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Sunday, 1 September 2024

स्नेहा एक साधारण परिवार की लड़की थी

 स्नेहा एक साधारण परिवार की लड़की थी, लेकिन उसकी मेहनत और लगन ने उसे एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर पहुंचा दिया था। उसके पिता, एक शिक्षक, ने उसे और उसके भाई को अच्छे संस्कार और शिक्षा दी थी। जब उसकी शादी की बात अर्जुन के परिवार से तय हुई, तो घर में खुशी की लहर दौड़ गई। अर्जुन एक संपन्न परिवार से था, और उसके माता-पिता ने स्नेहा को इसलिए पसंद किया क्योंकि वह एक सरकारी नौकरी में कार्यरत थी। लेकिन स्नेहा का सांवला रंग उनके मन में एक छोटी सी खटास पैदा कर रहा था, जिसे उन्होंने छुपा कर रखा था।


💍 *सगाई का दिन* आ चुका था। स्नेहा ने सादगी से सजी अपनी पसंदीदा गुलाबी साड़ी पहनी थी। अंगूठी पहनाई जा चुकी थी, और लोग धीरे-धीरे खाने में व्यस्त हो गए थे। स्नेहा अपनी सहेली और होने वाली जेठानी सीमा के साथ एक कोने में बैठी थी। सभी बातें कर रहे थे, लेकिन स्नेहा को अंदर से एक अजीब सी बेचैनी हो रही थी।


🌸 तभी उसकी सासू माँ, सुनीता देवी, कमरे में आईं और स्नेहा के पास बैठकर बोलीं, "देखो स्नेहा, अब शादी में कुछ ही दिन बचे हैं। धूप में कम निकला करो, और रात को बेसन, दही, और हल्दी का लेप लगाया करो। इससे रंग थोड़ा साफ़ हो जाएगा।" स्नेहा ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला दिया, लेकिन अंदर से वह आहत हो गई थी।


सीमा, जो हमेशा खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने की कोशिश करती थी, हंसते हुए बोली, "हाँ, नींबू और टमाटर का रस लगाओ, रंग जरूर साफ़ हो जाएगा। वैसे देवर जी को गोरी-चिट्टी लड़कियाँ पसंद हैं, मेरी तरह!" वह खिलखिलाते हुए हंस पड़ी, और माहौल में थोड़ी हल्कापन आ गया। 😌


🕒 **दिन बीतते गए**, और शादी की तारीख नजदीक आती गई। स्नेहा पर ससुराल वालों का दबाव बढ़ता गया। जब भी अर्जुन का फोन आता, वह भी सांवलेपन को लेकर स्नेहा को छेड़ता था। कभी-कभी वह सीरियस हो कर कहता, "स्नेहा, मुझे तुम्हारे सांवलेपन से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन मम्मी का अरमान है कि बहुएँ गोरी-चिट्टी हों। भाभी तो गोरी हैं, तुम थोड़ी सांवली हो, तो जो टिप्स दी जा रही हैं, उन्हें मान लो न। आखिर खूबसूरत तो तुम ही दिखोगी।"


स्नेहा ये सब सुनकर चुप रह जाती, लेकिन उसके भीतर एक तूफान उमड़ रहा था। उसे लगता कि वह अपने ही अस्तित्व से लड़ रही है। उसकी माँ भी उसे समझातीं, "बेटा, इतने बड़े घर में रिश्ता हो रहा है, ये तुम्हारी नौकरी की वजह से मुमकिन हुआ है। वे बड़े लोग हैं, उनकी सोसाइटी में उठना-बैठना है। तुम किस्मत वाली हो कि उन्होंने तुम्हें चुना है, अपने रंग-रूप के बावजूद।"


💭 **स्नेहा के मन में कई सवाल उठते**, लेकिन वह खुद को समझाने की कोशिश करती कि शायद वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जैसे-जैसे शादी का दिन करीब आने लगा, ससुराल से मिलने वाली हिदायतें और भी ज्यादा कठोर होती गईं।


🎂 **शादी से एक सप्ताह पहले** अर्जुन का जन्मदिन था। अर्जुन ने अपने दोस्तों और परिवार के लिए एक पार्टी रखी थी और स्नेहा को भी बुलाया था। सुनीता देवी ने पहले ही फोन पर उसे साफ-साफ बता दिया था कि वह पार्लर से तैयार होकर आए। स्नेहा की माँ ने भी उसे भाई के साथ पार्लर भेज दिया।


जब स्नेहा पार्टी में पहुँची, तो उसे देखते ही सुनीता देवी का चेहरा कठोर हो गया। वह नाराज होकर बड़ी बहू सीमा को बुलाती हैं और कहती हैं, "इसे बाथरूम में ले जाकर अच्छे से तैयार कर दो, अपने मेकअप से।" लेकिन स्नेहा ने जाने से इंकार कर दिया। 🚫


🌩️ सुनीता देवी का गुस्सा चरम पर पहुँच गया और उन्होंने लगभग धक्का देते हुए स्नेहा से कहा, "न रंग है, न रूप, फिर तुम्हें घमंड किस बात का है? हमने अपने से छोटे घर से रिश्ता जोड़ कर गलती कर दी।" इतने में अर्जुन भी वहाँ आ गया और स्नेहा का हाथ पकड़कर उसे बाथरूम की ओर ले जाने लगा।


