ही दिमाग से निकाल दिया…
क्योंकि मुझे पता था—
अब घर वाले किसी भी कीमत पर पढ़ाई नहीं करवाएँगे।
चार साल का अंतर — और दोस्त आगे निकल गए
धीरे–धीरे 4 साल निकल गए।
मेरे सभी दोस्त 12वीं के बाद कोई इंदौर गया, कोई भोपाल, कोई बड़े कॉलेजों में।
उन्हें आगे बढ़ते देखकर मन बहुत दुखता था।
इसी दौरान मैंने अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए
LIC में अभिकर्ता के तौर पर काम शुरू कर दिया।
पहली बार अपने हाथ की कमाई आने लगी।
पढ़ाई का पुनर्जीवन — हिम्मत की वापसी
कमाई ने हौसला दिया।
मैंने फिर हिम्मत की—
“एक बार और कोशिश करता हूँ।”
12वीं में जिस विषय में फेल हुआ था,
उसका पेपर 2012 में दुबारा दिया और पास कर लिया।
ये वो दिन था जब मैंने ठान लिया—
अब जीवन में पीछे नहीं हटूँगा।
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डिग्रियों की यात्रा — संघर्षों से उठती हुई कामयाबी
पैसों की कमी थी, इसलिए BA प्राइवेट से की।
2015 में फर्स्ट क्लास पास किया।
फिर MA (Hindi) किया और 2017 में पास किया।
इसके बाद DCA डिप्लोमा – ज़ाकिर हुसैन कॉलेज, बुरहानपुर से किया।
पढ़ने का जुनून कम नहीं हुआ,
इसलिए मिलेनियम कॉलेज, बुरहानपुर से B.Ed में एडमिशन लिया।
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B.Ed का अधूरा सपना
B.Ed में मैंने 3 सेमेस्टर पास कर लिए थे।
लेकिन आखिरी समय में
फीस जमा न कर पाने के कारण
थाकुर सर ने मुझे एग्ज़ाम में बैठने नहीं दिया।
और इसी तरह मेरा B.Ed अधूरा रह गया।
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नया कदम — फिर से आगे बढ़ना
आज मैं LL.B की पढ़ाई कर रहा हूँ।
बार–बार गिरकर उठने की कला मैंने जीवन से सीखी है;
और ये यात्रा बताती है—
गरीब होकर पढ़ना कठिन होता है,
लेकिन नामुमकिन नहीं।
हिम्मत और जिद हो तो रास्ते खुद बन जाते हैं।
**✨ यह था मेरा शिक्षा संघर्ष —
दरअसल यह सिर्फ पढ़ाई नहीं थी,
यह जीवन भर की जिद, मेहनत और आत्मविश्वास की परीक्षा थी।*
मैं पढ़ाई में बहुत टॉपर नहीं था,
आगे बैठे से डर लगता था।
लेकिन मैं जिद्दी था—
जो काम ठान लेता, उसे पूरा करके ही मानता।
यही जिद बाद में मेरी ताकत बनी।
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मेरे जीवन की कहानी – एक पंक्ति की सच्चाई
बहुत शौक था मुझे सबको खुश रखने का…
और शायद यही दरियादिली एक दिन मुझे डुबो भी देगी।
कभी-कभी खुद पर विश्वास नहीं होता कि लोग इतने बेईमान और धोखेबाज़ कैसे हो सकते हैं।
हो सकता है कहीं मैं गलत हूँ… पर कहाँ गलत हूँ, यह आज तक समझ नहीं आया।
किसी की मदद करना, सबका आदर करना, बिना गलती के भी माफ़ी मांग लेना,
और बिना स्वार्थ के समाज सेवा करना—
अगर यह गलत है… तो फिर हाँ, मैं गलत हूँ।
कभी-कभी हम गलत नहीं होते,
पर हमारे पास वो समय और शब्द नहीं होते
जो हमें सही साबित कर सकें।
बचपन से जवानी तक संघर्ष ही संघर्ष देखा है।
अपनी ही कहानी लिखते-लिखते आँखें भर आती हैं।
मैं सहानुभूति नहीं चाहता…
बस अपनी जिंदगी की सच्चाई दुनिया के सामने रखना चाहता हूँ।
मेरी कहानी शायद मनोरंजन न दे,
पर किसी की आँखें जरूर नम कर देगी।
क्योंकि सुख-दुख का असली मतलब
संघर्ष ही सिखाता है।
जीवन हर किसी का मुश्किल होता है,
पर हर कोई अपनी पीड़ा नहीं कह पाता।
बॉलीवुड के संजय दत्त ने अपनी बेगुनाही “संजू” फिल्म में कह दी,
पर हम जैसे साधारण लोग किससे और कैसे अपनी सच्चाई साबित करें?
मैंने खुद से बस एक वादा किया है—
जहाँ गलत न होऊँ, वहाँ सिर नहीं झुकाऊँगा।
और मेरी गलतियों को तुम दोहराना मत।
स्कूल के दिनों से लेकर आज तक का मेरा हर संघर्ष,
मैं इस बुक के माध्यम से आप तक पहुँचाऊँगा।
क्योंकि हमारी यादें भी जनधन योजना की तरह होती हैं—
सबके खाते खुल जाते हैं, पर भरता कोई नहीं।
मैं मंदिर कभी नहीं जाता,
पर भगवान को कभी नहीं भूलता।
यह जरूरी नहीं कि दुख हमेशा गलतियाँ करने पर मिले,
कई बार हद से ज़्यादा अच्छे होने की भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।
बेवजह के इल्ज़ाम,
लोगों की बातें,
और अपने ही अपनों के तीर—
इन सबने मेरी जिंदगी को नरक बनाकर रख दिया।
किसी के एक मजाक जैसा इल्ज़ाम
कई रातों से मेरी नींद और सुकून खा चुका है।
इल्ज़ाम इतने संगीन कि कभी-कभी खुद को खत्म करने का मन होता है,
पर उससे मैं बेगुनाह साबित नहीं हो जाऊँगा।
सच्चाई तो वही है—
इंसान को सबसे पहले खुद की नज़रों में अच्छा होना चाहिए।
दुनिया की नजरों में तो भगवान भी बुरे लगते हैं,
और झूठे लोग भी सच्चे साबित हो जाते हैं।
मेरी नियत साफ है,
फिर भी लोग मुझे बेईमान मानते हैं—
दुख इस बात का नहीं कि लोग क्या कहते हैं,
दुख इस बात का है कि यह सब अपनों ने किया।
खैर… अब जो होगा, अच्छा ही होगा।
ऊपर वाला परीक्षा तो लेता है,
लेकिन कभी न कभी परिणाम भी देता है।
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सत्र 1 – मेरा बचपन और संघर्ष
मेरी कहानी की शुरुआत मेरे बचपन से होती है, उतने ही पुराने दिनों से जितनी पुरानी मेरी यादें हैं ।
मैं लगभग 5 साल का था, लेकिन स्कूल जाने का नाम सुनते ही रोने लगता था। गाँव का माहौल भी ऐसा था कि बच्चे स्कूल से ज़्यादा
खेल-कूद में ही खोए रहते थे।
मेरा एडमिशन भी समय पर नहीं हुआ—5 साल की उम्र में, वह भी तब जब पिता जी ने टीचर से कहा कि “इसकी हाइट कम है, उम्र ज्यादा…है तब कोई जन्म प्रमाण पत्र नहीं हुवा करते थे और 1 क्लॉस में एडमिशन के लिए मास्टर जी ... बालक को आपने सिर के ऊपर से हाथ घुमाकर आपने कान तक पुराना होता था। मेरा हाथ नही पूरा लेकिन फिर भी मुझे एडमिशन मिल गया । क्योंकि कक्ष 1 में ऐडमिशन के लिए 6 साल की उम्र में ही ऐडमिशन मिलता था।
टीचर ने मुझे 6 साल का मान लिया और मुझे कक्षा 1 में एडमिशन मिल गया ।
वैसे मेरा जन्म 22 अप्रैल 1989 को हुआ था,। पर स्कूल रजिस्टर में सर ने 1987 लिख दिया। ताकि मुझे कक्ष्य 1 में एडमिशन मिल सके।
प्राइमरी स्कूल में एक पुरानी रिवायत थी—हाथ को सर के ऊपर से कान तक ले जाकर बच्चे की ऊँचाई मापी जाती थी। उसी पर एडमिशन मिलता था। मैं मुश्किल से चार साल का था, लेकिन फिर भी किसी तरह मुझे दाखिला मिल ही गया।
गाँव की खेलती-दौड़ती दुनिया
स्कूल से आने के बाद पढ़ाई नाम की कोई चीज़ शायद ही होती थी।
हम सब बच्चे अपने-अपने खेलों में खो जाते—गिल्ली डंडा,गोटी, भोरा, पतंग, चोर-पुलिस, कबड्डी, छुपन-छुपाई, खो-खो, डाब-डूबली ,
हाती का सूंड। आबा धाबी.(मारामारी) क्रिकेट.यही हमारे खेल हूआ करते थे हमारे खेल ही हमारी दुनिया थी।
मेरी एक अलग ही आदत थी—कागज़ से नोट जैसी आकार की गड्डी बनाना, उन पर मुस्कान वाला चेहरा बनाकर उन्हें खेल में पैसे की तरह चलन में इस्तेमाल करना। घर के सामने की नाली पर मिट्टी, लकड़ी और कागज़ से मैंने छोटे-छोटे पुल बनाकर खिलौने की गाड़ियों को चलाया करता था। यह सब मेरे लिए किसी सपनों की दुनिया जैसा था।
उस समय न हमारे पास स्कूल बैग होते थे, न ज्यादा सामान। एक छोटी-सी थैली में पट्टी और लेखनी रखकर स्कूल निकल जाते। कई बार लेखनी घर ही रह जाती, लेकिन फिर भी हम खुशी-खुशी स्कूल चले जाते—क्योंकि कभी-कभी चार आने मिल जाएँ तो स्कूल जाने का मज़ा दोगुना हो जाता था। क्युकी चार आने में 5 संतरे वाली खाने का मजा ही कुछ ओर था
तीसरी, चौथी तक पढ़ाई बहुत हल्के-फुल्के अंदाज़ में होती रही।वहा मुझे कुछ ठीक से याद भी नहीं है।
फिर पाँचवी में पहुँचकर मैंने तैयारी की और 77% के साथ एक नंबर से पास हुआ।
वो मेरी ज़िंदगी की पहली उपलब्धि थी।
गाँव के डॉ. सतीश भंगड़े ने मुझे 15 अगस्त को ₹21 का पुरस्कार दिया।