स्नेहा ने अर्जुन का हाथ धीरे से छोड़ा और अपनी सास के सामने जाकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में दृढ़ता थी। उसने कहा, "हाँ, मैं साधारण घर से हूँ, और मेरा रंग सांवला है। मुझे घमंड नहीं, बल्कि गर्व है अपनी पहचान पर। मैंने अपनी मेहनत से ये मुकाम हासिल किया है। मेरे माता-पिता ने मुझे सिखाया है कि इंसान को उसके रंग-रूप से नहीं, उसके गुणों से पहचाना जाता है। और अर्जुन, तुम्हें कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि तुमने बचपन से यही देखा है कि औरतें सजावटी सामान हैं। लेकिन मुझे अपनी पहचान पर गर्व है, और मैं खुद को बदलने वाली नहीं हूँ।" 🌟


**स्नेहा ने अपनी सगाई की अंगूठी उतारकर सुनीता देवी के हाथ में रख दी** और अपने भाई का हाथ पकड़कर हॉल से बाहर निकल गई। वह एक आज़ाद हवा के झोंके की तरह बाहर निकली, अपने आत्म-सम्मान और पहचान के साथ। 🌬️


**उसने यह निर्णय लिया** कि वह ऐसे रिश्ते में नहीं बंधेगी, जहाँ उसकी पहचान को उसके रंग से तौला जाए। स्नेहा जानती थी कि असली खूबसूरती आत्म-सम्मान, गरिमा, और अपने आप पर गर्व करने में है। वह गर्व से सिर उठाए चली गई, एक नई शुरुआत की ओर। ✨

एक अखबार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस समय वह अख़बार देने आता था,

 एक अखबार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस समय वह अख़बार देने आता था, उस समय मैं उसको अपने मकान की 'गैलरी' में टहलता हुआ मिल जाता था। अत: वह मेरे आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए मेरे आवास में अख़बार फेंकता और मुझको 'नमस्ते डॉक्टर साब' वाक्य से अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था। 

क्रमश: समय बीतने के साथ मेरे सोकर उठने का समय बदल कर प्रात: 7:00 बजे हो गया।

जब कई दिनों तक मैं उसको प्रात: नहीं दिखा तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:00 बजे वह मेरा कुशल-क्षेम लेने मेरे आवास पर आ गया। जब उसको ज्ञात हुआ कि घर में सब कुशल- मंगल है, मैं बस यूँ ही देर से उठने लगा था।

वह बड़े सविनय भाव से हाथ जोड़ कर बोला, 

"डॉक्टर साब! एक बात कहूँ?"

मैंने कहा... "बोलो"

वह बोला... "आप सुबह तड़के सोकर जगने की अपनी इतनी अच्छी आदत को क्यों बदल रहे हैं? आप के लिए ही मैं सुबह तड़के विधान सभा मार्ग से अख़बार उठा कर और फिर बहुत तेज़ी से साइकिल चला कर आप तक अपना पहला अख़बार देने आता हूँ...सोचता हूँ कि आप प्रतीक्षा कर रहे होंगे।"

मैने विस्मय से पूछा... "और आप! विधान सभा मार्ग से अखबार लेकर आते हैं?"

“हाँ! सबसे पहला वितरण वहीं से प्रारम्भ होता है," उसने उत्तर दिया।

“तो फिर तुम जगते कितने बजे हो?"

“ढाई बजे.... फिर साढ़े तीन तक वहाँ पहुँच जाता हूँ।"

“फिर?" मैंने पूछा।

“फिर लगभग सात बजे अख़बार बाँट कर घर वापस आकर सो जाता हूँ..... फिर दस बजे कार्यालय...... अब बच्चों को बड़ा करने के लिए ये सब तो करना ही होता है।”

मैं कुछ पलों तक उसकी ओर देखता रह गया और फिर बोला, “ठीक! तुम्हारे बहुमूल्य सुझाव को ध्यान में रखूँगा।"

घटना को लगभग पन्द्रह वर्ष बीत गये। एक दिन प्रात: नौ बजे के लगभग वह मेरे आवास पर आकर एक निमंत्रण-पत्र देते हुए बोला, “डॉक्टर साब! बिटिया का विवाह है..... आप को सपरिवार आना है।“

निमंत्रण-पत्र के आवरण में अभिलेखित सामग्री को मैंने सरसरी निगाह से जो पढ़ा तो संकेत मिला कि किसी डाक्टर लड़की का किसी डाक्टर लड़के से परिणय का निमंत्रण था। तो जाने कैसे मेरे मुँह से निकल गया, “तुम्हारी लड़की?"

उसने भी जाने मेरे इस प्रश्न का क्या अर्थ निकाल लिया कि विस्मय के साथ बोला, “कैसी बात कर रहे हैं, डॉक्टर साबजी! मेरी ही बेटी।"

मैं अपने को सम्भालते हुए और कुछ अपनी झेंप को मिटाते हुए बोला, “नहीं! मेरा तात्पर्य कि अपनी लड़की को तुम डाक्टर बना सके, इसी प्रसन्नता में वैसा कहा।“

“हाँ सरजी! लड़की ने मेकाहारा से एमबीबीएस किया है और उसका होने वाला पति भी वहीं से एमडी है ....... और सरजी! मेरा लड़का इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र है।”

मैं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा सोच रहा था कि उससे अन्दर आकर बैठने को कहूँ कि न कहूँ कि वह स्वयम् बोला, “अच्छा सरजी! अब चलता हूँ..... अभी और कई कार्ड बाँटने हैं...... आप लोग आइयेगा अवश्य।"

मैंने भी फिर सोचा आज अचानक अन्दर बैठने को कहने का आग्रह मात्र एक छलावा ही होगा। अत: औपचारिक नमस्ते कहकर मैंने उसे विदाई दे दी।

उस घटना के दो वर्षों के बाद जब वह मेरे आवास पर आया तो ज्ञात हुआ कि उसका बेटा जर्मनी में कहीं कार्यरत था। उत्सुक्तावश मैंने उससे प्रश्न कर ही डाला कि आखिर उसने अपनी सीमित आय में रहकर अपने बच्चों को वैसी उच्च शिक्षा कैसे दे डाली?