वो ₹21 मैंने कई दिन तक संभालकर रखे—खर्च करने की हिम्मत ही नहीं हुई।
छठी कक्षा – मेरा सबसे कठिन साल
अगला कदम था छठी कक्षा।
पर छठी कक्षा का नाम सुनते ही डर लगता था—क्योंकि वहाँ अंग्रेज़ी पढ़ाई जाती थी।
मैंने पहली बार A B C D भी छठी में जाकर ही पढ़ा।
घर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी, इसलिए मेरी खुद की किताबें नहीं थीं।
मैं अपने बड़े भाई की पुरानी किताबों से ही पढ़ता था।
भाई मुझसे चार साल बड़ा था—कक्षा सातवीं में।
भाई का डर और मेरा दुःख
हमारे बीच अक्सर झगड़े होते।
वह गुस्से में मुझे बहुत मारता, मेरी किताबें छीन लेता।
दोपहर में स्कूल की छुट्टी में जब मैं घर आकर खाना ढूँढता—तो वह मेरा हिस्सा भी खा जाता।
और फिर मैं भूखा ही स्कूल लौटा जाता था।
शाम को माँ-बाप खेत से लौटते तो मैं शिकायत करता,
लेकिन भाई उल्टा हंगामा करता—
छत पर पत्थर फेंकना, दरवाज़ा तोड़ना, खुद को चोट पहुँचाने की धमकी देना…
माँ-बाप डर जाते थे और उसे कुछ कह नहीं पाते।
कई बार भूख से परेशान होकर जब मैं खिचड़ी बनाता,
तो वह उसे भी फेंक देता।
मैं छोटा था, कमजोर था—लड़ नहीं सकता था।
आज भी वो सारी बातें दिल में कहीं गहरे उतर जाती हैं।
मेरे माँ-बाप ने मुझे कभी हाथ नहीं लगाया—बड़े लाड़-प्यार से पाला।
लेकिन मेरा भाई उसी प्यार का फायदा उठाकर मुझ पर हावी रहता था। किसी तरह मुझे मरने का बहाना ढूढता था।
मेरे जमा किए पैसे तक चुरा लेता और धमकी देता—
“किसी को बताया तो बहुत मार पड़ेगी…”
डर के कारण मैं चुप रहता।ओर सब सहेता।ओर खुद ही रो कर चुप हो जाता ।
बचपन का सार
ये मेरा बचपन था—सपनों, संघर्षों, आँसुओं और हिम्मत का मिला-जुला सफर।
जहाँ एक तरफ माँ-बाप का प्यार था, वहीं भाई का डर भी था।
एक तरफ मिट्टी के पुल और कागज़ के नोटों वाली मासूम दुनिया थी,
तो दूसरी तरफ भूख, गरीबी और डर के साये भी।
लेकिन इन्हीं अनुभवों ने मुझे मजबूत बनाया—
यही संघर्ष एक दिन मेरी सबसे बड़ी ताकत बनाता गया।
जिन लोगों ने मेरे साथ में धोखा किया।(मुझे दुख पहुंचाया)
उनकी लिस्ट विवरण के साथ इस इस प्रकार है।
1) उत्तम शामराव चौधरी।
2) रामेश्वर राठौड़ गब्बू।
3) देवराव चौहान,(मेरा साडू)
4) हीरालाल नंदू चौहान।
5) रामकिशन रसाल राठौड़।
6)मधुकर झाड़ू पान पाटील
7) संजय सुभाष चौधरी।
8) आसाराम मार्को जसोदी
9) शिवा मधुकर चौहान।
10) मांगीलाल तारापार्टी।
11) रविंद्र खेमसिंह राठौड़।
12)अमरसिंह ऊखा राठौड़
13) सुमन (Sis) अमरसिंह।
14) Polition M
15)पूनम मोरसिंह राठौड़।
16) देवराव चौहान (साडू)
17) केशव हीरालाल चौहान।
18) विजय पाटिल सर, शिरपुर।
19) गुरुदयाल बाबू पवार,
20) जीवन लक्ष्मण चौहान।
21) संजय दोला राठौड़
22) भावा दौला राठोड
23) नंदू लक्ष्मण चौहान।
24) राजू झामु चौहान
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विवरण
1) उत्तम शामराव चौधरी।
मेरे बड़े भाई राजेश की शादी की तारीख निकल गई थी और शादी करने के लिए पैसा कम पड़ रहा था।उस समय उत्तम चौधरी ब्याज से पैसे बांटता था। मैंने उससे अपनी प्रॉब्लम बता कर ब्याज से पैसे लेने की बात कही तो उसने मुझे मना कर दिया।एक-दो दिन बाद उसके सूत्रों ने मुझे बताया कि वहां तेरे पास से
पानी के लिए कुआं खोदने कि,जमीन लेना चाहता है।मैंने तुरंत हां कर दिया। वैसे भी मुझे पैसों की आवश्यकता थी।क्योंकि शादी की तारीख नजदीक आ रही थी और मेरे पास पैसा नहीं था।
जब जमीन के सौदे के लिए बैठे।तो बैठक में तय हुआ कि ₹50000 में। सिर्फ एक आरा (1000 स्केयर फिट)कुआं खोदने के लिए ही जमीन देना है।जब मैं रजिस्ट्री की जानकारी लेने ब्रानपुर पहुंचा तो मुंशी ने मुझे कहा कि एक आरे की रजिस्ट्री नहीं होगी। कम-से-कम 10 आरे की रजिस्ट्री होगी।जब मैंने यह बात घर पर बताई तो घर वालों ने मुझे साफ मना कर दिया।
फिर दोबारा हमारे घर में बैठक हुई। इस बैठक में हीरालाल, नंदू चौहान, करतार राठौड़ थे।
तो वहां पर उत्तम चौधरी मेरे घर वालों को समझाने लगा कि मुझे 10आरे की आवश्यकता नहीं है। मात्र एक आरे की ही आवश्यकता है।और वैसे भी वहां 10
आरे लेकर मैं क्या करूंगा, मुझे वाहा खेती करने तो आना नहीं है। मुझे सिर्फ कुए के लिए जगह चाहिए।मेरे लिए एक आरा बहुत है। मेरे घर वालों के मना करने के बावजूद मैंने उसकी बात सुनी।और उसके कहने के मुताबिक मैंने उसको 10आरे की रजिस्ट्री कर दी ।रजिस्ट्री करने के कुछ ही दिनों बाद उसने दोस
10 आरे पर कब्जा कर लिया।और कहने लगा कि मैंने तुमसे 10 जमीन खरीदी है।देखो मेरे पास में रजिस्ट्री भी है।जब मैं बीच वाले व्यक्ति से कहने लगा कि देखो मेरे साथ में उत्तम काका धोखा कर रहा है तो उन्होंने मुझे कहा, तुम तुम्हारा देखो हमें कुछ नहीं पता। और कानूनी दायरे से मैं उसका कुछ भी नहीं कर सकता।इतना कुछ होने के बाद भी मैंने उनसे कहा कि काका जी जब भी आप यह जमीन बेचोगे, मुझे जरूर बताना।और फिर दोबारा उसने मेरे साथ में धोखा किया, मुझे बिना बताए जमीन बेच दी।मैं आज भी उस जमीन को देखता हूं तो मेरे साथ में किया गया धोखा मुझे याद आ जाता है।इसलिए मैं खेत में बहुत कम जाता हूं।
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2) रामेश्वर(गबु)राठौड़
शुरुआत गहरी दोस्ती से होती है। आलम ऐसा था कि दिन के 24 घंटे में से 15 घंटे साथ में बिताया करते थे।हर एक प्राइवेट से प्राइवेट बाद भी एक दूसरे को शेयर किया करते थे। हम एक दूसरे को जय-वीरू से भी बढ़कर समझते थे।एक दिन अचानक मेरे दिमाग में एक आइडिया आया।और मैंने गब्बू से कहा, क्यों ना हम अपनी दोस्ती को बिजनेस पार्टनर में बदल ले। जिससे हम पैसा भी कमाएंगे और खूब टाइम साथ में रहकर इंजॉय भी करेंगे।गब्बू ने मुझसे पूछा, वह कैसे और कौन सा बिजनेस करेंगे।मैंने उससे कहा देख गाने सुनने का हम दोनों को बहुत शौक है।तो अपन दोनों मिलकर।डीजे साउंड का काम चालू करते हैं।
और वैसे भी गब्बू मेरी कोई बात का मना नहीं करता था।उसने तुरंत हां कह दीया।मैंने उससे कहा, हम पार्टनरशिप में बिजनेस तो करेंगे लेकिन हमारी दोस्ती में कोई दरार नहीं पढ़नी चाहिए क्योंकि जब घर में सगे भाई कि नहीं बनती, तो हो सकता है। बिजनेस में अपनी भी कुछ अनबन हो जाए और इस खराब स्थिति का भी हमें सामना करना है।जिस दिन मुझे लगेगा।या फिर तुझे लगेगा कि हम दोनों के बीच में कुछ अच्छा नहीं चल रहा है उस परिस्थिति में मुझे बिंदास बता देना।मैं तुझसे बिना कोई सवाल जवाब किए पार्टनरशिप से बाहर निकल जाऊंगा।क्योंकि मेरी व्यक्तिगत सोच थी। मैं तो भविष्य में कोई भी बिजनेस या जॉब करके .अपना और अपने परिवार का पेट पाल लूंगा लेकिन मेरा दोस्त गब्बू कम पढ़ा लिखा है इसलिए मैं यहां बिजनेस उसको दे दूंगा।.मैंने पार्टनरशिप करने से पहले नेगेटिव पॉजिटिव दोनों प्वाइंट उसको समझा दिए थे।हम दोनों के बीच में फूट डालने वाले बहुत सारे आएंगे लेकिन हमें किसी की बात नहीं सुननी है।.....
हम दोनों के पास में पैसों की बहुत प्रॉब्लम थी। हम लोग रोज हनुमान मंदिर पर बैठ कर।विचार विमर्श किया करते थे।लगभग एक से डेढ़ साल तक हमसे पैसों का जुगाड़ नहीं लग पाया था।
फिर उसी दरमियान मुझे नरेंद्र पवार का कॉल आया और कहने लगा। क्या आप जॉब करने की इच्छुक हो वैसे भी हमारे पास डीजे साउंड खरीदने के लिए पैसे नहीं थे तो मैंने जॉब करना उचित समझा।और फिर मैं महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी में एंकरिंग के जॉब के लिए चला गया।
उस के बाद गबु मुझसे फोन पर रोज बात किया करता था ।फोन पर भी हमारी बिजनेस की प्लानिंग चलती थी। मैंने उनसे कहा, मैं जॉब करके थोड़े बहुत पैसे इकट्ठा कर लेता हूं।और फिर मैं वापस आकर हम दोनों साथ में डीजे साउंड सिस्टम चालू करेंगे।जॉब पर लगे मुझे तीन से चार महीने ही हो रहे थे कि गब्बू मुझसे कहने लगा कि तू वापस आ जा हम दोनों यहीं पर कुछ जुगाड़ करते हैं। तेरे बिना यहां कुछ नहीं हो सकता।मैंने उससे कहा, मैंने कंपनी वालों के साथ में एग्रीमेंट किया है। कंपनी वाले मुझे आने नहीं देंगे यह जाब छोड़ कर।गब्बू ने मुझसे कहा, तू कुछ भी कर और वापस आजा।