“सर जी! इसकी बड़ी लम्बी कथा है फिर भी कुछ आप को बताये देता हूँ। अख़बार, नौकरी के अतिरिक्त भी मैं ख़ाली समय में कुछ न कुछ कमा लेता था। साथ ही अपने दैनिक व्यय पर इतना कड़ा अंकुश कि भोजन में सब्जी के नाम पर रात में बाज़ार में बची खुची कद्दू, लौकी, बैंगन जैसी मौसमी सस्ती-मद्दी सब्जी को ही खरीद कर घर पर लाकर बनायी जाती थी।

एक दिन मेरा लड़का परोसी गयी थाली की सामग्री देखकर रोने लगा और अपनी माँ से बोला, 'ये क्या रोज़ बस वही कद्दू, बैंगन, लौकी, तरोई जैसी नीरस सब्ज़ी... रूख़ा-सूख़ा ख़ाना...... ऊब गया हूँ इसे खाते-खाते। अपने मित्रों के घर जाता हूँ तो वहाँ मटर-पनीर, कोफ़्ते, दम आलू आदि....। और यहाँ कि बस क्या कहूँ!!'"

मैं सब सुन रहा था तो रहा न गया और मैं बड़े उदास मन से उसके पास जाकर बड़े प्यार से उसकी ओर देखा और फिर बोला, "पहले आँसू पोंछ फिर मैं आगे कुछ कहूँ।"

मेरे ऐसा कहने पर उसने अपने आँसू स्वयम् पोछ लिये। फिर मैं बोला, "बेटा! सिर्फ़ अपनी थाली देख। दूसरे की देखेगा तो तेरी अपनी थाली भी चली जायेगी...... और सिर्फ़ अपनी ही थाली देखेगा तो क्या पता कि तेरी थाली किस स्तर तक अच्छी होती चली जाये। इस रूख़ी-सूख़ी थाली में मैं तेरा भविष्य देख रहा हूँ। इसका अनादर मत कर। इसमें जो कुछ भी परोसा गया है उसे मुस्करा कर खा ले ....।"

उसने फिर मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और जो कुछ भी परोसा गया था खा लिया। उसके बाद से मेरे किसी बच्चे ने मुझसे किसी भी प्रकार की कोई भी माँग नहीं रक्खी। डॉक्टर साब! आज का दिन बच्चों के उसी त्याग का परिणाम है।

उसकी बातों को मैं तन्मयता के साथ चुपचाप सुनता रहा।

आज जब मैं यह संस्मरण लिख रहा हूँ तो यह भी सोच रहा हूँ कि आज के बच्चों की कैसी विकृत मानसिकता है कि वे अपने अभिभावकों की हैसियत पर दृष्टि डाले बिना उन पर ऊटपटाँग माँगों का दबाव डालते रहते हैं...!!

सुधा की नई-नई शादी हुई थी

 सुधा की नई-नई शादी हुई थी और वह एक महीने बाद अपने मायके लौटी।** 🏠💔 **अपनी माँ के सामने बैठकर सुधा आंसू बहाते हुए बोली, "माँ, तुमने मुझे किस घर में भेज दिया। वहाँ मेरी कोई इज्जत ही नहीं है। सारा दिन नौकरानी की तरह रसोई में खड़ी रहती हूँ। किसी को भी मुझ पर दया नहीं आती। कभी सास-ससुर की रोटियाँ पकाओ, कभी छोटे देवरों की, फिर ननद के कॉलेज से लौटने पर उसके लिए रोटियाँ बनाओ।"😢🍲


"और माँ, आए दिन सासू माँ के रिश्तेदार आते रहते हैं। उनके लिए मुझे ही चाय-नाश्ता और खाना तैयार करना होता है। रोज गंदे कपड़ों के ढेर इकट्ठे हो जाते हैं। आराम ही नहीं मिलता, जिंदगी नर्क सी बन गई है। और तो और, नारायण बिस्तर पर बैठे-बैठे ही सब कुछ चाहते हैं।** 😓👗 **जानते हो, बीते दिन मुझे अपने पति पर तब गुस्सा आया जब उन्होंने महीने की पूरी तनख्वाह सासू माँ के हाथ में रख दी और मुझसे कहा कि मुझे जो कुछ भी चाहिए, उसे एक पर्ची पर लिखकर देना। वह शाम को ड्यूटी से लौटते वक्त ले आएंगे।" 😔💸