गब्बू को मैंने एक आईडिया दिया फोन पर मैंने कहा।तू कल मेरे बॉस को फोन लगाकर बोल कि सुनील की दादी शांत हो गई है। उसको अर्जेंट घर पर भेज दो तो मुझे घर पर भेज सकते हैं।और जैसा मैंने कहा, गब्बू ने वैसा ही किया। हम लोग प्लान में कामयाब हो गए और मैं जॉब छोड़ कर।घर वापस आ गया।उस दोरान मैं एलआईसी एजेंट का भी काम करता था। अब 24500 के समथिंग मेरे पास पैसे थे और हमें डीजे सिस्टम खरीदने के लिए लगभग ₹100000 की जरूरत थी।फिर मैंने गब्बू के कहने पर एक व्यक्ति (ईश्वर राठोड सातपायरी)।से।60000 रुपए ₹5 परसेंट से लिए।उसने मेरे खाते में इस दिनांक ..............को पैसे डाले।और फिर हम लोग अरुण पवार सर को लेकर इंदौर गए।इतने पैसे में ही हमने डीजे का सामान खरीदा।अब हमारे पास में ना ही जंनलेटर था ना ही कोई दुकान थी और ना ही कोई गाडी थी।अरुण काका के रिफरेंस से हमें किराए का रूम मिल गया।अब हम लोग जनरेटर और गाड़ी किराए से लेकर डीजे साउंड का काम चालू कर दिया।
उस समय गांव में जनरेटर नहीं होने के कारण हमें डोईफोडीया से जनरेटर किराए से लाना पड़ता था।शादी के आर्डर के 1 दिन पहले।और जैसे ऑडर खत्म हुआ उसे वापस वही पहुंचाने जाना पड़ता था।कितनी कठिनाइयों से हम दोनों ने दिन निकाले और मेहनत करके धीरे-धीरे हमने अपना खुद का जनरेटर खरीद लिया।अब शादी ब्याह के ऑर्डर भी हमें अच्छे से मिलने लगे थे।धीरे धीरे डीजे का सामान भी बड़ा लिया ।डीजे साउंड का हिसाब किताब मेरे पास में ही था क्योंकि गबु को मुझ पर बहुत भरोसा था।उसके पास में जो भी पैसे आते वह मेरे पास में दे देता था।और कुछ ही दिनों बाद में हमने पुराना लैपटॉप भी खरीद लिया।उस समय डीजे ऑपरेटिंग सिस्टम पर मैं खुद ही बैठता था।हम दोनों का काम में बहुत मन लग गया था। हम लोग अच्छे से काम करने लग गए थे।मेरे पास में पैसे का लेनदेन होने के कारण में हर एक बारीक से बारीक चीज़ लिखकर रख लिया करता था।क्योंकि लेनदेन के हिसाब किताब में हमारा विवाद ना हो इसलिए मैं हर एक चीज को लिखकर रख लिया करता था।
और शायद यही बात गब्बू को पसंद नहीं थी। वैसे उसने मुझे कभी बताया नहीं कि तू बारीक बारीक चीज क्यों लिख लेता है.3 साल हमने डीजे बहुत अच्छे से चला आया।और 3 साल बाद धीरे-धीरे गब्बू की नाराजगी मुझसे बढ़ने लगी।मैंने बहुत बार उससे पूछने की कोशिश की, लेकिन उसने मुझे कभी कुछ बताया ही नहीं।उसने मुझसे बात करना भी कम कर दिया था।बिना बात किए भी हमने 1 साल साथ में काम किया।शायद उसकी इच्छा थी कि मुझे पार्टनरशिप से बाहर निकाले, लेकिन वह मुझे बोल नहीं पा रहा था।कभी-कभी तो मुझे बिना बताए ही आर्डर पर जाने लग गया।धीरे धीरे मुझे अपने आप में ही गिल्टी फील होने लगी।
शायद गब्बू मुझ से छुटकारा पाना चाहता है। मुझसे पार्टनरशिप से दूर होना चाहता है और मैं उसके पीछे पड़ा हूं।फिर एक दिन मैंने उससे कहा कि गब्बू अपना-अपना हिसाब किताब कर लेते हैं।लेकिन वहां कभी हिसाब किताब करने के लिए बैठता ही नहीं।फिर एक दिन मैंने उसको जबरदस्ती हिसाब करने के लिए बैठाया,जब हमने हिसाब किया तो मेरे पैसे डीजे सिस्टम के तरफ ₹25000 निकले।जो मैंने मेरे जेब से खर्च किए थे।गब्बू को मेरे हाथ का हिसाब पसंद नहीं आया तो उसने उसके भाई विजय राठौड़, उसके जीजा जी और दिनेश चौहान को बुला कर हिसाब करवाया।उनके द्वारा हिसाब करने पर गब्बू के तरफ मेरे ₹35000 कैश निकला।मैंने उनके द्वारा हिसाब किए हुए की कॉपी में सिग्नेचर ले ली और मेरे पास में कॉफी आज भी पड़ी है।और डीजे की पार्टनरशिप का पैसा तो हमने अभी जोड़ा ही नहीं है। जब मैं डीजे सिस्टम से बाहर निकला उस समय लगभग ढाई लाख रुपए की प्रॉपर्टी थी हमारे पास में।
जैसे 1लेपटॉप,2मिक्सर 2,मशीन
1जनरेटर,18 इंची दो स्पीकर,
15 इंची4स्पीकर,कॉर्डलेस माइक एवम अन्य ऐसीसरीज।जब मैं पार्टनरशिप से बाहर निकला तो गब्बू ने मुझे ₹1 भी नहीं दिया। ना ही उसने मेरे जेब से खर्चा हुआ पैसा दिया।ना ही सिस्टम में से कोई हिस्सा दिया.उसने मेरे बारे में कुछ भी नहीं सोचा और मुझे पार्टनरशिप से बाहर निकाल दिया।और मैं भी बिना किसी को कोई शिकायत किए।पार्टनरशिप से बाहर हो गया।
आज तक नहीं मैंने उससे कभी पैसे मांगे और ना ही उसने मुझे कभी पैसे देने की बात कही।
लेकिन मुझे एक बात का अफसोस हमेशा था, है,और रहेगा,।आखिर मेरी गलती क्या थी?