सुधा की बातों को ध्यान से सुनने के बाद उसकी माँ ने थोड़ा सोचकर कहा, "तो तुम क्या चाहती हो बेटा? क्या तुम उनके साथ नहीं रहना चाहती? बस तुम और तुम्हारे पति अलग रहना चाहते हो? अगर ऐसा है, तो मैं तुम्हें दो रास्ते बताती हूँ। 🛤️ **एक तो तुम वही रहो और उन सबकी सेवा करो क्योंकि वह परिवार भी अब तुम्हारा ही है। और दूसरा, तुम अपने पति को किसी किराए के मकान में ले जाओ। वहाँ तुम्हें किसी का खाना पकाना नहीं पड़ेगा, किसी के कपड़े धोने नहीं पड़ेंगे और तुम्हारे पति की पूरी तनख्वाह भी तुम्हें ही मिलेगी।"** 🏠🔑


**"लेकिन याद रखना बेटा, जब तुम्हारा खुद का बेटा होगा और वह बड़ा हो जाएगा, उसकी भी शादी होगी और जब तुम्हारी बहू आएगी, तब तुम यही चाहोगी कि तुम्हारा बेटा और बहू तुम्हारे साथ ही रहें और तुम अपने नाती-पोतों के साथ खेलो। जब तुम्हें प्यास लगेगी तो तुम्हारा नाती दौड़कर तुम्हारे लिए पानी का गिलास लाएगा। कोई तुम्हारे लिए ऐनक ढूंढकर लाएगा और कहेगा, 'दादी जी, खाना बन चुका है, चलो खाना खाएं।'"** 👵👶💖


**माँ ने आगे बोलना जारी रखा, "जिन कामों को तुम दुख समझ रही हो, दरअसल वही जीवन के महत्वपूर्ण क्षण हैं। एक सफल गृहणी हर कार्य को सरल बनाकर जल्दी ही निपटा देती है, उसका रोना नहीं रोती।** 🌸 **जो लोग दुनिया में सफल हुए हैं, वे अपनी जिम्मेदारियों से भागते नहीं, बल्कि उन्हें बखूबी निभाते हैं।** 💪 **और बेटा, यह जो तुम जिन्दगी की परेशानियाँ समझ रही हो ना, वह तुम्हारी सासू माँ तुम्हें एक जिम्मेदार बनाने के लिए सिखा रही हैं। वह आने वाले समय की परेशानियों से निपटने के लिए तुम्हें तैयार कर रही हैं। वर्षों से हर सास अपनी बहू को जिम्मेदार बनाने के लिए ऐसा करती आई है। कल तुम भी अपनी बहू को जिम्मेदार बनाने के लिए उसे मजबूत बनाओगी।"** 🌻


**"बेटा, घर के बुजुर्ग कब तक रहेंगे और कब नहीं, कोई नहीं जानता। वे अपनी आने वाली पीढ़ियों को मजबूत और रिश्ते निभाते हुए देखना चाहते हैं। कल तुम भी अपने बच्चों से यही आशाएँ रखोगी।"** 🌳👪


**सुधा की आँखों में आंसू थे। सुधा ने उसी वक्त अपना बैग उठाया और बोली, "बस माँ, मैं समझ गई आपकी बात। आपकी बातों में अनमोल सीख है। मैं अभी अपने ससुराल वापस जा रही हूँ। शाम होने वाली है और सासू माँ के पैरों में दर्द रहता है, मुझे उनकी घुटनों की मालिश करनी है।"** 👜😊 **यह कहते हुए सुधा मुस्कुराती हुई ससुराल की ओर चल दी, जबकि उसकी माँ अपनी बेटी की समझदारी पर मुस्कुरा रही थी!** 🌷✨


**आशा करती हूँ कि यह छोटी सी कहानी आपको पसंद आई होगी। अगर कहानी अच्छी लगी हो तो एक लाइक कर देना और फॉलो करना मत भूलना!** ❤️👍

आरव एक लेखक था

 यह कहानी है आरव और काव्या की, जिनकी मुलाकात एक किताबों की दुकान में हुई थी और जिनका प्यार साहित्य के प्रति उनकी गहरी रुचि से बंधा हुआ था। 📚


आरव एक लेखक था, जिसने कई उपन्यास लिखे थे, लेकिन उसकी किताबें अभी तक ज्यादा प्रसिद्ध नहीं हो पाई थीं। ✍️ वह अक्सर शहर की एक छोटी सी किताबों की दुकान में जाया करता था, जहाँ वह नई-नई किताबें खोजता और अपने लिखने के लिए प्रेरणा पाता। काव्या एक साहित्य प्रेमी थी, जो एक लाइब्रेरी में काम करती थी और खाली समय में किताबें पढ़ने का शौक रखती थी। 📖


एक दिन, आरव अपनी पसंदीदा किताबों की दुकान में नई किताबों की खोज में था। तभी उसकी नजर एक लड़की पर पड़ी, जो बड़े ध्यान से एक किताब पढ़ रही थी। वह लड़की काव्या थी। 😊 आरव ने देखा कि वह उसकी लिखी हुई किताब को पढ़ रही थी। यह देखकर उसे बहुत खुशी हुई। उसने हिम्मत जुटाई और काव्या के पास जाकर बोला, "क्या आप इस किताब को पढ़ने का आनंद ले रही हैं?"


काव्या ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "हाँ, यह बहुत ही दिलचस्प है। इस लेखक का लेखन बहुत अच्छा है।" 😊 आरव ने अपनी मुस्कान छिपाते हुए कहा, "धन्यवाद, मैं वही लेखक हूँ।" यह सुनकर काव्या हैरान रह गई और उसने आरव से उसकी किताबों और लेखन के बारे में बातें करनी शुरू कीं। 📚


इस पहली मुलाकात के बाद, आरव और काव्या के बीच एक गहरी दोस्ती हो गई। वे अक्सर एक-दूसरे से मिलते, किताबों और लेखन पर चर्चा करते और एक-दूसरे के विचारों को साझा करते। काव्या ने आरव को अपने लेखन को और भी निखारने के लिए प्रेरित किया और उसकी कहानियों को और भी बेहतर बनाने में मदद की। 🌟


समय के साथ, आरव और काव्या के बीच की दोस्ती प्यार में बदल गई। ❤️ एक दिन, आरव ने काव्या को शहर के एक पुराने पुस्तकालय में बुलाया, जो दोनों का पसंदीदा स्थान था। वहां, उसने एक खास तैयारी की थी। उसने एक छोटी सी नोटबुक तैयार की थी, जिसमें उसने अपनी और काव्या की कहानी को लिखा था। 📓


आरव ने काव्या को वह नोटबुक दी और कहा, "काव्या, यह हमारी कहानी है। मैं चाहता हूँ कि हम इस कहानी को मिलकर लिखें। क्या तुम मेरी जिंदगी का हिस्सा बनोगी?" 😊 काव्या ने वह नोटबुक पढ़ी और उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने कहा, "हाँ, आरव, मैं तुम्हारे साथ अपनी कहानी को पूरा करना चाहती हूँ।" 😢❤️


दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया और उसी पुस्तकालय में अपने प्यार का इकरार किया। 🤗 इसके बाद, उन्होंने अपने परिवारों को अपने रिश्ते के बारे में बताया और कुछ महीनों बाद उनकी शादी हुई। 💍


आरव और काव्या ने मिलकर अपनी जिंदगी को एक खूबसूरत किताब की तरह जिया। 📖 उन्होंने मिलकर नई-नई कहानियाँ लिखीं और अपने प्यार को हमेशा जीवंत रखा। 🌹 उनकी कहानी यह सिखाती है कि जब दो लोग एक-दूसरे के सपनों और भावनाओं को समझते हैं और उन्हें पूरा करने का प्रयास करते हैं, तो उनकी जिंदगी एक खूबसूरत कहानी बन जाती है। ✨ आरव और काव्या का प्यार और साझेदारी इस बात का प्रतीक है कि सच्चा प्यार न केवल एक-दूसरे को समझने में होता है, बल्कि एक-दूसरे के सपनों को पूरा करने में भी होता है। 💖

अकेलेपन

 राहुल** ने जैसे ही ऑफिस जाते वक्त **कैलेंडर** पर नजर डाली, आज की तारीख देखकर उसका मन टूट गया। आज **9 जनवरी** थी और उसकी दुनिया में **अकेलेपन** की पहली बरसी थी। **शिवानी**, उसकी पत्नी, को गुज़रे पूरा एक साल हो गया था। कानून और समाज की नज़र में वे आज भी शादी के बंधन में बंधे थे, पर यह बंधन बस नाम का ही रह गया था। शिवानी को गए लंबा अरसा हो चुका था, और राहुल इस रिश्ते को खत्म करने की कोशिश में कभी आगे नहीं बढ़ पाया। 🥀


शिवानी के जाने का दर्द आज फिर ताज़ा हो उठा। राहुल ने अपने **लैपटॉप बैग** और **मोबाइल** को मेज पर रखा और नौकरानी शांति को एक कप **कॉफी** बनाने की हिदायत देकर **अलमारी** की ओर बढ़ गया। उसने उस नीले कवर वाले **लिफाफे** को निकाला, जिस पर आज भी शिवानी की लिखावट में '**राहुल**' लिखा हुआ था।


लिफाफे में **शिवानी का एक खत** था। उसने लिखा था, **"राहुल, मैं अपने जज्बातों को इस खत में उकेर कर जा रही हूं। जब यह चिट्ठी तुम्हें मिलेगी, मैं इस दुनियावी आडंबरों से बहुत दूर जा चुकी हूंगी। कल रात मुझे फिर वही सपना आया, तुम मुझे एक पार्टी में ले गए थे। सब हंसते और बात करते थे, फिर अचानक उनके चेहरे पर भयानक हंसी आ गई। तुम्हारा चेहरा भी डरावना हो गया।"**


राहुल को याद आया कि वह कितना **गुस्सैल** हो गया था। वह शिवानी पर अपना गुस्सा उतारता रहता था, जबकि शुरू में ऐसा नहीं था। उनका **वैवाहिक जीवन** खुशहाल था, पर धीरे-धीरे काम के बोझ ने राहुल को इतना परेशान कर दिया कि वह शिवानी पर अपनी सारी फ्रस्ट्रेशन निकालने लगा था। 😔


राहुल ने खत का बचा हिस्सा पढ़ना शुरू किया। शिवानी ने लिखा था, **"तुम्हारे गुस्से के बावजूद मैं तुम्हें प्यार करती रही, पर तुमने मुझे कभी प्यार नहीं दिया। तुम मेरे मोटापे का मज़ाक उड़ाते थे, जबकि मेरे हाइपोथायराइडिज्म के कारण मेरा वजन बढ़ गया था। मैंने तुम्हारी हर खुशी के लिए सब कुछ किया, पर तुम्हारी नज़रों में मैं हमेशा बुरी ही रही।"**


राहुल के दिल में कांटे चुभने लगे, लेकिन वह उस पीड़ा को भोगना चाहता था। उसने खत का अगला हिस्सा पढ़ना शुरू किया। शिवानी ने लिखा था, **"मैं अब इस रुग्ण मानसिक अवस्था का हिस्सा नहीं बन सकती। मुझे अपने वजूद को फिर से पाना है।"**