उसने आज तक मुझे नहीं बताया।शायद किसी और के बारे में अच्छे विचार रखना ही बेवकूफी होती है और वह बेवकूफी मैंने की है।
बातें तो हम एक दूसरे से आज भी करते हैं लेकिन मेरे नजर में वह दोस्ती वाली इज़्ज़त बिल्कुल भी नहीं रही।गब्बू मुझसे सिर्फ एक बार बोल देता कि हमारी एक दूसरे से नहीं बन रही। मैं खुशी-खुशी से डीजे सिस्टम से बाहर हो जाता। उससे ₹1 भी नहीं मांगता और मैं उससे कभी नाराज भी नहीं होता लेकिन उसने तो मुझे.जिस प्रकार चाय में से मक्खी निकालकर फेंकते हैं वैसा उसने सिस्टम से मुझे बाहर फेंक दिया।..भविष्य में किसी के साथ में पार्टनरशिप करने की बात तो दूर उसका ख्याल भी दिमाग में नहीं ला पाऊगा।
लिखने की इच्छा तो बहुत कुछ है लेकिन पढ़ने वाला बोर हो जाएगा शायद मेरी सच्ची कहानी से क्योंकि आजकल सच्ची कहानी किसी को पसंद नहीं आती
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3) हिरालाल नंदू चौहान
एक दिन अरुण पवार सर की दुकान पर हीरा व्यापारी और अरुण पवार एक दूसरे से बात कर रहे थे। उतने में ही हीरा को फोन आता है उसके साले का.और वहां हीरा व्यापारी से बोलने लगता है कि कोई लड़का शादी के लिए हो तो आपके तरफ देखना।और इतने में ही उनकी नजर मेरे पर पड़ती है। मैं अमोल पाटील की दुकान पर बैठा था। वह मुझे बुलाते है और पूछते हैं क्या तू शादी करेगा?जैसे ही मैंने हां कहा, वैसे उन्होंने व्हाट्सएप पर फोटो बुलाकर मुझे दिखा दिया।मुझे फोटो पसंद आ गया। तीन-चार दिन बाद मैं अपने दोस्त पवन चौधरी को लेकर नागपुर चला गया लड़की देखने!
मुझे लड़की पसंद आ गई और कुछ ही दिन बाद मैंने शादी कर ली।तीन चार महीने शादीशुदा जीवन मेरा बहुत अच्छा चला ।
और मैं हीरा व्यापारी की मन ही मन बहुत इज्जत करने लगा। क्योंकि जहां मेरा इतना बड़ा परिवार होने के बाद मेंरी किसी ने मेरी शादी के बारे में नहीं सोचा ओर कोई शादी की बात नहीं कर रहा था, वहां पर हीरा व्यापारी ने मेरी शादी करवा कर मेरे नजरों में एक महान इंसान बन गए।
मैंने गांव में एक जमीन देख रखी थी। और वहां मुझे बहुत पसंद थी मैं उस जमीन को खरीदना चाहता था लेकिन मेरे पास में पैसा नहीं था।फिर मैंने सोचा इस जमीन को कोई और ना खरीद ले इसलिए मैंने मेरे साले साहब (निवेश पवार) को वहां जमीन खरीदने कि सलाह दी। मेरे साले( नितेश पवार) ने मुझे कहा कि यहां जमीन खरीद तो लुगा मै
लेकिन तू किसी को बताना मत।खासकर के हीरालाल चोहान और देवराव चौहान(मेरा बड़ा साडू) को बिल्कुल भी नहीं पता चलना चाहिए।
उनको अगर पता चल गया तो देवराव चौहान मुझे जमीन खरीदने नहीं देगा।जैसा नितेश भाई ने मुझे कहा, मैंने ठीक वैसा ही किया और वहां जमीन मैंने मेरे साले को दिलवा दी।जब कुछ दिन बाद यह जमीन की बात मेरे साढू को पता चली तो उसने हीरा व्यापारी को मेरे बारे में बढ़ चल कर।उलटी सीधी बात करने लगा।मेरे साढू ने हीरा व्यापारी से कहा कि तूने सुनील की शादी करवाई और सुनील ने तेरे को जरा सी बात भी नहीं बताई।उसने नितेश को जमीन दिला दी और तेरे कानों कान को खबर नहीं चलने दी।यह सुनकर हीरालाल को लगा कि सही तो बात है। मैंने सुनील की शादी करवाई और सुनील ने मेरे को जमीन खरीदी की बात बताई भी नहीं।बस इतनी सी बात और उन दोनों ने मिलकर मेरा शादीशुदा जीवन पूरा बर्बाद कर दीया उन दोनों ने मिलकर मेरे ऊपर इतने गंदे गंदे इल्जाम लगाए की मैं आपको बता भी नहीं सकता। मेरा परिवार एक दूसरे से अलग हो गया।तब से लेकर आज तक हीरालाल और उसका परिवार मेरे परिवार को बर्बाद करने के लिए कोई भी कसर नहीं छोड़ते हैं।मेरे ससुराल में जाकर मेरी इज्जत की धज्जियां उड़ाते हैं और बोलते हैं सुनील ने आपको जमीन दिलाकर फंसा दिया है जो जमीन आपने बोदरली में खरीदी है, उसे कोई आधे दाम में भी नहीं खरीदेगा। वहां जमीन मैंने मेरे साले साहब को ₹961000 में दिलाई थी 07/09/2017 को (रकबा 0.30 आरा) बार-बार मेरे साले साहब और ससुर को फोन लगाकर बोलते कि सुनील तुम्हारी जमीन में से पैसे खा गया ।और 3 साल बाद जब मैंने जमीन बेचने निकाली तो फिर मेरे साले साहब को फोन लगाकर हीरालाल का लडका केशव बोलने लगा कि जमीन के भाव बहुत ज्यादा है और जमीन कमी भाव में बेचना मत।जबकि मैं मेरे साले साहब को 3 साल में डबल रकम दिला रहा था। लेकिन हीरा और उसका परिवार नहीं चाहता था कि मेरे कारण मेरे साले को कोई फायदा पहुचे।बार बार फोन लगाकर या उसके घर जाकर बोलते कि सुनील से पैसे का व्यवहार करना मत वहां बहुत बुरा लड़का है और कैरक्टरलेस भी है।मेरे साढू ने और हीरालाल ने मेरा जीना हराम कर रखा है।बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो मैं आपको पब्लिकली नहीं बता सकता। उन्होंने मुझे कितना दुख दिया है।
घटना के 4 दिन बाद 25 जून 2021 को हीरालाल नंदू चौहान.. मेरे ससुराल के कहने पर मेरे घर पर आता है।
हीरालाल चौहान के सामने पूजा मुझ पर झूठे आरोप लगाने लगती है तो मैं अपना मोबाइल निकाल कर वीडियो शूटिंग चालू कर देता हूं।
बस इतनी सी बात पर हीरालाल चौहान एवम उसका लड़का पवन दोनों मेरे माता-पिता के सामने मुझे नंगी गालियां देकर मेरे साथ मारपीट करते और।
मेरे हाथ से मोबाइल छीन कर सबूत मिटाने का प्रयास करते हैं।
आप वीडियो में साफ-साफ देख सकते हो।
दूसरी घटना, 1 जुलाई 2021.