राहुल ने उस खत को बहुत देर तक थामे रखा। पिछले एक साल ने उसे बहुत कुछ सिखाया। उसे एहसास हुआ कि **पत्नी** केवल शोपीस नहीं होती, वह जीवन का अभिन्न अंग होती है। इस एक साल में उसने कई बार सोचा कि वह शिवानी को **फोन** करेगा और अपनी ज्यादतियों के लिए **माफी** मांगेगा। 📜💔


आज वह उसे बताना चाहता है कि उसे अपनी सभी **गलतियों** का एहसास है और उसे शिवानी की मुस्कान से प्यार है। वह जैसी भी है, उसकी अपनी है। अब वह और **इंतजार** नहीं कर सकता, उसे शिवानी को बताना है कि वह उससे बहुत **प्यार** करता है और उसकी हर कमी के बावजूद उसे अपनाना चाहता है। ❤️🌹

Saturday, 31 August 2024

यह सम्मान होगा उस प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग का जो एक आदमी अपने बच्चे के पालन के लिए कर सकता है

 बाप.💖..प्रस्तुत है वो कहानी जो मेरे अंतर्मन को छू गई .🌼

शहर के एक प्रसिद्ध अन्तरराष्ट्रीय के विद्यालय के बग़ीचे में तेज़ धूप और गर्मी की परवाह किये बिना, बड़ी लग्न से पेड़ - पौधों की काट छाँट में लगा था कि तभी विद्यालय के चपरासी की आवाज़ सुनाई दी, गंगादास! तुझे प्रधानाचार्या जी तुरंत बुला रही हैं।


गंगादास को आख़िरी के पांँच शब्दों में काफ़ी तेज़ी महसूस हुई और उसे लगा कि कोई महत्त्वपूर्ण बात हुई है जिसकी वज़ह से प्रधानाचार्या जी ने उसे तुरंत ही बुलाया है।

शीघ्रता से उठा, अपने हाथों को धोकर साफ़ किया और चल दिया, द्रुत गति से प्रधानाचार्या के कार्यालय की ओर। 


 उसे प्रधानाचार्या महोदया के कार्यालय की दूरी मीलों की लग रही थी जो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी। उसकी हृदयगति बढ़ गई थी। 


 सोच रहा था कि उससे क्या ग़लत हो गया जो आज उसको प्रधानाचार्या महोदया ने तुरंत ही अपने कार्यालय में आने को कहा।


      वह एक ईमानदार कर्मचारी था और अपने कार्य को पूरी निष्ठा से पूर्ण करता था। पता नहीं क्या ग़लती हो गयी। वह इसी चिंता के साथ प्रधानाचार्या के कार्यालय पहुँचा......

       #मैडम, क्या मैं अंदर आ जाऊँ? आपने मुझे बुलाया था।


हाँ। आओ और यह देखो" प्रधानाचार्या महोदया की आवाज़ में कड़की थी और उनकी उंगली एक पेपर पर इशारा कर रही थी। 

       "पढ़ो इसे" प्रधानाचार्या ने आदेश दिया।

       "मैं, मैं, मैडम! मैं तो इंग्लिश पढ़ना नहीं जानता मैडम!" गंगादास ने घबरा कर उत्तर दिया। 

     "मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ मैडम यदि कोई गलती हो गयी हो तो। मैं आपका और विद्यालय का पहले से ही बहुत ऋणी हूँ। क्योंकि आपने मेरी बिटिया को इस विद्यालय में निःशुल्क पढ़ने की इज़ाज़त दी। मुझे कृपया एक और मौक़ा दें मेरी कोई ग़लती हुई है तो सुधारने का। मैं आप का सदैव ऋणी रहूंँगा।" गंगादास बिना रुके घबरा कर बोलता चला जा रहा था।

      उसे प्रधानाचार्या ने टोका "तुम बिना वज़ह अनुमान लगा रहे हो। थोड़ा इंतज़ार करो, मैं तुम्हारी बिटिया की कक्षा-अध्यापिका को बुलाती हूँ।"

      वे पल जब तक उसकी बिटिया की कक्षा-अध्यापिका प्रधानाचार्या के कार्यालय में पहुँची बहुत ही लंबे हो गए थे गंगादास के लिए। सोच रहा था कि क्या उसकी बिटिया से कोई ग़लती हो गयी, कहीं मैडम उसे विद्यालय से निकाल तो नहीं रहीं। उसकी चिंता और बढ़ गयी थी।

      कक्षा-अध्यापिका के पहुँचते ही प्रधानाचार्या महोदया ने कहा, "हमने तुम्हारी बिटिया की प्रतिभा को देखकर और परख कर ही उसे अपने विद्यालय में पढ़ने की अनुमति दी थी। अब ये मैडम इस पेपर में जो लिखा है उसे पढ़कर और हिंदी में तुम्हें सुनाएँगी, ग़ौर से सुनो।"

      कक्षा-अध्यापिका ने पेपर को पढ़ना शुरू करने से पहले बताया, "आज मातृ दिवस था और आज मैंने कक्षा में सभी बच्चों को अपनी अपनी माँ के बारे में एक लेख लिखने को कहा। तुम्हारी बिटिया ने जो लिखा उसे सुनो।" 

      उसके बाद कक्षा- अध्यापिका ने पेपर पढ़ना शुरू किया।

      "मैं एक गाँव में रहती थी, एक ऐसा गाँव जहाँ शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाओं का आज भी अभाव है। चिकित्सक के अभाव में कितनी ही माँयें दम तोड़ देती हैं बच्चों के जन्म के समय। मेरी माँ भी उनमें से एक थीं। उन्होंने मुझे छुआ भी नहीं कि चल बसीं। मेरे पिता ही वे पहले व्यक्ति थे मेरे परिवार के जिन्होंने मुझे गोद में लिया। पर सच कहूँ तो मेरे परिवार के वे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझे गोद में उठाया था। बाक़ी की नज़र में तो मैं अपनी माँ को खा गई थी। मेरे पिताजी ने मुझे माँ का प्यार दिया। मेरे दादा - दादी चाहते थे कि मेरे पिताजी दुबारा विवाह करके एक पोते को इस दुनिया में लायें ताकि उनका वंश आगे चल सके। परंतु मेरे पिताजी ने उनकी 

एक न सुनी और दुबारा विवाह करने से मना कर दिया। इस वज़ह से मेरे दादा - दादीजी ने उनको अपने से अलग कर दिया और पिताजी सब कुछ, ज़मीन, खेती बाड़ी, घर सुविधा आदि छोड़ कर मुझे साथ लेकर शहर चले आये और इसी विद्यालय में माली का कार्य करने लगे। मुझे बहुत ही लाड़ प्यार से बड़ा करने लगे। मेरी ज़रूरतों पर माँ की तरह हर पल उनका ध्यान रहता है।"


    आज मुझे समझ आता है कि वे क्यों हर उस चीज़ को जो मुझे पसंद थी ये कह कर खाने से मना कर देते थे कि वह उन्हें पसंद नहीं है, क्योंकि वह आख़िरी टुकड़ा होती थी। आज मुझे बड़ा होने पर उनके इस त्याग के महत्त्व पता चला।"

     "मेरे पिता ने अपनी क्षमताओं में मेरी हर प्रकार की सुख - सुविधाओं का ध्यान रखा और मेरे विद्यालय ने उनको यह सबसे बड़ा पुरस्कार दिया जो मुझे यहाँ निःशुल्क पढ़ने की अनुमति मिली। उस दिन मेरे पिता की ख़ुशी का कोई ठिकाना न था।"

 यदि माँ, प्यार और देखभाल करने का नाम है तो मेरी माँ मेरे पिताजी हैं।


यदि दयाभाव, #माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी उस परिभाषा के हिसाब से पूरी तरह मेरी माँ हैं।

यदि त्याग, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी इस वर्ग में भी सर्वोच्च स्थान पर हैं।


 यदि संक्षेप में कहूँ कि प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग माँ की पहचान है तो मेरे पिताजी उस पहचान पर खरे उतरते हैं और मेरे पिताजी विश्व की सबसे अच्छी माँ हैं।


 आज मातृ दिवस पर मैं अपने पिताजी को शुभकामनाएँ दूँगी और कहूँगी कि आप संसार के सबसे अच्छे पालक हैं। बहुत गर्व से कहूँगी कि ये जो हमारे विद्यालय के परिश्रमी माली हैं, मेरे पिता हैं।


मैं जानती हूँ कि मैं आज की लेखन परीक्षा में असफल हो जाऊँगी। क्योंकि मुझे माँ पर लेख लिखना था और मैंने पिता पर लिखा,पर यह बहुत ही छोटी सी क़ीमत होगी उस सब की जो मेरे पिता ने मेरे लिए किया।

 धन्यवाद। 

आख़िरी शब्द पढ़ते - पढ़ते अध्यापिका का गला भर आया था और प्रधानाचार्या के कार्यालय में शांति छा गयी थी।


इस शांति में केवल गंगादास के सिसकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। बग़ीचे में धूप की गर्मी उसकी कमीज़ को गीला न कर सकी पर उस पेपर पर बिटिया के लिखे शब्दों ने उस कमीज़ को पिता के आँसुओं से गीला कर दिया था। वह केवल हाथ जोड़ कर वहाँ खड़ा था।  


उसने उस पेपर को अध्यापिका से लिया और अपने हृदय से लगाया और रो पड़ा।


प्रधानाचार्या ने खड़े होकर उसे एक कुर्सी पर बैठाया और एक गिलास पानी दिया तथा कहा, "गंगादास तुम्हारी बिटिया को इस लेख के लिए पूरे 15/15नम्बर दिए गए है। यह लेख मेरे अब तक के पूरे विद्यालय जीवन का सबसे अच्छा मातृ दिवस का लेख है। 🌼🍀


हम कल मातृ दिवस अपने विद्यालय में बड़े ज़ोर - शोर से मना रहे हैं। इस दिवस पर विद्यालय एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। विद्यालय की प्रबंधक कमेटी ने आपको इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने का निर्णय लिया है।🌼🍀


 यह सम्मान होगा उस प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग का जो एक आदमी अपने बच्चे के पालन के लिए कर सकता है। यह सिद्ध करता है कि आपको एक औरत होना आवश्यक नहीं है एक पालक बनने के लिए।🌼🌼


 साथ ही यह अनुशंषा करता है उस विश्वाश का जो विश्वास आपकी बेटी ने आप पर दिखाया। हमें गर्व है कि संसार का सबसे अच्छा पिता हमारे विद्यालय में पढ़ने वाली बच्ची का पिता है जैसा कि आपकी बिटिया ने अपने लेख में लिखा। 🌼