1 जुलाई को पूजा मुझसे कहती है। आज मेरा बर्थडे है।और मेरी तबीयत भी खराब है। आपने मुझे अभी तक माफ नहीं किया।मुझे लगा पूजा को अपनी गलती का एहसास हो गया है।मैं जैसे तैसे कर मैं भी पिछली बातों को भूलना चाहता था।
उसी रोज मैंने पूजा से कहा,,हम लोग ब्रानपुर जाकर हॉस्पिटल दिखा लेंगे,,और और बर्थडे केक भी लेकर आ जाएंगे,,,और घर पर ही बर्थडे मनाएंगे।
उस रोज पूजा बहुत खुश थी,,,मुझे नहीं पता। उसके मन में क्या चल रहा था ?
हम लोग ब्रानपुर जाने के लिए घर से निकलते हैं.... रास्ते में बर्जरी फाटे पर पूजा मुझसे कहती है...।एक बार मुझे मेरे प्रेमी से मिलना है।
इतना सुनने के बाद में गाड़ी रोक देता हूं।...और घर वापस चलने के लिए कहता हूं।
लेकिन पूजा मुझसे जिद करने लगती है।
मुझे मेरे प्रेमी से मिलना है।
और रोड से आने-जाने वाले वाहनों को रोककर ब्रानपुर जाने का प्रयास करती है।।
मैं उसके आगे हाथ पैर जोड़कर विनती करता हूं।
बार-बार बोलता हूं। मेरी इज्जत का तमाशा मत बना. हम घर चल कर बात करते हैं।
लेकिन पूजा मेरी एक नहीं सुनती।।।और एक बार तो ट्रक के सामने कूदने को करती है। मैं जैसे तैसे कर उसे बचाता हूं।
और मैं काफी खबर जाता हूं। कहीं आत्महत्या ना कर ले।
और अपने दोस्तों को फोन लगाकर मैं घटनास्थल पर बुलाता हूं।मेरे दोस्तों के समझाने पर पूजा घर वापस आ जाती है।
और मेरे परिवार से करतार सिंहराठौड़ काका) को घर बुलाकर घटना की सच्चाई बताता हूं ।
करतार राठौड़ के सामने पूजा मुझ पर फिर से झूठे आरोप लगाने लगती है।
इतना सुनकर मैं करता राठौड़ को बोलता हूं। मुझे अभी के अभी पूजा को उसके मायके
छोड़ कर आना है।
तो करता राठौड़ मुझे मना कर देता है।और मुझे बोलता है दो-चार दिन में उसके मां-बाप आकर उसको ले जाने वाले हैं,
लेकिन 8. 10 दिन बीत जाने के बाद भी उसके मां-बाप नहीं आते।
फिर मैं करता राठौड़ को बोलता हूं.. कि मेरे ऊपर ससुराल पक्ष के पैसे हैं। मैं पैसे का बहाना करके मेरे ससुराल वालों को यहां पर बुलाता हूं और पूजा की सच्चाई बताता हूं।
जैसे मैं ससुराल वालों को पैसे लेने के लिए बुलाता हूं, वहां तुरंत आ जाते हैं।
वह मेरे घर नहीं आते। हीरा व्यापारी के घर आते है।
और मैंने करता राठौड़ को पहले ही बोल दिया था। पहले मेरे पारिवारिक मैटर को सुलझाओ उसके बाद में अपने पैसे ससुराल वालों को दे दूंगा।
मुझे लगा मेरा काका है ।करता राठौड़ तो मुझे न्याय दिलाने में मदद करेगा। लेकिन वह तो हीरा के साथ और मेरे ससुराल वालों के मिल गया था।
दूसरे दिन करता राठौड़ के घर बैठक में मुझे बुलाया जहां पर मौजूद करता राठौड़ हीरालाल चौहान वह मेरे ससुराल पक्ष के लोग थे।
कुछ देर तक तो मुझे लग रहा था कि बैठक हमारे परिवारिक मैटर को समझाने के लिए ली जा रही है। लेकिन मुझे क्या पता कि वह लोगों को परिवार और से कोई लेना-देना नहीं था। उन्हें तो सिर्फ पैसों की पड़ी थी।
बैठक में मेरे ससुराल वाले मुझपर पैसों के लिए दबाव बनाने लगे।
जब मैंने कहा कि आप लोग मेरा पारिवारिक मैटर को सुलझा दो में पैसे देने के लिए तैयार हूं
तो उतने में करतार राठौड़ बोल पड़ा कि परिवार से कोई लेना देना नहीं है।तू पहले तेरे ससुराल वालों के पैसे दे।
मैं करतार राठौड की बात सुनकर पूरी तरह से शुण्य हो गया। मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
वे सभी के सभी पैसों की बातें कर रहे थे, लेकिन मेरे परिवार के बारे में कोई भी नहीं कुछ नहीं बोल रहा
अब तो मैं पूरी तरह से अकेला हो गया था क्योंकि मेरा काका भी मेरे तरफ से नहीं था।
फिर मैंने उनके सामने पैसे देने के लिए एक शर्त रख दी। जब तक आप मेरा पारिवारिक मैटर नहीं सुलजाओगे। मैं आपके पैसे नहीं दूंगा।
फिर करता राठौड़ और हीरालाल चौहान ने मेरे खिलाफ एक चाल चली।और मेरे खिलाफ एक साजिश रची।जिन लोगों को मैंने प्लॉट बेचे थे उन लोगों को मेरे खिलाफ भड़का कर मेरे घर पर भेजा।और उनके थ्रू मेरे ऊपर दबाव बनाने लगे।अब जिन लोगों को मैंने प्लाट बेचा है उनकी बात तो मुझे सुननी ही पड़ेगी क्योंकि मुझे उनसे पैसा लेना था।
फिर जैसा भी मुझे बोलते गए मैं वैसा ही करता रहा। मुझसे उन्होंने 1000.रु.के स्टांप पेपर पर लिखवा लिया और मुझसे चेक भी ले लिया।
और ₹50000 नगद और ₹150000 चेक के द्वारा उन्हें नगद दे दिया।
उसकि मां और भाई 17 जुलाई 2021 को पूजा को मेरे घर से लेकर चले गये।
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कहानी की शुरुआत एक बिजनेस प्लान से होती है।मैंने एक बिजनेस प्लान सोचा जिसमें मुझे गांव के हर एक समाज.एवम मार्केट वैल्यू वाले व्यक्ति की जरूरत थी।सभी अपने-अपने काम में माहिर व्यक्तियों को ही मैंने अपने प्लान में शामिल किया था।
जैसे..मार्केटिंग के लिए,संजय चौधरी जीवन पाटिल,
कानून कार्रवाई के लिए हिरालाल नंदू चौहान।
हिसाब मेंटेन के लिए सोहन सर
पत्रकार मेंटेन के लिए,खेमराज राठौड़
पूरा बिजनेस कवर करने के लिए मैं और मेरा दोस्त RP
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बड़े भाई की छाया — एक सच्ची कहानी
हमारे समाज में बड़े भाई को पिता के समान माना जाता है। यह माना जाता है कि बड़ा भाई घर में वह सहारा होता है, जो पिता की कमी महसूस नहीं होने देता। घर की जिम्मेदारियों को संभालने में उसकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है।
लेकिन मेरी जिंदगी में यह सब बिल्कुल उल्टा रहा।
मेरा बड़ा भाई, राजेश, मुझसे उम्र में लगभग चार साल बड़ा था। बचपन से ही उसका स्वभाव बहुत कठोर और आक्रामक था। छोटी-छोटी बातों पर वह मुझे मारता-पीटता था। मुझे बाहर बच्चों के साथ खेलने नहीं देता था। अगर मैं घर में खेलता, तो वह मेरे खिलौने तोड़ देता था। मैं छोटा और कमजोर था, इसलिए उसका विरोध करने की हिम्मत नहीं कर पाता था।
कई बार वह मेरे बाल पकड़कर मुझे जमीन पर पटक देता और लात-घूंसे से बेरहमी से मारता था। जब माता-पिता खेत पर काम करने जाते थे, तो जो काम बड़े भाई को बताया जाता, वह मुझसे करवाता था।
मुझे आज भी याद है — कड़कड़ाती ठंड में सुबह 4 बजे उठकर घर के लिए पानी भरना पड़ता था, जबकि भाई सोता रहता था। मेरे पास पहनने के लिए स्वेटर तक नहीं था। मैं ठंड में रोते हुए आधा-आधा घड़ा भरकर पानी लाता था, ताकि मम्मी को परेशान न करना पड़े।
घर का लगभग सारा काम — झाड़ू, बर्तन, सफाई, लकड़ी लाना — मुझे ही करना पड़ता था। कई बार मेरे हिस्से का खाना भी भाई खा जाता था और मैं भूखा रह जाता था।
त्योहारों पर भी मेरे साथ भेदभाव होता था। अगर मेरे लिए नए कपड़े या पटाखे आते, तो भाई छीन लेता था। शिकायत करने पर मम्मी मुझे ही समझा देती थीं, क्योंकि भाई किसी की बात नहीं मानता था।
भाई का स्वभाव इतना आक्रामक था कि अगर उसे डांटा जाता, तो वह घर के खपरैल पर पत्थर मार देता था। कई बार घर का सामान तोड़ देता था। इस डर से घर वाले भी उससे डरते थे।
स्कूल के समय भी उसने मुझे बहुत परेशान किया। मेरी किताबें छीन लेना, फाड़ देना, स्कूल बैग से सामान निकाल लेना — यह सब आम बात थी। कई बार भूख लगने पर मैं खुद खिचड़ी बनाता, तो वह भी खा लेता और बाकी फेंक देता।
धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ और मेहनत करके पैसे कमाने लगा। गांव में कपास की ट्रॉली भरने का काम करता था। हफ्ते में 150-200 रुपये कमा लेता था। लेकिन भाई वह पैसे भी चुरा लेता था।
मैं अपने कपड़े, जूते, बैग — सब खुद खरीदता था। शायद यही बात उसे सबसे ज्यादा चुभती थी।
भाई पढ़ाई में कमजोर था और 8वीं में दो बार फेल हो गया। उसने गुस्से में अपने स्कूल के कागज फाड़ दिए और पढ़ाई छोड़ दी। इसके बाद उसका काम सिर्फ गांव में घूमना, झगड़े करना और गलत संगत में रहना रह गया।
घर की जिम्मेदारी धीरे-धीरे मेरे और मेरी मां के कंधों पर आ गई। पिता जी सिलाई का काम करते थे, लेकिन अक्सर शराब पी लेते थे।
समय के साथ लोगों ने कहना शुरू किया कि भाई की शादी करवा दो, शायद वह सुधर जाए। आखिरकार हमने उसकी शादी कराने का फैसला किया। उस समय मेरी उम्र लगभग 18 साल थी और हमारे पास पैसे नहीं थे।
मजबूरी में हमें ब्याज पर पैसे लेने पड़े। इसके लिए हमें अपनी जमीन का हिस्सा बेचना पड़ा। हमें धोखे से 1 आरा की जगह 10 आरा जमीन रजिस्ट्री करवानी पड़ी। बाद में पूरी जमीन पर कब्जा कर लिया गया।
यह हमारे जीवन का बहुत बड़ा नुकसान था, लेकिन मजबूरी में हमें चुप रहना पड़ा।
कुछ समय बाद वह जमीन भी हमसे हमेशा के लिए चली गई।