गंगादास हमें गर्व है कि आप एक माली हैं और सच्चे अर्थों में माली की तरह न केवल विद्यालय के बग़ीचे के फूलों की देखभाल की बल्कि अपने इस घर के फूल को भी सदा ख़ुशबूदार बनाकर रखा जिसकी ख़ुशबू से हमारा विद्यालय महक उठा। तो क्या आप हमारे विद्यालय के इस मातृ दिवस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनेंगे🌼

रो पड़ा गंगादास और दौड़ कर बिटिया की कक्षा के बाहर से आँसू भरी आँखों से निहारता रहा , अपनी प्यारी बिटिया को..🌼🍀🌺

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आज के दौर में लड़कियाँ शादी से पहले लड़के की कमाई पर ध्यान देती हैं

 पति को संभोग सुख दो तो वो तुम्हें दुनिया के सारे सुख देगा।** यह बात मैं हमेशा अपनी सहेलियों, माँ, और चाची से सुनती आ रही थी। लेकिन असल में, बात कुछ और थी। जब मेरी शादी 35 साल की उम्र में हुई, तब मेरे पति की उम्र 37 साल थी। पहले लोग जल्दी शादी करने पर जोर देते थे, लेकिन आजकल लोग पहले करियर बनाने में लगे रहते हैं। कम उम्र में शादी से पार्टनर और परिवार से घुलने-मिलने में आसानी होती है, लेकिन देर से हुई शादी में लोग नए माहौल में ढलने में कठिनाई महसूस करते हैं। 💍


**35 की उम्र में शादी करने से शरीर में कामवासना का स्तर भी घटने लगता है, और 37 साल के पुरुष में भी उतनी ऊर्जा नहीं बचती।** जब मेरी शादी हुई, तो मुझे पता था कि मेरे पति की आय कम है, लेकिन 35 साल की उम्र हो जाने के कारण मेरी माँ को मेरी शादी की चिंता होने लगी थी। पापा की असमय मृत्यु के बाद, परिवार ने मुझे शादी करने की सलाह दी। सहेलियों ने कहा कि पति को खुश रखो, वो खुद मेहनत करके ज्यादा कमाएगा। 💰💔


**शादी के बाद, मैंने पाया कि पति के साथ जिम्मेदारी भी आती है।** मेरे पति जानते थे कि मैं उनकी कम आय से खुश नहीं थी। उन्होंने शादी की पहली रात ही मुझसे कहा, "मेरी आय कम है, लेकिन हम साथ में खुश रह सकते हैं। मैं तुम्हें सभी संसाधन नहीं दे सकता, लेकिन इतना जरूर दे सकता हूं कि हमारी जिंदगी अच्छे से चल सके।" **ऐसे ही 20-22 दिन बीत गए, लेकिन हमारे बीच पति-पत्नी का रिश्ता नहीं बन पाया। शायद उन्हें लगा कि मैंने उन्हें मन से स्वीकार नहीं किया है।** 😔💔


**फिर सहेलियों से बात हुई, उन्होंने फिर वही बात कही कि उन्हें खुश रखो।** महीने के अंत में, पति ने मुझे 20000 रुपये दिए और कहा कि मेरी जरूरतें सीमित हैं, ये पैसे तुम रखो। पर जब मैंने हिसाब लगाया तो पैसे कम पड़े। जब मैंने उनसे इस बारे में बात की, तो उन्होंने कहा कि वे दूसरी नौकरी की कोशिश कर रहे हैं। छह महीने बाद हमारा झगड़ा हुआ, और मैं मायके आ गई। उन्होंने कई बार मुझे बुलाया, लेकिन मैंने गुस्से में कहा कि जब आप अच्छा कमाने लगेंगे, तब आना। **इस बात से उन्हें गहरा आघात लगा। उन्होंने वकील से बात कर तलाक की पेशकश की।** 😢🛑


**तलाक के बाद, मैं घर पर रही और फिर नौकरी करने का निश्चय किया।** अब मेरी उम्र 37 साल हो गई थी। नौकरी पर आने के बाद पता चला कि काम कितना कठिन है और डिवोर्सी महिला के साथ कैसे व्यवहार किया जाता है। मेरी तनख्वाह 15000 रुपये थी, और अब समझ में आया कि नौकरी करना कितना कठिन है। पहले 20000 रुपये घर बैठे मिलते थे, लेकिन अब 15000 रुपये के लिए दिनभर की मेहनत करनी पड़ती थी। 🏢💼


**आज मेरे पति की तनख्वाह 86000 रुपये है।** मैंने रिश्ते को पैसे के पैमाने पर तोला, जो सही नहीं था। यदि प्यार से समझती, तो जीवन बेहतर होता। **आज के दौर में लड़कियाँ शादी से पहले लड़के की कमाई पर ध्यान देती हैं, लेकिन असल में चरित्र पर ध्यान देना चाहिए।** शादी जैसे बंधन को चलाने के लिए आपसी सहमति, समझौता और विश्वास जरूरी है। 👫💕


**मुझे यह बात तब समझ आई जब मैंने अपना रिश्ता खो दिया।** किसी अमीर से चार बातें सुनने से बेहतर है कि किसी कम आय वाले के साथ खुशी से रहो। **ये एक सत्य घटना है, आप बताइए, आपके हिसाब से रिश्ते चलाने के लिए पैसे कितने जरूरी हैं?**

हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान,

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है,  और सभी हिंद...